तृतीय सोपान — भाग 2

अरण्यकाण्ड

वनवास, शूर्पणखा प्रसंग एवं माता सीता हरण की कथा।

अरण्यकाण्ड — सुनें

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वनवास, शूर्पणखा प्रसंग एवं माता सीता हरण की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥

कुंदकली, अनार, बिजली, कमल, शरदका चाँद और नागिन, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, हाथी, सिंह - ये सब आज खुद अपनी तारीफ सुन रहे हैं।

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥

बेल, सोना, केला हर्षित हो रहे हैं, इनके मनमें अब कोई शंका-संकोच नहीं। जानकी, सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे खुश हैं मानो राज पा गए हों।

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी॥

यह होड़ तुमसे कैसे सही जाती है, प्रिये, तुम जल्दी सामने क्यों नहीं आतीं? इस तरह ढूँढ़ते-विलाप करते हुए स्वामी राम मानो कोई अत्यंत विरही और व्याकुल प्रेमी लग रहे हैं।

पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी॥आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥

पूर्णकाम, आनंदराशि, अजन्मा-अविनाशी राम मनुष्यके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे जाकर उन्होंने गृध्रराज जटायुको गिरा पड़ा देखा, जो राम के चरण-चिह्नोंका स्मरण कर रहा था।

दोहा

कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर।निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर३०

कृपासागर रघुवीरने अपने हाथसे उसके सिरको छुआ। शोभाधाम राम का मुख देखते ही उसकी सारी पीड़ा जाती रही।

तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा॥नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही॥

तब धीरज धरकर जटायुने कहा - संसार-भयको मिटानेवाले राम, सुनिए, नाथ, रावणने मेरी यह दशा की है, उसी दुष्टने जानकीको हर लिया है।

लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई॥दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥

गोसाईं, वह उन्हें दक्षिण दिशाकी ओर ले गया, सीता कुर्रीकी तरह विलाप कर रही थीं। प्रभु, मैंने बस आपके दर्शनके लिए प्राण रोक रखे थे, अब कृपानिधान, ये चलना चाहते हैं।

राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता॥जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा॥

राम ने कहा - तात, शरीर बचाए रखिए। वह मुस्कुराते हुए बोला - मरते समय जिसका नाम मुखमें आ जाए तो घोर पापी भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद कहते हैं -

सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई॥

वही आप आज मेरी आँखोंके सामने खड़े हैं, नाथ, अब मैं किस कमीके लिए यह देह बचाए रखूँ? आँखोंमें आँसू भरकर रघुनाथ बोले - तात, आपने अपने पुण्य कर्मोंसे यह दुर्लभ गति पाई है।

परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥

जिनके मनमें दूसरोंका भला बसता है, उनके लिए संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं। तात, देह त्यागकर मेरे परमधाममें जाइए, आपको मैं क्या दूँ, आप तो पहले ही पूर्णकाम हैं।

दोहा

सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ३१

तात, सीताहरणकी बात पिताजीसे मत कहिएगा - अगर मैं राम हूँ तो रावण खुद अपने परिवारसहित वहाँ आकर यह बात कहेगा।

गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥

जटायुने पक्षी-देह त्यागकर विष्णुका रूप धारण किया, कई दिव्य आभूषण और पीतांबर पहने। श्याम शरीर, चार विशाल भुजाएँ, आँखोंमें आँसू भरे वह स्तुति करने लगा -

छंद

जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥

राम, आपकी जय हो, आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण भी हैं सगुण भी, और सच्चे अर्थमें गुणोंके प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावणकी भुजाओंको तोड़नेके लिए प्रचंड बाण धारण करनेवाले, धरतीको सुशोभित करनेवाले, बादल-जैसे श्याम शरीर, कमल-जैसे मुख-नेत्र, विशाल भुजाओंवाले, भवभयसे मुक्त करनेवाले कृपालु राम को मैं सदा नमन करता हूँ।

