रामचरितमानसआरती
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पञ्चम सोपान

सुन्दरकाण्ड

हनुमानजी का लंका गमन, सीता माता से भेंट एवं लंका दहन की कथा।

सुन्दरकाण्ड — सुनें

सुन्दरकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी

हनुमानजी का लंका गमन, सीता माता से भेंट एवं लंका दहन की कथा।

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श्लोक

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदंब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिंवन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्

शांत, सनातन, प्रमाणोंसे परे, निष्पाप, मोक्षरूपी परम शांति देनेवाले, ब्रह्मा-शिव और शेषनागसे निरंतर सेवित, वेदांतद्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंके भी गुरु, मायासे मनुष्यरूप धारण करनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाके सागर, रघुकुलश्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि—उन जगदीश्वर श्रीरामकी मैं वंदना करता हूँ।

श्लोक

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीयेसत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मेकामादिदोषरहितं कुरु मानसं च

हे रघुनाथ! मैं सत्य कहता हूँ—आप तो सबके अंतरात्मा ही हैं, अतः जानते ही हैं कि मेरे हृदयमें और कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति प्रदान कीजिए और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिए।

श्लोक

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि

अतुलनीय बलके धाम, स्वर्ण-पर्वतके समान कांतिमय शरीरवाले, दैत्यरूपी वनको भस्म करनेके लिए अग्निस्वरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, संपूर्ण गुणोंके भंडार, वानरोंके स्वामी और श्रीरघुनाथके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

जाम्बवान्जी के मधुर वचन सुनकर हनुमानजी का हृदय हर्ष से भर उठा। उन्होंने कहा—हे भाइयो! तुमलोग कंद-मूल-फल खाकर कष्ट सहते हुए तबतक मेरी प्रतीक्षा करना,

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

जबतक मैं सीताजी को देखकर न लौट आऊँ — मुझे भारी हर्ष हो रहा है, यह कार्य अवश्य सफल होगा। यह कहकर सबको मस्तक नवाकर, हृदय में श्रीरघुनाथजी को बसाकर हनुमानजी हर्षित होकर चल पड़े।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था। हनुमानजी खेल-खेल में ही उछलकर उसके ऊपर जा चढ़े, और बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण करते हुए महाबली पवनपुत्र ने वहाँ से प्रचंड वेग से छलाँग लगाई।

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

जिस पर्वत पर पैर रखकर वे उछले, वह तुरंत ही पाताल में धँस गया — ठीक वैसे ही जैसे श्रीरघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी वेग से हनुमानजी आगे बढ़ चले।

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तें मैनाक होहि श्रमहारी॥

समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत जानकर मैनाक पर्वतसे कहा—हे मैनाक! तू इनकी थकान दूर करनेवाला बन, इन्हें अपने ऊपर विश्राम दे।

दोहा

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥

हनुमानजीने उसे हाथसे स्पर्श करके प्रणाम किया और कहा—भाई! श्रीरामका कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥सुरसा नाम अहिन्ह के माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

पवनपुत्र को जाते देख देवताओं ने उनकी विशेष बल-बुद्धि की परीक्षा लेनी चाही, तो उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा — उसने आकर हनुमानजी से यह बात कही।

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

आज देवताओं ने मुझे भोजन के रूप में दिया है! यह सुनकर पवनकुमार ने कहा—पहले मुझे श्रीराम का कार्य करके लौट आने दो और सीताजी का समाचार प्रभु को सुना दूँ।

तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

फिर मैं लौटकर तेरे मुँह में प्रवेश कर जाऊँगा, हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपाय से उसने जाने न दिया, तब हनुमानजी ने कहा—अच्छा तो मुझे निगल ही ले।

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

यह कहते ही सुरसा ने योजन भर मुँह फैलाया, तो हनुमानजी ने अपना शरीर उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया तो हनुमानजी तुरंत बत्तीस योजन के हो गए।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

ज्यों-ज्यों सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती गई, त्यों-त्यों हनुमानजी उससे दूना रूप दिखलाते गए। अंततः उसने सौ योजन का मुख बना लिया, तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

उसके मुख में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए, फिर सिर नवाकर विदा माँगते हुए बोले—देवताओं ने मुझे जिस कारण भेजा था, हे माता! मैंने तुम्हारे बल-बुद्धि का भेद पा लिया।

दोहा

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥

तुम श्रीरामका सब कार्य पूर्ण करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिके भंडार हो—यह आशीर्वाद देकर सुरसा चली गई, और हनुमानजी हर्षित होकर आगे बढ़ चले।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

समुद्र में सिंहिका नाम की एक राक्षसी रहती थी, जो माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी — वह जल में उनकी परछाईं देखकर उन्हें पकड़ लेती थी।

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

परछाईं पकड़े जाने पर वे उड़ नहीं पाते थे — इसी तरह वह सदा आकाशचारी जीवों को अपना आहार बनाती थी। उसने वही छल हनुमानजी के साथ भी किया, पर हनुमानजी ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया।

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

उसे मारकर धीरबुद्धि पवनपुत्र वीर हनुमानजी समुद्र के पार पहुँच गए। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी, जहाँ मधु के लोभ से भौंरे गुंजार कर रहे थे।

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

नाना प्रकार के वृक्ष फलों-फूलों से शोभित थे, पशु-पक्षियों के झुंड देखकर मन प्रसन्न हो गया। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी निर्भय होकर उस पर दौड़कर जा चढ़े।

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! इसमें वानर की कोई विशेष बड़ाई नहीं, यह तो प्रभु का ही प्रताप है, जो काल को भी निगल जाता है।

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥

पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी—अत्यंत दुर्गम और अद्वितीय किला, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। वह अत्यंत ऊँचा है, चारों ओर समुद्र से घिरा है, और उसके स्वर्ण-परकोटे की परम कांति चमक रही है।

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

विचित्र मणियोंसे जड़ा स्वर्ण-परकोटा है, भीतर घने और सुंदर भवन बने हैं। चौराहे, बाजार, सुंदर मार्ग और गलियाँ हैं—नगर भाँति-भाँतिसे सजाया गया है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह, पैदल सैनिक और रथोंके दलको कौन गिन सके! अनेक रूप धारण किए राक्षसोंकी अत्यंत बलशाली सेनाका वर्णन करते नहीं बनता। वन, बाग, उपवन, फुलवारी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ शोभा दे रही हैं। मनुष्य, नाग, देवता और गंधर्वोंकी कन्याएँ अपने सौंदर्यसे मुनियोंका भी मन मोह लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशालकाय, बलशाली मल्ल गरज रहे हैं, जो अनेक अखाड़ोंमें भाँति-भाँतिसे भिड़कर एक-दूसरेको ललकारते हैं। भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा सावधानीपूर्वक नगरकी चारों दिशाओंमें रखवाली करते हैं, तो कहीं दुष्ट राक्षस भैंस, मनुष्य, गाय, गधे और बकरोंको अपना आहार बना रहे हैं। तुलसीदासने इनकी (राक्षसोंकी) कथा इसीलिए संक्षेपमें कही है, क्योंकि ये निश्चय ही श्रीरामके बाणरूपी तीर्थमें अपने शरीर त्यागकर परमगतिको पाएँगे।

दोहा

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥

नगरके अनेक रखवालोंको देखकर हनुमानजीने मनमें सोचा—अत्यंत छोटा रूप धरकर रातके समय ही नगरमें प्रवेश करूँ।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

हनुमानजी मच्छरके समान छोटा रूप धारण कर नरलीला करनेवाले भगवान् श्रीरामका स्मरण करते हुए लंकाकी ओर चले। द्वारपर लंकिनी नामकी एक राक्षसी रहती थी, वह बोल उठी—मेरा निरादर करके कहाँ चला जा रहा है?

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

अरे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना—जितने भी चोर हैं, वे सब मेरा आहार हैं। यह सुनते ही महाकपि हनुमानजीने उसे ऐसा घूँसा मारा कि वह खून वमन करती हुई धरतीपर लुढ़क गई।

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥

वह फिर सँभलकर उठी और भयभीत होकर हाथ जोड़कर विनती करने लगी—जब ब्रह्माजीने रावणको वरदान दिया था, तब जाते समय उन्होंने मुझे यह पहचान बता दी थी कि—

बिकल होसि तें कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

जब तू किसी वानरके मारनेसे व्याकुल हो जाए, तभी समझना कि राक्षसोंका विनाश निकट है। हे तात! मेरे बड़े भाग्य हैं कि आज मैंने अपनी आँखोंसे श्रीरामके दूतका दर्शन पाया।

दोहा

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्षके समस्त सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाए, तो भी वे मिलकर भी सत्संगके एक क्षणमात्रके सुखकी बराबरी नहीं कर सकते।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

अयोध्यापति श्रीरामको हृदयमें बसाकर नगरमें प्रवेश करके अपना सारा कार्य सिद्ध कीजिए। उनके प्रतापसे विष अमृत बन जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समुद्र गौके खुरके बराबर हो जाता है और अग्निमें भी शीतलता आ जाती है।

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

हे गरुड़! जिसे श्रीराम एक बार कृपादृष्टिसे देख लें, उसके लिए सुमेरु पर्वत भी धूलके समान तुच्छ हो जाता है। तब हनुमानजीने अत्यंत छोटा रूप धारण किया और भगवान्का स्मरण करते हुए नगरमें प्रवेश किया।

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥

उन्होंने एक-एक महलकी खोज की, जहाँ-तहाँ अनगिनत योद्धा दिखाई दिए। फिर वे रावणके महलमें पहुँचे, जो इतना विचित्र था कि उसका वर्णन ही नहीं हो सकता।

सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

हनुमानजीने रावणको सोया हुआ देखा, पर महलमें कहीं जानकीजी दिखाई न दीं। फिर उन्हें एक और सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें भगवान्का एक अलग मंदिर बना हुआ था।

दोहा

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥

वह भवन श्रीरामके धनुष-बाणके चिह्नोंसे अंकित था, उसकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ नई-नई तुलसी देखकर वानरराज हनुमानजी हर्षित हो उठे।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

लंका तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है, यहाँ भला किसी सज्जनका वास कैसे हो सकता है—हनुमानजी मनमें ऐसा तर्क कर ही रहे थे कि उसी समय विभीषणजी जाग गए।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥

उन्होंने रामनामका उच्चारण किया, यह सुनते ही हनुमानजीने उन्हें सज्जन पहचान लिया और मनमें हर्षित हुए। उन्होंने सोचा—इनसे स्वयं आगे बढ़कर परिचय करूँगा, क्योंकि साधुसे मिलनेमें कभी हानि नहीं होती।

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥

ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमानजीने पुकारा, सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आए। प्रणाम कर कुशल पूछी और कहा—हे विप्रदेव! अपनी कथा कहिए।

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? आपको देखते ही मेरे हृदयमें अपार प्रेम उमड़ रहा है। या फिर क्या आप दीनोंपर स्नेह रखनेवाले साक्षात् श्रीराम ही हैं, जो मुझे धन्य करने आए हैं?

