रामचरितमानसआरती
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प्रथम सोपान

बालकाण्ड

शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।

बालकाण्ड — सुनें

बालकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी

शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

श्लोक

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ

अक्षर, शब्दों के अर्थ, काव्य-रस, छंद और समस्त शुभ कार्यों की सिद्धि करने वाले माँ सरस्वती और श्रीगणेशजी को मैं आरम्भ में ही प्रणाम करता हूँ।

श्लोक

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्

पार्वतीजी और शिवजी को नमन करता हूँ, जो क्रमशः श्रद्धा और विश्वास के साकार रूप हैं — इनके सहारे के बिना बड़े-बड़े सिद्ध पुरुष भी अपने भीतर बसे परमेश्वर को नहीं पहचान पाते।

श्लोक

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते

मैं अपने सद्गुरु को नमन करता हूँ, जो साक्षात ज्ञानस्वरूप, शाश्वत और शिवजी के समान पूजनीय हैं — जिनकी शरण पाकर टेढ़ा चन्द्रमा भी संसार भर में पूजा जाता है।

श्लोक

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ

श्रीराम-सीता के गुणों के पावन वन में सदा विचरण करने वाले, निर्मल ज्ञानसम्पन्न कविश्रेष्ठ वाल्मीकिजी तथा वानरशिरोमणि हनुमानजी को मैं वन्दन करता हूँ।

श्लोक

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्

सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली, समस्त कष्टों को दूर करने वाली और हर प्रकार का कल्याण करने वाली श्रीराम की प्रियतमा सीताजी के आगे मैं नतमस्तक होता हूँ।

श्लोक

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरायत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतांवन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्

जिनकी माया के अधीन ब्रह्मा आदि देवता, असुर और सम्पूर्ण चराचर जगत् है, जिनके अस्तित्व से ही यह दृश्य-जगत् वैसे ही सत्य प्रतीत होता है जैसे अंधेरे में रस्सी सांप-सी दिखे, और भवसागर पार करने की इच्छा वालों के लिए जिनके चरण ही एकमात्र नौका हैं — उन सर्वकारण-स्वरूप राम नामधारी भगवान् हरि को मैं वन्दन करता हूँ।

श्लोक

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति

अनेक पुराणों, वेदों (निगम), और शास्त्रों (आगम/तंत्र) से सम्मत (स्वीकृत), जो रामायण (वाल्मीकि रामायण या शिवजी द्वारा रचित रामकथा) में वर्णित है और कुछ अन्य ग्रंथों से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी (राम) की पावन कथा को तुलसीदास अपने अंतःकरण के सुख (आत्म-शांति) के लिए अत्यन्त मनोहर और सुंदर भाषा में विस्तृत (रचना) कर रहे हैं।

सोरठा

जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन

जिनका स्मरण करते ही हर कार्य सफल हो जाता है, जो गणों के अधिपति हैं और गजमुख धारण करते हैं — बुद्धि के भण्डार और शुभ गुणों के धाम वे श्रीगणेशजी मुझ पर कृपा करें।

सोरठा

मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥

जिनकी कृपा से गूँगा भी सुंदर वाणी बोलने लगे और लंगड़ा दुर्गम पर्वत पार कर ले — कलियुग के समस्त पापों को भस्म करने वाले वे दयालु प्रभु द्रवित हों।

सोरठा

नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन

नीलकमल-सा श्याम वर्ण और खिले लाल कमल जैसे नेत्रों वाले, सदा क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान् मेरे हृदय में सदा निवास करें।

सोरठा

कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन

कुंद के फूल और चन्द्रमा-सी गौर देह वाले, पार्वतीजी के प्रियतम और करुणा के आगार शिवजी — जो दीनों पर विशेष स्नेह रखते हैं — कामदेव के मर्दन करने वाले वे मुझ पर कृपा करें।

सोरठा

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर

गुरु के चरण-कमलों की मैं वन्दना करता हूँ, जो कृपा के सागर और मनुष्यरूप में साक्षात् हरि हैं — जिनका एक वचन महामोह रूपी सघन अंधकार को सूर्यकिरणों की भाँति दूर कर देता है।

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

मैं गुरुजी के चरण-कमलों की रज को नमन करता हूँ, जिसमें उत्तम सुगंध और गहरा अनुराग भरा है — जो अमृतमयी जड़ी के चूर्ण-सी है और भव-रोग के समस्त परिवार का शमन करती है।

सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किए तिलक गुन गन बस करनी॥

वह रज शिवजी के शरीर की निर्मल विभूति के समान पुण्यदायी है, सुंदर मंगल और आनंद को जन्म देने वाली है — भक्तों के मन-दर्पण का मैल हरने वाली यह रज मानो गुणों का तिलक बनकर मन को वश में कर लेती है।

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती॥दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥

श्रीगुरु के चरण-नखों की कान्ति मणियों के तेज-सी है, जिसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि जाग उठती है — यह प्रकाश मोहरूपी अंधकार का नाश करता है, और जिसके हृदय में यह उतर आए, वह परम भाग्यशाली है।

उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥

इसी दिव्य दृष्टि से निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रि के दोष-दुख मिट जाते हैं — तब राम-चरित्र के मणि-माणिक्य, चाहे प्रकट हों या छिपे, हर जगह दिखाई देने लगते हैं।

दोहा

जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान

जैसे सिद्ध साधक विशेष अंजन आँखों में लगाकर पर्वत और वन में गड़े अनगिनत धरती के खजाने कौतुक भर में देख लेते हैं, वैसे ही यह गुरु-कृपारूपी अंजन दृष्टि को दिव्य बना देता है।

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥

गुरु-चरणों की रज ही वह कोमल-सुंदर अंजन है जो नेत्रों के अमृत-दोष हर लेता है — इसी से निर्मल विवेक-रूपी नेत्र पाकर मैं संसार-बंधन काटने वाले श्रीराम-चरित्र का वर्णन करता हूँ।

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥

सबसे पहले मैं ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो मोहजनित सभी संशयों को हर लेते हैं — फिर सज्जनों के समाज को, जो समस्त गुणों की खान है, प्रेमपूर्वक प्रणाम करता हूँ।

साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥

साधुओं का चरित्र शुभ कपास के समान है — देखने में नीरस और स्वच्छ, पर उसका फल गुणों से भरा होता है; जो दूसरों के दोष छिपाकर स्वयं दुख सहता है, वही संसार में यश और वन्दना पाता है।

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥

संत-समाज आनंद और मंगल से भरा है, मानो पृथ्वी पर चलता-फिरता तीर्थराज ही हो — जहाँ राम-भक्ति गंगा की धारा-सी बहती है और ब्रह्मविचार का प्रचार होता रहता है।

बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥

यह समाज विधि-निषेध के ज्ञान से कलियुग के पाप हरता है और सूर्यपुत्र यमराज की कथा (धर्म-कथा) कहता है — हरि और हर, दोनों की कथाएँ यहाँ त्रिवेणी-सी विराजती हैं, जिन्हें सुनते ही सब मंगल-आनंद मिलता है।

बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥

यह समाज अपने धर्म पर अटल विश्वास रखने वाला और तीर्थराज प्रयाग-सा शुभ कर्मों वाला है — हर दिन, हर देश में, सबके लिए सुलभ है, और श्रद्धापूर्वक सेवा करने पर सारे क्लेश मिटा देता है।

अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥

तीर्थराज प्रयाग की महिमा अकथनीय और अलौकिक है — यह देह धारण करते ही तत्काल फल देने वाला अपना प्रभाव प्रत्यक्ष दिखा देता है।

दोहा

सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग

इसे सुनकर-समझकर लोग प्रसन्न मन से अत्यंत प्रेमपूर्वक स्नान करते हैं — इस देह के रहते ही वे साधु-समाजरूपी प्रयाग में चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पा लेते हैं।

मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥सुनि आचरज करे जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥

सत्संग में स्नान का फल तत्काल दिखता है — कौआ भी कोयल जैसा और बगुला भी हंस जैसा बन जाता है; यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।

बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥

वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी (घटयोनि) — सभी ने अपने-अपने मुख से अपनी कथा कही है; जल में, थल में, आकाश में रहने वाले तथा जड़-चेतन, सभी प्रकार के जीव इसके साक्षी हैं।

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥

बुद्धि, कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और भलाई — जिसने जब, जिस यत्न से, जहाँ भी पाई — जान लो कि वह सब सत्संग का ही प्रभाव है; लोक हो या वेद, इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है।

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥

सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता और राम-कृपा के बिना वह सत्संग भी सहज नहीं मिलता — सत्संग ही आनंद-मंगल का मूल है, वही सिद्धि रूपी फल और साधन का फूल है।

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥

मूर्ख भी सत्संग पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से खोटी धातु सोना बन जाती है — पर विधि के वश दुर्भाग्य से यदि सज्जन कुसंगत में पड़ जाएँ, तो भी वे मणि धारण किए साँप की तरह अपने ही गुण का अनुसरण करते हैं।

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा बड़े-बड़े कवि और विद्वानों की वाणी भी संतों की महिमा वर्णन करते हुए सकुचा जाती है। फिर मुझसे यह किस तरह कहा जा सकेगा — ठीक वैसे ही जैसे कोई साग बेचने वाला रत्नों के गुण परखने बैठ जाए।

दोहा

बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ३(क)

मैं ऐसे संतों को प्रणाम करता हूँ जिनका मन सबके प्रति समान रहता है, जिनके लिए न कोई हितैषी है, न कोई शत्रु — जैसे अंजलि में रखे शुभ फूल अपनी सुगंध से दोनों हाथों को समान रूप से महका देते हैं, वैसे ही उनका स्नेह सब पर एक-सा बरसता है।

दोहा

संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु३(ख)

हे सरल हृदय, संसार का हित चाहने वाले, स्वभाव से ही स्नेही संतो! मेरी बालक-जैसी विनती सुनकर कृपा कीजिए और मुझे श्रीराम के चरणों में प्रेम प्रदान कीजिए।

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥

अब मैं सद्भाव से दुष्टों की भी वंदना करता हूँ, जो बिना किसी कारण के ही किसी का भला या बुरा करने पर उतर आते हैं। जिनके लिए दूसरे की हानि में लाभ और लाभ में हानि दिखे, जो दूसरों की बर्बादी देखकर हर्षित होते हैं और उनकी भलाई देखकर दुखी होते हैं।

हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥

जो विष्णु और शिव की कीर्ति को राहु के समान ग्रस लेने वाले हैं, जो दूसरों को हानि पहुँचाने में सहस्रबाहु जैसे वीर बन जाते हैं। जो दूसरों के दोष हजार आँखों से देखते हैं, पर दूसरों की भलाई रूपी घी में मक्खी की तरह गिर पड़ते हैं।

तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥उदय केतु सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥

जो तेज में अग्नि के समान और क्रोध में यम के समान हैं, जिनके पास पाप और दुर्गुण ही धन हैं और वे उन्हीं के धनी-कुबेर हैं। जो केतु ग्रह के उदय के समान सबका अहित करने वाले हैं, और कुम्भकर्ण की तरह परोपकार के समय गहरी नींद में सोए रहना ही उनके लिए अच्छा है।

पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥

जो दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए अपने प्राण तक त्याग देते हैं, जैसे ओले खेती को नष्ट करके स्वयं भी गल जाते हैं। मैं ऐसे दुष्टों की भी वंदना करता हूँ जो क्रोधित शेषनाग के समान अपने सहस्र मुखों से दूसरों के दोष ही बखानते रहते हैं।

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥

फिर मैं राजा पृथु के समान दुष्टों को भी प्रणाम करता हूँ, जो दूसरों के पाप-दोष सुनने के लिए मानो दस हजार कान लगाए रहते हैं। फिर मैं इंद्र के समान उनकी भी विनती करता हूँ, जो सदैव देवताओं की सेना के हित का बहाना बनाए रहते हैं।

बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥

जिन्हें वज्र के समान कठोर वचन ही सदा प्रिय लगते हैं, और जो इन्द्र के सहस्र नेत्रों की भांति सदैव दूसरों के दोष ही देखते रहते हैं।

दोहा

उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति

उदासीन, शत्रु अथवा मित्र — किसी का भी भला सुनकर दुष्टों का स्वभाव जल उठता है, ऐसा जानकर भी यह सेवक दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक उनसे विनती करता है कि वे प्रसन्न रहें।

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥

मैंने अपनी ओर से तो प्रेम-निवेदन कर दिया है, पर दुष्ट लोग अपनी ओर से कभी भोलेपन का भाव नहीं लाते। कौवों को कितने ही प्रेम से क्यों न पाला जाए, वे कभी मांस छोड़कर शुद्ध शाकाहारी नहीं बन पाते।

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥

अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करता हूँ और दोनों में एक ऐसा अंतर बताता हूँ जो दुखदायी भी है और सुखद भी। एक बिछड़ते ही प्राण हर लेते हैं, तो दूसरे मिलते ही भयंकर दुख देते हैं।

उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥

संत और असंत इस संसार में साथ-साथ जन्म लेते हैं, जैसे कमल और जोंक एक ही जल में पैदा होकर भी अपने गुण-स्वभाव में सर्वथा भिन्न होते हैं। साधु और असाधु अमृत और मदिरा के समान हैं, यद्यपि इन दोनों का उद्गम स्थान एक ही अथाह समुद्र है।

भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥

भला और बुरा व्यक्ति अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही क्रमशः सुयश और अपयश रूपी फल पाते हैं।

सुधा सुधाकर सुरसरि साधु। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधु॥गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥

अमृत, चन्द्रमा और गंगा सत्पुरुषों के समान हैं, तो विष, अग्नि और कलियुग की मैली नदी दुष्टों के समान — यह गुण-दोष सभी जानते हैं, पर जिसे जो प्रिय लगे, वह उसे ही अच्छा मानता है।

दोहा

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥

भलाई से भला और नीचता से नीच अपना-अपना फल पाता है — अमृत की प्रशंसा अमरता के लिए होती है, तो विष की प्रशंसा उसकी घातक शक्ति के कारण मृत्यु के संदर्भ में होती है।

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥

दुष्टों के पाप-अवगुण और साधुओं की गुण-गाथाएँ, दोनों ही अपार समुद्र के समान अथाह हैं। इसीलिए यहाँ केवल कुछ ही गुण-दोषों का वर्णन किया गया है — क्योंकि बिना पहचाने किसी वस्तु को न तो ग्रहण करना उचित है, न त्यागना।

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥

भले और बुरे दोनों प्रकार के प्राणी विधाता ने उत्पन्न किए, पर वेदों ने उनके गुण-दोषों को गिनकर अलग-अलग बताया। वेद, इतिहास और पुराण सभी यही कहते हैं कि यह सृष्टि गुण और अवगुण दोनों से गुँथी हुई है।

कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥

वेद, इतिहास और पुराण सभी कहते हैं कि विधाता की यह सृष्टि गुण और दोष दोनों से मिश्रित है — सुख-दुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति जैसे परस्पर विरोधी तत्व इसी मिश्रित सृष्टि के अंग हैं।

दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥

दानव-देव, ऊँच-नीच, जीवनदायी अमृत और मृत्युदायी विष, माया और ब्रह्म, जीव और जगदीश्वर, लक्ष्मी और दरिद्रता, रंक और राजा — ये सभी परस्पर विरोधी तत्व एक साथ इस सृष्टि में विद्यमान हैं।

कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥

काशी और साधारण मार्ग, गंगा और कर्मनाशा नदी, मरुस्थल और उपजाऊ भूमि, ब्राह्मण और साधारण जन, स्वर्ग और नरक, अनुराग और वैराग्य — वेद-शास्त्र इन सभी द्वंद्वों में गुण-दोष का भेद बताते हैं।

दोहा

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥

सृष्टिकर्ता ने यह सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् गुण और दोष दोनों से युक्त बनाया है — जैसे हंस दूध और पानी को अलग कर केवल दूध ग्रहण करता है, वैसे ही संत जन जगत् में से केवल गुण को ग्रहण करते हैं और विकाररूपी जल को त्याग देते हैं।

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई॥

जब विधाता ऐसा विवेक प्रदान करते हैं, तब मन दोषों को छोड़कर गुणों में ही रमने लगता है। परंतु समय, स्वभाव और कर्मों के प्रबल प्रभाव से कभी-कभी भला व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर भलाई से चूक जाता है।

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥

उस भूल को भी भगवान के भक्त जन इस प्रकार सुधार लेते हैं कि दुख-दोष को मिटाकर निर्मल यश प्रदान कर देते हैं। सत्संग पाकर दुष्ट भी कभी भला कर बैठते हैं, फिर भी उनका मूल मलिन स्वभाव पूरी तरह नहीं मिटता।

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥

संसार में जो छली-कपटी लोग भी साधु जैसा सुंदर वेष धारण कर लेते हैं, वे भी उस वेष के प्रताप से कुछ समय के लिए पूजे जाने लगते हैं। किंतु अंत में उनका असली रूप खुल ही जाता है और उनका निर्वाह नहीं हो पाता — जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हुआ।

किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥

इसके विपरीत, कुरूप वेष धारण किए होने पर भी साधु पुरुष सम्मान पाते ही हैं, जैसे संसार में जाम्बवान और हनुमान का हुआ। बुरी संगति से हानि और अच्छी संगति से लाभ होता है — यह बात लोक और वेद दोनों में सर्वविदित है।

गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी॥

धूल भी पवन के संग से आकाश में उड़ जाती है, और वही जल नीचे बहकर कीचड़ में मिल जाता है। साधु और असाधु के घर में पले तोता-मैना भी अपनी-अपनी संगति के अनुसार ही होते हैं — एक राम का नाम स्मरण करता है तो दूसरा गिन-गिनकर गालियाँ देता है।

धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥

धुआँ बुरी संगति में जाकर कालिख बन जाता है, वही कालिख फिर स्याही बनकर पुराणों जैसे सुंदर ग्रंथ लिखने के काम आती है। वही जल जब अग्नि और वायु के संग से मिलता है, तो बादल बनकर संसार को जीवनदायी वर्षा देता है।

दोहा

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग७(क)

ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र भी अच्छे या बुरे संयोग को पाकर अच्छी या बुरी वस्तु बन जाते हैं — इस भेद को संसार में केवल सुलक्षण, विवेकी लोग ही पहचान पाते हैं।

दोहा

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह७(ख)

प्रकाश और अंधकार तो दोनों पक्षों में समान रूप से रहते हैं, पर विधाता ने उनके नाम अलग-अलग रख दिए। चन्द्रमा को शोषक और पोषक समझकर ही संसार ने उसे यश और अपयश दोनों दिए।

दोहा

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि७(ग)

जड़ और चेतन, इस संसार के जितने भी जीव हैं, उन सबको श्रीराममय जानकर मैं सदैव दोनों हाथ जोड़कर सबके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ।

दोहा

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब७(घ)

देवता, दानव, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व और किन्नर तथा राक्षस — इन सबकी मैं वंदना करता हूँ। अब आप सब मुझ पर कृपा कीजिए।

आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥

चौरासी लाख योनियों में जल, थल और आकाश में रहने वाले समस्त जीवों को सीता-राममय जानकर, मैं दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम करता हूँ।

जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥

मुझे अपना दास जानकर आप सब कृपापूर्वक छल त्यागकर स्नेह कीजिए। मुझे अपनी बुद्धि और बल का कोई भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ।

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥

मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों की गाथा कहना चाहता हूँ, पर मेरी बुद्धि तुच्छ है और उनका चरित्र अथाह है। मुझे इसका एक भी उपाय नहीं सूझता — मेरी बुद्धि तो दरिद्र के समान है, पर मनोरथ राजा के समान बड़ा है।

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥

मेरी बुद्धि अत्यंत तुच्छ है, पर इच्छा बहुत ऊँची है — चाहता तो अमृत हूँ, पर संसार में मुझे छाछ भी दुर्लभ है। फिर भी सज्जन लोग मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर देंगे और मन लगाकर मेरे बालक-जैसे वचन सुनेंगे।

जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥

जैसे कोई बालक तुतलाकर बोलता है, तो माता-पिता उसे प्रसन्न मन से सुनते हैं। किन्तु क्रूर, कुटिल और दुर्बुद्धि लोग, जिन्हें दूसरों की निंदा करना ही आभूषण जैसा प्रिय लगता है, वे उस पर हँसेंगे।

निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥

अपनी रचना किसे अच्छी नहीं लगती, चाहे वह रसीली हो या नीरस। पर जो दूसरों की रचना सुनकर भी प्रसन्न हो उठें, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में बहुत कम होते हैं।

जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥

संसार में अधिकांश लोग तालाब या नदी के समान हैं, जो जल पाकर स्वयं ही बढ़ जाते हैं। पर सज्जन कोई-कोई ही समुद्र के समान होते हैं, जो चंद्रमा को पूर्ण देखकर दूसरे के उत्कर्ष से स्वयं उमड़ आते हैं।