दोहा

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं

आप अपार बलवाले, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अगोचर, इंद्रियोंसे परे, सुख-दुखके द्वंद्वको मिटानेवाले, ज्ञानकी मूर्ति और धरतीके आधार हैं। जो संत राम-मंत्र जपते हैं, उन अनगिनत भक्तोंके मनको आनंद देनेवाले, निष्कामियोंके प्रिय और काम-जैसे दुष्ट भावोंका नाश करनेवाले राम को मैं सदा नमन करता हूँ।

दोहा

जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई

जिन्हें वेद निरंजन, ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और अजन्मा कहकर गाते हैं, जिन्हें मुनि ध्यान-ज्ञान-वैराग्य-योगसे पाते हैं, वे ही करुणाके सागर, शोभाके मूल प्रकट होकर सारे जगतको मोहित कर रहे हैं - मेरे हृदयकमलके भँवरे बने उनके अंग-अंगमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा शोभा पा रही है।

दोहा

जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी

जो अगम भी हैं सुगम भी, स्वभावसे निर्मल, विषम भी सम भी, सदा शांत हैं, जिन्हें योगी मन-इंद्रियोंको वशमें करते हुए बड़ी साधनासे देख पाते हैं - वे तीनों लोकोंके स्वामी, लक्ष्मीनिवास राम सदा अपने भक्तोंके वश रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें बसें, जिनकी पवित्र कीर्ति जन्म-मरणका चक्र मिटा देती है।

दोहा

अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम३२

अटूट भक्तिका वरदान माँगकर जटायु हरिधाम चला गया। राम ने उसकी अंत्येष्टि-क्रिया स्वयं अपने हाथों से पूरी की।

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी॥

रघुनाथ अत्यंत कोमल हृदयके, दीनदयालु और बिना किसी कारणके कृपालु हैं। जटायु पक्षियोंमें भी नीच और मांसाहारी था, फिर भी उसे वह दुर्लभ गति दी जो योगी तरसते हैं।

सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥

शिवजी कहते हैं - पार्वती, सुनो, वे अभागे हैं जो भगवानको छोड़कर सांसारिक विषयोंमें रम जाते हैं। फिर दोनों भाई सीताको खोजते आगे बढ़े, घने वनको निहारते हुए।

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥

वह सघन वन लताओं-वृक्षोंसे भरा है, वहाँ बहुत पक्षी, हिरण, हाथी, सिंह रहते हैं। रास्तेमें राम ने कबंध राक्षसको मार डाला, उसने मरते हुए अपने शापकी सारी कहानी सुनाई।

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥

बोला - दुर्वासाने मुझे शाप दिया था, प्रभुके चरण देखते ही वह पाप मिट गया। राम ने कहा - गंधर्व, सुनो, ब्राह्मणकुलसे द्रोह करनेवाला मुझे कभी नहीं भाता।

दोहा

मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव३३

जो मन-वचन-कर्मसे कपट छोड़कर ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, ब्रह्मा-शिवसहित मैं और सारे देवता उसके वश हो जाते हैं।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥

शाप देता, मारता या कड़वा बोलता ब्राह्मण भी पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील-गुणहीन ब्राह्मण भी पूजा जाए, पर गुणी और ज्ञानी शूद्र भी पूजनीय नहीं।

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥

राम ने उसे अपना धर्म समझाया, अपने चरणोंमें उसका प्रेम देखकर मन प्रसन्न हुआ। फिर रघुनाथके चरणोंमें सिर नवाकर वह अपना असली गंधर्व-रूप पाकर आकाशमें उड़ गया।

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥

उदार राम उसे मुक्ति देकर शबरीके आश्रम पहुँचे। राम को घर आया देखकर शबरीको मुनि मतंगके वचन याद आए और मन प्रसन्न हो उठा।

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥

कमल-जैसे नेत्र, विशाल भुजाएँ, सिरपर जटाओंका मुकुट, हृदयपर वनमाला - सुंदर साँवले-गोरे दोनों भाइयोंके चरणोंमें शबरी लिपट गई।