दोहा

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥

तब हनुमानजीने श्रीरामकी सारी कथा सुनाकर अपना नाम बताया। यह सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो उठे और श्रीरामके गुणोंका स्मरण करते हुए दोनोंका मन आनंदमें लीन हो गया।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

विभीषणजीने कहा—हे पवनपुत्र! मेरी दशा सुनो, मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतोंके बीच बेचारी जीभ। हे तात! क्या सूर्यकुलके स्वामी श्रीराम मुझ अनाथपर भी कभी कृपा करेंगे?

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

मेरा यह तामसी शरीर किसी साधनके योग्य नहीं और न मेरे मनमें उनके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। पर हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामकी मुझपर कृपा अवश्य है, क्योंकि हरिकृपाके बिना संतका मिलना संभव नहीं।

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥सुनहु बिभीषन प्रभु के रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥

जब श्रीरघुवीरकी कृपा हुई, तभी तो आपने स्वयं आगे बढ़कर मुझे दर्शन दिए। हनुमानजीने कहा—हे विभीषण! सुनिए, प्रभुकी यही रीति है कि वे अपने सेवकपर सदा प्रेम करते हैं।

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥

भला बताइए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ—चंचल वानर हूँ और सब प्रकारसे तुच्छ; इतना ही नहीं, प्रातःकाल जो हमारा नाम ले ले, उसे उस दिन भोजन तक नहीं मिलता।

दोहा

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥

हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा नीच हूँ, फिर भी श्रीरामने मुझपर कृपा की है—भगवान्के गुणोंका स्मरण करते ही हनुमानजीके नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर आए।

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥

जो जानते-बूझते भी ऐसे स्वामीको भुलाकर भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामके गुणोंका वर्णन करते हुए दोनोंने अवर्णनीय शांतिका अनुभव किया।

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥

फिर विभीषणजीने बताया कि जानकीजी लंकामें किस प्रकार रह रही हैं। तब हनुमानजीने कहा—हे भाई! सुनो, मैं अब जानकी माताके दर्शन करना चाहता हूँ।

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥

विभीषणजीने दर्शनकी सारी युक्ति बता दी। हनुमानजी विदा लेकर चले और फिर वही मच्छरका-सा रूप धरकर अशोक वाटिकामें पहुँचे, जहाँ सीताजी निवास करती थीं।

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

उन्हें देखते ही हनुमानजीने मनहीमन प्रणाम किया। सीताजीको बैठे-बैठे रातके सारे पहर बीत जाते हैं, शरीर क्षीण हो चुका है, सिरपर केवल एक जटाकी वेणी है, और वे हृदयमें निरंतर श्रीरामके गुणोंका स्मरण करती रहती हैं।

दोहा

निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन।परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥

उनके नेत्र अपने ही चरणोंपर टिके हैं और मन श्रीरामके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीकी यह दीन दशा देखकर पवनपुत्र हनुमानजी अत्यंत दुखी हो उठे।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किए बनावा॥

हनुमानजी वृक्षके पत्तोंमें छिपकर विचार करने लगे—हे भाई, अब क्या करूँ? उसी समय अनेक स्त्रियोंको साथ लेकर सज-धजकर रावण वहाँ आ पहुँचा।

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥

उस दुष्टने सीताजीको साम, दान, भय और भेद—हर तरहसे समझानेका प्रयत्न किया। रावणने कहा—हे सुमुखि, हे सयानी! सुनो, मंदोदरी आदि मेरी सभी रानियाँ—

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

मैं तुम्हें अपनी सब रानियोंसे बढ़कर रखूँगा, यह मेरा प्रण है; एक बार तो मेरी ओर देखो! तब जानकीजी अपने परम प्रियतम अयोध्यापति श्रीरामका स्मरण करते हुए तिनकेकी आड़ करके बोलीं—

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥

हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे भला कभी कमलिनी खिल सकती है? रे दुष्ट! तू भी अपने लिए ऐसा ही समझ ले, तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी शक्तिका कुछ भी भान नहीं है।

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

रे पापी! तू मुझे सूने (एकांत) में हर लाया—रे अधम, निर्लज्ज! तुझे लज्जा भी नहीं आती?

दोहा

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥

स्वयंको जुगनूके समान और श्रीरामको सूर्यके समान बताए जानेपर सीताजीके ये कठोर वचन सुनकर रावण तिलमिला उठा और तलवार खींचकर क्रोधमें बोला—

सीता तें मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥

सीते! तूने मेरा घोर अपमान किया है, अब मैं इस तीक्ष्ण तलवारसे तेरा सिर काट डालूँगा। नहीं तो तुरंत मेरी बात मान ले, हे सुमुखि! वरना प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा।

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

सीताजीने कहा—हे दशग्रीव! श्रीरामकी वह भुजा, जो श्यामकमलकी मालाके समान सुंदर और गजराजकी सूँड़के समान बलिष्ठ है, या तो वही मेरे कंठसे लिपटेगी या फिर तेरी यह भयानक तलवार—रे मूर्ख, यही मेरा सच्चा प्रण है।

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥

सीताजी कहती हैं—हे चंद्रहास! श्रीरामके विरहकी अग्निसे उपजी मेरी भारी जलनको तू हर ले। हे तलवार! तेरी धार शीतल, तीक्ष्ण और श्रेष्ठ है, तू मेरे दुःखका बोझ उतार दे।

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥

यह सुनते ही रावण उसे मारने दौड़ा, पर मंदोदरीने नीतिकी बात कहकर उसे समझा-बुझाकर रोक दिया। तब उसने सब राक्षसियोंको बुलाकर आदेश दिया—जाओ, सीताको तरह-तरहसे डराओ।

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

यदि यह एक महीनेमें मेरी बात नहीं मानेगी, तो मैं तलवार निकालकर इसे मार डालूँगा।

दोहा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद॥१०

यह कहकर रावण महलको लौट गया। इधर राक्षसियोंके झुंड भाँति-भाँतिके भयंकर रूप धरकर सीताजीको डराने लगे।

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

उनमें त्रिजटा नामकी एक राक्षसी थी, जिसकी श्रीरामके चरणोंमें दृढ़ प्रीति थी और जो विवेकमें निपुण थी। उसने सबको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी सेवा करके अपना ही भला कर लो।

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

स्वप्नमें मैंने देखा—एक वानरने लंका जला डाली और राक्षससेनाका समूल नाश कर दिया। रावण नग्न होकर गधेपर सवार था, उसका सिर मुँड़ा हुआ था और बीसों भुजाएँ कटी हुई थीं।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

इस तरह वह दक्षिण दिशाकी ओर (यमलोककी ओर) जा रहा है, मानो लंका विभीषणको मिल गई हो। नगरमें श्रीरामकी दुहाई फिर गई, और तब प्रभुने सीताजीको बुलवा भेजा।

यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गए दिन चारी॥तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

मैं दृढ़तासे कहती हूँ कि यह स्वप्न कुछ ही दिनोंमें सत्य होगा। त्रिजटाकी यह बात सुनकर सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकीजीके चरणोंमें गिर पड़ीं।

दोहा

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥११

तब वे सब जहाँ-तहाँ चली गईं। सीताजी मनमें सोचने लगीं—एक महीना बीतते ही यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा।

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तें मोरी॥तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥

सीताजीने हाथ जोड़कर त्रिजटासे कहा—हे माता! तुम मेरी विपत्तिकी सच्ची संगिनी हो, अब कोई शीघ्र उपाय करो जिससे मैं यह देह त्याग सकूँ, यह असह्य विरह अब सहा नहीं जाता।

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुने को श्रवन सूल सम बानी॥

काठ लाकर चिता सजा दे, हे माता, फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! मेरी प्रीतिको सत्य कर दे—रावणके शूल-जैसे कटु वचन अब कान भला कौन सुने!

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥

सीताजीकी यह बात सुनकर त्रिजटाने उनके चरण पकड़कर समझाया और प्रभुके प्रताप, बल और सुयशका वर्णन किया। उसने कहा—हे सुकुमारी! सुनो, रातमें अभी आग नहीं मिल सकती। यह कहकर वह अपने घर चली गई।

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥

सीताजी मन ही मन कहने लगीं—विधाता ही मेरे विरुद्ध हो गया है, न आग मिलेगी न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें तो तारे टूटकर गिरते साफ दिखते हैं, पर धरतीपर एक भी नहीं आता।

पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥

चंद्रमा भी मानो अग्निमय होकर मुझे अभागिन जानकर बरसना ही भूल गया है। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन, मेरा शोक हर ले और अपना नाम सार्थक कर दे।

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

तेरे नए कोमल पत्ते ही मेरे लिए अग्निके समान हैं—मुझे अग्नि दे दे, मेरे विरहको बढ़ाकर मत तड़पा। सीताजीको इस प्रकार विरहसे व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमानजीको युगके समान बीता।

सोरठा

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥१२

तब हनुमानजीने मन ही मन विचारकर सीताजीके सामने अँगूठी गिरा दी, मानो अशोकवृक्षने ही अंगारा दे दिया हो। यह जानकर सीताजी हर्षित होकर उठीं और उसे हाथमें उठा लिया।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥

अँगूठीपर राम-नाम अंकित देखकर सीताजी उसे पहचान गईं और चकित होकर देखने लगीं—हर्ष और विषाद दोनोंसे उनका हृदय व्याकुल हो उठा।

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥

उन्होंने सोचा—श्रीरघुनाथ तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है, और माया ऐसी दिव्य अँगूठी बना ही नहीं सकती। सीताजी मनमें भाँति-भाँतिके विचार कर ही रही थीं कि हनुमानजी मधुर वचन बोल उठे।

रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥

वे श्रीरामके गुणोंका वर्णन करने लगे, और सुनते ही सीताजीका दुःख जाता रहा। वे कान और मन लगाकर सुनने लगीं, हनुमानजीने आरंभसे लेकर सारी कथा कह सुनाई।

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥

सीताजीने कहा—जिसने यह श्रवण-सुधा जैसी कथा कही, हे भाई! वह प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमानजी पास चले गए, यह देखकर सीताजी मुख फेरकर बैठ गईं और उनके मनमें आश्चर्य हुआ।

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥

हनुमानजीने कहा—हे माता जानकी! मैं श्रीरामका दूत हूँ, करुणानिधानकी सच्ची शपथ खाकर कहता हूँ। यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ, श्रीरामने आपके लिए यह पहचान-चिह्न भेजा है।

नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें॥

सीताजीने पूछा—मनुष्य और वानरकी यह मित्रता भला कैसे हुई? तब हनुमानजीने जैसे यह संग हुआ था, वह सब कथा कह सुनाई।

दोहा

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३

हनुमानजीके प्रेमभरे वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास जाग उठा। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्मसे कृपासागर श्रीरामका ही सच्चा सेवक है।

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मो कहुँ जलजाना॥

भगवान्का सेवक जानकर सीताजीकी प्रीति और गाढ़ी हो गई, नेत्र भर आए और रोमांच बढ़ गया। उन्होंने कहा—हे तात हनुमान्! विरहसागरमें डूबती हुई मेरे लिए तुम नौका बनकर आए हो।

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥

अब मुझे लक्ष्मणसहित श्रीरामका कुशल-समाचार सुनाओ, मैं तुम्हारे ऊपर वारी जाती हूँ। श्रीराम तो स्वभावसे ही कोमलहृदय और कृपालु हैं, फिर हे हनुमान्! उन्होंने ऐसी निष्ठुरता कैसे धारण कर ली?

सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥

सेवकको सुख देना उनका स्वाभाविक गुण है। क्या श्रीराम कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल श्यामल अंगोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥

मुँहसे वचन नहीं निकलता, नेत्र आँसुओंसे भर आए—हाय नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको इस तरह विरहसे व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनम्र वचन बोले—

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

हे माता! प्रभु लक्ष्मणसहित कुशल हैं, पर आपके दुःखसे वे स्वयं दुखी हैं। हे माता! मन छोटा न करें, श्रीरामका प्रेम तो आपके प्रति आपसे भी दुगुना है।

दोहा

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४

हे माता! अब धैर्य धरकर श्रीरघुनाथका संदेश सुनिए—यह कहते हुए हनुमानजी प्रेमसे गद्गद हो उठे, उनके नेत्रोंमें आँसू भर आए।

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥

श्रीरामने कहा है—हे सीते! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिए सब कुछ प्रतिकूल हो गया है। वृक्षोंकी नई कोमल कोंपलें मानो अग्नि हैं, रात कालरात्रिके समान और चंद्रमा-सूर्य भी दाहक हो गए हैं।

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

कमलोंके वन भालोंके समान चुभने लगे हैं, बादल मानो खौलता तेल बरसाते हैं। जो पहले सुखदायी थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं—शीतल, मंद, सुगंधित पवन भी साँपकी साँसकी तरह विषैली हो गई है।

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥

मन की बात कह देनेसे दुःख कुछ कम हो जाता है, पर किससे कहूँ—यह कोई समझता ही नहीं। हे प्रिये! हम दोनोंके प्रेमका सच्चा रहस्य केवल मेरा यह मन ही जानता है।

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥

और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है—बस मेरे प्रेमका सार इतना ही समझ लेना। प्रभुका यह संदेश सुनते ही सीताजी प्रेममें ऐसी लीन हो गईं कि उन्हें अपने शरीरकी सुध ही न रही।

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

हनुमानजीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धरो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामका स्मरण करो। श्रीरघुनाथकी महिमाको हृदयमें रखो और मेरी बात सुनकर सारी शंका त्याग दो।

दोहा

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥१५

राक्षसोंका समूह पतंगेके समान है और श्रीरामका बाण अग्निके समान—हे माता! हृदयमें धैर्य धरो, राक्षसोंको अभीसे जला हुआ ही समझो।

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥

यदि श्रीरामको आपकी खबर मिल गई होती, तो वे तनिक भी विलंब न करते। हे जानकी! रामबाणरूपी सूर्यका उदय होते ही राक्षससेनारूपी अंधकार कहाँ ठहर सकता है?

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥

हे माता! मैं अभी आपको यहाँसे ले जा सकता हूँ, पर श्रीरामकी शपथ है, मुझे उनकी आज्ञा नहीं है। इसलिए हे माता! कुछ दिन और धैर्य धरो, श्रीराम वानरोंकी सेनासहित स्वयं यहाँ आएँगे।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥

और राक्षसोंको मारकर आपको ले जाएँगे, नारद आदि तीनों लोकोंमें उनका यश गाएँगे। सीताजीने कहा—हे पुत्र! सब वानर तो तुम्हारे ही जैसे (छोटे) होंगे, जबकि राक्षस अत्यंत बलशाली योद्धा हैं।

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥

इसीलिए मेरे मनमें बड़ा संदेह होता है। यह सुनते ही हनुमानजीने अपना असली विशाल रूप प्रकट किया—स्वर्ण-पर्वतके समान कांतिमान शरीर, युद्धमें शत्रुओंको भयभीत करनेवाला, अत्यंत बलशाली और वीर।

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥

उसे देखकर सीताजीके मनमें विश्वास जाग उठा, तब हनुमानजीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया।

दोहा

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६

हे माता! सुनो, वानरोंमें साधारणतः बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, पर प्रभुके प्रतापसे एक छोटा-सा सर्प भी गरुड़को निगल सकता है।

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे भरी हनुमानजीकी यह वाणी सुनकर सीताजीका मन संतुष्ट हो गया। श्रीरामके प्रिय भक्त जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया—हे तात! तुम बल और शीलके धाम बनो।

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

हे पुत्र! तुम अजर, अमर और गुणोंके भंडार बनो, श्रीरघुनाथ तुमपर सदा कृपा करते रहें। 'प्रभु कृपा करें' यह सुनते ही हनुमानजी अपार प्रेममें मग्न हो गए।

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥अब कृतकृत्य भय मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

हनुमानजीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और हाथ जोड़कर कहा—हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया, आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह तो सर्वविदित ही है।

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥

हे माता! सुनिए, इन सुंदर फलदार वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी भूख लग आई है। सीताजीने कहा—हे पुत्र! सुनो, इस वनकी रखवाली बड़े ही बलशाली राक्षस करते हैं।

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

हनुमानजीने कहा—हे माता! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दें, तो मुझे उनका भय तनिक भी नहीं है।

दोहा

देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७

हनुमानजीको बल-बुद्धिमें निपुण देखकर जानकीजीने कहा—जाओ पुत्र, श्रीरामके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरें लागा॥रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥

सीताजीको सिर नवाकर वे बागमें घुस गए, फल खाए और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से रखवाले योद्धा थे, कुछको मार गिराया और कुछ भागकर रावणसे पुकार करने लगे—

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥

हे नाथ! एक विशालकाय वानर आया है, उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली, फल खाए, वृक्ष उखाड़ डाले और रखवालोंको कुचल-कुचलकर धरतीपर पटक दिया।

सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥

यह सुनकर रावणने अनेक योद्धा भेजे। उन्हें देखते ही हनुमानजी गरज उठे और सभी राक्षसोंका संहार कर डाला; जो अधमरे बचे, वे चीखते-चिल्लाते भाग गए।

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

तब रावणने अक्षयकुमारको भेजा, जो असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देख हनुमानजीने एक वृक्ष उखाड़कर ललकारा और उसे मारकर भारी गर्जना की।

दोहा

कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥१८

उन्होंने सेनाके कुछ योद्धाओंको मार डाला, कुछको कुचल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। बचे हुए कुछ राक्षस भागकर रावणसे पुकार करने लगे—हे प्रभु! यह वानर अत्यंत बलशाली है।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

पुत्रका वध सुनते ही रावण क्रोधसे भर उठा और उसने बलशाली मेघनादको भेजा—कहा, इसे मारना मत, बाँधकर ले आना; देखें तो सही यह वानर कहाँका है।

चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

इंद्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला, भाईकी मृत्यु सुनकर उसे क्रोध चढ़ आया था। हनुमानजीने देखा कि एक भयंकर योद्धा आ रहा है, तो वे कटकटाकर गरजते हुए उसकी ओर दौड़े।

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥

उन्होंने एक विशाल वृक्ष उखाड़ लिया और उसके प्रहारसे रावणपुत्र मेघनादका रथ तोड़ डाला। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उन्हें पकड़-पकड़कर हनुमानजी अपने शरीरसे ही मसलने लगे।

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥

उन सबको मारकर वे फिर मेघनादसे भिड़ गए—मानो दो गजराज आपसमें टकरा रहे हों। हनुमानजीने एक घूँसा जमाकर उसे वृक्षपर चढ़कर मारा, जिससे वह क्षणभरके लिए मूर्छित हो गया।

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर उठकर उसने बहुत-सी माया रची, पर पवनपुत्र उससे जीते नहीं जा सकते थे।

दोहा

ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥१९

अंततः उसने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया। हनुमानजीने मनमें सोचा—यदि मैं ब्रह्मास्त्रका मान न रखूँ, तो इसकी महिमा ही मिट जाएगी।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

उसने हनुमानजीपर ब्रह्मबाण चलाया, फिर भी गिरते-गिरते उन्होंने बहुत-सी सेनाका संहार कर डाला। हनुमानजीको मूर्छित देखकर मेघनादने उन्हें नागपाशसे बाँधकर पकड़ लिया।

जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

शिवजी कहते हैं—हे भवानी! जिनका नाम जपकर ज्ञानी पुरुष जन्म-मरणके बंधन काट डालते हैं, भला उन्हींका दूत बंधनमें कैसे बँध सकता है? पर प्रभुके कार्यके लिए हनुमानजीने स्वयं ही अपनेको बँधवा लिया।

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥

वानरके बँधनेकी बात सुनकर राक्षस दौड़ पड़े, सब तमाशा देखनेके लिए सभामें आ जुटे। हनुमानजीने जाकर रावणकी सभा देखी—उसका ऐश्वर्य इतना अपार था कि वर्णन ही नहीं हो सकता।

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

देवता और दिक्पाल तक हाथ जोड़े, भयभीत होकर उसकी भौंहोंकी ओर ताक रहे थे। पर यह प्रताप देखकर भी हनुमानजीके मनमें रत्तीभर भय न हुआ—वे वैसे ही निडर खड़े रहे जैसे सर्पोंके बीच गरुड़ निर्भय रहते हैं।

दोहा

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०

हनुमानजीको देखकर रावण दुर्वचन कहते हुए ज़ोरसे हँसा, पर तभी पुत्रकी मृत्युका स्मरण होते ही उसके हृदयमें विषाद छा गया।

कह लंकेस कवन तें कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥

रावणने कहा—रे वानर! तू है कौन? किसके बलपर तूने मेरा वन उजाड़ डाला? क्या तूने कभी मेरा नाम भी नहीं सुना? रे मूर्ख! तू मुझे देखकर भी तनिक भयभीत नहीं दिख रहा।

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥

तूने किस अपराधमें मेरे राक्षसोंको मारा? क्या तुझे प्राणोंका भय नहीं है, रे मूर्ख? हनुमानजीने कहा—हे रावण! सुन, जिनके बलसे माया संपूर्ण ब्रह्मांडोंकी रचना करती है,

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥

जिनके बलसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव क्रमशः सृष्टिकी रचना, पालन और संहार करते हैं, और जिनके बलसे सहस्रमुख शेषनाग समस्त पर्वत-वन सहित ब्रह्मांडको अपने सिरपर धारण किए हुए हैं,

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता॥हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥

जो देवताओंकी रक्षाके लिए नाना रूप धारण करते हैं और तुम-जैसे मूर्खोंको भी सीख देनेवाले हैं, जिन्होंने शिवजीका कठोर धनुष तोड़ डाला और साथ ही राजाओंके समूहका अभिमान भी चूर्ण कर दिया,

