रामचरितमानसआरती
Dharma Path USA Foundation

द्वितीय सोपान

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

अयोध्याकाण्ड — सुनें

अयोध्याकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

श्लोक

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तकेभाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदाशर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्

जिनके अंग पर पर्वतराज की पुत्री पार्वती जी सुशोभित हैं, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षस्थल पर सर्पों के राजा शेषनाग विराजमान हैं - वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सबके स्वामी, सर्वव्यापी, चंद्रमा के समान कांतिमान श्री शंकर भगवान मेरी रक्षा करें।

श्लोक

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा

राज्याभिषेक की बात सुनकर जिनके मुखकमल की शोभा न तो हर्ष से बढ़ी और न वनवास के दुःख से म्लान हुई - रघुनंदन श्रीराम के उस मुखारविंद की शोभा सदा मुझे शुभ मंगल प्रदान करने वाली हो।

श्लोक

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्

नीलकमल के समान श्यामल और कोमल जिनका शरीर है, जिनके वाम भाग में सीता जी विराजमान हैं, और हाथों में सुंदर धनुष-बाण सुशोभित हैं - रघुकुल के स्वामी उन श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

श्रीगुरु के चरण-कमलों की रज से अपने मन-रूपी दर्पण को स्वच्छ करके मैं श्रीराम के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों फल देने वाला है।

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥

जब से राम विवाह करके घर लौटे, तब से प्रतिदिन नए मंगल-उत्सव होने लगे। चौदहों लोक मानो विशाल पर्वत हैं, जिन पर पुण्य-रूपी बादल सुख की वर्षा कर रहे हैं।

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥

ऋद्धि-सिद्धि और संपत्ति सुंदर नदियों के समान उमड़कर अयोध्या-रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष उत्तम कुल के मणियों के समान हैं - पवित्र, अमूल्य और हर प्रकार से सुंदर।

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥

नगर के ऐश्वर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता, मानो ब्रह्मा जी की समस्त कारीगरी यहीं सिमट आई हो। श्रीरामचंद्र के चंद्रमुख को निहारकर नगर के सभी लोग हर प्रकार से सुखी हैं।

मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥

सभी माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथ-रूपी लता को फलती देखकर आनंदित हैं। राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

दोहा

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु

सबके हृदय में यही अभिलाषा है, और सब महादेव जी को मनाकर प्रार्थना करते हैं कि राजा अपने जीते-जी राम को युवराज-पद प्रदान करें।

एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥

एक समय संपूर्ण समाज सहित राजा दशरथ राजसभा में विराजमान थे। समस्त पुण्यों की साक्षात मूर्ति वे राजा, राम का सुयश सुनकर अत्यंत उल्लसित हो रहे थे।

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं॥

सभी राजा उनकी कृपा चाहते हैं, और लोकपाल भी उनका अनुकूल भाव रखते हुए प्रीति करते हैं। तीनों लोकों और तीनों कालों में दशरथ के समान सौभाग्यशाली और कोई नहीं है।

मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सब तासू॥रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा॥

मंगल के मूल राम जिनके पुत्र हैं, उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाए वह थोड़ा ही है। राजा ने स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और अपना मुख देखकर मुकुट सीधा किया।

श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥

कानों के पास बाल सफेद हो गए, मानो बुढ़ापा यह उपदेश दे रहा हो - हे राजन, राम को युवराज पद दो, अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों न उठा लो।

दोहा

यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ

हृदय में यह विचार लाकर राजा ने शुभ दिन और उत्तम अवसर पाकर, प्रेम से पुलकित शरीर और आनंदित मन से जाकर अपने गुरु को यह बात सुनाई।

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥

राजा ने कहा - हे मुनिराज, सुनिए, राम हर प्रकार से पूर्ण योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री, समस्त नगरवासी, चाहे वे हमारे शत्रु हों, मित्र हों या उदासीन,

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई॥

राम सबको उतने ही प्रिय हैं जितने मुझे हैं, मानो आपका आशीर्वाद ही देह धारण करके शोभित हो रहा हो। ब्राह्मणों सहित समस्त परिवार, हे स्वामी, सब आप ही की तरह उन पर स्नेह करते हैं।

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥

जो गुरु के चरणों की रज को सिर पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त वैभव को वश में कर लेते हैं। यह अनुभव मुझ जैसा और किसी को नहीं हुआ - इस पावन रज की पूजा करके ही मैंने सब कुछ पा लिया है।

अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें॥मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥

अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है - हे नाथ, आपकी कृपा से वह पूर्ण हो। राजा के स्वाभाविक स्नेह को देखकर मुनि प्रसन्न हुए, राजा ने कहा - आप आज्ञा दीजिए।

दोहा

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार

हे राजन, आपका नाम और यश सबको मनचाहा फल देने वाला है। हे राजाओं में श्रेष्ठ, आपके मन की अभिलाषा अवश्य फलीभूत होगी।

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥

गुरु को हर प्रकार से प्रसन्न जानकर राजा हर्षित होकर मृदु वाणी में बोले - हे नाथ, राम को युवराज बनाइए, कृपा करके आज्ञा दीजिए और सारी तैयारी की जाए।

मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥

मेरे जीते-जी ही यह उत्सव हो जाए, जिससे सभी लोग अपने नेत्रों का लाभ पा सकें। प्रभु की कृपा और शिवजी की सहायता से यह सब पूर्ण हो - मेरे मन में बस यही एक लालसा है।

पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥

फिर मुझे कोई चिंता नहीं कि शरीर रहे या जाए, बस पीछे कोई पछतावा न रह जाए। दशरथ के ये सुंदर वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ के मन में मंगलमय आनंद उमड़ आया।

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥

सुनिए राजन, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन के बिना संताप नहीं मिटता - वे ही स्वामी आपके पुत्र रूप में अवतरित हुए हैं, पवित्र प्रेम के अनुगामी राम।

दोहा

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु

हे राजन, विलंब न कीजिए, शीघ्र ही सारी तैयारी कीजिए। शुभ दिन और सुमंगल तभी होगा जब राम युवराज पद पर अभिषिक्त होंगे।

मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥

प्रसन्न राजा महल में लौट आए और सेवकों, मंत्रियों तथा सुमंत्र को बुलवाया। सबने सिर झुकाकर जय-जयकार की, और राजा ने उन्हें मंगलमय वचन सुनाए।

जौं पाँचहि मत लागे नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥

यदि यह बात आप सबको उचित लगे, तो हर्षित हृदय से राम का राजतिलक कीजिए।

मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी॥बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी॥

प्रिय वचन सुनकर मंत्री आनंदित हो उठे, मानो उनकी मनचाही बेल पर जल पड़ गया हो। मंत्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं - हे जगत के स्वामी, आप करोड़ों वर्ष जीवित रहें।

जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥

आपने संसार के कल्याण के लिए यह उत्तम कार्य सोचा है, हे नाथ, इसमें विलंब न कीजिए। मंत्रियों की मधुर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनंद हुआ मानो बढ़ती हुई बेल को सहारे के लिए अच्छी शाखा मिल गई हो।

दोहा

कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ

राजा ने हाथ जोड़कर मुनिराज से कहा - जो भी आपकी आज्ञा हो, राम के राज्याभिषेक के लिए वह सब शीघ्र कीजिए।

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥

मुनिराज वशिष्ठ प्रसन्न होकर मृदु वाणी में बोले - सभी पवित्र तीर्थों का जल लाओ। औषधि, मूल, फूल, फल और पत्ते - उन्होंने अनेक मंगल वस्तुओं के नाम गिनाए।

चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥

चँवर, मृगचर्म, अनेक प्रकार के वस्त्र, ऊनी और रेशमी कपड़े अनगिनत जातियों के। मणियाँ और अनेक मंगल वस्तुएँ - जो कुछ भी संसार में राजा के अभिषेक के योग्य हो, वह सब मँगवाया गया।

बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥

वेदविहित समस्त विधान बताकर उन्होंने कहा - नगर में विविध प्रकार के मंडप सजाओ। फलों से लदे आम, सुपारी और केले के वृक्ष नगर की गलियों में चारों ओर रोपो।

रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥

सुंदर मणियों से मंजुल चौक सजाओ, और बाज़ार को शीघ्र सजाने का आदेश दो। गणपति, गुरु और कुलदेवता का पूजन करो, और ब्राह्मणों की हर प्रकार से सेवा करो।

दोहा

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग

ध्वजा, पताका, बंदनवार, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सजाओ। मुनिवर वशिष्ठ के वचनों को शिरोधार्य करके सब अपने-अपने कार्य में जुट गए।

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥

मुनिराज ने जिसे जो कार्य सौंपा, उसने उस कार्य को सर्वोपरि मानकर तुरंत पूरा किया। राजा ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं का पूजन करते हुए राम के हित में मंगल कार्य करने लगे।

दोहा

सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥।राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥

राम के सुंदर अभिषेक की बात सुनते ही अयोध्या में हर्ष के बधावे बजने लगे। राम और सीता के शरीर पर शुभ शकुन प्रकट होने लगे - उनके मंगलमय अंग फड़कने लगे।

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥

प्रेम से पुलकित होकर वे आपस में कहने लगे - ये शकुन तो भरत के आगमन के सूचक हैं। बहुत दिन बीत चुके हैं और प्रतीक्षा भी बढ़ गई है, ये शुभ संकेत प्रिय भरत से मिलन का ही संकेत दे रहे हैं।

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती॥

संसार में भरत के समान प्रिय और कौन है - इस शकुन का दूसरा कोई फल नहीं हो सकता। राम को अपने भाई की चिंता दिन-रात वैसे ही बनी रहती है, जैसे कछुई का हृदय अपने अंडों में लगा रहता है।

दोहा

एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु

इस अवसर पर परम मंगल समाचार सुनकर रनिवास आनंद से भर उठा। उसकी शोभा ऐसी लगती थी मानो बढ़ते चंद्रमा को देखकर समुद्र में लहरें उठने लगी हों।

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥

जो सबसे पहले जाकर यह समाचार सुनाने गईं, उन्हें प्रचुर आभूषण और वस्त्र भेंट में मिले। प्रेम से पुलकित शरीर और अनुराग से भरे मन से सभी स्त्रियाँ मंगल कलश सजाने में जुट गईं।

चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी॥आनंद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥

सुमित्रा जी ने सुंदर चौक मणियों से विविध प्रकार से अत्यंत मनोहर ढंग से सजाए। आनंदमग्न राम की माता कौशल्या ने ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भरपूर दान दिया।

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥

उन्होंने ग्राम देवी, देवताओं और नागों का पूजन किया और उन्हें बलि-भाग अर्पित करने का आदेश दिया। वे प्रार्थना करती हैं - जिस भी विधि से राम का कल्याण हो, कृपा करके वही वरदान दीजिए।

गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥

कोयल के समान मधुर स्वर वाली, चंद्रमुखी और मृगशावक जैसे नयनों वाली स्त्रियाँ मंगलगान गाने लगीं।

दोहा

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि

राम के राज्याभिषेक की बात सुनकर नगर के स्त्री-पुरुष हृदय से हर्षित हो उठे। सब कुछ अनुकूल जानकर वे सुमंगल की तैयारी में जुट गए।

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥

तब राजा दशरथ ने वशिष्ठ जी को बुलाकर उन्हें राम के महल में शिक्षा देने भेजा। गुरु के आगमन की बात सुनते ही रघुनाथ द्वार पर आए और उनके चरणों में मस्तक झुकाया।

सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥

आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर के भीतर लाया गया और सोलह प्रकार से उनकी पूजा करके सम्मानित किया गया। फिर सीता सहित राम ने उनके चरण पकड़े और हाथ जोड़कर कमल जैसे स्वर में बोले।

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई॥

हे स्वामी, अपनी प्रभुता को त्यागकर आपने यह स्नेह दिखाया है - आज यह घर पवित्र हो गया। जो भी आज्ञा हो, मैं वही करूँगा, हे गोसाईं; सेवक तो स्वामी की सेवा में ही अपनी सार्थकता पाता है।

दोहा

सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस

स्नेह में सने ऐसे वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ ने राम की प्रशंसा की - हे राम, तुम ऐसा क्यों न कहो, तुम तो हंस-कुल के भूषण हो।

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥

राम के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते हुए मुनिराज वशिष्ठ प्रेम से पुलकित होकर बोले - राजा ने अभिषेक की सारी तैयारी कर ली है, वे तुम्हें युवराज बनाना चाहते हैं।

राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥

हे राम, आज संयम और व्रत का पालन करो, जिससे विधाता की कृपा से यह कार्य भलीभाँति संपन्न हो। यह शिक्षा देकर गुरु राजा के पास चले गए, और राम के हृदय में यह सुनकर विस्मय उत्पन्न हुआ।

जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥

सभी भाई साथ-साथ जन्मे, बचपन में साथ-साथ भोजन, शयन और खेल-कूद करते रहे। कर्णवेध, यज्ञोपवीत और विवाह - सभी संस्कार और उत्सव भी सबके साथ-साथ ही संपन्न हुए।

बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन के कुटिलाई॥

इस निर्मल वंश में एक बात अनुचित-सी लगती है - अन्य भाइयों को छोड़कर केवल बड़े का ही अभिषेक होना। प्रभु राम का यह प्रेमपूर्ण संकोच इतना सुंदर है कि वह भक्तों के मन की कुटिलता तक हर लेता है।

दोहा

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद१०

उसी अवसर पर प्रेम और आनंद में मग्न लक्ष्मण वहाँ आए। रघुकुल के कुमुद-चंद्र राम ने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया।

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥

नाना प्रकार के वाद्य बज रहे थे, नगर के आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। सब लोग भरत के शीघ्र आगमन की कामना करते हैं, जिससे उनके नेत्रों को दर्शन का फल मिल सके।

हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई॥कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥

बाज़ार, गली, घर और चौपालों में स्त्री-पुरुष आपस में कहते हैं - कल की शुभ लगन में अब कितना समय शेष है, विधाता हमारी यह अभिलाषा अवश्य पूर्ण करें।

कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥

स्वर्ण सिंहासन पर सीता सहित राम बैठेंगे - यह सोचकर सब सचेत मन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। सब पूछते हैं कि यह शुभ घड़ी कब आएगी, जबकि कुटिल स्वभाव के दुष्ट लोग विघ्न की कामना कर रहे हैं।

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥

जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती, वैसे ही उन दुष्टों को अयोध्या का यह उत्सव नहीं सुहाता। देवता सरस्वती जी का आवाहन करके बार-बार उनके चरणों में गिरकर विनती करने लगे।

दोहा

बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु११

हे माता सरस्वती, हमारी इस बड़ी विपत्ति को देखकर आज ऐसा कीजिए कि राम राज्य त्यागकर वन चले जाएँ, जिससे देवताओं का सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाए।

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥

देवताओं की यह विनती सुनकर सरस्वती जी खड़ी-खड़ी पछताने लगीं, मानो कमल-वन के लिए हिम-रात्रि बनने जैसी विवशता उन्हें अनुभव हुई। यह देखकर देवता फिर विनती करने लगे - हे माता, इसमें आपको तनिक भी दोष नहीं लगेगा।

बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी॥

राघव राम तो हर्ष और विषाद दोनों से परे हैं, आप तो राम का सारा प्रभाव जानती ही हैं। जीव तो अपने कर्मों के अधीन सुख-दुख भोगता है - अतः देवताओं के हित के लिए आप अयोध्या पधारिए।

बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥

बार-बार उनके चरण पकड़कर संकोचवश सरस्वती जी यह विचार करती हुई चल पड़ीं कि देवताओं का निवास तो ऊँचा है, पर यह कार्य नीच है - वे दूसरों का वैभव देख ही नहीं सकते।

आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥

फिर भविष्य के परिणाम पर विचार करते हुए वे सोचने लगीं कि कवि भी मेरा गुणगान करेंगे। इस प्रकार वे हर्षित मन से राजा दशरथ की नगरी में आ पहुँचीं, मानो कोई असह्य दुखदायी ग्रहदशा उतर आई हो।

दोहा

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि१२

कैकेयी की मंथरा नामक मंदबुद्धि दासी को अपयश की पिटारी बनाकर, वाणी की देवी सरस्वती उसकी बुद्धि पलटकर लौट गईं।

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥

मंथरा ने देखा कि नगर सजाया जा रहा है, सुंदर मंगल बाजे बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि यह उल्लास किस बात का है, और राम-तिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा।

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥

कुबुद्धि और कुजाति मंथरा विचार करने लगी कि किसी भी तरह आज रात यह कार्य बिगड़ जाए। मीठी बातों में छिपकर वह कुटिल किरातिन ऐसे अवसर ताकने लगी, जैसे कोई चोर गाय चुराने का अवसर ताकता है।

भरत मातु पहिं गई बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥

वह उदास मुख बनाकर भरत की माता कैकेयी के पास गई। रानी ने हँसकर पूछा - क्यों उदास है? पर वह कोई उत्तर न देकर केवल लंबी साँस लेती रही, और स्त्री-सुलभ चातुर्य से आँसू बहाने लगी।

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥

रानी हँसकर बोलीं - तेरी तो बड़ी बातें बनाने की आदत है, लगता है लक्ष्मण ने तुझे कोई सीख दे दी है। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ न बोली, बस काली नागिन की तरह लंबी साँसें छोड़ती रही।

दोहा

सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु१३

भयभीत होकर रानी बोलीं - बोलती क्यों नहीं, राम, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सब कुशल तो हैं? यह सुनकर मंथरा के हृदय में और भी जलन उठी।

कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥

मुझे भला कौन सीख देगा, हे रानी? किसके बल पर मैं बड़ी-बड़ी बातें बनाऊँगी? राम को छोड़कर आज किसकी कुशलता है, जिसे राजा युवराज बनाने जा रहे हैं?

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥

कौशल्या पर विधाता अत्यंत अनुकूल हो गए हैं, यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं है। आप स्वयं जाकर वह सारी शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरा तो मन ही व्याकुल हो उठा है।

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥

तुम्हारा पुत्र विदेश में है, तुम्हें कोई चिंता नहीं, तुम समझती हो कि हमारे स्वामी तुम्हारे ही वश में हैं। तुम्हें तो बस नींद और मुलायम सेज ही प्रिय है, राजा की चतुर चालाकी तुम पहचान ही नहीं पातीं।

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥

ये मीठी परंतु विषभरी बातें सुनकर रानी ने उसका मलिन मन भाँप लिया और डाँटकर बोलीं - अब चुप रह, घर फोड़नेवाली! फिर कभी ऐसी बात कही तो तेरी जीभ पकड़कर खिंचवा डालूँगी।

दोहा

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि१४

एक आँख वाली, लँगड़ी, कुबड़ी, कुटिल और कुचाली जानकर - ऊपर से स्त्री और फिर दासी भी - भरत की माता कैकेयी ने यह बात सुनकर बस मुसकरा भर दिया।

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥

हे प्रिय, मैंने तुझे बस सिखाने के लिए डाँटा था, स्वप्न में भी मुझे तुझ पर कोई क्रोध नहीं है। जिस दिन तेरी यह बात सच हो जाएगी, वही दिन मेरे लिए सबसे शुभ और मंगलमय दिन होगा।

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥

बड़ा भाई स्वामी और छोटे भाई सेवक होते हैं - यही सूर्यवंश की सुंदर परंपरा है। यदि सचमुच कल राम का तिलक होने वाला है, तो हे सखी, तू जो चाहे माँग ले, मैं अवश्य दूँगी।

कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥

कौशल्या के समान ही सब माताएँ हैं, राम को तो सहज स्वभाव से ही सब प्रिय हैं। वे सब मुझ पर विशेष स्नेह रखती हैं - यह प्रेम मैंने स्वयं परखकर देखा है।

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥

यदि विधाता कृपा करके मुझे फिर जन्म दें, तो राम और सीता ही मेरे पुत्र-पुत्रवधू बनें। मुझे तो राम प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं - फिर उनके तिलक से तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है?

दोहा

भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ१५

भरत की सौगंध खाकर सच-सच बता, छल-कपट छोड़कर। हर्ष के इस अवसर पर तू विषाद क्यों प्रकट कर रही है - मुझे इसका कारण बता।

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥

अब तो एक ही बार में मेरी सारी आशा पूर्ण हो गई। अब मैं दूसरी ही जीभ से खुलकर कहूँगी। मेरा अभागा माथा तो फोड़े जाने योग्य है, क्योंकि भली बात कहने पर भी आपको दुख हो गया।

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥

जो झूठी बातें सच बनाकर कहते हैं, वे आपको प्रिय लगते हैं, और मैं आपको कड़वी लगने लगी हूँ, हे स्वामिनी। अब मैं भी बस चापलूसी की बातें ही किया करूँगी, नहीं तो दिन-रात मौन ही रहूँगी।

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥कोउ नृप होइ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥

मुझे कुरूप बनाकर विधाता ने मुझे सर्वथा पराधीन कर दिया - जो बोया जाता है वही काटा जाता है। कोई भी राजा बने, इसमें मेरी क्या हानि है? दासीपन छोड़कर क्या अब मैं रानी बन जाऊँगी?

जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥

मेरा स्वभाव तो जलाने योग्य है - बस आपका अहित होते देखा नहीं जाता, इसी कारण कुछ कह बैठी। हे देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए, यह मेरी बड़ी भूल थी।

दोहा

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि१६

गूढ़ छल से भरे इन मीठे वचनों को सुनकर अल्पबुद्धि रानी कैकेयी, देवमाया के वश होकर, इस शत्रु को हितैषी मानकर उस पर विश्वास कर बैठीं।

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥

रानी बार-बार आदरपूर्वक उससे पूछने लगीं, मानो शिकारी के गीत से मोहित हिरणी हो। उनकी बुद्धि जैसी विधि को अभीष्ट थी वैसी ही पलट गई। मंथरा प्रसन्न हो उठी, मानो उसका जाल सफल हो गया हो।

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ॥सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥

आप तो पूछती हैं, पर मुझे कहते हुए डर लगता है - आप मुझे फिर घर फोड़नेवाली कह देंगी। इस प्रकार अनेक ढंग से विश्वास जमाकर मंथरा ने अयोध्या पर मंडरा रही साढ़े-साती-सी विपत्ति की बात कहनी शुरू की।

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते॥

आपने कहा कि सीता-राम आपको प्रिय हैं और राम को भी आप प्रिय हैं - यह बात पहले सच थी, पर वे दिन अब बीत चुके। समय बदलते ही शत्रु भी प्रिय जैसा दिखने लगता है।

भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥

जो सूर्य कमल-कुल का पोषण करता है, वही जल के अभाव में उसे जलाकर राख कर देता है। आपकी सौत आपको जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है - अभी समय रहते किसी अच्छे उपाय से इसे रोक लीजिए।

दोहा

तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ१७

आपको तो अपने सुहाग के बल पर कोई चिंता नहीं, आप राजा को अपने वश में समझती हैं। पर राजा तो मन के मैले और मुख के मीठे हैं, जबकि आपका स्वभाव सीधा-सरल है।

चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें॥

राम की माता कौशल्या बड़ी चतुर और गंभीर हैं - अवसर पाकर उन्होंने अपनी बात सँवार ली है। राजा ने भरत को ननिहाल भेज दिया - समझ लीजिए, यह भी कौशल्या माता की ही चाल थी।

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥

मानो कौशल्या यह मानती हैं कि सब सौतें उनकी अच्छी सेवा करती हैं, और भरत की माता अपने पति के बल पर गर्वित हैं। हे स्वामिनी, कौशल्या तो आपको कष्ट में डालना ही चाहती हैं, पर वे इतनी चतुर हैं कि उनका छल प्रकट ही नहीं होता।

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥

राजा का आप पर विशेष प्रेम है - एक सौत का स्वभाव यह देख ही नहीं सकता। इसीलिए उन्होंने षड्यंत्र रचकर राजा को अपने वश में करके राम-तिलक का मुहूर्त निकलवा लिया है।

यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥

कुल-परंपरा के अनुसार राम का तिलक होना उचित ही है, और यह सबको भाता है, मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। पर आगे जो होने वाला है उसे सोचकर मुझे डर लगता है - विधाता वह फल कौशल्या को ही लौटा दें।

दोहा

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।कहिसि कथा सत सवति के जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु१८

अनेक प्रकार की कुटिलताएँ रच-रचकर मंथरा ने यह छलभरी सलाह दी, और सौत के विरुद्ध सैकड़ों बातें गढ़ीं, जिससे किसी भी तरह वैमनस्य बढ़ जाए।

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥

नियति के वश होकर रानी के मन में यह बात सच लगने लगी। उन्होंने फिर सौगंध दिलाकर पूछा। मंथरा बोली - अब और क्या पूछती हैं, अभी तक नहीं समझीं? अपना हित-अहित तो पशु भी पहचान लेता है।

भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥

पंद्रह दिन तो यह सारी तैयारी होते बीत गए, और आपको आज मुझसे पता चला है। मैं आपके ही राज्य में खाती-पहनती हूँ - सच कहने में मेरा कोई दोष नहीं होना चाहिए।

जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥

यदि मैं कुछ भी झूठ या बनावटी बात कहूँ, तो विधाता मुझे दंड दे। यदि कल राम का तिलक हो गया, तो समझ लीजिए विधाता ने आपके लिए विपत्ति का बीज बो दिया।

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध की माखी॥जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥

जोर देकर, दृढ़तापूर्वक मंथरा बोली - हे रानी, अब तो आप दूध में गिरी मक्खी के समान असहाय हो गई हैं। यदि पुत्र सहित सेवा करना स्वीकार हो तो ही इस घर में रह सकेंगी, अन्यथा कोई और उपाय नहीं है।

दोहा

कहउँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब१९

मैं तो विनयपूर्वक ही कह रही हूँ - कौशल्या आपको दुख देंगी, भरत को बंदीगृह में रहना पड़ेगा, और लक्ष्मण राम के प्रधान सेवक बन जाएँगे।

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥

यह कटु वचन सुनकर कैकेयी सहम गईं और भय से सूख-सी गईं, कुछ कह न सकीं। उनका शरीर पसीने से भीग गया और वे केले के पौधे-सी काँपने लगीं; यह देख मंथरा ने दाँतों तले जीभ दबाई।

कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥

अनेक छलभरी कहानियाँ बार-बार सुनाकर मंथरा रानी को धीरज बँधाने लगी। कैकेयी के कर्मों ने ऐसा पलटा खाया कि वह कुटिल दासी अब उन्हें प्रिय लगने लगी, मानो कोई बगुला हंस मानकर सराहा जा रहा हो।

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥

सुनो मंथरा, तेरी बात सच है - मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़कती रहती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूँ, पर मोहवश तुझे यह बात नहीं बताई।

काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥

क्या करूँ सखी, मेरा स्वभाव तो सीधा-सरल है - मैं दाएँ-बाएँ शकुन-अपशकुन कभी समझ ही नहीं पाई।

दोहा

अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह२०

आज तक मैंने अपने आचरण से कभी किसी का अहित नहीं किया। फिर न जाने किस पाप के कारण विधाता ने मुझे यह असह्य दुख एक साथ दे दिया।

नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥

चाहे मैं अपना सारा जीवन मायके में बिताकर पूरा कर लूँ, पर जीते-जी सौत की सेवा नहीं करूँगी। जब विधाता किसी को शत्रु के अधीन जिलाए रखे, तो ऐसे जीवन से मृत्यु ही भली होती है।

दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥

रानी ने अनेक प्रकार से दीन वचन कहे। यह सुनकर मंथरा ने और भी स्त्री-सुलभ छल दिखाया - ऐसा हीन मन बनाकर क्यों कहती हैं, आपका सुख और सौभाग्य तो दिन-प्रतिदिन दूना ही होता जा रहा है।

जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥

जिसने भी आपका इतना बड़ा अहित सोचा है, वही इसका पका हुआ फल पाएगा। हे स्वामिनी, जब से मैंने यह कुमंत्र सुना है, तब से न मुझे दिन में भूख लगती है और न रात को नींद आती है।

पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥

मैंने ज्योतिषियों से पूछा, उन्होंने गणना करके यही निश्चित बताया कि भरत ही राजा बनेंगे, यह सत्य है। हे स्वामिनी, यदि आप कुछ करना चाहें तो उपाय बता सकती हूँ - राजा तो पूरी तरह आपकी सेवा के वश में हैं।

दोहा

परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि२१

आपके कहने पर तो मैं कुएँ में भी गिर सकती हूँ, फिर पुत्र और पति को त्यागना कौन बड़ी बात है? मेरा इतना बड़ा दुख देखकर तुम कहती हो, तो अपने हित के लिए मैं यह क्यों न करूँ?

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥

मंथरा ने कैकेयी को अपने वश में कर लिया और छल की छुरी को हृदय-रूपी पत्थर पर तेज़ किया। रानी को अपने निकट आ रहे दुख का आभास ही नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे बलि का पशु हरी घास चरते हुए अनजान रहता है।

सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥

रानी की बात सुनने में मीठी पर अंत में कठोर लगती है, मानो मधु में विष घोलकर दिया जा रहा हो। दासी बोली - स्वामिनी, याद है या नहीं, वह बात जो आपने मुझसे कही थी?

दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु॥

राजा के पास आपकी दो वर वाली अमानत रखी है - आज वही माँगकर अपने हृदय को शांत कीजिए। पुत्र को राज्य और राम को वनवास - यह दोनों माँग लीजिए और सौत का सारा उल्लास मिटा दीजिए।

भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥

जब राजा राम की सौगंध खाकर वचन दें, तभी माँगिएगा, जिससे उनका वचन टल न सके। यदि आज की रात बीत गई तो सारा काम बिगड़ जाएगा - मेरी यह बात हृदय से प्रिय मानिए।

दोहा

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु२२

बड़ा भारी कुघात रचकर उस पापिनी ने कहा - जाओ, कोपभवन में जा बैठो। सजग रहकर सारा काम संवारना, जल्दबाजी में किसी भी बात पर विश्वास मत कर लेना।

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥

रानी ने मंथरा को अपने प्राणों से भी प्रिय मान लिया और बार-बार उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा की - संसार में तेरे समान मेरा हितैषी कोई नहीं, बहती धारा में तू ही मेरा सहारा बनी है।

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली॥बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई॥

यदि कल विधाता मेरा मनोरथ पूर्ण कर दें, तो हे सखी, मैं तुझे अपनी आँख की पुतली के समान बना लूँगी। इस प्रकार दासी को भाँति-भाँति से आदर देकर कैकेयी कोपभवन की ओर चली गईं।

बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी॥पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥

कैकेयी की कुबुद्धि मानो विपत्ति का बीज बन गई, और मंथरा वर्षा ऋतु बनकर उसे सींचने वाली बनी। छल-रूपी जल पाकर वह अंकुरित हो उठा - दोनों वर उसके दो पत्ते बने, और दुख उसका परिणामी फल हुआ।

कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई॥राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥

क्रोध की सारी तैयारी सजाकर वह लेट गई, अपनी ही कुबुद्धि से राजकाज को बिगाड़ते हुए। राजमहल और नगर में उत्सव का कोलाहल होता रहा, पर इस कुचाल की किसी को भनक तक न लगी।

दोहा

प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार२३

नगर के स्त्री-पुरुष सब आनंदित होकर मंगल-सामग्री सजाने में लगे हैं। राजा के दरबार में इतनी भीड़ है कि कोई भीतर जा रहा है तो कोई बाहर निकल रहा है।

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥

राम के बाल-सखा यह समाचार सुनकर हृदय से हर्षित हो उठे, दस-पाँच मिलकर राम के पास जाने लगे। प्रभु उनके प्रेम को पहचानकर उनका आदर करते हैं और मृदु वाणी में उनका कुशल-क्षेम पूछते हैं।

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा॥

प्रिय आज्ञा पाकर वे घर लौटते हैं, और आपस में राम की प्रशंसा करते चलते हैं - संसार में रघुवीर के समान शील और स्नेह निभाने वाला और कौन है?

जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू॥

जिस-जिस योनि में हम कर्मवश भटकते रहें, हे ईश्वर, हमें बस यही वरदान दीजिए - हम सेवक बने रहें और सीतानाथ राम हमारे स्वामी रहें, यह संबंध अंत तक ऐसे ही निभता रहे।

अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदय अति दाहू॥को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥

नगर में सभी की यही अभिलाषा है, पर कैकेयी के हृदय में तीव्र जलन है। बुरी संगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता? नीच की सलाह मान लेने पर बुद्धिमानी भी टिक नहीं पाती।

दोहा

साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ२४

संध्या के समय आनंदित मन से राजा दशरथ कैकेयी के महल गए - उनका यह जाना मानो निष्ठुरता ही स्नेह का रूप धारण करके निकट आ गई हो।

कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥

कोपभवन की बात सुनते ही राजा सकुचा गए, भयवश उनके पैर आगे बढ़ ही न पाए। जिनके बाहुबल से इंद्र भी सुरक्षित रहते हैं और समस्त राजा जिनकी ओर देखकर चलते हैं,

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥

वही राजा अपनी पत्नी का क्रोध सुनकर भय से सूख गए - देखिए, कामदेव के प्रताप की महिमा! त्रिशूल, वज्र और तलवार धारण करने वाले भी रतिनाथ कामदेव के फूलों के बाणों से घायल हो जाते हैं।

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥

भयभीत राजा अपनी प्रिया के पास गए - उनकी दशा देखकर राजा को अत्यंत दारुण दुख हुआ। कैकेयी भूमि पर पुराने मोटे वस्त्र बिछाकर लेटी थीं, और अपने सारे आभूषण उतार फेंके थे।

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी॥जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥

उस कुबुद्धि कैकेयी पर यह कुरूप वेश खूब फब रहा था, मानो विधाता ने ही उन्हें अनिष्ट का सूचक बना दिया हो। राजा निकट जाकर मृदु वाणी में बोले - हे प्राणप्रिया, तुम किस कारण रुष्ट हो?

छंद

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

रानी किस कारण इतनी रुष्ट हैं कि राजा जब उनका हाथ छूते हैं तो वे झिड़ककर हटा देती हैं, मानो कोई क्रोधित नागिन उन्हें भयंकर दृष्टि से देख रही हो। उनकी दोनों वरों की लालसा मानो जीभ और दाँत बनकर उनके मर्मस्थल को खोज रही है। तुलसीदास कहते हैं कि होनहार के वश में पड़े राजा इसे कामदेव का कौतुक-भर समझ रहे हैं।

सोरठा

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि।कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर२५

राजा बार-बार कहते हैं - हे सुमुखि, सुलोचनि, कोकिल-वाणी वाली, हे गजगामिनी, अपने क्रोध का कारण मुझे बताओ।

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥

हे प्रिये, तुम्हारा अहित किसने किया है? किसके सिर पर विपत्ति आ गई है, किसे यमराज लेने को उतारू हैं? बताओ किस दरिद्र को मैं राजा बना दूँ, बताओ किस राजा को देश-निकाला दे दूँ।

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥

तुम्हारे शत्रु को मैं देवता होते हुए भी मार सकता हूँ, फिर बेचारे मनुष्य और स्त्रियाँ तो कीट-पतंगे मात्र हैं। हे सुंदरी, तुम मेरा स्वभाव जानती ही हो - मेरा मन तो तुम्हारे चंद्रमुख पर मंडराता चकोर पक्षी है।

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥

हे प्रिये, मेरे प्राण, पुत्र, सर्वस्व, परिजन और समस्त प्रजा - सब तुम्हारे वश में हैं। यदि मैं तुमसे कुछ भी छल करके कहूँ, तो हे भामिनी, मुझे राम की सौगंध है।

बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥

हँसकर जो भी मन भाए वह माँग लो, अपने सुंदर शरीर को आभूषणों से सजा लो। शुभ-अशुभ घड़ी का विचार मन में मत करो, हे प्रिये, शीघ्र ही यह कुवेश त्याग दो।

दोहा

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंदभूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद२६

यह सुनकर और राजा की बड़ी सौगंध को मन में तौलकर वह मतिमंद कैकेयी मुसकराती हुई उठ बैठी। वह आभूषण सजाने लगी, पर राजा को ऐसे ताक रही थी मानो कोई किरातिन अपने जाल में फँसे हिरण को देख रही हो।

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥

राजा ने उसे फिर हितैषी मानकर, प्रेम से पुलकित होकर मृदु मधुर वाणी में कहा - हे प्रिये, तुम्हारी मनचाही बात हो गई है, नगर के घर-घर में आनंद के बधावे बज रहे हैं।

रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥

कल राम को युवराज पद दूँगा - हे सुलोचनि, तुम मंगल का श्रृंगार करो। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय ऐसे धड़क उठा मानो किसी पके हुए फोड़े को छू दिया गया हो।

ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥

ऐसी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री खुलकर रोती नहीं। राजा उसकी छलभरी चतुराई को पहचान ही न सके - आखिर करोड़ों कुटिलताओं की गुरु मंथरा ने ही उसे यह सब सिखाया था।

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥

राजा भले ही नीति में निपुण थे, पर स्त्री का चरित्र तो अथाह समुद्र के समान है। अपने कपट-भरे स्नेह को और बढ़ाकर वह मुसकराई और नेत्र व मुख फेरकर बोली।

दोहा

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु२७

आप तो कहते हैं माँगो-माँगो, पर न कभी देते हैं न लेते हैं। आपने दो वरदान देने को कहा था, अब उन्हीं पर भी संदेह होने लगा है।

जाने मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥

राजा उसका मर्म समझकर हँसते हुए बोले - लगता है तुम्हें रूठना ही सबसे प्रिय है! तुमने वे वर अमानत में रखे रहने दिए, कभी माँगे ही नहीं, और मेरे भुलक्कड़ स्वभाव के कारण मुझे भी वे भूल गए थे।

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥

मुझे झूठा दोष मत दो - दो के बदले चार भी माँग लो। रघुकुल की यह परंपरा सदा से चली आई है - प्राण भले चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन कभी नहीं टूटता।

नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥

असत्य के समान कोई पाप नहीं, चाहे करोड़ों छोटी-छोटी गुंजाएँ मिलकर पर्वत के समान भी क्यों न बन जाएँ। सारे सुंदर पुण्य-कर्मों की जड़ सत्य ही है - यह बात वेद, पुराण और मनु ने भी विदित की है।

तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥

उस पर मैंने राम की सौगंध भी खा ली है, जो सत्कर्म और स्नेह की चरम सीमा हैं, रघुकुल के शिरोमणि। इस प्रकार वचन को दृढ़ करा लेने पर कुबुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो अपने कुत्सित विचार-रूपी पक्षी का पिंजरा खोल रही हो।

दोहा

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु२८

राजा के मनोरथ मानो सुंदर वन में बसे सुखी पक्षियों का समूह थे, और कैकेयी किसी भीलनी के समान अपने भयंकर वचन-रूपी बाज़ को उस पर छोड़ने ही वाली थी।

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥

सुनिए प्राणप्रिय, मेरे मन को जो भाता है वह कहती हूँ - पहला वर यह दीजिए कि भरत का राजतिलक हो। हाथ जोड़कर मैं दूसरा वर माँगती हूँ - हे नाथ, मेरी यह अभिलाषा भी पूर्ण कीजिए।

तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥

दूसरा वर - राम तापस वेष धारण करके चौदह वर्ष तक वनवासी बनकर रहें। ये मृदु वचन सुनते ही राजा के हृदय में ऐसा शोक उमड़ा, जैसे चंद्रमा की किरण छूते ही चकवा पक्षी व्याकुल हो उठता है।

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥

राजा सहम गए, मुँह से कुछ कहते न बना, मानो वन में किसी बटेर पर बाज़ झपट पड़ा हो। राजा का मुख पूरी तरह विवर्ण हो गया, मानो बिजली ने किसी ताड़ के वृक्ष पर वज्राघात कर दिया हो।

माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥

राजा ने माथे पर हाथ रखकर दोनों आँखें मूँद लीं और ऐसे बैठ गए मानो चिंता ही देह धारण करके बैठी हो। मेरा मनोरथ मानो कल्पवृक्ष के समान फूला था, और फल लगते ही किसी हाथी ने उसे जड़ से उखाड़ दिया।

अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं॥

कैकेयी ने अयोध्या को उजाड़ डाला - उसने विपत्ति की अटल नींव रख दी।

दोहा

कवनें अवसर का भयउ गयउ नारि बिस्वास।जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास२९

कैसे अवसर पर क्या हो गया! स्त्री पर किया गया विश्वास कैसे नष्ट हो गया - ठीक वैसे ही जैसे योग-सिद्धि का फल मिलने के समय भी किसी यति का अज्ञान उसे नष्ट कर सकता है।

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥

इस प्रकार राजा मन-ही-मन विलाप करने लगे, और कैकेयी का यह कुभाँति रूप देखकर उनका मन जल उठा - क्या भरत तुम्हारे अपने पुत्र नहीं हैं? या तुमने मुझे बाज़ार से मोल खरीदा है?

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे॥देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥

यदि मेरी यह सौगंध तुम्हें ऐसे बाण-सी चुभी है, तो सोच-समझकर उत्तर क्यों नहीं देतीं? बताओ, यह वर स्वीकार करती हो या नहीं - रघुकुल में तो सभी सत्यप्रतिज्ञ ही होते हैं।

देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥

तुमने वर देने को कहा था, अब मत दो - सत्य छोड़ दो और संसार में अपयश ले लो। सत्य की इतनी प्रशंसा करके तुमने वर देने का वचन दिया था - क्या तुमने सोचा था कि यह कोई मामूली चीज़ माँगेगी?

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥

राजा शिबि, दधीचि मुनि और राजा बलि ने जो भी प्रण किया, उसके लिए शरीर और धन तक त्याग दिया पर वचन नहीं तोड़ा। कैकेयी अत्यंत कटु वचन कह रही है, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो।

दोहा

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे राय।सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ३०

धर्म के धुरंधर राजा दशरथ ने धैर्य धारण करके अपने नेत्र खोले। सिर धुनकर लंबी साँस लेते हुए वे सोचने लगे - इसने मुझे बड़े ही कुसमय पर घायल कर दिया।

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥

राजा के सामने वह क्रोध से जलती हुई दिखी, मानो क्रोध की तलवार म्यान से बाहर निकल आई हो - जिसकी मूठ कुबुद्धि और धार निष्ठुरता थी, और जिसे मंथरा ने अपनी सान पर तेज़ किया था।

लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥

राजा ने उसका भयंकर और कठोर रूप देखा, और सोचा - क्या यह सचमुच मेरे प्राण ही ले लेगी? राजा ने हृदय कठोर करके उसे प्रिय लगने वाली विनम्र वाणी में कहा।

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी॥

हे प्रिये, इस संकट के समय ऐसी अनुचित बातें कहकर विश्वास और प्रेम क्यों नष्ट करती हो? मेरे लिए भरत और राम दोनों आँखों के समान हैं - मैं शिवजी को साक्षी मानकर सत्य कहता हूँ।

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥

मैं अवश्य ही प्रातःकाल दूत भेजूँगा - सुनते ही दोनों भाई शीघ्र आ जाएँगे। शुभ दिन निकालकर सारी तैयारी सजाकर मैं धूमधाम से भरत को राज्य दे दूँगा।

दोहा

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति३१

राम को राज्य का कोई लोभ नहीं है, और भरत पर भी मेरा उतना ही प्रेम है। बड़े-छोटे का विचार मन में रखकर मैं तो बस राजनीति की मर्यादा निभा रहा था।

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥

मैंने अपने स्वाभाविक स्नेहवश राम की सैकड़ों सौगंध खाई है; राम की माता कौशल्या ने तो कभी कुछ नहीं कहा। मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया, इसी कारण मेरा मनोरथ खाली हाथ रह गया।

रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गए भरत जुबराजू॥एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥

अब क्रोध छोड़ो, मंगल की तैयारी करो - कुछ दिनों बाद भरत युवराज बन जाएँगे। बस एक बात से मुझे दुख हुआ है - तुमने दूसरा वर माँगकर मुझे असमंजस में डाल दिया है।

अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥

अभी तक उस बात की आँच से मेरा हृदय जल रहा है - क्या वह क्रोध या परिहास में कही गई थी, या सचमुच सच है? क्रोध छोड़कर बताओ तो, राम का क्या अपराध है - सभी तो कहते हैं कि राम अत्यंत सज्जन हैं।

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥

तुम भी तो उसकी प्रशंसा करती थीं और उस पर स्नेह रखती थीं - अब यह सुनकर मुझे संदेह हो रहा है। जिसका स्वभाव शत्रु के प्रति भी अनुकूल है, वह भला अपनी माता के प्रतिकूल कैसे हो सकता है?

दोहा

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु३२

हे प्रिये, यह हास्य ही था न? क्रोध छोड़ो और विवेकपूर्वक कुछ और माँग लो - जिससे मैं अपने नेत्रों से भरपूर भरत का राज्याभिषेक देख सकूँ।

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥

मछली भले जल के बिना जी ले, साँप भले मणि के बिना दुखी होकर जी ले - मैं तो अपना सच्चा स्वभाव कह रही हूँ, मन में कोई छल नहीं है: मेरा जीवन राम के बिना नहीं है।

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥

हे चतुर प्रिये, मन में सोचकर देखो - क्या सचमुच तुम्हारा जीवन राम के दर्शन पर ही निर्भर है? यह मृदु वचन सुनकर कुबुद्धि कैकेयी और भी जल उठी, मानो अग्नि में घी की आहुति पड़ गई हो।

कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥

वह बोली - चाहे करोड़ों उपाय कर लो, यहाँ तुम्हारी माया नहीं चलेगी। या तो वर दो या इनकार करो और अपयश ले लो - मुझे इतने प्रपंच अच्छे नहीं लगते।

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥

राम साधु हैं, तुम भी साधु और सयाने हो, राम की माता भली हैं - यह सब पहचान लिया गया है। जैसा भला कौशल्या ने मेरे लिए सोचा है, वैसा ही फल मैं भी उन्हें अवश्य दूँगी।

दोहा

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं३३

यदि सुबह होते ही राम मुनि का वेश धारण करके वन न चले जाएँ, तो हे राजन, अपने मन में यह समझ लीजिए कि वह मेरी मृत्यु और आपका अपयश होगा।

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥

यह कहकर वह कुटिल कैकेयी उठकर खड़ी हो गई, मानो क्रोध की नदी में बाढ़ आ गई हो। वह स्वयं पाप का साक्षात पर्वत बन गई, क्रोध के जल से इतनी भरी कि उसकी ओर देखा भी न जा सके।

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥

दोनों वर उसके दो किनारे थे, कठोर हठ उसकी धारा थी, और मंथरा के वचन उसके भँवर थे - राजा-रूपी वृक्ष की जड़ को ढहाती हुई यह विपत्ति-नदी अपने समुद्र की ओर बह चली।

लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥

राजा ने समझ लिया कि यह बात सचमुच सच है - मानो स्त्री के बहाने मृत्यु ही उनके सिर पर नाच रही हो। उन्होंने उसके पैर पकड़कर विनती की और उसे बिठाया - सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो।

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥

अभी माँग लो, मैं तुम्हें वही दे दूँगा - मुझे राम के वियोग से मत मारो। किसी भी तरह राम को यहीं रख लो, नहीं तो मेरी छाती जीवन भर जलती रहेगी।

दोहा

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ३४

अपनी इस असाध्य व्याधि को देखकर राजा भूमि पर गिर पड़े, माथा पीटते हुए अत्यंत व्याकुल वाणी में पुकारने लगे - राम, राम, रघुनाथ।

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥

व्याकुल राजा का सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो किसी हाथी ने कल्पवृक्ष को गिरा दिया हो। उनका कंठ सूख गया, मुख से वाणी न निकली, मानो जल के बिना कोई दीन मछली तड़प रही हो।

पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥

कैकेयी फिर कठोर और कटु वचन बोली, मानो घाव में विष उँडेल रही हो - यदि आखिर में यही करना था, तो तुमने माँगो-माँगो क्यों कहा, किस बल पर कहा?

दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥

हे राजन, क्या ये दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं - खुलकर हँसना और साथ ही गाल फुलाना? दानी कहलाना और साथ ही कंजूसी करना - क्या इस तरह कुशल-क्षेम और राजपाट दोनों निभ सकते हैं?

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥

या तो वचन तोड़ दो या धैर्य धारण करो - अबला स्त्री की भाँति विलाप मत करो। सत्यप्रतिज्ञ पुरुष के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी सब तिनके के समान बताए गए हैं।

दोहा

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर३५

यह मर्मभेदी वचन सुनकर राजा बोले - अब कुछ मत कहो, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। लगता है तुम पर कोई पिशाच सवार हो गया है, जो स्वयं को मेरा काल बताता है।

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥

भरत तो भूलकर भी राजा का यह अहित नहीं चाहेंगे, यह तो विधि के वश तुम्हारे मन में कुबुद्धि बस गई है। यह सब तो मेरे ही पापों का परिणाम है, जिसके कारण विधाता इतने कुसमय पर प्रतिकूल हो गए।

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥

सुंदर अयोध्या फिर से सुखपूर्वक बस जाएगी, राम की प्रभुता में जो सद्गुणों का धाम है। सभी भाई उनकी सेवा करेंगे, और तीनों लोकों में राम की महिमा फैलेगी।

तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ॥अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुहु गोई॥

तुम्हारा कलंक और मेरा पछतावा - मरने पर भी न मिटेगा, कभी नहीं जाएगा। अब जो तुम्हें उचित लगे वही करो, मैं तो आँखों की ओट में मुख छिपाकर बैठा रहूँगा।

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी॥

जब तक मैं जीवित हूँ, हाथ जोड़कर कहता हूँ, आगे और कुछ मत कहना। अंत में तुम्हें पछताना पड़ेगा, हे अभागिन - यह तो गाय को केवल उसकी नस के लिए मार डालने जैसा होगा।

दोहा

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु३६

राजा गिर पड़े और अनेक प्रकार से कहते रहे - आखिर तुम यह इतना बड़ा कदम क्यों उठा रही हो? पर वह चतुर छलिनी कुछ न बोली, मानो श्मशान में जागती हुई कोई भयंकर आत्मा बैठी हो।

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥

व्याकुल राजा 'राम-राम' रटते रहे, मानो पंख कटा कोई असहाय पक्षी हों। हृदय में वे यही मनाते रहे कि सुबह न हो, और कोई भी जाकर राम को यह बात न बताए।

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥

हे सूर्यदेव, रघुकुल के आराध्य, आज उदय मत होना - अयोध्या की यह दशा देखकर हृदय में शूल उठेगा। राजा का प्रेम और कैकेयी की कठोरता - विधाता ने दोनों को ही चरम सीमा तक रच डाला है।

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥

राजा के विलाप करते-करते ही सुबह हो गई, द्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि गूँजने लगी। भाट गुणगान पढ़ने लगे, गायक गीत गाने लगे - पर यह सब सुनकर राजा को मानो बाण चुभ रहे हों।

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥तेहिं निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥

सब मंगल-सामग्री राजा को कुछ ऐसी लगी जैसे सती होने जा रही स्त्री पर आभूषण सुहाते नहीं। उस रात किसी को भी नींद नहीं आई - सबके मन में राम-दर्शन की उत्सुकता और उल्लास भरा था।

दोहा

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि३७

द्वार पर सेवकों और मंत्रियों की भीड़ जमा है, सूर्य को उदित देखकर वे कहते हैं - अभी तक अयोध्यापति जागे नहीं हैं, आखिर इसका क्या विशेष कारण होगा?