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥

प्रेममें डूबी वह कुछ बोल न पाई, बार-बार चरणोंमें सिर नवाती रही। फिर आदरसे जल लेकर दोनोंके चरण धोए और सुंदर आसनपर बिठाया।

दोहा

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि३४

वह रसीले, स्वादिष्ट कंद-मूल-फल लाकर राम को दिए, प्रभुने बार-बार तारीफ करते हुए प्रेमसे उन्हें खाया।

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥

फिर हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गई, प्रभुको देखकर उसका प्रेम और बढ़ गया - बोली, मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ, मैं नीच जातिकी और मंदबुद्धि हूँ।

अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥

अधमसे भी अधम स्त्रियाँ होती हैं, और उनमें भी मैं सबसे मंदबुद्धि हूँ। रघुनाथने कहा - सुनो, मैं तो बस भक्तिका ही नाता मानता हूँ।

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥

जाति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिवार, गुण, चतुराई - सब कुछ हो, पर भक्तिहीन मनुष्य ऐसा लगता है जैसे पानी बिना बादल।

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

अब मैं तुझे अपनी नवधा भक्ति बताता हूँ, ध्यानसे सुन और मनमें बसा ले। पहली भक्ति है संतोंका साथ, दूसरी है मेरी कथाओंमें प्रेम,

दोहा

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान३५

तीसरी भक्ति है निरभिमान होकर गुरुके चरणोंकी सेवा, चौथी है छल छोड़कर मेरे गुण गाना।

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

मेरे नाम-मंत्रका जाप और मुझपर दृढ़ विश्वास - यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है। छठी है इंद्रिय-संयम, अच्छा स्वभाव, तमाम कामोंसे वैराग्य और सदा संतोंके आचरणमें लगे रहना।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

सातवीं भक्ति है सारी दुनियाको मुझमें ही समाया देखना और संतोंको मुझसे भी बढ़कर मानना। आठवीं है जो मिले उसीमें संतुष्ट रहना, सपनेमें भी दूसरोंके दोष न देखना।

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

नौवीं है सरलता और सबके साथ निष्कपट व्यवहार, मनमें मेरा भरोसा रखना और न कभी हर्षमें फूलना न दुखमें टूटना। इन नौमेंसे जिसमें एक भी हो, वह चाहे स्त्री हो पुरुष, जड़ हो या चेतन -

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

वही मुझे सबसे प्रिय है, सखी। और तुझमें तो सारी नौ भक्तियाँ पक्की हैं। इसलिए जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वह आज तेरे लिए सहज हो गई है।

मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥

मेरे दर्शनका सबसे बड़ा फल यही है कि जीव अपने असली स्वरूपको पा लेता है। सखी, अगर तुझे गजगामिनी जानकीकी कोई खबर हो तो बता।

पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥

शबरीने कहा - रघुनाथ, आप पंपा सरोवर जाइए, वहीं सुग्रीवसे आपकी मित्रता होगी। देव, रघुवीर, वह सब बता देगा - धैर्यवान प्रभु, आप सब जानते हुए भी मुझसे क्यों पूछते हैं!

बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥

बार-बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर उसने प्रेमसहित यह सारी बात सुनाई।

छंद

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥

सब कथा कहकर, हरिका मुख निहारकर, हृदयमें उनके चरणकमल धारण करके, योगाग्निसे देह त्यागकर वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गई जहाँसे लौटना नहीं होता। तुलसीदास कहते हैं - मनुष्यो, तरह-तरहके कर्म-अधर्म और मत-मतांतर सब दुखदायी हैं, इन्हें छोड़ो और विश्वाससहित राम के चरणोंमें प्रेम करो।

दोहा

जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि३६

जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि जैसी थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया - अरे महामूर्ख मन, ऐसे प्रभुको भुलाकर तू सुख चाहता है?

चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥

राम ने वह वन भी छोड़ दिया, आगे चल पड़े - दोनों भाई अतुलनीय बलवान, मनुष्योंमें सिंहके समान। प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए तरह-तरहकी बातें कहने लगे -

लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥

लक्ष्मण, देखो तो वनकी शोभा, इसे देखकर किसका मन विचलित न हो। पक्षी-पशुओंके झुंड सब अपनी-अपनी संगिनीके साथ हैं - मानो मेरा उपहास कर रहे हों।

हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥

हमें देखकर हिरनोंके झुंड भागते हैं तो हिरनियाँ कहती हैं - तुम्हें डर नहीं, तुम तो साधारण हिरनसे जन्मे हो, आनंद करो, ये तो सोनेका हिरन ढूँढ़ने आए हैं।

संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥

हाथी अपनी हथिनियोंको साथ लगाए रखते हैं, मानो मुझे सिखा रहे हों कि स्त्रीको अकेला न छोड़ो। अच्छी तरह पढ़े शास्त्रको भी बार-बार दोहराना चाहिए, अच्छी सेवावाले राजाको भी पूरा वश में मत समझो।

राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥

स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखो, पर जवान स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। तात, यह सुंदर वसंत तो देखो, प्रियाके बिना यह मुझमें डर पैदा कर रहा है।

दोहा

बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल३७(क)

विरहसे व्याकुल, कमजोर और बिल्कुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौंरे और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया।

दोहा

देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात३७(ख)

पर जब उसके दूतने देखा कि मैं भाईके साथ हूँ, अकेला नहीं, तो यह सुनकर कामदेवने मानो अपनी सेना रोककर डेरा डाल दिया।

बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका॥

विशाल वृक्षोंमें उलझी लताएँ ऐसी लगती हैं मानो कई तंबू तान दिए गए हों। केला-ताड़ सुंदर झंडोंकी तरह हैं - इन्हें देखकर वही न मोहित हो जिसका मन बहुत धीर हो।

बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥कहूँ कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥

तरह-तरहके फूले पेड़ मानो अलग-अलग वर्दीवाले धनुर्धर हों, कहीं-कहीं सुंदर पेड़ ऐसे शोभित हैं मानो योद्धा अलग-अलग छावनी डाले हों।

कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते॥मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥

कोयलें कूज रही हैं मानो मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हों, ढेक-महोख पक्षी मानो ऊँट-खच्चर हैं, मोर-चकोर-तोते-कबूतर-हंस मानो सुंदर घोड़े हैं।

तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा॥रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥

तीतर-बटेर पैदल सैनिकोंके झुंड हैं, कामदेवकी इस सेनाका वर्णन ही नहीं हो सकता। पहाड़ोंकी चट्टानें रथ हैं, झरने नगाड़े हैं, पपीहे भाट बनकर गुणगान कर रहे हैं।

मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥

भौंरोंकी गुंजार ही भेरी-शहनाई है, शीतल-मंद-सुगंधित हवा मानो दूत बनकर आई है। इस तरह चतुरंगिणी सेना लिए कामदेव मानो सबको चुनौती देते हुए घूम रहा है।

लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह के जग लीका॥एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥

लक्ष्मण, कामदेवकी इस सेनाको देखकर भी जो धीर बने रहें, संसारमें उन्हींकी प्रतिष्ठा है। इस कामदेवका सबसे बड़ा हथियार तो बस एक स्त्री ही है, जो उससे बच जाए वही सच्चा योद्धा है।

दोहा

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ३८(क)

तात, काम, क्रोध और लोभ - ये तीन बड़े प्रबल शत्रु हैं। ये ज्ञानी मुनियोंके मनको भी पलभरमें डगमगा देते हैं।

दोहा

लोभ कें इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि३८(ख)

लोभका बल है इच्छा और दिखावा, कामका बल है बस स्त्री, और क्रोधका बल है कठोर वचन - ऐसा श्रेष्ठ मुनि विचारकर कहते हैं।

गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥कामिन्ह के दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥

शिवजी कहते हैं - पार्वती, राम तीनों गुणोंसे परे, चराचरके स्वामी और सबके मनकी बात जाननेवाले हैं। इन बातोंसे उन्होंने कामीजनोंकी लाचारी दिखाई और धीर पुरुषोंके मनमें वैराग्य और दृढ़ किया।