दोहा

भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास

मेरा भाग्य छोटा है, पर अभिलाषा बड़ी है — फिर भी मैं एक विश्वास लेकर यह कर रहा हूँ। सज्जन लोग इसे सुनकर सुख पाएँगे, जबकि सभी दुष्ट लोग इसका उपहास ही करेंगे।

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥

दुष्टों का उपहास भी मेरे लिए हितकारी ही होगा — जैसे कौआ कोयल को कठोर स्वर वाली कहता है। बगुला हंस पर हँसता है, और मेंढक चातक पर — इसी तरह मलिन लोग निर्मल बात करने वालों पर हँसते हैं।

कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥

जिन्हें न तो काव्य में रस आता है और न श्रीराम के चरणों में प्रेम, उनके लिए यह हास्य-रस ही सुखद होगा। मेरी भाषा-रचना भोली और मति अल्प है, यह हँसने योग्य ही है, इसमें हँसने वालों का कोई दोष नहीं।

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी॥हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की॥

जिन्हें प्रभु के चरणों की प्रीति ठीक से समझ में नहीं आई, उन्हें यह कथा सुनकर फीकी लगेगी। पर जिनकी बुद्धि कुतर्की नहीं है और जिनकी रति विष्णु-शिव के चरणों में है, उनके लिए श्रीरघुनाथजी की यह कथा मधुर होगी।

राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥कबि न होऊँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥

जिनका मन श्रीराम-भक्ति से अलंकृत जान पड़ेगा, ऐसे सज्जन इसे सुनकर सुंदर वाणी की सराहना करेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वचनों में प्रवीण — समस्त कलाओं और विद्याओं से रहित हूँ।

आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥

अक्षर, अर्थ, नाना प्रकार के अलंकार, अनेक प्रकार के छंद और रचना-शैलियाँ, भाव और रस के अनगिनत भेद, तथा काव्य के विविध प्रकार के दोष-गुण — इन सबका मुझे कुछ ज्ञान नहीं।

कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे॥

मुझमें काव्य का कोई विवेक नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ — मानो कोरे कागज पर ही लिख रहा हूँ, इसे बिना किसी संकोच के स्वीकार करता हूँ।

दोहा

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक

मेरी रचना सभी गुणों से रहित है, पर उसमें एक ऐसा गुण है जो संसार भर में प्रसिद्ध है — राम-नाम। इसी बात को समझकर, जिनकी बुद्धि निर्मल और विवेकपूर्ण है, वे सुधीजन इसे सुनेंगे।

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥

इस रचना में श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यंत पवित्र है और पुराणों तथा वेदों का सार है। यह नाम मंगल का घर और अमंगल को हरने वाला है, जिसे उमा सहित शिवजी स्वयं जपते हैं।

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥

किसी अच्छे कवि की कितनी ही अद्भुत रचना क्यों न हो, राम-नाम के बिना वह शोभा नहीं पाती — जैसे चंद्रमुखी सुंदरी कितनी भी सजी-संवरी हो, वस्त्र के बिना उसकी शोभा अधूरी रहती है।

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥

किसी साधारण कवि की सर्वगुण-रहित रचना में भी यदि राम-नाम का यश अंकित हो, तो विद्वान लोग उसे आदरपूर्वक कहते-सुनते हैं, ठीक वैसे ही जैसे भ्रमर केवल रस ग्रहण करता है — संत भी सदा गुणों को ही ग्रहण करते हैं।

जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा॥

यद्यपि इस काव्य में एक भी काव्य-रस नहीं है, फिर भी इसमें श्रीराम का प्रताप स्पष्ट प्रकट है। मेरे मन में यही भरोसा है — भला अच्छे संग से किसे बड़प्पन नहीं मिला?

दोहा

धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥

धुआँ भी अगर की लकड़ी के संग से अपना कड़वापन छोड़कर सुगंध धारण कर लेता है। इसी तरह मेरी साधारण रचना भी उत्तम वस्तु का वर्णन करने से सुंदर बन गई है — क्योंकि राम कथा संसार का कल्याण करने वाली है।

छंद

मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥

श्रीरघुनाथजी की यह कथा मंगल करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है, ऐसा तुलसीदास कहते हैं। साधारण कवि की रचना की गति भी पवित्र नदी की धारा जैसी हो जाती है। प्रभु के सुंदर यश के संग से भद्दी रचना भी सज्जनों के मन को भाने लगती है — जैसे श्मशान की राख भी शिवजी के अंग पर सुशोभित और पवित्र हो जाती है, उसका स्मरण भी सुहावना और पावन होता है।

दोहा

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।दारु बिचारु कि करि कोउ बंदिअ मलय प्रसंग१०(क)

राम-यश के संग से मेरी यह रचना सबको अत्यंत प्रिय लगेगी। भला मलयगिरि चंदन के संग से कौन साधारण लकड़ी का विचार करता है — वह भी वंदनीय बन जाती है।

दोहा

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान१०(ख)

श्याम रंग की गाय का दूध भी अत्यंत निर्मल और गुणकारी होता है, जिसे सब पीते हैं। इसी तरह ग्रामीण-सामान्य भाषा में भी यदि सीता-राम का यश गाया-सुना जाए, तो सुज्ञ पुरुष उसे स्वीकार करते हैं।

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥

मणि, मानिक और मोती की जैसी शोभा होती है, वैसी शोभा वे सर्प, पर्वत या हाथी के सिर पर धारण किए जाने पर नहीं होती। वही जब राजमुकुट में या युवती के शरीर पर सजते हैं, तब उनकी शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं॥भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥

उसी प्रकार विद्वान कहते हैं कि अच्छे कवि की कविता भी कहीं और उत्पन्न होकर कहीं और ही अपनी शोभा पाती है। भक्ति के निमित्त सरस्वतीजी भी ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी चली आती हैं।

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥

राम-चरित रूपी सरोवर में स्नान कराए बिना, सरस्वतीजी का श्रम करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होता। कवि और विद्वान हृदय में यही विचार कर, कलियुग के पापों को हरने वाला हरि-यश गाते हैं।

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥

साधारण मनुष्यों के गुण गाने पर सरस्वतीजी को सिर धुनकर पछताना पड़ता है। विद्वान लोग कहते हैं कि हृदय समुद्र के समान है, बुद्धि सीप के समान, और सरस्वतीजी स्वाति नक्षत्र की बूँद के समान हैं।

जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू॥

यदि उत्तम विचार रूपी जल बरसे, तभी काव्य सुंदर मुक्तामणि के समान बन पाता है।

दोहा

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग११

फिर उन मोतियों को युक्तिपूर्वक बेधकर श्रीराम-चरित रूपी उत्तम धागे में पिरोया जाता है, जिन्हें सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं और वह उनके प्रेम की अत्यंत शोभा बढ़ाता है।

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें॥

जो लोग इस भयंकर कलियुग में जन्मे हैं, वे हंस का वेश धारण किए कौवे के समान कर्म करने वाले हैं। वे वेद-मार्ग छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं — उनका शरीर कपट और कलियुग के पापों का पात्र बना हुआ है।

बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥

वे स्वयं को राम-भक्त कहलाते हुए भी छली हैं, वास्तव में धन, क्रोध और काम के दास हैं। ऐसे लोगों में संसार में सबसे आगे मेरा ही नाम है — मैं ही सबसे बड़ा पाखंडी, धर्म की ध्वजा फहराने वाला ढोंगी हूँ।

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥

यदि मैं अपने सारे अवगुण गिनाने बैठूँ, तो यह कथा इतनी बढ़ जाएगी कि उसका पार ही नहीं मिलेगा। इसलिए मैंने केवल थोड़ा-सा ही वर्णन किया है — बुद्धिमान लोग इतने से ही सब कुछ जान लेंगे।

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥

मेरी नाना प्रकार की यह विनती समझकर कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। फिर भी जो इसमें शंका करेंगे, वे मुझसे भी अधिक मंदबुद्धि और दरिद्र समझे जाएँगे।

कबि न होऊँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥

मैं न तो कवि हूँ, न स्वयं को चतुर कहलाना चाहता हूँ — बस अपनी बुद्धि के अनुसार राम-गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी का अपार चरित्र, और कहाँ संसार में डूबी हुई मेरी तुच्छ बुद्धि!

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥

जिस वायु के वेग से मेरु पर्वत भी उड़ जाए, उसके आगे रूई किस गिनती में है? श्रीराम की अनंत प्रभुता को समझते हुए, यह कथा कहते हुए मेरा मन बहुत भयभीत हो रहा है।

दोहा

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान१२

सरस्वती, शेषनाग, शिव, ब्रह्मा तथा तंत्र-वेद-पुराण — सभी 'नेति नेति' कहकर जिनके गुणों का निरंतर गान करते रहते हैं।

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥

प्रभु की वह महिमा सभी जानते हैं, फिर भी उसे कहे बिना कोई नहीं रह पाता। इसका कारण वेदों ने यह बताया है — भजन का प्रभाव अनेक प्रकार से वर्णन करने योग्य होता है।

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥

वे एक, इच्छारहित, रूपरहित, नामरहित, अजन्मा, सच्चिदानंद और परमधाम स्वरूप भगवान ही व्यापक विश्वरूप हैं। उन्होंने ही देह धारण करके नाना प्रकार के चरित्र किए।

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥

वे केवल भक्तों के हित के लिए ही अवतार लेते हैं — वे परम कृपालु हैं और शरणागत से अत्यंत स्नेह करते हैं। जिस भगवान का अपने भक्तों पर अपार ममता और स्नेह है, जिन्होंने सदा करुणा ही की, कभी क्रोध नहीं किया।

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥

श्रीरघुनाथजी दीनों पर दया करने वाले, सरल और समर्थ स्वामी हैं। विद्वान लोग हरि-यश को इसी रूप में जानकर उसका वर्णन करते हैं और अपनी वाणी को पवित्र तथा सफल बनाते हैं।

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥

उसी बल के सहारे मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों की गाथा, राम-चरणों में मस्तक झुकाकर कहूँगा। मुनियों ने पहले ही हरि-कीर्ति गाई है, इसलिए उसी मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम हो गया है।

दोहा

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं१३

अत्यंत अपार नदी को भी यदि कोई राजा सेतु बनवा दे, तो उस पर चढ़कर एक छोटी-सी चींटी भी बिना श्रम के पार चली जाती है।

एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥

इसी प्रकार अपने मन को बल दिखाकर मैं श्रीरघुनाथजी की सुहावनी कथा कहूँगा — जैसे व्यास आदि अनेक श्रेष्ठ कवियों ने आदरपूर्वक हरि के सुयश का बखान किया है।

चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥

मैं उन्हीं के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ — वे मेरे सभी मनोरथ पूर्ण करें। मैं कलियुग के उन कवियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुण-समूहों का वर्णन किया है।

जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें॥

जो साधारण भाषा में भी परम बुद्धिमान कवि हैं, जिन्होंने अपनी भाषा में हरि-चरित्र का वर्णन किया है — जो हो चुके हैं और आगे होंगे, उन सबको मैं कपट त्यागकर प्रणाम करता हूँ।

होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥

आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु-समाज में मेरी रचना का सम्मान हो। जिस रचना को विद्वान लोग आदर नहीं देते, बालक कवि का वह परिश्रम व्यर्थ ही जाता है।

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥

कीर्ति, रचना और वैभव वही अच्छे हैं जो गंगा नदी के समान सबके लिए हितकारी हों। पर मुझे यह असमंजस और आशंका है कि श्रीराम की सुंदर कीर्ति और मेरी भद्दी रचना का मेल कैसे बैठेगा।

तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥

आप सबकी कृपा से मेरे लिए भी वह सुलभ हो जाएगा — जैसे मोटे टाट पर भी सुंदर पटोरी वस्त्र की सिलाई हो जाए तो वह सुहावना बन जाता है।

दोहा

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान१४(क)

सरल काव्य में निर्मल कीर्ति का वर्णन हो, तो सुज्ञ पुरुष उसी का आदर करते हैं — यहाँ तक कि स्वाभाविक शत्रु भी अपना वैर भूलकर उसे सुनकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दोहा

सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर१४(ख)

पर वह निर्मल बुद्धि के बिना संभव नहीं, और मेरी बुद्धि का बल अत्यंत तुच्छ है। इसलिए मैं बार-बार विनती करता हूँ — कृपा कीजिए, जिससे मैं हरि-यश कह सकूँ।

दोहा

कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल१४(ग)

श्रीरघुनाथजी का चरित्र मानो सुंदर मानसरोवर है, और कवि-विद्वान उसमें विचरने वाले सुंदर हंस हैं। मेरी बालक-जैसी विनती और शुभ रुचि देखकर, आप सब मुझ पर कृपा कीजिए।

सोरठा

बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित१४(घ)

मैं उन मुनि वाल्मीकि के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की रचना की — जो कठोर वर्णों से युक्त होते हुए भी अत्यंत सुकोमल और सुंदर है, और दोषरहित होते हुए भी 'दूषण' अक्षर से युक्त है (यह एक सुंदर शब्द-क्रीड़ा है)।

सोरठा

बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु१४(ङ)

मैं चारों वेदों की वंदना करता हूँ, जो संसार-सागर से पार उतारने के लिए जहाज़ के समान हैं - जिन्हें राम के निर्मल यश का वर्णन करते हुए स्वप्न में भी थकान नहीं होती।

सोरठा

बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी१४(च)

मैं विधाता के चरणों की धूलि को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने यह संसार-सागर रचा है - जहाँ से एक ओर संत-रूपी अमृत, चंद्रमा और कामधेनु प्रकट हुए, तो दूसरी ओर दुष्ट-रूपी विष और मदिरा भी उत्पन्न हुए।

सोरठा

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि१४(छ)

देवता, ब्राह्मण, विद्वान और नवग्रह - इन सबके चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप सब प्रसन्न होकर मेरे सारे सुंदर मनोरथ पूर्ण करें।

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥

फिर मैं सरस्वती और गंगा की वंदना करता हूँ, दोनों का चरित्र पवित्र और मनोहर है। इनमें से एक, गंगा, स्नान और जलपान से पाप का नाश करती हैं, और दूसरी, सरस्वती, कहने-सुनने मात्र से अज्ञान का नाश कर देती हैं।

गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके॥

गुरु, माता-पिता, शिवजी और पार्वतीजी, तथा दीनबंधु दीनदयालु भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ। तुलसीदास सीतापति श्रीराम के सेवक, स्वामी और सखा — सभी रूपों में सर्वथा निष्कपट हित चाहने वाले हैं।

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥

कलियुग को देखकर जगत के हित के लिए शिव-पार्वती ने साबर मंत्रों का जाल रचा, जिनके अक्षर आपस में मेल नहीं खाते और जिनका कोई अर्थ भी जपने योग्य नहीं लगता — फिर भी उनका प्रभाव प्रत्यक्ष दिखता है, यही शिवजी का प्रताप है।

सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥

वे उमापति शिवजी मुझ पर अनुकूल रहकर यह कथा आनंद और मंगल का मूल बनाएँ। पार्वती और शिवजी का स्मरण कर, उनका प्रसाद पाकर, मैं चित्त में उत्साह लिए राम-चरित्र का वर्णन करता हूँ।

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥

शिवजी की कृपा से मेरी रचना ऐसे शोभित होगी मानो तारागणों के साथ मिलकर सुंदर रात्रि शोभा पा रही हो। जो लोग इस कथा को सचेत होकर, समझकर, स्नेहपूर्वक कहेंगे-सुनेंगे,

होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥

वे श्रीराम के चरणों में अनुरागी होकर कलियुग के पापों से रहित सुमंगल के भागी बनेंगे।

दोहा

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥१५

स्वप्न में हो या सत्य में, शिव-पार्वती की कृपा सचमुच मुझ पर बनी है, तो मैंने भाषा-रचना के विषय में जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होकर प्रभावी सिद्ध हो।

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥

मैं अत्यंत पावन अयोध्यापुरी की वंदना करता हूँ, तथा कलियुग के पापों का नाश करने वाली सरयू नदी की भी। फिर मैं उस नगर के नर-नारियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन पर प्रभु की ममता कुछ कम नहीं है।

सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥

जिन्होंने सीताजी की निंदा करने वालों के भी पाप-समूह नष्ट किए और उन्हें शोकरहित लोक में बसाया। मैं पूर्व दिशा के समान कौसल्याजी की वंदना करता हूँ, जिनकी कीर्ति समस्त संसार में फैली है।

प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥

जहाँ से श्रीरघुनाथ रूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुए — जो विश्व के लिए सुखदायी और दुष्टरूपी कमल के लिए पाले के समान हैं। राजा दशरथ और उनकी सभी रानियों को मैं सुकृत और सुमंगल की साक्षात मूर्ति मानता हूँ,

करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥

मन-वचन-कर्म से प्रणाम करता हूँ — वे मुझे अपना पुत्र-सेवक जानकर कृपा करें। इन्हें रचकर स्वयं विधाता भी बड़ा हो गया, क्योंकि राम के माता-पिता होने की महिमा की कोई सीमा नहीं।

दोहा

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥१६

मैं अयोध्या के राजा दशरथजी को प्रणाम करता हूँ, जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम था — उन दीनदयालु प्रभु के वियोग में उन्होंने अपने प्रिय शरीर को तिनके के समान त्याग दिया।

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥

मैं परिवार सहित राजा जनक को प्रणाम करता हूँ, जिनके हृदय में श्रीराम के चरणों का गूढ़ स्नेह है। योग और भोग दोनों में जो गुप्त रूप से छिपा था, वह श्रीराम को देखते ही प्रकट हो गया।

प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥

मैं सबसे पहले भरतजी के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनके नियम-व्रत का वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका मन श्रीराम के चरण-कमलों में ऐसे लीन है जैसे लोभी भ्रमर कमल का साथ कभी नहीं छोड़ता।

बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता॥रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥

मैं लक्ष्मणजी के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जो शीतल, सुंदर और भक्तों को सुख देने वाले हैं। श्रीरघुनाथजी की निर्मल कीर्ति रूपी पताका के लिए वे मानो दंड के समान हैं।

सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥

सहस्र फणों वाले शेषनाग, जो संसार के आधार हैं और जिन्होंने पृथ्वी का भार व भय दूर करने के लिए लक्ष्मणजी के रूप में अवतार लिया — वे कृपासागर, गुणों की खान सौमित्र सदा मुझ पर अनुकूल रहें।

रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥

मैं शत्रुघ्नजी के चरण-कमलों को नमस्कार करता हूँ, जो शूरवीर, सुशील और भरतजी के अनुगामी हैं। फिर मैं महावीर हनुमानजी की विनती करता हूँ, जिनका यश स्वयं श्रीराम ने भी बखाना है।

सोरठा

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर१७

मैं पवनपुत्र हनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरूपी वन के लिए अग्नि के समान और ज्ञान के भंडार हैं, जिनके हृदय-मंदिर में धनुष-बाण धारण किए श्रीराम सदा निवास करते हैं।

कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥

वानरराज सुग्रीव, ऋक्षराज जाम्बवान, राक्षसराज विभीषण, तथा अंगद आदि जो भी वानर-समाज के सदस्य हैं — मैं उन सबके सुंदर चरणों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने पशु-योनि जैसे तुच्छ शरीर में भी श्रीराम को पा लिया।

रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥

श्रीरघुनाथजी के चरणों के जितने भी उपासक हैं — पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य और असुर सहित — मैं उन सबके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जो बिना किसी स्वार्थ के श्रीराम के सेवक हैं।

सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥

शुकदेव, सनकादि भक्त, नारदजी तथा जो भी श्रेष्ठ मुनि विज्ञान में निपुण हैं, उन सबको मैं धरती पर सिर टेककर प्रणाम करता हूँ। हे मुनीश्वरो, मुझे अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए।

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की॥ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

जनकनंदिनी जानकीजी संसार की जननी हैं, जो करुणानिधान श्रीराम को अत्यंत प्रिय हैं। मैं उनके दोनों चरण-कमलों को मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि प्राप्त होती है।

पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक॥

फिर मन-वचन-कर्म से मैं सर्वसमर्थ श्रीरघुनाथजी के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जिनके कमल-जैसे नेत्र हैं और जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, जो भक्तों की विपत्ति हरने वाले और सुख देने वाले हैं।

दोहा

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न१८

वाणी और अर्थ जल और लहर के समान हैं — न तो भिन्न कहे जा सकते हैं, न अभिन्न। मैं सीता-राम के उन चरणों की वंदना करता हूँ, जिन्हें दीन-दुखी अत्यंत प्रिय हैं।

बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥

मैं श्रीरघुनाथ राम के नाम की वंदना करता हूँ, जो अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा तीनों के लिए मूल कारण है। वह नाम ब्रह्मा-विष्णु-शिवमय और वेदों का प्राण है, वह निर्गुण होते हुए भी अनुपम गुणों का भंडार है।

महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥

जिस महामंत्र को शिवजी स्वयं जपते हैं और काशी में मुक्ति के लिए उसी का उपदेश देते हैं, उसकी महिमा गणेशजी जानते हैं, इसीलिए नाम के प्रभाव से ही उन्हें सबसे पहले पूजा जाता है।

जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥

आदिकवि वाल्मीकि ने नाम का प्रताप जाना — उलटा जपकर भी वे शुद्ध हो गए। शिवजी के वचन से यह सुनकर कि राम-नाम सहस्रनाम के समान है, पार्वतीजी ने भी अपने पति के साथ उसे जपा।

हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥

यह देखकर शिवजी स्वयं हर्षित हुए और नाम को अपनी पत्नी पार्वतीजी का आभूषण बना दिया। शिवजी नाम के प्रभाव को भली-भाँति जानते हैं — जिसने उन्हें कालकूट विष का फल भी अमृत के समान दे दिया।

दोहा

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।१९

श्रीरघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है, तुलसीदास और सुदास भक्तजन धान की फसल के समान हैं, और राम नाम के दोनों उत्तम अक्षर सावन-भादों के महीनों के समान हैं जो फसल को पूर्ण पोषण देते हैं।

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥

राम-नाम के दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो मानो भक्तों के हृदय के दो नेत्र हैं। इसका स्मरण सभी के लिए सुलभ और सुखद है — यह लोक में लाभ और परलोक में भी सहारा देता है।

कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥

कहने, सुनने और स्मरण करने में यह अत्यंत सुंदर है — तुलसीदास को यह राम-लखन के समान प्रिय है। यद्यपि वर्णन करने पर इसके दोनों अक्षरों में भेद जान पड़ता है, पर वे ब्रह्म और जीव के समान स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के सहचर हैं।

नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥

राम-नाम के दोनों अक्षर नर-नारायण जैसे शुभ भाई हैं, जो संसार के पालक और विशेषकर भक्तों के त्राता हैं। ये भक्ति रूपी सुंदर स्त्री के मनोहर कान के आभूषण हैं, और जगत के हित के लिए निर्मल चंद्रमा और सूर्य के समान हैं।

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥

ये दोनों अक्षर सुगति रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, तथा कच्छप और शेषनाग के समान पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। ये भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल के लिए भ्रमर के समान हैं, और जीभ पर मानो यशोदा के दो पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम के समान विराजते हैं।

दोहा

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोऊ२०

एक अक्षर छत्र के समान है और दूसरा सब वर्णों के ऊपर मुकुटमणि के समान — तुलसीदास कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी के नाम के ये दोनों अक्षर इसी प्रकार शोभा पाते हैं।

समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥

समझने पर नाम और नामी समान ही हैं — दोनों में परस्पर प्रेम है, नाम मानो प्रभु का ही अनुगामी है। नाम और रूप, दोनों ही ईश्वर की उपाधियाँ हैं — यह अकथनीय और अनादि रहस्य सुबुद्धि से ही समझा जा सकता है।

को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।॥देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥

इनमें कौन बड़ा और कौन छोटा है, यह कहना ही अपराध है — साधुजन इनके गुण-भेद को सुनकर स्वयं समझ लेंगे। रूप को देखने के लिए भी नाम की ही आवश्यकता होती है — नाम के बिना रूप का ज्ञान भी संभव नहीं।

रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥

किसी विशेष रूप को भी नाम जाने बिना पहचानना कठिन है — हाथ में रखी वस्तु भी बिना नाम जाने पहचानी नहीं जाती। पर नाम का तो बिना रूप देखे ही स्मरण किया जा सकता है, और वह हृदय में विशेष स्नेह के साथ स्वयं आ बसता है।

नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥

नाम और रूप की गति एक अकथनीय कहानी है — समझने में सुखद है, पर उसका पूरा वर्णन नहीं हो सकता। निर्गुण और सगुण के बीच नाम ही सच्चा साक्षी है, मानो दोनों को समझाने वाला एक चतुर दुभाषिया।

दोहा

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर२१

तुलसीदास कहते हैं — यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो राम-नाम रूपी मणिदीपक को जीभ रूपी द्वार की देहरी पर रख दे।

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥

योगीजन जीभ से नाम जपकर ही जाग्रत रहते हैं, वैराग्य द्वारा ब्रह्मा की इस सृष्टि-प्रपंच से मुक्त होकर वे अनुपम ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं — जो अकथनीय, दोषरहित और नाम-रूप से परे है।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥

जो लोग गूढ़ गति को जानना चाहते हैं, वे भी जीभ से नाम जपकर ही उसे जान पाते हैं। साधक लय लगाकर नाम जपते हैं और अणिमा आदि सिद्धियाँ पाकर सिद्ध हो जाते हैं।

जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥

अत्यंत पीड़ित भक्तजन नाम जपते हैं, जिससे उनके भारी संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। संसार में राम-भक्त चार प्रकार के हैं — और चारों ही पुण्यात्मा, निष्पाप तथा उदार हैं।

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥

चारों ही प्रकार के चतुर भक्तों के लिए नाम ही आधार है, फिर भी ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय है। चारों युगों और चारों वेदों में नाम का प्रभाव वर्णित है, विशेषकर कलियुग में तो नाम के अतिरिक्त कोई और उपाय ही नहीं।

दोहा

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहें किए मन मीन२२

जो सभी कामनाओं से रहित होकर श्रीराम-भक्ति के रस में लीन रहते हैं, नाम रूपी सुंदर प्रेम-अमृत ने उनके मन को उस अमृत में मछली के समान बना दिया है।

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥

निर्गुण और सगुण दोनों ही ब्रह्म के स्वरूप हैं — अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम। पर मेरी दृष्टि में इन दोनों से भी बड़ा नाम है, जिसने अपने बल से दोनों को ही अपने वश में कर लिया।

प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥एक दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥

इसे मेरी बढ़-चढ़कर कही बात न समझें — मैं तो अपने मन की सच्ची प्रीति और रुचि के अनुसार ही कह रहा हूँ। निर्गुण और सगुण ब्रह्म का भेद वैसे ही समझें जैसे लकड़ी में छिपी और प्रकट अग्नि।

उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनंद रासी॥

ये दोनों ही स्वयं अगम हैं, पर नाम के द्वारा सुगम बन जाते हैं — इसीलिए मैं नाम को ब्रह्म और राम दोनों से भी बड़ा कहता हूँ। व्यापक, अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म ही सत्-चित्-आनंदघन है।

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥

ऐसे निर्विकार प्रभु सबके हृदय में विद्यमान रहते हुए भी, संसार के सभी जीव दुखी और दीन बने रहते हैं — परन्तु नाम के निरूपण और नाम के ही प्रयत्न से वे प्रभु वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, जैसे परखने के प्रयत्न से रत्न का मूल्य प्रकट होता है।

दोहा

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार२३

इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म से भी नाम का प्रभाव अपार और बड़ा है — यह मैं अपने विचार के अनुसार कहता हूँ कि नाम राम से भी बड़ा है।

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥

श्रीराम ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य-शरीर धारण किया, स्वयं संकट सहकर साधुओं को सुखी किया। परंतु नाम को प्रेमपूर्वक जपने मात्र से ही, बिना किसी कष्ट के, भक्त आनंद और मंगल के धाम बन जाते हैं।

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी॥

श्रीराम ने तो एक तपस्वी की स्त्री अहल्या का ही उद्धार किया, पर नाम ने करोड़ों दुर्बुद्धि दुष्टों को सुधार दिया। श्रीराम ने ऋषियों के हित के लिए ताड़का का वध किया, सेना सहित उसके पुत्रों को भी दंडित किया —

सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥

पर नाम तो दास के दोष, दुख और दुराशा को उसी तरह नष्ट कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का नाश करता है। श्रीराम ने स्वयं शिवजी का धनुष तोड़ा, पर नाम का प्रताप तो संसार के भय का ही नाश करने वाला है।

दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥

प्रभु श्रीराम ने दण्डक वन को सुंदर बना दिया, पर नाम ने असंख्य भक्तों के मन को पावन कर दिया — श्रीराम ने राक्षसों के समूह का नाश किया, पर नाम कलियुग के समस्त पापों का समूल नाश करता है।

दोहा

सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ२४

श्रीरघुनाथजी ने शबरी और जटायु जैसे सुसेवकों को ही सद्गति दी, पर नाम ने असंख्य दुष्टों का उद्धार कर दिया — यह गुणगाथा वेदों में भी विदित है।

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ॥नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥

श्रीराम ने सुग्रीव और विभीषण, इन दो शरणागतों की ही रक्षा की, यह सभी जानते हैं। पर नाम ने तो अनेक दीन-दुखियों पर कृपा की है — यह उत्तम विरद लोक और वेद दोनों में शोभित है।

राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥

श्रीराम ने भालू-वानरों की सेना जुटाई और सेतु बनाने के लिए कम परिश्रम नहीं किया, पर नाम लेते ही भवसागर सूख जाता है — हे सज्जनो, अपने मन में इस पर विचार कीजिए।

राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥

श्रीराम ने युद्ध में कुल सहित रावण को मारकर सीताजी सहित अपनी अयोध्यापुरी में पदार्पण किया। राजा राम अयोध्या की राजधानी में विराजमान हुए, देवता-मुनि उत्तम वाणी से उनके गुण गाते हैं।

सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥

परंतु सेवक तो केवल प्रेमपूर्वक नाम का स्मरण करके ही, बिना किसी परिश्रम के, प्रबल मोह की सेना पर विजय पा लेता है — नाम के प्रसाद से उसे स्वप्न में भी कोई शोक नहीं होता।

दोहा

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥२५

ब्रह्मरूप श्रीराम से भी नाम बड़ा है, क्योंकि वह वरदान देने वाले को भी वर देने वाला है — इसी भाव को हृदय में जानकर भगवान शिव ने करोड़ों रामकथाओं में से इसी रामचरितमानस को चुना।

नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥

नाम के प्रसाद से ही अविनाशी शिवजी, अमंगल वेष धारण किए होते हुए भी, मंगलों की राशि बने हुए हैं। शुकदेव, सनकादि, सिद्ध, मुनि और योगी — ये सब भी नाम के प्रसाद से ही ब्रह्मसुख भोगते हैं।

नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥

नारदजी ने नाम का प्रताप जाना, जिससे वे स्वयं संसार को प्रिय हो गए और विष्णु-शिव दोनों को भी प्रिय बन गए। नाम जपने से ही प्रभु प्रसन्न हुए, और प्रह्लादजी भक्तों में शिरोमणि बन गए।

ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥

ध्रुवजी ने अपनी ग्लानि में हरि-नाम जपा और अचल, अनुपम पद पाया। पवनपुत्र हनुमानजी ने पवित्र नाम का स्मरण करके ही श्रीराम को अपने वश में कर लिया।

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥

पतित अजामिल, गजराज और गणिका — ये सभी हरि-नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ — स्वयं श्रीराम भी नाम के गुण पूरी तरह नहीं गा सकते।

दोहा

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु२६

राम का नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है और कल्याण का निवास है — जिसका स्मरण करते ही भाँग जैसे तुच्छ से तुलसीदास तुलसी जैसे पवित्र बन गए।

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥

चारों युगों, तीनों कालों और तीनों लोकों में, नाम जपकर ही जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का यही मत है कि समस्त पुण्यों का फल श्रीराम में प्रेम ही है।

ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥

सतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ-विधि से, और द्वापर में प्रभु की पूजा से ही प्रसन्नता होती थी। पर कलियुग तो केवल पापों की जड़ और मलिन है, जिसमें भक्तों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली के समान फँसा रहता है।

नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥

इस भयंकर कलियुग में नाम ही कल्पवृक्ष है, जिसका स्मरण करते ही संसार के समस्त जाल मिट जाते हैं। राम-नाम कलियुग में इच्छित फल देने वाला है, और लोक-परलोक दोनों में माता-पिता के समान हितकारी है।

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥

कलियुग में न तो कर्म का पालन संभव है, न भक्ति का, न विवेक का — राम-नाम ही एकमात्र सहारा है। कलियुग तो कालनेमि के समान कपट का भंडार है, और नाम रूपी सुबुद्धि ही उसे परास्त करने वाला समर्थ हनुमान है।

दोहा

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल२७

राम-नाम नृसिंह भगवान के समान है और कलिकाल हिरण्यकशिपु के समान — जो भी जपने वाला भक्त प्रह्लाद के समान होगा, नाम उसे उसी प्रकार पालेगा, देवताओं को कष्ट देने वाले कलिकाल का नाश करके।

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।॥सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥

चाहे बुरे भाव से, क्रोध से या आलस्य से ही नाम क्यों न जपा जाए, फिर भी दसों दिशाओं में मंगल होता है। उसी नाम का स्मरण करके, मैं श्रीरघुनाथजी को मस्तक झुकाकर उनकी गुण-गाथा कहता हूँ।

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥

मुझे तो वही सब प्रकार से सुधारेंगे, जिनकी कृपा किसी भी कृपा से कम नहीं होती। श्रीराम उत्तम स्वामी हैं और मुझसा कुसेवक कोई नहीं — फिर भी वे दयानिधि अपनी ही ओर से मेरा पालन-पोषण करते हैं।

लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥

लोक और वेद दोनों में उत्तम स्वामी की यही रीति है कि वह सेवक की विनती सुनकर उसका प्रेम पहचान लेता है — चाहे वह धनी हो या गरीब, गाँव का हो या नगर का, पंडित हो या मूर्ख, मलिन हो या उजला।

सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥

अच्छे-बुरे सभी कवि अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की प्रशंसा करते हैं, और सभी नर-नारी भी उसे सराहते हैं। साधु, सुज्ञ, सुशील राजा वस्तुतः ईश्वर के ही अंश हैं और संसार में परम कृपालु माने जाते हैं।

सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥

राजा सबकी बात सुनकर मीठी वाणी से सबका सम्मान करता है — रचना, भक्ति, विनम्रता और चाल-ढाल को पहचानकर। यह तो साधारण राजाओं का स्वभाव है, पर कोसलराज श्रीराम तो शिरोमणि हैं, वे इससे भी बढ़कर जानते हैं।

रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें॥

श्रीराम तो केवल निश्छल स्नेह देखकर ही रीझ जाते हैं — नहीं तो संसार में मुझसे बढ़कर मंदबुद्धि और मलिन-मति कौन होगा।

दोहा

सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु२८(क)

कृपालु श्रीराम मूर्ख सेवक की प्रीति को भी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं — जिन्होंने पत्थरों को भी जलयान बना दिया और वानर-भालुओं को सुबुद्धि मंत्री बना लिया।

दोहा

हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास२८(ख)

मैं भले ही स्वयं को सेवक कहलाता हूँ, और सब मेरा उपहास करते हैं, पर श्रीराम इसे सह लेते हैं — क्योंकि स्वामी तो सीतापति हैं, और सेवक तुलसीदास उन्हीं का है।

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥

मेरी धृष्टता और दोष इतने बड़े हैं कि उन्हें सुनकर नरक भी अपनी नाक सिकोड़ ले। यह समझकर मुझे अपने ही भय से डर लगता है, पर श्रीराम ने स्वप्न में भी कभी उसकी सुधि नहीं ली।

सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥

मेरी विनती सुनकर, सुंदर नेत्रों से देखकर, मेरी भक्ति और बुद्धि को स्वामी ने सराहा है। कहते ही सारा दोष मिट जाता है, हृदय में शुभता आ जाती है — क्योंकि श्रीराम अपने सेवक के हृदय की बात जानकर ही रीझ जाते हैं।

रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली॥

प्रभु के मन में सेवक की भूल कभी टिकती नहीं, पर वे उसके हृदय की सैकड़ों बार सुधि लेते हैं। जिस पाप के लिए बाली को शिकारी की भाँति मारा गया, फिर भी सुग्रीव ने भी वैसी ही कुचाल की थी।

सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥

विभीषण की भी वैसी ही करतूत थी, पर श्रीराम ने स्वप्न में भी उसे अपने हृदय में नहीं रखा। जब वे भरतजी से मिले तो उन्होंने सबका सम्मान किया, राजसभा में स्वयं रघुवीर ने ही सबकी प्रशंसा की।

दोहा

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान२९(क)

प्रभु स्वयं वृक्ष के नीचे बैठे और वानरों को डाल पर बैठाकर अपने समान सम्मान दिया — तुलसीदास कहते हैं कि श्रीराम जैसा शीलनिधान स्वामी कहीं नहीं मिलता।

दोहा

राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक२९(ख)

हे राम, आपकी भलाई सबके लिए ही अच्छी है — यदि यह सदा सच है, तो तुलसीदास का भी भला अवश्य होगा।

दोहा

एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ२९(ग)

इस प्रकार अपने गुण-दोष कहकर, सबको फिर से सिर झुकाकर, अब मैं श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करता हूँ, जिसे सुनते ही कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं।

जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥

याज्ञवल्क्य मुनि ने जो सुहावनी कथा भरद्वाज मुनि को सुनाई थी, मैं उसी संवाद का विस्तार से वर्णन करूँगा — हे सज्जनो, सुख मानकर सब उसे सुनिए।

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा॥

यह सुहावना चरित्र सबसे पहले शिवजी ने रचा, फिर कृपा करके उन्होंने इसे पार्वतीजी को सुनाया। शिवजी ने ही राम-भक्तों में अधिकारी जानकर इसे काकभुशुंडिजी को दिया।

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥

उन्हीं से याज्ञवल्क्य मुनि ने यह कथा पाई, और उन्होंने फिर भरद्वाज मुनि के सामने इसे गाया। ये सब श्रोता और वक्ता समान शील वाले हैं, जो हरि-लीला को भली-भाँति जानते हैं।

जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥

वे अपने ज्ञान से तीनों कालों को हाथ में रखे आँवले के समान स्पष्ट जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी जो सुज्ञ हरि-भक्त हैं, वे भी नाना प्रकार से इस कथा को कहते, सुनते और समझते हैं।

दोहा

मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत३०(क)

मैंने भी यह कथा सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी, परंतु उस समय बचपन के कारण मैं अत्यंत अचेत था और उसे वैसी नहीं समझ सका।

दोहा

श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम के गूढ़।किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़३०(ख)

श्रोता और वक्ता दोनों ज्ञान के भंडार थे, और श्रीराम की यह कथा भी अत्यंत गूढ़ है — मैं जैसा जड़ जीव, कलियुग के पापों से ग्रसित मूढ़, इसे कैसे समझ पाता।

तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥

फिर भी गुरुजी ने यह कथा बार-बार कही, जिससे मेरी बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आ गई। उसी को मैं भाषा में बद्ध करूँगा, जिससे मेरे मन को भी बोध हो सके।

जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥

जैसी भी मेरी बुद्धि और विवेक की शक्ति है, हृदय में हरि की प्रेरणा से मैं वैसा ही कहूँगा। अपने संदेह, मोह और भ्रम को हरने वाली, संसार-नदी को पार कराने वाली नाव के समान यह कथा मैं रचता हूँ।

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥

राम-कथा विद्वानों के लिए विश्राम-स्थल है, सबका मन रंजित करने वाली और कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। यह कलियुग रूपी सर्प के लिए गरुड़-मंत्र के समान है, और विवेक रूपी अग्नि प्रकट करने के लिए अरणी काष्ठ के समान है।

रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥

राम-कथा कलियुग में कामधेनु गाय के समान इच्छित फल देने वाली, सज्जनों के लिए संजीवनी बूटी के समान है। यह पृथ्वी पर अमृत की नदी है, भय का नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेंढक के लिए सर्पिणी के समान है।

असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥

यह राक्षस-सेना के समान नरक का नाश करने वाली, साधु-देवगण के हित के लिए पार्वतीजी के समान है। संत-समाज रूपी समुद्र के लिए यह लक्ष्मी के समान है, और विश्व का सारा भार धारण करने में अचल पृथ्वी के समान है।

जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥

यह यमदूतों के मुँह पर कालिख के समान और संसार के लिए यमुना नदी के समान है, तथा जीवन-मुक्ति के लिए मानो काशी के समान है। यह राम को तुलसी के पत्तों के समान प्रिय और पावन है, और तुलसीदास के हृदय को हुलसाने वाली है।

सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥

यह शिवजी को प्रिय नर्मदा नदी के समान है, समस्त सिद्धियों, सुखों और संपत्तियों की राशि है। यह सद्गुणों और देवताओं की माता अदिति के समान है, और श्रीरघुनाथजी की भक्ति व प्रेम की चरम सीमा के समान है।

दोहा

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु३१

राम-कथा मानो मंदाकिनी नदी है, मन ही सुंदर चित्रकूट पर्वत है — तुलसीदास कहते हैं कि इसमें सीता-रघुवीर का सुंदर स्नेह-वन विहार करता है।

राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥

राम-चरित्र एक सुंदर चिंतामणि है, संत-सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर श्रृंगार है। यह जगत का मंगल करने वाला, राम के गुण-समूहों से युक्त, तथा मुक्ति, धन और धर्म का दाता है।

सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बेद भव भीम रोग के॥जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥

यह ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु के समान है, संसार रूपी भयंकर रोग के लिए देवताओं और वेदों के समान वैद्य है। यह सीता-राम के प्रेम की जननी-जनक है, और समस्त व्रत-धर्म-नियमों का बीज है।

समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के॥

यह पाप, संताप और शोक को शांत करने वाली है, लोक-परलोक दोनों की प्रिय पालक है। यह विचारशील राजा के लिए उत्तम मंत्री और वीर सेनापति के समान है, और अपार लोभ-सागर को सोखने के लिए अगस्त्य मुनि के समान है।

काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥

यह काम-क्रोध और कलियुग के पापरूपी हाथियों के लिए सिंह-शावक के समान है, और भक्तों के मन-वन के लिए भी। यह पूज्य अतिथि है, शिवजी को अत्यंत प्रिय है, इच्छाएँ पूर्ण करने वाले मेघ के समान है, और दरिद्रता को जलाने वाली दावाग्नि के समान है।

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥

यह विषय-सर्प के लिए महामणि-मंत्र के समान है, जो ललाट पर लिखे कठिन दुर्भाग्य को भी मिटा देती है। यह मोह रूपी अंधकार को हरने के लिए सूर्य-किरणों के समान है, और सेवक रूपी धान की फसल की रक्षा करने वाले बादल के समान है।

अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से॥

यह इच्छित फल देने में कल्पवृक्ष के समान है, सेवा करने में सुलभ और सुखदायी विष्णु-शिव के समान है। यह अच्छे कवियों के मन के लिए शरद ऋतु के आकाश में तारागण के समान है, और राम-भक्तों के लिए जीवन-धन के समान है।

सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से॥

यह समस्त पुण्यों के फल और प्रचुर भोगों के समान है, तथा निष्कपट रूप से जगत का हित करने वाले साधु-पुरुषों के समान है। यह सेवक के मन रूपी मानसरोवर में विचरने वाले हंस के समान है, और पवित्र गंगा की तरंगमाला के समान है।

दोहा

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड३२(क)

कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल तथा कलियुग के कपट, दंभ और पाखंड को, श्रीराम के गुण-समूह उसी प्रकार जला देते हैं जैसे प्रचंड अग्नि लकड़ी को जला देती है।

दोहा

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु३२(ख)

राम-चरित्र पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणों के समान सबको सुख देने वाला है, विशेषकर सज्जन रूपी कुमुद और चकोर के हृदय के लिए यह बड़ा लाभ है।

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई॥

जिस प्रकार पार्वतीजी को प्रसन्न किया गया और जिस विधि शिवजी ने यह कथा विस्तार से कही, वह सारा कारण मैं गाकर कहूँगा, इस कथा को एक विचित्र प्रबंध के रूप में रचकर।

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करे सुनि सोई॥कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥

जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस अलौकिक कथा को सुनते हैं, वे आश्चर्य नहीं करते,

रामकथा के मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥

यह जानकर कि राम-कथा की कोई सीमा संसार में नहीं है — उनके मन में यह दृढ़ विश्वास है। श्रीराम के अनेक प्रकार के अवतार हुए हैं, और रामायण भी करोड़ों प्रकार की अपार हैं।

कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी॥

कल्पभेद से हरिचरित्र की सुंदर कथाएँ मुनीश्वरों ने अनेक प्रकार से गाई हैं — मन में यह संशय न करें, वरन् श्रद्धापूर्वक सरस्वती की यह कथा प्रेमपूर्वक सुनें।

दोहा

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार३३

श्रीराम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, और उनकी कथा का विस्तार भी असीम है — जिनकी बुद्धि निर्मल और विवेकपूर्ण है, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं मानते।

एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥

इस प्रकार सारे संशय दूर करके, गुरु के चरण-कमलों की धूल को सिर पर धारण कर, फिर मैं हाथ जोड़कर सबसे विनती करता हूँ कि यह कथा कहते हुए मुझे कोई दोष न लगे।

सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥संबत सोरह से एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥

अब शिवजी को आदरपूर्वक मस्तक नवाकर, मैं श्रीराम की निर्मल गुण-गाथा का वर्णन करता हूँ। संवत् सोलह सौ इकतीस में, हरि-चरणों में सिर रखकर मैं यह कथा रचता हूँ।

नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥

चैत्र मास की नवमी तिथि, मंगलवार के दिन, अयोध्यापुरी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीराम का जन्म हुआ, वेद उसका गान करते हैं, और समस्त तीर्थ वहाँ चलकर आते हैं।

असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥

असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता — सभी आकर श्रीरघुनाथजी की सेवा करते हैं। सुज्ञ जन जन्म-महोत्सव रचाते हैं और श्रीराम की सुंदर कीर्ति का गान करते हैं।

दोहा

मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर३४

उस दिन सज्जन लोग बड़ी संख्या में पवित्र सरयू के जल में स्नान करते हैं, और हृदय में श्रीराम के सुंदर श्याम शरीर का ध्यान धरकर उनका नाम जपते हैं।

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति॥

वेद-पुराण कहते हैं कि सरयू नदी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और उसका जल पीना — सभी पाप हर लेते हैं। इस पवित्र नदी की महिमा इतनी अपार है कि उसे निर्मल बुद्धि वाली सरस्वतीजी भी पूरी तरह वर्णन नहीं कर सकतीं।

राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहिं संसारा॥

अयोध्यापुरी श्रीराम-धाम देने वाली, सुहावनी और अत्यंत पवित्र है, जो समस्त लोकों में विख्यात है। चारों योनियों के जितने भी अपार जीव अयोध्या में शरीर त्यागते हैं, वे फिर संसार में नहीं लौटते।

सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी॥बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा॥

इस पुरी को सब प्रकार से मनोहर, समस्त सिद्धियाँ देने वाली और मंगल की खान जानकर, मैंने इस निर्मल कथा का आरंभ किया — जिसे सुनते ही काम, मद और दंभ नष्ट हो जाते हैं।

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥

इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस है — इसे कानों से सुनते ही मन को विश्राम प्राप्त होता है। यदि मन विषय-वासना रूपी अग्नि से जल रहा हो, तो इस मानसरोवर में पड़ते ही वह सुखी हो जाता है।

रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कलि कलुष नसावन॥

यह रामचरितमानस मुनियों को अत्यंत भाता है, इसे शिवजी ने सुंदर और पावन रूप में रचा। यह तीनों प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता को दबाने वाला है, और कलियुग की कुचालों तथा पापों का नाश करने वाला है।

रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥

शिवजी ने इसे रचकर पहले अपने मानस (मन) में रखा, फिर उचित अवसर पाकर पार्वतीजी से कहा। इसीलिए इसका नाम श्रीरामचरितमानस रखा गया — शिवजी ने हृदय में देखकर हर्षित होकर यह नाम धरा।

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई॥

अब मैं वही सुखद और सुहावनी कथा कहता हूँ — हे सज्जनो, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनिए।

दोहा

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु३५

यह मानस जिस प्रकार बना और जिस कारण संसार में इसका प्रचार हुआ, वह सारा प्रसंग अब मैं पार्वती और शिवजी का स्मरण करके कहता हूँ।

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥

शिवजी की कृपा से मेरे हृदय में सुबुद्धि हुलस उठी, और कवि तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। यह अपनी बुद्धि के अनुसार मनोहर बनाने का प्रयत्न है — हे सज्जनो, सुचित होकर सुनिए और इसकी त्रुटियों को सुधार लीजिए।

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥

सुबुद्धि रूपी भूमि पर हृदय ही अथाह सरोवर है, वेद-पुराण रूपी समुद्र से साधु रूपी बादल उठते हैं, और वे श्रीराम के सुयश रूपी मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।

लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥

जो सगुण लीला का विस्तार से वर्णन करते हैं, वह वर्णन ही जल की निर्मलता है जो मन का मैल दूर करता है। जो प्रेम-भक्ति वर्णन से परे है, वही इस जल की मिठास और शीतलता है।

सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥

यह जल पुण्य रूपी धान की खेती के लिए हितकारी है, और राम-भक्तों के लिए जीवन के समान है। यह पावन जल बुद्धि रूपी भूमि पर गिरकर, कानों के मार्ग से होकर सुहावने ढंग से बहा,

भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारू चिराना॥

और अंततः मानस रूपी सुंदर स्थान में जाकर स्थिर हो गया — सुखद, शीतल, रुचिकर और चिरस्थायी।

दोहा

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥३६

बुद्धिपूर्वक विचार कर अत्यंत सुंदर संवादों की रचना की गई है — यही इस पावन सरोवर के चार मनोहर और सुंदर घाट हैं।

सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥

इसकी सात कांडें सुंदर सीढ़ियों के समान हैं, जिन्हें ज्ञान-नेत्रों से देखकर मन प्रसन्न होता है। श्रीरघुनाथजी की निर्गुण, अबाध महिमा का वर्णन ही इस सरोवर का अथाह जल है।

राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥

राम-सीता का यश अमृत के समान जल है, इसकी उपमाएँ मनोरम लहरों की क्रीड़ा हैं। घनी सुंदर चौपाइयाँ सुंदर सीपों के समान हैं, जिनके भीतर युक्तिपूर्ण मणि जैसे भाव छिपे हैं।

छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥

छंद, सोरठा और सुंदर दोहे मानो विविध रंगों के कमल-समूह हैं। अनुपम अर्थ, सुंदर भाव और मधुर भाषा ही इनकी पराग, मकरंद और सुगंध है।

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥

पुण्य-समूह मानो सुंदर भ्रमरों की माला है, ज्ञान-वैराग्य और विचार हंस के समान हैं। काव्य की ध्वनि, अलंकार, गुण और छंद-जाति ही इसमें अनेक प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं।

अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — ये चारों पुरुषार्थ, तथा ज्ञान-विज्ञान का विचारपूर्वक कथन, और नवरस, जप, तप, योग और वैराग्य — ये सब इस सुंदर सरोवर के विविध जलचर जीव हैं।

सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना॥संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥

पुण्यात्मा साधुजन जो नाम-गुण गाते हैं, वे मानो इस सरोवर के विचित्र जलपक्षी हैं। संत-समाज चारों दिशाओं में फैला बाग है, और श्रद्धा को वसंत ऋतु के समान बताया गया है।

भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥

भक्ति का विविध प्रकार से निरूपण, तथा क्षमा-दया-संयम — ये सब लताओं की छतरी हैं। शम, यम, नियम — फूल हैं, ज्ञान — फल है, और हरि-चरणों में प्रीति ही उसका रस है, ऐसा वेदों ने बखान किया है।

औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥

इसके अतिरिक्त और भी अनेक कथा-प्रसंग हैं, वे सब मानो शुक-पिक जैसे नाना रंगों के पक्षी हैं।

दोहा

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु३७

पुलकावली ही इस बाग-वाटिका का सुख है, जिसमें सुंदर पक्षी विहार करते हैं — भक्तों के सुंदर नेत्र ही माली हैं, जो स्नेह रूपी जल से इसे सींचते हैं।

जे गावहिं यह चरित सँभारे। ते एहि ताल चतुर रखवारे॥सदा सुनहिं सादर नर नारी। ते सुरबर मानस अधिकारी॥

जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे इस सरोवर के चतुर रखवाले हैं। जो नर-नारी सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे श्रेष्ठ देवताओं के समान इस मानस-सरोवर के अधिकारी हैं।

अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥

जो अत्यंत दुष्ट, विषयी हैं, वे बगुले और कौवे के समान अभागे इस सरोवर के पास भी नहीं जाते। यहाँ सीप, मेंढक और शैवाल के समान नाना विषय-कथाओं का रस भी नहीं है।

तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥

इसी कारण कौवे और बगुले जैसे बेचारे विषयी-कामी लोग, मन में हारकर, यहाँ आने से कतराते हैं। इस सरोवर तक आना अत्यंत कठिन है — श्रीराम की कृपा के बिना यहाँ आया ही नहीं जा सकता।

कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥

कठिन कुसंगति ही भयंकर कुमार्ग है, और दुष्टों के वचन मानो बाघ, सिंह और सर्प हैं। घर-गृहस्थी के नाना जंजाल ही मार्ग में विशाल दुर्गम पर्वत हैं।

बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥

मोह, मद और अभिमान अनेक विषम वन हैं, और कुतर्क अनेक भयंकर नदियाँ हैं।

दोहा

जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ३८

जो श्रद्धा रूपी संबल से रहित हैं और जिन्हें संतों का साथ नहीं मिला — जिन्हें श्रीरघुनाथ प्रिय नहीं, उनके लिए यह मानस-सरोवर अत्यंत दुर्गम है।

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥

यदि कोई कष्ट सहकर वहाँ पहुँच भी जाए, तो जाते ही उसे शीतलता की जगह नींद जैसा आलस्य घेर लेता है। जड़ता और भयंकर जाड़ा हृदय में समा जाते हैं, और वह अभागा वहाँ पहुँचकर भी स्नान नहीं कर पाता।

करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥

वह न तो स्नान कर पाता है, न जल पी पाता है, और अभिमान सहित वापस लौट आता है। यदि फिर कोई उससे उस सरोवर के बारे में पूछे, तो वह सरोवर की निंदा करके ही उसे समझा देता है।

सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥

जिसे श्रीराम अपनी कृपा-दृष्टि से देखते हैं, उसे कोई विघ्न नहीं सताता — वही आदरपूर्वक इस सरोवर में स्नान कर पाता है, और फिर महाघोर त्रिविध ताप उसे नहीं जलाता।

ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ॥जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥

जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई, जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे, उसे मन लगाकर सत्संग करना चाहिए।

अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥

इस प्रकार मन की आँखों से इस मानस-सरोवर को निहारकर, कवि की बुद्धि निर्मल होकर उसमें डूब गई। हृदय में आनंद और उत्साह भर आया, और प्रेम व आनंद का प्रवाह उमड़ पड़ा।

चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥

उसी से यह सुंदर काव्य रूपी नदी बह चली, जो श्रीराम के निर्मल यश रूपी जल से भरी है। इसका नाम सरयू है — जो सुमंगल का मूल है, और लोक-वेद के मत ही इसके सुंदर तट हैं।

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥

यह पवित्र नदी मानस-सरोवर की पुत्री है, जो कलियुग के पापरूपी घास-वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।

दोहा

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।३९

तीन प्रकार के श्रोता-समाज ही गाँव-नगर हैं, दोनों किनारे हैं, और अनुपम संत-सभा ही अयोध्या नगरी है — यह सब सुमंगल का मूल है।

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥

यह सुंदर कीर्ति रूपी सरयू नदी बहते-बहते जाकर राम-भक्ति रूपी गंगा में मिल गई।

सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥

छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम का युद्ध-यश पावन है, मानो सोन नामक विशाल और सुंदर नदी में जा मिला हो।

जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी॥

दोनों धाराओं के बीच भक्ति रूपी गंगा-धारा वैराग्य और सद्विचार सहित शोभा पाती है। यह त्रिविध ताप को डराने वाला त्रिवेणी-संगम है, जो श्रीराम-स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बढ़ता है।

मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥

मानस-सरोवर से निकली यह नदी गंगा में जाकर मिल गई, इसे सुनकर सज्जनों का मन पावन हो जाएगा। बीच-बीच में जो विचित्र उप-कथाएँ आती हैं, वे मानो नदी तट पर बने वन-बाग हैं।

उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥

पार्वती-शिव विवाह की बारात ही मानो नदी में असंख्य प्रकार के जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजी के जन्म का आनंद और बधाई ही नदी की मनोहर लहरें हैं।

दोहा

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग४०

चारों भाइयों के बालचरित्र ही नदी में खिले अनेक रंगों के प्रचुर कमल हैं, और राजा-रानी तथा परिजनों के पुण्य ही इस जल पर मँडराते भ्रमर और जलपक्षी हैं।

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥

सीता-स्वयंवर की सुहावनी कथा ही इस सुंदर नदी की छटा है। नदी में नाव के समान अनेक कुशल प्रश्न हैं, और उनके विवेकपूर्ण उत्तर मानो कुशल केवट हैं।

सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥

इसे सुनकर लोगों में परस्पर चर्चा होती है, जिससे यह नदी पथिक-समाज से सुशोभित होती है। परशुरामजी का क्रोध ही इसकी भयंकर धारा है, और श्रीराम की सुंदर वाणी इसके सुदृढ़ घाट हैं।

सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥

लक्ष्मण सहित श्रीराम के विवाह का उत्साह ही इस नदी की शुभ बाढ़ है, जो सबको सुख देती है। इसे कहते-सुनते जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे पुण्यात्मा ही प्रसन्न मन से इसमें स्नान करते हैं।

राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥

श्रीराम के राजतिलक के मंगल-आयोजन ही मानो पर्व के अवसर पर जुटा हुआ समाज है। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी की काई है, जिसके फलस्वरूप भारी विपत्ति आ पड़ी।

दोहा

समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग४१

भरतजी का चरित्र और उनका जप-यज्ञ असंख्य उत्पातों को शांत करने वाला है। कलियुग के पाप और दुष्टों के अवगुणों का वर्णन ही इस जल की गंदगी और बगुले-कौवे हैं।

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।॥

यह कीर्ति-नदी छहों ऋतुओं में सुंदर है, समय-समय पर सुहावनी और अत्यंत पावन है। हेमंत ऋतु पार्वती-शिव विवाह के समान है, और शिशिर ऋतु प्रभु के जन्मोत्सव के समान सुखद है।

बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥

श्रीराम-विवाह के समाज का वर्णन ही आनंद-मंगलमय वसंत ऋतु है। श्रीराम का दुःसह वनगमन ग्रीष्म ऋतु के समान है, और वन-मार्ग की कथा उसकी तीखी धूप और गर्म हवा के समान है।

बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥

राक्षसों से घोर युद्ध वर्षा ऋतु के समान है, जो देवकुल रूपी धान की फसल के लिए मंगलकारी है। राम-राज्य का सुख, विनय और महिमा ही निर्मल, सुखद शरद ऋतु के समान सुहावनी है।

सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥

सतियों में शिरोमणि सीताजी के गुणों की गाथा ही इस जल की निर्मल, अनुपम गुणवत्ता है। भरतजी का स्वभाव इसकी शीतलता है, जो सदा एकरस है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

दोहा

अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास४२

आपस में देखना, बोलना, मिलना, प्रेम और हँसी-मजाक — चारों भाइयों का यह सुंदर भाईचारा ही इस जल की मिठास और सुगंध है।

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥

मेरी व्याकुलता, विनती और दीनता ही इस सुंदर जल की सरलता है, जो कुछ कम नहीं। यह अद्भुत जल सुनने मात्र से गुणकारी है, जो आशा रूपी प्यास और मन के मैल को हर लेता है।

राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥

यह जल श्रीराम के प्रति सुंदर प्रेम को पोषित करता है, और कलियुग के समस्त पाप-ग्लानि को हर लेता है। यह संसार के श्रम को सोखने वाला और संतोष को तृप्त करने वाला है, तथा पाप, दुख, दरिद्रता और दोषों को शांत करने वाला है।

काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥

यह काम, क्रोध, मद और मोह का नाश करने वाला है, और निर्मल विवेक तथा वैराग्य को बढ़ाने वाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान और पान करने से हृदय के पाप और संताप मिट जाते हैं।

जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥

जिन्होंने इस जल से अपना मन नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के हाथों नष्ट हो गए। जैसे प्यासा हिरण मृगतृष्णा के जल की ओर भटकता है, वैसे ही वे दुखी जीव इधर-उधर भटकते रहेंगे।

दोहा

मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ४३(क)

अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुंदर जल के गुण-समूह गिनकर और मन को उसमें स्नान कराकर, पार्वती-शिवजी का स्मरण कर, कवि अब यह सुहावनी कथा कहता है।

दोहा

अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद४३(ख)

अब श्रीरघुनाथजी के चरण-कमलों को हृदय में धारण कर, उनका प्रसाद पाकर, मैं दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुंदर संवाद कहता हूँ।

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥

भरद्वाज मुनि प्रयाग में निवास करते हैं, जिन्हें श्रीराम के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, शम-दम और दया के भंडार तथा परमार्थ के मार्ग में परम सुज्ञ हैं।

माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥

जब माघ मास में सूर्य मकर राशि में आता है, तब सभी लोग तीर्थराज प्रयाग आते हैं। देवता, दानव, किन्नर और मनुष्यों की पंक्तियाँ आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करती हैं।

पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥

वे माधव के चरण-कमलों की पूजा करते हैं, अक्षयवट का स्पर्श कर उनका शरीर पुलकित हो उठता है। भरद्वाज मुनि का आश्रम अत्यंत पावन, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है।

तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥

जो लोग तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने जाते हैं, वहाँ मुनियों-ऋषियों का समागम होता है। वे प्रातःकाल उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और आपस में हरि की गुण-गाथाएँ कहते हैं।