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥

राजा तो सदा रात के अंतिम पहर में ही जाग जाते हैं - आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमंत्र, तुम जाओ और उन्हें जगाओ - उनकी आज्ञा पाकर ही आगे का कार्य किया जाए।

गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं॥धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥

तब सुमंत्र राजमहल के भीतर गए - वहाँ का भयावह दृश्य देखकर उन्हें जाते हुए भी डर लगने लगा। मानो कोई झपटकर निगल लेगा, वे ठीक से देख भी नहीं पा रहे थे - मानो वहाँ विपत्ति और विषाद ने ही अपना डेरा डाल दिया हो।

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकैई॥कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥

पूछने पर भी किसी ने उत्तर न दिया; वे उसी महल में गए जहाँ राजा कैकेयी के साथ थे। 'जय हो' कहकर सिर झुकाकर वे बैठ गए - पर राजा की यह दशा देखकर वे भी भय से सूख गए।

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी॥

राजा चिंता से व्याकुल, विवर्ण मुख लिए भूमि पर पड़े थे, मानो कमल अपनी जड़ से उखड़ गया हो। भयभीत मंत्री कुछ पूछ भी न सके - तभी कैकेयी बोल पड़ी, वाणी अशुभ से भरी और शुभता से रहित।

दोहा

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु३८

राजा को उस रात नींद नहीं आई - इसका कारण तो बस भगवान ही जानते हैं। 'राम-राम' रटते हुए ही उन्होंने रात बिता दी, पर राजा ने किसी से भी अपने मन का भेद नहीं खोला।

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥चलेउ सुमंत्र राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥

कैकेयी बोली - जाओ, शीघ्र राम को बुलाकर लाओ, फिर लौटकर समाचार पूछना। सुमंत्र राजा का रुख भाँपकर चल पड़े, उन्हें आभास हो गया कि रानी ने कोई कुचाल की है।

सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें॥

चिंता से व्याकुल सुमंत्र के पैर मार्ग में उठ ही न रहे थे - राम को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? हृदय में धैर्य धारण करके वे द्वार पर पहुँचे - सबने उनका उदास मन देखकर उनसे पूछा।

समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥

सबकी जिज्ञासा को शांत करके वे वहाँ पहुँचे जहाँ सूर्यवंश-शिरोमणि राम विराजमान थे। राम ने सुमंत्र को आते देखकर उनका आदर किया, उन्हें पिता के समान मानते हुए।

निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥

सुमंत्र ने उनका मुख देखकर राजा की आज्ञा सुनाई, और रघुकुल के दीपक राम को साथ लेकर चल पड़े। राम मंत्री के साथ कुछ असामान्य ढंग से जाते हुए दिखे, यह देखकर जहाँ-तहाँ लोग व्याकुल हो उठे।

दोहा

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु३९

वहाँ जाकर रघुकुलमणि राम ने राजा की अत्यंत दयनीय दशा देखी - वे ऐसे सहम गए मानो कोई वृद्ध गजराज सिंहिनी को देखकर चौंक उठा हो।

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई॥

राजा के होंठ सूख रहे थे, सारा शरीर जल रहा था, मानो मणिहीन दीन सर्प हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी खड़ी दिखीं, मानो मृत्यु ही घड़ियाँ गिन रही हो।

करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥

राम का स्वभाव तो करुणामय और कोमल है; ऐसा दुख उन्होंने पहले कभी न देखा न सुना था। फिर भी धैर्य धारण करके, समय का विचार करते हुए उन्होंने माता से मधुर वचनों में पूछा।

मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥

हे माता, मुझे पिताजी के दुख का कारण बताइए, जिससे इसे दूर करने का कोई उपाय किया जा सके।

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना॥सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥

मुझे राजा ने दो वरदान देने को कहा था, मैंने जो कुछ मुझे उचित लगा वह माँग लिया। यह सुनकर राजा के हृदय में चिंता हो गई है - वे तुम्हारे प्रति संकोच नहीं छोड़ पा रहे।

दोहा

सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु४०

एक ओर पुत्र-स्नेह है और दूसरी ओर अपना वचन - राजा इसी संकट में फँस गए हैं। यदि तुमसे हो सके तो आज्ञा शिरोधार्य करके इस कठिन क्लेश को मिटा दो।

निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥

निधड़क बैठी कैकेयी कटु वाणी बोल रही थी - उसे सुनकर कठोरता भी व्याकुल हो उठे। उसकी जीभ मानो धनुष थी और वचन अनेक बाण, मानो कोमल राजा ही उनका सुलभ लक्ष्य बने हों।

जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥

मानो कठोरता ही देह धारण करके किसी वीर योद्धा को धनुर्विद्या सिखा रही हो। उसने राम को सारा प्रसंग सुना दिया, ऐसे बैठी मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण करके बैठी हो।

मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू॥बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥

मन-ही-मन मुसकराकर सूर्यकुल के सूर्य, सहज आनंद के भंडार राम, सभी दोषों से रहित मृदु और मनोहर वचन बोले, मानो वाणी के आभूषण हों।

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥

सुनिए माता, वही पुत्र सौभाग्यशाली है जो माता-पिता के वचन का अनुरागी हो। हे माता, माता-पिता दोनों को संतुष्ट करने वाला पुत्र इस समस्त संसार में दुर्लभ है।

दोहा

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर४१

मुनियों का सत्संग और विशेषकर वन-निवास - दोनों ही हर प्रकार से मेरे हित में हैं। उस पर पिता की आज्ञा और फिर हे माता, आपका साथ भी मिल रहा है।

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु॥जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥

मेरे प्राणप्रिय भरत को राज्य मिल रहा है - आज तो विधाता हर प्रकार से मेरे अनुकूल हैं। यदि इतने अच्छे कारण के लिए भी मैं वन न जाऊँ, तो मुझे सबसे पहले मूर्खों में गिना जाना चाहिए।

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥

जो लोग कल्पवृक्ष त्यागकर अरंड के पौधे की सेवा करते हैं, या अमृत छोड़कर विष माँग लेते हैं - वे भी ऐसा सुअवसर पाकर चूकते नहीं। हे माता, अपने मन में इसे भलीभाँति विचार कर देखिए।

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥

हे माता, मुझे केवल एक ही दुख विशेष है - राजा को इतना अत्यंत व्याकुल देखकर। इतनी छोटी-सी बात पर पिताजी को इतना भारी दुख हो, इस पर मुझे विश्वास नहीं होता, हे माता।

राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू॥जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ॥

राजा तो धैर्यवान और गुणों के अथाह सागर हैं - जरूर मुझसे ही कोई बड़ा अपराध हो गया है। इसीलिए राजा मुझसे स्वयं कुछ नहीं कह रहे - मेरी सौगंध है, हे माता, आप सच-सच बता दीजिए।

दोहा

सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान४२

राघव के सहज-सरल वचनों को कुटिल बुद्धि कैकेयी ने टेढ़ा ही समझा - ठीक वैसे ही जैसे जोंक साधारण जल में भी टेढ़ी चाल से चलती है।

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई॥सपथ तुम्हार भरत के आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना॥

राम का यह रुख पाकर रानी प्रसन्न हो गई, और कपट भरा स्नेह दिखाकर बोली - तुम्हारी और भरत की सौगंध, मैं इसका कोई और कारण नहीं जानती।

दोहा

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥।राम सत्य सब जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥

हे पुत्र, तुम अपराध के योग्य कभी हो ही नहीं सकते - तुम तो माता, पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम, तुमने जो कुछ कहा वह सर्वथा सत्य है - तुम सचमुच माता-पिता के वचन में रत रहते हो।

पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥

जाकर पिता को समझाकर वही कहो, जिससे वृद्धावस्था में उन्हें अपयश न हो। जिसे तुम्हारे समान पुत्र का पुण्य-फल मिला है, उसका अनादर करना उचित नहीं है।

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥

दुष्ट मुख से निकले शुभ वचन भी वैसे ही शोभा पाते हैं जैसे मगध में गया आदि तीर्थ। कैकेयी माता के सभी वचन राम को भा गए, ठीक वैसे ही जैसे गंगा में मिल जाने पर कोई भी जल पवित्र और सुंदर हो जाता है।

दोहा

गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।४३

राम का स्मरण करते ही राजा की मूर्च्छा टूट गई और उन्होंने करवट बदली। मंत्री सुमंत्र ने राम के आगमन की सूचना देकर समयानुकूल विनम्र वचन कहे।

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥सचिव सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥

राम के पधारने की बात सुनकर राजा ने धैर्य धारण करके अपने नेत्र खोले। मंत्री ने सहारा देकर राजा को बिठाया; राम को चरणों में गिरते देख राजा उन्हें एकटक निहारने लगे।

लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥

स्नेह से विह्वल होकर राजा ने राम को हृदय से लगा लिया, मानो किसी सर्प को उसकी खोई हुई मणि फिर मिल गई हो। राजा राम को अपलक निहारते रहे, और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली।

सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा॥बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥

शोक से विवश राजा कुछ कह ही न पाए, बस बार-बार राम को हृदय से लगाते रहे। मन-ही-मन राजा विधाता को मनाने लगे कि किसी तरह रघुनाथ को वन न जाना पड़े।

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥

शिवजी का स्मरण करके राजा विनती करते हैं - हे सदाशिव, मेरी यह प्रार्थना सुनिए। आप आशुतोष हैं, असीम दानी हैं - मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरी पीड़ा हर लीजिए।

दोहा

तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु४४

आप ही सबके हृदय के प्रेरक हैं - राम को भी वही बुद्धि दीजिए कि वे मेरा वचन त्यागकर, अपने शील और स्नेह को परे रखकर, घर पर ही रुक जाएँ।

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ॥सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥

संसार में मेरा अपयश हो जाए, मेरा सुयश नष्ट हो जाए; मैं भले स्वर्ग के बजाय नरक में गिर जाऊँ - मुझे चाहे जितने असह्य दुख भोगने पड़ें, पर राम कभी मेरी आँखों से ओझल न हों।

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥

राजा मन-ही-मन ऐसा सोचते रहे पर मुँह से कुछ न बोले; उनका मन पीपल के पत्ते-सा काँपने लगा। रघुनाथ ने पिता को प्रेमवश समझकर, माता का भाव अनुमान लगाकर फिर कुछ कहना शुरू किया।

देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥

देश-काल और अवसर के अनुसार राम ने विनम्र, विचारपूर्ण वचन कहे - हे तात, मुझे कुछ कहने की धृष्टता करने दीजिए, अनुचित लगे तो बालसुलभ जानकर क्षमा कीजिएगा।

अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥

इतनी छोटी-सी बात के लिए आपने इतना दुख उठाया, मुझे पहले किसी ने बताया ही नहीं। आपकी यह दशा देखकर मैंने माता से पूछा, और सारा प्रसंग सुनकर तो मेरे शरीर को शांति मिल गई है।

दोहा

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात४५

हे तात, इस मंगल अवसर पर केवल स्नेहवश यह चिंता त्याग दीजिए। हर्षित हृदय से मुझे आज्ञा दीजिए - यह कहते हुए प्रभु का शरीर पुलकित हो उठा।

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥

धन्य है उसका जन्म इस पृथ्वी पर, जिसका आचरण सुनकर पिता को आनंद मिले। जिसके लिए माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हों, उसकी हथेली में तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - चारों फल स्वयं आ जाते हैं।

आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥

आपकी आज्ञा का पालन करके जन्म का फल पाकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा, बस आपकी आज्ञा चाहिए। मैं माता से विदा माँग आता हूँ, फिर उनके चरण छूकर वन को चल पड़ूँगा।

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥

यह कहकर राम वहाँ से चल पड़े; राजा शोक से इतने विवश थे कि कोई उत्तर न दे सके। यह तीखी बात सारे नगर में फैल गई, मानो छूते ही किसी बिच्छू ने हर शरीर को डंक मार दिया हो।

सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥

यह सुनते ही नगर के सभी स्त्री-पुरुष व्याकुल हो उठे, जैसे दावानल देखकर लता और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जहाँ भी किसी ने यह सुना, वहीं सिर धुनने लगा - इतना गहरा विषाद कि किसी को धैर्य ही न रहा।

दोहा

मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ।मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।४६

सबके मुख सूख गए, नेत्रों से आँसू बहने लगे, हृदय में शोक समाता न था - मानो करुण रस की सेना ही धावा बोलकर अयोध्या पर उतर आई हो।

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी॥एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥

सब कुछ ठीक चलते-चलते विधाता ने यह बात बिगाड़ दी - जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को कोसने लगे। इस पापिन को न जाने क्या सूझा कि उसने अपने ही छाए हुए घर पर आग लगा दी।

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥

वह मानो अपने ही हाथ से अपनी आँखें निकालकर भी देखना चाहती हो, अमृत फेंककर विष चखना चाहती हो। यह कुटिल, कठोर, कुबुद्धि अभागिन तो रघुकुल-रूपी बाँस के वन के लिए साक्षात आग बन गई है।

पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥

जैसे कोई डाल पर बैठकर उसी वृक्ष को काट डाले, वैसे ही सुख के बीच उसने शोक का साम्राज्य खड़ा कर दिया। राम तो सदा इसे अपने प्राणों के समान प्रिय थे - न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठान ली।

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥

कवियों ने स्त्री-स्वभाव के विषय में सच ही कहा है - वह हर प्रकार से अगम्य और अथाह रहस्य है। अपनी परछाईं को तो शायद कोई पकड़ भी ले, पर हे भाई, स्त्री की गति समझी नहीं जा सकती।

दोहा

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।४७

अग्नि क्या नहीं जला सकती? समुद्र में क्या नहीं समा सकता? कोई प्रबल स्त्री क्या नहीं कर सकती? इस संसार में मृत्यु किसे नहीं निगल जाती?

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥

विधाता क्या सुनाना चाहता था और क्या सुना दिया! क्या दिखाना चाहता था और क्या दिखा रहा है! कोई कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया - बिना सोचे-विचारे उस कुबुद्धि को वरदान दे दिया।

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥

जो हठपूर्वक समस्त दुखों का भाजन बन गए, मानो एक अबला के वश होकर उनका ज्ञान और गुण ही खो गया हो। पर कुछ लोग धर्म की सही मर्यादा पहचानते हैं, और वे बुद्धिमान राजा को दोष नहीं देते।

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥

कोई एक-दूसरे को राजा शिबि, दधीचि और हरिश्चंद्र की कथाएँ सुनाने लगे। कोई कहते हैं यह भरत की सहमति से ही हुआ होगा, तो कोई उदासीन भाव से बस सुनते रह जाते हैं।

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥

कान बंद करके, दाँतों तले जीभ दबाकर कुछ लोग कहते हैं - यह बात तो झूठी लगती है। ऐसा कहने से तुम्हारे पुण्य ही नष्ट होंगे - राम तो भरत को प्राणों के समान प्रिय हैं।

दोहा

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल४८

चंद्रमा भले अग्नि की चिंगारियाँ बरसाने लगे, अमृत भले विष का ढेर बन जाए - फिर भी भरत और राम स्वप्न में भी कभी एक-दूसरे के प्रतिकूल कुछ नहीं करेंगे।

एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥

कोई विधाता को ही दोष देते हैं, जिन्होंने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर में हलचल मच गई, सबको चिंता सताने लगी - सबके हृदय का उल्लास मिटकर असह्य जलन में बदल गया।

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी॥लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही॥

कुल की सम्मानित ब्राह्मण स्त्रियाँ और वृद्धजन, जो कैकेयी को अत्यंत प्रिय थे, उसे शील की प्रशंसा करते हुए सीख देने लगे - पर उनके वचन कैकेयी को बाणों के समान चुभने लगे।

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥

तुम तो सदा कहती थीं कि भरत मुझे राम जितना प्रिय नहीं है - यह बात सारा जगत जानता है। राम पर तुम्हारा सहज स्नेह रहा है - फिर आज किस अपराध पर उन्हें वनवास दे रही हो?

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥

तुमने कभी सौत के प्रति ईर्ष्या नहीं दिखाई - तुम्हारी प्रीति और विश्वास सारा देश जानता है। अब कौशल्या ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जिसके लिए तुमने मानो वज्र ही गिरा दिया?

दोहा

सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम४९

क्या सीता कभी अपने प्रियतम का साथ छोड़ेंगी? क्या लक्ष्मण कभी घर पर रुक जाएँगे? क्या भरत कभी नगर में राज्य भोगेंगे? और क्या राजा राम के बिना जीवित रह पाएँगे?

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥

ऐसा विचार करके हृदय से क्रोध त्याग दो, शोक और कलंक की पिटारी मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर वन से राम का क्या प्रयोजन?

नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥

राम को राज्य की कोई भूख नहीं है, वे तो धर्म के धुरंधर और विषय-भोग से विरक्त हैं। राम घर छोड़कर गुरु के घर ही रह जाएँ - राजा से यही दूसरा वर माँग लो।

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥

यदि तुम हमारी बात नहीं मानोगी, तो तुम्हारे हाथ कुछ भी नहीं आने वाला। यदि यह सब हँसी-मज़ाक में कहा गया था, तो खुलकर कह दो और सबको बता दो।

राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥

क्या राम जैसा पुत्र वन जाने योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हारे विषय में क्या कहेंगे? शीघ्र उठो और वही उपाय करो जिससे यह शोक और कलंक मिट जाए।

छंद

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥

जिस भी उपाय से शोक और कलंक मिट सके, वही उपाय करके कुल की रक्षा करो; हठपूर्वक राम को वन जाने से रोक दो, कोई दूसरी बात न चलने दो। जैसे सूर्य के बिना दिन नहीं, प्राण के बिना शरीर नहीं, और चंद्रमा के बिना रात्रि नहीं होती - वैसे ही, तुलसीदास कहते हैं, हे रानी, अपने मन में समझ लो कि प्रभु के बिना अयोध्या भी कुछ नहीं है।

सोरठा

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी५०

सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मधुर और परिणाम में हितकर थी - पर मंथरा की सिखाई हुई उस कुटिल कैकेयी ने उस पर तनिक भी ध्यान न दिया।

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥

असह्य क्रोध से रूखी कैकेयी ने कोई उत्तर न दिया, बस हिरणियों को देखती भूखी बाघिन-सी घूरती रही। उसकी व्याधि को असाध्य जानकर वे स्त्रियाँ उसे छोड़कर चल दीं, कहती हुईं - मंदबुद्धि अभागिन!

राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥

राज्य करते हुए विधाता ने इसे इस तरह बिगाड़ दिया - इसने वह कर डाला जो कोई और कभी नहीं करता। इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष विलाप करते हैं और उस कुचाली को करोड़ों गालियाँ देते हैं।

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥

प्रजा भयंकर ज्वर से जलती हुई लंबी साँसें ले रही है - राम के बिना जीवन की क्या आशा? इस विशाल वियोग से व्याकुल प्रजा ऐसी तड़प रही है मानो सूखते जल में जलचर प्राणी।

अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखे राऊ॥

नगर के स्त्री-पुरुष गहरे विषाद में डूबे थे, जब स्वामी राम अपनी माता के पास पहुँचे। उनका मुख प्रसन्न था और मन में चौगुना उत्साह था, मानो सारी चिंता मिट गई हो और राजा बच गए हों।

दोहा

नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान५१

रघुवीर का मन मानो नवबंधित हाथी था और राज्य उसकी बेड़ी के समान। स्वयं को मुक्त जानकर, वन जाने की बात सुनकर उनके हृदय में और भी अधिक आनंद बढ़ गया।

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥

रघुकुल के तिलक राम ने दोनों हाथ जोड़कर आनंदपूर्वक माता के चरणों में मस्तक झुकाया। माता ने आशीर्वाद देकर उन्हें हृदय से लगा लिया और आभूषण-वस्त्र न्योछावर किए।

बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए॥

माता बार-बार राम का मुख चूमती रहीं, उनके नेत्रों में स्नेह के आँसू और शरीर पुलकित था। कभी गोद में बिठाकर तो कभी हृदय से लगाकर, उनका प्रेम-रस सुंदर बूँदों के समान बह रहा था।

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥

उनका प्रेम और आनंद वर्णन से परे था, मानो किसी दरिद्र को कुबेर का पद मिल गया हो। राम का सुंदर मुख आदरपूर्वक निहारते हुए माता मधुर वचन बोलीं।

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥सुकृत सील सुख सी सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥

हे पुत्र, बताओ, तुम्हारी माता तुम पर वारी जाती है - वह आनंदमय शुभ लगन कब है? जिससे पुण्य, शील और सुख से भरा यह सुंदर समय मेरे जीवन के सच्चे लाभ की चरम सीमा बन जाए।

दोहा

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति५२

जिसे नगर के सभी स्त्री-पुरुष इस तरह व्याकुल होकर चाहते हैं, जैसे प्यासे चातक और चातकी शरद ऋतु की स्वाति बूँद के लिए तरसते हैं।

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥

हे पुत्र, मैं तुम पर वारी जाती हूँ, जाओ शीघ्र स्नान करो, जो मन भाए वह कुछ मीठा खा लो। फिर पिताजी के पास जाना, हे भैया - बहुत देर हो चुकी है, जाओ, मैं तुम पर वारी जाती हूँ।

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला॥

माता के ये अत्यंत अनुकूल वचन सुनकर, मानो स्नेह के कल्पवृक्ष के फूल हों, सुख-रूपी मकरंद से भरे और सौभाग्य में जड़े हुए - फिर भी राम का मन भँवरे की तरह इनमें भूला नहीं।

धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥

धर्म के धुरंधर राम ने धर्म की गति समझकर माता से अत्यंत मृदु वाणी में कहा - पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है, जहाँ हर प्रकार से मेरा बड़ा प्रयोजन सिद्ध होगा।

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥

हे माता, प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दीजिए, जिससे मैं आनंद और मंगल के साथ वन को जाऊँ। स्नेहवश व्यर्थ भय मत कीजिए - हे माता, मेरा आनंद तो आपके आशीर्वाद में ही है।

दोहा

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान५३

पिता के वचन को प्रमाण मानकर चौदह वर्ष वन में बिताकर मैं फिर लौटकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा - मन को मलिन मत कीजिए।

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥

राघव के ये विनम्र, मधुर वचन माता के हृदय में बाणों की तरह चुभे। यह शीतल वाणी सुनकर वे सहमकर सूख गईं, जैसे जवासा का पौधा वर्षा का जल पड़ते ही मुरझा जाता है।

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥

उनके हृदय का विषाद वर्णन से परे था, मानो किसी हिरणी ने सिंह की गर्जना सुन ली हो। उनके नेत्र भर आए, शरीर थर-थर काँपने लगा, मानो काँटा निगल गई कोई मछली तड़प रही हो।

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥

धैर्य धारण करके पुत्र का मुख निहारते हुए माता गद्गद वाणी में बोलीं - हे तात, तुम पिता को प्राणों के समान प्रिय हो, वे सदा तुम्हारा आचरण देखकर आनंदित रहते हैं।

राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥

राजतिलक के लिए उन्होंने शुभ दिन साध लिया था - अब वन जाने को कह रहे हैं, किस अपराध पर? हे तात, मुझे पूरा सच बताओ - सूर्यवंश के लिए यह आग किसने लगाई है?

दोहा

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ५४

राम का भाव देखकर सुमंत्र ने समझाकर सारा कारण बता दिया। यह प्रसंग सुनकर कौशल्या मानो मूक हो गईं - उनकी दशा वर्णन से परे थी।

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू॥

वे न राम को रोक सकीं और न जाने को कह सकीं - दोनों ही ओर से हृदय में भयंकर जलन थी। मानो चंद्रमा लिखते-लिखते विधाता के हाथ से राहु लिखा गया हो - विधि की गति सदा सबके लिए किसी न किसी रूप में विपरीत ही होती है।

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥

धर्म और स्नेह दोनों ने उनकी बुद्धि को घेर लिया - उनकी दशा साँप और छछूंदर की-सी हो गई। यदि मैं पुत्र को रोकूँ और आग्रह करूँ, तो धर्म भी नष्ट होगा और परिवार में विरोध भी उत्पन्न होगा।

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी॥बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥

यदि मैं वन जाने को कहूँ तो भी बड़ी हानि है - इस संकट में रानी चिंता से विवश हो गईं। फिर स्त्री-धर्म का विचार करके बुद्धिमती कौशल्या ने राम और भरत दोनों को समान पुत्र मानकर विचार किया।

सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥

सीधे-सरल स्वभाव वाली राम की माता ने बड़े धैर्य से यह वचन कहा - हे पुत्र, मैं तुम पर वारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया; पिता की आज्ञा तो सभी धर्मों का शिखर है।

दोहा

राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु५५

राज्य देने की बात कहकर वन दे दिया गया - इसमें मुझे तनिक भी दुख नहीं। पर तुम्हारे बिना भरत को, राजा को और प्रजा को अत्यंत तीव्र कष्ट होगा।

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥

हे तात, यदि यह केवल पिता की आज्ञा हो, तो माता को बड़ा मानकर मत जाओ। पर यदि माता-पिता दोनों वन जाने को कहें, तो वन भी अयोध्या के समान सौ गुना हो जाता है।

पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥

वन के देवता को पिता और वनदेवी को माता मानना, पक्षी और मृग तुम्हारे चरण-कमलों की सेवा करेंगे। अंततः राजा के लिए भी वनवास उचित ही है - पर उनकी अवस्था देखकर हृदय में विषाद होता है।

बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥

वन बड़ा भाग्यशाली है और अयोध्या अभागी है, क्योंकि रघुकुल-तिलक तुमने उसे त्याग दिया। हे पुत्र, यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो, तो तुम्हारे हृदय में संदेह हो सकता है।

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥

हे पुत्र, तुम सबके परम प्रिय हो - प्राणों के भी प्राण, जीवन के भी जीवन। यदि तुम कहो कि माता, मैं वन जा रहा हूँ, तो यह वचन सुनकर मैं बैठी पछताती रहूँगी।

दोहा

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ५६

यह सोचकर मैं झूठा स्नेह बढ़ाकर हठ नहीं करूँगी। माता-पुत्र के नाते को मानते हुए, मैं तुम पर वारी जाती हूँ - बस मुझे याद करना मत भूलना।

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई॥अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥

हे स्वामी, देवता और पितर सब तुम ही हो, पलक जैसे नेत्र की रक्षा करती है वैसे मेरी रक्षा करना। समयावधि जल है और प्रिय परिजन मछलियाँ - तुम करुणा के सागर और धर्म के धुरंधर हो।

अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई॥जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥

यह सोचकर वही उपाय करना जिससे लौटकर सबसे जीते-जी मिल सको। सुख से वन जाओ, मैं तुम पर वारी जाती हूँ - अपनी प्रजा, परिजन और नगर को अनाथ-सा छोड़कर जाओ।

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥

आज सबके पुण्यों का फल मानो समाप्त हो गया - यह भयंकर विपरीत समय आ गया है। अनेक प्रकार से विलाप करते हुए वे राम के चरणों से लिपट गईं, स्वयं को परम अभागिन मानते हुए।

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥

हृदय में भयंकर असह्य जलन फैल गई - उनके अनेक विलाप वर्णन से परे थे। राम ने माता को उठाकर हृदय से लगाया और फिर मृदु वचनों से समझाया।

दोहा

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ५७

उस समय यह समाचार सुनकर सीता व्याकुल होकर उठ खड़ी हुईं। जाकर उन्होंने सास के चरण-कमलों की वंदना की और सिर झुकाकर बैठ गईं।

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥

सास ने मृदु वाणी में आशीर्वाद दिया, सीता की अत्यंत कोमलता देखकर वे व्याकुल हो उठीं। सीता सिर झुकाए बैठी चिंतित थीं - सौंदर्य की राशि, पति के प्रति पवित्र प्रेम से भरी।

चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू॥की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना॥

मेरे जीवन के स्वामी वन जाना चाहते हैं - किस भाग्यशाली को उनका साथ मिलेगा? क्या शरीर सहित प्राण साथ जाएँगे, या केवल प्राण ही रह जाएँगे? विधाता की चाल कुछ समझ में नहीं आती।

चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥

सीता अपने सुंदर चरणों के नाखूनों से धरती कुरेदती रहीं, पायल की मधुर रुनझुन गूँजती रही, जैसा कवियों ने वर्णित किया है। मानो वे पायल भी प्रेमवश विनती कर रही हों - सीता के चरण हमें कभी न त्यागें।

मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी॥तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी॥

सीता के सुंदर नेत्रों से आँसू बह रहे थे; यह देखकर राम की माता बोलीं - हे पुत्र, सुनो, सीता अत्यंत सुकुमार हैं, सास-ससुर और परिजनों को अत्यंत प्रिय हैं।

दोहा

पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु५८

सीता के पिता राजाओं में शिरोमणि जनक हैं, ससुर सूर्यवंश के सूर्य हैं, और पति सूर्यकुल-रूपी कुमुद-वन के लिए चंद्रमा हैं - गुण और रूप के भंडार।

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई॥

और मैंने भी उसे प्रिय पुत्रवधू के रूप में पाया है - रूप, गुण और शील की सुंदर राशि। उसे अपनी आँख की पुतली बनाकर, प्रेम बढ़ाकर, मैंने अपने प्राण जानकी से बाँध लिए हैं।

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥

मानो कल्पलता हो, मैंने उसे अनेक प्रकार से दुलार से पाला-पोसा, स्नेह-जल से सींचकर बड़ा किया। फूलने-फलने ही वाली थी कि विधाता प्रतिकूल हो गए - अब क्या परिणाम होगा, यह कहा नहीं जा सकता।

पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥

पलंग और गोद की हिंडोली के अतिरिक्त सीता ने कभी कठोर धरती पर पैर नहीं रखा। मैं उसे संजीवनी बूटी की तरह सहेजती रही हूँ, दीये की बाती हटाने तक को कभी नहीं कहा।

सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी॥

वही सीता अब तुम्हारे साथ वन जाना चाहती है - हे रघुनाथ, अब तुम्हारी क्या आज्ञा है? चंद्रमा की किरणों की रसिक चकोरी भला सूर्य की प्रखर आँखों से नेत्र कैसे मिला सकेगी?

दोहा

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि५९

वन में हाथी, सिंह, राक्षस और अनेक दुष्ट जीव विचरते हैं - हे पुत्र, क्या विष की बगिया में कहीं सुंदर संजीवनी बूटी शोभा पाती है?

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥

वन के लिए विधाता ने भील और किरात जाति की किशोरियाँ ही रची हैं, जो भोग-विलास से अनजान हैं। उनका स्वभाव पत्थर में रहने वाले कीड़े-सा कठोर है - वन उन्हें कभी कष्ट नहीं देता।

के तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥

या फिर तपस्विनी स्त्रियाँ वन के योग्य हैं, जिन्होंने तप के लिए सारे भोग त्याग दिए हों। पर हे पुत्र, सीता वन में कैसे रहेगी - जो चित्र में बने बंदर को देखकर भी डर जाती है!

सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥

गंगा में उगने वाला सुंदर कमल - क्या राजहंस की कुमारी किसी छोटे कीचड़ भरे गड्ढे के योग्य है? यह विचार करके, जो भी तुम्हारी आज्ञा हो, वही सलाह मैं जानकी को दूँगी।

जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥

माता ने कहा - यदि सीता घर पर ही रहे, तो मुझे बहुत सहारा मिलेगा। माता के इन प्रिय वचनों को सुनकर रघुवीर को लगा मानो वे शील और स्नेह के अमृत में सने हों।

दोहा

कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष६०

प्रिय और विवेकपूर्ण वचन कहकर राम ने माता को संतुष्ट किया, फिर वन के गुण-दोष प्रकट करते हुए जानकी को समझाने लगे।

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥

माता के समीप कहने में राम को संकोच हुआ, पर समय को समझते हुए वे बोले - हे राजकुमारी, मेरी सीख सुनो, इसे मन में किसी और भाव से मत लो।

आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥

यदि तुम अपना और मेरा दोनों का भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर पर ही रहो। मेरी आज्ञा और सास की सेवा - हे प्रिये, हर प्रकार से घर में रहना ही उचित है।

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥

इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं कि तुम आदरपूर्वक सास-ससुर के चरणों की सेवा करो। जब-जब माता मेरा स्मरण करेंगी, तब-तब उनका सीधा-सरल मन प्रेमवश व्याकुल होगा,

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥

तब-तब, हे सुंदरी, पुरानी कथाएँ सुनाकर उन्हें मृदु वाणी से समझाना। मैं स्वाभाविक भाव से सौगंध खाकर कहता हूँ - हे सुमुखि, माता के हित के लिए ही मैं तुम्हें यहाँ रोक रहा हूँ।

दोहा

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस६१

गुरु और श्रुति के अनुकूल धर्म का फल तो बिना कष्ट के ही प्राप्त हो जाता है - मुनि गालव और राजा नहुष ने तो हठ के वश ही वे सारे संकट सहे थे।

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥

और मैं पिता के वचन को प्रमाण मानकर शीघ्र ही लौट आऊँगा - सुनो, हे सुमुखि सयानी। दिन बीतने में देर न लगेगी - हे सुंदरी, मेरी यह सीख सुनो।

जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥

हे प्रिये, यदि तुम प्रेमवश हठ करोगी, तो अंततः तुम्हें दुख ही मिलेगा। वन अत्यंत कठिन और भयंकर है - वहाँ घोर धूप, हिम, वर्षा और आँधी है।

कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥

मार्ग में कुश, काँटे और अनेक कंकड़-पत्थर बिछे हैं - बिना जूतों के पैदल चलना पड़ता है। तुम्हारे चरण-कमल तो कोमल और सुंदर हैं, और मार्ग विशाल पर्वतों से दुर्गम है।

कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥

वहाँ कंदराएँ, गुफाएँ, नदी-नाले हैं - इतने दुर्गम और अथाह कि देखे भी नहीं जाते। भालू, बाघ, भेड़िया, सिंह और हाथी ऐसी दहाड़ते हैं कि सुनते ही धैर्य भी भाग जाए।

दोहा

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल६२

भूमि पर शयन, वल्कल के वस्त्र, और कंद-मूल-फल का आहार - क्या ये सदा प्रतिदिन हर अनुकूल समय पर सहज ही मिल जाते हैं?

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥

राक्षस मनुष्यों का भक्षण करते हुए विचरते हैं, वे अनेक प्रकार के कपटी वेष धारण कर लेते हैं। पहाड़ी जल भी अत्यंत कड़वा लगता है - वन की विपत्तियों का वर्णन नहीं किया जा सकता।

ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥

भयंकर सर्प, डरावने पक्षी, घोर वन, और स्त्री-पुरुषों को चुरा ले जाने वाले राक्षसों के झुंड। धीर पुरुष भी घने वन की याद आते ही डर जाते हैं - और तुम तो, हे मृगनयनी, स्वभाव से ही भीरु हो।

हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥

हे हंसगामिनी, तुम वन के योग्य नहीं हो - यह सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे। मानसरोवर के अमृत-सम जल से पली हंसिनी भला लवण-समुद्र में कैसे जी सकेगी?

नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥

नए आम्रकुंज में विहार करने वाली कोयल भला कँटीले करील के वन में कैसे शोभा पाएगी? हे चंद्रमुखी, हृदय में यह विचार करके घर पर ही रहो - वन में बहुत भारी दुख है।

दोहा

सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि६३

जो सहज हितैषी, गुरु या स्वामी की सीख को सिर झुकाकर स्वीकार नहीं करता, वह अवश्य ही हृदय में भरपूर पछताता है - उसका अपना हित अवश्य नष्ट होता है।

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥

अपने प्रियतम के मृदु और मनोहर वचन सुनकर सीता के सुंदर नेत्र आँसुओं से भर आए। यह शीतल सीख कैसे दाहक बन गई - जैसे शरद ऋतु की चाँदनी रात चकवी के लिए बन जाती है।

उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥

व्याकुल वैदेही से कोई उत्तर न बन पड़ा - उनके पवित्र, स्नेही स्वामी उन्हें छोड़ना चाहते थे। बलपूर्वक आँसू रोककर पृथ्वी-कुमारी सीता ने हृदय में धैर्य धारण किया।

लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥

सास के चरण छूकर हाथ जोड़कर उन्होंने कहा - हे देवी, मेरी यह बड़ी धृष्टता क्षमा कीजिए। मेरे प्राणनाथ ने मुझे वही सीख दी है, जिससे मेरा परम हित हो।

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥

पर मैं अपने दुखी मन में यह भी समझती हूँ कि प्रियतम के वियोग के समान संसार में कोई दुख नहीं है।

दोहा

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान६४

हे प्राणनाथ, हे करुणा के आगार, सुंदर, सुखदायक और सुजान - हे रघुकुल-कुमुद के चंद्रमा, आपके बिना तो स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है।

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई॥सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥

माता, पिता, प्रिय बहन, प्रिय भाई, प्रिय परिवार और हितैषियों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, सज्जन सहायक, सुंदर और सुशील सुखदायी पुत्र -

जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥

हे नाथ, जितने भी स्नेह और नाते हों, पति के बिना स्त्री के लिए वे सूर्य से भी अधिक तपते हैं। शरीर, धन, घर, भूमि, नगर, राज्य - पति के बिना ये सब शोक का समूह मात्र बन जाते हैं।

भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥

भोग रोग के समान, आभूषण मात्र भार, और संसार यमयातना के समान हो जाता है। हे प्राणनाथ, आपके बिना इस संसार में मेरे लिए कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है।

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥

जैसे शरीर बिना प्राण के और नदी बिना जल के, वैसे ही, हे नाथ, स्त्री पुरुष के बिना निष्प्राण है। हे नाथ, सारा सुख तो आपके साथ रहने में है, आपके शरद-चंद्र-सम निर्मल मुख को निहारने में है।

दोहा

खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल६५

हे नाथ, आपके साथ पक्षी और मृग ही मेरे परिजन होंगे, वन ही नगर और वल्कल ही निर्मल रेशमी वस्त्र। आपके साथ रहने पर पर्णकुटी भी स्वर्ग-भवन के समान सुख का मूल बन जाएगी।

बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु संग मंजु मनोज तुराई॥

उदार वनदेवता और वनदेवियाँ सास-ससुर के समान ही मेरी देखभाल करेंगे। कुश और कोमल पत्तों की शैया भी सुंदर लगेगी - प्रभु के साथ वह कामदेव की मृदु सेज जैसी प्रतीत होगी।

कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥

कंद-मूल-फल ही अमृत-सम आहार होंगे, पहाड़ ही अयोध्या के सैकड़ों महलों के समान लगेंगे। पल-पल प्रभु के चरण-कमलों को निहारते हुए मैं दिन में चकवी की भाँति आनंदित रहूँगी।

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥

हे नाथ, आपने वन के अनेक दुख गिनाए - भय, विषाद और घनघोर संताप। पर हे कृपानिधान, ये सब मिलकर भी प्रभु-वियोग के लेशमात्र दुख के बराबर नहीं हो सकते।

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥

हे सुजानों में शिरोमणि, यह हृदय में जानकर मुझे साथ ले चलिए, मत छोड़िए। हे स्वामी, मैं और क्या विनती करूँ - आप तो करुणामय और अंतर्यामी हैं।

दोहा

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान६६

यदि मुझे अवधि-भर अयोध्या में ही छोड़ दिया गया, तो हे दीनबंधु, हे सुंदर सुखदायक शील-स्नेह-निधान, जान लीजिए कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे।

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥

मुझे मार्ग में चलते हुए कोई थकान नहीं होगी, क्षण-क्षण आपके चरण-कमलों को निहारते हुए। मैं हर प्रकार से प्रियतम की सेवा करूँगी और मार्ग से उत्पन्न सारी थकान दूर करूँगी।

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥

आपके चरण धोकर, वृक्ष की छाया में बैठकर, मैं प्रसन्न मन से पंखा झलूँगी। पसीने की बूँदों सहित आपके श्याम शरीर को देखते हुए, हे प्राणनाथ, फिर दुख का समय कहाँ रह जाता है?

सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही॥

समतल भूमि पर तृण और कोमल पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबाएगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्ति निहारते हुए मुझे कोई आँधी भी नहीं छू सकेगी।

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥

हे नाथ, आपके साथ रहते हुए मुझे कौन ताक भी सकेगा - जैसे सिंहनी की ओर खरगोश या सियार नहीं देखते? आप कहते हैं मैं सुकुमार हूँ, वन के योग्य नहीं - पर तप तो आपके लिए उचित हो और भोग मेरे लिए, यह कैसा न्याय?

दोहा

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावर प्रान६७

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी यदि आपका हृदय न पसीजे, तो हे प्रभु, यह तुच्छ प्राण भीषण वियोग का दुख सहने को विवश होंगे।

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥

यह कहकर सीता अत्यंत व्याकुल हो गईं - वे 'वियोग' शब्द तक सहन न कर सकीं। यह दशा देखकर रघुनाथ के मन में समझ आ गया कि यदि हठपूर्वक रोका गया, तो सीता प्राण नहीं बचा पाएँगी।

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥

कृपालु सूर्यवंश-नाथ राम ने कहा - चिंता छोड़ो, वन में मेरे साथ चलो। आज विषाद का अवसर नहीं है - शीघ्र वन-गमन की तैयारी करो।

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥

प्रिय वचन कहकर राम ने प्रिया को समझाया, फिर वे माता के चरणों में आशीर्वाद लेने गए। राम बोले - मैं शीघ्र लौटकर प्रजा का दुख मिटाऊँगा, माता मुझे निष्ठुर समझकर भुला न देना।

फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥

क्या विधाता फिर कभी मेरी यह दशा पलटेंगे, कि मैं फिर यह मनोहर नेत्र-युगल देख सकूँ? हे तात, वह शुभ, सुंदर दिन कब आएगा, जब यह माता जीवित रहते हुए तुम्हारा चंद्रमुख निहार सके?

दोहा

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात६८

फिर 'वत्स', 'लाल', 'रघुपति', 'रघुबर', 'तात' कहकर - न जाने कब मैं तुम्हें बुलाकर, हृदय से लगाकर हर्षित होकर तुम्हारा रूप निहार सकूँगी?

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥

माता को स्नेह से इतना कातर और व्याकुल देखकर मुँह से वचन ही न निकलते थे। राम ने अनेक प्रकार से उन्हें समझाया - उस समय के स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता।

तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥

तब जानकी ने सास के चरण छूकर कहा - सुनिए माता, मैं अत्यंत अभागिन हूँ। आपकी सेवा के समय ही विधाता ने मुझे वनवास दे दिया - मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सका।

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥

आप विषाद त्याग दीजिए, पर मुझ पर से अपना स्नेह मत हटाइए - यह तो कठिन कर्मगति है, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। सीता के ये वचन सुनकर सास व्याकुल हो उठीं - उनकी दशा कैसे वर्णन करूँ?

बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥

बार-बार सीता को हृदय से लगाकर, धैर्य धारण करके सास ने उन्हें सीख और आशीर्वाद दिया - जब तक गंगा-यमुना की जलधारा बहती रहे, तब तक तुम्हारा सुहाग अचल बना रहे।

दोहा

सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार६९

सास ने सीता को अनेक प्रकार से आशीर्वाद और सीख दी, और वे बड़े प्रेम से बार-बार उनके चरण-कमलों में सिर नवाकर वहाँ से चल पड़ीं।

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥

जब लक्ष्मण ने यह समाचार सुना, तो व्याकुल होकर उदास मुख लिए दौड़ पड़े। शरीर काँप रहा था, रोमांच हो आया, आँखें आँसुओं से भर गईं - अत्यंत प्रेम में अधीर होकर उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए।

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा॥

वे कुछ कह नहीं पा रहे, बस खड़े देखते रह गए - मानो जल से निकाली गई मछली हो। मन में यही सोच थी - हे विधाता, अब क्या होने वाला है? क्या हमारा सारा सुख और पुण्य यहीं समाप्त हो गया?

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें॥

मुझे रघुनाथ क्या कहेंगे - घर पर रहने देंगे या साथ ले चलेंगे? राम ने देखा कि भाई लक्ष्मण हाथ जोड़े खड़े हैं, शरीर और घर से मानो सारा नाता तोड़ चुके हैं।

बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥

नीति में निपुण, शील-स्नेह और सरलता के सागर राम बोले - हे तात, प्रेमवश अधीर मत हो; हृदय में यह समझ लो कि इसका परिणाम कल्याणकारी ही होगा।

दोहा

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ७०

जो लोग माता-पिता, गुरु और स्वामी की सीख को स्वाभाविक रूप से शिरोधार्य कर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का सच्चा लाभ पाया है - नहीं तो संसार में जन्म लेना व्यर्थ ही है।

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥

हे भाई, हृदय में यह बात समझकर मेरी सीख सुनो - माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, पिताजी वृद्ध हैं, और उनके मन में मेरे वियोग का दुख है।

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥

यदि मैं तुम्हें भी साथ लेकर वन चला जाऊँ, तो अयोध्या हर तरह से अनाथ हो जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार - सभी पर असहनीय दुख का भार पड़ेगा।

रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥

इसलिए तुम यहीं रहो और सबको संतोष दो, नहीं तो हे तात, बड़ा दोष लगेगा - जिस राजा के राज्य में प्रिय प्रजा दुखी रहती है, वह अवश्य ही नरक का भागी होता है।

रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥

हे तात, ऐसी नीति सोचकर तुम घर ही रह जाओ - यह सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह व्याकुल हो उठे, मानो पाले के स्पर्श से कमल मुरझा जाए, वैसे ही ये शीतल वचन सुनकर वे सूख से गए।

दोहा

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।७१

प्रेमवश लक्ष्मण से कोई उत्तर देते नहीं बना - उन्होंने व्याकुल होकर राम के चरण पकड़ लिए और कहा - हे नाथ, मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अब आप मुझे त्याग ही दें तो मेरा क्या वश चलेगा?

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥

हे स्वामी, आपने मुझे सीख तो बहुत अच्छी दी, पर मेरी कायरता के कारण वह मेरी पहुँच से बाहर लगती है। शास्त्र और नीति के वे ही अधिकारी हैं जो धीर हों और धर्म की धुरी थामे रहें।

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥

मैं तो प्रभु के स्नेह में पला हुआ बालक हूँ - क्या कहीं हंस मंदराचल या सुमेरु पर्वत उठा सकते हैं? हे नाथ, सच कहता हूँ, विश्वास कीजिए - आपके सिवा मैं गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानता।

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥

संसार में जहाँ तक स्नेह का नाता, प्रेम और विश्वास है, जिसे वेदों ने स्वयं गाया है - हे स्वामी, हे दीनबंधु, हे अंतर्यामी, मेरे लिए तो बस आप ही सब कुछ हैं।

धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥

धर्म और नीति का उपदेश तो उसे देना चाहिए जिसे कीर्ति, वैभव या सद्गति प्रिय हो। पर जो मन-वचन-कर्म से केवल चरणों में अनुरक्त हो, हे कृपासिंधु, क्या उसे भी त्यागा जा सकता है?

दोहा

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत७२

करुणासिंधु राम ने भले भाई के ये कोमल, विनम्र वचन सुने, और उन्हें स्नेह के कारण भयभीत जानकर हृदय से लगाकर समझाया।

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥

जाकर माता से विदा माँग आओ और जल्दी वन को चलो! रघुकुल-श्रेष्ठ राम की यह वाणी सुनकर लक्ष्मण आनंदित हो उठे - बड़ी हानि टल गई और बड़ा लाभ हो गया।

हरषित हृदय मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥

वे हर्षित हृदय से माता सुमित्रा के पास आए, मानो किसी अंधे को फिर से नेत्र मिल गए हों। जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया, पर मन तो राम और जानकी के साथ ही लगा था।

पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी॥गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा॥

माता ने उनका उदास मन देखकर कारण पूछा, तो लक्ष्मण ने सारी बात विस्तार से कह सुनाई। कठोर वचन सुनते ही सुमित्रा ऐसे सहम गईं जैसे चारों ओर दावानल देखकर हिरनी सहम जाती है।

लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥

लक्ष्मण को लगा कि अब बड़ा अनर्थ हो गया - माता स्नेहवश कहीं काम ही न बिगाड़ दें! इसलिए विदा माँगते हुए वे डर और संकोच से सिकुड़ रहे थे, मन में सोच रहे थे - माता साथ चलने को कहेंगी या नहीं।

दोहा

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ७३

सुमित्रा ने राम-सीता के रूप, सुंदर शील और स्वभाव को समझकर, और राजा के उनके प्रति स्नेह को देखकर सिर पीट लिया - पापिन कैकेयी ने कैसा घात लगाया है।

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी॥तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥

पर असमय जानकर उन्होंने धैर्य धारण किया, और स्वभाव से ही हितैषी सुमित्रा कोमल वाणी में बोलीं - हे तात, जानकी तुम्हारी माता हैं और सब भाँति स्नेह करने वाले राम तुम्हारे पिता हैं।

अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥

जहाँ राम का निवास हो, वहीं अयोध्या है; जहाँ सूर्य का प्रकाश हो, वहीं दिन है। यदि सच में सीता-राम वन जा रहे हैं, तो अयोध्या में तुम्हारा अब कोई काम नहीं रह गया।

गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी - इन सबकी सेवा प्राणों के समान करनी चाहिए। और राम तो प्राणों से भी प्रिय हैं, हृदय के जीवन हैं, सबके निःस्वार्थ सखा हैं।

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें॥अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू॥

संसार में जो भी पूजनीय और परम प्रिय हैं, वे सब राम के नाते ही ऐसे माने जाते हैं। हृदय में यह जानकर, हे तात, उनके साथ वन जाओ और जीवन का सच्चा लाभ उठाओ।

दोहा

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ७४

मैं तुम पर बलिहारी जाती हूँ - मेरे साथ तुम भी बड़े भाग्यशाली हुए, कि तुम्हारे मन ने छल त्यागकर राम के चरणों में स्थान पा लिया है।

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥

संसार में वही स्त्री सच्ची माता है जिसका पुत्र राम का भक्त हो। नहीं तो जो पुत्र राम से विमुख हो, उसमें अपना हित माननेवाली स्त्री तो बाँझ रहना ही बेहतर - उसका जन्म देना पशु के प्रसव जैसा ही व्यर्थ है।

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥

तुम्हारे ही भाग्य से राम वन जा रहे हैं, हे तात, दूसरा कोई कारण नहीं। सारे पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि सीता-राम के चरणों में स्वाभाविक प्रेम बना रहे।

राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥

राग, द्वेष, ईर्ष्या, मद और मोह - इनके वश स्वप्न में भी मत होना। इन सब विकारों को त्यागकर मन, वचन और कर्म से सीता-राम की सेवा करना।

तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥

वन में तुम्हें हर तरह से सुख ही मिलेगा, क्योंकि साथ में राम और सीता रूपी माता-पिता हैं। पुत्र, बस यही करना जिससे राम को वन में कोई कष्ट न हो - यही मेरा उपदेश है।

छंद

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥

हे तात, मेरा यही उपदेश है कि तुम्हारे कारण राम और सीता को वन में सुख मिले, और वे पिता-माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जाएँ। तुलसीदास कहते हैं कि सुमित्रा ने अपने प्रभु लक्ष्मण को यों सीख देकर वन जाने की आज्ञा दी, फिर आशीर्वाद दिया कि सीता-राम के चरणों में तुम्हारा निर्मल प्रेम नित नया बना रहे।

सोरठा

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।७५

माता के चरणों में सिर नवाकर, हृदय में सशंकित हुए लक्ष्मण तुरंत ऐसे चल पड़े जैसे भाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदा तुड़ाकर भाग निकला हो।

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥

लक्ष्मण जहाँ जानकीनाथ थे वहाँ पहुँचे, प्रिय का साथ पाकर मन में बहुत प्रसन्न हुए। राम-सीता के सुंदर चरणों की वंदना करके वे उनके साथ राजभवन की ओर चल पड़े।

कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥

नगर के स्त्री-पुरुष आपस में कहने लगे - विधाता ने खूब बनाकर भी बात बिगाड़ दी! उनके शरीर दुबले, मन दुखी और मुख उदास हो रहे थे - मानो शहद छिन जाने पर मधुमक्खियाँ व्याकुल हों।

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥

सब हाथ मल रहे थे, सिर पीट-पीटकर पछता रहे थे, मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हों। राजद्वार पर भारी भीड़ जुट आई थी - वहाँ का अपार विषाद वर्णन से परे था।

सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥

मंत्री ने 'राम पधार रहे हैं' यह प्रिय समाचार सुनाकर राजा को उठाकर बैठाया। सीता सहित दोनों पुत्रों को वन-गमन के वेश में देखकर राजा बहुत व्याकुल हो उठे।

दोहा

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ७६

सीता सहित दोनों सुंदर पुत्रों को देख-देखकर राजा अकुला उठते, और स्नेहवश बार-बार उन्हें हृदय से लगा लेते।

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥

राजा व्याकुल थे, बोल नहीं पा रहे थे - हृदय में शोक से उपजी भयंकर जलन थी। तब रघुवीर राम अत्यंत प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठे और विदा माँगी -

पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥तात किए प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥

पिताजी, मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिए - हर्ष के इस समय आप विषाद क्यों कर रहे हैं? हे तात, प्रिय के प्रेमवश यदि कर्तव्य में चूक हो जाए, तो जगत में यश जाता रहेगा और निंदा होगी।

सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥

यह सुनकर राजा स्नेहवश उठे और राम की बाँह पकड़कर उन्हें बिठा लिया - बोले, सुनो तात, तुम्हारे विषय में मुनिजन कहते हैं कि तुम ही चराचर के स्वामी हो।

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु हृदय बिचारी॥करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥

शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ही ईश्वर हृदय में विचारकर फल देता है - जो जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है, वेद की यही नीति सब कहते हैं।

दोहा

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।अति बिचित्र भगवंत गति को जग जाने जोगु७७

पर अपराध कोई और करे और उसका फल कोई और भोगे - भगवान की लीला बड़ी विचित्र है, इसे जानने योग्य इस जगत में कौन है?