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि—इन सब अतुलनीय बलशालियोंका वध किया,

दोहा

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥२१

जिनके बलके लेशमात्रसे तुमने संपूर्ण चराचर जगत्को जीत लिया, और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम चुराकर ले आए—मैं उन्हींका दूत हूँ।

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥

मैं तुम्हारी शक्तिको भलीभाँति जानता हूँ—सहस्रबाहुसे तुम्हारा युद्ध हुआ था और बालिसे लड़कर तुमने यश भी पाया था। हनुमानजीकी यह बात सुनकर रावणने हँसकर टाल दी।

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥

हे स्वामी! मुझे भूख लगी थी इसलिए फल खाए, और वानर-स्वभाववश वृक्ष तोड़ डाले। हे नाथ! देह तो सबको प्रिय होती है, पर जब कुमार्गी राक्षस मुझे मारने दौड़े,

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनय तुम्हारे॥मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥

तब जिन्होंने मुझे मारा, मैंने उन्हें मार डाला। इसी बातपर तुम्हारे पुत्रने मुझे बाँध लिया। पर मुझे बँधे जानेकी कोई लज्जा नहीं, मैं तो बस अपने स्वामीका कार्य सिद्ध करना चाहता हूँ।

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥

हाथ जोड़कर मैं तुमसे विनती करता हूँ, हे रावण! अभिमान त्यागकर मेरी सीख सुनो। अपने ही कुलका विचार करो और भ्रम छोड़कर भक्तोंका भय हरनेवाले भगवान्को भजो।

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥

जिनके भयसे स्वयं काल भी काँपता है, जो देवता-राक्षस सहित समूचे चराचरको निगल सकता है—उनसे कभी वैर मत करो, और मेरे कहनेसे जानकीजीको लौटा दो।

दोहा

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।गए सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥२२

शरणागतोंके रक्षक और करुणाके सागर खरारि श्रीरघुनाथकी शरणमें जाओगे, तो प्रभु तुम्हारा सारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें ले लेंगे।

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

श्रीरामके चरणकमलोंको हृदयमें बसाओ और लंकाका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यका यश निर्मल चंद्रमाके समान उज्ज्वल है, उस चंद्रमापर कलंक मत बनो।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥

रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती—मद-मोह त्यागकर विचार करो। हे देवशत्रु! जैसे आभूषणोंसे सजी सुंदरी भी वस्त्रके बिना शोभा नहीं पाती,

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥

वैसे ही रामविमुखकी संपत्ति और प्रभुता चाहे बनी रहे, पर उसका होना न होनेके बराबर है। जिन नदियोंको केवल वर्षाका ही सहारा है, वे बरसात बीतते ही सूख जाती हैं।

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा मिलकर भी रामद्रोहीको नहीं बचा सकते।

दोहा

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥२३

मोहमूलक, अत्यंत कष्टदायी इस अंधकार-जैसे अभिमानको त्याग दो और करुणासागर, रघुकुलस्वामी भगवान् श्रीरामका भजन करो।

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥

यद्यपि हनुमानजीने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीतिसे भरी अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी वह महाअभिमानी रावण हँसकर बोला—हमें तो यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिल गया है!

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, जो मुझ अधमको सीख देने चला है। हनुमानजीने कहा—इसका उल्टा ही होगा, यह तेरा भ्रम है, मैं भलीभाँति जानता हूँ।

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥

हनुमानजीकी बात सुनकर वह और तिलमिला उठा—अरे, इस मूर्खके प्राण शीघ्र क्यों नहीं ले लेते? यह सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े, तभी मंत्रियोंसहित विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे।

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥

उन्होंने सिर नवाकर बड़ी विनतीके साथ कहा—दूतका वध करना नीतिविरुद्ध है, कोई अन्य दंड दिया जाए। सबने कहा—हाँ भाई, यही सलाह उत्तम है।

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला—अच्छा तो, वानरका अंग-भंग करके ही इसे लौटा दिया जाए।

दोहा

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥२४

मैं सबको समझाता हूँ—वानरको अपनी पूँछसे बड़ा मोह होता है, इसलिए कपड़ेको तेलमें भिगोकर इसकी पूँछमें बाँध दो और फिर उसमें आग लगा दो।

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई॥

जब यह पूँछविहीन वानर वापस जाएगा, तब यह मूर्ख अपने स्वामीको भी यहाँ ले आएगा—जिसकी इसने इतनी प्रशंसा की है, मैं भी देखूँ तो सही उसका सामर्थ्य!

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥

यह सुनकर हनुमानजी मनमें मुस्कुराए—समझ गया, यह बुद्धि सरस्वतीजीकी ही कृपासे मिली है। रावणकी यह बात सुनकर मूर्ख राक्षस पूँछमें आग लगानेकी तैयारी करने लगे।

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥

पूँछ लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लग गया कि नगरमें कुछ भी शेष न बचा। हनुमानजीने ऐसी लीला रची कि पूँछ बढ़ती ही चली गई। नगरवासी तमाशा देखने उमड़ पड़े, कोई ठोकर मारता तो कोई खिलखिलाकर हँसता।

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता॥

ढोल बजते रहे, लोग तालियाँ बजाते रहे—हनुमानजीको पूरे नगरमें घुमाकर फिर पूँछमें आग लगा दी गई। आगकी लपटें देखते ही हनुमानजी तुरंत अत्यंत छोटे रूपमें सिमट गए।

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥

बंधनसे मुक्त होकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े, यह देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयसे काँप उठीं।

दोहा

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥२५

उसी क्षण भगवान्की प्रेरणासे उनचास पवन चल पड़े। हनुमानजी अट्टहास करते हुए गरजे और आकाशकी ओर उछल पड़े।

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥

उनका शरीर विशाल पर अत्यंत फुर्तीला हो गया, वे एक महलसे दूसरे महलपर दौड़-दौड़कर चढ़ने लगे। नगर जलने लगा, लोग बेहाल हो उठे, चारों ओर आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपटने लगीं।

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥

हाय बाबा! हाय माँ! अब हमें कौन बचाएगा?—चारों ओर यही करुण पुकार गूँज उठी। लोग कहने लगे—हमने तो पहले ही कहा था, यह वानर नहीं, वानररूप धरे कोई देवता है।

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥

साधुके अपमानका यही फल होता है—नगर वैसे ही जल रहा है जैसे किसी अनाथका घर जलता है। हनुमानजीने पलभरमें सारी लंका भस्म कर दी, केवल विभीषणका घर बचा रहा।

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको ही रचा है, हनुमानजी उन्हींके दूत हैं, इसीलिए वे स्वयं जले नहीं। इस प्रकार पूरी लंकाको उलट-पलटकर जला डालनेके बाद वे समुद्रमें कूद पड़े।

दोहा

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥२६

पूँछ बुझाकर, थकान मिटाकर और फिर छोटा रूप धारण करके हनुमानजी हाथ जोड़े हुए सीताजीके सामने जा खड़े हुए।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

हनुमानजीने कहा—हे माता! मुझे कोई ऐसा चिह्न दीजिए, जैसा श्रीरामने मुझे दिया था। तब सीताजीने अपनी चूड़ामणि उतारकर दे दी, जिसे हनुमानजीने हर्षपूर्वक ग्रहण किया।

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥

सीताजीने कहा—हे तात! मेरा यह प्रणाम श्रीरामसे कहना और यह भी कहना—हे प्रभु! आप तो सर्वथा पूर्णकाम हैं, फिर भी दीनोंपर दया करना आपका स्वभाव है, इसी विरदको स्मरण कर मेरे इस भारी संकटको हर लीजिए।

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

हे तात! इंद्रपुत्र जयंतकी कथा उन्हें सुनाना और उनके बाणके प्रतापका स्मरण कराना। यदि एक महीनेके भीतर प्रभु न आए, तो फिर मुझे जीवित नहीं पाएँगे।

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

कहो हनुमान्, मैं किस तरह प्राण बचाए रखूँ—तुम भी अब जानेकी बात कह रहे हो, हे तात! तुम्हें देखकर मेरी छातीको क्षणभरका ठंडक मिली थी, पर अब फिर वही दिन और वही रात मुझे झेलनी होगी!

दोहा

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥२७

हनुमानजीने जानकीजीको भाँति-भाँतिसे समझाकर धैर्य बँधाया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामके पास लौट चले।

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥

चलते समय उन्होंने ऐसी भारी गर्जना की कि राक्षसियोंके गर्भ तक गिर पड़े। समुद्र लाँघकर वे इस पार आए और वानरोंको हर्षभरी किलकारी सुनाई।

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥

हनुमानजीको देखते ही सब हर्षित हो उठे, मानो वानरोंका नया जन्म हो गया हो। उनका मुख प्रसन्न और शरीर तेजसे दमक रहा था—देखते ही सब समझ गए कि वे श्रीरामका कार्य सिद्ध करके लौटे हैं।

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥

सब उनसे मिलकर ऐसे सुखी हुए जैसे तड़पती मछलीको जल मिल जाए। फिर नए-नए समाचार पूछते-कहते सब हर्षित होकर श्रीरामके पास चल पड़े।

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

तब सब मधुवनमें जा घुसे और अंगदकी सम्मतिसे मीठे फल खाने लगे। रखवाले रोकने आए तो घूँसोंकी मार खाकर सब भाग खड़े हुए।

दोहा

जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥२८

उन्होंने जाकर सुग्रीवसे पुकार की कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव समझ गए—वानर प्रभुका कार्य सिद्ध करके ही लौटे हैं, यही सोचकर वे हर्षित हुए।

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥

यदि सीताजीकी खबर न मिली होती, तो क्या ये मधुवनके फल खानेका साहस करते? राजा सुग्रीव मनमें यही विचार कर रहे थे कि तभी सारा वानरदल वहाँ आ पहुँचा।

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥

सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया, कपिराज भी बड़े प्रेमसे सबसे मिले। कुशल पूछनेपर वानरोंने कहा—आपके चरणदर्शनसे सब कुशल है, श्रीरामकी कृपासे बड़ा भारी काम संपन्न हुआ है।

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥

हे नाथ! यह सब कार्य हनुमानजीने ही किया और हम सब वानरोंके प्राण बचा लिए। यह सुनकर सुग्रीव हनुमानजीसे फिर गले मिले, और फिर सब वानरोंसहित श्रीरामके पास चल पड़े।

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किए काजु मन हरष बिसेषा॥फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

वानरोंको कार्य सिद्ध करके आते देख श्रीरामके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक-शिलापर विराजमान थे, सभी वानर जाकर उनके चरणोंमें गिर पड़े।

दोहा

प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥२९

करुणाके सागर श्रीराम सबसे प्रेमपूर्वक गले मिले और कुशल पूछी। वानरोंने कहा—हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शनसे ही अब सब कुशल है।

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥

जाम्बवान्ने कहा—हे रघुनाथ! सुनिए, जिसपर आप कृपा करते हैं, उसका सदा कल्याण होता है और देवता, मनुष्य, मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं।

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥

वही विजयी, वही विनयी और वही गुणोंका सागर बन जाता है, उसीका सुयश तीनों लोकोंमें फैलता है। प्रभुकी कृपासे ही सब कार्य सिद्ध हुआ, आज हमारा जन्म सफल हो गया।

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥

हे नाथ! पवनपुत्रने जो पराक्रम किया, वह हज़ार मुखोंसे भी वर्णित नहीं हो सकता। तब जाम्बवान्ने हनुमानजीके सुंदर कारनामे श्रीरामको सुनाए।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

यह सुनकर कृपानिधानका मन अत्यंत प्रसन्न हुआ और उन्होंने हनुमानजीको फिर हृदयसे लगा लिया। उन्होंने पूछा—हे तात! बताओ, सीता किस तरह अपने प्राणोंकी रक्षा करती हुई वहाँ रह रही हैं?