दोहा

ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग४४

वे ब्रह्म का निरूपण करते हैं, धर्म-विधि और तत्त्वों के भेद का वर्णन करते हैं, तथा ज्ञान-वैराग्य सहित भगवान की भक्ति का वर्णन करते हैं।

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥

इस प्रकार पूरे माघ मास स्नान करके, फिर सब अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं। प्रत्येक वर्ष यह अत्यंत आनंददायी होता है — मकर स्नान करके मुनि-समूह अपने स्थान को चले जाते हैं।

एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥

एक बार मकर-स्नान पूरा करके सभी मुनीश्वर अपने आश्रमों को चले गए। परम विवेकी याज्ञवल्क्य मुनि को भरद्वाज मुनि ने चरण पकड़कर रोक लिया।

सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥

उन्होंने आदरपूर्वक याज्ञवल्क्य मुनि के चरण-कमल धोए और अत्यंत पवित्र आसन पर बैठाया। पूजा करके और मुनि के सुयश का बखान करके, वे अत्यंत पवित्र और कोमल वाणी में बोले।

नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें॥कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥

हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संशय है, यद्यपि वेद का सारा तत्त्व आपकी मुट्ठी में है। उसे कहने में मुझे भय और लज्जा लगती है, पर यदि न कहूँ तो बड़ी हानि होगी।

दोहा

संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किए दुराव४५७

संतजन ऐसी नीति कहते हैं, और वेद-पुराण तथा मुनि भी यही गाते हैं कि गुरु से कुछ छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥

ऐसा विचारकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ — हे नाथ, अपने सेवक पर स्नेह करके इसे दूर कीजिए। राम-नाम का अमित प्रभाव है, जिसे संत, पुराण और उपनिषद सभी गाते हैं।

संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥

अविनाशी शिवजी निरंतर इसी नाम को जपते हैं — शिवजी भगवान ज्ञान और गुणों की राशि हैं। संसार में चारों योनियों के जीव, काशी में मरकर परम पद प्राप्त कर लेते हैं।

सुनि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥

श्रीराम की महिमा सुनकर, हे मुनिराज, शिवजी दया करके उपदेश करते हैं। हे कृपानिधि, मैं आपसे पूछता हूँ — यह राम कौन प्रभु हैं, मुझे समझाकर कहिए।

एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥

एक राम तो अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं, जिनका चरित्र संसार में विख्यात है। उन्होंने पत्नी के वियोग में अपार दुख सहा, फिर क्रोधित होकर युद्ध में रावण को मारा।

दोहा

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि४६

क्या वही राम प्रभु हैं जिन्हें शिवजी जपते हैं, या कोई और? आप सत्यधाम और सर्वज्ञ हैं, विवेकपूर्वक विचारकर मुझे बताइए।

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥

जैसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, हे नाथ, वह कथा विस्तार से कहिए। याज्ञवल्क्य मुनि मुस्कुराकर बोले — तुम्हें तो श्रीरघुनाथजी की प्रभुता पहले से ही ज्ञात है।

राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥चाहहु सुने राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥

तुम मन-वचन-कर्म से राम-भक्त हो, तुम्हारी चतुराई मैं जानता हूँ। तुम श्रीराम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हो, इसीलिए मानो अनजान बनकर यह प्रश्न किया है।

तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम के कथा सुहाई॥महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥

हे तात, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो, मैं श्रीराम की सुहावनी कथा कहता हूँ। महामोह मानो विशाल यम है, और राम-कथा उसके लिए भयंकर काली देवी के समान है।

रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥

राम-कथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत रूपी चकोर पीते हैं। ऐसा ही संशय पार्वतीजी ने भी किया था, तब महादेव ने उन्हें विस्तार से बताया था।

दोहा

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद४७

अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही पार्वती-शिव संवाद कहता हूँ — यह जिस समय और जिस कारण हुआ, हे मुनि, उसे सुनने से तुम्हारा विषाद मिट जाएगा।

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥

एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य मुनि के पास गए। साथ में जगत-जननी सती पार्वती भी थीं। ऋषि ने उन्हें संपूर्ण जगत का स्वामी जानकर पूजा की।

रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥

श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य ने राम-कथा का बखान किया, जिसे महादेव ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने सुंदर हरि-भक्ति के विषय में पूछा, और शिवजी ने उन्हें अधिकारी जानकर बताया।

कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥

श्रीरघुनाथजी की गुण-गाथा कहते-सुनते शिवजी वहाँ कुछ दिन रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर, दक्ष-पुत्री सती के साथ शिवजी अपने धाम को चले।

तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥

उसी समय पृथ्वी का भार हरने के लिए विष्णु ने रघुवंश में अवतार लिया था। पिता के वचन का पालन करने के लिए राज्य त्यागकर, अविनाशी प्रभु उदासीन होकर दण्डक वन में विचरण कर रहे थे।

दोहा

हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गए जान सब कोइ४८(क)

जाते हुए शिवजी अपने हृदय में विचार कर रहे थे कि किस प्रकार दर्शन हो — क्योंकि प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया था, यह बात सब कोई नहीं जानते थे।

सोरठा

संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची४८(ख)

शिवजी के हृदय में अत्यंत हलचल थी, पर सती इस रहस्य को नहीं जानती थीं। तुलसीदास कहते हैं — मन में दर्शन का लोभ था, पर साथ ही डर भी था, फिर भी नेत्र लालची हो रहे थे।

रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥

रावण का वध मनुष्य के हाथों होना विधाता का वरदान था, प्रभु उस वचन को सत्य करना चाहते थे। यदि मैं दर्शन के लिए न जाऊँ तो पछतावा रहेगा — ऐसा विचार करते हुए भी कोई उपाय नहीं बन रहा था।

एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा॥लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥

इस प्रकार शिवजी सोच में पड़े हुए थे, कि उसी समय रावण जाकर नीच मारीच को साथ ले गया, और वह तुरंत कपट-मृग बन गया।

करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥

उस मूर्ख रावण ने छल करके सीताजी का हरण कर लिया — उसे प्रभु के प्रभाव का ज्ञान नहीं था। मृग का वध करके श्रीराम भाई सहित आश्रम लौटे, तो आश्रम को सूना देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया।

बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें॥

श्रीरघुनाथजी विरह से विकल होकर साधारण मनुष्य की भाँति दोनों भाई वन में सीता को खोजते फिरे। जिनका कभी संयोग-वियोग होता ही नहीं, उन्हीं में प्रत्यक्ष विरह का दुख देखा गया।

दोहा

अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन४९

श्रीरघुनाथजी का यह अत्यंत विचित्र चरित्र परम सुज्ञ पुरुष ही जानते हैं — जो मंदबुद्धि मोहवश हृदय में कुछ और ही मान बैठते हैं, वे नहीं समझ पाते।

संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी॥

उसी समय शिवजी ने श्रीराम को देखा, जिससे उनके हृदय में विशेष हर्ष उत्पन्न हुआ। नेत्र भरकर सौंदर्य-सागर को निहारा, पर असमय जानकर उन्होंने परिचय प्रकट नहीं किया।

जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥

'हे सच्चिदानंद, जगत को पावन करने वाले, आपकी जय हो' — ऐसा कहकर कामदेव का नाश करने वाले शिवजी आगे बढ़ गए। सती सहित शिवजी चलते गए, और कृपानिधान शिवजी बार-बार पुलकित हो रहे थे।

सतीं सो दसा संभु के देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥

सतीजी ने शिवजी की यह दशा देखी, जिससे उनके हृदय में विशेष संदेह उत्पन्न हुआ — शिवजी तो जगत के वंदनीय, जगदीश्वर हैं, जिन्हें देवता, मनुष्य और मुनि सभी मस्तक झुकाते हैं।

तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा॥भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥

उन्हीं शिवजी ने राजपुत्र राम को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया, और उनकी छवि निहारकर मग्न हो गए — आज भी सतीजी को वह प्रीति हृदय में रोकी नहीं रह पाई।

दोहा

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद५०

जो ब्रह्म व्यापक, निर्मल, अजन्मा, अखंड, इच्छारहित और अभेद है, क्या वह देह धारण करके साधारण मनुष्य बन सकता है, जिसे वेद भी नहीं जान पाते?

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥

जो विष्णु देवताओं के हित के लिए मनुष्य-शरीर धारण किए हैं, वे शिवजी के समान ही सर्वज्ञ हैं। तो क्या वे ज्ञान के धाम, असुरों के शत्रु श्रीपति, अज्ञानी स्त्री की भाँति सीता को खोजेंगे?

संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥

फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते — शिवजी सर्वज्ञ हैं, यह सभी जानते हैं। इस प्रकार सतीजी के मन में अपार संशय उत्पन्न हो गया, और हृदय में कोई समाधान नहीं मिल रहा था।

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥

यद्यपि पार्वतीजी ने यह संशय प्रकट रूप से नहीं कहा, फिर भी अंतर्यामी शिवजी ने सब जान लिया। शिवजी बोले — हे सती, सुनो, यह तुम्हारा स्त्री-स्वभाव है, ऐसा संशय हृदय में कभी नहीं रखना चाहिए।

जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥

जिनकी कथा अगस्त्य मुनि ने गाई थी, और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई थी — वही श्रीरघुवीर मेरे इष्टदेव हैं, जिनकी सेवा सदा धीर मुनि करते हैं।

छंद

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि॥

धीर मुनि, योगी और सिद्धजन निरंतर निर्मल मन से जिनका ध्यान करते हैं, और वेद-पुराण-आगम जिनकी कीर्ति 'नेति नेति' कहकर गाते हैं — वे ही राम व्यापक ब्रह्म, समस्त लोकों के स्वामी और माया के अधिपति हैं। रघुकुल के मणि उन्होंने अपने भक्तों के हित के लिए अपनी ही इच्छा से नित्य अवतार लिया है।

सोरठा

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिव बार बहु।बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ५१

यद्यपि शिवजी ने बार-बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में यह उपदेश नहीं बैठा। शिवजी हरि की माया का बल जानकर मन-ही-मन हँसकर बोले।

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही॥

यदि तुम्हारे मन में इतना अधिक संदेह है, तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? तब तक मैं यहाँ बरगद की छाया में बैठा रहूँगा, जब तक तुम मेरे पास लौट न आओ।

जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥

जिस प्रकार यह भारी मोह-भ्रम दूर हो, वैसा ही उपाय विवेकपूर्वक विचारकर करो। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चल पड़ीं, और विचार करने लगीं कि अब क्या करूँ।

इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥

इधर शिवजी ने मन में अनुमान लगाया कि इसमें दक्षपुत्री सती का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी संशय दूर नहीं हुआ — जब विधाता प्रतिकूल हों तो भलाई नहीं होती।

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा॥

जो श्रीराम ने रचकर पहले ही निश्चित कर रखा है, वही होगा — तर्क करके शाखाएँ बढ़ाने से क्या लाभ? ऐसा कहकर शिवजी हरिनाम जपने लगे, और सती वहाँ गईं जहाँ सुखधाम प्रभु श्रीराम थे।

दोहा

पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप५२

बार-बार हृदय में विचार करके, सीताजी का रूप धारण कर, वे उसी मार्ग पर आगे जा खड़ी हुईं, जिस मार्ग से राजा श्रीराम आ रहे थे।

लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥

लक्ष्मणजी ने पार्वतीजी द्वारा धारण किया गया यह वेष देखा, तो हृदय में विशेष भ्रम के कारण चकित हो गए। पर वे अत्यंत गंभीर होने के कारण कुछ कह न सके, क्योंकि धीर बुद्धि वाले लक्ष्मणजी प्रभु का प्रभाव जानते थे।

सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥

देवताओं के स्वामी श्रीराम ने सती का यह कपट तुरंत पहचान लिया, क्योंकि वे सबके द्रष्टा और सबके अंतर्यामी हैं। जिनका स्मरण करते ही अज्ञान मिट जाता है, वे ही सर्वज्ञ भगवान राम हैं।

सती कीन्ह चह तहँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥

सती अपने मन का भेद वहाँ छिपाना चाहती हैं—देखिए, यह है नारी-स्वभाव का प्रभाव। अपनी माया की शक्ति हृदय में विचारकर श्रीरामजी मुस्कराकर कोमल वाणी बोले।

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥

प्रभु ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पिता समेत अपना नाम बताया। फिर पूछा—भगवान शिव कहाँ हैं? आप वन में अकेली किस कारण घूम रही हैं?

दोहा

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु५३

श्रीराम के कोमल किन्तु गूढ़ वचन सुनकर सती को बड़ा संकोच हुआ। भयभीत मन से वे शिवजी के पास चलीं, हृदय में गहरी चिंता लिए।

मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥जाइ उतरु अब देह काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥

मैंने शिवजी की बात नहीं मानी और अपने अज्ञान का दोष श्रीराम पर मढ़ दिया। अब जाकर मैं क्या उत्तर दूँगी? हृदय में भारी संताप उठा।

जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥

श्रीराम ने जान लिया कि सती को दुख हुआ है, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट कर दिखाया। मार्ग में जाते हुए सती ने एक अद्भुत दृश्य देखा—आगे श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित।

फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा॥जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥

मुड़कर पीछे देखा तो वहाँ भी प्रभु को सुंदर वेष में सीता और भाई सहित देखा। जिधर भी दृष्टि डालें, वहीं प्रभु विराजमान थे, सिद्ध और श्रेष्ठ मुनिजन उनकी सेवा कर रहे थे।

देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥

सती ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जिनका प्रभाव एक-दूसरे से बढ़कर था। सब देवता विविध रूपों में प्रभु के चरण वंदन करते और सेवा करते दिखे।

दोहा

सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप५४

सती ने अनगिनत अनुपम सरस्वती और लक्ष्मी को भी देखा। ब्रह्मा आदि देवता जिस-जिस रूप में थे, उनकी शक्तियाँ भी उसी रूप के अनुरूप वहाँ विद्यमान थीं।

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥

जहाँ-जहाँ जितने श्रीराम दिखे, वहाँ-वहाँ उतने ही देवता अपनी शक्तियों सहित भी दिखाई दिए। संसार के जड़-चेतन सभी प्राणी उन्होंने अनेक रूपों में देखे।

पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥

देवता अनेक रूपों में प्रभु की पूजा कर रहे थे, पर श्रीराम के रूप के समान दूसरा कोई रूप नहीं दिखा। श्रीराम अनेक जगह दिखे, किंतु सीताजी सहित वैसा दूसरा रूप कहीं नहीं था।

सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता॥हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥

वही श्रीराम, वही लक्ष्मण और वही सीता—हर जगह यही देखकर सती अत्यंत भयभीत हो गईं। हृदय काँपने लगा, देह की सुध-बुध जाती रही, वे आँखें मूँदकर मार्ग में ही बैठ गईं।

बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥

फिर आँखें खोलकर देखा तो दक्षकुमारी को वहाँ कुछ भी दिखाई न दिया। बार-बार श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर वे वहाँ चलीं जहाँ शिवजी विराजमान थे।

दोहा

गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात५५

सती शिवजी के पास पहुँचीं, तब शिवजी हँसकर कुशल पूछने लगे—बताओ, तुमने किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो।

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई॥

श्रीराम के प्रभाव को समझकर सती भय के कारण शिवजी से बात छिपा गईं। बोलीं—स्वामी, मैंने कोई परीक्षा नहीं ली, आपकी ही भाँति उन्हें प्रणाम किया।

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना॥

आपने जो कहा वह असत्य नहीं हो सकता, मेरे मन में यह पूर्ण विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान लगाकर देखा और सती ने जो कुछ किया था, सब जान लिया।

बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥

शिवजी ने फिर श्रीराम की माया को सिर नवाया, जिसने सती को प्रेरित कर असत्य कहलवाया। भगवान की इच्छा और होनी बड़ी बलवान है—यह सोचते हुए बुद्धिमान शिवजी हृदय में विचार करने लगे।

सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥

सती ने सीताजी का रूप धरा था, यह जानकर शिवजी के हृदय में विशेष विषाद हुआ। सोचा—यदि अब मैं सती से पहले जैसा प्रेम रखूँ तो भक्ति का मार्ग मिट जाएगा और अनीति होगी।

दोहा

परम पुनीत न जाइ तजि किए प्रेम बड़ पापु।प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु५६

सती परम पवित्र हैं, उन्हें त्यागा नहीं जा सकता, पर स्नेह बनाए रखना भी बड़ा दोष होगा। यह सोचकर शिवजी कुछ प्रकट नहीं कहते, किंतु उनके हृदय में अत्यंत संताप है।

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥

तब शिवजी ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया, श्रीराम का स्मरण करते हुए हृदय में यह विचार आया—इस देह में अब सती का मिलन मेरे लिए उचित नहीं। शिवजी ने मन में यह संकल्प कर लिया।

अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥

यह विचारकर स्थिरबुद्धि शिवजी श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने भवन को चले। चलते समय आकाश से मधुर वाणी हुई—हे महेश, जय हो, आपने भक्ति का मार्ग दृढ़ रखा।

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥

ऐसा दृढ़ प्रण आपके सिवा और कौन कर सकता है? आप ही श्रीराम के समर्थ भक्त और स्वयं भगवान हैं। यह आकाशवाणी सुनकर सती के मन में चिंता उठी, संकोच सहित उन्होंने शिवजी से पूछा।

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥

हे कृपालु, हे सत्यस्वरूप दीनदयालु प्रभु, बताइए आपने कौन-सा प्रण किया? सती ने अनेक प्रकार से पूछा, फिर भी त्रिपुरारि शिवजी ने कुछ नहीं बताया।

दोहा

सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।। 57क५७(क)

सती ने हृदय में अनुमान कर लिया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गए हैं। उन्हें ग्लानि हुई—मैंने शिवजी से कपट किया, नारी स्वभाव से ही सहज मूढ़ और अज्ञानी होती है।

सोरठा

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि५७(ख)

जल और दूध जैसे मिलकर एक भाव से बिकते हैं—देखिए प्रेम की यही सुंदर रीति है। पर जहाँ कपट की खटास पड़ जाती है, वहाँ रस अलग होकर बिगड़ जाता है।

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥

अपनी करनी को समझकर सती के हृदय में ऐसी चिंता हुई जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। कृपा के अथाह सागर शिवजी ने फिर भी मेरा अपराध प्रकट नहीं किया, यह सोचकर वे और लज्जित हुईं।

संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥

शिवजी का उदासीन भाव देखकर भवानी का मन व्याकुल हो उठा—लगा कि प्रभु ने मुझे त्याग दिया है। अपने ही अपराध को समझकर कुछ कहते न बना, हृदय में संताप बहुत बढ़ गया।

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥

सती को दुखी जानकर शिवजी ने सुख देने के लिए सुंदर कथाएँ सुनाईं। मार्ग में अनेक प्रसंग कहते-कहते विश्वनाथ शिवजी कैलास पहुँच गए।

तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥

वहाँ पहुँचकर शिवजी ने अपना प्रण फिर याद किया और वट वृक्ष के नीचे कमलासन लगाकर बैठ गए। अपने सहज स्वरूप को सँभालकर वे अखंड अपार समाधि में लीन हो गए।

दोहा

सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं५८

सती तब कैलास पर रहने लगीं, मन में उन्हें अत्यंत चिंता रहती। भेद कोई नहीं जानता था, और एक-एक दिन उनके लिए युग समान बीतने लगा।

नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना॥

सती के हृदय में प्रतिदिन नई-नई चिंता भारी होती—मैं इस दुख-सागर से कब पार जाऊँगी? मैंने श्रीराम का अपमान किया और फिर पति के वचन को असत्य समझा।

सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥

विधाता ने मुझे उसी का फल दिया है, जो उचित था वही किया। हे विधाता, अब यह तो पूछा नहीं जाता कि शिवजी से विमुख होकर तुम मुझे क्यों जीवित रखे हो।

कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥

हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती। बुद्धिमती सती मन-ही-मन श्रीराम का स्मरण करने लगीं—यदि प्रभु सचमुच दीनदयालु कहलाते हैं, यदि वेद उन्हें दुख हरने वाला गाते हैं।

तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥

तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ—मेरी यह देह शीघ्र छूट जाए। यदि शिवजी के चरणों में मेरा सच्चा स्नेह है, यदि मन-वचन-कर्म से मेरा यह व्रत सत्य है।

दोहा

तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करहु सो बेगि उपाइ।होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ५९

तो हे सर्वदर्शी प्रभु, सुनिए और शीघ्र वह उपाय कीजिए, जिससे बिना कष्ट के मेरा मरण हो जाए और यह असह्य विपत्ति समाप्त हो।

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥

इस प्रकार प्रजापति-पुत्री सती अकथनीय भारी दुख सहती रहीं। सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि त्यागी।

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानी सतीं जगतपति जागे॥जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥

शिवजी श्रीराम-नाम का स्मरण करने लगे, सती ने जान लिया कि जगत्पति जाग गए हैं। जाकर उन्होंने शिवजी के चरणों की वंदना की, शिवजी ने सम्मुख आसन दिया।

लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥

शिवजी हरिकथा का रसपान कराने लगे, उसी समय दक्ष प्रजापति बने। ब्रह्माजी ने सबको योग्यता से परखकर दक्ष को प्रजापतियों का प्रमुख बनाया।

बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥नहिं कोऊ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥

दक्ष को जब बड़ा अधिकार मिला, तब उनके हृदय में अत्यंत अभिमान आ गया। संसार में ऐसा कोई जन्मा नहीं, जिसे बड़प्पन पाकर मद न चढ़े।

दोहा

दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग६०

दक्ष ने सब मुनियों को बुलाकर एक बड़ा यज्ञ आरंभ किया, और उन सब देवताओं को आदरपूर्वक निमंत्रण भेजा जिन्हें यज्ञ का भाग मिलता है।

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥

किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और सभी देवता अपनी पत्नियों सहित यज्ञ में चले। विष्णु, ब्रह्मा और शिव को छोड़कर शेष सब देवता विमान सजाकर चले।

सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥

सती ने आकाश में अनेक सुंदर विमानों को जाते देखा। देव-सुंदरियाँ मधुर गान कर रही थीं, जिसे सुनकर मुनियों का ध्यान भी भंग हो जाता।

पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥

सती ने पूछा तो शिवजी ने सब बता दिया। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ हर्षित हुईं—यदि शिवजी आज्ञा दें तो इसी बहाने कुछ दिन जाकर वहाँ रह आऊँ।

पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कह न निज अपराध बिचारी॥बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥

पति का साथ छोड़ने के विचार से हृदय में भारी दुख था, पर अपना अपराध सोचकर कह न सकीं। फिर सती भय, संकोच और प्रेम में सनी मनोहर वाणी बोलीं।

दोहा

पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ६१

हे कृपानिधान, पिता के भवन में बड़ा उत्सव हो रहा है, यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जाकर आदरपूर्वक वह उत्सव देख आऊँ।

कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई॥

शिवजी बोले—तुमने अच्छा कहा, मेरे मन को भी यह भाया, पर यह अनुचित है कि दक्ष ने निमंत्रण नहीं भेजा। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया है, पर हमारे प्रति बैर के कारण तुम्हें भुला दिया।

ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥

ब्रह्मसभा में उन्हें हमसे दुख पहुँचा था, इसी कारण अब भी वे अपमान करते हैं। हे भवानी, यदि तुम बिना बुलाए वहाँ जाओगी तो न शील रहेगा, न स्नेह, न मर्यादा।

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥

यद्यपि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाने में कोई संदेह नहीं है, फिर भी जहाँ कोई विरोध और अभिमान रखता हो, वहाँ जाने से कल्याण नहीं होता।

भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥

शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाया, पर होनी के वश ज्ञान सती के हृदय में न बैठा। अंत में प्रभु ने कहा—यदि तुम बिना बुलाए जाओगी तो यह बात हमें अच्छी नहीं लगती।

दोहा

कहि देखा हर जतन बहु रहई न दच्छकुमारि।दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि६२

शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाकर देख लिया, पर दक्षकुमारी किसी तरह न रुकीं। तब त्रिपुरारि शिवजी ने अपने प्रमुख गणों को साथ देकर उन्हें विदा किया।

पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥

जब भवानी पिता के घर पहुँचीं, तो दक्ष के भय से किसी ने उनका सम्मान नहीं किया। केवल माता ही आदरपूर्वक भलीभाँति मिलीं, बहनें भी बहुत मुसकराकर मिलीं।

दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥

दक्ष ने सतीजी की कुशल-क्षेम तक नहीं पूछी, यह देखकर सती का सारा शरीर क्रोध और पीड़ा से जल उठा। सती ने जाकर यज्ञ में देखा तो कहीं भी शिवजी का भाग नहीं दिखा।

तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥

तब उन्हें शिवजी की पहले कही बात याद आ गई; स्वामी के अपमान का बोध होते ही हृदय जल उठा। पति-त्याग का पूर्व दुःख भी उतना गहरा नहीं था, जितना यह नया संताप उन्हें अब हुआ।

जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥

यद्यपि संसार में अनेक प्रकार के भयंकर दुःख हैं, तथापि कुल-अपमान से बढ़कर कठिन दुःख कोई नहीं। यह समझकर सती को अत्यंत क्रोध आया; माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया।

दोहा

सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध६३

शिवजी का अपमान सती से सहा नहीं गया, हृदय को कोई शांति नहीं मिली। तब उन्होंने सारी सभा को हठपूर्वक रोककर क्रोध भरे वचन कहे।

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥

हे सभासदो, हे समस्त मुनीश्वरो, सुनो! जिस-जिसने यहाँ शिवजी की निंदा कही या सुनी है, उसे उसका फल तुरंत मिलेगा, और मेरे पिता को भी भलीभाँति पछताना पड़ेगा।

संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥

जहाँ कहीं संत, शिवजी अथवा श्रीहरि की निंदा सुनाई पड़े, वहाँ यही मर्यादा है — या तो निंदा करने वाले की जीभ काट दी जाए, अन्यथा कान बंद करके वहाँ से दूर चला जाए।

जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥

महेश तो जगत की आत्मा, त्रिपुरासुर के संहारक, संसार के पिता और सबके हितकारी हैं; मेरे मंदबुद्धि पिता उन्हीं की निंदा करते हैं, यह भूलकर कि यह मेरा शरीर भी दक्ष के ही वंश से उत्पन्न है।

तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥

इसी कारण मैं अभी यह देह त्याग दूँगी — यह विचारकर, हृदय में चंद्रमौलि वृषकेतु (शिवजी) को धारण किए, उन्होंने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर लिया। सारे यज्ञ में हाहाकार मच गया।

दोहा

सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस६४

सती की मृत्यु सुनकर शिवजी के गण यज्ञ को नष्ट करने चल पड़े। यज्ञ का विध्वंस होते देख मुनि भृगु ने उसकी रक्षा का उपाय किया।

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥

जब शिवजी को यह सारा समाचार मिला, तो उन्होंने क्रोधित होकर वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने जाकर यज्ञ का विध्वंस कर दिया और सभी देवताओं को विधिवत उनका फल दिया।

भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख के होई॥यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥

शंभु से विमुख होने पर जैसी दुर्गति होती है, वैसी ही दक्ष की गति संसार भर में विख्यात हुई। यह कथा सारे जगत को ज्ञात है, इसीलिए मैंने इसे संक्षेप में कह दिया।

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥

मरते समय सती ने हरि से यही वर माँगा था कि जन्म-जन्म शिवजी के चरणों में उनका अनुराग बना रहे। इसी कारण उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया और पार्वती के रूप में देह पाई।

जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई॥जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥

जब से उमा हिमालय के घर जन्मीं, तभी से वहाँ सभी सिद्धियाँ और संपदाएँ आ बसीं। जहाँ-तहाँ मुनियों ने सुंदर आश्रम बनाए, और पर्वत ने उन्हें उचित निवास-स्थान दिए।

दोहा

सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति६५

वहाँ सदा फूल-फल से लदे नाना जाति के नए वृक्ष शोभा पाते, और पर्वत पर अनेक प्रकार की मणियों की खानें सुंदर रूप से प्रकट हुईं।

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥

सारी नदियाँ पवित्र जल लेकर बहतीं, पक्षी, मृग और भँवरे सब सुखपूर्वक वहाँ रहते। सभी प्राणियों ने अपना सहज वैर त्यागकर उस पर्वत पर आपस में प्रेम कर लिया था।

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥

गिरिजा (पार्वती) के घर आने से पर्वत ऐसा शोभित हुआ मानो उसे रामभक्ति ही प्राप्त हो गई हो। उस घर में नित नए मंगल होते, जिसका यश ब्रह्मा आदि देवता भी गाते थे।

नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥

नारदजी ने जब यह सब समाचार पाया, तो कौतुकवश तुरंत पर्वत के घर जा पहुँचे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर उन्हें सुंदर आसन दिया।

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥

पत्नी सहित पर्वतराज ने मुनि के चरणों में सिर नवाया, और चरणामृत से सारा भवन सिंचवाया। अपने सौभाग्य का बहुत बखान करते हुए उन्होंने पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों में डाल दिया।

दोहा

त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि६६

हे मुनिवर, आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी गति सर्वत्र है; कृपया हृदय में विचारकर मेरी पुत्री के गुण-दोष बताइए।

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥

मुनि मुस्कराकर गूढ़ और मधुर वाणी में बोले — तुम्हारी पुत्री समस्त गुणों की खान है। यह सहज सुंदर, सुशील और बुद्धिमती है, इसका नाम उमा, अंबिका और भवानी है।

सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥

यह कन्या सब शुभ लक्षणों से संपन्न है, अपने पति को सदा प्रिय ही रहेगी। इसका सुहाग सदा अटल रहेगा, और इसके कारण माता-पिता को भी बड़ा यश मिलेगा।

होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा॥

यह सारे संसार में पूज्य होगी, इसकी सेवा करने वाले के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। इसका नाम स्मरण करके ही संसार की स्त्रियाँ पतिव्रत की तलवार की धार पर चलने योग्य हो सकेंगी।

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥

हे पर्वतराज, तुम्हारी पुत्री सुलक्षणा है, अब इसके दो-चार अवगुण भी सुन लो। यह गुणहीन (सांसारिक अर्थ में), मानरहित, माता-पिता से हीन, उदासीन और संशय-रहित है।

दोहा

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख६७

ऐसा योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नग्न और अमंगल वेष वाला पति ही इसे मिलेगा — हाथ की यही रेखा इसके भाग्य में लिखी है।

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥

मुनि की वाणी को सत्य जानकर हिमालय को अपने हृदय में दुःख हुआ, पर उमा यह सुनकर प्रसन्न हो गईं। नारदजी भी यह भेद न जान सके कि एक ही बात से दोनों की दशा इतनी अलग क्यों हुई।

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥

गिरिजा की सभी सखियाँ, पर्वत और मैना — सबका शरीर रोमांचित हो उठा और आँखें आँसुओं से भर गईं। देवर्षि की वाणी झूठी नहीं हो सकती, यह जानकर सब चिंतित हुए, पर उमा ने वह बात हृदय में सँजोकर रख ली।

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥

उनके मन में पहले से ही शिवजी के चरणों में प्रेम उत्पन्न हो चुका था, अब मिलन कठिन जानकर मन में संदेह उठा। असमय जानकर उन्होंने अपना प्रेम छिपा लिया और सखी की गोद में जाकर बैठ गईं।

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥

देवर्षि की वाणी असत्य नहीं हो सकती, यह सोचकर बुद्धिमान दंपति और सखियाँ चिंतित हुईं। तब धैर्य धरकर पर्वतराज ने पूछा — हे नाथ, अब बताइए क्या उपाय किया जाए?

दोहा

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार६८

मुनीश्वर बोले — हे हिमवंत, सुनो, विधाता ने जो ललाट पर लिख दिया है, उसे देव, दानव, मनुष्य, नाग अथवा मुनि — कोई भी नहीं मिटा सकता।

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं॥

फिर भी मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, जो दैव सहायक हो तो अवश्य सफल होगा। मैंने तुम्हें जिस वर का वर्णन किया, उसी से उमा का मिलन होगा, इसमें कोई संशय नहीं।

जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषु गुन सम कह सबु कोई॥

वर में जो-जो दोष बताए गए थे, वे सब मैंने शिवजी में ही पाए हैं। यदि विवाह शंकरजी से हो, तो गुण-दोष दोनों बराबर मानकर सब कोई इसे उचित ही कहेंगे।

जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥

यदि विष्णु सर्प की शय्या पर सोते हैं, तो बुद्धिमान उसमें कोई दोष नहीं मानते। सूर्य और अग्नि सब कुछ ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी उन्हें कोई नीच नहीं कहता।

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई॥

नदी शुभ और अशुभ दोनों प्रकार का जल बहाती है, फिर भी गंगा को कोई अपवित्र नहीं कहता। समर्थ के लिए दोष नहीं होता, हे स्वामी, यह बात सूर्य, अग्नि और गंगा के समान ही सत्य है।

दोहा

जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान६९

यदि कोई मूर्ख, अविवेकी और अभिमानी मनुष्य ऐसी ही तुलना करने लगे, तो वह एक कल्प भर नरक में पड़ा रहता है — भला जीव कहीं ईश्वर के समान हो सकता है?

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥

गंगा के ही जल से बनी मदिरा को भी संत कभी ग्रहण नहीं करते, फिर भी गंगा में मिलना पवित्र माना जाता है — ईश्वर और सामान्य जीव में भी ठीक यही अंतर है।

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किए कलेसू॥

शंभु स्वभाव से ही सर्वसमर्थ और स्वयं भगवान हैं, इस विवाह में हर प्रकार से कल्याण ही है। महेश भले ही प्रसन्न करने में कठिन हों, पर वे आशुतोष भी हैं, बस उन्हें ठीक विधि से आराधना चाहिए।

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥

यदि तुम्हारी कन्या तपस्या करे, तो त्रिपुरारि भाग्य को भी बदल सकते हैं। संसार में यद्यपि अनेक वर हैं, तथापि इसके लिए शिव के सिवा कोई दूसरा उपयुक्त नहीं।

बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥

वे वरदाता, शरणागत की पीड़ा हरने वाले, कृपा के सागर और सेवक के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना के बिना करोड़ों योग-जप से भी इच्छित फल नहीं मिलता।

दोहा

अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस७०

ऐसा कहकर नारदजी ने हरि का स्मरण किया और गिरिजा को आशीर्वाद दिया — यह विवाह अवश्य कल्याणकारी होगा, अब हे गिरीश, सारा संशय त्याग दो।

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥

यह कहकर मुनि ब्रह्मलोक चले गए। अब आगे का चरित्र सुनो — पति को अकेला पाकर मैना ने कहा — नाथ, मुनि की बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई।

जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा॥न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥

यदि सुयोग्य घर, वर और कुल मिले, तभी हमें अपनी बेटी के योग्य विवाह करना चाहिए, अन्यथा कन्या भले ही कुँआरी रह जाए — उमा मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।

जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥

यदि गिरिजा के योग्य वर न मिला, तो सारा संसार पर्वत को मूर्ख कहेगा। यह सोचकर, हे स्वामी, विवाह इस प्रकार कीजिए कि हृदय में फिर कभी पछतावा न हो।

अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥बरु पावक प्रगटे ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥

ऐसा कहकर वे पति के चरणों में गिर पड़ीं, गिरीश ने स्नेहपूर्वक कहा — जैसे चंद्रमा में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही वर मिलना निश्चित है; नारदजी के वचन कभी असत्य नहीं होते।

दोहा

प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान७१

प्रिये, सारी चिंता त्याग दो, और केवल श्रीभगवान का ही स्मरण करो — जिन्होंने पार्वती को रचा है, वही उनका कल्याण भी करेंगे।

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू॥करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपाय न मिटिहि कलेसू॥

यदि तुम्हें पुत्री से इतना ही स्नेह है, तो जाकर उसे यही शिक्षा दो — वह ऐसी तपस्या करे जिससे उसे महेश ही प्राप्त हों, इसके सिवा और कोई उपाय इस दुःख को मिटाने का नहीं।

नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥

नारदजी के वचन गूढ़ अर्थ और शुभ प्रयोजन से भरे हैं, वृषकेतु (शिवजी) समस्त गुणों के भंडार हैं। यह विचारकर तुम सारी शंका त्याग दो, शंकरजी हर प्रकार से निष्कलंक हैं।

सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥

पति के वचन सुनकर मैना का मन हर्ष से भर गया, वे तुरंत उठकर गिरिजा के पास गईं। उमा को देखते ही उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भर गईं, और उन्होंने स्नेहपूर्वक उसे गोद में बिठा लिया।

बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥

वे बार-बार उमा को हृदय से लगातीं, गद्गद कंठ से कुछ कहा न जाता। तब जगत की माता, सर्वज्ञ भवानी ने अपनी माता को सुख देने वाली मृदु वाणी में कहा —

दोहा

सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि७२

हे माता, सुनिए, मैंने एक स्वप्न देखा है, वही आपको सुनाती हूँ — एक सुंदर, गौरवर्ण, श्रेष्ठ वर ने आकर मुझे यह उपदेश दिया।

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥

हे पर्वतकुमारी, जाकर तपस्या करो — नारदजी की बात को सत्य मानकर विचार किया गया। माता-पिता को भी यह विचार भला लगा, क्योंकि तपस्या सुख देने वाली और दुःख-दोष का नाश करने वाली होती है।

तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥

तपोबल से ही ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, तपोबल से ही विष्णु सारे संसार की रक्षा करते हैं। तपोबल से ही शिवजी संहार करते हैं, और तपोबल से ही शेषनाग पृथ्वी का भार धारण करते हैं।

तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥

हे भवानी, सारी सृष्टि तप के ही आधार पर टिकी है — यह जानकर पार्वती के मन में यह विचार दृढ़ हुआ कि जाकर तपस्या करूँ। यह वचन सुनकर माता चकित रह गई, और उसने पर्वत को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया।

मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥

माता-पिता को बहुत प्रकार से समझाकर उमा हर्षित मन से तप के लिए चल दीं। प्रिय परिवार, पिता और माता व्याकुल हो उठे, मुख से कोई बात न निकली।

दोहा

बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ७३

तब वेदशिरा मुनि ने आकर सबको समझाया; पार्वती की महिमा सुनकर सब को सांत्वना मिली और वे शांत हो गए।

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥

उमा ने प्राणपति (शिव) के चरणों को हृदय में धारण किया और वन में जाकर तपस्या करने लगीं। शरीर अत्यंत सुकुमार था, तप के योग्य नहीं था, फिर भी पति के चरणों का स्मरण कर उन्होंने सारे भोग त्याग दिए।

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥

प्रतिदिन उनके चरणों में नया अनुराग उपजता, देह की सुध बिसर गई और मन तपस्या में ही लग गया। एक हजार वर्ष उन्होंने केवल कंद-मूल-फल खाकर बिताए, फिर सौ वर्ष तक केवल साग खाकर काटे।

कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥

कुछ दिन उन्होंने केवल जल और वायु पर कठिन उपवास किया। बेल के पत्ते भी पृथ्वी पर सूखकर गिरते, उन्हें ही खाते हुए तीन हजार वर्ष बिताए।

पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना॥देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥

फिर वे सूखे पत्ते भी छोड़ दिए, तभी से उमा का नाम अपर्णा पड़ा। तप से क्षीण हुए उनके शरीर को देखकर देवताओं के मन गंभीर चिंता से भर उठे।

दोहा

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि७४

हे गिरिराज-कुमारी, सुनो, तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ; अब सारे असह्य क्लेश त्याग दो, त्रिपुरारि शीघ्र तुम्हें मिलेंगे।

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥

हे भवानी, ऐसा तप किसी और ने नहीं किया, इसी कारण अनेक धीर और ज्ञानी मुनि हुए। अब यह ब्रह्मा की श्रेष्ठ वाणी हृदय में धारण करो, इसे सदा सत्य और पवित्र जानो।

आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥

जब भी पिता तुम्हें बुलाने आएँ, तब हठ छोड़कर घर चली जाना। जब सप्तर्षि तुमसे मिलें, तब तुम इसे इसी वाणी की प्रामाणिकता समझ लेना।

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥

आकाशवाणी से ब्रह्मा की यह वाणी सुनकर गिरिजा का शरीर रोमांचित हो उठा और वे हर्षित हुईं। मैंने उमा का सुंदर चरित्र गाया, अब सुनो शिवजी का सुहावना चरित्र।

जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥

जब से सती ने जाकर देह त्यागी थी, तब से शिवजी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया था। वे सदा रघुनाथ के नाम का जप करते और जहाँ-तहाँ राम के गुणों की चर्चा सुनते।

दोहा

चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम७५

चिदानंद, सुख के धाम शिवजी, मोह-मद-काम से रहित होकर, हृदय में हरि को धारण किए हुए, सब लोकों को सुंदर बनाते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥

कहीं वे मुनियों को ज्ञान का उपदेश देते, कहीं राम के गुणों का बखान करते। यद्यपि वे स्वयं निष्काम भगवान हैं, तथापि सुजान शिवजी भक्तों के विरह-दुःख से स्वयं दुखी हो जाते।

एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥

इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर राम के चरणों में उनकी प्रीति नित नई ही बनी रही। शंकरजी का यह नियम और प्रेम देखकर लगा कि उनके हृदय में भक्ति की रेखा अटल है।

प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥

तब कृतज्ञ और कृपालु राम, जो रूप, शील और तेज के अपार भंडार हैं, प्रकट हुए। उन्होंने शंकरजी की बहुत प्रकार से सराहना की — तुम्हारे सिवा ऐसा व्रत और कौन निभा सकता था!