राय राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥

राजा ने राम को रोकने के लिए छल त्यागकर बहुत उपाय किए। पर जब उन्होंने धर्मधुरंधर, धीर और सयाने राम का दृढ़ रुख देख लिया और समझ गए कि वे रुकनेवाले नहीं,

तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही॥कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए॥

तब राजा ने सीता को हृदय से लगा लिया और बड़े प्रेम से बहुत तरह की सीख दी। वन के असहनीय दुखों का वर्णन किया, फिर सास-ससुर और पिता के यहाँ रहने के सुख समझाए।

सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥

पर सीता का मन तो राम के चरणों में ही रमा था, इसलिए न उन्हें घर सुगम लगा न वन कठिन। फिर सबने मिलकर वन की विपत्तियाँ बढ़ा-चढ़ाकर बताईं और सीता को समझाने का प्रयत्न किया।

सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥

मंत्री सुमंत्र की पत्नी, गुरु वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती और अन्य सुजान स्त्रियाँ स्नेहपूर्वक कोमल वाणी में कहती हैं - तुम्हें तो वनवास मिला नहीं है, इसलिए ससुर, गुरु और सास जो कहें वही करो।

दोहा

सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि७८

यह शीतल, हितकर, मधुर और कोमल सीख सुनकर भी सीता को अच्छी नहीं लगी - मानो शरद की चाँदनी पाकर चकवी व्याकुल हो उठे, वैसे ही वे व्याकुल हो उठीं।

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥

सीता संकोचवश कोई उत्तर नहीं दे पातीं। यह देखकर कैकेयी तमककर उठ खड़ी हुई - मुनियों के वस्त्र, आभूषण और पात्र लाकर राम के आगे रख दिए और कोमल वाणी में बोली -

नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥

हे रघुवीर, राजा को तुम प्राणों के समान प्रिय हो - प्रेमवश दुर्बल हृदय के राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे, चाहे पुण्य, यश और परलोक नष्ट हो जाए, पर वे तुम्हें वन जाने को कभी नहीं कहेंगे।

अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥

ऐसा सोचकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। यह सीख सुनकर राम को सुख हुआ, पर राजा को ये वचन बाण जैसे लगे - वे मन में सोचने लगे, अभागे प्राण अब भी क्यों नहीं निकल जाते!

लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥

लोग व्याकुल और मूर्छित हो उठे, राजा को क्या करें कुछ सूझ ही नहीं रहा था। राम तुरंत मुनि का वेश धारण कर, माता-पिता को सिर नवाकर चल पड़े।

दोहा

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत७९

वन की सारी सामग्री सजाकर, सीता और लक्ष्मण सहित राम ब्राह्मणों और गुरु के चरणों की वंदना करके, सबको अचेत छोड़कर चल दिए।

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥

राजमहल से निकलकर राम वसिष्ठ के द्वार पर आ खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरह की आग में जल रहे हैं। प्रिय वचन कहकर सबको समझाया, फिर ब्राह्मणों की मंडली बुलाई।

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥

गुरु से कहकर उन सबको वर्षभर का भोजन दिलवाया, और आदर, दान तथा विनय से उन्हें संतुष्ट किया। याचकों को दान-मान देकर तृप्त किया और मित्रों को पवित्र प्रेम से प्रसन्न किया।

दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥सब के सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई॥

फिर दास-दासियों को बुलाकर गुरु को सौंपते हुए हाथ जोड़कर बोले - हे गुरुदेव, इन सबकी देखभाल माता-पिता की तरह करते रहिएगा।

बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी॥सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहे भुआल सुखारी॥

बार-बार दोनों हाथ जोड़कर राम सबसे कोमल वाणी में कहते हैं कि मेरा सच्चा हितैषी वही होगा जिसके कारण महाराज सुखी रहें।

दोहा

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन८०

हे परम बुद्धिमान पुरवासियो, आप सब वही उपाय करना जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरह से दुखी न हों।

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥

इस तरह राम ने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरु के चरण-कमलों में सिर नवाया। फिर गणेश, पार्वती और शिव को मनाकर, आशीर्वाद पाकर आगे बढ़े।

राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥

राम के चलते ही बड़ा भारी विषाद छा गया - नगर का करुण क्रंदन सुना नहीं जाता। लंका में अपशकुन होने लगे, अयोध्या में गहरा शोक छाया, और देवलोक हर्ष और विषाद दोनों में डूब गया।

गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥

मूर्छा टूटी तो राजा जागे, और सुमंत्र को बुलाकर कहने लगे - राम वन चले गए, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे, न जाने किस सुख के लिए यह शरीर अब भी टिका है।

एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना॥पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू॥

इससे बड़ी और कौन-सी व्यथा होगी जिसे पाकर भी प्राण देह नहीं छोड़ते? फिर धैर्य धरकर राजा ने कहा - हे सखा, रथ लेकर तुम भी राम के साथ जाओ।

दोहा

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गए दिन चारि८१

अत्यंत सुकुमार दोनों राजकुमारों और सुकुमारी जानकी को रथ पर चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिन में लौट आना।

जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥

यदि धैर्यवान दोनों भाई न लौटें - क्योंकि राम प्रण के सच्चे और दृढ़व्रती हैं - तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभु, मिथिलेश-कुमारी सीता को ही लौटा दीजिए।

जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई॥सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥

जब सीता वन देखकर डर जाएँ, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उन्हें सुनाना कि सास-ससुर का संदेश है - बेटी, लौट चलो, वन में बहुत कष्ट है।

पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥

कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहीं रहना। इस तरह जो भी उपाय हो सके करना - सीता लौट आईं तो मेरे प्राणों को सहारा मिल जाएगा।

नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भए बिधि बामा॥अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ॥

नहीं तो अंत में मेरी मृत्यु ही निश्चित है, विधाता के विपरीत होने पर किसी का कुछ वश नहीं चलता। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े - राम, लक्ष्मण, सीता को लाकर दिखाओ।

दोहा

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ८२

सुमंत्र राजा की आज्ञा पाकर, सिर नवाकर, बड़ी फुर्ती से रथ जुड़वाकर वहाँ पहुँचे जहाँ नगर के बाहर सीता सहित दोनों भाई खड़े थे।

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥

सुमंत्र ने राजा के वचन राम को सुनाए और विनती करके उन्हें रथ पर चढ़ाया। सीता सहित दोनों भाई रथ पर सवार होकर, हृदय से अयोध्या को सिर नवाकर चल पड़े।

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥

राम को जाते और अयोध्या को अनाथ होते देख सब लोग व्याकुल होकर साथ चल पड़े। करुणासिंधु राम उन्हें बहुत तरह समझाते हैं, तो वे लौट जाते हैं, पर प्रेमवश फिर पीछे आ जाते हैं।

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी॥घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी॥

अयोध्या बहुत भयावनी लगने लगी, मानो अंधकारमयी कालरात्रि हो। नगर के स्त्री-पुरुष भयानक जंतुओं की तरह एक-दूसरे को देखकर डर रहे थे।

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं॥

घर श्मशान जैसे लगते, परिजन भूत जैसे, पुत्र-हितैषी-मित्र मानो यमदूत। बगीचों में पेड़-बेलें मुरझा रही थीं, नदी-तालाब देखे नहीं जाते थे।

दोहा

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर८३

करोड़ों घोड़े, हाथी, पाले हुए हिरन, नगर के पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर -

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥

राम के वियोग में सब जहाँ-तहाँ चुपचाप खड़े रह गए, मानो चित्रों में खींचे गए हों। नगर मानो फलों से भरा घना वन था, और नगरवासी स्त्री-पुरुष उसमें बसे पशु-पक्षी।

बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही॥सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी॥

विधाता ने कैकेयी को मानो भीलनी बना दिया, जिसने दसों दिशाओं में असह्य दावाग्नि लगा दी। राम के वियोग की इस आग को सहन न कर सब लोग व्याकुल होकर भाग चले।

सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥जहाँ रामु तहँ सबु समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥

सबने मन में यही तय कर लिया - राम, लक्ष्मण, सीता के बिना कोई सुख नहीं। जहाँ राम वहीं सब कुछ, राम के बिना अयोध्या में हमारा कोई काम नहीं।

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥

यह विचार दृढ़ करके, देवताओं को भी दुर्लभ ऐसे सुखी घरों को छोड़कर सब राम के साथ चल पड़े। जिन्हें राम के चरण-कमल प्रिय हों, उन्हें भला विषय-भोग कभी बाँध सकते हैं?

दोहा

बालक बृद्ध बिहाइ गृह लगे लोग सब साथ।तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ८४

बच्चों और बूढ़ों को घर पर छोड़कर बाकी सब साथ हो लिए। पहले दिन राम ने तमसा नदी के तट पर विश्राम किया।

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥

प्रजा को प्रेमवश साथ आते देख राम के दयालु हृदय को गहरा दुख हुआ। करुणामय राम पराई पीड़ा को तुरंत अपना लेते हैं।

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥

प्रेमभरे कोमल और मधुर वचन कहकर राम ने लोगों को कई तरह समझाया, बहुत धर्मोपदेश दिए - पर प्रेमवश लोग लौटाए नहीं लौटते।

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥

शील और स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता - राम असमंजस में पड़ गए। शोक और थकान से लोग वहीं सो गए, और कुछ के मन देवमाया से भी मोहित हो गए।

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपाय बनिहि नहिं बाता॥

जब दो पहर रात बीत गई, तो राम ने प्रेमपूर्वक मंत्री सुमंत्र से कहा - हे तात, रथ के पहियों के निशान छिपाकर हाँको, अब कोई और उपाय काम नहीं आएगा।

दोहा

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।सचिव चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ८५

शिव के चरणों में सिर नवाकर राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर सवार हुए। मंत्री ने तुरंत रथ को इधर-उधर पहिये के निशान छिपाते हुए हाँक दिया।

जागे सकल लोग भए भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं॥

सवेरा होते ही सब जाग उठे और बड़ा शोर मच गया कि राम चले गए। रथ का कहीं पता नहीं चलता, सब "राम राम" पुकारते हुए चारों दिशाओं में दौड़ते फिरते हैं।

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥एकहि एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥

मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो और व्यापारियों का समूह व्याकुल हो उठा हो - वैसे ही सब एक-दूसरे को समझाते हैं कि राम ने हमें क्लेश होगा यह जानकर ही छोड़ दिया।

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥

वे अपनी निंदा करते और मछलियों की सराहना करते हैं - राम के बिना जीने को धिक्कार है! विधाता ने प्रिय का वियोग रचा तो माँगने पर मृत्यु क्यों न दी!

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा॥बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना॥

इस तरह विलाप करते हुए वे संताप से भरकर अयोध्या पहुँचे। उनके इस असह्य वियोग का वर्णन नहीं हो सकता - बस चौदह वर्ष की अवधि की आशा से ही प्राण थामे हुए हैं।

दोहा

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि८६

स्त्री-पुरुष राम के दर्शन के लिए नियम-व्रत करने लगे, और ऐसे व्याकुल हुए जैसे सूर्य के बिना चकवा-चकवी और कमल दुखी हो जाते हैं।

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥

सीता, सुमंत्र और दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गंगा को देखकर राम रथ से उतरे और बड़े हर्ष से दंडवत प्रणाम किया।

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥

लक्ष्मण, सुमंत्र और सीता ने भी प्रणाम किया, सबके साथ राम को सुख मिला। गंगा समस्त आनंद-मंगल की जड़ हैं, सब सुख देनेवाली और सारी पीड़ा हरनेवाली हैं।

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥

कई कथा-प्रसंग सुनाते हुए राम गंगा की लहरों को निहारते रहे, और सुमंत्र, लक्ष्मण तथा सीता को देवनदी गंगा की महिमा सुनाई।

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥

सबने स्नान किया, जिससे रास्ते की थकान मिट गई और शुद्ध जल पीते ही मन प्रसन्न हो उठा। जिनके स्मरण मात्र से बड़े-बड़े श्रम मिट जाते हैं, उन्हें स्वयं थकान लगना केवल लोक-व्यवहार है।

दोहा

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु८७

शुद्ध, सच्चिदानंदमय और सूर्यकुल के ध्वज राम मनुष्यों जैसे ही चरित्र करते हैं, जो संसार-सागर से पार उतरने के लिए पुल के समान हैं।

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥

यह खबर पाकर निषादराज गुह ने आनंदित होकर अपने भाई-बंधुओं को बुलाया, फल-मूल की भेंट भरकर मिलने चल पड़ा - हृदय में हर्ष का कोई पार नहीं था।

करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥

दंडवत करके भेंट सामने रखकर वह अत्यंत प्रेम से प्रभु को निहारने लगा। स्वाभाविक स्नेह से भरे राम ने उसे पास बिठाकर कुशल पूछी।

नाथ कुसल पद पंकज देखें। भय भागभाजन जन लेखें॥देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥

निषादराज ने कहा - हे नाथ, आपके चरण-कमलों के दर्शन से ही कुशल है, आज मैं भाग्यवानों की गिनती में आ गया। हे देव, यह धरती, धन और घर सब आपका है, मैं तो परिवार सहित आपका ही सेवक हूँ।

कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ॥कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना॥

अब कृपा करके नगर में पधारिए और इस दास की प्रतिष्ठा बढ़ाइए, जिससे सब लोग मेरे भाग्य की सराहना करें। राम ने कहा - हे सुजान सखा, तुमने जो कहा सब सत्य है, पर पिता ने मुझे और ही आज्ञा दी है।

दोहा

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु८८

चौदह वर्ष वन में मुनियों का व्रत, वेश और आहार धारण करते हुए बिताने हैं - गाँव में रहना उचित नहीं है। यह सुनकर गुह को बड़ा दुख हुआ।

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥

राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर गाँव के स्त्री-पुरुष प्रेम से आपस में कहते हैं - सखी, बताओ तो, कैसे होंगे वे माता-पिता जिन्होंने ऐसे सुंदर बालकों को वन भेज दिया!

एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना॥

कोई कहती है - राजा ने अच्छा ही किया, इसी बहाने विधाता ने हमें भी आँखों का लाभ दे दिया। तब निषादराज ने मन में सोचकर अशोक के मनोहर वृक्ष को उनके ठहरने योग्य समझा।

लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए॥

उसने राम को ले जाकर वह स्थान दिखाया, राम ने कहा - यह हर तरह से सुंदर है। पुरवासी जोहार करके अपने घर लौटे, और राम संध्या-वंदन करने चले गए।

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥

गुह ने कुश और कोमल पत्तों की सुंदर सेज बिछा दी, और पवित्र, मीठे फल-मूल छाँटकर दोनों में भर-भरकर पानी भी रख दिया।

दोहा

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ८९

सीता, सुमंत्र और भाई लक्ष्मण सहित कंद-मूल-फल खाकर रघुकुलमणि राम लेट गए, और लक्ष्मण उनके पैर दबाने लगे।

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥

प्रभु को सोता जानकर लक्ष्मण उठे, मंत्री को कोमल वाणी में सोने को कहकर कुछ दूर धनुष-बाण सजाए वीरासन में बैठकर पहरा देने लगे।

गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती॥आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई॥

गुह ने विश्वासपात्र पहरेदारों को बुलाकर बड़े प्रेम से जगह-जगह नियुक्त किया, और स्वयं कमर में तरकस बाँधकर, धनुष पर बाण चढ़ाकर लक्ष्मण के पास जा बैठा।

सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदय बिषादू॥तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई॥

प्रभु को धरती पर सोता देखकर निषादराज के हृदय में प्रेमवश विषाद उमड़ आया - शरीर पुलकित हो उठा, आँखों से जल बहने लगा, और वह प्रेम से भरकर लक्ष्मण से कहने लगा -

भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥

दशरथ का महल स्वभाव से ही इतना सुंदर है कि इंद्रलोक भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। उसमें मणियों से जड़े सुंदर चौबारे हैं, मानो कामदेव ने स्वयं अपने हाथों सजाए हों।

दोहा

सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास९०

जो पवित्र, विलक्षण, सुख-सामग्री और फूलों की सुगंध से भरे हैं, जहाँ सुंदर पलंग और मणि-दीपक हैं और हर तरह का पूरा आराम है -

बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई॥तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥

जहाँ अनेक वस्त्र, तकिए और गद्दे दूध के फेन जैसे कोमल, उज्ज्वल और सुंदर हैं - वहीं सीता-राम रात को सोया करते थे और अपनी शोभा से रति-कामदेव का गर्व हरते थे।

ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥

वही सीता-राम आज घास-फूस की सेज पर थके हुए, बिना वस्त्रों के सो रहे हैं - यह दृश्य देखा नहीं जाता। माता-पिता, परिजन, नगरवासी, मित्र, सुशील दास-दासियाँ -

जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥

जिनकी सब प्राणों की तरह देखभाल करते थे, वही राम आज धरती पर सो रहे हैं - जिनके पिता जनक हैं, जिनका प्रभाव जगत में विख्यात है, जिनके ससुर इंद्र के मित्र दशरथ हैं,

रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥

और जिनके पति स्वयं राम हैं, वही सीता आज धरती पर सोई हैं - विधाता किसे प्रतिकूल नहीं होता! क्या सीता-राम सचमुच वन के योग्य थे? लोग ठीक ही कहते हैं कि कर्म ही प्रधान है।

दोहा

कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह९१

कैकेयी की बेटी नीच बुद्धि ने ऐसी कुटिलता की, जिसने राम और जानकी को सुख के समय ही दुख दे दिया।

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥

वह सूर्यवंश रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी बन गई, उस कुबुद्धि ने सारे संसार को दुखी कर दिया। राम-सीता को धरती पर सोते देखकर निषाद को गहरा दुख हुआ।

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥

तब लक्ष्मण ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस में सने मीठे, कोमल वचन बोले - हे भाई, कोई किसी को सुख-दुख देने वाला नहीं है, सब अपने ही किए कर्मों का फल भोगते हैं।

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥

संयोग-वियोग, अच्छे-बुरे भोग, मित्र-शत्रु-उदासीन - ये सब भ्रम के जाल हैं। जन्म-मृत्यु, संपत्ति-विपत्ति, कर्म और काल - जहाँ तक संसार का यह जंजाल फैला है,

धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥

धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग-नरक - जो कुछ भी देखने-सुनने और मन में विचारने में आता है, इन सबकी जड़ में मोह ही है, परमार्थ से इनका कोई अस्तित्व नहीं।

दोहा

सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ९२

जैसे स्वप्न में भिखारी राजा बन जाए या कंगाल इंद्र बन जाए, तो जागने पर न कोई लाभ न हानि - वैसे ही इस संसार के दृश्य को समझना चाहिए।

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥

ऐसा समझकर क्रोध नहीं करना चाहिए, न किसी को व्यर्थ दोष देना चाहिए। सब मोह की रात में सोए हुए हैं, और सोते हुए उन्हें तरह-तरह के स्वप्न दिखते हैं।

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

इस संसार रूपी रात्रि में योगी ही जागते हैं, जो परमार्थी हैं और इस माया-जाल से मुक्त हैं। जीव तभी सच में जागा माना जाए जब उसे सारे भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥

विवेक जागते ही मोह का यह भ्रम मिट जाता है, और तब राम के चरणों में सच्चा प्रेम उपजता है। हे सखा, मन-वचन-कर्म से राम के चरणों में यही प्रेम सबसे बड़ा परमार्थ है।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥

राम स्वयं परमार्थ-स्वरूप परब्रह्म हैं - अगोचर, अलक्ष्य, अनादि और अनुपम। वे सब विकारों से रहित और भेदरहित हैं, वेद जिन्हें सदा "नेति-नेति" कहकर ही निरूपित कर पाते हैं।

दोहा

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल९३

वही कृपालु राम भक्तों, भूमि, ब्राह्मणों, गौओं और देवताओं के हित के लिए मनुष्य-देह धारण कर लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनने मात्र से संसार के बंधन कट जाते हैं।

सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥

हे सखा, ऐसा समझकर मोह छोड़ो और सीता-राम के चरणों में अनुरक्त हो जाओ। इस तरह राम के गुण कहते-कहते सवेरा हो गया, और जगत का कल्याण करने वाले राम जाग उठे।

सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥

सारे नित्यकर्म पूरे करके राम ने स्नान किया, फिर बरगद का दूध मँगाकर लक्ष्मण सहित सिर पर जटाएँ बनाईं - यह देखकर सुमंत्र की आँखों में आँसू छलक आए।

हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना॥नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा॥

उनका हृदय जलने लगा, मुख उदास हो गया, और हाथ जोड़कर वे बड़े दीन स्वर में बोले - हे नाथ, कोसलनाथ ने मुझे यही आज्ञा दी थी कि रथ लेकर राम के साथ जाऊँ,

बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई॥लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी॥

वन दिखाकर, गंगा-स्नान कराकर दोनों भाइयों को जल्दी लौटा लाना, और लक्ष्मण, राम, सीता तीनों को सारी शंका-संकोच मिटाकर वापस ले आना।

दोहा

नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहहु करौं बलि सोइ।करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ९४

महाराज ने ऐसा ही कहा था, अब प्रभु जैसा कहें मैं वही करूँगा, मैं आपकी बलिहारी हूँ - ऐसा कहकर सुमंत्र विनती करते हुए राम के चरणों में गिर पड़े और बालक की तरह रो पड़े।

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥

हे तात, कृपा करके वही कीजिए जिससे अयोध्या अनाथ न हो जाए। राम ने मंत्री को उठाकर धैर्य बँधाते हुए कहा - हे तात, आपने तो धर्म के सारे सिद्धांत छान डाले हैं।

सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा॥रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना॥

शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चंद्र ने धर्म के लिए करोड़ों कष्ट सहे। बुद्धिमान रंतिदेव और बलि राजा ने भी अनेक संकट सहकर धर्म को कभी नहीं छोड़ा।

धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥

वेद-शास्त्र-पुराण कहते हैं कि सत्य के समान कोई दूसरा धर्म नहीं। मैंने वह धर्म सहज ही पा लिया है - इसे त्यागने से तीनों लोकों में मेरा अपयश छा जाएगा।

संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥

प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश करोड़ों मृत्यु के समान भीषण संताप देने वाला है। हे तात, आपसे अधिक क्या कहूँ - लौटकर उत्तर देने में भी मैं पाप का भागी बनूँगा।

दोहा

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।चिंता कवनिहु बात के तात करिअ जनि मोरि९५

आप जाकर पिताजी के चरण पकड़कर करोड़ों बार नमन करते हुए, हाथ जोड़कर विनती करना कि हे तात, आप मेरी किसी बात की चिंता न करें।

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥

आप भी पिता के समान ही मेरे परम हितैषी हैं। हे तात, मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि आपका भी यही कर्तव्य है कि पिताजी हमारे लिए सोच में दुखी न हों।

सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू॥पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी॥

राम और सुमंत्र का यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुंब सहित व्याकुल हो उठा। फिर लक्ष्मण ने कुछ कड़वी बात कही, पर प्रभु राम ने उसे अनुचित जानकर तुरंत रोक दिया।

सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई॥कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥

राम ने संकोच से अपनी सौगंध दिलाकर सुमंत्र से कहा कि लक्ष्मण का यह संदेश आगे न कहना। सुमंत्र ने फिर राजा का संदेश सुनाया कि सीता वन का कष्ट सह नहीं सकेंगी।

जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥

इसलिए जिस तरह सीता अयोध्या लौट आएँ, तुम और राम वही उपाय करना। नहीं तो मैं बिल्कुल निराधार होकर वैसे ही मर जाऊँगा जैसे जल बिना मछली नहीं जीती।

दोहा

मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान९६

सीता के मायके और ससुराल दोनों जगह सब सुख हैं - जब तक यह विपत्ति नहीं टलती, तब तक वे जहाँ मन चाहे, सुख से रह सकती हैं।

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥

राजा ने जितनी दीनता और प्रेम से विनती की थी, वह वर्णन से परे है। कृपानिधान राम ने पिता का संदेश सुनकर सीता को अनेक प्रकार से सीख दी।

सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू॥सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥

यदि तुम लौट जाओ तो सास-ससुर, गुरु और सब प्रियजनों की चिंता मिट जाए। पति के वचन सुनकर सीता कहती हैं - हे प्राणनाथ, हे परम स्नेही, सुनिए -

प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥

हे प्रभु, आप करुणामय और परम विवेकी हैं - शरीर को छोड़कर छाया कहीं अलग रह सकती है भला? सूर्य को छोड़कर उसकी प्रभा, या चंद्रमा को छोड़कर चाँदनी कहीं जा सकती है?

पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥

पति को यह प्रेमभरी विनती सुनाकर सीता मंत्री से सुंदर वाणी में कहने लगीं - आप मेरे पिता और ससुर के समान ही हितैषी हैं, फिर भी आपको उत्तर देना मुझे बहुत अनुचित लग रहा है।

दोहा

आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात९७

पर हे तात, मैं व्याकुलतावश ही आपके सामने बोल पड़ी हूँ, बुरा मत मानिएगा - आर्यपुत्र के चरण-कमलों के बिना संसार का कोई भी नाता मेरे लिए व्यर्थ है।

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥

मैंने पिता के ऐश्वर्य की शोभा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी पर बड़े-बड़े राजाओं के मुकुट झुकते हैं - ऐसा सुख-भंडार पिता का घर भी पति के बिना भूलकर भी मुझे नहीं भाता।

ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई॥

मेरे ससुर कोसल के चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है - इंद्र स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत करते हैं और अपने आधे सिंहासन पर बिठाते हैं।

ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥

ऐसे प्रतापी ससुर, अयोध्या का ऐसा वैभवशाली निवास, प्रिय परिजन और माता समान सासें - राम के चरण-कमलों की धूल के बिना इनमें से कुछ भी मुझे स्वप्न में भी सुखद नहीं लगता।

अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा॥कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥

दुर्गम रास्ते, वन-भूमि, पहाड़, हाथी-सिंह, अथाह तालाब-नदियाँ, कोल-भील, हिरन-पक्षी - प्राणनाथ के साथ रहते हुए ये सब भी मुझे सुख ही देंगे।

दोहा

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ९८

इसलिए सास-ससुर के चरणों में गिरकर मेरी ओर से विनती करना कि वे मेरी कोई चिंता न करें - मैं वन में स्वभाव से ही सुखी हूँ।

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥

प्राणनाथ और प्रिय देवर दोनों वीर धनुष-तरकस लिए साथ हैं, इसलिए मुझे न रास्ते की थकान है, न कोई भ्रम, न मन में कोई दुख - आप मेरे लिए भूलकर भी चिंता न करें।

सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥

सीता की यह शीतल वाणी सुनकर सुमंत्र ऐसे व्याकुल हो उठे जैसे साँप अपनी मणि खो बैठा हो - आँखों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनाई नहीं देता, अत्यंत व्याकुल होकर वे कुछ कह ही नहीं पाते।

राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे॥

राम ने उन्हें बहुत तरह समझाया, फिर भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलने के लिए मंत्री ने कई उपाय सुझाए, पर रघुनंदन राम हर बार उचित उत्तर देते रहे।

मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई॥राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥

राम की आज्ञा टाली नहीं जा सकती, कर्म की गति बड़ी कठिन है, उस पर किसी का वश नहीं चलता। राम, लक्ष्मण और सीता के चरणों में सिर नवाकर सुमंत्र ऐसे लौटे जैसे कोई व्यापारी अपनी पूँजी गँवाकर लौटता है।

दोहा

रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं९९

सुमंत्र ने रथ हाँका, घोड़े राम की ओर देख-देखकर हिनहिनाने लगे। यह देखकर निषाद लोग विषाद से भरकर सिर पीट-पीटकर पछताने लगे।

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥

जिनके वियोग में पशु तक इतने व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा और माता-पिता कैसे जी पाएँगे? राम ने बलपूर्वक सुमंत्र को लौटा दिया, फिर वे गंगा के तट पर आए।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह नाव नहीं लाया - बोला, मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है। तुम्हारे चरण-कमलों की धूल के बारे में सब कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥

जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई - काठ तो पत्थर से कठोर होता नहीं, मेरी नाव भी कहीं मुनि की पत्नी बन जाएगी और मेरी रोज़ी-रोटी की यही राह उजड़ जाएगी।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु आन कबारू॥जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

मैं तो इसी नाव से अपना पूरा परिवार पालता हूँ, दूसरा कोई काम नहीं जानता। हे प्रभु, यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हैं, तो पहले मुझे अपने चरण-कमल धोने दीजिए।

छंद

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

हे नाथ, मैं चरण धोकर ही आपको नाव पर चढ़ाऊँगा, आपसे कोई उतराई नहीं चाहता। हे राम, मुझे आपकी और दशरथ की सौगंध है, मैं सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले मुझे तीर मार दें, पर जब तक चरण धो न लूँ तब तक, हे तुलसीदास के स्वामी, हे कृपालु, आपको पार नहीं उतारूँगा।

सोरठा

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन१००

केवट के प्रेम में लिपटे इन भोले-भाले वचनों को सुनकर करुणाधाम राम, जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर मुस्कुरा उठे।

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

कृपासिंधु राम मुस्कुराते हुए बोले - भाई, तू वही कर जिससे तेरी नाव सुरक्षित रहे। जल्दी पानी ला और मेरे पैर धो दे, देर हो रही है, अब पार उतार दे।

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

जिनका नाम एक बार स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर से पार हो जाते हैं, और जिन्होंने अपने ही तीन पगों में सारे जगत को नाप लिया था, वही कृपालु राम आज केवट से विनती कर रहे हैं!

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥

प्रभु के इन वचनों से गंगा की बुद्धि मोहित हो गई, पर उनके चरणों के नखों को देखते ही वे पहचान गईं और हर्षित हो उठीं। केवट राम की आज्ञा पाकर कठौते में जल भरकर ले आया।

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥

अपार आनंद और प्रेम में उमँगकर वह भगवान के चरण-कमल धोने लगा। सारे देवता फूल बरसाते हुए ईर्ष्या करने लगे कि इसके समान भाग्यशाली कोई नहीं।

दोहा

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार१०१

चरण धोकर वह जल पीकर, अपने पूरे परिवार सहित पहले अपने पितरों को भवसागर से पार कर, फिर आनंदपूर्वक प्रभु को गंगा के पार ले गया।

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता॥केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥

गुह और लक्ष्मण सहित सीता और राम नाव से उतरकर गंगा की रेत पर खड़े हो गए। केवट भी उतरकर दंडवत करने लगा, पर उसे कुछ न दे पाने के संकोच से प्रभु को झिझक हुई।

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥

पति के हृदय की बात जाननेवाली सीता ने प्रसन्न मन से अपनी रत्नजड़ित अँगूठी उतार दी। कृपालु राम ने कहा - केवट, यह नाव की उतराई ले लो। केवट व्याकुल होकर उनके चरण पकड़ बैठा।

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥

बोला - हे नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई। बरसों मजदूरी करता रहा, पर आज विधाता ने भरपूर मजदूरी दे दी।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥

अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए, हे दीनदयाल, यह आपकी कृपा ही बहुत है। लौटते समय जो कुछ आप दें, वही प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा।

दोहा

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सिय नहिं कछु केवटु लेइ।बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ१०२

प्रभु, लक्ष्मण और सीता ने बहुत आग्रह किया, पर केवट ने कुछ नहीं लिया। अंत में करुणा के धाम राम ने उसे निर्मल भक्ति का वरदान देकर विदा किया।

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥सिय सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥

फिर रघुकुल के स्वामी राम ने स्नान करके पार्थिव-पूजा की और शिव को सिर नवाया। सीता ने हाथ जोड़कर गंगा से कहा - हे माता, मेरी यह मनोकामना पूरी कीजिए,

पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥

कि पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौटकर मैं तुम्हारी पूजा करूँ। सीता की प्रेमभरी विनती सुनकर तब गंगा के निर्मल जल से यह श्रेष्ठ वाणी गूँजी -

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥

हे रघुवीर की प्रिया जानकी, सुनो, तुम्हारा प्रभाव किसे नहीं मालूम? तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही लोग लोकपाल बन जाते हैं, सारी सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥

तुमने मुझसे इतनी विनम्रता से विनती करके मुझ पर कृपा ही की है, मुझे बड़ाई दी है। फिर भी, हे देवी, मैं अपनी वाणी सफल करने के लिए तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ -

दोहा

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ१०३

तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी, तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुयश जगत भर में फैलेगा।

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥

गंगा के इन मंगलमय वचनों को सुनकर और उन्हें अनुकूल पाकर सीता प्रसन्न हो उठीं। तब राम ने गुह से कहा - अब तुम घर लौट जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में जलन उठी।

दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥

गुह हाथ जोड़कर दीन स्वर में बोला - हे रघुकुलमणि, मेरी विनती सुनिए। मुझे आपके साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, कुछ दिन चरण-सेवा कर लेने दीजिए -

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥

जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुंदर पर्णकुटी बना दूँगा। फिर आप जैसी आज्ञा देंगे, आपकी दुहाई, मैं वही करूँगा।

सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥

उसका यह सहज प्रेम देखकर राम ने उसे साथ ले लिया, जिससे गुह का हृदय आनंद से भर गया। फिर गुह ने अपने कुटुंबियों को बुलाकर, उन्हें संतुष्ट करके विदा किया।

दोहा

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ१०४

तब गणेश और शिव का स्मरण करके, गंगा को मस्तक नवाकर, सखा गुह, छोटे भाई लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ वन की ओर चल पड़े।

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥

उस दिन एक पेड़ के नीचे विश्राम हुआ। लक्ष्मण और सखा गुह ने सारी व्यवस्था कर दी। सवेरे नित्यकर्म पूरे करके राम ने जाकर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन किए।

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी॥चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु॥

उस राजा (प्रयाग) का सत्य मंत्री है, श्रद्धा प्रिय पत्नी है, और वेणीमाधव जैसा हितैषी मित्र है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फलों से उसका भंडार भरा है, और वह पुण्यभूमि ही उसका सुंदर देश है।

छेत्र अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥

प्रयाग क्षेत्र ही एक दुर्गम, मज़बूत और सुंदर किला है, जिसे पापरूपी शत्रु स्वप्न में भी नहीं पा सके। सभी तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ रणधीर वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल देते हैं।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥

गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम ही उसका शोभायमान सिंहासन है, अक्षयवट उसका छत्र है जो मुनियों तक का मन मोह लेता है। यमुना और गंगा की लहरें उसके चँवर हैं, जिन्हें देखते ही दुख-दरिद्रता मिट जाती है।

दोहा

सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम१०५

पुण्यात्मा साधुजन उसकी सेवा करते हैं और सारी कामनाएँ पाते हैं। वेद और पुराण मानो भाट बनकर उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं।

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥

प्रयाग का प्रभाव भला कौन बखान कर सके - वह पापरूपी हाथियों का संहार करने वाला सिंह है। ऐसे सुंदर तीर्थराज का दर्शन कर सुख के सागर राम ने भी सुख पाया।

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥

उन्होंने अपने ही मुख से सीता, लक्ष्मण और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा सुनाई। फिर प्रणाम करके, वन-बगीचे निहारते हुए और बड़े प्रेम से माहात्म्य कहते हुए -

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा॥

इस तरह आकर उन्होंने त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण मात्र से ही सारे मंगल देती है। फिर आनंद से स्नान करके शिव की पूजा की और विधिपूर्वक तीर्थ-देवताओं का पूजन किया।

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥

फिर प्रभु भरद्वाज मुनि के पास पहुँचे। मुनि ने दंडवत करते-करते ही उन्हें हृदय से लगा लिया - मुनि के मन का आनंद वर्णन से परे था, मानो उन्हें ब्रह्मानंद की राशि मिल गई हो।

दोहा

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि१०६

मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज ने आशीर्वाद दिया, हृदय में यह जानकर अपार आनंद हुआ कि आज विधाता ने मानो उनके सारे पुण्यों का फल आँखों के सामने लाकर रख दिया हो।

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥

कुशल पूछकर मुनि ने उन्हें आसन दिए और प्रेमपूर्वक पूजा करके तृप्त किया। फिर मानो अमृत से बने हों, ऐसे सुंदर कंद-मूल-फल-अंकुर लाकर भेंट किए।

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥

सीता, लक्ष्मण और सेवक गुह सहित राम ने बड़े चाव से वे मूल-फल खाए। थकान मिटने से राम प्रसन्न हो उठे, तब भरद्वाज कोमल वाणी में बोले -

दोहा

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥

हे राम, आज आपका दर्शन पाकर मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया - आज मेरा जप, योग और वैराग्य सार्थक हुआ, और मेरे सारे शुभ साधनों का समूह भी आज सफल हो गया।

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी॥अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥

लाभ और सुख की सीमा आपके दर्शन के अलावा और कुछ नहीं - आपके दर्शन से मेरी सारी आशाएँ पूरी हो गईं। अब कृपा करके यह वरदान दे दीजिए कि आपके चरण-कमलों में मेरा सहज प्रेम बना रहे।

दोहा

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार१०७

जब तक मन-वचन-कर्म से छल छोड़कर कोई सच में आपका न हो जाए, तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी उसे स्वप्न में भी वह सुख नहीं मिलता।

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥

मुनि के ये वचन सुनकर, भाव-भक्ति के आनंद से तृप्त राम संकोच से भर उठे। फिर उन्होंने भरद्वाज मुनि का सुंदर यश अनेक प्रकार से कहकर सबको सुनाया।

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥

वही बड़ा है, वही सब गुणों का घर है जिसे आप जैसा मुनि आदर दे। इस तरह राम और भरद्वाज दोनों परस्पर विनम्रता दिखाते हुए अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करने लगे।

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए॥

यह खबर पाकर प्रयागवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब भरद्वाज के आश्रम में दशरथ के सुंदर पुत्रों को देखने आए।

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू॥देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई॥

राम ने सबको प्रणाम किया, सब नेत्रों का लाभ पाकर आनंदित हुए और आशीर्वाद देने लगे। राम के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौट गए।

दोहा

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ१०८

राम ने वहीं रात्रि विश्राम किया और सवेरे प्रयाग में स्नान करके, प्रसन्नतापूर्वक मुनि को सिर नवाकर सीता, लक्ष्मण और गुह सहित आगे बढ़ चले।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥

चलते हुए राम ने बड़े प्रेम से मुनि से पूछा - हे नाथ, बताइए हमें किस राह जाना है। मुनि मन में हँसकर बोले - आपके लिए तो सभी रास्ते सुगम हैं।

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥

फिर साथ भेजने के लिए मुनि ने अपने शिष्यों को बुलाया। यह सुनते ही मन में हर्षित होकर कोई पचास शिष्य आ गए - सबका राम पर अपार प्रेम था, सब कहने लगे कि रास्ता तो हमने देखा हुआ है।

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥

तब मुनि ने चार ब्रह्मचारी भी उनके साथ कर दिए, जिन्होंने कई जन्मों तक पुण्य कर्म किए थे। ऋषि की आज्ञा पाकर, प्रणाम करके राम हृदय में आनंदित होकर आगे चले।

ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई॥होहिं सनाथ जनम फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई॥

जब वे किसी गाँव के पास से निकलते हैं, स्त्री-पुरुष दौड़कर उनका दर्शन करने आते हैं। जन्म सफल हुआ मानकर वे मन को साथ भेजकर, पर शरीर से पीछे रह जाने के दुख के साथ लौटते हैं।

दोहा

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम१०९

फिर राम ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया, वे मनचाही वस्तु पाकर लौट गए। यमुना पार करके सबने उसके जल में स्नान किया, जो राम के शरीर जैसा ही श्याम था।

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥

यमुना-तट पर बसने वाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर अपना काम-काज भूलकर दौड़े, और राम, लक्ष्मण, सीता का सौंदर्य देखकर अपने भाग्य को सराहने लगे।

अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥

उनके मन में परिचय जानने की बड़ी उत्सुकता थी, पर नाम-गाँव पूछते हुए वे संकोच कर रहे थे। उनमें जो अनुभवी और चतुर बुज़ुर्ग थे, उन्होंने युक्ति से राम को पहचान लिया।

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय कीन्ह भल नाहीं॥

उन्होंने सबको पूरी कथा सुनाई कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन जा रहे हैं। यह सुनकर सब दुखी होकर पछताने लगे कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया।

तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥

उसी समय वहाँ एक तेजस्वी, कम उम्र का सुंदर तपस्वी आया। उसकी गति कोई नहीं जानता था, वैरागी वेश में था और मन-वचन-कर्म से राम का अनन्य भक्त था।

दोहा

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि११०

अपने इष्टदेव को पहचानते ही उसकी आँखें भर आईं और शरीर पुलकित हो उठा - वह दंड की तरह धरती पर गिर पड़ा, उसकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥

राम ने प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया, मानो किसी दरिद्र को पारस मिल गया हो। देखने वाले कहने लगे मानो प्रेम और परमार्थ दोनों देह धरकर आज मिल रहे हों।

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥

फिर वह लक्ष्मण के चरणों में गिरा, लक्ष्मण ने प्रेम से उमँगकर उसे उठा लिया। फिर उसने सीता के चरणों की धूल सिर पर धारण की, और सीता ने माता जैसा स्नेह देकर उसे आशीर्वाद दिया।

कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥

निषादराज ने भी उसे दंडवत की, और राम का प्रेमी जानकर वह उससे प्रसन्नता से मिला। वह तपस्वी नेत्रों से राम के रूप-सुधा का पान करता रहा, ठीक वैसे ही जैसे भूखा व्यक्ति भोजन पाकर तृप्त होता है।

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥

गाँव की स्त्रियाँ कहती हैं - सखी, बताओ तो, कैसे होंगे वे माता-पिता जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेजा! राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेह से व्याकुल हो उठते हैं।

दोहा

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेई कीन्ह१११

तब राम ने सखा गुह को कई तरह से समझाया, और गुह ने राम की आज्ञा शिरोधार्य कर अपने घर की राह ली।

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥

फिर सीता, राम और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर फिर से यमुना को प्रणाम किया। सूर्यकन्या यमुना की महिमा गाते हुए दोनों भाई सीता सहित प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े।

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥

रास्ते में कई यात्री मिलते हैं, दोनों भाइयों को देखकर प्रेम से कहते हैं - तुम्हारे हर अंग में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ी चिंता होती है।

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाए॥अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥

तुम पैदल ही रास्ता तय कर रहे हो, इससे लगता है ज्योतिष झूठा ही है। आगे दुर्गम जंगल और ऊँचे पहाड़ हैं, और साथ में यह सुकुमारी स्त्री भी है।

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥

हाथी-सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें, जहाँ तक आप जाएँगे वहाँ तक पहुँचाकर फिर प्रणाम करके लौट आएँगे।

दोहा

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन११२

इस तरह वे यात्री प्रेमवश पुलकित होकर, आँखों में आँसू भरकर पूछते हैं, पर कृपासिंधु राम विनम्र, कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥

रास्ते में बसे गाँव और पुरवासियों को देखकर नाग और देवता भी ईर्ष्या करते हैं - किस पुण्यात्मा ने किस शुभ घड़ी में इन्हें बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और सुंदर हो रहे हैं!

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥

जहाँ-जहाँ राम के चरण पड़ते हैं, वहाँ की तुलना इंद्रपुरी अमरावती से भी नहीं की जा सकती। रास्ते के पास बसने वाले भी बड़े भाग्यशाली हैं - स्वर्गवासी देवता तक उनकी सराहना करते हैं -

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥

जो आँखें भरकर घनश्याम राम को सीता-लक्ष्मण सहित निहारती हैं, और जिन तालाबों-नदियों में राम स्नान करते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी प्रशंसा करती हैं।

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥

जिस वृक्ष के नीचे प्रभु बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करता है। राम के चरण-कमलों की धूल छूकर धरती अपने को परम सौभाग्यशाली मानती है।

दोहा

छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं।देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं११३

रास्ते में बादल छाया करते हैं, देवता फूल बरसाकर ईर्ष्या करते हैं। पहाड़, वन और पशु-पक्षियों को निहारते हुए राम आगे बढ़ते जाते हैं।

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी॥

सीता-लक्ष्मण सहित राम जब किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तो यह सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब घर-काम भूलकर तुरंत उन्हें देखने दौड़ पड़ते हैं।

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी॥सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥

राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर नेत्रों का फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानंद में डूब जाते हैं, आँखें भर आतीं और शरीर पुलकित हो उठता।

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥

उनकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता, मानो किसी दरिद्र को रत्नों का ढेर मिल गया हो। वे एक-दूसरे को बुलाकर कहते हैं - इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लो।

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥

कोई राम को देखकर ऐसे अनुरक्त हो गए कि निहारते हुए उनके साथ चल पड़े। किसी की आँखों में उनकी छवि बस गई और वे शरीर, मन, वाणी सबसे शिथिल हो उठे।

दोहा

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात११४

कोई बरगद की सुंदर छाया देखकर वहाँ नरम घास-पत्ते बिछाकर कहते हैं - क्षणभर यहीं बैठकर थकान मिटा लीजिए, फिर चाहे अभी चलिए, चाहे सवेरे।

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥

कोई घड़ा भरकर पानी लाते हैं और कोमल स्वर में कहते हैं - नाथ, आचमन कर लीजिए। उनका यह प्रेमभरा वचन सुनकर, अत्यंत सुशील और दयालु राम ने -

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥

सीता को मन ही मन थकी हुई जानकर घड़ी भर बरगद की छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनंदित होकर उनकी शोभा निहारते हैं, अनुपम रूप ने सबके नेत्र और मन मोह लिए हैं।

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥

सब लोग चारों ओर टकटकी लगाए, चकोर की तरह राम के मुखचंद्र को निहारते हुए शोभित हो रहे हैं। उनका तमाल जैसा साँवला शरीर देखते ही करोड़ों कामदेवों का मन मोहित हो जाता है।

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा॥

बिजली जैसे रंग वाले लक्ष्मण भी बहुत ही सुंदर लगते हैं - नख से शिखा तक मनमोहक हैं। दोनों मुनियों जैसे वस्त्र पहने, कमर में तरकस बाँधे हैं, कमल-से हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

दोहा

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल११५

उनके सिरों पर सुंदर जटा-मुकुट हैं, वक्ष-भुजाएँ-नेत्र विशाल हैं, और शरद-पूर्णिमा के चाँद जैसे सुंदर मुखों पर पसीने की बूँदें झिलमिला रही हैं।

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥

उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, शोभा इतनी अधिक है और मेरी बुद्धि इतनी छोटी। राम, लक्ष्मण, सीता की सुंदरता को सब मन-चित्त-बुद्धि लगाकर निहारते रह जाते हैं।

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥

प्रेम के प्यासे वे स्त्री-पुरुष ऐसे ठिठक गए जैसे दीपक देखकर हिरन-हिरनी स्तब्ध रह जाते हैं। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं, पर अत्यंत स्नेह के कारण कुछ पूछते हुए भी सकुचाती हैं।

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥

बार-बार सब उनके पैरों पड़ती हैं और सहज, सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं - राजकुमारी, हम कुछ पूछना चाहती हैं, पर स्त्री-स्वभाव के कारण डर रही हैं।

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥

स्वामिनी, हमारी ढिठाई क्षमा कीजिए, हमें गँवार जानकर बुरा न मानिएगा - ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही ऐसे सुंदर हैं कि मरकतमणि और सोने ने भी अपनी चमक इन्हीं से पाई है।

दोहा

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन११६

एक साँवला, एक गौरवर्ण, दोनों किशोर अवस्था के परम सुंदर हैं - इनके मुख शरद-चंद्रमा जैसे और नेत्र शरद-कमल जैसे हैं।

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥

सुमुखि, बताओ तो, करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं? यह प्रेमभरी मधुर वाणी सुनकर सीता सकुचा गईं और मन ही मन मुस्कुरा उठीं।

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी॥सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥

उन्हें देखकर सीता संकोचवश धरती की ओर देखने लगीं - दोनों ओर के संकोच से वे सकुचा रही थीं। हिरनी जैसी आँखों और कोयल जैसी वाणी वाली सीता प्रेम से सकुचाकर मधुर वचन बोलीं -

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥

ये जो सहज स्वभाव के, सुंदर और गोरे शरीर वाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीता ने चंद्रमुख को आँचल से ढककर, प्रियतम की ओर तिरछी नज़र से देखा,

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सिय सयननि॥भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥

और खंजन पक्षी जैसी सुंदर तिरछी आँखों से इशारा करके बता दिया कि ये उनके पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवतियाँ ऐसी आनंदित हुईं मानो निर्धनों ने धन की राशि लूट ली हो।

दोहा

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस११७

वे अत्यंत प्रेम से सीता के पैरों पड़कर तरह-तरह से आशीर्वाद देती हैं - जब तक शेषनाग के सिर पर यह धरती टिकी है, तब तक तुम सदा सुहागिन बनी रहो,

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥

और पार्वती जैसी अपने पति की प्रिय बनो। हे देवी, हम पर अपनी कृपा बनाए रखना। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि तुम फिर इसी रास्ते लौटना,

दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीय सब प्रेम पिआसी॥मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥

और अपनी दासी जानकर हमें दर्शन देना। सीता ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखकर मीठे वचनों से ऐसे संतुष्ट किया मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिला दिया हो।

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥

तभी राम का इशारा समझकर लक्ष्मण ने कोमल वाणी में लोगों से आगे का रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुखी हो उठे, शरीर पुलकित हुए और आँखों में आँसू भर आए।

मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥

उनका आनंद मिट गया, मन उदास हो गए, मानो विधाता दी हुई संपत्ति वापस छीन रहा हो। पर कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धरा और अच्छी तरह सोचकर सुगम रास्ता बता दिया।

दोहा

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ११८

तब लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ आगे बढ़ चले, और सबको प्रिय वचन कहकर विदा किया, पर उनका मन तो अपने साथ ही बँधा रह गया।

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं॥सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥

लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत पछताते और मन ही मन विधाता को दोष देते हैं। विषाद के साथ आपस में कहते हैं कि विधाता के सारे काम उलटे ही हैं।

निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥

वह विधाता बिल्कुल निरंकुश, निर्दय और निडर है, जिसने चाँद को रोगी और कलंकित बनाया, कल्पवृक्ष को साधारण पेड़ और समुद्र को खारा बनाया - उसी ने इन राजकुमारों को वन भेज दिया है।

जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥

यदि विधाता ने इन्हें वनवास ही दिया है, तो भोग-विलास बनाना उसका व्यर्थ ही परिश्रम था। ये तो बिना जूतों के नंगे पैर चल रहे हैं, फिर विधाता ने इतने वाहन क्यों बनाए?

ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥

ये तो कुश-पत्ते बिछाकर धरती पर ही सो जाते हैं, तब विधाता ने सुंदर शय्याएँ किसलिए रचीं? इन्हें तो पेड़ों के नीचे ही ठिकाना मिला, फिर उसने उजले महल बना-बनाकर व्यर्थ ही श्रम किया।

दोहा

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार११९

जो ये इतने सुंदर और सुकुमार होकर भी मुनियों के वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो विधाता ने तरह-तरह के गहने और वस्त्र व्यर्थ ही बनाए।

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥

जो ये कंद-मूल-फल खाते हैं, तो संसार में अमृत जैसे भोजन भी व्यर्थ ही हैं। कोई कहते हैं - ये तो स्वभाव से ही ऐसे सुंदर हैं, ये स्वयं प्रकट हुए हैं, विधाता के बनाए हुए नहीं।

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥

वेदों ने जहाँ तक विधाता की रचना का वर्णन किया है, जितना हमारी आँख-कान-मन तक पहुँचता है, चौदहों लोकों में खोज लो - ऐसा पुरुष और ऐसी स्त्री कहीं और नहीं मिलेगी।

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥

इन्हें देखकर विधाता का मन भी मोहित हो गया, और वह भी इनके समान दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। बहुत परिश्रम किया, पर कोई इनकी बराबरी तक न पहुँचा - इसी ईर्ष्या में उसने इन्हें वन में लाकर छिपा दिया है।

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥

कोई कहते हैं - हम बहुत नहीं जानते, पर अपने को बड़ा भाग्यशाली मानते हैं। हमारी समझ से वे भी बड़े पुण्यवान हैं जिन्होंने इन्हें देखा, जो देख रहे हैं, और जो आगे देखेंगे।

दोहा

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर१२०

इस तरह प्रिय बातें करते-करते सब की आँखों में जल भर आता है, और वे सोचते हैं - इतने कोमल, सुकुमार शरीर वाले ये दुर्गम रास्ते कैसे तय करेंगे।

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं॥मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥

स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो उठती हैं, मानो संध्या के समय चकवी विरह से व्याकुल हो। इनके कोमल चरणों और कठोर रास्ते को देख वे व्यथित हृदय से मीठी बातें कहती हैं -

परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥

इनके कोमल, लाल-लाल चरण छूते ही धरती भी वैसे ही सिकुड़ जाती है जैसे हमारा हृदय सिकुड़ रहा है। यदि जगदीश्वर ने इन्हें वन ही भेजा है, तो पूरा रास्ता फूलों से क्यों न भर दिया?

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥

सखी, यदि विधाता से माँगकर कुछ मिल सके, तो हम इन्हें बस अपनी आँखों में ही बसा लें! जो लोग इस अवसर पर यहाँ नहीं आए, वे सीता-राम को नहीं देख पाए।

सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥

उनका सौंदर्य सुनकर लोग व्याकुल होकर पूछते हैं - भाई, वे अब तक कहाँ तक पहुँचे होंगे? जो समर्थ हैं वे दौड़कर दर्शन कर आते हैं, और जन्म का सच्चा फल पाकर आनंदित होकर लौटते हैं।

दोहा

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं१२१

स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े हाथ मल-मलकर पछताते हैं। इस तरह राम जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेम के वश में हो जाते हैं।

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥

सूर्यकुल की कुमुदिनी को खिलाने वाले चंद्रमा जैसे राम का दर्शन कर हर गाँव में ऐसा ही आनंद छा जाता है। जो लोग यह समाचार सुनते हैं, वे राजा-रानी को दोष देने लगते हैं।

कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाई॥

कोई कहते हैं - राजा बहुत भले हैं, उन्होंने हमें भी नेत्रों का लाभ दे दिया। स्त्री-पुरुष आपस में सीधी, स्नेहभरी सुंदर बातें करते हैं।

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥

वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया, वह नगर धन्य है जहाँ से ये आए, वह देश-पर्वत-वन-गाँव धन्य है, और जहाँ-जहाँ ये जाते हैं वही स्थान धन्य हो जाता है।

सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥

ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया जिसके ये इतने स्नेही हैं। पथिक बने राम-लक्ष्मण की सुंदर कथा पूरे रास्ते और जंगल में फैल गई है।

दोहा

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत१२२

इस तरह रघुकुल-कमल को खिलाने वाले सूर्य राम रास्ते के लोगों को सुख देते हुए, सीता-लक्ष्मण सहित वन को निहारते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।

आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे॥

आगे राम हैं, पीछे लक्ष्मण - दोनों तपस्वी वेश में शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच सीता ऐसी सुशोभित हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥

फिर जैसी छवि मेरे मन में बसी है, उसे कहता हूँ - मानो वसंत और कामदेव के बीच रति शोभित हो। हृदय में खोजकर एक और उपमा कहता हूँ - मानो बुध और चंद्रमा के बीच रोहिणी सोह रही हो।

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाए॥

प्रभु के चरण-चिह्नों के बीच-बीच पैर रखती हुई सीता डरते-डरते रास्ता चलती हैं, और लक्ष्मण दोनों के चरण-चिह्न बचाते हुए उन्हें दाहिनी ओर रखकर चलते हैं।

राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥

राम-लक्ष्मण-सीता की यह सुंदर प्रीति वाणी से परे है, भला कैसे कही जाए? पक्षी-पशु भी यह छवि देखकर मुग्ध हो जाते हैं - पथिक बने राम ने तो सबके ही मन चुरा लिए हैं।

दोहा

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ१२३

प्रिय पथिक सीता सहित दोनों भाइयों को जिन-जिन लोगों ने देखा, वे बिना किसी परिश्रम के ही आनंदपूर्वक संसार का यह दुर्गम मार्ग पार कर गए।

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम ये तीनों पथिक बसें, वह भी राम के परमधाम का वह मार्ग पा लेगा जिसे कभी कोई विरला मुनि ही पाता है।

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥

तब राम ने सीता को थका हुआ जानकर, पास ही एक बरगद और ठंडा जल देखकर वहीं विश्राम किया। कंद-मूल-फल खाकर, रातभर वहाँ रहकर, सवेरे स्नान करके राम आगे चले।

देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥

सुंदर वन, सरोवर और पर्वत निहारते हुए प्रभु वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। राम ने देखा कि मुनि का निवास अत्यंत सुंदर है, जहाँ सुंदर पर्वत, वन और पवित्र जल हैं।

सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥

सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष खिले हुए हैं, भौंरे मकरंद के नशे में मीठा गुंजन कर रहे हैं। ढेरों पक्षी-पशु कोलाहल करते हैं, वैररहित होकर प्रसन्न मन से विचरते हैं।

दोहा

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन१२४

पवित्र, सुंदर आश्रम देखकर कमलनयन राम प्रसन्न हो उठे। राम के आगमन की खबर सुनकर मुनि वाल्मीकि उन्हें लेने आगे आए।

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥

राम ने मुनि को दंडवत किया, विप्रश्रेष्ठ ने उन्हें आशीर्वाद दिया। राम की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए, और वे उन्हें सम्मानपूर्वक आश्रम में ले आए।

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए॥सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए॥

श्रेष्ठ मुनि ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर मीठे कंद-मूल-फल मँगवाए। सीता, लक्ष्मण और राम ने वे फल खाए, फिर मुनि ने उन्हें सुंदर विश्राम-स्थान दिखाया।

बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥

वाल्मीकि के मन में यह मंगलमय मूर्ति निहारकर बड़ा आनंद हुआ। तब राम ने हाथ जोड़कर कानों को सुख देने वाले मीठे वचन बोले -

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥

हे मुनिनाथ, आप त्रिकालदर्शी हैं, समूचा विश्व आपकी हथेली पर रखे बेर जैसा है। ऐसा कहकर प्रभु ने कैकेयी ने जिस-जिस तरह वनवास दिया, वह सारी कथा विस्तार से सुनाई।

दोहा

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ१२५

पिता की आज्ञा, माता का हित, भरत जैसे भाई का राजा बनना, और फिर मुझे आपके दर्शन होना - यह सब मेरे पुण्यों का ही प्रभाव है।

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥

हे मुनिराज, आपके चरणों के दर्शन से आज हमारे सारे पुण्य सफल हो गए। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो, जहाँ कोई मुनि भी उद्वेग न पाए -

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥

क्योंकि जिनसे मुनि-तपस्वी दुख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है, और ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥

ऐसा हृदय में समझकर वह स्थान बताइए जहाँ मैं सीता-लक्ष्मण सहित जा बसूँ, और वहाँ सुंदर पत्तों-घास की कुटी बनाकर, हे दयालु, कुछ समय निवास करूँ।

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥

राम की सहज सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले - धन्य, धन्य! हे रघुकुल-ध्वज, आप ऐसा क्यों न कहेंगे - आप तो सदा वेद की मर्यादा के रक्षक हैं।

छंद

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

हे राम, आप वेद-मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकी आपकी माया हैं, जो आपकी इच्छा पाकर जगत की रचना, पालन और संहार करती हैं। जो शेषनाग पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करते हैं, वही चराचर के स्वामी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिए आप राजकुमार का रूप धरकर दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने चले हैं।

सोरठा

राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह१२६

हे राम, आपका स्वरूप वाणी से परे, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है - वेद निरंतर उसे "नेति-नेति" कहकर ही वर्णित करते हैं।

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥

हे राम, संसार तो दृश्य है, आप उसके द्रष्टा हैं - आप ब्रह्मा-विष्णु-शिव तक को नचाने वाले हैं। जब वे भी आपका मर्म नहीं जानते, तो और कौन जान सकता है?

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई॥तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥

वही आपको जानता है जिसे आप स्वयं जना दें, और जानते ही वह आप-जैसा ही हो जाता है। हे रघुनंदन, हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन, आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥

आपकी देह चिदानंदमय और सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवताओं और संतों के कार्य के लिए मनुष्य-देह धारण की है, इसलिए साधारण राजा जैसे ही कहते-करते हैं।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥

हे राम, आपके चरित्र देख-सुनकर मूर्ख मोहित होते हैं और ज्ञानी सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते-करते हैं वह सब सत्य ही है - जैसा स्वांग धरा है, वैसा ही नाचना भी उचित है।

दोहा

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ१२७

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ, पर मैं यह पूछते हुए सकुचाता हूँ कि आप जहाँ न हों वह जगह बता दीजिए, तभी मैं आपके लिए ठिकाना दिखा सकूँगा।

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥

मुनि के प्रेमरस में डूबे वचन सुनकर राम सकुचाकर मन ही मन मुस्कुराए। वाल्मीकि हँसकर फिर अमृत जैसी मीठी वाणी में बोले -

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥

सुनिए राम, अब मैं वह स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीता-लक्ष्मण सहित निवास करें - जिनके कान समुद्र की तरह हैं और आपकी सुंदर कथा मानो अनेक नदियों की तरह उनमें बहती है,

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥

निरंतर भरती रहती हैं फिर भी वे कभी तृप्त नहीं होते - उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं। जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघ के लिए सदा तरसते रहते हैं,

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥

और जो बड़ी-बड़ी नदियों-समुद्रों-झीलों का तिरस्कार करके आपके सौंदर्य की एक बूँद से ही सुखी हो जाते हैं - हे रघुनाथ, उन्हीं के हृदयरूपी सुखद भवनों में आप भाई लक्ष्मण और सीता सहित निवास कीजिए।

दोहा

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु१२८

आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनकर आपके गुणसमूह रूपी मोती चुगती रहे, हे राम, आप उसी के हृदय में बस जाइए।

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

जिसकी नासिका प्रभु के पवित्र, सुगंधित प्रसाद को नित्य आदर से ग्रहण करती है, और जो आपको अर्पित करके ही भोजन करते हैं, आपके प्रसादरूप ही वस्त्र-आभूषण धारण करते हैं;

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा॥

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखते ही प्रेमपूर्वक विशेष नम्रता से झुक जाते हैं, जिनके हाथ नित्य आपके चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय में केवल आपका ही भरोसा है, दूसरा कोई नहीं;

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥

जिनके पैर आपके तीर्थों की ओर चलकर जाते हैं - हे राम, आप उनके मन में बस जाइए। जो नित्य आपके नाम-मंत्र का जप करते हैं और परिवार सहित आपकी पूजा करते हैं,

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥

जो अनेक विधियों से तर्पण-हवन करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराकर खूब दान देते हैं, और गुरु को आपसे भी बड़ा मानकर सब भाँति सम्मान के साथ उनकी सेवा करते हैं -

दोहा

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होइ।तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ१२९

ये सब कर्म करके भी वे केवल एक ही फल माँगते हैं - राम के चरणों में प्रेम हो। हे सीता-राम, उन्हीं के मनरूपी मंदिर में आप दोनों निवास कीजिए।

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥

जिनमें न काम है, न क्रोध, न मद, न अभिमान, न मोह; न लोभ, न क्षोभ, न राग, न द्वेष; और न कपट, न दंभ, न माया - हे रघुराज, आप उनके हृदय में निवास कीजिए।

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुख-सुख और निंदा-प्रशंसा समान लगते हैं, जो सोच-समझकर सच्चे, प्रिय वचन बोलते हैं और जागते-सोते सदा आपकी ही शरण में रहते हैं,

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥

और जिनके लिए आपके सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं - हे राम, आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को माता समान मानते हैं और पराया धन विष से भी भारी विष समझते हैं;

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

जो दूसरे का सुख देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे का दुख देखकर विशेष व्याकुल हो उठते हैं, हे राम, जिन्हें आप प्राणों से भी प्रिय हैं - उनका मन ही आपका सच्चा घर है।

दोहा

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात१३०

हे तात, जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता, गुरु - सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए।

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥नीति निपुन जिन्ह कह जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥

जो अवगुण छोड़कर सबके गुण ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिए संकट सहते हैं, नीति में जिनकी जगत भर में साख है, उनका सुंदर मन ही आपका घर है।

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥

जो अपने गुण आपके और दोष अपने समझता है, जिसे हर तरह से बस आपका ही भरोसा है, और जिसे राम-भक्त प्रिय लगते हैं - उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिए।

जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥

जाति, धन, धर्म, बड़ाई, प्रिय परिवार और सुखद घर - इन सबको छोड़कर जो केवल आपको हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथ, उसी के हृदय में आप निवास कीजिए।

सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥

स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसे समान लगते हैं, क्योंकि वह हर जगह बस धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है, और जो मन-वचन-कर्म से आपका दास है - हे राम, उसी के हृदय में डेरा डालिए।

दोहा

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु१३१

जिसे आपसे कभी कुछ नहीं चाहिए, और जिसका आपसे स्वाभाविक ही प्रेम है, आप निरंतर उसी के मन में बसिए - वही आपका अपना घर है।

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥

इस तरह मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि ने राम को कई घर दिखाए, उनके प्रेमभरे वचन राम के मन को भा गए। फिर मुनि ने कहा - हे सूर्यकुल-स्वामी, सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक निवास बताता हूँ -

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥

आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए हर तरह की सुविधा है। सुहावना पर्वत और सुंदर वन है, जहाँ हाथी, सिंह, हिरन और पक्षी विचरते हैं।

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी॥सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥

वहाँ एक पवित्र नदी है जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है, जिसे अत्रि-पत्नी अनसूया अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगा की ही धारा है, नाम है मंदाकिनी - जो सारे पापों को नष्ट करने वाली है।

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥

अत्रि जैसे कई श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग-जप-तप से अपनी देह साधते हैं। चलिए राम, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और इस पर्वतश्रेष्ठ को भी गौरव दीजिए।

दोहा

चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ१३२

महामुनि वाल्मीकि ने चित्रकूट की अपार महिमा सुनाई। तब सीता सहित दोनों भाइयों ने आकर उस श्रेष्ठ नदी में स्नान किया।

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥

राम ने कहा - लक्ष्मण, यह घाट बहुत अच्छा है, अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। लक्ष्मण ने पयस्विनी नदी का ऊँचा उत्तरी किनारा देखा, जिसके चारों ओर धनुष जैसा एक नाला घूमा हुआ था।

नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥

यह नदी मानो उस धनुष की डोरी है और शम-दम-दान उसके बाण हैं। कलियुग के सारे पाप इसके शिकार बने हिंसक पशु हैं। चित्रकूट मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी नहीं चूकता।

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥

यह कहकर लक्ष्मण ने जगह दिखाई, स्थान देखकर राम प्रसन्न हुए। देवताओं ने जान लिया कि राम का मन यहीं रम गया है, तो वे अपने प्रधान शिल्पी विश्वकर्मा को साथ लेकर चल पड़े।

कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥

सब देवता कोल-भील का वेश धरकर आए और पत्ते-घास के सुंदर घर बना दिए। दो ऐसी सुंदर कुटियाँ बनीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता - एक छोटी पर बेहद सुंदर, दूसरी बड़ी।

दोहा

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत१३३

लक्ष्मण और जानकी सहित प्रभु उस सुंदर कुटी में शोभायमान हैं, मानो कामदेव मुनि का वेश धरकर पत्नी रति और वसंत ऋतु के साथ सुशोभित हो रहे हों।

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥

उसी समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट आए, और राम ने सबको प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनंदित हुए।

बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥

फूल बरसाकर देवसमाज ने कहा - हे नाथ, आज हम सनाथ हो गए। फिर विनती करके उन्होंने अपने असह्य दुख सुनाए और आश्वासन पाकर प्रसन्न होकर अपने-अपने लोक लौट गए।

चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥

राम चित्रकूट में आ बसे हैं, यह खबर सुन-सुनकर कई मुनि वहाँ आए। मुनियों की मंडली को आते देख रघुकुल-चंद्र राम ने दंडवत प्रणाम किया।

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥

मुनिगण राम को हृदय से लगा लेते हैं और सफलता के लिए आशीर्वाद देते हैं। सीता-लक्ष्मण-राम की छवि देखकर वे अपनी सारी साधना सफल हुई मानते हैं।

दोहा

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद१३४

प्रभु ने यथोचित सम्मान करके मुनिमंडली को विदा किया। वे सब अपने-अपने आश्रमों में स्वच्छंद होकर योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे।

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥

यह खबर कोल-भीलों को मिली तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो घर बैठे नौ निधियाँ मिल गई हों। वे दोने भर-भरकर कंद-मूल-फल लेकर ऐसे चल पड़े मानो दरिद्र सोना लूटने जा रहे हों।

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता॥कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥

उनमें से जिन्होंने पहले ही दोनों भाइयों को देख लिया था, बाकी लोग रास्ते में उनसे पूछते जाते हैं। इस तरह राम की सुंदरता की चर्चा करते-सुनते सबने आकर राम के दर्शन किए।

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥

भेंट आगे रखकर वे जोहार करते हैं और गहरे अनुराग से प्रभु को निहारते हैं। वे मानो चित्र में खींचे हुए जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते हैं, शरीर पुलकित और आँखों में प्रेम के आँसू भर आते हैं।

राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी॥

राम ने सबको प्रेम में डूबा जानकर, प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनम्र वचन कहते हैं -

दोहा

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय१३५

हे नाथ, आपके चरणों का दर्शन पाकर आज हम सब सनाथ हो गए। हे कोसलराज, हमारे ही भाग्य से आपका यहाँ आगमन हुआ है।

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥

हे नाथ, जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे, वह भूमि, वन, रास्ता और पहाड़ धन्य हो गए। वहाँ विचरने वाले पक्षी-पशु भी धन्य हैं, जिन्होंने आपको देखकर अपना जन्म सफल कर लिया।

हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥

हम सब भी परिवार सहित धन्य हैं कि नेत्र भरकर आपका दर्शन कर पाए। आपने बड़ी सोच-समझकर अच्छी जगह निवास किया है - यहाँ हर ऋतु में आप सुखी रहेंगे।

हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥

हम हर तरह से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभु, यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ - सब हमने पग-पग देख रखे हैं।

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥

हम आपको जगह-जगह शिकार खिलाएँगे और तालाब-झरने दिखाएँगे। हम परिवार सहित आपके सेवक हैं, हे नाथ, इसलिए हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजिए।

दोहा

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन१३६

जो वेद-वचनों और मुनियों के मन तक को अगम हैं, वे करुणा के धाम राम भीलों के इन वचनों को ऐसे सुन रहे हैं जैसे पिता अपने बालक की बातें सुनता है।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेइ जो जाननिहारा॥राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥

राम को केवल प्रेम प्रिय है - जो जानना चाहे, जान ले। तब प्रेम से भरे राम ने कोमल वचन कहकर उन सब वनवासियों को संतुष्ट किया।

बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥

फिर उन्हें विदा किया। वे सिर नवाकर लौटे और राम के गुण कहते-सुनते घर पहुँचे। इस तरह देवता-मुनियों को सुख देने वाले दोनों भाई सीता सहित वन में रहने लगे।

जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥

जब से राम वहाँ आकर बसे, तभी से वह वन मंगलमय हो उठा। तरह-तरह के वृक्ष फूलने-फलने लगे, और उन पर लिपटी सुंदर लताओं के मंडप तन गए।

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥

वे कल्पवृक्ष जैसे स्वाभाविक रूप से ही सुंदर हो उठे, मानो देवताओं का नंदनवन छोड़कर यहीं आ बसे हों। भौंरों की पंक्तियाँ मीठा गुंजन करती हैं, और सुखद, शीतल, सुगंधित त्रिविध हवा बहती रहती है।

दोहा

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर१३७

नीलकंठ, कोयल, तोता, पपीहा, चकवा, चकोर - सब पक्षी तरह-तरह से ऐसी बोलियाँ बोलते हैं जो कानों को सुख देती हैं और मन को मोह लेती हैं।

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी॥

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर, हिरन - सब वैर भूलकर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार पर निकले राम की छवि देखकर पशुओं के झुंड विशेष आनंदित होते हैं।

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं॥सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥

संसार में जितने भी देवताओं के वन हैं, सब राम के इस वन को देखकर ईर्ष्या करते हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यपुत्री यमुना, नर्मदा, गोदावरी जैसी पुण्य नदियाँ,

सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥

सारे तालाब, समुद्र और नदियाँ मंदाकिनी की ही प्रशंसा करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मंदराचल, सुमेरु - देवताओं के ये सारे निवास-स्थान भी,

सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥

और हिमालय जैसे जितने भी पर्वत हैं, सब चित्रकूट का यश गाते हैं। विंध्याचल इतना आनंदित है कि उसके मन में सुख समाता नहीं - बिना किसी परिश्रम के उसने यह बड़ी प्रतिष्ठा पा ली है।

दोहा

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति१३८

चित्रकूट के पक्षी, पशु, लता, वृक्ष, तृण - इन सबकी हर जाति पुण्य की राशि और धन्य है - देवता दिन-रात यही कहते हैं।

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥

आँखों वाले जीव राम को निहारकर जन्म का फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और निर्जीव वस्तुएँ भी उनके चरणों की धूल छूकर सुखी हो उठती हैं - इस तरह सभी मानो परमपद के अधिकारी बन जाते हैं।

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥

वह वन और पर्वत स्वभाव से ही ऐसे सुंदर, मंगलमय और पवित्र हैं कि पवित्रों को भी पवित्र कर दें। उसकी महिमा भला कैसे कही जाए, जहाँ सुख के सागर राम ने निवास किया है।

पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥

क्षीरसागर और अयोध्या दोनों को छोड़कर सीता-लक्ष्मण-राम जहाँ आकर बसे, उस वन की शोभा का वर्णन तो लाख शेषनाग भी हजार-हजार मुखों से नहीं कर सकते।

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥

उसे मैं भला किस विधि से वर्णन करके कहूँ - क्या कहीं छोटे पोखर का कछुआ मंदराचल उठा सकता है? लक्ष्मण मन-वचन-कर्म से राम की सेवा करते हैं, उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु१३९

क्षण-क्षण सीता-राम के चरण निहारकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मण स्वप्न में भी भाई, माता-पिता और घर की याद नहीं करते।

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥

राम के साथ सीता अयोध्या, कुटुंब और घर की याद भूलकर सुखी रहती हैं। क्षण-क्षण पति के चंद्रमुख को निहारकर वे ऐसी प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरी चंद्रमा को देखकर।

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥

स्वामी का प्रेम नित्य बढ़ता देखकर सीता ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिन में चकवी। सीता का मन राम के चरणों में इतना रमा है कि उन्हें यह वन हजारों अयोध्या जैसा प्रिय लगता है।

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥

प्रियतम के साथ पर्णकुटी भी प्यारी लगती है, हिरन-पक्षी अपने परिवार जैसे लगते हैं। मुनि-पत्नियाँ सास जैसी, श्रेष्ठ मुनि ससुर जैसे, और कंद-मूल-फल अमृत जैसे मीठे लगते हैं।

नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥

स्वामी के साथ सोई हुई कुश-पत्तों की सेज भी सैकड़ों कामदेव-सेजों से बढ़कर सुखद है। जिनके दर्शन मात्र से जीव लोकपाल बन जाते हैं, भला उन्हें कोई भोग-विलास मोहित कर सकता है!

दोहा

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु१४०

जिन राम का स्मरण करते ही भक्त तमाम भोग-विलास तिनके जैसा त्याग देते हैं, उन्हीं की प्रिय पत्नी और जगत-जननी सीता के लिए यह त्याग कोई आश्चर्य की बात नहीं।

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥

सीता और लक्ष्मण को जिस तरह सुख मिले, राम वही करते और वही कहते हैं। वे पुरानी कथाएँ-कहानियाँ सुनाते हैं, और लक्ष्मण-सीता बड़े सुख से उन्हें सुनते हैं।

जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥

जब-जब राम को अयोध्या की याद आती है, उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता-पिता, परिजन, भाइयों और भरत के स्नेह-शील-सेवाभाव को याद करके -

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥

कृपासिंधु प्रभु दुखी हो उठते हैं, पर कुसमय जानकर धैर्य धर लेते हैं। राम को दुखी देखकर सीता-लक्ष्मण भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी की परछाईं उसी के भाव-भंगिमा दोहराती हो।

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥

प्रिया और भाई की यह दशा देखकर धीर, कृपालु, भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले राम कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मण और सीता सुख पाते हैं।

दोहा

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत१४१

लक्ष्मण और सीता सहित राम पर्णकुटी में ऐसे शोभित हैं जैसे अमरावती में इंद्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयंत के साथ बसते हों।

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥

प्रभु सीता-लक्ष्मण की ऐसी देखभाल करते हैं जैसे पलकें आँखों की करती हैं। इधर लक्ष्मण सीता-राम की ऐसी सेवा करते हैं जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने शरीर की करता है।

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥कहेउ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥

इस तरह पक्षी-पशु-देवता-तपस्वियों के हितकारी प्रभु वन में सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं। अब सुनिए, सुमंत्र जिस तरह अयोध्या लौटे, वह कथा।

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥

प्रभु को पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तो आकर उसने रथ को सुमंत्र सहित देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जो दुख हुआ, वह कहा नहीं जा सकता।

राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥

"राम, राम, सीता, लक्ष्मण" पुकारते हुए सुमंत्र धरती पर गिर पड़े, अत्यंत व्याकुल होकर। घोड़े दक्षिण दिशा की ओर देख-देखकर हिनहिनाते हैं, मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों।

दोहा

नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि१४२

वे न घास चरते हैं, न पानी पीते हैं, बस आँखों से आँसू बहाते रहते हैं। राम के घोड़ों की यह दशा देखकर सारे निषाद व्याकुल हो उठे।

धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥

तब धैर्य धरकर निषादराज बोला - सुमंत्र, अब विषाद छोड़िए। आप विद्वान और परमार्थ के ज्ञाता हैं, विधाता को प्रतिकूल जानकर धीरज धरिए।

बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी॥सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी॥

कोमल वाणी से तरह-तरह की कथाएँ सुनाकर निषाद ने जबरन सुमंत्र को रथ पर बिठा दिया। पर शोक से इतने शिथिल हो चुके थे कि रथ हाँक ही नहीं पाते - हृदय में राम-वियोग की तीव्र पीड़ा थी।

चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें॥

घोड़े तड़फड़ाते हैं, ठीक रास्ते पर नहीं चलते, मानो जंगली पशु पकड़कर रथ में जोत दिए गए हों। कभी लड़खड़ाकर गिर पड़ते, कभी मुड़कर पीछे देखने लगते - राम-वियोग की तीखी पीड़ा से व्याकुल।

जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती॥

जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम लेता है, घोड़े हिनहिनाकर प्रेम से उसकी ओर देखने लगते हैं। घोड़ों की यह विरह-दशा कैसे बयान हो, वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि खोकर साँप व्याकुल होता है।

दोहा

भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग१४३

मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद से भर उठा। तब उसने चार अच्छे सेवक बुलाकर सारथी के साथ भेज दिए।

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥

गुह सारथी सुमंत्र को पहुँचाकर लौटा - उसके विरह-दुख का वर्णन नहीं हो सकता। चारों निषाद रथ लेकर अयोध्या की ओर चले, पर हर क्षण विषाद में डूबे जाते थे।

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥

दुख से व्याकुल और दीन सुमंत्र सोचते हैं - राम के बिना जीने को धिक्कार है। यह अधम शरीर आखिर बचेगा तो नहीं ही, फिर राम से बिछुड़ते ही इसने प्राण क्यों नहीं त्याग दिए।

भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥

ये प्राण अपयश और पाप के भागी बन गए, फिर भी निकलते क्यों नहीं? हाय, मंद बुद्धि ने अच्छा मौका गँवा दिया, अब भी हृदय के दो टुकड़े नहीं होते।

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहूँ कृपन धन रासि गवाँई॥बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥

सुमंत्र हाथ मल-मलकर, सिर पीट-पीटकर पछताते हैं, मानो किसी कंजूस ने धन का खजाना खो दिया हो। वे ऐसे चले जा रहे थे मानो कोई वीर योद्धा कहलाकर युद्ध से भाग खड़ा हुआ हो।

दोहा

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति१४४

जैसे कोई विवेकी, वेदज्ञ, साधु-सम्मत आचरण वाला कुलीन ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी बैठे और फिर पछताए, वैसे ही मंत्री सुमंत्र पछता रहे हैं।

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥रहे करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु॥

जैसे किसी कुलीन, समझदार, मन-वचन-कर्म से पति को ही देवता मानने वाली साध्वी स्त्री को भाग्यवश पति से बिछुड़कर रहना पड़े, उसके हृदय में जैसी दारुण पीड़ा हो, वैसी ही सुमंत्र के हृदय में हो रही थी।

लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥

नेत्रों में जल भर आया है, दृष्टि धुँधली हो गई है, कानों से सुनाई नहीं देता, व्याकुल बुद्धि बेठिकाने है। होंठ सूख रहे हैं, मुँह में जीभ चिपक गई है, फिर भी प्राण नहीं निकलते - क्योंकि हृदय में अवधि की आस का किवाड़ लगा है।

बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥

सुमंत्र का चेहरा इतना बदरंग हो गया कि देखा नहीं जाता, मानो उन्होंने माता-पिता को मार डाला हो। राम-वियोग की गहरी ग्लानि मन पर छाई है, जैसे कोई पापी नरक जाते हुए रास्ते में पछता रहा हो।

बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥

मुँह से वचन नहीं निकलते, हृदय में पछताते हैं - अयोध्या जाकर मैं क्या देखूँगा? राम-रहित रथ जो भी देखेगा, वही मुझसे नज़र मिलाने में सकुचाएगा।

दोहा

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि१४५

नगर के व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदय पर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा।

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता॥पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥

दीन-दुखी सब माताएँ जब पूछेंगी, हे विधाता, मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मण की माता पूछेंगी, तब कौन-सा सुखद संदेश दूँगा?

राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई॥पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही॥

राम की माता जब दौड़ी आएँगी, जैसे नई ब्याई गाय बछड़े को याद कर दौड़ती है, तब उनके पूछने पर मुझे यही उत्तर देना होगा - राम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गए!

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥

जो भी पूछेगा, यही उत्तर देना पड़ेगा। हाय, अयोध्या जाकर अब बस यही सुख शेष है! जब दुख से दीन महाराज, जिनका जीवन ही राम पर टिका है, मुझसे पूछेंगे,

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई॥सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥

तब मैं कौन-सा मुँह लेकर कहूँगा कि राजकुमारों को कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण-सीता-राम का यह संदेश सुनते ही महाराज तिनके की तरह प्राण त्याग देंगे।

दोहा

-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु१४६

प्रियतम रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट क्यों नहीं गया - इससे तो यही जानता हूँ कि विधाता ने मुझे यह यातना सहने वाला शरीर ही दिया है।

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥

इस तरह रास्ते भर पछताते हुए सुमंत्र का रथ तुरंत तमसा नदी के तट पर आ पहुँचा। उन्होंने विनती करके चारों निषादों को विदा किया, वे विषाद से व्याकुल होते हुए पैरों पड़कर लौटे।

पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा॥

नगर में प्रवेश करते हुए मंत्री ऐसे सकुचा रहे थे मानो गुरु या गौ को मारकर आए हों। सारा दिन एक पेड़ के नीचे बिताया, संध्या होने पर मौका मिला।

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥

अँधेरा होते ही उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया और रथ द्वार पर खड़ा करके चुपचाप महल में घुसे। जिस-जिसने यह खबर सुनी, वे सब रथ देखने राजद्वार पर आ गए।

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जेसें॥

रथ पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर लोगों के शरीर ऐसे गल रहे थे जैसे धूप में ओले। नगर के स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल थे जैसे पानी घटने पर मछलियाँ।

दोहा

सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु१४७

मंत्री का अकेले लौटना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो उठा। महल उन्हें ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतों का निवास हो।

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी॥सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा॥

सभी रानियाँ अत्यंत व्याकुल होकर पूछती हैं, पर सुमंत्र की वाणी रुक गई है, उत्तर ही नहीं फूटता। न कानों से सुनाई देता है, न आँखों से कुछ सूझता है - वे जो भी सामने मिलता है, उसी से पूछते जाते हैं, राजा कहाँ हैं?

दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई॥जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा॥

दासियों ने मंत्री को व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्या के महल में ले गईं। सुमंत्र ने जाकर देखा - राजा ऐसे बैठे थे मानो अमृतरहित चंद्रमा।

आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना॥लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती॥

राजा आसन-शय्या-आभूषणों से रहित, बिल्कुल उदास धरती पर पड़े हैं। लंबी साँसें लेते हुए ऐसे सोच में डूबे हैं मानो राजा ययाति स्वर्ग से गिरकर पछता रहे हों।

लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती॥राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही॥

क्षण-क्षण छाती भर-भरकर सोच करते हैं, मानो पंख जलकर सम्पाती गिर पड़ा हो। राजा "राम, राम" कहते, फिर "हा राम, हा लक्ष्मण, हा जानकी" पुकारने लगते हैं।

दोहा

देखि सचिव जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कह सुमंत्र कहँ रामु१४८

मंत्री ने देखकर "जय हो, जीते रहें" कहकर दंडवत प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले - सुमंत्र, कहो, राम कहाँ हैं?

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥

राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया, मानो डूबते हुए को कोई सहारा मिल गया हो। स्नेह से पास बिठाकर, आँखों में आँसू भरे राजा पूछने लगे -

राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए॥

हे मेरे स्नेही सखा, राम की कुशल कहो - बताओ, रघुनाथ, लक्ष्मण और वैदेही कहाँ हैं? क्या उन्हें लौटा लाए हो या वे वन को चले गए? यह सुनते ही मंत्री की आँखों में आँसू भर आए।

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू॥राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥

शोक से व्याकुल राजा फिर पूछने लगे - सीता, राम, लक्ष्मण का संदेश तो कहो। राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते रहे।

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना॥

मैंने राजतिलक की बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिसके मन में न हर्ष हुआ न विषाद, उस पुत्र से बिछुड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गए - मुझसे बड़ा पापी और कौन होगा!

दोहा

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।१४९

हे सखा, राम, सीता, लक्ष्मण जहाँ हों, मुझे भी वहीं पहुँचा दो - नहीं तो सच कहता हूँ, अब मेरे प्राण चलने को ही व्याकुल हैं।

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥

राजा बार-बार मंत्री से पूछते हैं - मेरे प्यारे पुत्रों का संदेश सुनाओ। हे सखा, तुरंत वही उपाय करो जिससे राम, लक्ष्मण, सीता को मुझे आँखों दिखा सको।

सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा॥

मंत्री धीरज धरकर कोमल वाणी में बोले - महाराज, आप विद्वान और ज्ञानी हैं। हे देव, आप शूरवीरों और धैर्यवानों में श्रेष्ठ हैं, आपने सदा साधु-समाज की सेवा की है।

जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा॥काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥

जन्म-मरण, सुख-दुख के भोग, हानि-लाभ, प्रियजनों का मिलना-बिछुड़ना - ये सब, हे स्वामी, काल और कर्म के अधीन रात-दिन की तरह अपने आप होते रहते हैं।

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥

मूर्ख सुख में हर्षित होते और दुख में रोते हैं, पर धीर पुरुष मन में दोनों को समान मानते हैं। धीरज धरिए, विवेक से विचार कीजिए और सबका हित सोचकर शोक त्याग दीजिए।

दोहा

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।नहाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर१५०

राम का पहला पड़ाव तमसा तट पर हुआ, दूसरा गंगा तट पर - सीता सहित दोनों भाई उस दिन केवल स्नान करके जल पीकर ही रहे।

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥

केवट ने बहुत सेवा की, वह रात श्रृंगवेरपुर में ही बीती। सवेरा होते ही बरगद का दूध मँगवाकर राम-लक्ष्मण ने सिर पर जटाओं के मुकुट बनाए।

राम सखा तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥

तब सखा निषादराज ने नाव मँगवाई। पहले प्रिया सीता को चढ़ाकर, फिर राम स्वयं चढ़े। लक्ष्मण ने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू॥

मुझे व्याकुल देखकर राम ने धीरज धरकर मधुर वचन कहे - तात, पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और बार-बार उनके चरण-कमल पकड़ना।

करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी॥बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें॥

फिर पैर पकड़कर विनती करना कि पिताजी, मेरी चिंता न कीजिए। आपकी कृपा और पुण्य से वन में और रास्ते में हमारा कल्याण ही होगा।

छंद

तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥जननीं सकल परितोषि परि परि पाय करि बिनती घनी।तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी॥

पिताजी, आपके अनुग्रह से मैं वन में जाते हुए भी सुख ही पाऊँगा। आज्ञा का भलीभाँति पालन करके, आपके दर्शन को फिर कुशलपूर्वक लौट आऊँगा। सब माताओं के चरणों में गिर-गिरकर, उनसे बहुत विनती करके - तुलसीदास कहते हैं - तुम वही करना जिससे कोसलपति पिता कुशल रहें।

सोरठा

गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति१५१

बार-बार चरण-कमल पकड़कर गुरु वसिष्ठ से मेरा संदेश कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिता मेरी चिंता न करें।

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी॥सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी॥

पुरवासियों और परिजनों सबसे विनती करके, तात, मेरी यह प्रार्थना सुनाना कि वही मेरा सच्चा हितैषी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।

कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥

भरत के आने पर उन्हें मेरा संदेश कहना कि राजपद पाकर भी नीति न छोड़ें, मन-वचन-कर्म से प्रजा का पालन करें और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करें।

ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥

और भाई, पिता-माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपन को अंत तक निभाना। हे तात, राजा को इस तरह रखना जिससे उन्हें कभी मेरी चिंता न सतानी पड़े।

लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई॥

लक्ष्मण ने कुछ कठोर वचन कहे, पर राम ने उन्हें रोककर फिर मुझसे अनुरोध किया, बार-बार अपनी सौगंध दिलाई - कहा, तात, वहाँ लक्ष्मण की यह लड़कपन वाली बात मत कहना।

दोहा

कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह१५२

प्रणाम करके सीता भी कुछ कहना चाहती थीं, पर स्नेह से शिथिल हो गईं - वाणी रुक गई, आँखों में जल भर आया और शरीर रोमांच से भर उठा।

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥

उसी समय राम का इशारा पाकर केवट ने नाव पार को चला दी। इस तरह रघुकुल-तिलक राम चले गए, और मैं छाती पर वज्र रखे खड़ा-खड़ा देखता रहा।

मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ॥

मैं अपना दुख कैसे बताऊँ, कि राम का यह संदेश लेकर भी मैं जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गई, और वे ग्लानि और सोच से भर उठे।

सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥

सारथी के वचन सुनते ही राजा धरती पर गिर पड़े, हृदय में भयानक जलन उठी। वे तड़पने लगे, मन गहरे मोह से व्याकुल हो गया - मानो मछली को माँझा (वर्षा का पहला जल) लग गया हो।

करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी॥सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा॥

सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं - उस महान विपत्ति का वर्णन कैसे हो सके? उनका विलाप सुनकर दुख को भी दुख हुआ, और धीरज का भी धीरज छूट गया।

दोहा

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु१५३

राजमहल में उठे शोर को सुनकर पूरे अयोध्या में भारी कुहराम मच गया, मानो पक्षियों से भरे किसी वन में रात में कठोर वज्र गिरा हो।

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥

राजा के प्राण कंठ तक आ गए, मानो मणि खोकर साँप व्याकुल हो उठा हो। सारी इंद्रियाँ बुरी तरह विकल हो गईं, मानो बिना जल के तालाब में कमल-वन मुरझा गया हो।

कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी॥

कौसल्या ने राजा को इतना व्याकुल देखा कि हृदय में समझ गईं - अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त होने को है। तब राम की माता कौसल्या धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं -

नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू॥करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥

हे नाथ, मन में विचार कीजिए कि राम का यह वियोग एक अपार समुद्र है, अयोध्या उसमें चलता जहाज है, और आप उसके कर्णधार हैं - सब प्रियजन ही इस जहाज पर सवार यात्री हैं।

धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू॥जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥

धीरज धरेंगे तो सब पार लग जाएँगे, नहीं तो सारा परिवार डूब जाएगा। हे प्रिय स्वामी, यदि मेरी यह विनती मान लें तो राम, लक्ष्मण, सीता फिर मिल जाएँगे।

दोहा

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि१५४

प्रिय पत्नी के कोमल वचन सुनकर राजा ने आँखें खोलकर देखा - मानो कोई तड़पती हुई दीन मछली पर शीतल जल छिड़क रहा हो।

धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥

धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले - सुमंत्र, कहो, कृपालु राम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है?

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती॥तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥

राजा व्याकुल होकर बहुत तरह से विलाप कर रहे हैं, वह रात युग जैसी लंबी हो गई, बीतती ही नहीं। तभी राजा को अंधे तपस्वी के शाप की याद आई, और उन्होंने वह सारी कथा कौसल्या को सुना दी।

भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा॥सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा॥

वह कथा सुनाते-सुनाते राजा व्याकुल हो उठे और बोले - राम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है! मैं इस शरीर को रखकर क्या करूँगा, जिसने मेरा प्रेम का प्रण नहीं निभाया?

हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥

हा रघुनंदन, मेरे प्राणप्रिय! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गए। हा जानकी, हा लक्ष्मण, हा रघुवर! हा पिता के हृदयरूपी चातक के लिए मेघ समान पुत्र!

दोहा

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम१५५

राम-राम कहते, फिर राम कहते, फिर राम-राम कहते और फिर राम कहते हुए राजा राम के विरह में शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले गए।

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥

जीने और मरने का सच्चा फल तो दशरथ ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनगिनत ब्रह्मांडों में फैल गया। जीते-जी राम के चंद्रमुख को निहारा, और राम के विरह को ही अपनी मृत्यु का सुंदर बहाना बना लिया।

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी॥करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा॥

शोक से व्याकुल सब रानियाँ रो रही हैं, राजा के रूप, शील, बल और तेज का बखान करते हुए वे तरह-तरह से विलाप करती हैं और बार-बार धरती पर गिर पड़ती हैं।

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू॥

दास-दासी व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं, नगरवासी घर-घर रो रहे हैं - कहते हैं, आज धर्म की सीमा, गुण-रूप के भंडार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गए!

गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी॥

सब कैकेयी को कोसते हैं, जिसने पूरे संसार को अंधा कर दिया। इस तरह विलाप करते-करते रात बीत गई। सवेरे बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि वहाँ आए।

दोहा

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास१५६

तब वसिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल कई इतिहास सुनाकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥

वसिष्ठ ने तेल भरी नाव में राजा के शरीर को सुरक्षित रखवा दिया, फिर दूतों को बुलाकर कहा - तुरंत भरत के पास दौड़ो, पर राजा की मृत्यु की खबर रास्ते में किसी को मत बताना।

एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई॥सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए॥

भरत से जाकर बस इतना कहना कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलवाया है। मुनि की आज्ञा सुनते ही दूत दौड़ पड़े, अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी मात करते हुए चले।

अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥

जब से अयोध्या में यह अनर्थ शुरू हुआ, तभी से भरत को अपशकुन होने लगे थे। वे रात में डरावने सपने देखते और जागकर तरह-तरह की बुरी कल्पनाएँ करते रहते।

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥

वे रोज़ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते, शिव का अभिषेक कई विधियों से करते। हृदय में महादेव को मनाकर माता-पिता, परिजन और भाइयों की कुशलता माँगते।

दोहा

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ१५७

भरत मन में यों ही सोच रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरु की आज्ञा सुनते ही वे गणेश जी को मनाकर चल पड़े।

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥

हवा जैसे वेग वाले घोड़ों को हाँकते हुए वे कठिन नदी, पहाड़ और घने जंगल लाँघते चले। हृदय में गहरा सोच था, कुछ भाता नहीं था - मन में यही सोचते कि उड़कर पहुँच जाऊँ।

एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥

एक-एक पल वर्ष जैसा बीत रहा था, इस तरह भरत नगर के निकट पहुँचे। नगर में प्रवेश करते ही अपशकुन होने लगे - कौवे बुरी जगह बैठकर अशुभ बोलने लगे।

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥

गधे और सियार विपरीत दिशा में बोल रहे हैं, यह सुन-सुनकर भरत के मन में गहरी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब बेरौनक हो गए हैं, नगर बेहद डरावना लग रहा है।

खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥

राम के वियोग रूपी रोग से पीड़ित पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी ऐसे दुखी हैं कि देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यंत दुखी हैं, मानो सबने अपनी सारी संपत्ति खो दी हो।

दोहा

पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं१५८

नगरवासी मिलते हैं पर कुछ बोलते नहीं, चुपचाप दूर से ही प्रणाम करके निकल जाते हैं। भरत भी किसी से कुशल नहीं पूछ पाते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छाया है।

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥

बाजार और रास्ते सूने नहीं दिखते, मानो पूरे नगरमें चारों ओर आग लग गई हो। पुत्रके आनेकी बात सुनकर सूर्यवंशरूपी कमलको खिलानेवाली चाँदनी के समान कैकेयी बहुत हर्षित हुई।

सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई॥भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥

आरती सजाकर वह आनंदमें उठ दौड़ी और द्वारपर ही भरत-शत्रुघ्नसे मिलकर उन्हें महलमें ले आई। भरतने पूरे परिवारको उदास देखा, मानो कमलोंके वनपर पाला पड़ गया हो।

कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥

कैकेयी अकेली ऐसी हर्षित दिखाई देती है जैसे कोई भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनंदित हो रही हो। पुत्रको चिंतित और उदास देखकर वह पूछने लगी - हमारे नैहरमें तो सब कुशल है न?

सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥

भरतने सारी कुशल-क्षेम बता दी और फिर अपने घरकी कुशलता पूछी - पिताजी कहाँ हैं, सब माताएँ कहाँ हैं, सीता और मेरे प्रिय भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं?