दोहा

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥३०

हनुमानजीने कहा—आपका नाम ही उनका दिन-रातका पहरेदार है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। उनके नेत्र सदा आपके चरणोंमें बँधे रहते हैं—यही ताला है, फिर प्राण किस राहसे निकलें?

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥

चलते समय उन्होंने मुझे अपनी चूड़ामणि दी, जिसे श्रीरामने हृदयसे लगा लिया। हनुमानजीने कहा—हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर जानकीजीने मुझसे यह वचन कहे—

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥

छोटे भाईसहित प्रभुके चरण पकड़ना और कहना—आप दीनबंधु हैं, शरणागतका दुःख हरनेवाले हैं, और मैं मन-वचन-कर्मसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ, फिर हे स्वामी! मुझे किस अपराधमें त्याग दिया?

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥

हाँ, एक दोष मैं अवश्य मानती हूँ कि आपके वियोगमें भी मेरे प्राण नहीं निकले। पर हे नाथ! यह तो नेत्रोंका ही अपराध है, जो प्राणोंको निकलनेसे हठपूर्वक रोक लेते हैं।

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥

विरह अग्नि है, यह शरीर रूई है और साँस पवन—इस संयोगसे तो देह क्षणभरमें जल जानी चाहिए, पर नेत्र अपने ही हितके लिए आँसू बहाते रहते हैं, जिससे विरहकी यह आग देहको जला नहीं पाती।

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है, हे दीनदयालु! उसे बिना कहे रहने देना ही अच्छा है।

दोहा

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥३१

हे करुणानिधान! उनका एक-एक क्षण युगके समान बीत रहा है। इसलिए हे प्रभु! शीघ्र चलिए और अपने भुजबलसे दुष्टोंकी सेनाको जीतकर सीताजीको ले आइए।

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥

सीताजीका दुःख सुनते ही सुखधाम प्रभुके कमलनेत्र आँसुओंसे भर आए। उन्होंने कहा—जो मन, वचन और कर्मसे पूरी तरह मुझपर ही आश्रित है, क्या उसे स्वप्नमें भी विपत्ति हो सकती है?

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥

हनुमानजीने कहा—हे प्रभु! विपत्ति तो तभी है जब आपका स्मरण-भजन न हो सके। राक्षसोंकी बिसात ही क्या है—आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको अवश्य ले आएँगे।

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

भगवान्ने कहा—हे हनुमान्! तेरे समान मेरा उपकार करनेवाला कोई देवता, मनुष्य या मुनि नहीं है। तेरा प्रत्युपकार मैं क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने छोटा पड़ जाता है।

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥

हे पुत्र! सुन, मैंने भलीभाँति विचार करके देख लिया है कि मैं तेरा ऋण कभी नहीं चुका सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानजीको निहार रहे थे, नेत्र आँसुओंसे भरे थे और शरीर रोमांचित था।

दोहा

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥३२

प्रभुके ये वचन सुनकर और उनका प्रसन्न मुख तथा पुलकित शरीर देखकर हनुमानजी हर्षसे भर उठे और प्रेमविह्वल होकर 'हे भगवन्, रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े।

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥

प्रभु उन्हें बार-बार उठाना चाहते थे, पर प्रेममें डूबे हनुमानजीको उठना ही न सुहाता था। प्रभुका करकमल हनुमानजीके सिरपर था—उस दृश्यका स्मरण करते ही शिवजी स्वयं प्रेममें लीन हो गए।

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥

फिर मनको संयत करके शिवजी यह अत्यंत सुंदर कथा सुनाने लगे—प्रभुने हनुमानजीको उठाकर हृदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अपने बिलकुल पास बिठा लिया।

कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥

हे हनुमान्! बताओ तो, रावणकी सुरक्षित लंका और उसके अभेद्य किलेको तुमने कैसे जला दिया? हनुमानजीने प्रभुको प्रसन्न देखकर बिना किसी अभिमानके कहा—

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा॥

वानरका पुरुषार्थ बस इतना ही होता है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर कूद जाए। मैंने जो समुद्र लाँघकर स्वर्णनगरी जलाई और राक्षसोंको मारकर अशोकवाटिका उजाड़ी,

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

यह सब हे रघुनाथ! आपका ही प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी अपनी कोई बड़ाई नहीं है।

दोहा

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥३३

हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं—आपके प्रभावसे तो साधारण रूई भी बड़वानलको जला सकती है।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥

हे नाथ! मुझे कृपा करके अपनी वह अविचल भक्ति दीजिए, जो अत्यंत सुख देनेवाली है। हनुमानजीकी यह अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! प्रभुने कहा—एवमस्तु, ऐसा ही हो।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥

हे उमा! जिसने श्रीरामके स्वभावको पहचान लिया, उसे भजनके अतिरिक्त कुछ और सुहाता ही नहीं। स्वामी-सेवकका यह संवाद जिसके हृदयमें उतर गया, वही श्रीरघुनाथके चरणोंकी सच्ची भक्ति पाता है।

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥

प्रभुके वचन सुनकर वानरगण जय-जयकार करने लगे—कृपालु आनंदकंद श्रीरामकी जय हो! तब श्रीरामने सुग्रीवको बुलाकर कहा—प्रस्थानकी तैयारी करो।

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

अब विलंब किस बातका, वानरोंको तुरंत आज्ञा दो। यह लीला देखकर देवता हर्षित होकर पुष्पवर्षा करते हुए आकाशसे अपने-अपने लोकको लौट गए।

दोहा

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥३४

वानरराज सुग्रीवने तुरंत बुलावा भेजा, तो सेनापतियोंके दल उमड़ पड़े—अनेक रंगोंके, अतुलनीय बलशाली वानर-भालुओंकी सेना जुट आई।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥

सब प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं, महाबली रीछ-वानर गरज उठते हैं। श्रीरामने वानरोंकी सारी सेना देखी और अपने कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर देखा।

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥

श्रीरामकी कृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखधारी पर्वत बन गए। तब श्रीरामने हर्षित होकर प्रस्थान किया, चारों ओर अनेक सुंदर शुभ शकुन होने लगे।

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥

जिनकी कीर्ति सर्वथा मंगलमय है, उनके प्रस्थानपर शुभ शकुन होना स्वाभाविक ही है। सीताजीको भी प्रभुके प्रस्थानका आभास हो गया—उनका बायाँ अंग फड़ककर मानो यह संकेत दे रहा था।

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥

जानकीजीके लिए जो-जो शुभ शकुन हुए, वे ही रावणके लिए अपशकुन बन गए। सेना चल पड़ी, उसका वर्णन कौन कर सके—असंख्य वानर-भालू गरजते हुए आगे बढ़ रहे थे।

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

नखरूपी शस्त्र धारण किए, पर्वत और वृक्षोंको उठाए वे स्वच्छंद विचरनेवाले वानर-भालू कोई आकाशमार्गसे तो कोई धरतीपर चल पड़े। वे सिंहगर्जना कर रहे थे, जिससे दिशाओंके हाथी तक विचलित होकर चिग्घाड़ उठे।

छंद

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे॥कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥

दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ उठे, धरती डोलने लगी, पर्वत काँपने लगे और समुद्र खलबला उठा। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग और किन्नर सब हर्षित हो उठे कि अब उनके दुःख टलनेवाले हैं। करोड़ों भयंकर वानरयोद्धा कटकटाते और दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं, सब मिलकर 'प्रबल प्रतापी कोसलनाथ श्रीरामकी जय हो' पुकारते हुए उनके गुणोंका गान कर रहे हैं।

छंद

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥

उदार सर्पराज शेषजी भी इस विशाल सेनाका भार सहन नहीं कर पाते, वे बार-बार विचलित होकर कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे कस लेते हैं। ऐसा करते हुए वे मानो श्रीरामकी इस सुंदर, परम सुहावनी प्रस्थानयात्राकी अमर, पवित्र गाथाको कच्छपकी पीठपर अंकित कर रहे हों।

दोहा

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर३५

इस प्रकार कृपानिधान श्रीराम समुद्रके तटपर जा उतरे, और अनेक रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे।

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥

उधर लंकामें जबसे हनुमानजी उसे जलाकर गए थे, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे थे। सब अपने-अपने घरोंमें यही सोच रहे थे कि अब राक्षसकुलकी रक्षाका कोई उपाय शेष नहीं बचा।

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥

जिसके दूतके ही बलका वर्णन नहीं हो सकता, वह स्वयं नगरमें आए तो कैसी विपत्ति होगी! नगरवासियोंकी यह बात दूतियोंसे सुनकर मंदोदरी अत्यंत व्याकुल हो उठी।

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु॥

वह एकांतमें हाथ जोड़े पतिके चरणोंमें गिर पड़ी और नीतियुक्त वाणीमें बोली—हे प्रियतम! श्रीहरिसे वैर त्याग दीजिए, मेरी यह बात अत्यंत हितकारी जानकर हृदयमें धारण कीजिए।

समुझत जासु दूत कह करनी। स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी॥तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥

जिनके दूतकी करनीका स्मरण मात्रसे राक्षसियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्राणप्रिय! यदि अपना भला चाहते हैं तो अपने मंत्रीको बुलाकर उसके साथ सीताजीको लौटा दीजिए।

तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

आपके कुलरूपी कमलवनके लिए सीता जाड़ेकी रातके समान कष्टदायी बनकर आई है। हे नाथ! सुनिए, सीताको लौटाए बिना तो शिव और ब्रह्मा भी मिलकर आपका भला नहीं कर सकते।

दोहा

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥३६

श्रीरामके बाण सर्पोंके समान हैं और राक्षससेना मेंढकोंके समान—जबतक वे तुम्हें निगल न जाएँ, तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिए।

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥

जगप्रसिद्ध अभिमानी मूर्ख रावण यह वाणी सुनकर खिलखिलाकर हँसा—स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच डरपोक होता है, मंगलमें भी भय मान बैठती हो, तुम्हारा मन बहुत कच्चा है।

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥

यदि वानरोंकी सेना आ भी गई, तो बेचारे राक्षस उन्हें खाकर अपना पेट भर लेंगे। जिसके डरसे लोकपाल तक काँपते हैं, उसकी पत्नी डर रही है—यह तो बड़ी हास्यकी बात है।

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥

यह कहकर रावणने हँसते हुए उसे हृदयसे लगाया और स्नेह जताकर सभामें चला गया। मंदोदरी मनमें चिंतित हो उठी कि पतिके विरुद्ध विधाता ही हो गए हैं।

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥

सभामें बैठते ही उसे खबर मिली कि शत्रुकी सारी सेना समुद्रके उस पार आ चुकी है। उसने मंत्रियोंसे राय माँगी, तो वे सब हँसकर बोले—इसमें सलाहकी क्या बात है, चुप ही रहिए।

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥

आपने तो देवताओं और असुरोंको जीत लिया, उसमें कोई मेहनत ही नहीं लगी—फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें हैं!