क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया॥सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला॥

क्रोध, काम, लोभ, मद, माया - ये सब राम की कृपासे ही छूटते हैं। जिसपर वे नटराज प्रसन्न हों, वह मनुष्य इस माया-जालमें कभी नहीं भटकता।

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥

उमा, मैं तुझे अपना अनुभव बताता हूँ - हरिका भजन ही सच है, यह पूरी दुनिया तो एक सपना है। फिर प्रभु पंपा नामक सुंदर, गहरे सरोवरके किनारे गए।

संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥

उसका पानी संतोंके मनकी तरह निर्मल है, चार सुंदर घाट बने हैं। तरह-तरहके पशु जहाँ-तहाँ पानी पी रहे हैं, मानो किसी उदार दानीके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो।

दोहा

पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म३९(क)

घने कमल-पत्तोंकी आड़में पानीका पता जल्दी नहीं चलता - ठीक वैसे ही जैसे मायाकी ओटमें निर्गुण ब्रह्म नहीं दिखता।

दोहा

सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं३९(ख)

उस अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एक-सी सुखी रहती हैं, जैसे धर्मपरायण लोगोंके दिन हमेशा सुखसे बीतते हैं।

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥

उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हैं, बहुत-से भौंरे मीठी गुंजार कर रहे हैं। जलमुर्गे और राजहंस ऐसे बोल रहे हैं मानो प्रभुको देखकर उनकी तारीफ कर रहे हों।

चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥

चकवा-बगुलोंका झुंड देखते ही बनता है, बयान नहीं हो सकता। पक्षियोंकी मीठी बोली ऐसी लगती है मानो रास्ते चलते राहगीरको बुला रही हो।

ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए॥चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला॥

उस सरोवरके पास मुनियोंने आश्रम बना रखे हैं, चारों ओर सुंदर वनके वृक्ष हैं - चंपा, मौलसिरी, कदंब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक, आम,

नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना॥सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ॥

कई पेड़ नए पत्तों-फूलोंसे लदे हैं, भौंरे उनपर गुंजार कर रहे हैं। शीतल-मंद-सुगंधित मनोहर हवा हर पल बहती रहती है।

कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥

कोयलें कुहू-कुहू कर रही हैं, उनकी मीठी बोली सुनकर मुनियोंका ध्यान भी टूट जाता है।

दोहा

फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ४०

फलोंके बोझसे झुककर सारे पेड़ धरतीके करीब आ गए हैं - जैसे परोपकारी लोग बड़ी संपत्ति पाकर विनम्र हो जाते हैं।

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥

राम ने यह सुंदर तालाब देखकर स्नान किया और बहुत सुख पाया। फिर एक अच्छे पेड़की छाया देखकर वे लक्ष्मणसहित बैठ गए।

तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥

वहाँ सब देवता-मुनि आए, स्तुति करके अपने-अपने धाम लौट गए। परम प्रसन्न कृपालु राम लक्ष्मणसे रसभरी कथाएँ कहने लगे।

बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥

भगवानको विरहमें देखकर नारदको बड़ा सोच हुआ - उन्होंने सोचा, मेरे ही शापको स्वीकार करके राम इतने दुख झेल रहे हैं।

ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥

ऐसे प्रभुके पास जाकर उन्हें देख लूँ, फिर ऐसा मौका न मिलेगा - यह सोचकर नारद वीणा लिए वहाँ पहुँचे जहाँ प्रभु सुखसे बैठे थे।

गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥

वे कोमल वाणीमें प्रेमसे राम के चरित्र गाते हुए आ रहे थे। दंडवत करते देखकर राम ने उन्हें उठाकर बहुत देर गले लगाए रखा।

स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥

फिर कुशल पूछकर पास बिठाया, लक्ष्मणने आदरपूर्वक उनके चरण धोए।

दोहा

नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि४१

नारदने कई तरहसे विनती की और प्रभुको प्रसन्न जानकर हाथ जोड़कर बोले -

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥

स्वभावसे उदार रघुनाथ, सुनिए, आप सुंदर, अगम भी और सुगम भी, वरदान देनेवाले हैं। स्वामी, मैं एक वरदान माँगता हूँ, यद्यपि आप अंतर्यामी होकर सब जानते ही हैं।

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥

राम ने कहा - मुनि, तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो, क्या मैं अपने भक्तसे कभी कुछ छिपाता हूँ? भला ऐसी कौन-सी चीज़ है जो मुझे प्रिय हो और तुम माँग न सको?

जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥

भक्तके लिए मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है, यह भरोसा भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारद हर्षित होकर बोले - मैं यह धृष्टता करते हुए ऐसा वरदान माँगता हूँ -

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥

यद्यपि प्रभुके अनेक नाम हैं और वेद कहते हैं वे सब एक-से-बढ़कर-एक हैं, फिर भी नाथ, रामनाम सब नामोंसे श्रेष्ठ हो, और यह पापरूपी पक्षियोंके लिए शिकारी-जैसा हो।

दोहा

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम४२(क)

आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात है, उसमें 'राम' नाम ही पूर्णचंद्र बनकर और बाकी सब नाम तारे बनकर भक्तोंके निर्मल हृदय-आकाशमें बसें।

दोहा

एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ४२(ख)

कृपासागर रघुनाथने मुनिसे 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदने मनमें बहुत हर्षित होकर प्रभुके चरणोंमें सिर नवाया।

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥

रघुनाथको बहुत प्रसन्न जानकर नारद फिर कोमल वाणीमें बोले - राम, सुनिए, जब आपने अपनी माया चलाकर मुझे मोहित किया था,

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥

तब मैं विवाह करना चाहता था, प्रभु, आपने किस वजहसे मुझे रोका? राम ने कहा - मुनि, सुनो, मैं तुम्हें प्रसन्नतासे बताता हूँ - जो सारा भरोसा छोड़कर बस मुझे ही भजते हैं,

करउँ सदा तिन्ह के रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥

मैं उनकी रक्षा वैसे ही सदा करता हूँ जैसे माँ बच्चेकी करती है - बच्चा दौड़कर आग या साँप पकड़ने जाए तो माँ उसे झट खींचकर बचा लेती है।

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥

पर वही बेटा बड़ा हो जाए तो माँ प्यार तो करती है, पर पुरानी वैसी सतर्कता नहीं रहती। मेरे लिए ज्ञानी वैसा ही है जैसे बड़ा हो चुका बेटा, और निरभिमानी सेवक मेरे छोटे बच्चे जैसा है।

जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥

मेरे सेवकके पास सिर्फ मेरा बल होता है, ज्ञानीके पास अपना बल - पर काम-क्रोध तो दोनोंके शत्रु हैं। यह समझकर बुद्धिमान लोग मुझे ही भजते हैं, ज्ञान पाकर भी भक्ति नहीं छोड़ते।

दोहा

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि।तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि४३

काम, क्रोध, लोभ, मद - ये मोहकी प्रबल सेना हैं, इनमें मायारूपी स्त्री सबसे भयानक दुख देनेवाली है।

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥

मुनि, सुनो, पुराण-वेद-संत कहते हैं कि स्त्री मोहरूपी वनके लिए वसंत ऋतु है। जप-तप-नियमरूपी सारे जलाशयोंको वह गर्मीकी तरह सोख लेती है।

काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥

काम, क्रोध, मद, ईर्ष्या - ये मेंढक हैं, इन्हें आनंद देनेवाली बरसात यही स्त्री है। बुरी वासनाएँ कुमुद हैं, उन्हें सदा सुख देनेवाली यह शरद ऋतु है।

धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥

सारे धर्म कमलोंके झुंड हैं, यह क्षणिक सुख देनेवाली स्त्री पाला बनकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवासा इस शिशिर-ऋतु स्त्रीको पाकर हरा-भरा हो उठता है।

पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥

पापरूपी उल्लुओंके लिए यह स्त्री सुखद घनी अँधेरी रात है। बुद्धि, बल, शील, सत्य - ये सब मछलियाँ हैं, और इन्हें फँसानेके लिए स्त्री बंसीके समान है, चतुर लोग यही कहते हैं।

दोहा

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि४४

जवान स्त्री अवगुणोंकी जड़, दुखदायी और सारे दुखोंकी खान है। इसीलिए मुनि, मैंने यह समझकर तुम्हें विवाहसे रोका था।

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥कहहु कवन प्रभु के असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥

रघुनाथके यह सुंदर वचन सुनकर मुनिका शरीर रोमांचित हो उठा, आँखें भर आईं - सोचने लगे, किस प्रभुकी ऐसी रीति है, सेवकपर इतना स्नेह-प्रेम!

जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥

जो भ्रम छोड़कर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानहीन, मूर्ख और अभागे हैं। फिर नारद आदरसे बोले - विज्ञानविशारद राम, सुनिए -

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥

रघुवीर, भवभयको मिटानेवाले नाथ, अब कृपा करके संतोंके लक्षण बताइए। राम ने कहा - मुनि, सुनो, मैं संतोंके गुण बताता हूँ, जिनकी वजहसे मैं उनके वश रहता हूँ।

षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥

वे छहों विकार जीत चुके, पापरहित, निष्काम, स्थिरचित्त, निस्संग, तन-मनसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानी, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी,

सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना॥

सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, निरभिमानी, धैर्यवान, धर्मके आचरणमें बड़े निपुण,

दोहा

गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह४५

गुणोंके भंडार, संसारके दुखसे परे और हर संशयसे मुक्त होते हैं - मेरे चरणकमलोंको छोड़कर उन्हें न देह प्यारी लगती है न घर।

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती॥

अपने गुण सुनकर सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुनकर खुश होते हैं। समभाव और शांत रहते हैं, न्याय कभी नहीं छोड़ते, सरल स्वभावके होकर सबसे प्रेम रखते हैं।

जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥

जप-तप-व्रत-संयम-नियममें रत रहते हैं, गुरु-गोविंद-ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, प्रसन्नता और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है।

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥

वैराग्य, विवेक, विनय, तत्त्वज्ञान और वेद-पुराणका सच्चा ज्ञान रखते हैं। कभी दिखावा, अभिमान या घमंड नहीं करते, भूलसे भी गलत राह पर पैर नहीं रखते।

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥

सदा मेरी लीलाएँ गाते-सुनते हैं, बिना किसी स्वार्थके दूसरोंका भला करते रहते हैं। मुनि, सुनो, संतोंके इतने गुण हैं कि सरस्वती और वेद भी उन्हें पूरा नहीं गिना सकते।

छंद

कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥सिरु नाह बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥

'शेष और सरस्वती भी नहीं बता सकते' - यह सुनते ही नारदने राम के चरण पकड़ लिए। दीनबंधु कृपालु प्रभुने इस तरह खुद अपने भक्तोंके गुण बताए। बार-बार सिर नवाकर नारद ब्रह्मलोक चले गए। तुलसीदास कहते हैं - वे लोग धन्य हैं जो सारी आशा छोड़कर बस हरिके रंगमें रँग गए हैं।

दोहा

रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग४६(क)

जो लोग रावणके शत्रु राम का पवित्र यश गाएँगे और सुनेंगे, वे बिना वैराग्य-जप-योगके भी राम की दृढ़ भक्ति पा लेंगे।

दोहा

दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग४६(ख)

जवान स्त्रीका शरीर दीपककी लौ-जैसा है, मन, तू उसका पतंगा मत बन। काम-मद छोड़कर राम को भज और सदा सत्संग कर।

दोहा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीय: सोपान: समाप्तः।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह तीसरा सोपान (अरण्यकाण्ड) समाप्त हुआ।

सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज में तोरें॥

सखा, धीरज रखो, मेरे बलपर तुम्हारा काम हर तरहसे बन जाएगा।