दोहा

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन१५९

पुत्रके स्नेहभरे वचन सुनकर आँखोंमें कपटके आँसू भरकर पापिनी कैकेयी भरतके मनमें शूलकी तरह चुभनेवाले वचन बोली।

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥

बेटा, मैंने सारी बात बना ली थी, बेचारी मंथरा भी सहायक बनी। पर विधाताने बीचमें कुछ बिगाड़ दिया - राजा स्वर्गको सिधार गए।

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥

यह सुनते ही भरत दुखसे विवश हो गए, मानो सिंहकी दहाड़ सुनकर हाथी सहम गया हो। 'तात, तात, हा तात' पुकारते हुए वे व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े।

चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥

आपके जाते समय मैं दर्शन भी न कर सका, आपने मुझे राम भी नहीं सौंपा - ऐसा विलाप करते हुए फिर धीरज धरकर वे उठे और बोले - माता, पिताके मरनेका कारण तो बताओ।

सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥

पुत्रका यह वचन सुनकर कैकेयी मानो घावमें विष भरते हुए बोलने लगी और शुरूसे लेकर अपनी सारी करनी बड़े प्रसन्न मनसे कठोरतापूर्वक सुना दी।

दोहा

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु१६०

राम वनको गए यह सुनते ही भरतको पिताके मरनेका शोक भी भूल गया, और मनमें इस सबका कारण खुदको जानकर वे स्तब्ध होकर मौन खड़े रह गए।

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।॥

पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी घावपर नमक छिड़कती-सी समझाने लगी - बेटा, राजाके लिए सोच करनेकी बात नहीं, उन्होंने पुण्य कमाकर उसका पूरा भोग कर लिया।

जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥

जीते-जी उन्होंने जन्मका सारा फल पा लिया और अंतमें इंद्रलोक चले गए। ऐसा समझकर सोच छोड़ो और समाजसहित नगरका राज्य संभालो।

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा॥

यह सुनकर राजकुमार भरत बुरी तरह सहम गए, मानो पके घावपर अंगारा छू गया हो। धीरज धरकर लंबी साँस लेते हुए बोले - पापिनी, तूने हर तरहसे कुलका नाश कर डाला।

जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥पेड़ काटि तें पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥

यदि तेरी नीयत इतनी बुरी थी तो जन्मते ही मुझे क्यों नहीं मार डाला? तूने तो पेड़ काटकर पत्तेको सींचा और मछलीके लिए पानी ही उलीच डाला - मेरा भला करते-करते उलटा अहित कर डाला।

दोहा

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ१६१

मुझे सूर्यवंश-सा वंश मिला, दशरथ-जैसे पिता मिले, राम-लक्ष्मण-से भाई मिले, पर हे माता, जन्म देनेवाली तू निकली! विधाताके आगे किसीका वश नहीं चलता।

जब तें कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदय न गयऊ॥बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा॥

जिस दिन तूने यह दुर्बुद्धि मनमें ठानी, उसी क्षण तेरे हृदयके टुकड़े-टुकड़े क्यों न हो गए? वरदान माँगते समय तुझे तनिक भी पीड़ा न हुई, तेरी जीभ न गली, तेरे मुँहमें कीड़े न पड़े?

भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥

राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? लगता है मरते समय विधाताने उनकी बुद्धि ही हर ली थी। स्त्रीके हृदयकी चाल तो विधाता भी नहीं जान पाया, वह तो कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है।

सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जाने तीय सुभाऊ॥अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥

पर पिता तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे, वे भला स्त्रीका स्वभाव कैसे जानते? संसारमें ऐसा कौन जीव है जिसे राम प्राणोंसे प्यारे नहीं?

भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई॥

वही राम भी तुझे शत्रु लगने लगे! तू सच-सच बता, तू कौन है? जो भी है सो है, अब मुँह काला करके उठ और मेरी नजरोंसे दूर जा बैठ।

दोहा

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि१६२

विधाताने मुझे रामके विरोधी तेरे ही हृदयसे जन्म दिया। मेरे बराबर पापी और कौन होगा? मैं व्यर्थ ही तुझसे यह सब कह रहा हूँ।

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥

माताकी यह कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नका रोम-रोम क्रोधसे जल उठा, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके वस्त्र-आभूषणोंसे सजी हुई कुबड़ी मंथरा वहाँ आ पहुँची।

लखि रिस भरे लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई॥हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा॥

उसे सजी-धजी देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न क्रोधसे भर उठे, मानो जलती आगमें घी पड़ गया हो। उन्होंने ठीक निशाना साधकर उसके कूबड़पर लात जमा दी, वह चीखती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी।

कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा॥

उसका कूबड़ टूट गया, खोपड़ी फूट गई, दाँत टूट गए, मुँहसे खून बहने लगा। वह कराहते हुए बोली - हाय दैव, मैंने क्या बिगाड़ा था, भला करते-करते यह बुरा फल पाया।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥

उसकी बात सुनकर और उसे सिरसे पाँवतक दुष्ट जानकर शत्रुघ्न उसे बाल पकड़कर घसीटने लगे। तब दयालु भरतने उसे छुड़ा दिया और दोनों भाई कौसल्याके पास चले गए।

दोहा

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार१६३

कौसल्याके वस्त्र मैले हैं, चेहरा उतरा हुआ है, वे व्याकुल हैं, दुखके बोझसे शरीर सूख गया है - मानो सोनेकी सुंदर बेलको वनमें पालाने मार दिया हो।

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥

भरतको देखते ही माता उठकर दौड़ीं पर चक्कर खाकर मूर्छित होकर गिर पड़ीं। यह देखकर भरत भी बहुत व्याकुल हो उठे और अपनी सुध भुलाकर उनके चरणोंमें गिर पड़े।

मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा॥

बोले - माता, पिताजी कहाँ हैं, दिखा दो; सीता और मेरे दोनों भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं? कैकेयी संसारमें जन्मी ही क्यों, और जन्मी तो बाँझ क्यों न रही?

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥

जिसने कुलका कलंक, अपयशका भागी और अपनोंका द्रोही मुझ-जैसा पुत्र जना, तीनों लोकोंमें मुझसे बड़ा अभागा कौन होगा, जिसके कारण माता तेरी यह दशा हुई।

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु॥धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥

पिता स्वर्गमें हैं, राम वनमें हैं, इन सब अनर्थोंका कारण मैं ही हूँ। धिक्कार है मुझे, मैं तो बाँसके वनमें उठी आगकी तरह हूँ जिसने यह असह्य जलन और दुख फैलाया।

दोहा

मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि१६४

भरतके कोमल वचन सुनकर माता फिर सँभलकर उठीं, उन्हें उठाकर छातीसे लगा लिया और आँखोंसे आँसू बहाने लगीं।

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥

सीधे स्वभाववाली माताने भरतको ऐसे प्रेमसे गले लगाया मानो राम ही लौट आए हों। फिर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नको भी गले लगाया। हृदयमें शोक और स्नेह समाए नहीं समा रहे थे।

देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे॥

उनका यह स्वभाव देखकर सब कहने लगे - रामकी माता ऐसी ही तो होनी चाहिए। माताने भरतको गोदमें बिठाया, आँसू पोंछे और कोमल वचन बोलीं।

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि॥

बेटा, अब भी धीरज धरो, बुरा समय समझकर शोक छोड़ दो। काल और कर्मकी गति टाली नहीं जा सकती, यह जानकर मन ही मन हानि और ग्लानि मत मानो।

काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥

बेटा, किसीको दोष मत दो, विधाता तो मेरे साथ ही उलटा हो गया है कि इतने दुखके बाद भी मुझे जिला रहा है। कौन जानता है उसे अब और क्या मंजूर है।

दोहा

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर१६५

पिताकी आज्ञासे राम ने गहने-वस्त्र त्याग दिए और वल्कल पहन लिए। उनके मनमें न कोई खेद था, न कोई हर्ष।

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥चले बिपिन सुनि सिय संग लागी। रहहिं न राम चरन अनुरागी॥

मुख प्रसन्न था, मनमें न मोह था न रोष, सबको संतुष्ट करके वे वनको चल दिए। यह सुनते ही सीता भी साथ हो लीं, रामके चरणोंकी प्रेमिका वे किसी तरह पीछे न रह सकीं।

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥

यह सुनते ही लक्ष्मण भी उठकर साथ चल दिए, राघुनाथने उन्हें रोकनेकी बहुत कोशिश की पर वे न रुके। तब सबको सिर नवाकर राघुनाथ सीता और छोटे भाईको साथ लेकर चले गए।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गयउँ न संग न प्रान पठाए॥यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें॥

राम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गए, न मैं उनके साथ गई, न अपने प्राण उनके साथ भेजे। यह सब मेरी इन्हीं आँखोंके सामने हुआ, फिर भी अभागे इस जीवने शरीर नहीं छोड़ा।

मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥

अपने ही स्नेहको देखकर मुझे लाज तक नहीं आती, राम-जैसे पुत्रकी मैं माता हूँ! जीना-मरना तो राजाने खूब समझा था, मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है।

दोहा

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु१६६

कौसल्याके यह वचन सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा, राजमहल मानो शोकका घर बन गया।

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥

भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई व्याकुल होकर रो रहे थे, कौसल्याने उन्हें छातीसे लगा लिया और अनेक प्रकारसे समझा-बुझाकर विवेकभरी बातें कहीं।

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं॥छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥

भरतने भी सब माताओंको पुराण-वेदकी सुंदर कथाएँ सुनाकर धीरज बँधाया। फिर हाथ जोड़कर वे निष्कपट, पवित्र और सीधी वाणीमें बोले।

जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥

जो पाप माता-पिता-पुत्रकी हत्यासे, गौशाला और ब्राह्मणोंके गाँव जलानेसे लगते हैं, जो पाप स्त्री-बालककी हत्यासे और मित्र-राजाको विष देनेसे लगते हैं,

जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं॥ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता॥

कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने भी छोटे-बड़े पाप कवियोंने गिनाए हैं - हे विधाता, अगर इस काममें मेरी सहमति रही हो तो हे माता, वे सारे पाप मुझे लगें।

दोहा

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर१६७

जो लोग हरि और शंकरके चरण छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंकी उपासना करते हैं, माता, अगर इसमें मेरी सहमति रही हो तो विधाता मुझे उन्हींकी गति दे।

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥

जो वेद बेचते हैं, धर्मको दुहकर कमाते हैं, चुगली करते हैं, दूसरोंके पाप उघाड़ते हैं, जो कपटी, कुटिल, झगड़ालू और क्रोधी हैं, जो वेदोंकी निंदा करते और सारे संसारसे बैर रखते हैं,

लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥

जो लोभी, लम्पट और लालचमें डूबे रहते हैं, जो दूसरोंके धन और स्त्रीपर नजर रखते हैं - माता, अगर यह मेरी सम्मति रही हो तो मैं उन्हींकी भयानक गति पाऊँ।

जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥

जिनका सत्संगमें मन नहीं लगता, जो अभागे परमार्थके मार्गसे मुँह मोड़े रहते हैं, जो मनुष्य-जन्म पाकर भी हरिका भजन नहीं करते, जिन्हें हरि-हरका सुयश अच्छा नहीं लगता,

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥तिन्ह के गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥

जो वेदमार्ग छोड़कर उल्टे रास्तेपर चलते हैं, जो ठग वेष बनाकर संसारको छलते हैं - माता, अगर यह भेद मुझे मालूम रहा हो तो शंकर मुझे उन्हींकी गति दें।

दोहा

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ१६८

भरतके यह सच्चे और सरल स्वाभाविक वचन सुनकर माता कौसल्या बोलीं - बेटा, तुम तो सदा ही मन, वचन और शरीरसे रामके प्रिय हो।

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥

बेटा, राम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं और तुम भी राघुनाथको प्राणोंसे बढ़कर प्यारे हो। चाहे चाँद विष उगलने लगे और पाला आग बरसाने लगे, जलचर जीव पानीसे विरक्त हो जाएँ,

भए ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥

चाहे ज्ञान होनेपर भी मोह न मिटे, तुम राम के विरुद्ध कभी नहीं हो सकते। संसारमें जो लोग तुम्हारे विषय में ऐसा कहते हैं, वे स्वप्नमें भी सुख और सद्गति नहीं पाएँगे।

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए॥करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती॥

ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतको छातीसे लगा लिया, उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा और आँखोंमें आँसू छलक आए। इस तरह विलाप करते हुए बैठे-बैठे ही सारी रात बीत गई।

बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे॥

तब वामदेव और वसिष्ठ आए, उन्होंने सब मंत्रियों और नगरवासियोंको बुलवाया। मुनि वसिष्ठने बहुत तरहसे परमार्थकी उचित बातें कहकर भरतको समझाया।

दोहा

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु१६९

हे तात, हृदयमें धीरज धरो और आज जो करने योग्य है वह करो - गुरुके यह वचन सुनकर भरत उठे और सारी तैयारीका आदेश दिया।

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥

वेदविधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और एक अद्भुत विमान सजाया गया। भरतने सब माताओंके चरण पकड़कर उन्हें रोक लिया, और वे रानियाँ राम-दर्शनकी आशामें रुक गईं।

चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए॥सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥

चंदन, अगर और अनगिनत सुगंधित द्रव्योंके ढेर मँगाए गए। सरयूके तटपर ऐसी सुंदर चिता सजाई गई मानो स्वर्गकी सीढ़ी हो।

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत नहाइ तिलांजुलि दीन्ही॥सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥

इस तरह सारी दाहक्रिया संपन्न हुई और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलांजलि दी। वेद-स्मृति-पुराणका मत जानकर भरतने पिताका दसगात्र-विधान पूरा किया।

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा॥भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना॥

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने जहाँ जैसा आदेश दिया, भरतने वहाँ वैसा ही हजारों तरहसे किया। शुद्ध होकर गौ, घोड़े, हाथी आदि अनेक सवारियाँ दान कीं,

दोहा

सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम१७०

सिंहासन, गहने, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और घर - सब भरतने दान किए, और ब्राह्मण यह पाकर पूरी तरह संतुष्ट हो गए।

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥

पिताके लिए भरतने जो कुछ किया वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं हो सकता। शुभ दिन देखकर तब मुनि वसिष्ठ आए और मंत्रियों तथा नगरवासियोंको बुलवाया।

बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई॥भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे॥

सब लोग राजसभामें जाकर बैठे। मुनिने भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको बुलवाया, भरतको अपने पास बिठाकर नीति और धर्मसे भरे वचन कहे।

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी॥भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा॥

पहले मुनिने कैकेयीकी सारी कुटिल करनी की कथा कही, फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने प्रेम निभानेके लिए शरीर तक त्याग दिया।

कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥

राम के गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते मुनिराजकी आँखें भर आईं और शरीर पुलकित हो उठा। फिर लक्ष्मण और सीताके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें डूब गए।

दोहा

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ१७१

मुनिनाथ भारी मनसे बोले - भरत, सुनो, होनहार बड़ी बलवान होती है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश - यह सब विधाताके हाथ है।

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥

ऐसा सोचकर किसे दोष दें, किसपर व्यर्थ क्रोध करें? हे तात, मनमें विचार करो - राजा दशरथ सोच करने योग्य नहीं हैं।

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥

सोच तो उस ब्राह्मणका करना चाहिए जो वेद नहीं जानता और अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें डूबा रहता है। सोच उस राजाका करना चाहिए जो नीति नहीं जानता और जिसे प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं।

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥

सोच उस वैश्यका करना चाहिए जो धनवान होकर भी कंजूस है और अतिथि-सत्कार तथा शिव-भक्तिमें कुशल नहीं। सोच उस शूद्रका करना चाहिए जो ब्राह्मणोंका अपमान करता है, बहुत बोलता है, मान चाहता है और ज्ञानका घमंड रखता है।

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥

फिर सोच उस स्त्रीका करना चाहिए जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, झगड़ालू और मनमानी करनेवाली है। सोच उस ब्रह्मचारीका करना चाहिए जो अपना व्रत छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञा नहीं मानता।

दोहा

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग१७२

सोच उस गृहस्थका करना चाहिए जो मोहवश कर्मका रास्ता छोड़ देता है। सोच उस संन्यासीका करना चाहिए जो सांसारिक प्रपंचमें फँसा है और जिसमें ज्ञान-वैराग्य नहीं।

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥

वानप्रस्थी वही सोचने योग्य है जिसे तप छोड़कर भोग अच्छे लगने लगें। सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करता है और माता-पिता-गुरु-भाइयोंसे बैर रखता है।

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥

हर तरहसे सोच उसका करना चाहिए जो दूसरोंका बुरा करता है, सिर्फ अपना ही शरीर पालता है और बहुत निर्दयी है। और सबसे ज्यादा सोच उसका करना चाहिए जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं बनता।

सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥

पर कोसलराज दशरथ सोच करने योग्य नहीं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें फैला है। भरत, तुम्हारे-जैसा पिता न कभी हुआ, न है, न आगे होगा।

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र और सब दिक्पाल दशरथके गुणोंकी कथाएँ गाया करते हैं।

दोहा

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु१७३

हे तात, बताओ, उनकी बड़ाई भला कोई कैसे करे जिनके राम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-जैसे पवित्र पुत्र हैं?

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥

राजा हर तरहसे भाग्यशाली थे, उनके लिए विषाद करना व्यर्थ है। यह समझकर सोच छोड़ दो और राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो।

राय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥

राजाने राजपद तुम्हें दिया है, पिताका वचन सच करना ही चाहिए, जिन्होंने वचनके लिए राम को त्याग दिया और राम-विरहकी अग्निमें अपना शरीर तक होम कर दिया।

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥करहु सीस धरि भूप रजाई। है तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥

राजाको वचन प्रिय थे, प्राण नहीं। इसलिए तात, पिताके वचनको सच करो, उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके पालन करो, इसीमें तुम्हारा सब तरहसे भला है।

परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥

परशुरामने पिताकी आज्ञा रखते हुए माताको मार डाला, सारा संसार इसका साक्षी है। ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी - पिताकी आज्ञा माननेसे उन्हें पाप या अपयश नहीं लगा।

दोहा

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन१७४

जो उचित-अनुचितका विचार छोड़कर पिताके वचनका पालन करते हैं, वे सुख और सुयशके भागी बनकर अंततः स्वर्गमें बसते हैं।

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू॥

राजाका वचन अवश्य सच करो, शोक छोड़ो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजाको संतोष मिलेगा और तुम्हें पुण्य और सुयश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।

बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥

वेदमें भी यही बात प्रसिद्ध और सबको मान्य है कि पिता जिसे राज्य दे वही राजतिलक पाता है। इसलिए राज्य करो, ग्लानि छोड़ दो, मेरे वचनको हितकारी समझकर मानो।

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥

यह सुनकर राम और सीता भी सुखी होंगे, कोई विद्वान इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्या समेत सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी।

परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥

जो तुम्हारे और रामके श्रेष्ठ संबंधको जानेगा, वह तुम्हें ही भला समझेगा। राम के लौटनेपर राज्य उन्हें सौंप देना, तबतक स्नेहपूर्वक उनकी ओरसे प्रजाकी सेवा करना।

दोहा

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि१७५

मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं - गुरुकी आज्ञा अवश्य मानिए, राघुनाथके लौटनेपर जो उचित होगा वह तब कर लीजिएगा।

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥

कौसल्या धीरज धरकर कह रही हैं - बेटा, गुरुकी आज्ञा ही तुम्हारे लिए हितकारी है, उसे मानो, हित समझकर पालन करो और कालकी गति जानकर विषाद छोड़ दो।

बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा॥

राम वनमें हैं, राजा स्वर्ग सिधार गए, और तात, तुम इस तरह कातर हो रहे हो! परिवार, प्रजा, मंत्री और सब माताओं - सबका सहारा अब तुम्हीं हो।

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥

विधाता प्रतिकूल और समय कठोर देखकर धीरज धरो, बेटा, मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ। गुरुकी आज्ञा शिरोधार्य करके प्रजाका पालन करो और परिवारका दुख दूर करो।

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥

गुरुके वचन और मंत्रियोंके समर्थनको सुनकर भरतके हृदयको मानो चंदनकी ठंडक मिली। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलतासे भरी माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी।

छंद

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥

माताकी सरल और स्नेहभरी वाणी सुनकर भरत व्याकुल हो उठे, उनकी आँखोंसे बहते आँसू मानो हृदयमें उगे विरहके नए अंकुरको सींच रहे थे। उस दशाको देखकर उस पल सबको अपनी देहकी सुध भूल गई। तुलसीदास कहते हैं - सब आदरपूर्वक भरतके इस स्वाभाविक स्नेहकी सीमाकी सराहना करने लगे।

सोरठा

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि१७६

धैर्यको थामे भरत हाथ जोड़कर, धीरज धरकर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबोकर सबको उचित उत्तर देने लगे -

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥

गुरुने मुझे सुंदर उपदेश दिया, प्रजा और मंत्री - सबको यही स्वीकार्य है, माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है, और मैं भी अवश्य उसे शिरोधार्य करके निभाना चाहता हूँ।

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥उचित कि अनुचित किए बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥

गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृदकी बात सुनकर मन प्रसन्न रखते हुए उसे भला समझकर करना ही चाहिए। उचित-अनुचितका विचार करने बैठें तो धर्म भी छूट जाता है और सिरपर पापका बोझ चढ़ जाता है।

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें॥

आप मुझे वही सीधी शिक्षा दे रहे हैं जिसके पालनमें मेरा भला है। यह मैं भलीभाँति समझता हूँ, फिर भी मेरे मनको संतोष नहीं मिलता।

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥

अब आप मेरी विनती भी सुन लें और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे राह दिखाएँ। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा करें - साधु पुरुष दुखी मनुष्यके गुण-दोष नहीं गिनते।

दोहा

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।एहि तें जानहु मोर हित के आपन बड़ काजु१७७

पिता स्वर्गमें हैं, सीता-राम वनमें हैं, और आप मुझसे राज्य करनेको कह रहे हैं। इसमें आप मेरा हित समझते हैं या इसमें आपका ही कोई बड़ा स्वार्थ छिपा है?

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई॥मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपाय मोर हित नाहीं॥

मेरा हित तो रामकी सेवामें था, वह भी माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने खुद सोचकर देख लिया है, इसके सिवा मेरा और कोई भला नहीं।

सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू॥

लक्ष्मण, राम और सीताके चरण देखे बिना यह शोकभरा राज्य किस गिनतीमें है? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ ही व्यर्थ है, वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है,

सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥

रोगी शरीरके लिए तमाम भोग व्यर्थ हैं, हरिभक्तिके बिना जप-योग व्यर्थ हैं, जीवके बिना सुंदर देह व्यर्थ है - वैसे ही राघुनाथके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है।

जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू॥मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥

मुझे आज्ञा दीजिए, मैं राम के पास जाऊँ, यही निश्चय है, इसीमें मेरा हित है। और मुझे राजा बनाकर आप मेरा भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहके मोहवश ही कह रहे हैं।

दोहा

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम के राज॥१७८

कैकेयीका बेटा, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-जैसे नीचके राज्यसे आप मोहवश ही सुख चाहते हैं।

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥

मैं सच कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें - राजा वही होना चाहिए जो धर्मपरायण हो। मुझे जबरन राज्य दोगे उसी क्षण धरती पाताल में धँस जाएगी।

मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥राय राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥

मेरे समान पापी और कौन होगा, जिसके कारण सीता-राम को वनवास मिला? राजाने राम को वन दिया और उनके बिछड़ते ही खुद स्वर्ग सिधार गए।

मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥

और मैं दुष्ट, जो इन सब अनर्थोंका कारण हूँ, होश में बैठा यह सब सुन रहा हूँ! राम बिना सूने घरको देखकर और दुनियाका उपहास सहकर भी ये प्राण टिके हुए हैं।

राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥

क्योंकि ये प्राण राम-जैसे पवित्र विषयमें रमे नहीं, बल्कि लालची हैं, भूमि और भोगके भूखे हैं। मेरे हृदयकी कठोरताका क्या कहूँ, जिसने वज्रको भी मात दे दी।

दोहा

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर१७९

कारण कठिन हो तो कार्य भी कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा - दोनों ही भयानक और कठोर बनते हैं।

कैकेई भव तनु अनुरागे। पावर प्रान अघाइ अभागे॥जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥

कैकेयीसे जन्मी इस देहसे मोह करनेवाले ये नीच प्राण पूरी तरह अभागे हैं। जब प्रियके वियोगमें भी मुझे यह प्राण प्यारे लग रहे हैं, तो आगे और भी बहुत कुछ देखना-सुनना बाकी है।

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥

लक्ष्मण, राम और सीताको तो वन दिया, स्वर्ग भेजकर पतिका भला किया, खुद विधवापन और अपयश लिया, और प्रजाको शोक-संताप दिया।

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू॥एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥

और मुझे सुख, सुयश और राज्य दिया! कैकेयीने तो सबका काम बना दिया! इससे बढ़कर मेरे लिए अब क्या रह गया, कि आप मुझे राजतिलक देनेकी बात कर रहे हैं!

कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥

कैकेयीके पेट से जन्म लेकर यह मेरे लिए कुछ भी अनुचित नहीं। यह सब तो विधाताने ही रचा है, फिर इसमें प्रजा और आप लोग सहायता क्यों कर रहे हैं?

दोहा

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार१८०

जिसे बुरे ग्रह लगे हों, फिर वायुरोग सताए, और तिसपर बिच्छू भी डंक मार दे - ऐसेको यदि शराब पिलाई जाए, तो बताइए यह कैसा इलाज हुआ।

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥

कैकेयीके बेटेके लिए संसारमें जो कुछ उचित था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर 'दशरथका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे व्यर्थ ही मिली।

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका॥उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥

आप सब भी मुझसे तिलक कढ़ानेकी बात कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सबको ठीक लगती है। मैं किस-किसको क्या उत्तर दूँ - जिसकी जो इच्छा हो, वही आप सुखपूर्वक कहें।

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥

मेरी कुमाता कैकेयीको छोड़कर, बताइए, और कौन कहेगा कि यह अच्छा हुआ? इस चराचर संसारमें मेरे सिवा कोई और नहीं जिसे सीता-राम प्राणोंसे प्यारे न हों।

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥

जो सबसे बड़ी हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दिख रहा है। यह मेरा बुरा समय है, इसमें किसीका दोष नहीं। आप सब जो कह रहे हैं वह उचित ही है, क्योंकि आप संशय, शील और प्रेमके वश में हैं।

दोहा

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि१८१

रामकी माता बहुत सरलहृदय हैं और मुझपर उनका खास स्नेह है, इसीलिए मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ऐसा कह रही हैं।

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥

गुरुजी ज्ञानके सागर हैं, यह सारा संसार जानता है, जिनके लिए यह पूरा विश्व हथेलीके बेरके समान है - वे भी मेरे लिए राजतिलककी तैयारी कर रहे हैं। सच है, विधाता विपरीत हो तो सब कोई विपरीत हो जाता है।

परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥

राम-सीताको छोड़कर संसारमें कोई नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सहमति नहीं थी। मैं यह सब सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा, क्योंकि जहाँ पानी है वहाँ अंततः कीचड़ भी होता ही है।

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥एक उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥

मुझे डर नहीं कि संसार मुझे बुरा कहेगा, न परलोककी चिंता है। बस मेरे हृदयमें एक ही असह्य आग धधक रही है कि मेरे कारण सीता-राम दुखी हुए।

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥

जीवनका असली लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ छोड़कर रामके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो रामके वनवासके लिए ही हुआ था, फिर मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताऊँ?

दोहा

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।देखें बिनु रघुनाथ पद जिय के जरनि न जाइ१८२

सबके आगे सिर झुकाकर मैं अपनी गहरी दीनता कह रहा हूँ - राघुनाथके चरणोंके दर्शन बिना मेरे मनकी जलन नहीं जाएगी।

आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय के रघुबर बिनु बूझा॥एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥

मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता, राम के बिना मेरे मनकी बात कौन जाने? मनमें एक ही निश्चय है - सुबह होते ही मैं प्रभुके पास चल पड़ूँगा।

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥

यद्यपि मैं दुष्ट और अपराधी हूँ, और मेरे कारण ही यह सारा उपद्रव हुआ, फिर भी मुझे शरणमें सामने खड़ा देखकर राम सब कुछ क्षमा करके मुझपर खास कृपा करेंगे।

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥

राघुनाथ शील, संकोच, अत्यंत सरल स्वभाव और कृपा-स्नेहके घर हैं। उन्होंने शत्रुका भी कभी बुरा नहीं किया। मैं भले टेढ़ा हूँ, पर हूँ तो उनका बच्चा और सेवक ही।

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥

आप सब भी इसीमें मेरा भला मानकर मुझे मीठी वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दें, ताकि मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास मानकर राम फिर राजधानी लौट आएँ।

दोहा

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस१८३

यद्यपि मेरा जन्म बुरी माँसे हुआ है और मैं खुद भी दुष्ट और दोषी हूँ, फिर भी मुझे भरोसा है कि राघुनाथ मुझे अपना जानकर कभी नहीं त्यागेंगे।

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥

भरतके यह वचन सबको प्यारे लगे, मानो वे रामके प्रेमरूपी अमृतमें डूबे हों। रामवियोगके भारी विषसे जले हुए सब लोग मानो बीजमंत्र सुनते ही जाग उठे।

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥भरतहि कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही॥

माता, मंत्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष - सब स्नेहके मारे बहुत व्याकुल हो उठे। सब भरतकी बार-बार सराहना करते हुए कहते हैं कि आपका शरीर तो साक्षात रामप्रेमकी मूरत ही है।

तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥जो पावर अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई॥

तात भरत, आप ऐसा क्यों न कहें, राम को आप प्राणोंके समान प्रिय हैं। जो मूर्ख अपनी नादानीमें आपकी माताकी कुटिलताको लेकर आपपर शक करेगा,

सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥

वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकमें ही बसेगा। जैसे साँपके पाप-अवगुणको मणि ग्रहण नहीं करती, बल्कि वह विष हर लेती है और दुख-दरिद्रता जला देती है।

दोहा

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह१८४

भरत, वनको जरूर चलिए जहाँ राम हैं - आपने बहुत अच्छी सलाह दी। शोकसागरमें डूबते हुए सबको आपने बड़ा सहारा दिया है।

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥

सबके मनमें अपार आनंद हुआ, मानो बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनकर पपीहा और मोर खुश हो उठे हों। सुबह चलनेका यह सुंदर निर्णय देखकर भरत सबको प्राणप्रिय हो गए।

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥

मुनि वसिष्ठको प्रणाम करके और भरतको सिर नवाकर सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर चले। कहते जाते हैं - भरतका जीवन धन्य है, ऐसा कहकर सब उनके शील-स्नेहकी सराहना करते जाते हैं।

कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चले कर साजहिं साजू॥जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥

आपसमें कहते हैं - बड़ा काम हो गया, सब चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसे भी घरकी रखवालीके लिए रोका जाता, वह मानो अपनी गर्दन कटती महसूस करता।

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू॥

कोई-कोई कहते हैं - किसीको भी रुकनेको मत कहो, संसारमें जीवनका यह लाभ भला कौन नहीं चाहता।

दोहा

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ१८५

वह संपत्ति, घर, सुख, मित्र, माता-पिता-भाई जल जाएँ जो रामके चरणोंकी ओर बढ़नेमें हँसते-हँसते साथ न दें।

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना॥भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू॥

घर-घर लोग तरह-तरहकी सवारियाँ सजा रहे हैं, हृदयमें हर्ष है कि सुबह चलना है। भरतने घर जाकर सोचा - नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना सब,

संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही॥तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥

यह सारी संपत्ति तो रघुनाथकी है। यदि इसकी व्यवस्था किए बिना यूँ ही छोड़कर चल दूँ, तो अंततः इसमें मेरी भलाई नहीं - स्वामीका द्रोह तो सबसे बड़ा पाप है।

करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥

सेवक वही है जो स्वामीका भला करे, चाहे कोई उसे करोड़ों दोष क्यों न दे। ऐसा सोचकर भरतने ऐसे विश्वस्त सेवकोंको बुलाया जो कभी सपनेमें भी अपने कर्तव्यसे नहीं डिगे थे।

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा॥करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे॥

सब भेद और उत्तम कर्तव्य समझाकर, जो जिस लायक था उसे वही जिम्मेदारी सौंपी। पूरी व्यवस्था करके, रखवाले नियुक्त करके भरत रामकी माता कौसल्याके पास गए।

दोहा

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान१८६

स्नेहके जानकार भरतने सब माताओंको दुखी जानकर उनके लिए पालकियाँ और सुखासन तैयार करवाने को कहा।

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी॥जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना॥

नगरके स्त्री-पुरुष चकवा-चकवीकी तरह हृदयमें व्याकुल होकर सुबह होनेकी राह देख रहे हैं। सारी रात जागते-जागते सुबह हो गई, तब भरतने चतुर मंत्रियोंको बुलाया।

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू॥बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥

और कहा - तिलकका सब सामान ले चलो, वनमें ही मुनि वसिष्ठ राम को राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियोंने प्रणाम किया और तुरंत घोड़े, रथ, हाथी सजा दिए।

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ॥बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना॥

सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठ अरुंधती और अग्निहोत्रकी सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले, फिर तप और तेजके भंडार सभी ब्राह्मण अलग-अलग सवारियोंपर चढ़कर चले।

नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना॥सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी॥

नगरके सब लोग तैयार होकर चित्रकूटकी ओर चल पड़े। सुंदर पालकियोंपर चढ़कर सब रानियाँ चलीं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ१८७

विश्वस्त सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक विदा करके, राम-सीताके चरणोंका स्मरण करते हुए भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चल पड़े।

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥

राम दर्शनकी चाहमें सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी पानी देखकर दौड़ पड़े हों। सीता-राम वनमें हैं यह सोचकर छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरत भी पैदल ही चल रहे हैं।

देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे॥जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली॥

उनका यह स्नेह देखकर लोग भी भाव-विभोर हो उठे और घोड़े-हाथी-रथ छोड़कर पैदल चलने लगे। तब रामकी माता कौसल्या भरतके पास आकर, अपनी पालकी वहीं खड़ी करके कोमल वाणीमें बोलीं -

तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥

बेटा, रथपर चढ़ जाओ, माता तुम्हारी बलैया लेती है, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी होगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सब लोग पैदल चलेंगे, शोकसे दुबले हुए यह सब पैदल चलनेके लायक नहीं हैं।

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई॥तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू॥

माताकी आज्ञा मानकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चल पड़े। पहला दिन तमसा नदीपर बिताया, दूसरा गोमती तटपर।

दोहा

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग१८८

कोई सिर्फ दूध पीते, कोई फलाहार करते, और कुछ रातमें एक ही बार भोजन करते - राम के लिए सब गहने-भोग छोड़कर ऐसे नियम-व्रत निभा रहे हैं।

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥

रातभर सई नदीके किनारे रुककर सुबह वहाँसे चल दिए और सब श्रृंगवेरपुरके पास पहुँच गए। निषादराजने यह खबर सुनी तो दुखी मनसे सोचने लगा -

कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं॥जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥

भरत वनको क्यों जा रहे हैं, मनमें जरूर कोई कपट है। अगर मनमें खोट न होती तो साथ सेना क्यों लाए हैं?

जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥

समझते होंगे कि लक्ष्मणसहित राम को मारकर आराम से निष्कंटक राज्य करूँगा। भरतने राजनीतिका विचार ही मनमें नहीं रखा - पहले कलंक लगा था, अब जान ही जाएगी।

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा॥का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं॥

सारे देवता-दानव मिलकर भी लड़ें तो राम को युद्धमें कोई नहीं जीत सकता। भरत ऐसा कर रहे हैं तो इसमें अचरज क्या, विषकी बेल कभी अमृत-फल नहीं देती।

दोहा

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु१८९

ऐसा सोचकर गुहने अपनी जातिवालोंसे कहा - सब सावधान हो जाओ, नावें अपने कब्जेमें कर लो, फिर उन्हें डुबा दो और सारे घाट रोक दो।

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥

तैयार होकर घाट रोक लो, सब मरनेकी तैयारी कर लो। मैं भरतसे आमने-सामने भिड़ूँगा और जीते-जी उन्हें गंगापार नहीं उतरने दूँगा।

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा॥भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥

युद्धमें मरना, फिर गंगातट, राम का काम और यह क्षणभंगुर शरीर - भरत तो राम के भाई और राजा हैं, और मैं तुच्छ सेवक, ऐसी मृत्यु तो बड़े भाग्यसे मिलती है।

स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥

मैं स्वामीके काज के लिए रणमें लड़ूँगा और चौदहों लोकोंमें अपने यशसे नाम रोशन करूँगा। रघुनाथके लिए प्राण त्याग दूँगा - मेरे तो दोनों हाथ लड्डू हैं, जीता तो सेवकका यश, मरा तो रामकी सेवा।

साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥

जिसकी गिनती साधुओंके बीच नहीं और जिसका नाम रामभक्तोंमें नहीं, वह जीते-जी धरतीका बोझ है, माताके यौवनरूपी पेड़को काटनेवाली कुल्हाड़ी है।

दोहा

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु१९०

यह सोचकर निषादराज विषादसे मुक्त हो गया, सबका उत्साह बढ़ाकर और राम को स्मरण करके उसने तुरंत तरकस, धनुष और कवच माँगा।

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ॥भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा॥

बोला - भाइयो, जल्दी करो, हथियार सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई डरे नहीं। सब हर्षसे बोल उठे - बहुत अच्छा नाथ, और एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे।

चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं॥

निषादराजको प्रणाम कर-करके सब निषाद चल पड़े, सब बड़े शूरवीर हैं जिन्हें युद्धकी लड़ाई भाती है। राम के चरणकमलोंकी खड़ाऊँ याद करके उन्होंने तरकस बाँधे और धनुषोंपर प्रत्यंचा चढ़ाई।

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥

कवच पहनकर सिरपर टोप रख लिया, फरसे-भाले-बरछे तैयार कर लिए। कुछ तलवारके वार रोकनेमें बड़े कुशल हैं, ऐसे उत्साहमें हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद रहे हों।

निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई॥देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने॥

अपना-अपना साज-सामान सजाकर सब निषादराज गुहके पास जाकर जोहार करने लगे। सुंदर योद्धाओंको देखकर गुहने सबको सुयोग्य समझा और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया।

दोहा

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि१९१

बोला - भाइयो, आज धोखा मत करना, मेरा बड़ा काम है। यह सुनकर सब योद्धा जोशमें बोल पड़े - वीर, अधीर मत हो।

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥

नाथ, राम के प्रताप और आपके बलसे हम भरतकी सेनाको वीर और घोड़े दोनोंसे खाली कर देंगे, जीते-जी पीछे पाँव नहीं रखेंगे, धरतीको रुंड-मुंडसे भर देंगे।

दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥

निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर लड़ाईका ढोल बजवाया। इतना कहते ही बाईं ओर छींक हुई, शकुन देखनेवालोंने कहा कि यह शुभ संकेत है।

बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥

एक बूढ़ेने शकुन देखकर कहा - भरतसे मिल लो, लड़ाई नहीं होगी। भरत तो राम को मनाने जा रहे हैं, शकुन कहता है कोई विरोध नहीं है।

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥

यह सुनकर गुहने कहा - बूढ़ा सही कह रहा है, जल्दबाजीमें किया काम मूर्ख बादमें पछताते हैं। भरतका स्वभाव बिना जाने-समझे लड़ना बड़ी हानि होगी।

दोहा

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ१९२

इसलिए वीरो, तुम सब घाट रोककर इकट्ठे रहो, मैं जाकर भरतसे मिलकर उनका मन टटोलता हूँ। मित्र हैं, शत्रु हैं या उदासीन - यह समझकर ही आगे जो करना होगा करूँगा।

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥

उनके सुंदर स्वभावसे ही मैं उनका स्नेह पहचान लूँगा, वैर और प्रेम छिपाए नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान जुटाने लगा - कंद, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाए।

मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥

कहार लोग बड़ी-बड़ी पुरानी मछलियोंके भार भर-भरकर लाए। भेंटका सामान सजाकर वे मिलनेको चले, और रास्तेमें शुभ शकुन मिले।

देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥

दूर से देखकर उसने अपना नाम बताया और मुनि वसिष्ठको दंडवत प्रणाम किया। मुनिने उसे रामका प्रिय जानकर आशीर्वाद दिया और भरतको समझाकर बताया कि यह राम का मित्र है।

राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥

यह राम का मित्र है, सुनते ही भरतने रथ छोड़ दिया और प्रेममें उमड़ते हुए उतरकर चल पड़े। गुहने अपना गाँव, जाति और नाम बताकर धरतीपर माथा टेककर जोहार की।

दोहा

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ१९३

उसे दंडवत करते देखकर भरतने उठाकर छातीसे लगा लिया, मानो लक्ष्मणसे ही भेंट हो गई हो, हृदयमें प्रेम समाया नहीं जा रहा।

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम के रीती॥धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥

भरत उसे बड़े प्रेमसे गले लगा रहे हैं, लोग इस प्रेमकी रीति देखकर मुग्ध हो रहे हैं। देवता 'धन्य-धन्य' कहकर सराहते हुए फूल बरसा रहे हैं।

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥

जो लोक और वेद दोनोंमें सबसे नीचा माना जाता है, जिसकी छाया छू जाए तो स्नान करना पड़े, उसी निषादको राम के छोटे भाई भरत बाँहोंमें भरकर, शरीरमें रोमांच लिए गले लगा रहे हैं।

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥

जो राम-राम कहकर जँभाई भी लेते हैं, उनके सामने पापोंका ढेर भी नहीं टिकता। फिर इस गुहको तो राम ने खुद हृदयसे लगा लिया और उसके पूरे कुलको जगत्-पावन बना दिया।

करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥

कर्मनाशा नदीका पानी जब गंगामें मिल जाता है तो उसे भी कौन सिरपर नहीं चढ़ाता? दुनिया जानती है कि उलटा नाम जपते-जपते वाल्मीकि ब्रह्मके समान हो गए।

दोहा

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावर कोल किरात।रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात१९४

चांडाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात-जैसे मूर्ख और नीच भी रामनाम लेते ही परम पवित्र होकर तीनों लोकोंमें विख्यात हो जाते हैं।

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं॥

इसमें कोई अचरज नहीं, यह तो युगों-युगोंसे चली आ रही रीति है - राम ने किसे बड़ाई नहीं दी? देवता रामनामकी यह महिमा कह रहे हैं, और सुन-सुनकर अयोध्यावासी सुखी हो रहे हैं।

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥

राम के मित्र निषादराजसे प्रेमपूर्वक मिलकर भरतने कुशल-मंगल पूछी। भरतका शील-स्नेह देखकर निषाद उस पल देहकी सुध भूल गया।

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥

उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनंद इतना बढ़ गया कि वह टकटकी लगाए भरतको देखता खड़ा रह गया। फिर धीरज धरकर, चरण वंदन करके प्रेमसे हाथ जोड़कर विनती करने लगा -

कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥

प्रभु, कुशलके मूल आपके चरणकमल देखकर मैंने तीनों कालोंमें अपनी कुशलता जान ली। अब आपकी परम कृपासे मेरे करोड़ों कुलोंका कल्याण हो गया।

दोहा

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ१९५

अपनी करनी और कुल सोचकर, और प्रभुकी महिमा हृदयमें तौलकर - जो रघुवीरके चरणोंका भजन नहीं करता, वह इस संसारमें विधाताके हाथों ठगा गया समझो।

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥

मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और नीच जातिका हूँ, लोक और वेद दोनोंसे बाहर हूँ, पर जबसे राम ने मुझे अपनाया है तभीसे मैं संसारका भूषण बन गया।

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥

उसका प्रेम और सुंदर विनय देखकर फिर भरतके छोटे भाई शत्रुघ्न भी उससे मिले। निषादने अपना नाम बताकर आदरपूर्वक सब रानियोंको जोहार की।

जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥

रानियाँ उसे लक्ष्मणके समान मानकर आशीर्वाद देती हैं - सौ लाख वर्ष सुखसे जिओ। नगरके स्त्री-पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए मानो लक्ष्मणको ही देख रहे हों।

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥

सब कहते हैं - जीवनका असली लाभ तो इसीने पाया, जिसे राम ने बाँहों भरकर गले लगाया। निषाद अपने भाग्यकी यह बड़ाई सुनकर मनमें फूला न समाया और सबको साथ लेकर चल पड़ा।

दोहा

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ१९६

उसने इशारेसे अपने सब सेवकोंको बता दिया, वे स्वामीका इशारा पाकर चल दिए और घरों, पेड़ोंके नीचे, तालाबों, बागों और जंगलोंमें ठहरनेकी जगह बना दी।

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥सोहत दिए निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥

भरतने जब श्रृंगवेरपुर देखा तो प्रेमके मारे उनका पूरा शरीर शिथिल हो गया। वे निषादके कंधेपर हाथ रखे ऐसे शोभित हो रहे थे मानो विनय और प्रेम ने खुद शरीर धारण कर लिया हो।

एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥

इस तरह पूरी सेना साथ लेकर भरतने जगत्को पवित्र करनेवाली गंगाके दर्शन किए, रामघाटपर प्रणाम किया - मन इतना आनंदमग्न हुआ मानो राम से ही भेंट हो गई हो।

करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥

नगरके स्त्री-पुरुष प्रणाम कर रहे हैं और गंगाके पवित्र जलको देखकर आनंदित हो रहे हैं। स्नान करके हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि रामके चरणोंमें उनका प्रेम कभी कम न हो।

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥

भरतने कहा - हे गंगे, तुम्हारी रज सबको सुख देनेवाली और सेवकके लिए कामधेनु समान है। हाथ जोड़कर मैं यही वरदान माँगता हूँ कि सीता-रामके चरणोंमें मेरा सहज प्रेम बना रहे।

दोहा

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ१९७

इस तरह स्नान करके, गुरुकी आज्ञा पाकर और यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, भरत डेरा उठाकर आगे चल दिए।

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥

लोगोंने जहाँ-तहाँ अपना डेरा डाल दिया, भरतने सबकी खोज-खबर ली। फिर देवपूजा करके आज्ञा पाकर दोनों भाई रामकी माता कौसल्याके पास गए।

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥

चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतने सब माताओंका सम्मान किया, फिर भाई शत्रुघ्नको माताओंकी सेवा सौंपकर खुद निषादको बुला लिया।

चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें॥पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥

सखा निषादसे हाथ मिलाए भरत चल रहे हैं, प्रेम इतना गहरा है कि शरीर शिथिल हुआ जा रहा है। सखासे पूछते हैं - मुझे वह जगह दिखाओ, नेत्र और मनकी जलन थोड़ी ठंडी करो।

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥

जहाँ सीता, राम और लक्ष्मण रातको सोए थे। इतना कहते ही उनकी आँखोंमें आँसू भर आए। भरतके यह वचन सुनकर निषाद भी विषादमें डूब गया और तुरंत उन्हें वहाँ ले गया।

दोहा

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु१९८

जहाँ पवित्र अशोक वृक्षके नीचे राम ने विश्राम किया था, वहाँ भरतने अत्यंत प्रेमसे आदरपूर्वक दंडवत प्रणाम किया।

कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥

कुशकी सुंदर बिछी शय्या देखकर उसकी परिक्रमा करके प्रणाम किया, राम के चरण-चिह्नोंकी धूल आँखोंमें लगाई - उस समयका प्रेम कहते नहीं बनता।

कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥

दो-चार सोनेके कण देखकर भरतने उन्हें सीता समझकर सिरपर रख लिया। आँखें आँसुओंसे भरी, हृदयमें ग्लानि लिए वे सखासे कहने लगे -

श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥

यह सोनेके कण भी सीताके विरहमें ऐसे फीके पड़ गए हैं जैसे रामके वियोगमें अयोध्याके नर-नारी क्षीण हो रहे हैं। जिनके पिता स्वयं राजा जनक हैं, भोग और योग दोनों जिनकी मुट्ठीमें हैं - उन जनकको मैं किससे उपमा दूँ?

ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई॥

जिनके ससुर सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथ हैं, जिन्हें इंद्र भी ईर्ष्यासे देखते थे, और जिनके प्राणनाथ स्वयं रघुनाथ हैं - जो इतने महान हैं कि जो कोई भी बड़ा बनता है, राम की ही कृपासे बनता है।

दोहा

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।बिहरत हृदय न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि१९९

उन पतिव्रताओंकी शिरोमणि सीताकी यह कुशशय्या देखकर भी मेरा हृदय फट नहीं जाता - यह वज्रसे भी कठोर है।

लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे॥

मेरे छोटे भाई लक्ष्मण इतने सुंदर और प्यारे हैं कि ऐसा भाई न कभी हुआ, न है, न होगा। जो अवधवासियोंके प्रिय, माता-पिताके दुलारे और सीता-रामके प्राणप्रिय हैं,

मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥

जिनकी देह कोमल और स्वभाव सुकुमार है, जिन्हें कभी गरम हवा तक नहीं लगी, वे आज वनमें हर तरहकी विपत्ति झेल रहे हैं - मेरी यह छाती करोड़ों वज्रोंसे भी कठोर निकली कि अब तक फटी नहीं।

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥

राम ने जन्म लेकर संसारको उजागर कर दिया, वे रूप, शील, सुख और सारे गुणोंके सागर हैं। नगरवासी, कुटुंबी, गुरु, माता-पिता - सबके लिए उनका स्वभाव सुखदायी है।

बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥

शत्रु भी राम की बड़ाई करते हैं, उनकी बोलचाल और विनय मन मोह लेती है। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेष मिलकर भी प्रभुके गुणोंकी गिनती नहीं कर सकते।

दोहा

सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान२००

सुखस्वरूप, रघुवंशशिरोमणि, मंगल और आनंदके भंडार राम धरतीपर कुशा बिछाकर सोते हैं - विधाताकी गति सचमुच बड़ी बलवान है।

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥

राम ने कभी कानोंसे भी दुखका नाम नहीं सुना था, राजा स्वयं जीवन-वृक्षकी तरह उनकी देखभाल करते थे, और सब माताएँ रात-दिन ऐसे सँभालती थीं जैसे पलक आँखोंकी और साँप अपनी मणिकी रखवाली करता है।

ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी॥धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला॥

वही राम अब जंगलोंमें पैदल भटक रहे हैं, कंद-मूल-फल खाकर गुजारा कर रहे हैं। अमंगलकी जड़ कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रिय पतिके ही विरुद्ध हो गई।

मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥

मुझ पापी अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण यह सब उत्पात हुआ। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर सृजा और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया।

सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥

यह सुनकर निषादराज प्रेमसे समझाने लगा - नाथ, व्यर्थ विषाद क्यों करते हैं? राम आपको प्रिय हैं और आप राम को प्रिय हैं, यही सच है - दोष तो प्रतिकूल विधाताका है।

छंद

बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी।तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ।परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥

प्रतिकूल विधाताकी करनी कठोर है, जिसने माताको बावली बना दिया। उस रात प्रभु बार-बार आदरपूर्वक आपकी सराहना करते रहे। तुलसीदास कहते हैं - राम को आपसे बढ़कर प्रिय कोई नहीं, यह मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। अंत भला होगा, यह जानकर हृदयमें धीरज रखिए।

सोरठा

अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन२०१

राम अंतर्यामी हैं और संकोच, प्रेम व कृपाके धाम हैं - यह सोचकर, मनमें दृढ़ता लाकर चलिए और विश्राम कीजिए।

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥

सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर राम को स्मरण करते हुए भरत डेरेकी ओर चले। यह खबर पाकर नगरके स्त्री-पुरुष भी बड़ी व्याकुलतासे उस स्थानको देखने चल पड़े।

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥भरि भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं॥

वे उस जगहकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको खूब कोसते हैं। आँखोंमें आँसू भर-भरकर प्रतिकूल विधाताको दोष देते हैं।

एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥

कोई भरतके स्नेहकी सराहना करता है, कोई कहता है राजाने प्रेम खूब निभाया। सब खुदकी निंदा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं - उस पलके विमोह और विषादको कोई बयान नहीं कर सकता।

एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥

इस तरह सारी रात सब जागते रहे, सुबह होते ही नाव चलनी शुरू हुई। पहले सुंदर नावपर गुरुको चढ़ाया, फिर नई नावपर सब माताओंको चढ़ाया।

दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥

चार घड़ीमें सब गंगापार हो गए, तब भरतने उतरकर सबको सँभाला।

दोहा

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ२०२

प्रातःक्रिया करके, माताके चरण छूकर और गुरुको सिर नवाकर भरतने निषादगणोंको आगे कर लिया और सेनाको चला दिया।

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥

निषादराजको आगे करके सब माताओंकी पालकियाँ चलाईं। छोटे भाई शत्रुघ्नको बुलाकर साथ ले लिया, फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुने प्रस्थान किया।

आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरि लखन सहित सिय रामू॥गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥

भरतने खुद गंगाको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित सीता-रामका स्मरण किया। वे खुद पैदल चले, साथमें बिना सवारीके घोड़े बागडोरसे बँधे चल रहे थे।

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥

अच्छे सेवक बार-बार कहते हैं - नाथ, घोड़ेपर सवार हो जाइए। भरत कहते हैं - राम तो पैदल गए और हमारे लिए रथ-हाथी-घोड़े सजाए गए हैं!