दोहा

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥३७

मंत्री, वैद्य और गुरु—यदि ये तीन भय या स्वार्थवश अप्रिय सत्य छिपाकर केवल मीठी बात कहने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म—इन तीनोंका शीघ्र ही नाश हो जाता है।

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥

रावणके लिए भी वैसा ही दुर्योग बन आया—मंत्री उसके सामने ही उसकी झूठी प्रशंसा करने लगे। इसी बीच अवसर देखकर विभीषणजी वहाँ आए और बड़े भाईके चरणोंमें सिर नवाया।

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥

फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गए और आज्ञा पाकर बोले—हे कृपालु! जब आपने मुझसे राय पूछी ही है, तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपकी भलाईकी बात कहता हूँ—

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई॥

जो कोई अपना कल्याण, सुयश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना सुख चाहता हो, हे स्वामी! वह परस्त्रीके मुखको चौथके चंद्रमाकी तरह देखनेसे भी बचे।

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥

चौदह लोकोंका स्वामी भी हो, पर यदि वह प्राणियोंसे द्रोह करे तो टिक नहीं सकता। गुणोंका सागर और चतुर पुरुष भी यदि तनिक लोभी हो, तो उसे कोई भला नहीं कहता।

दोहा

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥३८

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ—ये सब नरकके मार्ग हैं। इन सबको त्यागकर श्रीरामका भजन करें, जिन्हें संतजन भजते हैं।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥

हे तात! श्रीराम केवल मनुष्योंके राजा नहीं, वे संपूर्ण लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं। वे स्वयं भगवान् हैं—विकाररहित, अजन्मा, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत ब्रह्म।

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥

उन करुणासागर भगवान्ने गौ, ब्राह्मण, पृथ्वी और देवताओंके हितके लिए ही मनुष्यरूप धारण किया है। हे भाई! सुनिए, वे भक्तोंको आनंद देनेवाले, दुष्टोंका नाश करनेवाले और वेद-धर्मके रक्षक हैं।

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥

वैर त्यागकर उन्हींके चरणोंमें मस्तक नवाइए, वे शरणागतका दुःख हरनेवाले श्रीरघुनाथ हैं। हे नाथ! जानकीजीको उन्हें लौटा दीजिए और बिना कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामका भजन करें।

सरन गए प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

जिसने संपूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप किया हो, शरणमें आनेपर प्रभु उसे भी नहीं त्यागते। जिनका नाम तीनों तापोंका नाशक है, वे ही प्रभु मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं—हे रावण! हृदयमें यह बात समझ लीजिए।

दोहा

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥३९(क)

हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरण पकड़कर विनती करता हूँ—मान, मोह और मद त्यागकर कोसलाधीश श्रीरामका भजन करें।

दोहा

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥३९(ख)

मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके द्वारा यह संदेश भेजा था, हे तात! सुंदर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात आपसे कह दी।

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥

माल्यवान् नामका एक अत्यंत बुद्धिमान मंत्री था, उसने विभीषणकी बात सुनकर बड़ा संतोष पाया और कहा—हे तात! आपके छोटे भाई नीतिके आभूषण हैं, विभीषण जो कह रहे हैं उसे हृदयमें उतार लीजिए।

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥

रावणने कहा—ये दोनों मूर्ख शत्रुकी बड़ाई गा रहे हैं, कोई है यहाँ, इन्हें दूर करो! तब माल्यवान् घर लौट गया, पर विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे—

सुमति कुमति सब के उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

हे नाथ! पुराण और वेद कहते हैं कि अच्छी और बुरी बुद्धि दोनों ही सबके हृदयमें रहती हैं—जहाँ अच्छी बुद्धि होती है, वहाँ नाना संपदाएँ रहती हैं, और जहाँ बुरी बुद्धि होती है, वहाँ अंततः विपत्ति ही आती है।

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

आपके हृदयमें उलटी बुद्धि बस गई है, इसीसे आप हितको अहित और शत्रुको मित्र मान बैठे हैं। जो राक्षसकुलके लिए कालरात्रिके समान हैं, उन सीताजीपर आपकी इतनी गहरी प्रीति है!

दोहा

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥४०

हे तात! मैं आपके चरण पकड़कर विनती करता हूँ, मेरा यह आग्रह स्वीकार कर लीजिए—सीताजीको श्रीरामको लौटा दीजिए, जिससे आपका कोई अहित न हो।

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई॥

विभीषणने पंडितों, पुराणों और वेदोंसे प्रमाणित नीति समझाकर कही, पर सुनते ही रावण क्रोधसे उठ खड़ा हुआ—अरे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है!

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥

रे मूर्ख! तू सदा मेरे ही अन्नसे पलता आया है, फिर भी तुझे शत्रुका पक्ष लेना ही भला लगता है। बता तो, जगत्में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपने भुजबलसे न जीता हो?

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥

मेरे नगरमें रहकर तू तपस्वियोंसे प्रेम करता है—जा मूर्ख, उन्हींसे मिल और उन्हींको नीति सिखा। यह कहकर रावणने उन्हें लात मारी, पर विभीषणने फिर भी बार-बार उसके चरण ही पकड़े।

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! संतकी यही महिमा है कि वे बुराई किए जानेपर भी भलाई ही करते हैं। विभीषणने कहा—आप मेरे पिता समान हैं, मुझे मारा तो अच्छा ही किया, पर हे नाथ! आपका भला तो श्रीरामको भजनेमें ही है।

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

यह कहकर विभीषण अपने मंत्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्गसे चल दिए और सबको सुनाते हुए यों कहने लगे—

दोहा

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥४१

श्रीराम सत्यसंकल्प और सर्वसमर्थ प्रभु हैं, और हे रावण! तुम्हारी यह सभा कालके अधीन हो चुकी है। मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे इसका दोष न देना।

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल के हानी॥

यह कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, वैसे ही सब राक्षस आयुहीन हो गए। शिवजी कहते हैं—हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही समस्त कल्याणका नाश कर देता है।

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥

जिस क्षण रावणने विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा अपने वैभवसे हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित मनसे अनेक मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथके पास चल पड़े।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥

वे सोचते जा रहे थे—अब मैं जाकर उन कोमल, अरुण चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिनके स्पर्शसे ऋषिपत्नी अहल्या तर गई थीं और जिन्होंने दंडकवनको पवित्र कर दिया।

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई॥

जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें बसा रखा है, जो कपटमृगके पीछे दौड़े थे, और जो साक्षात् शिवजीके हृदय-सरोवरमें कमलकी तरह सुशोभित हैं—मेरा सौभाग्य है कि आज मैं उन्हींके दर्शन करूँगा।

दोहा

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥४२

जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, आज मैं उन्हीं चरणोंको अपनी आँखोंसे प्रत्यक्ष देखूँगा।

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥

इस प्रकार प्रेमपूर्ण विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके इस पार आ पहुँचे। वानरोंने विभीषणको आते देखा तो समझ लिया कि यह शत्रुका कोई विशेष दूत है।

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥

उन्हें वहीं ठहराकर वानर सुग्रीवके पास आए और सारा समाचार कह सुनाया। सुग्रीवने कहा—हे रघुनाथ! सुनिए, रावणका भाई आपसे मिलने आया है।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कह कपीस सुनहु नरनाहा॥जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥

प्रभुने कहा—हे मित्र! तुम्हारी क्या राय है? सुग्रीवने कहा—हे महाराज! सुनिए, राक्षसोंकी माया समझमें नहीं आती। यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला न जाने किस कारण आया है।

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥

लगता है यह मूर्ख हमारा भेद जानने आया है, मुझे तो यही उचित लगता है कि इसे बाँध लिया जाए। श्रीरामने कहा—हे मित्र! तुमने नीति तो ठीक ही सोची, पर मेरा प्रण है शरणागतका भय हर लेना!

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥

प्रभुके ये वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हो उठे—भगवान् सचमुच शरणागतवत्सल हैं, यह सोचकर।

दोहा

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥४३

श्रीरामने फिर कहा—जो लोग अपनी हानिकी संभावना देखकर शरणमें आए हुएको त्याग देते हैं, वे नीच और पापी होते हैं, उन्हें देखनेमात्रसे भी पाप लगता है।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्याका पाप जिसे लगा हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव जैसे ही मेरे सम्मुख होता है, उसके करोड़ों जन्मोंके पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥

पापीका स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे मेरा भजन कभी नहीं सुहाता। यदि यह सचमुच दुष्ट हृदयका होता, तो क्या यह मेरे सम्मुख आ भी सकता था?