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥

मुझे तो उचित यह है कि सिरके बल चलूँ, सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतकी यह दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवक ग्लानिसे गड़े जा रहे हैं।

दोहा

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग२०३

प्रेममें उमड़ते हुए बार-बार 'सीताराम-सीताराम' कहते हुए भरतने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया।

झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥

उनके पैरोंमें छाले ऐसे चमक रहे हैं जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदें। भरत आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह सुनकर सारा समाज दुखी हो गया।

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥

जब पता चला कि सब लोग स्नान कर चुके हैं, तब त्रिवेणीपर आकर प्रणाम किया, फिर विधिपूर्वक गंगा-यमुनाके संगमजलमें स्नान करके दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया।

देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥

श्याम और सफेद लहरोंको देखकर भरतका शरीर रोमांचित हो उठा, हाथ जोड़कर बोले - हे तीर्थराज, आप सब कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं, आपका प्रभाव वेदोंमें और संसारमें प्रसिद्ध है।

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥

मैं अपना क्षत्रिय-धर्म त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ - दुखी मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? यह जानकर सुजान दानी संसारमें माँगनेवालेकी बात हमेशा पूरी कर देते हैं।

दोहा

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन२०४

मुझे न अर्थकी चाह है, न धर्मकी, न कामकी, न मोक्षकी - बस जन्म-जन्ममें राम के चरणोंमें मेरा प्रेम बना रहे, यही वरदान माँगता हूँ, और कुछ नहीं।

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥

राम भले मुझे कुटिल समझें और लोग भले गुरुद्रोही-स्वामिद्रोही कहें, पर सीता-रामके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे।

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पति पाहन डारउ॥चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई॥

बादल चाहे जन्मभर चातकको भुला दे और पानी माँगनेपर पत्थर बरसाए, पर चातकका रटना कम हो जाए तो उसकी अपनी ही प्रतिष्ठा घट जाएगी - उसके लिए तो प्रेम बढ़ाते जाना ही सब तरहसे भला है।

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥

जैसे तपानेसे सोनेमें चमक आती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें नेम निभानेसे सेवककी शोभा बढ़ती है। भरतके यह वचन सुनकर त्रिवेणीके बीचसे एक कोमल, मंगलमय वाणी गूँजी -

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥

तात भरत, तुम हर तरहसे साधु हो, राम के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम अथाह है। मनमें व्यर्थ ग्लानि मत करो, राम को तुम्हारे समान प्रिय कोई और नहीं।

दोहा

तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल२०५

त्रिवेणीके यह अनुकूल वचन सुनकर भरतका शरीर रोमांचित हो उठा, हृदयमें हर्ष छा गया। देवता 'भरत धन्य हैं, धन्य हैं' कहकर हर्षसे फूल बरसाने लगे।

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा॥

तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और संन्यासी सब बहुत आनंदित हैं, दस-पाँच मिलकर आपसमें कहते हैं - भरतका प्रेम और शील सच्चा और पवित्र है।

सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥

राम के सुंदर गुणोंकी चर्चा सुनते-सुनते वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजके पास आए। मुनिने भरतको दंडवत करते देखा और उसे अपना साक्षात सौभाग्य समझा।

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥

उन्होंने दौड़कर भरतको उठाया, गले लगाया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। आसन दिया, भरत सिर नवाकर ऐसे बैठे मानो संकोचकी ओटमें छिप जाना चाहते हों।

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥

उनके मनमें बड़ी चिंता है कि मुनि क्या पूछेंगे। भरतका शील-संकोच देखकर ऋषि बोले - सुनो भरत, हमें सब खबर मिल चुकी है, विधाताके किए पर किसीका वश नहीं चलता।

दोहा

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति।तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति२०६

मनमें ग्लानि मत करो, माताकी करनी याद करके। तात, कैकेयीका दोष नहीं, उसकी बुद्धि ही बिगड़ गई थी।

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ॥तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥

यह कहते भी कोई बुरा नहीं मानेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही इसे मानते हैं। पर तात, तुम्हारा निर्मल यश गाकर लोक और वेद दोनोंको ही बड़ाई मिलेगी।

लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥

लोक और वेद दोनों यही मानते और कहते हैं कि पिता जिसे राज्य दे वही उसे पाता है। राजा सत्यव्रती थे, तुम्हें बुलाकर राज्य देते तो सुख मिलता, धर्म बचता और बड़ाई होती।

राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥

सारे अनर्थकी जड़ तो राम का वनगमन है, जिसे सुनकर पूरा संसार व्यथित हो उठा। वह भी भावीवश ही हुआ, नादान रानीने कुचाल करके अंततः पछताया ही।

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥

उसमें भी तुम्हारा तनिक अपराध कहे तो वह मूर्ख और नीच है। तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न लगता, सुनकर राम को भी संतोष ही होता।

दोहा

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु२०७

भरत, अब तो तुमने बहुत अच्छा किया, यही तुम्हारे लिए उचित था। राम के चरणोंमें प्रेम होना ही संसारके सब मंगलोंकी जड़ है।

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥

वह प्रेम ही तुम्हारा धन, जीवन और प्राण है, तुम्हारे समान भाग्यशाली कौन होगा? तात, यह आश्चर्यकी बात नहीं - तुम दशरथके पुत्र और राम के प्रिय भाई हो।

सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥

सुनो भरत, राम के मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र कोई और नहीं। लक्ष्मण, राम और सीता तीनोंकी वह सारी रात तुम्हारी सराहना करते ही बीती।

जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥

प्रयागमें स्नान करते समय ही मैंने यह भेद जान लिया कि वे तुम्हारे प्रेममें ही डूबे रहते हैं। तुमपर रघुनाथका ऐसा गहरा स्नेह है जैसा किसी मूर्ख मनुष्यका संसारके सुखभरे जीवनपर होता है।

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥

यह रघुनाथकी कोई बड़ी बात नहीं, वे तो शरणागतके पूरे कुटुंबको पालनेवाले हैं। भरत, मेरा तो यही मत है कि तुम स्वयं शरीरधारी रामप्रेम ही हो।

दोहा

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु२०८

भरत, तुम्हारी नजरमें यह भले कलंक हो, पर हम सबके लिए तो यह उपदेश है। रामभक्तिकी सिद्धिके लिए यह घड़ी बड़ी शुभ साबित हुई है।

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥

तात, तुम्हारा यश निर्मल नए चाँदकी तरह है, राम के सेवक उसके कुमुद और चकोर हैं। यह चाँद कभी अस्त नहीं होगा, हमेशा उदय ही रहेगा, संसाररूपी आकाशमें घटेगा नहीं, दिन-दिन दूना ही बढ़ेगा।

कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥

तीनों लोकरूपी चकवा इस चाँदपर खूब प्रेम करेगा, और प्रभुके प्रतापरूपी सूरज इसकी चमक कभी नहीं छीनेगा। यह रात-दिन सबको सुख देगा, कैकेयीके कुकर्मरूपी राहु इसे कभी नहीं ग्रसेगा।

पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥राम भगत अब अमिअ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥

यह चाँद राम के सुंदर प्रेमरूपी अमृतसे भरा है, गुरु-अपमानके दोषसे बिल्कुल दूषित नहीं। तुमने इसे रचकर धरतीपर भी अमृत सुलभ कर दिया - अब राम-भक्त इससे तृप्त हों।

भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी॥दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥

राजा भगीरथ गंगाको लाए, जिनका स्मरण ही सब मंगलोंकी खान है। दशरथके गुणोंका तो वर्णन ही नहीं हो सकता, इससे बढ़कर क्या कहें, जिनकी बराबरी करनेवाला संसारमें कोई नहीं।

दोहा

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ२०९

जिनके प्रेम और संकोचके वश होकर स्वयं भगवान राम प्रकट होकर आए, जिन्हें शिव भी अपने हृदयकी आँखोंसे देखते-देखते कभी तृप्त नहीं हुए,

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥

उनसे भी बढ़कर तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चाँद उत्पन्न किया, जिसमें रामप्रेम ही मृगचिह्नके रूपमें बसता है। तात, तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि पाल रहे हो, पारस पाकर भी दरिद्रतासे डर रहे हो।

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥

सुनो भरत, हम झूठ नहीं कहते - हम उदासीन हैं, तपस्वी हैं और वनवासी हैं, हमें किसी पक्षका मोह नहीं। हमारे सारे साधनोंका सबसे सुंदर फल तो लक्ष्मण, राम और सीताका यह दर्शन ही है।

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ॥

उस फलका भी परम फल है यह तुम्हारा दर्शन - प्रयागसहित हमारा यह बड़ा सौभाग्य है। भरत, तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत जीत लिया है। ऐसा कहते-कहते मुनि प्रेममें डूब गए।

सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥

मुनिके यह वचन सुनकर सभासद हर्षित हो उठे, साधु-साधु कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाए। आकाश और प्रयागमें गूँजती 'धन्य-धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरत प्रेममें डूबे जा रहे हैं।

दोहा

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन२१०

भरतका शरीर पुलकित है, हृदयमें सीता-राम बसे हैं, कमल-जैसे नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। मुनियोंकी मंडलीको प्रणाम करके वे गदगद वाणीमें बोले -

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥

यह मुनियोंका समाज है और तीर्थराज प्रयाग है, यहाँ झूठी सौगंध तो दूर, सच्ची सौगंधसे भी बड़ा नुकसान होता है। इस पवित्र स्थानपर यदि कुछ बनावटी कहूँ तो इससे बड़ा पाप और कुछ नहीं होगा।

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥

मैं सच्चे मनसे कहता हूँ - आप सर्वज्ञ हैं और रघुनाथ स्वयं हृदयकी बात जाननेवाले हैं। मुझे माताकी करनीका कोई सोच नहीं, न इस बातका दुख कि संसार मुझे बुरा समझेगा।

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥

न मुझे परलोक बिगड़नेका डर है, न पिताके मरनेका शोक - क्योंकि उनका पुण्य और सुयश तीनों लोकोंमें सुशोभित है, उन्होंने राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र पाए।

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही॥

फिर जिन्होंने राम के विरहमें अपना क्षणभंगुर शरीर त्याग दिया, उस राजाके लिए सोच कैसा? सोच तो इस बातका है कि राम, लक्ष्मण और सीता बिना जूतोंके, मुनि-वेष धारण किए वन-वनमें भटक रहे हैं।

दोहा

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात२११

वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फल खाते हैं, धरतीपर कुश-पत्ते बिछाकर सोते हैं, पेड़ोंके नीचे रहते हुए नित्य सर्दी-गर्मी-बरसात-हवा सहते हैं।

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥

इसी दुखकी आगमें मेरी छाती दिन-रात जलती रहती है, न दिनमें भूख लगती है न रातको नींद आती है। मैंने मन-ही-मन पूरा संसार खोज डाला, पर इस बीमारीकी दवा कहीं नहीं मिली।

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु॥

माताका कुविचार ही सबसे बड़ा बढ़ई है, जिसने हमारे हित नामका बसूला बनाया, फिर उससे कलहरूपी कुयंत्र बनाकर चौदह वर्षकी कठिन अवधिरूपी मंत्र पढ़कर उसे गाड़ दिया।

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥

मेरे लिए ही उसने यह सारा कुचक्र रचा और पूरे संसारको छिन्न-भिन्न करके तबाह कर दिया। यह कुयोग राम के लौटनेपर ही मिट सकता है, तभी अयोध्या फिर बस सकती है, और किसी उपायसे नहीं।

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई॥तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥

भरतके यह वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सबने उनकी खूब सराहना की। तात, बहुत ज्यादा सोच मत करो, राम के चरणोंका दर्शन होते ही सारा दुख मिट जाएगा।

दोहा

करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु२१२

इस तरह मुनिश्रेष्ठने समझाकर कहा - अब आप हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनें और कृपा करके जो कंद-मूल-फल हम दें, स्वीकार करें।

सुनि मुनि बचन भरत हिये सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥

मुनिकी यह बात सुनकर भरतके मनमें सोच हुआ कि यह कैसा बेमौका संकोच आ पड़ा। फिर गुरुजनकी बातको महत्त्व देकर, चरण वंदन करके हाथ जोड़े बोले -

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा॥भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए॥

नाथ, आपकी आज्ञा शिरोधार्य करना ही हमारा परम धर्म है। भरतकी यह बात मुनिको बहुत भाई, उन्होंने अपने विश्वस्त सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया।

चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई॥भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥

कहा - भरतकी आवभगत करनी चाहिए, जाकर कंद-मूल-फल ले आओ। सबने 'बहुत अच्छा नाथ' कहकर सिर नवाया और खुशी-खुशी अपने-अपने काममें जुट गए।

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता॥सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाईं॥

मुनिको चिंता हुई कि मेहमान तो बहुत बड़ा है, उसकी पूजा भी वैसी ही होनी चाहिए। यह सुनते ही ऋद्धियाँ और अणिमा-जैसी सिद्धियाँ आ पहुँचीं और बोलीं - गोसाईं, जो आज्ञा हो सो हम करें।

दोहा

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज२१३

मुनिराज प्रसन्न होकर बोले - शत्रुघ्न और समाजसहित भरत राम के विरहमें व्याकुल हैं, इनकी आवभगत करके इनकी थकान दूर करो।

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥

ऋद्धि-सिद्धियोंने मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य करके खुदको बड़भागी माना। सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं - राम के छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं जिनकी तुलना ही नहीं हो सकती।

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू॥अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना॥

मुनिके चरण वंदन करके आज वही करना चाहिए जिससे सारा राजसमाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने ऐसे सुंदर भवन रच दिए कि देखकर विमान भी लजा जाएँ।

भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे॥दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें॥

उनमें इतने भोग-वैभव भरकर रखे कि देवता भी देखकर ललचा उठें। दासी-दास सारा साज-सामान लिए हुए मन लगाकर उनकी हर इच्छा भाँप लेते रहे।

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं॥प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही॥

स्वर्गमें भी सपनेमें न मिलनेवाला ऐसा सुख-साज सिद्धियोंने पलभरमें सजा दिया। पहले सबको उनकी रुचिके अनुसार सुंदर, सुखद निवास दिए।

दोहा

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह२१४

फिर परिवारसहित भरतको भी वैसा ही स्थान दिया, क्योंकि ऋषिने पहले ही ऐसी आज्ञा दे रखी थी। मुनिश्रेष्ठने अपने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच डाला।

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी॥

जब भरतने मुनिका यह प्रभाव देखा तो उनके आगे सारे लोकपालोंके लोक भी तुच्छ जान पड़े। सुख-सामग्रीका वर्णन ही नहीं हो सकता, जिसे देखकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी वैराग्य भूल जाएँ।

आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना॥सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना॥

आसन, शय्या, सुंदर वस्त्र, चँदोवे, वन-बगीचे, तरह-तरहके पक्षी-पशु, सुगंधित फूल, अमृत-जैसे मीठे फल, अनेक निर्मल जलाशय -

असन पान सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥

अमृतसे भी बढ़कर पवित्र खान-पानकी वस्तुएँ, जिन्हें देखकर लोग संयमी साधुओंकी तरह सकुचा रहे हैं। हर डेरेमें कामधेनु और कल्पवृक्ष जैसी वस्तुएँ हैं, जिन्हें देखकर इंद्र और उनकी पत्नी तक ललचा जाएँ।

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥

वसंत ऋतु है, शीतल-मंद-सुगंधित हवा बह रही है, सबको धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों सुलभ हैं। माला, चंदन, स्त्री-जैसे भोग देखकर लोग हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हैं।

दोहा

संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार२१५

संपत्ति चकवी है और भरत चकवा, मुनिकी आज्ञा मानो खेल है जिसने उस रात दोनोंको आश्रमरूपी पिंजरेमें बंद रखा और यूँ ही सुबह हो गई।

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥

सुबह भरतने तीर्थराजमें स्नान किया, समाजसहित मुनिको सिर नवाया, ऋषिकी आज्ञा और आशीर्वाद शिरोधार्य करके दंडवत करते हुए बहुत विनती की।

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥

फिर रास्ता जाननेवाले साथियोंको लेकर सब चित्रकूटकी ओर चित्त लगाए चल पड़े। भरत रामसखा गुहका हाथ थामे ऐसे चल रहे हैं मानो प्रेम स्वयं शरीर धारण किए हो।

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया॥लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी॥

न पैरोंमें जूते हैं, न सिरपर छाया - उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म पूरी तरह निष्कपट है। वे सखासे लक्ष्मण, राम और सीताके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीमें बताता जाता है।

राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं॥देखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला॥

राम के ठहरनेकी जगहों और पेड़ोंको देखकर उनके हृदयका प्रेम रोके नहीं रुकता। यह देखकर देवता फूल बरसाते हैं, धरती कोमल हो जाती है और रास्ता मानो मंगलकी जड़ बन जाता है।

दोहा

किए जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात२१६

बादल छाया कर रहे हैं, सुखद हवा बह रही है - भरतके जाते समय रास्ता जितना सुखद बना, उतना राम के लिए भी नहीं बना था।

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥

रास्तेमें अनगिनत जड़-चेतन जीव थे। जिन्हें प्रभुने देखा या जिन्होंने प्रभुको देखा, वे सब परमपदके अधिकारी बन गए। पर भरतके दर्शनने तो उनका जन्म-मरणका रोग ही मिटा दिया।

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥

भरतके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं, जिन्हें राम खुद अपने मनमें स्मरण करते हैं। संसारमें जो एक बार भी राम कह ले, वह भी तरने-तारनेवाला बन जाता है।

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥

फिर भरत तो राम के प्रिय और छोटे भाई हैं, तब उनके लिए रास्ता मंगलदायी क्यों न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कहते हैं और भरतको देखकर मनमें हर्षित होते हैं।

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥

भरतका यह प्रभाव देखकर इंद्रको चिंता हुई। संसार जैसा खुद होता है वैसा ही दूसरोंको देखता है। उसने गुरु बृहस्पतिसे कहा - प्रभु, ऐसा उपाय करें कि राम और भरतकी भेंट ही न हो।

दोहा

रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि२१७

राम संकोची और प्रेमके वश हैं, भरत प्रेमके सागर हैं - बनी-बनाई बात बिगड़नेको है, इसलिए कोई छल ढूँढ़कर उपाय करें।

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥

यह सुनते ही देवगुरु बृहस्पति मुस्कुराए, उन्होंने हजार आँखोंवाले इंद्रको समझका अंधा जाना और कहा - देवराज, माया के स्वामी राम के सेवकके साथ जो माया करता है, वह पलटकर खुद उसीपर आ पड़ती है।

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी॥सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥

पहले तो राम का रुख देखकर कुछ किया था, अब कुचाल करनेसे नुकसान ही होगा। सुनो देवराज, रघुनाथका स्वभाव यह है कि वे अपने खिलाफ किए अपराधसे कभी क्रोधित नहीं होते।

जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

पर जो कोई राम के भक्तका अपराध करता है, वह राम के क्रोधरूपी आगमें जल जाता है। लोक और वेद दोनोंमें यह कथा प्रसिद्ध है, इस महिमाको दुर्वासा जानते हैं।

भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥

सारा जगत राम को जपता है, और राम जिन्हें जपते हैं, उन भरतके समान राम का प्रेमी और कौन होगा?

दोहा

मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु२१८

देवराज, रघुकुलश्रेष्ठ राम के भक्तका काम बिगाड़नेकी बात मनमें भी मत लाओ - इससे लोकमें अपयश, परलोकमें दुख और दिन-ब-दिन शोक ही बढ़ेगा।

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई॥

सुनो देवराज, हमारा यह उपदेश सुनो - राम को अपना सेवक सबसे प्रिय है। वे सेवककी सेवासे सुख पाते हैं और सेवकसे वैर करनेको सबसे बड़ा वैर मानते हैं।

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥

यद्यपि वे समभाव हैं - न राग, न रोष, न किसीका पाप-पुण्य या गुण-दोष पकड़ते हैं। उन्होंने संसारमें कर्मको ही प्रधान बना रखा है, जो जैसा करता है वैसा ही फल पाता है।

तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस॥

फिर भी वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार अलग-अलग व्यवहार करते हैं। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस राम भक्तके प्रेमवश ही सगुण बने हैं।

राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥

राम सदा अपने सेवककी इच्छा पूरी करते आए हैं, वेद-पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। यह जानकर कुटिलता छोड़ो और भरतके चरणोंमें सुंदर प्रेम रखो।

दोहा

राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल२१९

राम के भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, दूसरोंके दुखसे दुखी होते हैं और दयालु होते हैं। भक्तोंमें शिरोमणि भरतसे तो बिल्कुल मत डरो, देवराज।

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥

प्रभु राम सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंके हितैषी हैं, भरत भी राम की आज्ञाके अनुसार ही चलते हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थवश व्याकुल हो रहे हो, इसमें भरतका कोई दोष नहीं, यह तुम्हारा ही मोह है।

सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी॥बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ॥

देवगुरु बृहस्पतिकी यह उत्तम वाणी सुनकर इंद्रके मनमें आनंद हुआ और चिंता मिट गई। हर्षित होकर देवराजने फूल बरसाए और भरतके स्वभावकी सराहना करने लगे।

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा॥

इस तरह भरत रास्तेमें चले जा रहे हैं, उनकी यह दशा देखकर मुनि और सिद्ध भी ईर्ष्यासे मुग्ध होते हैं। भरत जब भी राम कहकर लंबी साँस लेते हैं, चारों ओर मानो प्रेम उमड़ पड़ता है।

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना॥बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए॥

उनके वचन सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं, अयोध्यावासियोंका प्रेम कहते नहीं बनता। बीचमें ठहरकर वे यमुनाके तटपर पहुँचे, यमुनाका जल देखकर उनकी आँखें भर आईं।

दोहा

रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज२२०

राम के रंग-जैसा सुंदर जल देखकर सारा समाज विरहके सागरमें डूबते-डूबते विवेकरूपी जहाजपर चढ़ गया।

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥

उस दिन यमुनातटपर ठहरे, समयके अनुसार सबके लिए अच्छी व्यवस्था हो गई। रातों-रात घाट-घाटकी अनगिनत नावें वहाँ आ गईं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।

प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥

सुबह एक ही खेवमें सब पार हो गए, रामसखा निषादराजकी इस सेवासे सब संतुष्ट हुए। फिर स्नान करके, नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चल पड़े।

आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें॥तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें॥

आगे बढ़िया सवारियोंपर मुनिश्रेष्ठ हैं, पीछे सारा राजसमाज चल रहा है, उसके पीछे दोनों भाई बिल्कुल सादे वस्त्र-आभूषणोंमें पैदल चल रहे हैं।

सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥

सेवक, मित्र और मंत्रीपुत्र साथ हैं, लक्ष्मण-सीता-रघुनाथका स्मरण करते चल रहे हैं। जहाँ-जहाँ राम ने विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं।

दोहा

मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ२२१

रास्तेमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर-बार छोड़कर दौड़ पड़ते हैं, और उनका रूप-प्रेम देखकर जन्म सफल हुआ मानकर आनंदित होते हैं।

कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं॥बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली॥

गाँवकी स्त्रियाँ आपसमें प्रेमसे कहती हैं - सखी, ये राम-लक्ष्मण हैं या नहीं? इनकी उम्र, देह, रंग-रूप, शील-स्नेह और चाल सब वैसे ही हैं।

बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥

पर सखी, न वह वेष है, न सीता साथ हैं, और आगे तो पूरी सेना चल रही है, न मुख प्रसन्न है, मनमें कोई खेद जान पड़ता है - इसी भेदसे संदेह होता है।

तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी॥तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी॥

उसकी यह बात सबको जँच गई, सब कहने लगीं कि इससे चतुर कोई नहीं। उसकी सराहना करके, 'तेरी बात सच है' कहकर दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली -

कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू॥भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी॥

प्रेमपूर्वक वह सारी कथा सुनाई कि कैसे राम का राजतिलक भंग हुआ, फिर भरतके शील, स्नेह और स्वभावकी सराहना करने लगी।

दोहा

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु२२२

देखो, यह भरत पिताका दिया राज्य त्यागकर पैदल फल खाते हुए राम को मनाने जा रहे हैं - इनके समान आज कौन है!

भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई॥

भरतका भाईपन, भक्ति और आचरण सुनने-कहनेसे ही दुख और दोष दूर हो जाते हैं। इनके बारेमें जो कुछ कहा जाए वह कम है - राम का भाई ऐसा ही तो होना चाहिए।

हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें॥सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं॥

शत्रुघ्नसहित भरतको देखकर हम भी आज धन्य स्त्रियोंमें गिनी जाने लगीं। इनके गुण सुनकर और दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं - यह पुत्र कैकेयी-जैसी माँके लायक नहीं।

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन॥कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी॥

कोई कहती है - रानीका भी दोष नहीं, यह सब विधाताने ही किया जो हमारे भाग्यमें था। कहाँ हम लोक-वेद दोनोंसे हीन, कुल और करनीसे मलिन तुच्छ स्त्रियाँ,

बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा॥अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा॥

जो बुरे देश-गाँवमें रहती हैं, और कहाँ पुण्योंके फलस्वरूप यह दर्शन! हर गाँवमें ऐसा आनंद-अचरज छाया है मानो मरुभूमिमें कल्पवृक्ष उग आया हो।

दोहा

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु२२३

भरतका रूप देखते ही रास्तेके लोगोंका भाग्य खुल गया, मानो दैवयोगसे सिंहलद्वीपवासियोंको प्रयाग सुलभ हो गया हो।

निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥

अपने गुणोंसहित राम के गुणोंकी कथा सुनते और रघुनाथको स्मरण करते हुए भरत चले जा रहे हैं, तीर्थ-मुनि आश्रम-मंदिर देखकर स्नान और प्रणाम करते हैं,

मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू॥मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी॥

और मन-ही-मन यही वरदान माँगते हैं कि सीता-रामके चरणोंमें प्रेम बना रहे। रास्तेमें भील, कोल-जैसे वनवासी और वानप्रस्थी, ब्रह्मचारी, संन्यासी मिलते हैं,

करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही॥ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं॥

जिससे भी मिलते हैं प्रणाम करके पूछते हैं - लक्ष्मण, राम और जानकी किस वनमें हैं? वे सब समाचार बताते हैं और भरतको देखकर जन्म सफल मानते हैं।

जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥

जो कहते हैं कि हमने उन्हें कुशलपूर्वक देखा है, उन्हें राम-लक्ष्मणके समान ही प्रिय मानते हैं। इस तरह सबसे मीठी वाणीमें पूछते और राम के वनवासकी कहानी सुनते जाते हैं।

दोहा

तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ२२४

उस दिन वहीं ठहरकर सुबह ही रघुनाथको स्मरण करके चल पड़े। साथके सब लोगोंको भी भरतकी तरह ही राम के दर्शनकी लालसा है।

मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू॥

सबको शुभ शकुन हो रहे हैं, सुखदायी नेत्र-भुजाएँ फड़क रही हैं। भरतसहित सारे समाजको उत्साह है कि राम मिलेंगे और दुखकी जलन मिट जाएगी।

करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके॥सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं॥

जिसके मनमें जैसा भाव है वह वैसा ही मनोरथ करता है, सब स्नेहके नशेमें डूबे चले जा रहे हैं। शरीर शिथिल है, पैर डगमगा रहे हैं, प्रेमवश विह्वल वचन बोल रहे हैं।

रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा॥जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा॥

उसी समय रामसखाने वह सुंदर पर्वत दिखाया, जिसके पास पयस्विनी नदीके तटपर सीतासहित दोनों भाई रहते हैं।

देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा॥प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥

उसे देखकर सब 'जानकी-जीवन राम की जय' कहते हुए दंडवत प्रणाम करते हैं, राजसमाज प्रेममें ऐसा डूबा है मानो रघुनाथ स्वयं अयोध्या लौट रहे हों।

दोहा

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु२२५

उस समय भरतका जो प्रेम था, वैसा शेष भी बयान नहीं कर सकते - कविके लिए वह उतना ही अगम है जितना अहंकारी मनके लिए ब्रह्मानंद।

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥

राम के प्रेममें सब इतने शिथिल हो गए कि सूर्यास्ततक बस दो कोस ही चल पाए, फिर सुविधाजनक जगह देखकर रातभर रुके रहे। रात बीतनेपर रघुनाथके प्रेमी भरतने आगे प्रस्थान किया।

उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीय सपन अस देखा॥सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥

उधर राम रात शेष रहते ही जाग गए, सीताने ऐसा स्वप्न देखा कि मानो समाजसहित भरत आए हैं, प्रभुके वियोगकी पीड़ासे उनकी देह जल रही थी।

सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥

सब मनमें उदास, दीन और दुखी दिखे, सासुएँ बिल्कुल दूसरी सूरतमें दिखीं। सीताका स्वप्न सुनकर राम की आँखें भर आईं, सबको सांत्वना देनेवाले प्रभु खुद चिंतित हो उठे।

लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने॥

बोले - लक्ष्मण, यह स्वप्न शुभ नहीं, कोई कठोर खबर आनेवाली है। ऐसा कहकर भाईसहित स्नान किया, शिवजीका पूजन करके साधुओंका सम्मान किया।

छंद

सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए।नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥।

देवताओंका पूजन और मुनियोंका वंदन करके राम बैठ गए और उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे। आकाशमें धूल छाई है, बहुत-से पक्षी-पशु व्याकुल होकर भागते हुए आश्रमकी ओर आ रहे हैं। यह देखकर राम उठे और सोचमें पड़ गए कि यह क्या है। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार सुनाए।

सोरठा

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल२२६

यह शुभ समाचार सुनते ही राम के मनमें आनंद छा गया, शरीर रोमांचित हो उठा और शरद-ऋतुके कमल-जैसे नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर आए।

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥

सीतापति राम फिर चिंतित हो उठे कि भरतके आनेका क्या कारण होगा। तभी किसीने आकर बताया कि उनके साथ बड़ी भारी सेना भी है।

सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥

यह सुनकर राम को बड़ी चिंता हुई - इधर पिताका वचन, उधर भाई भरतका संकोच। भरतका स्वभाव याद करके भी प्रभुका मन किसी स्थिर निष्कर्षपर नहीं पहुँच पा रहा था।

समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥

तब यह सोचकर समाधान हुआ कि भरत साधु और समझदार हैं, मेरी बात माननेवाले हैं। लक्ष्मणने देखा कि प्रभुके मनमें उलझन है, तो वे समयानुसार अपनी नीतिभरी बात कहने लगे -

बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समय न ढीठ ढिठाई॥तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥

स्वामी, बिना पूछे ही कुछ कह रहा हूँ, पर सेवक समयपर बोले तो ढिठाई नहीं मानी जाती। आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं, मैं तो सेवक होकर अपनी समझकी बात कह रहा हूँ।

दोहा

नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान२२७

नाथ, आप परम सुहृद, सरलहृदय और शील-स्नेहके भंडार हैं, सबपर आपका प्रेम और विश्वास है, और अपने मनमें सबको अपने ही समान मानते हैं।

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना॥

पर मूढ़ विषयी जीव सत्ता पाकर मोहवश अपना असली रूप दिखा देते हैं। भरत तो नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं, और आपके चरणोंमें उनका प्रेम है, यह सारा जगत जानता है।

तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी॥

वे भरत भी आज आपका सिंहासन पाकर धर्मकी मर्यादा मिटाकर चले हैं। यह कुटिल भाई कुसमय देखकर और आपको वनमें अकेला-असहाय जानकर,

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥

मनमें बुरी चाल सोचकर, सारा समाज जोड़कर, राज्यको निष्कंटक बनाने आए हैं - अनगिनत कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आ पहुँचे हैं।

जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥

यदि इनके मनमें कपट न होता तो रथ-घोड़े-हाथियोंकी यह कतार किसे भाती? पर भरतको ही व्यर्थ दोष क्यों दें - राजपद पाकर तो सारी दुनिया ही पगला जाती है।

दोहा

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान२२८

चंद्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा - पर राजा वेनके समान नीच कोई नहीं, जो लोक-वेद दोनोंसे विमुख हो गया।

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥

सहस्रबाहु, इंद्र, त्रिशंकु - किसे राजमदने कलंकित नहीं किया? भरतने यह उपाय ठीक ही किया है, शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं छोड़ना चाहिए।

एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई॥समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी॥

हाँ, भरतने एक बात गलत की - आपको असहाय जानकर निरादर किया। पर आज संग्राममें आपका क्रोधित मुख देखकर उसे भी यह बात अच्छी तरह समझ आ जाएगी।

एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी॥

इतना कहते ही लक्ष्मण नीतिकी बात भूल गए और युद्धरसका उत्साह मानो रोमांचके बहाने फूट पड़ा। प्रभुके चरण वंदन करके, चरण-धूल सिरपर रखकर वे सच्चे स्वाभाविक बलसे बोले -

अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥

नाथ, मेरी बात अनुचित मत मानिए, भरतने हमारे साथ कम बुरा बर्ताव नहीं किया। कहाँतक सहा जाए, कहाँतक मन मारकर रहा जाए, जब स्वामी साथ हों और धनुष हाथमें हो!

दोहा

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान२२९

क्षत्रिय जाति, रघुकुलमें जन्म और आपका अनुगामी होना - यह सब जगत जानता है। धूलके समान नीच भी लात पड़नेपर सिरपर चढ़ ही जाती है।

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥

यों कहकर लक्ष्मण खड़े हो गए, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी, मानो सोया हुआ वीररस जाग उठा हो। जटा बाँधकर, कमरमें तरकस कसकर, धनुष-बाण हाथमें लेकर बोले -

आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥

आज मैं राम के सेवकका यश लूँगा और भरतको युद्धमें सबक सिखाऊँगा। राम के निरादरका फल पाकर दोनों भाई रणभूमिकी शय्यापर सो जाएँ।

आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥

अच्छा हुआ कि सारा समाज एक जगह आ जमा - आज मैं पुराना सारा क्रोध निकालूँगा, जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचलता है, जैसे बाज लवेको लपेटमें ले लेता है,

तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मार रन राम दोहाई॥

वैसे ही भरतको सेनासहित, छोटे भाईसहित, तिरस्कृत करके मैदानमें पटक दूँगा। शिव भी सहायताको आएँ तो भी राम की सौगंध, मैं उन्हें रणमें मार डालूँगा।

दोहा

अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान२३०

लक्ष्मणका क्रोध और उनकी सच्ची सौगंध सुनकर सब भयभीत हो उठे, लोकपाल भी घबराकर भागना चाहने लगे।

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा॥

सारा जगत भयसे डूब गया, तभी आकाशसे लक्ष्मणके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती वाणी गूँजी - तात, तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन बयान कर सकता है, कौन जान सकता है?

अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥

पर कोई भी काम हो, उचित-अनुचित समझ-बूझकर करें तो सब सराहते हैं। वेद और विद्वान कहते हैं जो जल्दबाजीमें काम करके बादमें पछताए, वह बुद्धिमान नहीं।

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीय सादर सनमाने॥कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥

देववाणी सुनकर लक्ष्मण सकुचा गए, राम और सीताने उन्हें आदरसे सम्मानित किया - तात, तुमने बड़ी सुंदर नीति कही, राजमद ही सबसे कठिन मद है।

जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥

जिन्होंने सत्संगका सुख नहीं जाना, वे ही राजमदरूपी शराब पीते ही मदहोश हो जाते हैं। सुनो लक्ष्मण, भरत-जैसा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी इस सृष्टिमें न कभी सुना गया, न देखा गया।

दोहा

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ२३१

ब्रह्मा-विष्णु-शिवका पद पाकर भी भरतको राजमद नहीं हो सकता - क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसागर नष्ट हो सकता है?

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥

अंधेरा चाहे दोपहरके सूरजको निगल जाए, आकाश चाहे बादलोंमें विलीन हो जाए, गोपदभर पानीमें अगस्त्य डूब जाएँ, धरती चाहे अपना स्वाभाविक धैर्य त्याग दे,

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥

मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाए, पर भाई, भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। लक्ष्मण, मैं तुम्हारी और पिताकी सौगंध खाकर कहता हूँ - भरत-जैसा पवित्र भाई संसारमें कोई नहीं।

सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥

गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी पानीको मिलाकर विधाता यह संसार रचता है, पर भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंस बनकर जन्म लेकर गुण और दोषको अलग-अलग कर दिखाया।

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी॥कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ॥

गुणरूपी दूध ग्रहण करके और अवगुणरूपी पानी त्यागकर भरतने अपने यशसे संसारमें उजाला कर दिया। भरतके गुण, शील और स्वभावकी चर्चा करते-करते रघुनाथ प्रेमसागरमें डूब गए।

दोहा

सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु२३२

राम की यह वाणी सुनकर और भरतपर उनका प्रेम देखकर सब देवता सराहने लगे - राम-जैसा कृपाका धाम प्रभु और कौन होगा।

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को॥कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा॥

यदि भरतका जन्म ही न होता तो धरतीपर सारे धर्मोंकी धुरी कौन थामता? रघुनाथ, कविकुलके लिए भी अगम भरतके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है?

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥

लक्ष्मण, राम और सीताने देवताओंकी यह वाणी सुनकर अपार सुख पाया, जो बयान नहीं हो सकता। इधर भरतने सारे समाजके साथ पवित्र मंदाकिनीमें स्नान किया।

सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा॥चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई॥

फिर सबको नदीके किनारे ठहराकर, माता-गुरु-मंत्रीकी आज्ञा लेकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरत वहाँ चल पड़े जहाँ सीता-राम थे।

समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं॥रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥

माताकी करनी याद करके वे सकुचाते हैं और मनमें तरह-तरहकी शंका करते हैं - कहीं राम, लक्ष्मण, सीता मेरा नाम सुनकर यह जगह छोड़कर कहीं और न चले जाएँ।

दोहा

मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर२३३

मुझे माताके पक्षका मानकर वे जो भी करेंगे वह कम ही होगा, पर अपना नाता याद करके मेरे पाप-अवगुण क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे।

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी॥मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥

चाहे मलिन मन जानकर त्याग दें, चाहे सेवक मानकर सम्मान दें - मेरे लिए तो राम की खड़ाऊँ ही शरण है, राम अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सेवकका ही होता है।

जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥

संसारमें यशके असली हकदार तो चातक और मछली हैं, जो अपने नियम और प्रेमको हमेशा ताज़ा रखनेमें माहिर हैं। ऐसा सोचते हुए भरत रास्तेमें चलते जाते हैं, संकोच और स्नेहसे उनका पूरा शरीर शिथिल हो रहा है।

फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥

माताकी करनी मानो उन्हें वापस खींचती है, पर धीरजकी धुरी थामे भरत भक्तिके बलपर आगे बढ़ते जाते हैं। जब रघुनाथका स्वभाव याद आता है तो पैर तेज़ी से पड़ने लगते हैं।

भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥

उस समय भरतकी दशा वैसी ही है जैसी जलके बहावमें भँवरेकी होती है। भरतका यह सोच और प्रेम देखकर निषाद भी उस पल देहकी सुध भूल गया।

दोहा

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु२३४

मंगल शकुन होने लगे, उन्हें देख-विचारकर निषाद कहने लगा - सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर अंतमें फिर विषाद भी आएगा।

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने॥भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥

भरतने सेवकके सब वचन सच्चे जाने और आश्रमके निकट जा पहुँचे। वहाँका वन-पर्वत देखकर वे ऐसे आनंदित हुए मानो भूखेको अच्छा भोजन मिल गया हो।

ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥

जैसे संकटोंसे त्रस्त, तीन तापों और ग्रह-पीड़ासे दुखी प्रजा किसी सुशासित देशमें जाकर सुखी हो जाए, भरतकी दशा ठीक वैसी ही हो रही है।

राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥

राम के निवाससे वनकी संपदा ऐसी शोभित है मानो अच्छा राजा पाकर प्रजा सुखी हो। यह सुहावना वन ही पवित्र देश है, विवेक इसका राजा है और वैराग्य मंत्री।

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥

यम-नियम इसके योद्धा हैं, पर्वत राजधानी है, शांति और सुबुद्धि दो सुंदर रानियाँ हैं। यह राजा हर तरहसे संपन्न है और राम के चरणोंका आश्रय पाकर इसका मन प्रसन्न है।

दोहा

जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।करत अकंटक राजु पुर सुख संपदा सुकालु२३५

मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कंटक राज्य कर रहा है, उसके नगरमें सुख, संपदा और सुकाल है।

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥

वनप्रांतोंमें मुनियोंके बहुत-से निवास मानो शहर-गाँव-खेड़ोंका समूह हैं, अनगिनत विचित्र पक्षी-पशु ही मानो इसकी प्रजा हैं, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥

गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे, बैल देखकर इस राज्यके ठाटकी सराहना किए बिना नहीं रहा जाता। ये सब बैर भुलाकर साथ विचरते हैं, मानो यही चतुरंगिणी सेना हो।

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥

झरने झर रहे हैं, मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं - मानो कई तरहके नगाड़े बज रहे हों। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता, कोयल और सुंदर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं।

अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला॥

भौंरे गुंजार रहे हैं, मोर नाच रहे हैं, मानो इस सुशासित राज्यमें चारों ओर मंगल छाया है। बेल, वृक्ष, घास सब फल-फूलसे लदे हैं, सारा वातावरण आनंद और मंगलका मूल बना है।

दोहा

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु२३६

राम के इस पर्वतकी शोभा देखकर भरतके हृदयमें अपार प्रेम उमड़ा, जैसे तपस्वी नियम पूरा होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है।

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥

तब केवट दौड़कर ऊँचाईपर चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतसे बोला - नाथ, ये जो पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिख रहे हैं,

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥

इन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीच एक सुंदर विशाल बरगद सुशोभित है, जिसे देखते ही मन मोहित हो जाता है - उसके पत्ते गहरे नीले और घने हैं, फल लाल हैं, उसकी घनी छाया हर मौसममें सुख देती है।

मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥

मानो ब्रह्माने अंधकार और लालीको समेटकर एक अनोखी शोभा रच दी हो। गोसाईं, ये वृक्ष नदीके पास हैं, जहाँ राम की पर्णकुटी बनी है।

तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहूँ कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए॥बट छायाँ बेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई॥

वहाँ तुलसीके कई सुंदर पौधे शोभित हैं, कहीं सीताने तो कहीं लक्ष्मणने लगाए हैं। इसी बरगदकी छायामें सीताने अपने हाथों एक सुंदर वेदी बनाई है।

दोहा

जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान२३७

जहाँ सुजान सीता-राम मुनियोंके साथ बैठकर नित्य शास्त्र, वेद-पुराणकी कथाएँ सुनते हैं।

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥

सखाकी बात सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतकी आँखोंमें आँसू उमड़ आए। दोनों भाई प्रणाम करते हुए आगे बढ़े - उनके इस प्रेमका वर्णन करते सरस्वती भी सकुचा जाएँ।

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥

राम के चरण-चिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो किसी दरिद्रको पारस मिल गया हो। वहाँकी धूल सिरपर, हृदयपर और आँखोंपर लगाते हैं, मानो रघुनाथसे मिलनेका ही सुख पा रहे हों।

देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥

भरतकी यह अवर्णनीय दशा देखकर वनके पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक प्रेममें डूब गए। प्रेमके अतिरेकमें सखा निषादराज भी रास्ता भूल गया, तब देवताओंने सही राह दिखाकर फूल बरसाए।

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥

भरतका यह प्रेम देखकर सिद्ध और साधक भी भाव-विभोर हो उठे और उनके स्वाभाविक स्नेहकी सराहना करने लगे - अगर धरतीपर भरत न होते तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन बना पाता?

दोहा

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर२३८

प्रेम अमृत है, विरह मंदराचल है, भरत गहरा सागर हैं - कृपासागर राम ने देवता और साधुओंके भले के लिए स्वयं यह प्रेमरूपी अमृत मथकर निकाला है।

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥

सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको घने वनकी आड़में लक्ष्मण नहीं देख पाए। भरतने देखा प्रभुका पवित्र आश्रम, जो सब मंगलोंका सुंदर घर है।

करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥

आश्रममें कदम रखते ही भरतका सारा दुख-दाह मिट गया, मानो किसी योगीको परमतत्त्वकी प्राप्ति हो गई हो। भरतने देखा लक्ष्मण प्रभुके आगे खड़े प्रेमपूर्वक कुछ कह रहे हैं।

सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥

सिरपर जटा, कमरमें मुनि-वस्त्र बाँधे, तरकस कसे, हाथमें बाण और कंधेपर धनुष - वेदीपर मुनि-साधुओंका समूह बैठा है और सीतासहित रघुनाथ विराजमान हैं।

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा॥कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥

वल्कल वस्त्र, जटाधारी, श्याम शरीर - मानो रति और कामदेवने मुनि-वेष धर लिया हो। राम अपने हाथोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं और हँसकर देखते ही मनकी हर जलन हर लेते हैं।

दोहा

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु२३९

सुंदर मुनि-मंडलीके बीच सीता और रघुकुलचंद्र राम ऐसे शोभित हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात भक्ति और सच्चिदानंद स्वयं शरीर धारण करके बैठे हों।

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई॥

शत्रुघ्न और सखा निषादसहित भरतका मन प्रेममें डूब गया, हर्ष-शोक सब भूल गए। 'नाथ रक्षा करो, गोसाईं रक्षा करो' कहते हुए वे धरतीपर दंडकी तरह गिर पड़े।

बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥

प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणने पहचान लिया और समझ गए कि भरत प्रणाम कर रहे हैं। एक ओर भाईका सरस स्नेह, दूसरी ओर स्वामीकी सेवाका बंधन,

मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥

न मिले बिना रहा जाए, न सेवा छोड़ी जाए - लक्ष्मणके मनकी यह उलझन कोई श्रेष्ठ कवि ही बयान कर सकता है। वे सेवाको ही सर्वोपरि मानकर रुके रहे, मानो पतंग खींचता खिलाड़ी डोर थामे हो।

कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥

लक्ष्मणने प्रेमसे धरतीपर माथा टेककर कहा - रघुनाथ, भरत प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही राम प्रेमसे अधीर होकर उठ खड़े हुए, कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष-बाण।

दोहा

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान२४०

कृपानिधान राम ने उन्हें जबरन उठाकर छातीसे लगा लिया - भरत और राम के इस मिलनको देखकर सबको अपनी सुध-बुध भूल गई।

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥

इस मिलनका प्रेम बयान कैसे हो, यह तो कविकुलके लिए कर्म, मन, वाणी तीनोंसे परे है। दोनों भाई मन-बुद्धि-अहंकार सब भुलाकर परम प्रेममें डूब गए।

कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई॥कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥

इस उत्कृष्ट प्रेमको भला कौन बयान करे, कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे? कविके पास तो बस शब्द और अर्थका ही सहारा है - नट भी तो ताल देखकर ही नाचता है।

अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥

भरत और रघुनाथका यह प्रेम इतना अगम है कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव तक वहाँ नहीं पहुँच सकते। मैं मंदबुद्धि उसे कैसे बयान करूँ - क्या घास-फूसकी डोरीसे भी कोई मधुर राग बज सकता है?

मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी॥समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥

भरत और राम का यह मिलन देखकर देवता भी भयसे काँप उठे, उनका दिल धड़कने लगा। देवगुरु बृहस्पतिने समझाया, तब वे सचेत होकर फूल बरसाते हुए प्रशंसा करने लगे।

दोहा

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम२४१

फिर राम प्रेमसे शत्रुघ्नसे मिले, फिर केवटसे भेंट की। प्रणाम करते लक्ष्मणसे भरत बड़े प्रेमसे मिले।

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥

लक्ष्मण उत्साहसे छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले, फिर निषादराजको गले लगाया। फिर दोनों भाइयोंने मुनियोंको प्रणाम किया और मनचाहा आशीर्वाद पाकर आनंदित हुए।

सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥

शत्रुघ्नसहित भरत प्रेमसे उमड़कर सीताके चरणोंकी धूल सिरपर धरकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताने उन्हें उठाकर अपने हाथसे उनके सिरपर स्नेहसे हाथ फेरा और बिठाया।

सीय असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥

सीताने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया, प्रेममें ऐसी डूबी थीं कि देहकी सुध ही न थी। सीताको इतना अनुकूल पाकर भरत निश्चिंत हो गए, मनका सारा भय जाता रहा।

कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥

उस पल न कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है - मन प्रेमसे इतना भरा है कि खुद कुछ सोचनेकी गुंजाइश ही नहीं। तभी केवट धीरज धरकर हाथ जोड़े प्रणाम करके विनती करने लगा -

दोहा

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग२४२

नाथ, मुनिनाथ वसिष्ठके साथ सब माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मंत्री - सब आपके वियोगमें व्याकुल होकर आए हैं।

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू॥चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला॥

गुरुका आगमन सुनते ही शीलसागर राम ने शत्रुघ्नको सीताके पास छोड़ दिया और वे धीर, धर्मधुरंधर, दीनदयालु तुरंत वेगसे चल पड़े।

गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे॥मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई॥

गुरुको देखते ही लक्ष्मणसहित प्रभु प्रेमसे भर उठे और दंडवत प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ दौड़कर उन्हें गले लगा बैठे और प्रेमसे दोनों भाइयोंसे मिले।

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥

प्रेमसे रोमांचित होकर केवटने अपना नाम बताकर दूरसे ही दंडवत प्रणाम किया। ऋषिने उसे रामसखा जानकर जबरन गले लगा लिया, मानो धरतीपर बिखरे प्रेमको समेट लिया हो।

रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥

राम की भक्ति ही सब मंगलोंका मूल है, ऐसा कहकर सराहते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे और बोले - इसके समान नीच कोई नहीं और वसिष्ठके समान महान कोई नहीं।

दोहा

जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ२४३

जिसे देखकर मुनिराज लक्ष्मणसे भी बढ़कर प्रसन्नतासे मिले, यह सब सीतापति राम की भक्तिका ही प्रत्यक्ष प्रभाव है।

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥

आर्त लोगोंको राम ने पहचान लिया, दयालु सुजान भगवानने जो जिस भावसे मिलनेको आतुर था, उसे उसी भावसे अपनाया,

सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥यह बड़ि बात राम के नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥

लक्ष्मणसहित पलभरमें सबसे मिलकर उनका कठिन दुख-संताप दूर कर दिया। राम के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं, जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक सूरज एक साथ झलक जाता है।

मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥

सारे नगरवासी प्रेमसे उमड़कर केवटसे मिलकर उसके भाग्यकी सराहना करते हैं। राम ने अपनी सब माताओंको दुखी देखा, मानो सुंदर लताओंकी कतारोंपर पाला पड़ गया हो।

प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई॥पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥

सबसे पहले राम कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव और भक्तिसे उसका मन शांत कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल-कर्म-विधाताको दोष देकर उन्होंने उसे सांत्वना दी।

दोहा

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु२४४

फिर रघुनाथ सब माताओंसे मिले और समझा-बुझाकर संतोष दिलाया - माता, यह संसार ईश्वरके अधीन है, किसीको दोष मत दो।

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई॥गंग गौरि सम सब सनमानीं।। देहिं असीस मुदित मृदु बानी॥

दोनों भाइयोंने गुरुपत्नी अरुंधतीके साथ आई ब्राह्मण-स्त्रियोंके चरण वंदन किए, गंगा-गौरीके समान सबका सम्मान किया, और सब प्रसन्न होकर कोमल आशीर्वाद देने लगीं।

गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका॥पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता॥

फिर दोनों भाई पैर छूकर सुमित्राकी गोदमें जा लिपटे, मानो किसी दरिद्रको अपार धन मिल गया हो। फिर कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े, प्रेमसे सारा शरीर शिथिल हो उठा।

अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए॥तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू॥

माताने अपार स्नेहसे उन्हें गले लगाया और आँसुओंसे नहला दिया। उस समयका हर्ष-विषाद कवि कैसे बयान करे, जैसे गूँगा स्वादको कैसे बताए।

मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ॥पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू॥

लक्ष्मणसहित रघुनाथ माँसे मिलकर गुरुसे बोले - आश्रमपर पधारिए। फिर मुनिकी आज्ञा पाकर नगरवासी जल-थलकी सुविधा देखकर वहीं ठहर गए।

दोहा

महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।२४५

ब्राह्मण, मंत्री, माताएँ और गुरु समेत चुने हुए लोगोंको साथ लेकर भरत, लक्ष्मण और रघुनाथ पवित्र आश्रमकी ओर चले।

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥

सीता आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठके चरणों लगीं और मनचाहा आशीर्वाद पाया। फिर मुनि-पत्नियोंसहित गुरुपत्नी अरुंधतीसे मिलीं - वह प्रेम बयान नहीं हो सकता।

बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥

सबके चरण छू-छूकर सीताने मनचाहे आशीर्वाद पाए। जब सुकुमारी सीताने सब सासुओंको देखा तो सहमकर आँखें मूँद लीं।

परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो देउ सहावा॥

मानो राजहंसिनियाँ शिकारीके जालमें फँस गई हों - ऐसी दशा देखकर मनमें सोचा, विधाताने यह क्या कर डाला! सासुओंने भी सीताको देखकर बड़ा दुख पाया, पर जो दैव सहलाए वह सहना ही पड़ता है।

जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा॥मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई॥

तब जानकीने हृदयमें धीरज धरकर, नीले कमल-जैसे नेत्रोंमें आँसू भरकर सब सासुओंसे जाकर भेंट की - उस पल धरतीपर मानो करुणा ही करुणा छा गई।

दोहा

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग२४६

सीता सबके चरण छू-छूकर बड़े प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहसे हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं - सदा सुहागिन रहो।

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥

सीता और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं, तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेको कहा। फिर मुनिनाथने संसारकी मायिक गति समझाते हुए कुछ परमार्थकी बातें कहीं।

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी॥

फिर वसिष्ठने राजाके स्वर्गगमनकी बात सुनाई, यह सुनकर रघुनाथको गहरा दुख हुआ। अपने प्रति पिताका स्नेह ही उनकी मृत्युका कारण समझकर धीरधुरंधर राम बेहद व्याकुल हो उठे।

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी॥सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू॥

वज्रजैसी कठोर, कड़वी बात सुनकर लक्ष्मण, सीता और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे इतना व्याकुल हुआ मानो राजा आज ही स्वर्गवासी हुए हों।

मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥

फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने राम को समझाया, तब सबने मिलकर मंदाकिनीमें स्नान किया। उस दिन प्रभुने निर्जल व्रत रखा, मुनिके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया।

दोहा

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह२४७

अगले दिन सुबह मुनिने रघुनाथको जो-जो आज्ञा दी, प्रभुने वह सब श्रद्धा-भक्तिसहित आदरपूर्वक पूरी की।

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥

वेदविधिके अनुसार पिताकी क्रिया करके, पापरूपी अंधकारके नाशक सूर्य राम शुद्ध हुए - जिनका नाम पापरूपी रूईके लिए आग है, जिनका स्मरणमात्र सब मंगलोंकी जड़ है,

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥सुद्ध भएँ दुई बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते॥

साधुओंकी राय है कि राम का यह शुद्ध होना वैसा ही है जैसे तीर्थोंके आवाहनसे गंगा शुद्ध होती है - असलमें राम तो सदा शुद्ध ही हैं। शुद्ध हुए दो दिन बीतनेपर राम प्रेमसे गुरुसे बोले -

नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी॥सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता॥

नाथ, यहाँ सब बहुत दुखी हैं, कंद-मूल-फल-जलसे ही गुजारा कर रहे हैं। शत्रुघ्नसहित भरत, मंत्रियों और सब माताओंको देखकर मुझे हर पल एक युगके समान बीतता लगता है।

सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ॥बहुत कहेउ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥

इसलिए सबके साथ आप अयोध्या पधारिए, आप यहाँ हैं और राजा स्वर्गमें हैं। मैंने बहुत कह दिया, यह मेरी बड़ी ढिठाई है, गोसाईं, अब जो उचित लगे वही कीजिए।

दोहा

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम२४८

राम, तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं, दो दिन तुम्हारा दर्शन पाकर उन्हें कुछ शांति मिल जाए।

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥

राम के यह वचन सुनकर सारा समाज ऐसे भयभीत हुआ मानो समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो। पर गुरुकी कल्याणकारी वाणी सुनते ही मानो हवा अनुकूल हो गई।

पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥

सब लोग उस पवित्र नदीमें तीनों समय स्नान करते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे पापोंके ढेर मिट जाते हैं, और मंगलमूर्ति राम को दंडवत करके नेत्र भर-भरकर निहारते हैं।

राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥

सब राम के पर्वत और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सुख ही सुख है और दुखका नामोनिशान नहीं। झरने अमृतजैसा जल बहाते हैं और शीतल-मंद-सुगंधित हवा तीनों तापोंको हर लेती है।

बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥

अनगिनत तरहके वृक्ष, लताएँ, घास, फल-फूल-पत्ते हैं, सुंदर शिलाएँ और सुखद छाया है - इस वनकी शोभा कोई कैसे बयान करे।

दोहा

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग२४९

तालाबोंमें कमल खिले हैं, जलपक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं, और रंग-बिरंगे पशु-पक्षी वैररहित होकर वनमें विचर रहे हैं।

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥

कोल-किरात-भील वनवासी लोग पवित्र, सुंदर, अमृतजैसे मीठे शहदको सुंदर दोनोंमें भर-भरकर और कंद-मूल-फल-अंकुरकी जूड़ियाँ बनाकर,

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥

विनय और प्रणाम करते हुए सबको देते हैं, हर चीजका स्वाद-भेद-गुण-नाम बता-बताकर। लोग बदलेमें बहुत दाम देना चाहते हैं, पर वे नहीं लेते, राम की दुहाई देकर लौटा देते हैं।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥

प्रेममें डूबकर वे कोमल वाणीमें कहते हैं - साधु लोग तो प्रेम पहचानकर उसका सम्मान करते हैं। आप पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं, राम की कृपासे ही हमें आपके दर्शन हुए।

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥

हमारे लिए आपके दर्शन उतने ही दुर्लभ हैं जितनी मरुभूमिके लिए गंगाकी धारा। देखिए, कृपालु राम ने निषादपर कैसी कृपा की है - जैसा राजा हो वैसे ही उसकी प्रजा भी होनी चाहिए।

दोहा

यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु२५०

यह जानकर संकोच छोड़ो और हमारा प्रेम देखकर कृपा करो, हमें कृतार्थ करनेके लिए ही यह फल-तृण-अंकुर ग्रहण करो।

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई॥

आप प्रिय अतिथि बनकर वनमें पधारे हैं, आपकी सेवाके योग्य हमारा भाग्य नहीं। स्वामी, हम आपको क्या दें, हम भीलोंकी दोस्ती तो बस लकड़ी और पत्तोंतक ही है।

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई॥हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥

हमारी यही सबसे बड़ी सेवा है कि हम आपके बर्तन-कपड़े नहीं चुराते। हम अनजान, हिंसक, कुटिल, कुचाली और नीच जातिके हैं,

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥

हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं, फिर भी न तन ढकनेको कपड़ा है न पेट भरता है। हममें सपनेमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसे आई - यह सब रघुनंदनके दर्शनका ही असर है।

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे॥

जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे असह्य दुख-दोष मिट गए। यह सुनकर अयोध्यावासी प्रेमसे भर उठे और वनवासियोंके भाग्यकी सराहना करने लगे।

छंद

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥

सब उनके भाग्यकी सराहना करते और प्रेमकी बातें सुनाते हैं। उनकी बोलचाल और सीता-रामके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सुख पाते हैं। कोल-भीलोंकी यह वाणी सुनकर नर-नारी अपने ही प्रेमको कम मानने लगते हैं। तुलसीदास कहते हैं - यह रघुवंशमणिकी ही कृपा है कि लोहा नाव बनकर तैर गया।

सोरठा

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम२५१

सब लोग दिनोंदिन प्रसन्न होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली बरसातका पानी पाकर मेढक और मोर मस्त हो उठते हैं।

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥

अयोध्याके स्त्री-पुरुष सब प्रेममें ऐसे डूबे हैं कि दिन पलकी तरह बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ हैं, सीता उतने ही रूप बनाकर आदरपूर्वक सबकी बराबर सेवा करती हैं।

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥सीय सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥

राम के सिवा यह भेद किसीने नहीं जाना - सारी माया सीताकी ही मायामें समाई है। सीताने सेवासे सासुओंको वश कर लिया, उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिए।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥

सीतासहित दोनों सरल भाइयोंको देखकर कुटिल कैकेयी भरपेट पछताई। वह धरती और यमसे मौत माँगती है, पर धरती रास्ता नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता।

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥

लोक-वेदमें प्रसिद्ध है और विद्वान भी कहते हैं कि राम से विमुखको नरकमें भी जगह नहीं मिलती। सबके मनमें यही संशय था - राम का अयोध्या लौटना होगा या नहीं।

दोहा

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच२५२

भरतको न रातमें नींद आती है न दिनमें भूख लगती है, वे शुद्ध चिंतामें ऐसे व्याकुल हैं जैसे तलकी कीचड़में फँसी मछली पानीकी कमीसे तड़पती है।

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥

भरत सोचते हैं - माताके बहाने कालने ही यह कुचाल की है, जैसे धान पकते समय अचानक आफत आ जाए। अब राम का राज्याभिषेक कैसे हो, मुझे कोई उपाय नहीं सूझता।

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥

गुरुकी आज्ञा मानकर तो राम अवश्य लौट आएँगे, पर मुनि तो राम की इच्छा जानकर ही कुछ कहेंगे। माताके कहनेसे भी रघुनाथ लौट सकते हैं, पर भला राम को जन्म देनेवाली माँ कभी हठ करेगी?

मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥

मुझ सेवककी बिसात ही क्या, ऊपरसे समय भी प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करूँ तो यह घोर अधर्म होगा - सेवकका धर्म तो कैलास पर्वतसे भी भारी होता है।

एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥

भरतके मनमें एक भी उपाय न ठहरा, सोचते-सोचते रात बीत गई। सुबह स्नान करके प्रभुको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषिने उन्हें बुलवा भेजा।

दोहा

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ२५३

भरतने गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर आसन लिया, तभी ब्राह्मण, महाजन, मंत्री और सब सभासद आकर जुट गए।

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ समयोचित वचन बोले - सुनो सभासदो, सुनो सुजान भरत, सूर्यकुलके सूर्य राजा राम धर्मधुरंधर और स्वतंत्र भगवान हैं।

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनम जग मंगल हेतू॥गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥

वे सत्यप्रतिज्ञ हैं, वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं, राम का अवतार ही जगतके कल्याणके लिए हुआ है। वे गुरु-पिता-माताके वचनके अनुसार चलते हैं, दुष्टोंका नाश करनेवाले और देवताओंके हितैषी हैं।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥

नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको राम-जैसा सच्चाईसे कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, चंद्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, कर्म और काल -

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥

शेष और सारे राजाओंकी जितनी भी प्रभुता है, योगकी जो सिद्धियाँ वेद-शास्त्रोंमें गाई गई हैं - मनमें अच्छी तरह विचार करके देखो, राम की आज्ञा ही इन सबके ऊपर है।

दोहा

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ२५४

इसलिए राम की आज्ञा और इच्छाका पालन करनेमें ही हम सबका भला है। तुम सब समझदार लोग मिलकर जो सबको मान्य हो वही अब करो।

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥

राम का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायी है, मंगल और आनंदका यही एक रास्ता है। पर रघुनाथ अयोध्या कैसे लौटें, विचारकर बताओ, वही उपाय किया जाए।

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥

मुनिश्रेष्ठकी नीति, परमार्थ और व्यावहारिकतासे भरी यह बात सबने आदरसे सुनी, पर किसीको कोई उत्तर नहीं सूझा, सब चुप रह गए। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े,

भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥

और कहा - सूर्यवंशमें एक-से-एक बढ़कर राजा हुए हैं, सबके जन्मका कारण माता-पिता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोंका फल विधाता देते हैं।

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥

आपका आशीर्वाद ही ऐसा है जो दुख मिटाकर सब कल्याण सजा देता है, यह जगत जानता है। स्वामी, आपने तो विधाताकी गति भी रोक दी है - आपने जो ठान लिया उसे कौन टाल सकता है?

दोहा

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।२५५

अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह मेरा दुर्भाग्य है। भरतके इन प्रेमभरे वचनोंको सुनकर गुरुके हृदयमें भी प्रेम उमड़ आया।

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥

तात, बात सच है, पर यह सब राम की कृपासे ही है - राम से विमुखको सपनेमें भी सफलता नहीं मिलती। तात, एक बात कहनेमें मुझे संकोच होता है - बुद्धिमान लोग सब कुछ खोने से पहले आधा त्याग देते हैं।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥

इसलिए तुम दोनों भाई वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता, राम को वापस ले आओ। यह सुंदर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो उठे, उनका पूरा शरीर आनंदसे भर गया।

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥

उनका मन प्रसन्न हो उठा, शरीरमें तेज छा गया, मानो राजा दशरथ फिर उठे हों और राम राजा बन गए हों। दूसरे लोगोंको इसमें लाभ ही ज्यादा, हानि कम लगी, पर रानियाँ तो दुख-सुख दोनोंको बराबर मानकर रोने लगीं।

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥

भरत बोले - मुनिने जो कहा वही करूँ तो संसारके सब जीवोंकी मनचाही पूरी होगी। पर मैं तो जन्मभर वनमें ही रहूँगा, इससे बढ़कर मेरे लिए कोई सुख नहीं।

दोहा

अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान२५६

राम और सीता अंतर्यामी हैं, आप सर्वज्ञ और सुजान हैं - यदि आप यह सच कह रहे हैं तो नाथ, अपने ही वचनको प्रमाण मानिए।

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥

भरतके यह वचन और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठ स्तब्ध रह गए - भरतकी महिमा तो जैसे समुद्र है और मुनिकी बुद्धि उसके किनारे खड़ी असहाय स्त्रीकी तरह।

गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥

वह उस पार जाना चाहती है, मनमें उपाय भी ढूँढ़ती है, पर कोई नाव या जहाज नहीं मिलता। भरतकी बड़ाई और कौन करेगा - क्या तालाबकी सीपीमें समुद्र समा सकता है?

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥

भरत मुनिके मनको बहुत भाए, वे समाजसहित राम के पास आए। प्रभुने प्रणाम करके उन्हें उत्तम आसन दिया, सब मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गए।

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥

मुनिश्रेष्ठ देश-काल-अवसरके अनुसार विचारकर बोले - सुनो सर्वज्ञ, सुजान, धर्म-नीति-गुण-ज्ञानके भंडार राम!

दोहा

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ२५७

आप सबके हृदयमें बसते हैं और सबका भला-बुरा भाव जानते हैं। जिसमें नगरवासियों, माताओं और भरतका हित हो, वही उपाय बताइए।

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ॥सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥

दुखी लोग कभी सोच-समझकर नहीं बोलते, जुआरीको तो बस अपना ही दाँव दिखता है। मुनिकी बात सुनकर रघुनाथ बोले - नाथ, उपाय तो आपके ही हाथमें है।

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किए मुदित फुर भाषें॥प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई॥

आपका रुख बनाए रखने और आपकी आज्ञाको सच मानकर प्रसन्नतासे निभानेमें ही सबका भला है। पहले जो आज्ञा मुझे मिले, उसे शिरोधार्य करके ही करूँगा।

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाई॥कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥

फिर गोसाईं, आप जिसे जो कहेंगे वह पूरी तरह उसीका पालन करेगा। मुनि बोले - राम, तुमने सच कहा, पर भरतके स्नेहने मेरा विवेक ही डिगा दिया है।

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥

इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गई है। मेरी समझसे तो भरतकी इच्छाके अनुसार जो भी हो, शिव साक्षी हैं, वह शुभ ही होगा।

दोहा

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि२५८

पहले भरतकी विनती आदरसे सुन लें, फिर विचार करें - तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदका निचोड़ लेकर वैसा ही करें।

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम हृदय आनंदु बिसेषी॥भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥

भरतपर गुरुका यह स्नेह देखकर राम के मनमें खास आनंद हुआ। भरतको धर्मधुरंधर और तन-मन-वचनसे अपना सेवक जानकर -

बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥

गुरुकी आज्ञाके अनुरूप राम मीठे, कोमल, मंगलमय वचन बोले - नाथ, आपकी और पिताके चरणोंकी सौगंध, संसारमें भरत-जैसा भाई कभी हुआ ही नहीं।

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥

जो गुरुके चरणोंके अनुरागी हैं, वे लोक और वेद दोनोंमें भाग्यशाली माने जाते हैं। फिर जिसपर आपका ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको भला कौन बयान करे?

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥

छोटा भाई जानकर उसके सामने ही उसकी तारीफ करते हुए मुझे संकोच होता है, फिर भी कहूँगा कि भरत जो कहें वही करना ठीक होगा। ऐसा कहकर राम चुप हो गए।

दोहा

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय के बात२५९

तब मुनिने भरतसे कहा - तात, सारा संकोच त्यागकर कृपासागर अपने प्रिय भाईसे अपने मनकी बात कहो।

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥

मुनिकी बात सुनकर और राम का रुख पाकर - गुरु और स्वामी दोनोंको अपने अनुकूल पाकर भी - सारा बोझ अपने ही ऊपर महसूस करके भरत कुछ बोल नहीं पाए, सोचमें पड़ गए।

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें॥कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥

शरीर रोमांचित होकर वे सभामें खड़े हो गए, कमल-जैसे नेत्रोंमें आँसू भर आए। बोले - मेरी बात तो मुनिनाथने ही कह दी, इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ।

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

अपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ - वे अपराधीपर भी कभी क्रोधित नहीं होते। मुझपर तो उनकी खास कृपा और स्नेह है, खेलमें भी मैंने उनकी नाराज़गी कभी नहीं देखी।

सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥

बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा, और उन्होंने भी कभी मेरा मन नहीं तोड़ा। प्रभुकी कृपाकी रीति मैंने अच्छी तरह देखी है - हारकर भी खेलमें वे मुझे जिता देते थे।

दोहा

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन२६०

मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामनेसे कुछ नहीं कहा। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक दर्शनसे तृप्त नहीं हुए।

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥

पर विधाता मेरा यह दुलार सह न सका, उसने नीच माताके बहाने बीचमें दरार डाल दी। यह कहना भी आज मुझे शोभा नहीं देता - अपनी नजरमें कौन साधु और पवित्र होता है?

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली॥

माता बुरी है और मैं सदाचारी हूँ, यह मन में लाना ही करोड़ों दुराचारोंके बराबर है। क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान उगा सकती है? क्या काली सीपी मोती दे सकती है?

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥

सपनेमें भी किसीका कोई दोष नहीं, मेरा अभागा ही अथाह सागर है। बिना अपने पापका फल समझे मैंने माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ दुखी किया।

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥गुर गोसाईँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥

मैंने हृदयमें हर तरफ खोजा और हार गया, फिर भी एक ही बात निश्चित रूपसे मेरे भले की है - गुरु सर्वसमर्थ हैं और सीता-राम मेरे स्वामी हैं, इसीसे मुझे अच्छा परिणाम दिखता है।

दोहा

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ२६१

साधुओं और गुरु-स्वामीके सामने इस पवित्र स्थानपर मैं सच्चे मनसे कहता हूँ - यह प्रेम है या छल, सच है या झूठ, यह तो मुनि वसिष्ठ और रघुनाथ ही जानते हैं।

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी॥

पिताजीका मरना और माताकी कुबुद्धि दोनोंका सारा संसार साक्षी है। माताएँ इतनी व्याकुल हैं कि देखी नहीं जातीं, अयोध्याके नर-नारी असह्य संतापसे जल रहे हैं।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥

मैं ही इन सब अनर्थों का मूल कारण हूँ — यह जानकर भी मैंने वह सब पीड़ा सह ली, जब सुना कि रघुनाथ लक्ष्मण और सीता सहित मुनि-वेष धारण कर वन को चले गए।

बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥

वे बिना जूतों के पैदल चले, शिवजी साक्षी हैं, फिर भी इस चोट को सहकर मैं जीवित रहा। फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी मेरा वज्र-सा कठोर हृदय नहीं फटा।

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥

अब यह सब मैंने अपनी आँखों से देख लिया, फिर भी यह जड़ जीव जीवित रहकर सब सहता रहा — जबकि इन्हें (राम-लक्ष्मण-सीता को) देखकर मार्ग की साँपिन और बिच्छू तक अपना भयंकर विष और क्रोध त्याग देते हैं।

दोहा

ते रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।तासु तनय तजि दुसह दुख देउ सहावइ काहि२६२

वे ही रघुनंदन, लक्ष्मण और सीता जिसे शत्रु लगे, उस कैकेयीके पुत्रको छोड़कर दैव किसे और असह्य दुख सहाएगा?

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥

भरतकी यह अत्यंत व्याकुल, दुख-प्रेम-विनय-नीतिसे भरी वाणी सुनकर सारी सभा शोकमें डूब गई, मानो कमलोंके वनपर पाला पड़ गया हो।

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥

तब ज्ञानी मुनिने अनेक पुरानी कथाएँ सुनाकर भरतको समझाया। फिर सूर्यवंशरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चंद्रमा रघुनंदन उचित वचन बोले -

तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें॥

तात, तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो, जीवकी गति ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें तो तीनों कालों और तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा भी तुमसे कमतर हैं।

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥

मनमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप लगाना यह लोक और परलोक दोनों बिगाड़ देता है। माता कैकेयीको वही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी संगत नहीं की।

दोहा

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार२६३

भरत, तुम्हारा नाम लेते ही सब पाप, भ्रम और अमंगल मिट जाएँगे, इस लोकमें सुयश और परलोकमें सुख मिलेगा।

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥

भरत, मैं स्वभावसे ही सच कहता हूँ, शिव साक्षी हैं, यह धरती तुम्हारी ही धरोहर बनी रहेगी। तात, व्यर्थ कुतर्क मत करो, वैर और प्रेम छिपाए नहीं छिपते।

मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥

पक्षी-पशु मुनियोंके पास बेखौफ चले जाते हैं, पर शिकारीको देखते ही भाग जाते हैं - पशु-पक्षी भी मित्र-शत्रु पहचानते हैं, फिर मनुष्य-शरीर तो गुण और ज्ञानका भंडार है।

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥राखेउ राय सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥

तात, मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ, पर मन बड़े असमंजसमें है, क्या करूँ। राजाने मुझे त्यागकर सत्य निभाया और प्रेम-प्रणके लिए शरीर तक छोड़ दिया।

तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहऊँ सोइ कीन्हा॥

उनकी बातको मिटाते मनमें सोच होता है, उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है, ऊपरसे गुरुने भी मुझे आज्ञा दी है - इसलिए अब तुम जो कहोगे, वही करना चाहता हूँ।

दोहा

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु२६४

मन प्रसन्न करके, संकोच त्यागकर कहो, आज मैं वही करूँगा। सत्यप्रतिज्ञ रघुनाथका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥

देवताओंसहित इंद्र भयभीत होकर सोचने लगे कि बना-बनाया काम बिगड़ने ही वाला है, कोई उपाय नहीं सूझता। तब सब मन-ही-मन राम की शरणमें चले गए।

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥

फिर सोच-विचारकर आपसमें कहने लगे - रघुनाथ तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अंबरीष-दुर्वासाकी घटना याद करके देवता और इंद्र बिल्कुल निराश हो गए।

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥

पहले देवताओंने बहुत लंबे समय तक दुख सहा था, तब भक्त प्रह्लादने नृसिंहभगवानको प्रकट किया। सब देवता कान में कहते और सिर धुनते हैं - अब देवताओंका काम भरतके हाथमें है।

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥

देवताओ, कोई और उपाय नहीं दिखता, राम अपने अच्छे सेवककी सेवाको बहुत मानते हैं। इसलिए अपने गुण-शीलसे राम को वश करनेवाले भरतको ही प्रेमपूर्वक हृदयसे स्मरण करो।

दोहा

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु२६५

देवताओंका यह विचार सुनकर देवगुरु बृहस्पतिने कहा - अच्छा सोचा, तुम्हारा बड़ा भाग्य है, भरतके चरणोंका प्रेम ही जगतके सब मंगलोंकी जड़ है।

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥

सीतापति राम के सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान है। तुम्हारे मनमें भरतकी भक्ति आ गई तो अब सोच छोड़ो, विधाताने बात बना दी है।

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥

देवराज, भरतका प्रभाव देखो, रघुनाथ सहज स्वभावसे ही उनके पूरी तरह वश में हैं। देवताओ, भरतको राम की परछाई समझकर निश्चिंत हो जाओ, डरनेकी बात नहीं।

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥

देवगुरु और देवताओंकी यह सम्मति और उनका सोच सुनकर अंतर्यामी प्रभुको संकोच हुआ। भरतने अपने मनमें सारा भार खुद पर ही समझा और हृदयमें तरह-तरहके विचार करने लगे।

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥

पूरी तरह सोच-विचार करके अंततः मनमें यही तय किया कि राम की आज्ञामें ही भला है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रख लिया, यह कुछ कम कृपा नहीं थी।

दोहा

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ२६६

सीतानाथने सब तरहसे मुझपर अपार कृपा की। फिर भरत दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके बोले -

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥

स्वामी, कृपासागर, अंतर्यामी, अब मैं और क्या कहूँ। गुरु प्रसन्न हैं और स्वामी अनुकूल, यह जानकर मेरे मनकी सारी कल्पित पीड़ा मिट गई।

अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥

मैं बेवजह डर गया था, मेरे सोचकी कोई जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर सूरजका दोष नहीं होता। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और समयकी कठिनाई -

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥

इन सबने मिलकर मुझे बर्बाद करनेकी ठान ली थी, पर शरणागतवत्सल आपने अपना प्रण निभाया। यह आपका कोई नया तरीका नहीं, लोक और वेद दोनोंमें यह प्रसिद्ध है, छिपा नहीं।

जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥

स्वामी, सारा जगत बुरा हो पर आप अकेले भले रहें तो फिर बताइए किसकी भलाईसे भला होता है? आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है - वह न कभी किसीके अनुकूल है, न प्रतिकूल।

दोहा

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच२६७

जो उस वृक्षको पहचानकर पास जाए, उसकी छाया ही सब चिंता मिटा देती है - राजा हो या रंक, भला हो या बुरा, सब उससे मनचाही वस्तु पाते हैं।

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥

गुरु और स्वामीका यह स्नेह हर तरहसे देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मनमें कोई संदेह नहीं रहा। दयासागर, अब वही कीजिए जिससे सेवकके लिए आपके मनमें कोई क्षोभ न रहे।

जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची॥सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई॥

जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहे, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका असली हित तो यह है कि वह सारे सुख-लोभ छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे।

स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किए रजाइ कोटि बिधि नीका॥यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु॥

नाथ, आपके लौटनेमें ही सबका भला है, और आपकी आज्ञा माननेमें करोड़ों तरहका कल्याण है। यही असली स्वार्थ और परमार्थका सार है, सारे पुण्योंका फल और शुभ गतिका शिखर है।

देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥

देव, मेरी एक विनती सुनकर फिर जैसा उचित लगे वैसा कीजिए। राजतिलककी सारी सामग्री सजाकर लाई गई है, यदि आपका मन माने तो इसे सफल कर दीजिए।

दोहा

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ२६८

शत्रुघ्नसहित मुझे वनमें भेज दीजिए और अयोध्या लौटकर सबको सनाथ कर दीजिए। नहीं तो नाथ, लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिए और मैं आपके साथ चलूँ।

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥

या फिर हम तीनों भाई वनको चले जाएँ और आप सीतासहित लौट जाइए। दयासागर, जिससे भी प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिए।

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु॥कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥

देव, आपने सारा भार मुझपर डाल दिया, पर मुझमें न नीतिका विवेक है न धर्मका। मैं तो अपने ही स्वार्थके लिए यह सब कह रहा हूँ - दुखी मनुष्यके मनमें कहाँ विवेक टिकता है।

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥

स्वामीकी आज्ञा सुनकर भी जो जवाब दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी शर्मा जाए। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह सागर हूँ, फिर भी स्वामी स्नेहवश मुझे साधु कहकर सराहते हैं।

अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥

कृपालु, अब तो वही मत मुझे अच्छा लगता है जिससे स्वामीका मन तनिक भी संकुचित न हो। प्रभुके चरणोंकी सौगंध, मैं सच कहता हूँ - संसारके कल्याणका एक यही उपाय है।

दोहा

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब२६९

प्रसन्न मनसे संकोच छोड़कर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे शिरोधार्य करके निभाएँगे और सारी उलझन-अड़चन मिट जाएगी।

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥

भरतके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और साधु-साधु कहकर फूल बरसाने लगे। अयोध्यावासी असमंजसमें पड़ गए, जबकि तपस्वी और वनवासी लोग मनमें बहुत आनंदित हुए।

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥जनक दूत तेहि अवसर आए मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥

पर संकोची रघुनाथ चुप ही रह गए, प्रभुकी यह चुप्पी देखकर सारी सभा चिंतामें पड़ गई। उसी समय जनकके दूत आए, यह सुनकर मुनि वसिष्ठने उन्हें तुरंत बुलवा लिया।

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे॥दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता॥

उन्होंने प्रणाम करके राम को देखा, उनका मुनि-वेष देखकर बहुत दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने दूतोंसे पूछा - बताओ, राजा जनकका कुशल-समाचार क्या है।

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा॥बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं॥

यह सुनकर सकुचाते हुए, धरतीपर सिर नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले - स्वामी, आपका इतने आदरसे पूछना ही, गोसाईं, कुशल होनेका प्रमाण है।

दोहा

नाहिं त कोसल नाथ कें साथ कुसल गई नाथ।मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ२७०

नहीं तो नाथ, कुशल-क्षेम तो कोसलनाथ दशरथके साथ ही चली गई। उनके जानेसे यूँ तो सारा जगत ही अनाथ हो गया, पर मिथिला और अयोध्या विशेषरूपसे अनाथ हो गए।

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा॥जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥

अयोध्यानाथकी यह गति सुनकर जनकपुरवासी सब शोकसे विक्षिप्त हो गए। उस समय जिसने भी जनकको देखा, उसे उनका 'विदेह' नाम सच लगा ही नहीं (क्योंकि वे भी शोकसे अभिभूत दिखे)।

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥

रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको कुछ नहीं सूझता। फिर भरतको राज्य और राम को वनवास सुनकर जनकके मनमें और गहरा दुख हुआ।

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥

राजाने विद्वानों और मंत्रियोंसे पूछा - विचारकर बताओ, अभी क्या करना उचित है। अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों तरफसे असमंजस देखकर 'चलें या रुकें' किसीने कुछ नहीं कहा।

नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥

तब राजाने खुद धीरज धरकर विचार किया और चार चतुर गुप्तचर अयोध्या भेजे - भरतका राम के प्रति सद्भाव है या दुर्भाव, यह पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको भनक न लगे।

दोहा

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति२७१

गुप्तचर अयोध्या पहुँचे, भरतकी चाल-ढाल और करनी देखकर जैसे ही भरत चित्रकूटकी ओर चले, वैसे ही वे मिथिलाकी ओर लौट पड़े।

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥

दूतोंने आकर जनककी सभामें भरतकी करनीका अपनी समझसे वर्णन किया, यह सुनकर गुरु, कुटुंबी, मंत्री और राजा सब सोच और स्नेहसे अत्यंत व्याकुल हो उठे।

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥

फिर जनकने धीरज धरकर और भरतकी सराहना करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया, घर-नगर-देशमें रखवाले नियुक्त करके घोड़े-हाथी-रथ जैसी बहुत सी सवारियाँ सजवाईं।

दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥

शुभ मुहूर्त देखकर वे तुरंत चल पड़े, रास्तेमें राजाने कहीं विश्राम नहीं किया। उसी दिन सुबह प्रयागमें स्नान करके चले, फिर सब यमुना पार करने लगे।

खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥

तब नाथ, हमें खबर लेनेको भेजा गया - यह कहकर दूतोंने धरतीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने छह-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत विदा किया।

दोहा

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु२७२

जनकके आगमनकी बात सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो उठा, राम को बड़ा संकोच हुआ और देवराज इंद्र खासतौर से चिंतामें डूब गए।

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥

कुटिल कैकेयी मनमें ग्लानिसे गलती जा रही है - किससे कहे, किसे दोष दे। और सब नर-नारी यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि जनकके आनेसे कुछ और दिन ठहरना हो गया।

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥

इस तरह वह दिन भी बीत गया, सुबह सब स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेश, गौरी, शिव और सूर्यकी पूजा करते हैं।

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी॥

फिर विष्णुके चरण वंदन करके, हाथ जोड़कर, आँचल फैलाकर विनती करते हैं - राम राजा हों, जानकी रानी हों, और राजधानी अयोध्या आनंदकी पराकाष्ठा बनकर,

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥

फिर समाजसहित सुखसे बसे, और राम भरतको युवराज बनाएँ। देव, इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सबको जीनेका यह लाभ दीजिए।

दोहा

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ२७३

गुरु, समाज और भाइयोंसहित राम का राज्य अयोध्यामें हो, और राम के राजा रहते ही हम अयोध्यामें मरें - सब यही माँगते हैं।

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥

अयोध्यावासियोंकी यह प्रेमभरी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग-वैराग्यको तुच्छ मानने लगते हैं। इस तरह नित्यकर्म करके अवधवासी रोमांचित होकर राम को प्रणाम करते हैं।

ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥

ऊँच-नीच-मध्यम सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार दर्शन पाते हैं। राम सावधानीसे सबका सम्मान करते हैं और सब कृपानिधानकी सराहना करते हैं।

लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥

बचपनसे ही राम की यह आदत है कि प्रेम पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। रघुनाथ शील और संकोचके सागर हैं, सुंदर मुख, सुंदर नेत्र और सरल स्वभावके धनी हैं।

कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥

राम के गुणोंकी चर्चा करते-करते सब प्रेममें डूब गए और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे - संसारमें हम-जैसे पुण्यशाली कम ही हैं, जिन्हें राम अपना मानते हैं।

दोहा

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु२७४

उस पल सब प्रेममें डूबे थे, तभी मिथिलापति जनकके आनेकी खबर सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य राम सभासहित तुरंत आदरपूर्वक उठ खड़े हुए।

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं॥

भाई, मंत्री, गुरु और नगरवासियोंको साथ लेकर रघुनाथ अगवानीमें आगे बढ़े। जनकने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठको देखा, त्यों ही प्रणाम करके रथ छोड़ दिया।

राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥

राम के दर्शनकी लालसा और उत्साहमें किसीको रास्तेकी थकान तनिक भी महसूस नहीं हुई। मन तो वहीं है जहाँ राम और जानकी हैं, बिना मनके तन कैसे सुख-दुख जाने?

आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती॥आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे॥

जनक इस तरह चले आ रहे हैं, समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आते देखकर सब प्रेमसे भर उठे और आदरपूर्वक एक-दूसरेसे मिलने लगे।

लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि॥

जनक मुनियोंके चरण वंदन करने लगे और रघुनंदनने ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसहित राम जनकसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रम ले चले।

दोहा

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।सेन मनहुँ करुना सरित लिए जाहिं रघुनाथु२७५

राम का आश्रम शांतरसका पवित्र सागर है, और जनककी सेना मानो करुणाकी नदी है, जिसे रघुनाथ उसी सागरमें मिलानेको लिए जा रहे हैं।

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥

यह करुणानदी ज्ञान-वैराग्यके किनारोंको डुबोती जा रही है, शोकभरे वचन इसमें मिलनेवाले नद-नाले हैं, और लंबी साँसें इसकी लहरें हैं जो धैर्यरूपी किनारेके वृक्षोंको तोड़ रही हैं।

बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥

भयानक विषाद ही इसकी तेज धारा है, भय-भ्रम इसके अनगिनत भँवर हैं। विद्वान मल्लाह हैं, विद्या बड़ी नाव है, पर कोई इसे खे नहीं पाता, किसीको कोई तरकीब नहीं सूझती।

बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई॥

बेचारे वनवासी कोल-किरात ही इसके यात्री हैं, जो इसे देखकर हिम्मत हार बैठे हैं। यह करुणानदी जब आश्रमरूपी सागरमें मिली, तो मानो वह सागर खुद उमड़ पड़ा।

सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥

दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो उठे, किसीको न ज्ञान रहा न धीरज न लाज। राजा दशरथके रूप-गुण-शीलकी सराहना करते हुए सब रोते हुए शोकसागरमें डूब रहे हैं।

छंद

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।दे दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥

शोकसागरमें डूबते हुए सब स्त्री-पुरुष अत्यंत व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं, क्रोधसे विधाताको दोष देते हुए कहते हैं - इस प्रतिकूल विधाताने यह क्या कर डाला! तुलसीदास कहते हैं - देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनि तक कोई भी जनककी यह दशा देखकर प्रेमकी इस नदीको पार नहीं कर सका, सब प्रेममें डूब गए।

सोरठा

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन२७६

जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको बहुत उपदेश दिए, और वसिष्ठने जनकसे कहा - राजन, धीरज धरिए।

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥

जिनका ज्ञानरूपी सूर्य जन्म-मरणकी रातको मिटा देता है, जिनकी वाणीकी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं - क्या मोह-ममता उनके पास भी फटक सकते हैं? यह तो सीता-रामके प्रेमकी ही महिमा है।

बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥

विषयी, साधक और सिद्ध - वेदोंने संसारमें तीन तरहके जीव बताए हैं। इनमें से जिसका मन राम के प्रेमसे सराबोर रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका सबसे बड़ा आदर होता है।

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए॥

राम के प्रेमके बिना ज्ञान भी वैसे ही शोभाहीन है जैसे कर्णधार बिना जहाज। वसिष्ठने जनकको बहुत तरहसे समझाया, फिर सबने राम के घाटपर स्नान किया।

सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥

सब स्त्री-पुरुष शोकसे भरे थे, वह दिन बिना पानी पिए ही बीत गया। पशु-पक्षी-हिरणोंतकने कुछ नहीं खाया, फिर प्रियजनोंकी तो बात ही क्या।

दोहा

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात२७७

जनक और राम दोनों समाजसहित अगले दिन सुबह स्नान करके बरगदके पेड़तले जा बैठे, सबके मन उदास और शरीर दुबले थे।

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥

दशरथकी अयोध्या और जनककी मिथिलाके जो ब्राह्मण थे, और सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठ तथा जनकके पुरोहित शतानंद, जिन्होंने सांसारिक और पारमार्थिक दोनों मार्ग खोज डाले थे,

लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका॥कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं॥

वे सब धर्म, नीति, वैराग्य और विवेकसे भरे अनेक उपदेश देने लगे। विश्वामित्रने पुरानी कथाएँ सुना-सुनाकर सारी सभाको सुंदर वाणीमें समझाया।

तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥

तब रघुनाथने विश्वामित्रसे कहा - नाथ, कल सब लोग बिना जल पिए ही रह गए थे। मुनिने कहा - राम ठीक कह रहे हैं, आज भी ढाई पहर दिन बीत चुका है।

रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाई रजायसु चले नहाना॥

ऋषिका रुख देखकर जनकने कहा - यहाँ अन्न खाना उचित नहीं। राजाकी यह बात सबको भली लगी, आज्ञा पाकर सब स्नान करने चल पड़े।

दोहा

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार२७८

उसी समय वनवासी लोग तरह-तरहके फल-फूल-पत्ते-मूल बहँगियोंमें भर-भरकर बड़ी मात्रामें ले आए।

कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनंद अनुरागा॥

राम की कृपासे सारे पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले बन गए, देखनेमात्रसे ही दुख हर लेते थे। तालाब, नदी, वन और धरतीके हर हिस्सेमें मानो आनंद और प्रेम उमड़ रहा था।

बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला॥तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥

बेलें और पेड़ सब फल-फूलसे लद गए, पक्षी-पशु-भौंरे सब मीठा बोलने लगे। उस समय वनमें बड़ा उत्साह था, हर किसीको सुख देनेवाली शीतल-मंद-सुगंधित हवा बह रही थी।

जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥

उस वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी स्वयं जनकजी की आवभगत कर रही हो। तब राम, जनक और मुनि की आज्ञा पाकर सभी लोग स्नान करने लगे।

देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥

सुंदर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम से भरकर नगरवासी जहाँ-तहाँ ठहरने लगे — वहाँ अनेक प्रकार के पवित्र, सुंदर और अमृत-सम मीठे पत्ते, फल, मूल और कंद उपलब्ध थे।

दोहा

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥२७९

श्रीराम के गुरु वसिष्ठजी ने आदरपूर्वक सबके लिए भार भर-भरकर सामग्री भिजवाई; पितरों, देवताओं, अतिथियों और गुरु की पूजा करके सब फलाहार करने लगे।

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥

इस तरह चार दिन बीत गए, राम को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजोंके मनमें यही इच्छा है कि सीता-रामके बिना लौटना ठीक नहीं।

सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥

सीता-रामके साथ वनमें रहना करोड़ों स्वर्गोंके बराबर सुखद है। लक्ष्मण, राम, जानकीको छोड़कर जिसे घर अच्छा लगे, विधाता उसीके विरुद्ध समझो।

दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥

जब भाग्य सबके अनुकूल हो, तभी राम के पास वनमें रहा जा सकता है - मंदाकिनीमें तीनों समय स्नान और आनंद-मंगलकी माला-जैसा राम का दर्शन,

अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥

राम के पर्वत, वन और तपोवनमें घूमना, अमृतजैसे मीठे कंद-मूल-फल खाना - सुखके साथ चौदह वर्ष पलकी तरह बीत जाएँगे, पता ही नहीं चलेगा।

दोहा

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु२८०

सब लोग कहते हैं - हम इस सुखके लायक नहीं, हमारा ऐसा भाग्य कहाँ। दोनों समाजोंका राम के चरणोंमें स्वाभाविक ही गहरा प्रेम है।

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥

इस तरह सब मनोरथ करते रहे, उनके प्रेमभरे वचन सुनते ही मन मोह लेते हैं। उसी समय सीताकी माता सुनयनाकी भेजी दासियाँ सही मौका देखकर आ पहुँचीं।

सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥

यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ अभी फुरसतमें हैं, जनकका रनिवास मिलने आया। कौसल्याने आदरसे सबका स्वागत किया और समयोचित आसन दिए।

सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥

दोनों ओरका शील और स्नेह देखकर-सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाए। शरीर रोमांचित और शिथिल हैं, आँखोंमें आँसू हैं, सब पैरोंके नखोंसे धरती कुरेदते हुए सोचमें डूब गईं।

सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥

सब मानो सीता-रामके प्रेमकी साक्षात मूर्ति हैं, मानो करुणा खुद कई रूप धरकर विलाप कर रही हो। सीताकी माताने कहा - विधाताकी बुद्धि कितनी टेढ़ी है, जो दूधके फेनजैसी कोमल चीज़को वज्रकी छेनीसे तोड़ रहा है।

दोहा

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल२८१

अमृतकी बस बात सुनी जाती है, पर विष हर जगह सामने दिखता है - विधाताकी करतूतें ही ऐसी भयानक हैं। जहाँ-तहाँ कौए-उल्लू-बगुले ही दिखते हैं, हंस तो बस मानसरोवरमें ही मिलता है।

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥जो सजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी॥

यह सुनकर सुमित्रा दुखी होकर बोलीं - विधाताकी चाल बड़ी उलटी और अजीब है, जो बनाकर पालता है फिर खुद ही नष्ट कर देता है, विधाताकी बुद्धि बच्चोंके खेलजैसी लगती है।

कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥

कौसल्याने कहा - किसीका दोष नहीं, दुख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं। कर्मकी गति बड़ी कठिन है, इसे विधाता ही जानता है जो शुभ-अशुभ सब फल देता है।

ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥

ईश्वरकी आज्ञा सबके ऊपर है - उत्पत्ति, पालन, नाश और अमृत-विष तककी। देवी, मोहवश सोच करना व्यर्थ है, विधाताका यह खेल सदासे ऐसा ही अटल और अनादि है।

भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥

राजाके जीने-मरनेकी बात याद करके जो चिंता करती है, वह असलमें अपने ही स्वार्थकी हानि देखकर करती है, सखी। सीताकी माताने कहा - आपकी बात सच है, आप तो पुण्यात्माओंके शिखर राजा दशरथकी ही रानी हैं।

दोहा

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु२८२

कौसल्याने भारी मनसे कहा - राम, लक्ष्मण, सीताका वनमें जाना अंततः अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो बस भरतकी चिंता है।

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥

ईश्वरकी कृपा और आपके आशीर्वादसे मेरे पुत्र और बहुएँ गंगाजलकी तरह पवित्र हैं। सखी, मैंने कभी राम की सौगंध नहीं खाई, आज खाकर सच कहती हूँ -

भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥

भरतके शील, गुण, विनय, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छाईका वर्णन करते तो सरस्वती भी हिचकें - क्या सीपसे कहीं समुद्र उलीचा जा सकता है?

जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥

मैं भरतको सदा कुलका दीपक मानती हूँ, राजाने भी बार-बार यही कहा था। सोना कसौटीपर और रत्न जौहरीके सामने ही पहचाना जाता है, वैसे ही इंसानकी परख समय आनेपर ही होती है।

अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥

पर आज मेरा यह कहना भी अनुचित है, शोक और स्नेहमें सूझबूझ कम हो जाती है। कौसल्याकी गंगाजैसी पवित्र वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहसे व्याकुल हो उठीं।

दोहा

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि२८३

कौसल्याने फिर धीरज धरकर कहा - देवी मिथिलेश्वरी, सुनिए, ज्ञानके भंडार जनककी प्रिया आपको भला कौन उपदेश दे सकता है?

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥

रानी, मौका पाकर राजासे अपनी तरफसे समझाकर कहिएगा कि लक्ष्मणको घर रोक लिया जाए और भरत वनको जाएँ, यदि यह बात राजाके मनमें ठीक बैठे,

तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥

तो अच्छी तरह सोच-विचारकर ऐसी व्यवस्था कर दें। मुझे भरतकी बहुत चिंता है, उनके मनमें गहरा प्रेम छिपा है, उनका घर रहना मुझे ठीक नहीं लगता।

लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥

कौसल्याका स्वभाव और उनकी सरल सुंदर वाणी सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें डूब गईं। आकाशसे फूलोंकी झड़ी लगी और धन्य-धन्यकी ध्वनि गूँजी, सिद्ध-योगी-मुनि तक स्नेहसे द्रवित हो उठे।

सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥

सारा रनिवास यह देखकर स्तब्ध रह गया, तब सुमित्राने धीरज धरकर कहा - देवी, दो घड़ी रात बीत चुकी है। यह सुनकर राम की माता कौसल्या प्रेमसे उठीं।

दोहा

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय२८४

और स्नेहसे सच्चे मनसे बोलीं - अब जल्दी अपने डेरे चलिए। हमारा तो अब ईश्वर ही सहारा है, या फिर मिथिलेश्वर जनक ही मददगार हैं।

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥

कौसल्याका यह स्नेह और विनम्र वचन देखकर-सुनकर जनककी पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिए और बोलीं - देवी, आपकी ऐसी नम्रता स्वाभाविक ही है, आप दशरथकी रानी और राम की माता हैं।

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥

प्रभु अपने नीचोंका भी आदर करते हैं, जैसे आग धुएँको और पर्वत घासको भी अपने ऊपर धारण करता है। हमारे राजा तो तन-मन-वचनसे आपके सेवक हैं, और शिव-पार्वती सदा उनके सहायक हैं।

रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै॥रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥

आपकी सहायता करने योग्य संसारमें कौन है? दीपक सूर्यकी मदद करने जाए तो क्या शोभा पाएगा? राम वनमें जाकर देवताओंका काम पूरा करके अयोध्यामें अटल राज्य करेंगे।

अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल॥यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥

देवता, नाग और मनुष्य सब राम की भुजाओंके बलपर अपने-अपने स्थानोंमें सुखसे बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनिने पहले ही कह रखा है, देवी, मुनिकी बात झूठी नहीं हो सकती।

दोहा

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ२८५

ऐसा कहकर बड़े प्रेमसे चरणोंमें गिरकर सीताको साथ भेजनेकी विनती की, और आज्ञा पाकर सीताकी माता सीतासहित डेरेकी ओर चलीं।

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥

जानकी अपने प्रिय परिजनोंसे जिस-जिसके योग्य था उसी तरहसे मिलीं। जानकीको तपस्विनी-वेषमें देखकर सब बहुत व्याकुल हो उठे।

जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की॥

जनक राम के गुरुकी आज्ञा पाकर डेरेकी ओर चले और सीताको देखा। जनकने अपनी प्रिय, प्राणोंसे प्यारी बेटी जानकीको हृदयसे लगा लिया।

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥

उनके हृदयमें प्रेमका सागर उमड़ पड़ा, राजाका मन मानो प्रयाग बन गया। उन्होंने देखा कि सीताके स्नेहरूपी अक्षयवटपर राम का प्रेमरूपी बालक कैसा शोभित हो रहा है।

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥

जनकका ज्ञानरूपी चिरंजीवी मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो इस प्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया। असलमें विदेहराजकी बुद्धि मोहमें नहीं डूबी - यह तो सीता-रामके प्रेमकी ही महिमा है।

दोहा

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि२८६

पिता-माताके स्नेहके आगे सीता इतनी विकल हो उठीं कि खुदको सँभाल न सकीं, पर धैर्यवती पृथ्वीपुत्रीने समय और धर्मका विचार करके धीरज धर लिया।

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥

सीताको तपस्विनी-वेषमें देखकर जनकको विशेष प्रेम और संतोष हुआ - बेटी, तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए, तेरे उज्ज्वल यशसे सारा जगत रोशन हो रहा है, ऐसा सब कहते हैं।

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥

तेरी कीर्तिरूपी नदीने गंगाको भी पीछे छोड़कर करोड़ों ब्रह्मांडोंमें बहना शुरू कर दिया है। गंगाने तो धरतीपर बस तीन ही तीर्थ बड़े बनाए, पर तेरी इस कीर्तिने अनगिनत संत-समाजरूपी तीर्थ रच डाले।

पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥

पिताने स्नेहसे यह सच्ची बात कही, पर अपनी तारीफ सुनकर सीता मानो संकोचमें सिमट गईं। फिर माता-पिताने उन्हें गले लगाया और हितकी सुंदर सीख व आशीर्वाद दिए।

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥

सीता कुछ कहती नहीं पर मनमें संकोच है कि रातमें यहाँ ठहरना ठीक नहीं। रानी सुनयनाने सीताका मन भाँपकर राजासे कह दिया, दोनों मन-ही-मन उनके शील-स्वभावकी सराहना करने लगे।

दोहा

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि२८७

राजा-रानीने बार-बार गले मिलकर, सम्मान करके सीताको विदा किया। फिर चतुर रानीने सही समय देखकर राजासे भरतकी दशाका वर्णन किया।

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥

भरतका ऐसा व्यवहार सुनकर, जो सोनेमें सुगंध और अमृतमें चंद्रमाके सारजैसा है, राजाने प्रेमसे भरी आँखें मूँद लीं, शरीर रोमांचित हो उठा और मन-ही-मन उनके सुयशकी सराहना करने लगे।

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥

बोले - सुनयनी, ध्यान से सुनो, भरतकी कथा संसारके बंधनसे मुक्त करनेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार - इनमें जितनी मेरी समझ है, उतना बताता हूँ।

सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥

पर मेरी वह बुद्धि भी भरतकी महिमाका वर्णन तो दूर, छलसे भी उसकी परछाईं नहीं छू सकती। ब्रह्मा, गणेश, शेष, शिव, सरस्वती, कवि, विद्वान, बुद्धिमान -

भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥

भरतका चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल वैभव - सुनने-समझनेमें सबको सुख देते हैं, पवित्रतामें गंगाको और मिठासमें अमृतको भी मात देते हैं।

दोहा

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि२८८

भरत असीम गुणोंवाले, बेमिसाल पुरुष हैं - भरतकी तुलना सिर्फ भरतसे ही हो सकती है। सुमेरुको भला बटखरेके बराबर कैसे कहा जाए? इसलिए कविसमाजकी बुद्धि भी उन्हें किसीसे उपमा देते हुए सकुचा जाती है।

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥

श्रेष्ठ वर्णवाली, भरतकी महिमा सबके लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित धरतीपर मछलीका चलना। रानी, भरतकी अपार महिमा को अकेले राम ही जानते हैं, पर वे भी उसे पूरा बयान नहीं कर सकते।

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥

इस तरह प्रेमसे भरतके प्रभावका वर्णन करके, पत्नीके मनकी इच्छा भाँपकर राजाने कहा - लक्ष्मण लौट जाएँ और भरत वनको जाएँ, इसीमें सबका भला है, यही सबके मनमें भी है।

देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की॥

पर देवी, भरत और रघुनाथका प्रेम और परस्पर विश्वास तर्कसे नहीं समझा जा सकता। राम भले समताकी सीमा हों, पर भरत तो प्रेम और ममताकी सीमा हैं।

परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥साधन सिद्ध राम पग नेहू।। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥

भरतने परमार्थ, स्वार्थ और सुख - इनकी ओर सपनेमें भी नहीं देखा। राम के चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही उनकी सिद्धि है - मुझे तो भरतका बस यही एक सिद्धांत जान पड़ता है।

दोहा

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ२८९

राजाने भावुक होकर कहा - भरत भूलकर भी राम की आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे, इसलिए स्नेहवश चिंता करनेकी जरूरत नहीं।

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥

राम और भरतके गुण गिनते-गिनते पति-पत्नीको सारी रात पलकी तरह बीत गई। सुबह दोनों राजसमाज जागे और स्नान करके देवताओंकी पूजा करने लगे।

गे नहाइ गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई॥नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥

स्नान करके रघुनाथ गुरुके पास गए, चरण वंदन करके उनका रुख पाकर बोले - नाथ, भरत, नगरवासी और सब माताएँ शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं।

सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा॥

मिथिलापति जनकको भी समाजसहित यह कष्ट सहते बहुत दिन हो गए। इसलिए नाथ, जो उचित हो वही कीजिए, सबका भला अब आपके ही हाथमें है।

अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥

यह कहकर रघुनाथ बहुत सकुचा गए, उनका शील-स्वभाव देखकर मुनि रोमांचित हो उठे - राम, तुम्हारे बिना दोनों राजसमाजोंके सारे सुख-साधन भी नरकके समान हैं।

दोहा

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम२९०

राम, तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माकी भी आत्मा, सुखके भी सुख हो। तात, तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर अच्छा लगता है, विधाता उन्हींके विरुद्ध समझो।

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥

जहाँ राम के चरणोंमें प्रेम नहीं, वह सुख-कर्म-धर्म जल जाए। जिसमें राम प्रेमकी प्रधानता नहीं, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है।

तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥

तुम्हारे बिना सब दुखी हैं, और जो सुखी हैं वे तुम्हारे ही कारण सुखी हैं। हर किसीके मनकी बात तुम जानते हो, तुम्हारी आज्ञा सबके सिरपर है, कृपालु, तुम्हें सबकी दशा भलीभाँति मालूम है।

आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥

इसलिए आप आश्रमको पधारिए। यह कहते-कहते मुनिराज स्नेहसे भर उठे। फिर राम प्रणाम करके चले गए और वसिष्ठ धीरज धरकर जनकके पास आए।

राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए॥महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥

गुरुने राम के शील और स्नेहभरे स्वभावसे यह सुंदर बात राजा जनकको सुनाई - महाराज, अब वही कीजिए जिससे धर्मसहित सबका भला हो।

दोहा

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल२९१

राजन, आप ज्ञानके भंडार, सुजान, पवित्र और धर्ममें दृढ़ हैं। इस समय आपके सिवा इस दुविधाको सुलझाने में और कौन समर्थ है?

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥

मुनिकी बात सुनकर जनक प्रेममें डूब गए, उनकी दशा देखकर मानो ज्ञान-वैराग्यको भी वैराग्य हो गया। स्नेहसे शिथिल होकर सोचने लगे कि यहाँ आना ठीक नहीं किया।

रामहि राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥

राजा दशरथने राम को वन भेजा और अपने प्रेमको प्राणोंसे सच्चा साबित कर दिया, पर हम इन्हें और गहरे वनमें भेजकर अपने विवेककी बड़ाई करते हुए लौटेंगे।

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा॥

तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सुनकर-देखकर प्रेमसे बहुत व्याकुल हो उठे। समय समझकर धीरज धरते हुए जनक समाजसहित भरतके पास चले।

भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥

भरतने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उचित आसन दिए। तिरहुतराज जनक बोले - तात भरत, तुम राम का स्वभाव जानते ही हो।

दोहा

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु२९२

राम सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील-स्नेह रखते हैं, इसीलिए संकोचवश यह कष्ट सह रहे हैं - अब तुम जो आज्ञा दो, वही उन्हें बताई जाए।

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥

यह सुनकर रोमांचित होकर, आँखोंमें आँसू भरकर, बड़ा धीरज धरकर भरत बोले - प्रभु, आप पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं, और कुलगुरु-जैसा हितैषी तो माता-पिता भी नहीं होते।

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी॥

विश्वामित्र-जैसे मुनि और मंत्रियोंका समाज है, और आज ज्ञानसागर आप स्वयं यहाँ हैं। स्वामी, मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञाकारी समझकर शिक्षा दीजिए।

एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥

इस पवित्र सभामें आप जैसोंसे पूछना ही उचित होता, चुप रहूँ तो मलिन समझा जाऊँगा, बोलूँ तो पागलपन - फिर भी छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ, तात, विधाताको दोषी मानकर क्षमा कीजिएगा।

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥

वेद-शास्त्र-पुराणोंमें प्रसिद्ध है, सारा जगत जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामिधर्म और स्वार्थमें विरोध होता है, वैर अंधा होता है और प्रेमको होश नहीं रहता।

दोहा

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि२९३

इसलिए मुझे पराधीन मानकर, राम की रुचि और सत्यके व्रतको बनाए रखते हुए, जो सबको मान्य और सबके लिए हितकर हो, आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिए।

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥

भरतके यह वचन और स्वभाव देखकर राजा जनक समाजसहित उनकी सराहना करने लगे - भरतकी बात सुगम भी है, अगम भी, कोमल भी, कठोर भी - शब्द थोड़े पर अर्थ अपार।

ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥

जैसे मुखका प्रतिबिंब आईनेमें दिखता है, आईना हाथमें होते हुए भी वह पकड़ में नहीं आता - वैसे ही भरतकी यह अद्भुत बात भी समझमें आकर भी पकड़में नहीं आती। तब राजा जनक, भरत और मुनि समाजसहित वहाँ गए जहाँ देवतारूपी कुमुदोंको खिलानेवाले चंद्रमा राम थे।

सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥देव प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥

यह खबर सुनकर सब लोग चिंतासे व्याकुल हो उठे, जैसे नई बरसातके पानीसे मछलियाँ बेचैन होती हैं। देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्ठकी दशा देखी, फिर जनककी गहरी भावुकता देखी,

राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥

और फिर राम-भक्तिमें डूबे भरतको देखा। यह सब देखकर स्वार्थी देवता घबराकर हतोत्साहित हो गए, हर किसीको राम प्रेममें सराबोर पाया, और खुद इतनी चिंतामें डूब गए जिसका हिसाब ही नहीं।

दोहा

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु२९४

देवराज इंद्र चिंतित होकर बोले - राम तो स्नेह और संकोचके वश हैं, इसलिए सब मिलकर कोई तरकीब निकालो, नहीं तो काम बिगड़ा ही समझो।

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥

देवताओंने सरस्वतीका स्मरण करके उनकी स्तुति की - देवी, हम शरणागत हैं, रक्षा कीजिए, अपनी माया रचकर भरतकी बुद्धि पलट दीजिए और छलसे देवकुलकी रक्षा कीजिए।

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥

देवताओंकी यह विनती सुनकर और उन्हें स्वार्थवश मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वती बोलीं - मुझसे कहते हो भरतकी बुद्धि पलट दूँ? हजार आँखोंसे भी तुम्हें सुमेरु नहीं दिखता!

बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिवकी माया भी इतनी विशाल है, फिर भी वह भरतकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती - उसे तुम मुझसे भोली बनवाना चाहते हो? क्या चाँदनी कभी सूरजकी तेज किरणें चुरा सकती है?

भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥

भरतके हृदयमें तो सीता-रामका वास है, जहाँ सूरजका उजाला हो वहाँ अंधेरा कैसे टिकेगा? ऐसा कहकर सरस्वती ब्रह्मलोक चली गईं, देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रातमें चकवा तड़पता है।

दोहा

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु२९५

मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाहसे एक षड्यंत्र रचा, अपनी प्रबल मायासे भय, भ्रम, अनबन और उथल-पुथल फैला दी।

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥

यह कुचाल करके भी इंद्र चिंतित ही रहे कि सब कुछ भरतके ही हाथमें है। इधर जनक राम के पास पहुँचे, सूर्यकुलदीपक राम ने सबका सम्मान किया,

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥

तब समय, समाज और धर्मके अनुकूल वसिष्ठ बोले। उन्होंने पहले जनक-भरतका संवाद सुनाया, फिर भरतकी कही सुंदर बातें दोहराईं।

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥

तात राम, मेरा तो यही मत है कि तुम जो आज्ञा दो वही सब करें। यह सुनकर रघुनाथ हाथ जोड़कर सच्ची, सरल, कोमल वाणीमें बोले -

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥

आप और मिथिलेश्वर जनक स्वयं मौजूद हैं, ऐसेमें मेरा कुछ कहना अनुचित होगा। आप दोनोंकी जो भी आज्ञा होगी, मैं आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ, वही सबको शिरोधार्य होगी।

दोहा

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत२९६

राम की यह शपथ सुनकर मुनि और जनक सभासहित सकुचा गए, किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, सब भरतका मुँह ताकने लगे।

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी॥कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा॥

भरतने सभाको संकोचमें देखा, बड़ा धीरज धरकर और कुसमय जानकर अपने उमड़ते प्रेमको ऐसे सँभाला जैसे अगस्त्यने बढ़ते विंध्याचलको रोका था।

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥

शोकने सारी सभाकी विमल गुणोंसे भरी बुद्धिरूपी धरतीको हर लिया था, पर भरतके विवेकरूपी विशाल वराहने बिना किसी परिश्रमके उसे तुरंत उबार लिया।

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥

भरतने प्रणाम करके सबको हाथ जोड़े - राम, राजा जनक, गुरु और साधुओंसे विनती की - आज मेरे इस अनुचित व्यवहारको क्षमा करें, मैं छोटे मुँहसे कठोर बात कह गया।

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥

फिर उन्होंने हृदयमें सुंदर सरस्वतीका स्मरण किया, वे मानो उनके मनरूपी मानसरोवरसे मुखपर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे भरी भरतकी वाणी सुंदर हंसिनीके समान है।

दोहा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु२९७

विवेककी आँखोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देखकर, सबको प्रणाम करके, सीता-रामका स्मरण करते हुए भरत बोले -

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥

प्रभु, आप पिता, माता, मित्र, गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अंतर्यामी हैं। सरलहृदय, श्रेष्ठ स्वामी, शीलके भंडार, शरणागतवत्सल, सर्वज्ञ, सुजान,

समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई॥

समर्थ, शरणागतके हितैषी, गुणग्राहक और अवगुण-पाप हरनेवाले हैं। गोसाईं, आप-जैसा स्वामी आप ही हैं, और स्वामीसे द्रोह करनेमें मेरे जैसा मैं ही हूँ।

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥

मैं मोहवश प्रभु और पिताके वचनोंको टालकर समाज जुटाकर यहाँ आया हूँ। संसारमें भला-बुरा, ऊँच-नीच, अमृत-अमरपद, विष-मृत्यु आदि -

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥

कहीं देखा-सुना नहीं कि कोई मनसे भी राम की आज्ञा टाल दे, पर मैंने हर तरहसे यही ढिठाई की, फिर भी प्रभुने इसे स्नेह और सेवा मानकर स्वीकार कर लिया।

दोहा

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर२९८

नाथ, आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरे दोष भी गुण-जैसे बन गए और चारों ओर मेरा सुयश फैल गया।

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥

आपकी रीति और सुंदर स्वभावकी बड़ाई संसारमें प्रसिद्ध है, वेद-शास्त्रोंने भी गाई है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलहीन, नास्तिक और निडर हैं,

ते सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥

उन्हें भी आपने शरणमें आया देखकर एक ही प्रणामपर अपना लिया। उनके दोष देखकर भी कभी मनमें नहीं रखा, बल्कि उनके गुण सुनकर साधु-समाजमें उनकी तारीफ की।

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥

ऐसा सेवकपर मेहरबान स्वामी और कौन होगा, जो खुद ही सेवककी सारी जरूरतें पूरी कर दे, और सपनेमें भी अपनी करनी न मानते हुए सेवककी झिझक और चिंताको अपने दिलमें रखे!

सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥

मैं हाथ उठाकर, प्रण करके कहता हूँ - आपके सिवा ऐसा दूसरा स्वामी कोई नहीं। पशु नाच सकते हैं, तोते पाठ रट सकते हैं, पर यह सब सिखानेवाले और नचानेवालेके ही अधीन होता है।

दोहा

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर२९९

इस तरह अपने सेवकोंकी बात सुधारकर, सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया - आपके सिवा कौन इस तरह अपनी विरदावली जिद करके निभाएगा?

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥

मैं शोक, स्नेह या बचपने के कारण आज्ञा टालकर चला आया, फिर भी कृपालु स्वामीने अपनी ओरसे इसे हर तरहसे अच्छा ही माना।

देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जाने स्वामि सहज अनुकूला॥बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥

मैंने सब मंगलोंकी जड़ आपके चरणोंका दर्शन पाया और जाना कि स्वामी स्वभावसे ही मुझपर अनुकूल हैं। इस बड़े समाजमें अपना भाग्य देखा - इतनी बड़ी भूल होनेपर भी स्वामीका मुझपर इतना प्रेम है!

कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं॥

कृपानिधानने मुझपर बहुत ज्यादा ही कृपा और अनुग्रह किया - हे गोसाईं, आपने अपने शील और भलेपनसे मेरा दुलार बनाए रखा।

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥

नाथ, मैंने स्वामी और समाजका संकोच भुलाकर, अविनय या विनयभरी जैसी भी बात मन आई कही - यह पूरी ढिठाई है। देव, मेरी बेचैनी समझकर क्षमा करेंगे।

दोहा

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।आयसु देइअ देव अब सब सुधारी मोरि३००

सुहृद, बुद्धिमान और श्रेष्ठ स्वामीसे इतना ज्यादा कहना बड़ा अपराध है। देव, अब आज्ञा दीजिए, आपने मेरी सारी बात सुधार दी।

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सी सुहाई॥सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥

प्रभुके चरणकमलोंकी धूलकी सौगंध, जो सत्य, पुण्य और सुखकी पराकाष्ठा है - उसकी दुहाई देकर मैं अपने मनकी जागते-सोते-सपनेमें बनी रहनेवाली इच्छा कहता हूँ।

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥

वह इच्छा है - छल, स्वार्थ और चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। आज्ञापालनसे बढ़कर श्रेष्ठ स्वामीकी कोई सेवा नहीं - देव, अब सेवकको वही आज्ञारूपी वरदान मिले।

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥

यह कहकर भरत प्रेमसे अभिभूत हो गए, शरीर रोमांचित हुआ, आँखें भर आईं। व्याकुल होकर उन्होंने प्रभुके चरण पकड़ लिए - उस पलका स्नेह बयान नहीं हो सकता।

कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥

कृपासागर राम ने मीठी वाणीसे सम्मान करके उनका हाथ थामकर पास बिठाया। भरतकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और रघुनाथ स्वयं स्नेहसे भर उठे।

छंद

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी॥भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥

रघुनाथ, साधु-समाज, मुनि वसिष्ठ और जनक सब स्नेहसे भर गए, सब मन-ही-मन भरतके भाईपन और भक्तिकी गहरी महिमा सराह रहे थे। देवता प्रशंसा करते हुए फूल बरसाने लगे। तुलसीदास कहते हैं - सब लोग भरतकी बात सुनकर इतने व्याकुल हुए जैसे रातके आगमनसे कमल सिकुड़ जाते हैं।

सोरठा

देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत३०१

दोनों समाजोंके सब नर-नारीको दीन-दुखी देखकर मलिन मनका इंद्र मरे हुओंको मारकर भी अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।

कपट कुचालि सी सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥

देवराज इंद्र कपट और कुचालकी हद है, उसे दूसरोंका नुकसान और अपना फायदा ही प्यारा है। उसकी चाल कौए-जैसी है, वह छली और मलिन मनका है, किसीपर उसे भरोसा नहीं।

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥

पहले उसने बुरी सोचसे कपट बटोरा, फिर वह उचाट सबके सिरपर डाल दिया। फिर देवमायासे सबको मोहित कर दिया, पर राम के प्रति उनका प्रेम पूरी तरह नहीं टूटा।

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥

भय और उचाटके कारण किसीका मन स्थिर नहीं रहा - कभी वनमें रहनेकी इच्छा होती, कभी घर अच्छा लगने लगता। मनकी इस दुविधासे प्रजा दुखी हो रही थी, मानो नदी-सागरके संगमका पानी अशांत हो।

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥

मन बँटा होनेसे उन्हें कहीं संतोष नहीं मिलता, वे एक-दूसरेसे अपनी उलझन भी नहीं कह पाते। यह देखकर कृपानिधान राम मनमें हँसकर बोले - कुत्ता, इंद्र और युवक तीनों एक जैसे ही होते हैं।

दोहा

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ३०२

भरत, जनक, मुनिजन, मंत्री और सचेत साधु-संतोंको छोड़कर बाकी सबपर, जिसकी जैसी प्रकृति थी उसी अनुसार देवमाया असर कर गई।

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥

कृपासागर राम ने लोगोंको अपने स्नेह और इंद्रके भारी छलसे दुखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मंत्री - सबकी बुद्धिको भरतकी भक्तिने थाम रखा था।

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥

सब लोग तस्वीरकी तरह स्थिर होकर राम को देख रहे हैं, सकुचाते हुए रटे-रटाए वचन बोल रहे हैं। भरतका प्रेम, विनम्रता, नम्रता और बड़प्पन सुननेमें तो सुखद है, पर बयान करना कठिन है।

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥

जिनकी भक्तिकी एक झलक देखकर मुनिगण और मिथिलेश जनक तक प्रेममें डूब गए, उन भरतकी महिमा तुलसीदास कैसे बयान करे? उनकी भक्ति और सुंदर भावसे मन में सुबुद्धि उमड़ रही है।

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥

पर वह बुद्धि खुदको छोटा और भरतकी महिमाको बड़ा जानकर, कविपरंपराकी मर्यादा माननकर सकुचा गई। गुण कहनेकी चाह तो बहुत है, पर कह नहीं पाती - बुद्धिकी गति बच्चेकी बोलीजैसी हो गई।

दोहा

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि३०३

भरतका निर्मल यश निर्मल चाँद है और सुबुद्धि चकोरी, जो भक्तोंके हृदयरूपी आकाशमें उस चाँदको उदय होते देखकर टकटकी लगाए निहारती ही रह गई।

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥

भरतका स्वभाव तो वेदोंके लिए भी सुगम नहीं, मेरी छोटी बुद्धिकी यह चंचलता कवि क्षमा करें - भरतके सद्भावको सुन-कहकर कौन सीता-रामके चरणोंमें अनुरक्त न होगा।

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को॥देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥

भरतको याद करनेसे जिसे राम का प्रेम न मिला, उससे बड़ा अभागा और कौन होगा? दयालु सुजान राम ने सबकी दशा और भक्तके मनकी हालत जानकर,

धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥

धर्मधुरंधर, धीर, नीतिनिपुण, सत्य-स्नेह-शील-सुखके सागर, नीति-प्रीतिके रक्षक रघुनाथने देश-काल-अवसर और समाज देखकर,

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥

ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीका सर्वस्व थे, परिणाममें हितकारी और सुननेमें चाँदनीके अमृतजैसे मीठे थे - तात भरत, तुम धर्मधुरंधर, लोक-वेद दोनोंके ज्ञाता और प्रेममें निपुण हो।

दोहा

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात३०४

तात, कर्म-वचन-मनसे निर्मल तुम्हारे समान बस तुम ही हो। गुरुजनोंकी इस सभामें और ऐसे कठिन समयमें छोटे भाईके गुण कैसे बयान किए जाएँ?

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥

तात, तुम सूर्यकुलकी रीति, सत्यप्रतिज्ञ पिताकी कीर्ति और प्रीति, समय-समाज और गुरुजनकी मर्यादा, तथा उदासीन-मित्र-शत्रु सबके मनकी बात जानते हो।

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥

तुम्हें सबके कर्तव्यका और अपने-मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुमपर पूरा भरोसा है, फिर भी समयके अनुसार कुछ कहता हूँ।

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी॥नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥

तात, पिताके बिना हमारी बात अबतक बस गुरुकुलकी कृपासे ही सँभली है, नहीं तो हमारे साथ प्रजा, कुटुंब, परिवार सब बर्बाद हो जाते।

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥

यदि समयसे पहले ही सूरज डूब जाए तो जगतमें किसे दुख न होगा? तात, विधाताने ठीक वैसा ही उत्पात किया, पर मुनि और मिथिलेशने सबको सँभाल लिया।

दोहा

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम३०५

राज्यका सारा काम, लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन, घर - इन सबकी रक्षा गुरुका प्रभाव करेगा, और परिणाम शुभ ही होगा।

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥

समाजसहित घर और वनमें तुम्हारी और मेरी रक्षा गुरुकी कृपा ही करेगी। माता-पिता-गुरु-स्वामीकी आज्ञा माननी ही सारे धर्मको धारण करनेवाले शेषनागके समान है।

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥

तात, तुम वही करो और मुझसे भी करवाओ, सूर्यकुलके रक्षक बनो। यह आज्ञापालन ही एक ऐसी साधना है जो सारी सिद्धियाँ, कीर्ति, सद्गति और ऐश्वर्य एक साथ देती है।

सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥

यह सोचकर भारी संकट सहकर भी प्रजा-परिवारको सुखी रखो। भाई, मेरी विपत्ति सबने बाँट ली, पर तुम्हें चौदह वर्षतक सबसे बड़ी कठिनाई झेलनी होगी।

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥

तुम्हें कोमल जानते हुए भी मैं कठोर बात कह रहा हूँ, तात, बुरे समयमें यह अनुचित नहीं। मुसीबतके वक्त अच्छे भाई ही सहारा बनते हैं, वज्रका वार भी हाथसे ही रोका जाता है।

दोहा

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ३०६

सेवक हाथ-पैर-आँखोंकी तरह और स्वामी मुखकी तरह होना चाहिए। तुलसीदास कहते हैं - ऐसी सेवक-स्वामी प्रीति सुनकर अच्छे कवि उसकी सराहना करते हैं।

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी॥सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥

राम की यह वाणी, जो मानो प्रेमसागरसे निकले अमृतमें सनी थी, सुनकर सारा समाज स्नेहसे शिथिल हो गया, सबको मानो समाधि लग गई - यह दशा देखकर सरस्वती भी चुप हो गईं।

भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥

भरतको बड़ा संतोष हुआ, स्वामीके अनुकूल होते ही उनके दुख-दोष जैसे भाग खड़े हुए। मुख प्रसन्न हो गया, मनका विषाद मिट गया - मानो किसी गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गई हो।

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥

उन्होंने फिर प्रेमसे प्रणाम किया, हाथ जोड़कर बोले - नाथ, आपके साथ जानेका सुख मिल गया, मैंने जन्म लेनेका असली लाभ पा लिया।

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई॥सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥

कृपालु, अब जो आज्ञा हो, मैं उसे सिर चढ़ाकर आदरसे निभाऊँगा, पर देव, मुझे कोई ऐसा सहारा दें जिसकी सेवा करते हुए मैं यह अवधि पार कर सकूँ।

दोहा

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ३०७

देव, आपके अभिषेकके लिए गुरुकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेकर आया हूँ - इसके लिए क्या आज्ञा है?

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभय सकोच जात कहि नाहीं॥कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥

मेरे मनमें एक और बड़ी इच्छा है, जो भय-संकोचके कारण कह नहीं पा रहा। राम ने कहा - भाई, कहो। तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरत स्नेहभरी मीठी वाणीमें बोले -

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥

आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने, पर्वत-समूह और खासकर आपके चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ।

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥

अत्रि ऋषिकी आज्ञा जरूर सिर चढ़ाओ और निर्भय होकर वनमें विचरो। भाई, अत्रि मुनिकी कृपासे यह वन मंगलदायी, परम पवित्र और अत्यंत सुंदर है -

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥

और ऋषिश्रेष्ठ अत्रि जहाँ कहें, वहीं तीर्थोंका जल रख देना। प्रभुके यह वचन सुनकर भरतको सुख मिला और आनंदित होकर मुनि अत्रिके चरणोंमें सिर नवाया।

दोहा

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल३०८

सब मंगलोंकी जड़ यह भरत-राम संवाद सुनकर स्वार्थी देवता भी रघुकुलकी सराहना करते हुए कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे।

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई॥मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥

'भरत धन्य हैं, स्वामी राम की जय हो' कहते हुए देवता बहुत हर्षित हुए। भरतकी बात सुनकर मुनि वसिष्ठ, जनक और सारी सभाको बड़ा उत्साह हुआ।

भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥

भरत और राम के गुण और प्रेमकी जनक रोमांचित होकर प्रशंसा कर रहे हैं - सेवक और स्वामी दोनोंका स्वभाव कितना सुंदर है, इनका नियम और प्रेम पवित्रताको भी और पवित्र कर देता है।

मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥

मंत्री और सभासद सब प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी समझसे सराहना करने लगे। राम-भरतका यह संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके मनमें हर्ष और विषाद दोनों उमड़ आए।

राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥

राम की माता कौसल्याने दुख-सुखको बराबर मानते हुए राम के गुण बताकर बाकी रानियोंको धीरज बँधाया। कोई राम की महानताकी चर्चा करता है, कोई भरतकी अच्छाईकी सराहना करता है।

दोहा

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप३०९

तब अत्रिने भरतसे कहा - इस पर्वतके पास ही एक सुंदर कुआँ है, इस पवित्र, अनोखे, अमृतजैसे तीर्थजलको वहीं रख दीजिए।

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥

भरतने अत्रिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र भिजवा दिए, और छोटे भाई शत्रुघ्न तथा अत्रि मुनि व साधु-संतोंके साथ खुद उस अथाह कुएँपर गए।

पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥

और वह पवित्र जल उस पुण्यस्थानमें रख दिया। तब अत्रिने प्रसन्न होकर कहा - तात, यह अनादि सिद्धस्थान है, कालक्रममें लुप्त हो गया था, इसीलिए किसीको इसका पता नहीं था।

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥

तब सेवकोंने इस उपजाऊ जगहको देखकर उस जलके लिए एक खास कुआँ बना दिया। दैवयोगसे यह सारे संसारके भले का काम बन गया, और जो धर्मविचार अगम था वह सुगम हो गया।

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥

अब लोग इसे भरतकूप कहेंगे, तीर्थजलके मिलनेसे यह अत्यंत पवित्र हो गया है - इसमें नियमपूर्वक प्रेमसे स्नान करनेवाला मन-वचन-कर्मसे निर्मल हो जाएगा।

दोहा

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ३१०

कुएँकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गए जहाँ रघुनाथ थे, और अत्रिने रघुनाथको उस तीर्थके पुण्य-प्रभावकी कथा सुनाई।

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥

प्रेमसे धर्मकी कथाएँ कहते-सुनते वह रात सुखसे बीत गई और सुबह हो गई। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके राम, अत्रि और गुरुकी आज्ञा लेकर,

सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥

समाजसहित सादे वेषमें राम के वनमें भ्रमण करने पैदल चल पड़े। कोमल पैर बिना जूतोंके चलते देखकर धरती मानो सकुचाकर खुद कोमल हो गई।

कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥

कुश, काँटे, कंकड़, दरारें - सब कड़वी-कठोर चीज़ें छिपाकर धरतीने सुंदर, कोमल रास्ता बना दिया। सुखद शीतल-मंद-सुगंधित हवा बहने लगी।

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥

देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, घास अपनी कोमलतासे, हिरण देखकर और पक्षी मीठा बोलकर - सब भरतको राम का प्रिय जानकर उनकी सेवा करने लगे।

दोहा

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात३११

जब एक साधारण मनुष्य भी जँभाई लेते हुए 'राम' कहनेसे सारी सिद्धियाँ पा लेता है, तो राम के प्राणप्रिय भरतके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं।

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥

इस तरह भरत वनमें घूम रहे हैं, उनका नियम और प्रेम देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलाशय, धरतीके अलग-अलग भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, घास, पर्वत, वन, बाग -

चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥

सब खास सुंदर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरत पूछते हैं, और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रि प्रसन्न मनसे हर एकका कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभाव बताते हैं।

कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥

भरत कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थान निहारते हैं, और कहीं मुनिकी आज्ञा पाकर बैठकर सीतासहित राम-लक्ष्मणका स्मरण करते हैं।

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥फिरहिं गए दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥

भरतका स्वभाव, प्रेम और सुंदर सेवा देखकर वनदेवता आनंदित होकर आशीर्वाद देते हैं। इस तरह घूमते-फिरते ढाई पहर दिन बीतनेपर वे लौटकर प्रभुके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं।

दोहा

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ३१२

भरतने पाँच दिनोंमें सब तीर्थस्थान देख लिए। विष्णु और शिवका सुयश कहते-सुनते वह दिन भी बीत गया, शाम हो गई।

भोर नहाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥

अगली सुबह स्नान करके भरत, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज इकट्ठा हुआ। आज विदाईका शुभ दिन जानकर भी कृपालु राम कहनेमें सकुचा रहे हैं।

गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥

राम ने गुरु, राजा जनक, भरत और सारी सभाकी ओर देखा, पर सकुचाकर नजर फेरकर धरतीकी ओर देखने लगे। सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है - राम-जैसा संकोची स्वामी कहीं और नहीं।

भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी॥करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी॥

सुजान भरतने राम का रुख देखकर प्रेमसे उठकर, बड़ा धीरज धरकर दंडवत करके हाथ जोड़कर कहा - नाथ, आपने मेरी हर इच्छा पूरी रखी।

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई॥

मेरे लिए सबने संताप सहा और आपने भी बहुत तरहका दुख झेला। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें, मैं जाकर चौदह वर्षतक अवधकी सेवा करूँ।

दोहा

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखे दीनदयाल।सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल३१३

दीनदयालु, जिस उपायसे यह सेवक फिर आपके चरणोंका दर्शन पाए - कोसलपति, कृपालु, अवधिभरके लिए मुझे वही शिक्षा दीजिए।

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई॥राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥

गोसाईं, आपके प्रेम और नातेसे नगरवासी, कुटुंबी और प्रजा सब पवित्र और आनंदमय हैं। आपके लिए तो जन्म-मरणके दुखमें जलना भी अच्छा है, प्रभुके बिना मोक्षका सुख भी व्यर्थ है।

स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥

स्वामी, आप सुजान हैं, सबके मनकी और मुझ सेवकके दिलकी इच्छा-लालसा जानते हैं। शरणागतवत्सल, आप सबका पालन करेंगे और देव, दोनों तरफकी बात अंततक निभाएँगे।

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किए बिचारु न सोचु खरो सो॥आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥

मुझे हर तरहसे इतना गहरा भरोसा है कि विचार करनेपर तिनकेभर भी चिंता नहीं रहती। मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनों मिलकर मुझे जबरन इतना ढीठ बना गए हैं।

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥

स्वामी, इस बड़े दोषको माफ करके, संकोच छोड़कर अपने अनुगामी सेवकको शिक्षा दीजिए। भरतकी इस विनतीको दूध-पानी अलग करनेवाली हंसिनीकी चालकी तरह सबने सराहा।

दोहा

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन३१४

दीनबंधु, चतुर राम भाई भरतके यह दीन, निष्कपट वचन सुनकर देश-काल-अवसरके अनुकूल वचन बोले -

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥

तात, तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घर-वनकी सारी चिंता गुरु वसिष्ठ और राजा जनकको है। जब हमारे सिरपर गुरु, मुनि और मिथिलेश हैं, तो हमें-तुम्हें सपनेमें भी कोई कष्ट नहीं।

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई॥

मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिताकी आज्ञा मानें - राजाकी बात निभाना ही लोक और वेद दोनोंमें भला है।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई॥

गुरु-पिता-माता-स्वामीकी सीख माननेसे कुमार्गपर चलकर भी पैर गड्ढेमें नहीं पड़ता। यह सोचकर सारा सोच छोड़कर अवध जाकर चौदह वर्षतक उसका पालन करो।

देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥

देश, खजाना, कुटुंब-परिवार सबकी जिम्मेदारी गुरुके चरणोंकी धूलपर है। तुम बस मुनि, माताओं और मंत्रियोंकी सीख मानते हुए प्रजा और राजधानीका पालन करते रहना।

दोहा

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक३१५

तुलसीदास कहते हैं - राम ने कहा, मुखिया मुखकी तरह होना चाहिए, जो खुद खाता तो एक अकेला है, पर विवेकसे शरीरके सारे अंगोंका पालन-पोषण करता है।

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥

राजधर्मका पूरा सार बस इतना ही है, जैसे मनके भीतर इच्छा छिपी रहती है। रघुनाथने भाई भरतको बहुत तरहसे समझाया, पर बिना किसी सहारेके उनके मनको न संतोष मिला न शांति।

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥

एक तरफ भरतका प्रेम, दूसरी तरफ गुरुजन-मंत्री-समाजकी उपस्थिति - यह देखकर रघुनाथ संकोच और स्नेह दोनोंके वश हो गए। आखिर प्रभुने कृपा करके खड़ाऊँ दे दीं और भरतने आदरसे उन्हें सिरपर धारण कर लिया।

चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥

करुणानिधानकी वे दोनों खड़ाऊँ मानो प्रजाके प्राणोंकी रक्षा करनेवाले दो पहरेदार हैं, भरतके प्रेमरूपी रत्नके लिए मानो डिब्बा और जीवके उद्धारके लिए मानो राम-नामके दो अक्षर हैं।

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥

रघुकुलकी रक्षाके लिए दो किवाड़, अच्छे कर्म करनेके लिए दो हाथ, और सेवारूपी धर्मको सुझानेके लिए निर्मल आँखें - इस सहारेको पाकर भरत इतने आनंदित हुए जितना सीता-रामके साथ रहनेसे होता।

दोहा

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ३१६

भरतने प्रणाम करके विदा माँगी, राम ने उन्हें गले लगा लिया। इधर कुटिल इंद्रने बुरा मौका पाकर लोगोंमें उथल-पुथल मचा दी।

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥

वह कुचाल भी अंततः सबके भले के लिए हो गई, मानो अवधिकी आशाके समान जीवनके लिए संजीवनी बन गई। नहीं तो लक्ष्मण-सीता-रामके वियोगसे सब लोग घबराकर मर ही जाते।

रामकृपाँ . अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥

राम की कृपाने सारी गड़बड़ सुधार दी, लूटने आई देवसेना ही रक्षक बन गई। राम भाई भरतको बाँहोंमें भरकर मिल रहे हैं - उस प्रेमके आनंदका वर्णन नहीं हो सकता।

तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥

तन-मन-वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा, धीरजके धनी रघुनाथने भी धैर्य खो दिया - कमल-जैसे नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। यह दशा देखकर देवताओंकी सभा भी दुखी हो गई।

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥

मुनिगण, गुरु वसिष्ठ और जनक-जैसे धीरधुरंधर, जिन्होंने अपने मनको ज्ञानकी आगमें सोनेकी तरह तपाया था, जिन्हें ब्रह्माने निर्लेप रचा और जो संसाररूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह अनासक्त पैदा हुए,

दोहा

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार३१७

वे भी राम-भरतके इस अनुपम, अपार प्रेमको देखकर तन-मन-वचनसे, वैराग्य-विवेकसहित उसी प्रेममें डूब गए।

जहाँ जनक गुर गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥

जहाँ जनक और गुरु वसिष्ठकी बुद्धि भी कुंठित हो गई, उस दिव्य प्रेमको सांसारिक कहना बड़ा अपराध होगा। राम-भरतके वियोगका वर्णन सुनकर लोग कविको निष्ठुर ही समझेंगे।

सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥

वह संकोचभरा रस बयान से परे है, इसीलिए कविकी वाणी भी उस पलके प्रेमको याद करके सकुचा गई। भरतसे मिलकर रघुनाथने उन्हें समझाया, फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नको भी गले लगाया।

सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥

सेवक और मंत्री भरतका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें लग गए। यह सुनकर दोनों समाजोंमें भारी दुख छा गया, वे चलनेकी तैयारी करने लगे।

प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥

प्रभुके चरणकमल वंदन करके और राम की आज्ञा शिरोधार्य करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उन्होंने विनती की।

दोहा

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि३१८

फिर लक्ष्मणसे मिलकर, प्रणाम करके, सीताके चरणोंकी धूल सिरपर धारण करके और सब मंगलोंकी जड़ आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चल पड़े।

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥

छोटे भाई लक्ष्मणसहित राम ने राजा जनकको सिर नवाकर बहुत तरहसे विनती और उनकी बड़ाई की - देव, आपने दयावश बड़ा कष्ट सहा, समाजसहित वनमें आए।

पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥

अब आशीर्वाद देकर नगर लौट जाइए। यह सुनकर राजा जनकने धीरज धरकर प्रस्थान किया। फिर राम ने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु-शिवके समान मानकर सम्मानपूर्वक विदा किया।

सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥

तब राम-लक्ष्मण दोनों भाई सास सुनयनाके पास गए, चरण वंदन करके आशीर्वाद पाकर लौट आए। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और सदाचारी कुटुंबी, नगरवासी, मंत्री -

जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥

सबको यथायोग्य विनय और प्रणाम करके लक्ष्मणसहित राम ने विदा किया। कृपानिधान राम ने छोटे-मझले-बड़े सभी स्त्री-पुरुषोंका सम्मान करके उन्हें लौटाया।

दोहा

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि३१९

भरतकी माता कैकेयीके चरण वंदन करके प्रभु राम ने निश्छल प्रेमसे उनसे भेंट की और उनका सारा संकोच-सोच मिटाकर पालकी सजाकर उन्हें विदा किया।

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥

प्राणप्रिय पति राम के साथ निष्ठावान सीता नैहरके कुटुंबियों और माता-पितासे मिलकर लौट आईं। फिर प्रणाम करके सब सासुओंसे गले मिलीं - उस प्रेमका वर्णन करते कविका मन भी हुलसित नहीं होता।

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई॥

उनकी सीख सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीता दोनों ओरके प्रेममें डूबी रहीं। फिर रघुनाथने सुंदर पालकियाँ मँगवाईं और सांत्वना देकर सब माताओंको उनपर बिठाया।

बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई॥साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥

दोनों भाइयोंने बार-बार गले मिलकर बराबर स्नेहसे माताओंको विदा किया। भरत और राजा जनककी सेनाओंने घोड़े-हाथी-सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया।

हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता॥बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें॥

सीता-लक्ष्मणसहित राम को हृदयमें बसाए सब लोग बेसुध होकर चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े, हाथी तक हारे हुए मनसे परवश चले जा रहे हैं।

दोहा

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत३२०

गुरु और गुरुपत्नी अरुंधतीके चरण वंदन करके सीता-लक्ष्मणसहित प्रभु राम हर्ष और विषाद दोनों लिए लौटकर पर्णकुटीमें आए।

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥

फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया, वह गया तो सही पर हृदयमें विरहका भारी दुख लिए। फिर कोल-किरात-भील वनवासियोंको भी लौटाया, वे जोहार करते हुए विदा हुए।

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥

प्रभु, सीता और लक्ष्मण बरगदकी छायामें बैठकर प्रियजनों और परिवारके वियोगसे दुखी हो रहे हैं। भरतके स्नेह, स्वभाव और सुंदर वाणीको याद करते हुए वे सीता और लक्ष्मणसे बातें कर रहे हैं।

प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥

राम ने प्रेमवश अपने मुखसे भरतके प्रेम, विश्वास और आचरणका वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु, मछलियाँ - चित्रकूटके सभी जड़-चेतन जीव उदास हो गए।

बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥

रघुनाथकी यह दशा देखकर देवताओंने फूल बरसाकर अपनी-अपनी व्यथा सुनाई। प्रभुने प्रणाम करके उन्हें आश्वासन दिया, तब वे प्रसन्न मनसे चले, मनमें तनिक भी डर नहीं रहा।

दोहा

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर३२१

लक्ष्मण और सीतासहित प्रभु राम पर्णकुटीमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य स्वयं शरीर धारण करके विराजमान हों।

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥

मुनि, ब्राह्मण, गुरु, भरत और राजा जनक - सारा समाज राम के विरहमें व्याकुल है। प्रभुके गुणोंको मनमें दोहराते हुए सब चुपचाप रास्ता तय कर रहे हैं।

जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥

सब यमुना पार करके उस दिन बिना भोजनके ही रह गए। फिर गंगा पार करके दूसरा मुकाम किया, जहाँ रामसखा निषादराजने सारी व्यवस्था कर दी।

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥

फिर सई नदी पार करके गोमतीमें स्नान किया और चौथे दिन अयोध्या पहुँच गए। जनक चार दिन अयोध्यामें रहे और सारा राजकाज सँभालकर,

सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥

मंत्री, गुरु और भरतको राज्य सौंपकर सारी तैयारी करके मिथिलाको चल पड़े। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुकी सीख मानकर राम की राजधानी अयोध्यामें सुखपूर्वक रहने लगे।

दोहा

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस३२२

सब लोग राम के दर्शनकी आस लिए नियम-उपवास करने लगे, गहने-भोग-सुख त्यागकर बस उस अवधिकी प्रतीक्षामें जी रहे हैं।

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे॥पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥

भरतने मंत्रियों और विश्वस्त सेवकोंको समझाया, वे सीख पाकर अपने-अपने काममें जुट गए। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नको बुलाकर सीख दी और सब माताओंकी सेवा उन्हें सौंपी।

भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥

ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतने हाथ जोड़कर, उम्रके अनुसार आदरसे विनती की - कोई भी छोटा-बड़ा, अच्छा-बुरा काम हो, बिना संकोचके आज्ञा दीजिएगा।

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥

फिर परिवार, नगरवासी और प्रजाको बुलाकर उन्हें समझाकर सुखपूर्वक बसाया। फिर शत्रुघ्नसहित गुरुके घर जाकर दंडवत करते हुए हाथ जोड़कर बोले -

आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥

आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक यहीं रहूँ। मुनि वसिष्ठ रोमांचित होकर प्रेमसे बोले - भरत, तुम जो भी समझोगे, कहोगे, करोगे, वही जगतमें धर्मका सार होगा।

दोहा

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि३२३

यह सुनकर और बड़ा आशीर्वाद पाकर भरतने ज्योतिषियोंको बुलाया, शुभ मुहूर्त देखकर प्रभुकी चरण-पादुकाओंको निर्विघ्न सिंहासनपर विराजमान किया।

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥

फिर राम की माता कौसल्या और गुरुके चरणोंमें सिर नवाकर, चरण-पादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मधुरंधर भरतने नंदिग्राममें पर्णकुटी बनाकर वहीं निवास किया।

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥

सिरपर जटा और मुनि-वस्त्र धारण करके, धरती खोदकर उसमें कुशकी शय्या बिछाई। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत-नियम - सबमें वे ऋषियोंका कठिन धर्म प्रेमपूर्वक निभाने लगे।

भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥

गहने, वस्त्र और तमाम भोग-सुख मन-वचन-कर्मसे पूरी तरह त्याग दिए। जिस अयोध्याके राज्यको इंद्र तक तरसते थे और जिसकी संपत्ति सुनकर कुबेर भी लजाते थे,

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥

उसी अयोध्यामें भरत ऐसे निर्लिप्त होकर रहते हैं जैसे चंपाके बागमें भौंरा। राम के सच्चे प्रेमी भाग्यशाली लोग वैभव-विलासको वैसे ही त्याग देते हैं जैसे उल्टी की हुई चीज़को कोई दोबारा नहीं छूता।

दोहा

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति३२४

भरत तो वैसे भी राम के प्रेमके पात्र हैं, इस त्यागसे वे बड़े नहीं हुए - यह तो उनके लिए स्वाभाविक ही है। जैसे पानी न पीनेकी टेकसे चातककी और नीर-क्षीर विवेकसे हंसकी सराहना होती है, वैसे ही भरतकी।

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥

भरतका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है, तेज घट रहा है, पर बल और मुखकी कांति वैसी ही बनी है। राम प्रेमका यह व्रत रोज नया और सशक्त होता है, धर्म बढ़ता है और मन उदास नहीं, प्रसन्न रहता है।

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥

जैसे शरद ऋतुके उजालेसे पानी घटता है, पर बेंत शोभा पाते हैं और कमल खिल उठते हैं - वैसे ही शम, दम, संयम, नियम और उपवास भरतके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र बन गए हैं।

ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥

विश्वास ही उस आकाशका ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि पूर्णिमाके समान है, और स्वामी राम की याद आकाशगंगाकी तरह चमकती है। राम प्रेम ही वह अचल, निष्कलंक चाँद है जो अपने नक्षत्र-समाजसहित सदा सुंदर शोभित रहता है।

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥

भरतकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य और निर्मल गुण-वैभवका वर्णन करते सभी अच्छे कवि सकुचा जाते हैं - वहाँ तो शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है।

दोहा

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति३२५

वे नित्य प्रभुकी पादुकाओंकी पूजा करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे हर तरहसे राजकाज चलाते हैं।

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥

शरीर रोमांचित है, हृदयमें सीता-राम बसे हैं, जीभ राम-नाम जप रही है, आँखोंमें प्रेमके आँसू हैं। लक्ष्मण-राम-सीता वनमें रहते हैं, और भरत घरमें रहते हुए भी तपसे अपना शरीर कस रहे हैं।

दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥

दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब कहते हैं कि भरत हर तरहसे सराहनीय हैं। उनके व्रत-नियम सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं, उनकी दशा देखकर मुनिराज भी लजा जाते हैं।

परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥

भरतका परम पवित्र आचरण मधुर, सुंदर और मंगलकारी है। यह कलियुगके कठिन पाप-क्लेशोंको हरनेवाला और महामोहरूपी रातको मिटानेके लिए सूर्यके समान है।

पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥

यह पापरूपी हाथीके लिए सिंह है, सारे संतापोंका नाश करनेवाला है, भक्तोंको आनंद देनेवाला, संसारका बोझ हरनेवाला और राम प्रेमरूपी चंद्रमाका सार अमृत है।

छंद

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥

यदि सीता-रामके प्रेमरूपी अमृतसे भरा भरतका जन्म न होता, तो मुनियोंको भी दुर्लभ यम-नियम-शम-दमके कठिन व्रत कौन निभाता? दुख, संताप, दरिद्रता, दंभ जैसे दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरता? और कलियुगमें तुलसीदास-जैसे मूर्खोंको हठपूर्वक राम के सम्मुख कौन करता?

सोरठा

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति३२६

तुलसीदास कहते हैं - जो कोई भरतके चरित्रको नियमपूर्वक आदरसे सुनेगा, उसे अवश्य ही सीता-रामके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-भोगसे वैराग्य होगा।

सोरठा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीय: सोपानः समाप्तः।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह दूसरा सोपान (अयोध्याकाण्ड) समाप्त हुआ।

करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥

पूजा करके और मीठे वचन कहकर, उन्होंने प्रभुको भानेवाले फल-मूल भेंट किए।