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥

जो निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है—मुझे कपट और छल तनिक भी प्रिय नहीं। भले ही रावणने इसे भेद लेने भेजा हो, तो भी हे सुग्रीव! हमें कोई भय या हानि नहीं है।

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥

क्योंकि हे मित्र! संसारमें जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण पलभरमें उन सबका नाश कर सकते हैं। और यदि यह भयभीत होकर शरण आया है, तो मैं इसे अपने प्राणोंकी भाँति सुरक्षित रखूँगा।

दोहा

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥४४

कृपानिधान श्रीरामने हँसकर कहा—दोनों ही स्थितिमें उसे यहाँ ले आओ। तब सुग्रीव अंगद और हनुमानसहित 'कृपालु श्रीरामकी जय' कहते हुए चल पड़े।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥

विभीषणको आदरपूर्वक आगे करके वानर वहाँ पहुँचे, जहाँ करुणाके सागर श्रीराम विराजमान थे। नेत्रोंको आनंद देनेवाले दोनों भाइयोंको विभीषणने दूरसे ही देख लिया।

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥

फिर शोभाके धाम श्रीरामको देखते ही वे पलक झपकाना भूलकर स्तब्ध निहारते रह गए—विशाल भुजाएँ, लाल कमल-जैसे नेत्र और शरणागतका भय मिटानेवाला श्यामल शरीर।

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

सिंहके समान कंधे, चौड़ी और सुशोभित छाती, असंख्य कामदेवोंको भी मोहित कर देनेवाला मुख—यह रूप देखते ही विभीषणके नेत्र भर आए और शरीर रोमांचित हो उठा। फिर धैर्य धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे—

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

हे नाथ! मैं रावणका छोटा भाई हूँ, राक्षसकुलमें जन्म लिया है। हे देवरक्षक! मेरा शरीर तामसी है और स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लूको अंधकारसे सहज ही स्नेह होता है।

दोहा

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥४५

मैं आपका सुयश कानोंसे सुनकर ही यहाँ आया हूँ कि आप जन्म-मरणके भयको मिटानेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख हरनेवाले, शरणागतको सुख देनेवाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥

यह कहते हुए उन्हें दंडवत करते देख प्रभु अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठ खड़े हुए। विभीषणके ये दीन वचन सुनकर प्रभुका मन द्रवित हो उठा और उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया।

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥

लक्ष्मणसहित गले मिलकर उन्हें अपने पास बिठाकर भक्तोंका भय हरनेवाले श्रीराम बोले—हे लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो, तुम्हारा निवास तो बड़ी बुरी जगहपर रहा है।

खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥

दिन-रात दुष्टोंकी संगतिमें रहते हुए हे मित्र! तुम्हारा धर्म कैसे निभता होगा? मैं तुम्हारा सारा आचरण जानता हूँ—तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, अनीति तुम्हें कभी नहीं सुहाती।

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥

हे तात! नरकमें रहना भी अच्छा, पर विधाता दुष्टका साथ कभी न दे। विभीषणने कहा—हे रघुनाथ! अब आपके चरणोंके दर्शन पाकर मैं सचमुच कुशल हूँ, आपने अपना सेवक जानकर मुझपर कृपा की।

दोहा

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥४६

जबतक जीव शोकके घर काम-वासनाको त्यागकर श्रीरामको नहीं भजता, तबतक उसे न कुशल मिलती है, न स्वप्नमें भी मनको शांति।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥

लोभ, मोह, ईर्ष्या, मद और अहंकार-जैसे अनेक दुर्गुण तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक धनुष-बाण और कमरमें तरकस धारण किए श्रीरघुनाथ हृदयमें नहीं बस जाते।

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥

ममता एक घनी अंधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको ही सुख देती है। यह रात तभीतक जीवके मनमें छाई रहती है, जबतक प्रभुके प्रतापका सूर्य उदय नहीं होता।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥

हे श्रीराम! आपके चरणकमलोंके दर्शनसे अब मैं सचमुच कुशल हूँ, मेरे सारे भारी भय मिट गए। हे कृपालु! आप जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे तीनों प्रकारके सांसारिक ताप कभी नहीं छूते।

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

मैं अत्यंत नीच स्वभावका राक्षस हूँ, मैंने कभी कोई शुभ कर्म नहीं किया। पर जिनका रूप मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं समाता, उन्हीं प्रभुने प्रसन्न होकर मुझे अपने हृदयसे लगा लिया।

दोहा

-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥४७

मेरा असीम सौभाग्य है, हे कृपा और सुखके सागर श्रीराम! कि मैंने अपनी आँखोंसे ब्रह्मा और शिवजीद्वारा भी सेवित आपके युगल चरणकमल देख लिए।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥

श्रीरामने कहा—हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव बताता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिव और पार्वती भी जानते हैं। कोई मनुष्य चाहे संपूर्ण चराचर जगत्का द्रोही ही क्यों न हो, यदि वह भयभीत होकर मेरी शरणमें आ जाए,

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥

और मद, मोह तथा नाना छल-कपट त्याग दे, तो मैं उसे तुरंत ही साधुके समान बना देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—

सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

इन सबके ममत्वके धागोंको बटोरकर, उन्हें एक डोरीमें पिरोकर जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है, जो समदर्शी है, जिसे कोई इच्छा नहीं और जिसके मनमें हर्ष, शोक, भय कुछ भी नहीं—

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरे देह नहिं आन निहोरें॥

ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें वैसे ही बस जाता है जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा रहता है। तुम्हारे-जैसे संत ही मुझे प्रिय हैं, मैं किसी और आग्रहवश देह धारण नहीं करता।

दोहा

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥४८

जो सगुण भगवान्के उपासक हैं, दूसरोंके हितमें रत रहते हैं, नीति-नियमोंमें दृढ़ हैं और ब्राह्मणोंके चरणोंमें जिनका प्रेम है—वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान प्रिय हैं।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

हे लंकापति! सुनो, ये सब गुण तुममें हैं, इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो। श्रीरामके ये वचन सुनकर वानरदल जय-जयकार करने लगा—कृपासागर श्रीरामकी जय हो!

सुनत बिभीषनु प्रभु के बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥

प्रभुकी यह वाणी सुनते हुए विभीषण उसे कानोंके लिए अमृत मानकर तृप्त ही नहीं हो पा रहे थे। वे बार-बार श्रीरामके चरणकमल पकड़ लेते, उनका प्रेम इतना अपार था कि हृदयमें समाता नहीं था।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥

विभीषणने कहा—हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी! हे शरणागतोंके रक्षक! हे अंतर्यामी! सुनिए, मेरे हृदयमें जो पहलेकी वासनाएँ थीं, वे सब आपके चरणप्रेमकी धारामें बह गईं।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

अब हे कृपालु! मुझे अपनी वह पवित्र भक्ति दीजिए, जो शिवजीके मनको भी सदा प्रिय है। 'एवमस्तु' कहकर रणधीर प्रभुने तुरंत समुद्रका जल मँगवाया।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

और कहा—हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं थी, फिर भी मेरा दर्शन इस जगत्में कभी निष्फल नहीं जाता। यह कहकर श्रीरामने उन्हें राजतिलक कर दिया, आकाशसे फूलोंकी अपार वर्षा होने लगी।

दोहा

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥४९(क)

श्रीरामने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें, जो विभीषणकी ही साँसों-वचनोंसे प्रचंड हो उठी थी, जलते हुए विभीषणको बचा लिया और उन्हें अखंड राज्य प्रदान किया।

दोहा

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिए दस माथ।सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥४९(ख)

शिवजीने जो संपत्ति रावणको उसके दसों सिर बलि चढ़ाने पर दी थी, वही संपत्ति श्रीरघुनाथने संकोचसे भरकर विभीषणको सौंप दी।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥

ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो दूसरोंको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु ही हैं। अपना सेवक जानकर श्रीरामने विभीषणको अपना लिया—प्रभुका यह स्वभाव सारे वानरकुलके मनको भा गया।

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

फिर सर्वज्ञ, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप, सबसे परे, उदासीन और भक्तोंके लिए ही मनुष्यरूप धरनेवाले, राक्षसकुलका नाश करनेवाले श्रीराम नीतिकी रक्षा करते हुए बोले—

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥

हे वीर सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्रको कैसे पार किया जाए? मगर, साँप और मछलियोंसे भरा यह अथाह समुद्र हर तरहसे दुर्गम है।

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

विभीषणने कहा—हे रघुनाथ! सुनिए, यद्यपि आपका एक ही बाण करोड़ों समुद्रोंको सोख सकता है, फिर भी नीति यही कहती है कि पहले जाकर समुद्रसे विनतीपूर्वक अनुरोध किया जाए।

दोहा

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥५०

हे प्रभु! समुद्र तो आपके ही कुलके पूर्वज हैं, वे विचारकर उपाय बता देंगे, जिससे सारी भालू-वानर सेना बिना किसी परिश्रमके समुद्र पार कर जाएगी।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ देव जौं होइ सहाई॥मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

श्रीरामने कहा—हे सखा! तुमने अच्छा उपाय सुझाया है, यदि दैव सहायक हुआ तो यही किया जाएगा। यह सलाह लक्ष्मणको तनिक भी न भाई, श्रीरामके ये वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ।

नाथ देव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

लक्ष्मणने कहा—हे नाथ! भला दैवका क्या भरोसा! मनमें क्रोध लाकर समुद्रको सुखा ही डालिए। यह 'दैव' तो बस कायरके मनका सहारा है, आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारते फिरते हैं।

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥

यह सुनकर रघुवीर हँसते हुए बोले—ऐसा ही करेंगे, तुम धैर्य रखो। यह कहकर प्रभुने छोटे भाईको समझाया और स्वयं समुद्रके निकट चले गए।

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

उन्होंने पहले सिर नवाकर समुद्रको प्रणाम किया, फिर तटपर कुश बिछाकर बैठ गए। इधर ज्यों ही विभीषण प्रभुके पास पहुँचे थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे गुप्तचर भेज दिए थे।

दोहा

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥५१

वानरका कपटरूप धरकर उन गुप्तचरोंने यह सारी लीला अपनी आँखों देखी और मनहीमन प्रभुके गुणों तथा शरणागतपर उनके अपार स्नेहकी सराहना करने लगे।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

वे खुलेआम भी अत्यंत प्रेमसे श्रीरामके स्वभावकी प्रशंसा करने लगे, यहाँतक कि अपना छद्मवेश भी भूल बैठे। तभी वानरोंने पहचान लिया कि ये शत्रुके गुप्तचर हैं, और उन्हें बाँधकर सुग्रीवके पास ले आए।

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

सुग्रीवने कहा—सुनो वानरो, इन राक्षसोंके अंग-भंग करके भेज दो। यह सुनते ही वानर दौड़ पड़े और दूतोंको बाँधकर पूरी सेनाके चारों ओर घुमाया।

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥

वानर उन्हें भाँति-भाँतिसे पीड़ा देने लगे, वे दीन होकर गिड़गिड़ाते रहे, फिर भी वानरोंने न छोड़ा। तब उन्होंने पुकारा—जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामकी शपथ है!

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए॥रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

यह सुनकर लक्ष्मणने सबको अपने पास बुलवाया, उन्हें दया आ गई और हँसते हुए उन्हें तुरंत छोड़ दिया। कहा—रावणके हाथ यह संदेश देना, हे कुलघातक! लक्ष्मणका यह वचन ध्यानसे सुनो।

दोहा

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार॥५२

मूर्खसे मुँहज़बानी मेरा यह उदार संदेश कह देना—सीताको लौटाकर श्रीरामसे मिल जाओ, नहीं तो समझ लो तुम्हारा अंत निकट आ गया है।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥

लक्ष्मणके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामके गुणोंकी कथा कहते हुए दूत तुरंत चल पड़े। श्रीरामके यशका बखान करते हुए वे लंका पहुँचे और रावणके चरणोंमें सिर नवाया।

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

रावणने हँसते हुए पूछा—अरे शुक! अपनी कुशल तो बता, फिर विभीषणका भी समाचार सुना, जिसकी मृत्यु अब बिलकुल निकट आ पहुँची है।

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥

मूर्खने राज्य करते हुए लंका त्याग दी, अब वह अभागा घुनकी तरह पिस जाएगा। फिर मुझे भालू-वानरोंकी सेनाका हाल बता, जो काल-प्रेरित यहाँ चली आई है।

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥कहु तपसिन्ह के बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

जिनके जीवनका सहारा बस यह बेचारा कोमलहृदय समुद्र ही बन गया है (वरना अबतक मारे जा चुके होते)। फिर उन तपस्वियोंका हाल बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा भारी भय रहता है—

दोहा

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥५३

उनसे तुम्हारी भेंट हुई, या वे मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए? शत्रुसेनाके तेज-बलका वर्णन क्यों नहीं करता? तेरा चित्त तो बहुत ही चकित दिख रहा है।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

दूतने कहा—हे नाथ! जैसे आपने कृपापूर्वक पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात मान लीजिए—आपका छोटा भाई जैसे ही श्रीरामसे जा मिला, वहाँ पहुँचते ही उन्होंने उसे राजतिलक कर दिया।

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥श्रवन नासिका काटे लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥

हम रावणके दूत हैं, यह सुनते ही वानरोंने हमें बाँधकर बहुत सताया, यहाँतक कि नाक-कान काटने लगे थे। श्रीरामकी शपथ दिलाकर ही किसी तरह हमें छुड़ाया गया।

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥

हे नाथ! आपने श्रीरामकी सेनाके विषयमें पूछा—पर उसे तो सौ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। नाना रंगोंके भालू-वानरोंकी वह सेना विकराल मुख और विशाल शरीरवाली, अत्यंत भयंकर है।

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको मारा, उसका बल तो उस सेनामें सबसे कम है। वहाँ असंख्य नामोंवाले भयंकर योद्धा हैं, जिनमें अनगिनत हाथियोंका बल भरा है।

दोहा

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥५४

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्—ये सब बलकी साक्षात् राशि हैं।

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥

ये सब वानर सुग्रीवके समान बलशाली हैं, और इनके जैसे करोड़ों हैं—इतनी बड़ी संख्या गिने भी तो कौन! श्रीरामकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है, वे तीनों लोकोंको तिनकेके समान तुच्छ समझते हैं।

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥

हे दशग्रीव! मैंने तो यही सुना है कि अकेले अठारह पद्म वानर तो केवल सेनापति ही हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं जो युद्धमें आपको न जीत सके।

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला॥

वानर सब अत्यन्त क्रोधमें हाथ मलते हैं, पर श्रीरघुनाथजी उन्हें युद्धकी आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं—हम मछलियों-साँपोंसहित समुद्रको ही सोख डालेंगे, नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ भरकर इसे पाट देंगे।

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥

और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे—सब वानर इसी तरहके वचन बोल रहे हैं। वे स्वभावसे ही निर्भय गरज-तर्ज रहे हैं, मानो लंकाको निगल ही जाना चाहते हों।

दोहा

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम॥५५

वानर-भालू तो स्वभावसे ही शूरवीर हैं, ऊपरसे उनके सिरपर स्वयं प्रभु श्रीराम विराजमान हैं। हे रावण! ऐसेमें वे युद्धमें करोड़ों कालोंको भी जीत सकते हैं।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥सक सर एक सोधि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

श्रीरामके तेज, बल और बुद्धिकी अपार महिमाको सैकड़ों शेषनाग भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंको सोख सकते हैं, फिर भी नीतिनिपुण होनेके कारण तुम्हारे भाईसे राह पूछी है।

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥

तुम्हारे भाई विभीषणके वचन सुनकर वे कृपावश समुद्रसे मार्ग माँग रहे हैं। यह सुनते ही रावण हँस पड़ा और बोला—यदि ऐसी बुद्धि है तो वानरकी सहायतासे ही काम चलेगा!

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥

स्वभावसे डरपोक विभीषणकी बात मानकर उन्होंने समुद्रसे यह बालहठ ठानी है। अरे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्यों करता है, मैंने तो शत्रुके बल-बुद्धिकी थाह पहले ही पा ली है।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥

जिसका मन्त्री ही विभीषणकी तरह डरपोक हो, उसे संसारमें विजय और वैभव कहाँ मिल सकते हैं! दुष्ट रावणके ये वचन सुनकर दूतका क्रोध बढ़ गया, और अवसर देखकर उसने अपनी पत्रिका निकाली।

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

और कहा—यह पत्रिका श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने भेजी है, हे नाथ! इसे पढ़कर अपना कलेजा ठंडा कीजिये। रावणने हँसकर उसे बायें हाथसे ले लिया और मन्त्रीको बुलाकर पढ़वाने लगा।

दोहा

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥५६(क)

पत्रिकामें लिखा था—अरे मूर्ख! केवल मीठी बातोंसे मन बहलाकर अपने कुलका नाश मत कर। श्रीरामसे बैर करके तू विष्णु, ब्रह्मा और शिवकी शरणमें जाकर भी नहीं बच सकेगा।

दोहा

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥५६(ख)

या तो अभिमान त्यागकर अपने छोटे भाई विभीषणकी भाँति प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा, अन्यथा हे दुष्ट! अपने समूचे कुलसहित श्रीरामके बाणरूपी अग्निमें पतंगेकी तरह जलकर भस्म हो जायगा।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥

पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो उठा, परन्तु ऊपरसे मुसकराता हुआ सबको सुनाकर बोला—यह वैसे ही है जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़ना चाहे, या छोटा-सा तपस्वी अपनी गर्वीली शेखी बघारे।

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

शुकने कहा—हे नाथ! अभिमान छोड़कर इस पत्रीमें लिखी सब बातोंको सत्य मान लीजिये। क्रोध त्यागकर मेरी बात सुनिये और श्रीरामसे यह बैर छोड़ दीजिये।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥

श्रीरघुवीरका स्वभाव अत्यन्त कोमल है, यद्यपि वे समस्त लोकोंके स्वामी हैं। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा करेंगे, आपका एक भी अपराध वे मनमें नहीं रखेंगे।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

बस इतना ही कीजिये कि जानकीजीको श्रीरघुनाथको लौटा दीजिये, प्रभु मेरी इतनी बात मान लें। ज्योंही उसने जानकीजीको लौटानेकी बात कही, त्योंही दुष्ट रावणने उसे लात मार दी।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

वह भी विभीषणकी ही तरह चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला गया जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी विराजते थे। प्रणाम करके उसने अपनी सारी कथा सुनायी और श्रीरामकी कृपासे अपनी सद्गति पायी।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

शिवजी कहते हैं—हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि ही अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस बना था। बार-बार श्रीरामके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको लौट गया।

दोहा

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७

इधर विनयको समुद्र तीन दिन बीतनेपर भी नहीं मानता। तब श्रीराम क्रोधसहित बोल उठे—बिना भय दिखाये प्रेम नहीं जागता!

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥

हे लक्ष्मण! धनुष-बाण ले आओ, मैं अग्निबाणसे इस समुद्रको सोख डालूँगा। मूर्खसे विनय करना, कुटिलसे प्रेम रखना और जन्मजात कंजूसको उदारताका उपदेश देना—

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

ममतामें डूबे हुएको ज्ञानकी बात, अत्यन्त लोभीको वैराग्यकी शिक्षा और क्रोधीको शान्ति तथा कामीको भगवत्कथा सुनाना—इन सबका फल वैसा ही होता है जैसे ऊसर भूमिमें बीज बोनेका।

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथने धनुष चढ़ा लिया, यह निर्णय लक्ष्मणके मनको बहुत भाया। प्रभुने भयंकर बाणका संधान किया, जिससे समुद्रके हृदयमें आगकी लपटें उठ गयीं।

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

मगर, सर्प और मछलियोंके समूह व्याकुल हो उठे। जब समुद्रने अपने प्राणियोंको जलते देखा, तो वह सोनेके थालमें अनेक मणियाँ भरकर, अभिमान त्यागकर ब्राह्मणका रूप धरकर आ पहुँचा।

दोहा

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८

काकभुशुण्डिजी कहते हैं—हे गरुड़! सुनो, केला तो चाहे कितने ही उपाय करके सींचो, काटनेपर ही फलता है; इसी तरह नीच विनयसे नहीं मानता, डाँटनेपर ही झुकता है।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़ लिये—हे नाथ! मेरे सब अपराध क्षमा कीजिये। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सबकी प्रकृति ही स्वभावसे जड़ है।

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥

आपकी ही प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये रचा है, यही सब शास्त्रोंने गाया है। स्वामीकी जैसी आज्ञा जिसके लिये है, वह उसीमें रहकर सुख पाता है।

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

प्रभुने मुझे दण्ड देकर भला ही किया, पर यह मर्यादा भी तो आपने ही बनायी है—कि ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री, ये सब शिक्षाके ही अधिकारी हैं।

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं। फिर भी प्रभुकी आज्ञा तो वेदोंने भी अलंघ्य बतायी है, अतः जो आपको भाये वही शीघ्र कीजिये।

दोहा

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।जेहि बिधि उतरे कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥५९

समुद्रके इतने विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीरामने मुसकराकर कहा—हे तात! जिस विधिसे वानर-सेना पार उतर सके, वही उपाय बताओ।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥तिन्ह के परस किए गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

समुद्रने कहा—हे नाथ! नील और नल नामके दो वानर भाई हैं, बचपनमें ही उन्हें एक ऋषिका आशीर्वाद मिला था। उनके छूते ही बड़े-बड़े पर्वत भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैरने लगेंगे।

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

मैं भी प्रभुकी महिमाको हृदयमें धारणकर अपने बलभर सहायता करूँगा। हे नाथ! इस तरह समुद्रको बाँध दीजिये, जिससे यह सुयश तीनों लोकोंमें गाया जाय।

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥

इसी बाणसे मेरे उत्तर तटपर बसनेवाले पापी दुष्टोंका वध कर दीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामने समुद्रकी यह पीड़ा सुनते ही तुरन्त उसे दूर कर दिया।

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

श्रीरामका भारी बल-पौरुष देखकर समुद्र हर्षित और सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया, फिर चरणोंकी वन्दना करके वह अपने घर चला गया।

छंद

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

समुद्र अपने घर लौट गया, श्रीरघुनाथको उसकी यह सलाह भा गयी। तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार यह चरित्र गाया है, जो कलियुगके पापोंको हरनेवाला है। यह सुखका घर है, संशय मिटानेवाला और विषादका नाश करनेवाला श्रीरघुनाथका गुणगान है—इसे अपनी सब आशा-भरोसा छोड़कर मूर्ख मनवाले भी निरन्तर गायें और सुनें।

दोहा

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०

श्रीरघुनाथका यह गुणगान समस्त शुभ मंगलोंको देनेवाला है। जो इसे आदरपूर्वक सुनेंगे, वे बिना किसी नौकाके ही भवसागरको पार कर जायँगे।

दोहा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चम: सोपान: समाप्तः।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पाँचवाँ सोपान (सुन्दरकाण्ड) समाप्त हुआ।