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥अति पुनीत गिरिजा के करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥

राम ने शिवजी को बहुत प्रकार से समझाया और पार्वती के जन्म की कथा सुनाई। कृपानिधि ने विस्तार से गिरिजा की अत्यंत पवित्र करनी का वर्णन किया।

दोहा

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु७६

हे शिव, अब मेरी एक विनती सुनिए — यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो जाकर पर्वत-पुत्री से विवाह कर लीजिए, यही मेरी इच्छा मुझे माँगकर पूरी कीजिए।

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥

शिवजी बोले — यद्यपि ऐसा करना उचित तो नहीं, फिर भी हे नाथ, आपके वचन कभी टाले नहीं जा सकते।

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥

आपकी आज्ञा सिर-माथे स्वीकार करना ही उचित है — हे नाथ, यही हमारा परम धर्म है।

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥

माता, पिता, गुरु और स्वामी के वचन बिना विचार किए ही शुभ मानकर स्वीकार करने चाहिए। आप हर प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं, हे नाथ, आपकी आज्ञा मुझे सिर-माथे स्वीकार है।

प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥

शिवजी के भक्ति, विवेक और धर्म से युक्त वचन सुनकर प्रभु प्रसन्न हुए। प्रभु ने कहा — हे हर, आपका व्रत बना रहा, अब जो मैंने कहा है उसे सदा हृदय में रखना।

अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥

ऐसा कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए, शंकरजी ने उसी मूर्ति को अपने हृदय में बसा लिया। तभी सप्तर्षि शिवजी के पास आए, और प्रभु ने उनसे अत्यंत मधुर वचन कहे।

दोहा

पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु७७

तुम पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लो; फिर पर्वत को प्रेरित कर उन्हें घर भिजवा देना और उनका सारा संदेह दूर कर देना।

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥

ऋषियों ने वहाँ गौरी को मूर्तिमान तपस्या के समान देखा। मुनियों ने कहा — हे शैलकुमारी, सुनो, तुम किस कारण इतना भारी तप कर रही हो?

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥

किसकी आराधना कर रही हो, क्या चाहती हो, हमें सच्चा भेद क्यों नहीं बताती? यह वचन कहते हुए उनका मन बहुत सकुचाया — कहीं हमारी मूर्खता सुनकर तुम हँस न पड़ो।

मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥

मन हठ पर अड़ा है, कोई सीख नहीं सुनता, मानो जल पर दीवार खड़ी करना चाहते हों। नारद का कथन सत्य समझकर मैंने माना, अब बिना पंखों के भी हम उड़ना चाहते हैं।

देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥

हे मुनि, हमारे इस अविवेक को देखिए — हमें सदा शिवजी को ही पति के रूप में चाहिए।

दोहा

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब देह।नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह७८

यह वचन सुनकर ऋषि हँस पड़े — हे गिरिजा, यह देह तुम्हारी है, पर नारद के उपदेश का पहले क्या परिणाम हुआ, यह भी तो बताओ।

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥

दक्ष के पुत्रों को भी नारदजी ने ऐसा ही उपदेश दिया था, और वे फिर कभी घर लौटकर नहीं देख सके। चित्रकेतु का घर भी उन्होंने ऐसे ही उजाड़ा, और हिरण्यकशिपु का भी वैसा ही हाल किया।

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥

जो नर-नारी नारद की सीख सुनते हैं, वे अवश्य घर त्यागकर भिखारी हो जाते हैं। वे मन के कपटी और तन से साधु दिखते हैं, और सबको अपने ही समान बनाना चाहते हैं।

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥

उन्हीं के वचनों पर विश्वास कर तुम एक ऐसे पति की कामना करती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, निर्गुण, निर्लज्ज, कुवेषधारी, कपाली, कुलहीन, गृहहीन, दिगंबर और साँपों से युक्त है।

कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥पंच कहें सिव सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥

बताओ ऐसा वर पाकर कौन-सा सुख मिलेगा — तुम भला भूलकर ठग की बातों में बहक गई हो। पहले भी पंचों के कहने पर शिव से सती का विवाह हुआ था, पर अंततः उसी उपेक्षा में उन्हें मरना पड़ा।

दोहा

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं७९

अब वे निश्चिंत सोते हैं, भीख माँगकर खाते हैं, कोई चिंता नहीं करते। ऐसे स्वभाव से एकाकी रहने वालों के घर में भला कभी स्त्री टिक सकती है?

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥

अब भी हमारी बात मान लो, हमने तुम्हारे लिए एक अच्छा वर सोच रखा है — अत्यंत सुंदर, पवित्र, सुखदायी और सुशील, जिसकी लीला का यश वेद भी गाते हैं।

दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥

दोष रहित, सब गुणों की राशि, लक्ष्मीपति और वैकुंठ में निवास करने वाला — ऐसा वर हम लाकर तुम्हें दिलाएँगे। यह सुनकर भवानी मुस्कराकर बोलीं —

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥

हे मुनिवर, आपने सच कहा, यह शरीर पर्वत की संतान है, हठ कभी नहीं छूटेगा, चाहे शरीर ही क्यों न छूट जाए। सोना भी पत्थर में मिला होता है, पर उसे आग में तपाने पर भी उसका स्वाभाविक गुण नहीं छूटता।

नारद बचन न मैं परिहरउँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥

मैं नारद के वचन कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे घर बसे या उजड़ जाए, मुझे कोई भय नहीं। जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं, उसे स्वप्न में भी सुख और सिद्धि सुलभ नहीं होती।

दोहा

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम८०

महादेव अवगुणों के घर हैं और विष्णु सब गुणों के धाम — पर जिसका मन जिसमें रम जाए, उसका प्रेम-कार्य उसी से बनता है।

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥

यदि तुम मुनिवरो, मुझसे पहले ही मिले होते, तो शायद मैं तुम्हारी सीख भी सिर झुकाकर सुन लेती। पर अब मेरा यह जन्म शिवजी के लिए ही समर्पित हो चुका है, अब गुण-दोष का विचार कौन करे?

जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किए बरेषी॥तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥

यदि तुम्हारे हृदय में हठ इतनी गहरी बैठ गई है कि बिना विवाह के रहा ही नहीं जाता, तो हे कौतुक-प्रिय मुनियो, इसमें आलस्य की क्या बात — संसार में और भी अनेक कन्याएँ हैं।

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥

करोड़ों जन्मों तक भी मेरा यह हठ बना रहेगा — मैं शंकर को ही वरूँगी, नहीं तो कुँआरी ही रहूँगी। मैं नारद का उपदेश कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे महेश स्वयं सौ बार भी ऐसा कहें।

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥

जगदंबा ने कहा — मैं तुम्हारे चरणों में प्रणाम करती हूँ, अब तुम अपने घर लौट जाओ, बहुत विलंब हो चुका है। उनका प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले — जय हो, जय हो, हे जगदंबिके भवानी!

दोहा

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु८१

तुम माया हो, शिवजी भगवान हैं, तुम दोनों समस्त जगत के माता-पिता हो — यह कहकर मुनि उनके चरणों में सिर नवाकर बार-बार हर्षित होते हुए वहाँ से चल दिए।

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा के सकल सुनाई॥

मुनियों ने जाकर हिमवान को भेजा, और विनती करके गिरिजा को घर ले आए। फिर सप्तर्षि शिवजी के पास जाकर उमा की सारी कथा सुनाई।

भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥

यह स्नेहभरी कथा सुनते ही शिवजी भाव-विभोर हो गए; सप्तर्षि हर्षित होकर अपने-अपने घर लौट गए। मन को स्थिर कर सुजान शंकर तब रघुनाथ का ध्यान करने लगे।

तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥

उसी समय तारकासुर नामक असुर उत्पन्न हुआ, जिसकी भुजाओं का प्रताप, बल और तेज अत्यंत विशाल था। उसने सभी लोकों के लोकपालों को जीत लिया, और देवता सुख-संपत्ति से रहित हो गए।

अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥

वह अजर-अमर था, कोई उसे जीत नहीं सकता था; देवता अनेक प्रकार से युद्ध करके भी हार गए। तब वे ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार करने लगे; ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुखी देखा।

दोहा

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ८२

ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा — इस दैत्य की मृत्यु तभी होगी जब शिवजी और उमा से उत्पन्न पुत्र युद्ध में इसे जीतेगा।

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥

मेरी यह बात सुनकर उपाय करो, ईश्वर स्वयं सहायक होंगे — जो सती ने दक्ष के यज्ञ में देह त्यागी थी, वही जाकर हिमाचल के घर जन्मीं।

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥

उस तपस्या के प्रभाव से शिवजी की समाधि दृढ़ हो गई, वे सब कुछ त्यागकर समाधि में बैठ गए। यद्यपि यह बड़ा असमंजस भरा कार्य है, तथापि हमारी एक बात सुनो।

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥

कामदेव को भेजो, वे जाकर शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करेंगे। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर नवाकर बलपूर्वक उनका विवाह करा देंगे।

एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥

इस प्रकार देवताओं का हित भली-भाँति सिद्ध होगा — सबने इस विचार को अत्यंत उत्तम बताया। देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम बाणों वाले कामदेव प्रकट हुए।

दोहा

सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार८३

देवताओं ने अपनी सारी विपत्ति कामदेव को सुनाई; यह सुनकर उन्होंने मन में विचार किया और मुस्कराकर कहा — शिवजी से बैर करना मेरे लिए कुशलकारी नहीं है।

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥

फिर भी मैं तुम्हारा कार्य अवश्य करूँगा, क्योंकि वेद परोपकार को ही परम धर्म कहते हैं। जो दूसरों के हित के लिए अपना शरीर तक त्याग दे, संत सदा उसी की प्रशंसा करते हैं।

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥

ऐसा कहकर, सबको सिर नवाकर, फूलों का धनुष हाथ में लिए, अपने सहायकों सहित कामदेव चल पड़े। चलते हुए मन में यह विचार आया — शिवजी से बैर करना मानो निश्चित मृत्यु मोल लेना है।

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥

तब भी उसने अपना प्रभाव फैलाया और सारे संसार को अपने वश में कर लिया। जैसे ही जलचरकेतु (कामदेव) क्रोधित हुआ, क्षणभर में सारे वैदिक मर्यादा के बाँध टूट गए।

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना॥सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा॥

ब्रह्मचर्य, अनेक व्रत और संयम, धैर्य, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, सदाचार, जप, योग और वैराग्य — विवेक की यह सारी सेना भय खाकर भाग खड़ी हुई।

छंद

भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे॥होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा॥

विवेक अपने सहायकों सहित उस युद्धभूमि में हार मानकर भाग गया, और उसी समय जाकर सद्ग्रंथों की तरह पर्वतों की कंदराओं में जा छिपा। होनी को कौन टाल सकता है, कर्ता कौन है, रक्षक कौन — संसार में सब हलचल मच गई; उस रतिनाथ के आगे किसका सिर न झुके, जिसने क्रोधित होकर हाथ में धनुष-बाण उठा लिया।

दोहा

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम८४

संसार के जितने भी सजीव, चर-अचर, नर-नारी कहलाते हैं, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा त्यागकर काम के वश में हो गए।

सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई॥

सबके हृदय में कामेच्छा जाग उठी, लताएँ वृक्षों की डालियों को देखकर झुक जातीं। नदियाँ उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ पड़तीं, तालाब आपस में संगम करने लगते।

जहँ असि दसा जड़न्ह के बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी॥

जब जड़ पदार्थों की भी ऐसी दशा वर्णित है, तो सचेतन प्राणियों की करनी कौन कह सकता है। आकाश, जल और थल में विचरने वाले सभी पशु-पक्षी समय-सुध भूलकर काम के वश हो गए।

मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥

सारा संसार कामांध और व्याकुल हो गया, चकवा-चकवी रात-दिन एक-दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकते। देव, दानव, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत और बेताल — सब इसी दशा में पड़ गए।

इन्ह के दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी॥

इन सबकी दशा का मैंने विस्तार से वर्णन नहीं किया, क्योंकि ये तो सदा से ही काम के दास माने जाते हैं। पर सिद्ध, विरक्त, महामुनि और योगी भी काम के वश होकर विरह में तड़पने लगे।

छंद

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥

योगीश्वर और तपस्वी भी काम के वश हो गए, फिर साधारण जनों की तो बात ही क्या। जो ब्रह्ममय दृष्टि से सबको देखते थे, वे अब सारे चराचर जगत को नारीमय देखने लगे। स्त्रियाँ पुरुषमय जगत देखतीं, पुरुष सबको स्त्रीमय — दो घड़ी भर के लिए सारे ब्रह्मांड में यह कामकृत कौतुक ऐसा ही फैल गया।

सोरठा

धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे।जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ८५

उस समय किसी का भी धैर्य टिक न सका, कामदेव ने सबके मन हर लिए; केवल जिन्हें रघुवीर ने बचाया, वे ही उस काल में इससे उबर पाए।

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू॥

यह विचित्र कौतुक तभी तक हुआ, जब तक कामदेव शिवजी के पास नहीं पहुँचा। शिवजी को देखते ही कामदेव भयभीत हो गया, और सारा संसार अपनी यथार्थ स्थिति में लौट आया।

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गए मतवारे॥रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥

सारे जीव तुरंत वैसे ही सुखी हो गए, जैसे नशा उतरने पर मतवाले सामान्य हो जाते हैं। रुद्र को देखकर कामदेव को भय हुआ, क्योंकि वे भगवान अत्यंत दुर्जेय और दुर्गम्य हैं।

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥

लौट जाने में भी लज्जा आ रही थी और वहाँ कुछ करते भी नहीं बन रहा था; अंततः मृत्यु का निश्चय कर उसने मन में एक उपाय रचा। उसने तुरंत सुंदर ऋतुराज वसंत को प्रकट कर दिया, जिसमें नए-नए फूलों से लदे वृक्षों की पंक्तियाँ शोभा पाने लगीं।

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा॥जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा॥

वन-उपवन, बावड़ी और तालाब — सभी दिशाएँ परम सुंदर हो उठीं। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा हो, ऐसा दृश्य देखकर मरे हुए मन में भी कामवासना जाग उठती।

छंद

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही।सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा॥

वसंत में मन की काम-वासना ऐसी जाग उठती कि मरा हुआ मन भी चंचल हो जाए, वन की सुंदरता का वर्णन ही नहीं हो सकता। शीतल, सुगंधित, मंद बयार मानो कामरूपी अग्नि की सच्ची सखी बन गई। सरोवरों में अनेक कमल खिले, भौंरों के झुंड गुनगुना रहे थे, हंस, कोयल और तोते मधुर स्वर में बोलते और अप्सराएँ गा-नाचकर आनंद मनाती थीं।

दोहा

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत८६

सारी कलाएँ और करोड़ों उपाय आजमाकर कामदेव अपनी सेना सहित हार गया, फिर भी शिवजी की अचल समाधि टस से मस न हुई; हृदय में बसे शिवजी को अंततः क्रोध आ गया।

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा॥सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने॥

एक सुंदर आम के वृक्ष की श्रेष्ठ शाखा देखकर, मन में क्रोधित कामदेव उस पर चढ़ गया। उसने फूलों के धनुष पर अपना बाण चढ़ाया और बड़े क्रोध से निशाना साधकर कान तक खींचा।

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे॥भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी॥

उसने भयंकर बाण छोड़ा, जो शिवजी के हृदय में जा लगा; उससे उनकी समाधि टूट गई और शिवजी जाग उठे। ईश्वर के मन में अत्यंत क्षोभ हुआ, उन्होंने आँखें खोलकर चारों दिशाओं में देखा।

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका॥तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा॥

सुगंधित नए पल्लवों के बीच छिपे कामदेव को देखते ही उन्हें क्रोध हो आया, और उस क्रोध से तीनों लोक काँप उठे। तब शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोला, और उसकी दृष्टि पड़ते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।

हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी॥समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी॥

सारे संसार में भारी हाहाकार मच गया, देवता डर गए और असुर प्रसन्न हो उठे। भोगी लोग काम-सुख की समाप्ति सोचकर शोकाकुल हुए, जबकि साधक और योगी अपने विघ्न से मुक्त होकर सुखी हुए।

छंद

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥

योगी-जन निष्कंटक हो गए, पर अपने पति की यह दशा सुनते ही रति मूर्छित हो गई। वह रोती-बिलखती, अनेक प्रकार से करुण विलाप करती हुई शिवजी के पास गई। बड़े प्रेम और विनय से हाथ जोड़े वह उनके सम्मुख खड़ी रही, तब कृपालु और आशुतोष प्रभु शिवजी ने उस असहाय स्त्री को देखकर सचमुच करुणा से वचन कहे।

दोहा

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु८७

हे रति, अब से तुम्हारे पति का नाम अनंग होगा, वे बिना शरीर के ही सबमें व्याप्त रहेंगे; अब अपने पुनर्मिलन का प्रसंग भी सुन लो।

जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥

जब यदुवंश में कृष्ण अवतार होगा और वे पृथ्वी का महान भार हरण करेंगे, तब कृष्ण का ही पुत्र तुम्हारा पति बनेगा — मेरी यह बात कभी असत्य नहीं होगी।

रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए॥

शिवजी की यह वाणी सुनकर रति चली गई; अब आगे की अलग कथा कहता हूँ, सुनो। जब देवताओं को यह सारा समाचार मिला, तो ब्रह्मा आदि देवता वैकुंठ चले गए।

सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥

विष्णु और ब्रह्मा सहित सभी देवता वहाँ गए जहाँ कृपानिधान शिवजी विराजमान थे। उन्होंने अलग-अलग बड़े प्रेम से उनकी स्तुति की, तब चंद्रमा को मुकुट में धारण करने वाले शिवजी प्रसन्न हुए।

बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू॥कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी॥

कृपासागर वृषकेतु बोले — कहो देवताओ, तुम किस कारण यहाँ आए हो? ब्रह्माजी ने कहा — हे प्रभु, आप तो अंतर्यामी हैं, फिर भी भक्तिवश हम आपसे विनती करते हैं, हे स्वामी।

दोहा

सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु८८

सभी देवताओं के हृदय में यही परम उत्साह है, हे शंकर, कि वे अपनी आँखों से आपका विवाह देखना चाहते हैं।

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥

यह उत्सव हमें नेत्र भरकर देखने दीजिए, हे कामदेव के मद को नष्ट करने वाले, अब कुछ कीजिए। आपने कामदेव को जलाकर रति को वरदान दिया, हे कृपासागर, यह आपने बहुत भला किया।

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभु कर सहज सुभाऊ॥पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥

दंड देकर फिर कृपा भी करना — यह तो प्रभु का सहज स्वभाव ही है, हे नाथ। पार्वती ने अपार तपस्या की है, अब आप उन्हें स्वीकार कीजिए।

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होइ कहा सुखु मानी॥तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई॥

ब्रह्माजी की विनती सुनकर और उनकी बात समझकर प्रभु शिवजी ने प्रसन्न मन से कहा — ऐसा ही होगा। तब देवताओं ने नगाड़े बजाए, फूल बरसाए और जय-जयकार की।

अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥

उचित अवसर जानकर सप्तर्षि वहाँ आए, ब्रह्माजी ने तुरंत उन्हें पर्वत के घर भेजा। वे पहले वहाँ गए जहाँ भवानी विराजमान थीं, और छलपूर्ण मधुर वचन बोले।

दोहा

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस८९

हमारी बात तब तुमने नहीं मानी थी, न ही नारद के उपदेश पर ध्यान दिया था। अब देखो, तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी हो गई, क्योंकि महेश ने तो कामदेव को ही भस्म कर दिया।

सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥

यह सुनकर भवानी मुस्कराकर बोलीं — हे विद्वान मुनिवर, आपने ठीक ही कहा है। मैं भी जानती हूँ कि अब कामदेव को शिवजी ने जला दिया, इससे पहले तक शिवजी विकारयुक्त ही समझे जाते थे।

हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी॥

मैं तो जानती हूँ कि शिवजी सदा योगी, अजन्मा, निर्दोष, निष्काम और निर्विकार हैं। यदि मैंने उन्हें ऐसा जानकर ही प्रेम, कर्म, मन और वचन से उनकी सेवा की है —

तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा॥

तो हे मुनीश्वर, सुनिए, मेरी यह प्रतिज्ञा कृपानिधान ईश्वर सत्य करके ही दिखाएँगे। आपने जो कहा कि हर ने कामदेव को जलाया, यह कहना आपकी बड़ी भूल है।

तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥गए समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई॥

हे तात, आग का यह स्वाभाविक गुण है कि बर्फ कभी उसके पास नहीं टिक सकती। जो भी उसके निकट गया, वह अवश्य नष्ट हो जाता है — कामदेव और महेश का संबंध भी ठीक वैसा ही समझिए।

दोहा

हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास९०

पार्वती के इन वचनों में प्रीति और विश्वास देखकर मुनि हृदय से हर्षित हुए, और उन्हें सिर नवाकर वे हिमाचल के पास चले गए।

सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा॥बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना॥

उन्होंने सारा प्रसंग पर्वतराज को सुनाया; कामदेव के भस्म होने की बात सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। फिर जब रति को दिए गए वरदान की बात कही, तो हिमवान को बहुत सुख मिला।

हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई॥सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई॥

शिवजी की महिमा हृदय में विचारकर उन्होंने बड़े आदर से मुनिवरों को बुलाया, और शीघ्र ही वेदविधि से शुभ दिन, नक्षत्र, मुहूर्त निश्चित कर विवाह का लग्न निकाला गया।

पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही॥जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती॥

सप्तर्षियों को शोभायमान लग्न-पत्री दी गई, हिमाचल ने उनके चरण पकड़कर विनती की। मुनियों ने जाकर वह पत्री ब्रह्माजी को दी, जिसे पढ़ते हुए उनके हृदय में प्रेम समाया न गया।

लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥

ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, यह सुनकर सभी मुनि और देवसमूह हर्षित हुए। आकाश से फूल बरसे, बाजे बजने लगे, और दसों दिशाओं में मंगल-कलश सजाए गए।

दोहा

लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान९१

सभी देवता अपने-अपने वाहन और विविध विमान सजाने लगे, शुभ शकुन होने लगे, और अप्सराएँ मंगल-गान करने लगीं।

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥

शिवजी के गण उनका शृंगार करने लगे — जटाओं का मुकुट सजाया और उस पर सर्प का मौर बाँधा। कुंडल और कंगन के रूप में साँप पहनाए गए, शरीर पर भस्म और वस्त्र के रूप में सिंह-चर्म धारण कराया गया।

ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥

ललाट पर सुंदर चंद्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, और यज्ञोपवीत के रूप में सर्प — कंठ में विष, वक्षस्थल पर नरमुंडों की माला — ऐसे अशुभ-से दिखते वेष में भी शिवधाम कृपालु शोभा पा रहे थे।

कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥

हाथ में त्रिशूल और डमरू शोभा पा रहे थे, शिवजी बैल पर चढ़कर चले, बाजे बजने लगे। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कराने लगीं — ऐसे वर के योग्य दुल्हन तो संसार में है ही नहीं!

बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता॥सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा॥

विष्णु, ब्रह्मा आदि सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चले। देवसमाज तो हर प्रकार से अनुपम था, पर वर के अनुरूप बारात नहीं लग रही थी।

दोहा

बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज९२

विष्णु ने मुस्कराकर सभी दिक्पालों को बुलाकर कहा — तुम सब अपने-अपने समाज सहित अलग-अलग होकर चलो।

बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥

यदि वर के अनुरूप बारात न सजी, तो दूसरे नगर में जाकर हमारी हँसी होगी। विष्णु की यह बात सुनकर देवता मुस्कराए और अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए।

मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥

महेश मन-ही-मन मुस्कराने लगे, विष्णु के व्यंग्य भरे वचन उनसे छिपे न रहे। अपने प्रिय के मुख से यह प्रिय वचन सुनकर उन्होंने भृंगी को भेजकर अपने सभी गणों को बुलवाया।

सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥

शिवजी की आज्ञा सुनकर सारे गण आ गए, उन्होंने प्रभु के चरण-कमलों में सिर नवाया। नाना वाहन और नाना वेष धारण किए अपने इस विचित्र समाज को देखकर शिवजी स्वयं हँस पड़े।

कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥

कोई मुखहीन था तो किसी के अनेक मुख थे, कोई बिना हाथ-पैर का था तो किसी के कई हाथ-पैर थे। कोई अनेक नेत्रों वाला था, कोई नेत्रहीन, कोई अत्यंत हृष्ट-पुष्ट तो कोई अत्यंत दुबला।

छंद

तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥

कोई अत्यंत दुबला तो कोई मोटा, कोई पवित्र वेष में तो कोई अपवित्र रूप धरे था। किसी के आभूषण भयंकर खोपड़ियों के थे, सबके शरीर ताजे रक्त से सने थे। गधे, कुत्ते, सुअर और सियार के मुख वाले अनगिनत गण थे, उनका वेष कोई गिन ही नहीं सकता था। अनेक प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगियों के झुंड थे, जिनका वर्णन करना भी कठिन था।

सोरठा

नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि९३

सभी भूत परम उमंग में नाचते-गाते थे, देखने में अत्यंत विचित्र लगते और विलक्षण ढंग से बोलते थे।

जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥

जैसा दूल्हा था, वैसी ही यह बारात सजी थी; मार्ग में चलते हुए अनेक विचित्र कौतुक होते रहे। इधर हिमाचल ने ऐसा भव्य मंडप सजाया, जिसका वर्णन करना भी कठिन था।

सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥

संसार में जितने भी पर्वत हैं, छोटे-बड़े सब, जिनका पूरा वर्णन ही नहीं हो सकता; वन, सागर, सभी नदियाँ और तालाब — हिमगिरि ने सबको निमंत्रण भेजा।

कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥

सुंदर मनचाहा रूप धारण किए सभी अपनी पत्नियों सहित हिमालय के घर पहुँचे, और प्रेमपूर्वक मंगल-गीत गाने लगे।

प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागई लघु बिरंचि निपुनाई॥

पहले से ही पर्वत ने अनेक भवन सजा रखे थे, जिनमें सब यथोचित रूप से ठहर गए। नगर की सुंदर शोभा देखकर ब्रह्माजी की निपुणता भी फीकी लगने लगी।

छंद

लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥

नगर की शोभा देखकर सचमुच ब्रह्मा की कारीगरी भी छोटी लगती थी। वन, बाग, कुएँ, तालाब और नदियों की सुंदरता का वर्णन कौन कर सकता है। घर-घर पर अनेक मंगल-तोरण, पताकाएँ और ध्वजाएँ शोभा पा रही थीं, और सुंदर-चतुर स्त्री-पुरुषों की छवि देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता।

दोहा

जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ९४

जिस नगर में स्वयं जगदंबा अवतरित हुई हों, उसका वर्णन भला कैसे किया जाए — वहाँ ऋद्धि-सिद्धि और संपदा नित नए रूप में बढ़ती ही जाती थी।

नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥

नगर के निकट बारात आई सुनकर, नगर में हलचल और शोभा और भी बढ़ गई। अनेक प्रकार के वाहन सजाकर लोग आदरपूर्वक अगवानी करने चले।

हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥

देवताओं की सेना देखकर सब हृदय से हर्षित हुए, विष्णु को देखकर तो और भी सुखी हुए। पर जब शिवजी के गणों का समाज दिखा, तो वाहन डरकर भाग खड़े हुए।

धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥गए भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥

वहाँ धैर्यवान समझदार लोग ही टिके रहे, बाकी बालकों को लेकर लोग जान बचाकर भागे। घर पहुँचकर जब माता-पिता ने पूछा, तो वे भय से काँपते हुए बताने लगे।

कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥

क्या कहें, वह दृश्य कहा ही नहीं जा सकता — मानो यमराज की सेना हो या बारात। कोई बैल पर सवार पागल-सा दिखता था, सर्प, खोपड़ी और भस्म के आभूषण पहने था।

छंद

तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥

शरीर पर भस्म, आभूषण के रूप में साँप और खोपड़ी, नंगे, जटाधारी और भयंकर रूप वाले — साथ में भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और विकट मुख वाले निशाचर। जो यह बारात देखकर भी जीवित बचा रहे, उसका बड़ा भाग्य समझो — यही बात घर-घर में बच्चे कहते फिरे कि वही उमा का विवाह देख पाएगा।

दोहा

समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं९५

महेश के इस विचित्र समाज को समझकर माता-पिता मुस्कराए, और बालकों को अनेक प्रकार से समझाया कि निडर रहो, डरने की कोई बात नहीं है।

लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥

अगवानी करने वाले बारात को लिवा लाए, और सबको सुंदर जनवासे दिए गए। मैना ने शुभ आरती सजाई, और स्त्रियाँ साथ में मंगल-गीत गाने लगीं।

कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥

सुंदर कंचन के थाल में जल लिए मैना हर्षित मन से शिवजी की परछन करने चलीं। पर जब उन्होंने शिवजी का विकट रूप देखा, तो सभी स्त्रियों के हृदय में बड़ा भय समा गया।

भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी॥

वे भयभीत होकर घर के भीतर भाग गईं, और शिवजी अपने जनवासे में चले गए। मैना के हृदय में भारी दुःख हुआ, उन्होंने पार्वती को बुलाकर पास बिठाया।

अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥

बड़े स्नेह से उन्हें गोद में बिठाया, श्याम कमल जैसे उनके नेत्र आँसुओं से भर आए। जिस विधाता ने तुम्हें ऐसा सुंदर रूप दिया, उसी मूर्ख ने ऐसा पागल वर क्यों दे दिया।

छंद

कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।घरु जाउ अपजसु होइ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥

विधाता ने तुम्हें तो इतनी सुंदरता दी, फिर ऐसा पागल वर क्यों चुना — जो फल कल्पवृक्ष को मिलना चाहिए, वह जबरन बबूल को लगा दिया। तुम्हारे साथ मैं भी पर्वत से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में डूब जाऊँगी। घर भले उजड़ जाए, संसार में अपयश भी हो, पर जीते-जी मैं यह विवाह नहीं होने दूँगी।

दोहा

भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि९६

पर्वत की सभी स्त्रियाँ यह देखकर व्याकुल और दुखी हो उठीं। पुत्री के स्नेह में डूबी मैना विलाप करने लगीं, रोते-रोते बातें करने लगीं।

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा॥

नारद ने मेरा क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा घर ही उजाड़ दिया! जिन्होंने उमा को ऐसा उपदेश दिया, उन्हीं के कारण वह पागल वर पाने के लिए तप करती रही।

साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव के पीरा॥

सचमुच उन्हें न मोह है, न माया, न घर-द्वार, न पत्नी — वे तो उदासीन हैं। पर दूसरे के घर को उजाड़ने में उन्हें कोई लाज-भय नहीं — भला बाँझ स्त्री प्रसव-पीड़ा क्या जाने!

जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥

माता को इतना व्याकुल देखकर भवानी विवेकपूर्ण मृदु वाणी में बोलीं — हे माता, ऐसा सोचकर व्यर्थ चिंता मत करो, विधाता ने जो रच दिया है, वह कभी टलता नहीं।

करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥

यदि भाग्य में ही यह पागल वर लिखा है, तो फिर किसी को दोष क्यों दिया जाए? क्या तुम्हारे कारण विधाता के अंक मिट सकते हैं? हे माता, व्यर्थ ही कलंक अपने सिर मत लो।

छंद

जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥

हे माता, व्यर्थ कलंक मत लो, करुणा छोड़ो, अब यह सोचने का अवसर नहीं है — ललाट पर लिखा दुःख-सुख जहाँ जाना है, वहीं मिलेगा। उमा के इन विनम्र और कोमल वचनों को सुनकर सभी स्त्रियाँ फिर भी चिंतित रहीं, और विधाता को बहुत दोष देते हुए आँसू बहाती रहीं।

दोहा

तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत९७

उसी समय नारद और सप्तर्षि भी यह समाचार सुनकर तुरंत हिमालय के घर पहुँचे।

तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा॥मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥

तब नारद ने सबको समझाया और पूर्व की सारी कथा सुनाई — हे मैना, सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह पुत्री साक्षात् जगदंबा भवानी है।

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥

वह अजन्मा, अनादि, अविनाशी शक्ति है, सदा शिवजी के अर्धांग में निवास करने वाली है। वही जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करती है, और अपनी इच्छा से ही लीला के लिए शरीर धारण करती है।

जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥

पहले उसने दक्ष के घर जन्म लिया था, नाम था सती, और सुंदर देह पाई थी। उसी जन्म में सती ने शंकरजी से विवाह किया था, यह कथा सारे संसार में प्रसिद्ध है।

एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥

एक बार शिवजी के साथ आते हुए सती ने रघुकुल के सूर्यरूप राम को वन में देखा। उन्हें मोह हुआ और शिवजी की बात न मानकर, भ्रमवश उन्होंने सीता का रूप धारण कर लिया।

छंद

सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया॥

सीता का जो वेष सतीजी ने धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकरजी ने उन्हें त्याग दिया। शिव-वियोग में जाकर वे पिता के यज्ञ की योगाग्नि में जल गईं। अब इसी हिमालय के घर जन्म लेकर उन्होंने अपने ही पति के लिए यह कठिन तप किया है। यह जानकर, हे गिरिजा, तुम सारा संशय त्याग दो — तुम सदा से ही शंकर की प्रिया हो।

दोहा

सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद९८

नारदजी के ये वचन सुनकर सबका विषाद क्षणभर में मिट गया, और यह समाचार क्षणमात्र में सारे नगर के घर-घर में फैल गया।

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥

तब मैना और हिमवान अत्यंत आनंदित हुए, और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वंदना की। नगर के सभी स्त्री-पुरुष, बालक और वृद्ध — सब अत्यंत हर्षित हो उठे।

लगे होन पुर मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना॥भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥

नगर में मंगल-गीत गूँजने लगे, घर-घर में सोने के अनेक कलश सजाए गए। सूपशास्त्र के अनुसार जितने भी व्यंजन बन सकते थे, वे सब अनेक प्रकार से तैयार किए गए।

सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥

उस भोज का वर्णन कैसे किया जाए, जहाँ स्वयं माता भवानी निवास करती हों! सभी बाराती आदरपूर्वक बुलाए गए — विष्णु, ब्रह्मा और सभी प्रकार के देवता।

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥

अनेक पंक्तियों में बैठकर सब भोजन करने लगे, निपुण रसोइए परोसने लगे। स्त्रियों के समूह ने देवताओं को पहचानकर मीठी वाणी में विवाह की परंपरागत ठिठोली गाना शुरू किया।

छंद

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥

सुंदरियाँ मधुर स्वर में ठिठोली गातीं और व्यंग्यभरे वचन सुनातीं। देवता बड़ी देर तक भोजन करते और यह विनोद सुनकर सुख पाते रहे। भोजन करते समय जो आनंद बढ़ा, उसका वर्णन करोड़ों मुख से भी नहीं हो सकता। हाथ धुलाकर पान देकर सबको उनके-उनके जनवासे में विदा किया गया।

दोहा

बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ९९

फिर मुनियों ने हिमवान को लग्न सुनाया, और शुभ मुहूर्त देखकर देवताओं को विवाह के लिए बुला भेजा।

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥

सभी देवताओं को आदरपूर्वक बुलाकर उन्हें यथोचित आसन दिए गए। वेद-विधि के अनुसार वेदी सजाई गई, और स्त्रियाँ सुंदर मंगल-गीत गाने लगीं।

सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥

अत्यंत दिव्य और सुहावना सिंहासन ब्रह्माजी ने बनाया था, जिसका वर्णन करना भी कठिन था। शिवजी विप्रों को सिर नवाकर उस पर बैठे, हृदय में अपने प्रभु रघुनाथ का स्मरण करते हुए।

बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई॥देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥

फिर मुनियों ने उमा को बुलवाया, सखियाँ उन्हें सुंदर शृंगार कर लिवा लाईं। उनका रूप देखकर सभी देवता मोहित हो गए — ऐसी छवि का वर्णन संसार का कौन कवि कर सकता है!

जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥

भवानी को साक्षात् जगदंबिका जानकर देवताओं ने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया। भवानी की सुंदरता और मर्यादा का वर्णन करोड़ों मुख से भी नहीं हो सकता।

छंद

कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥छबिखानि मातु भवानि गवनी मध्य मंडप सिव जहाँ।अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥

करोड़ों मुखों से भी जगत-जननी की महान शोभा का वर्णन नहीं हो सकता, स्वयं वेद, शेषनाग और शारदा भी कहते हुए सकुचाते हैं, फिर मंदबुद्धि तुलसीदास भला क्या कह सकता है। छवि की खान माता भवानी मंडप के मध्य में वहाँ पहुँचीं जहाँ शिवजी विराजमान थे, और उन्हें देखकर मन का भँवरा संकोचवश पति के चरण-कमलों में जाकर ही रम गया।

दोहा

मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि१००

मुनि की आज्ञा से पहले गणपति की पूजा की गई, फिर शिवजी और भवानी की पूजा हुई। कोई इसमें संशय न करे, देवता तो अनादि हैं, यह जानकर मन में इसे स्वीकार करना चाहिए।

जसि बिबाह के बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥

वेदों में विवाह की जो विधि बताई गई है, महामुनि ने वह सब विधिपूर्वक संपन्न कराई। गिरिराज ने कुशा और कन्या का हाथ पकड़कर, भवानी को भव (शिव) के हाथों सौंप दिया।

पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥

जब महेश ने पाणिग्रहण किया, तो सभी देवता हृदय से हर्षित हो उठे। महामुनि वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे, और देवता जय-जयकार करते हुए जय शंकर कहने लगे।

बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥

अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे, आकाश से नाना प्रकार के फूल बरसने लगे। इस प्रकार हर-गिरिजा का विवाह संपन्न हुआ, सारे लोकों में उत्सव छा गया।

दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥

दासी, दास, घोड़े, रथ, हाथी, गाय, वस्त्र, मणियाँ और अनेक वस्तुएँ, अन्न और सोने के बर्तन भरकर अनगिनत गाड़ियाँ — इतना दहेज दिया गया कि उसका वर्णन ही नहीं हो सकता।

छंद

दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥

हिमाचल ने बहुत प्रकार का दहेज देकर फिर हाथ जोड़कर कहा — हे संकर, आप तो पूर्णकाम हैं, हम आपको और क्या दें — यह कहकर वे शिवजी के चरण-कमल पकड़कर वहीं रह गए। कृपासागर शिवजी ने ससुर को हर प्रकार से संतोष दिया, फिर मैना ने भी उनके चरण-कमल पकड़ लिए, उनका हृदय प्रेम से परिपूर्ण था।

दोहा

नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु१०१

हे नाथ, उमा मेरे प्राणों के समान प्रिय है, इसे अपनी घर की सेविका मानकर रखिए। मेरे सारे अपराध क्षमा कीजिए, अब प्रसन्न होकर यही वर दीजिए।

बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥

शिवजी ने सास को बहुत प्रकार से समझाया, तब वे उनके चरणों में सिर नवाकर घर लौट गईं। फिर मैना ने उमा को बुलाकर, उन्हें गोद में बिठाकर सुंदर शिक्षा दी।

करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥

सदा शंकरजी के चरणों की पूजा करना, स्त्री के लिए पति की सेवा के सिवा दूसरा कोई धर्म नहीं है। यह वचन कहते हुए उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं, फिर उन्होंने पुत्री को हृदय से लगा लिया।

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥

विधाता ने संसार में स्त्री को क्यों रचा — पराधीन होकर उसे स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता। माता प्रेम से अत्यंत विकल हो उठीं, पर असमय जानकर उन्होंने धैर्य धारण किया।

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना॥सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥

बार-बार वे चरण पकड़कर मिलतीं और गिर पड़तीं, उस परम प्रेम का वर्णन नहीं हो सकता। सभी स्त्रियाँ मिलकर भवानी से भेंट करतीं, और वे फिर-फिर जाकर माता के गले लिपट जातीं।

छंद

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गई॥जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥

फिर माता से मिलकर वे चलीं, सबने उन्हें उचित आशीर्वाद दिया; बार-बार पीछे मुड़कर माता को निहारते हुए सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गईं। सभी याचकों को संतुष्ट कर संकरजी उमा सहित अपने भवन को चले, सभी देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे और आकाश में नगाड़े बजने लगे।

दोहा

चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु१०२

तब हिमवान भी उन्हें विदा करने के लिए बड़े स्नेह से साथ चले। अनेक प्रकार से संतोष देकर, वृषकेतु ने उन्हें विदा किया।

तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥

गिरिराज तुरंत घर लौट आए, उन्होंने सभी पर्वतों और सरोवरों को बुलाया। सबको आदर, दान, विनय और सम्मान देकर हिमवान ने सबको विदा किया।

जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी॥

जब शिवजी कैलास पहुँच गए, तब सभी देवता अपने-अपने लोक को लौट गए। जगत के माता-पिता शिव-भवानी का शृंगार और वैभव इतना अनुपम था कि उसका वर्णन ही नहीं किया जा सकता।

करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥

वे अनेक प्रकार से भोग-विलास करते और अपने गणों सहित कैलास पर निवास करते। हर-गिरिजा की यह लीला नित नई होती रही, इस प्रकार बहुत समय बीत गया।

तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा॥आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥

तब षटानन कुमार का जन्म हुआ, जिसने युद्ध में तारकासुर का वध किया। आगम, निगम और सभी प्रसिद्ध पुराणों में षन्मुख का यह जन्म संसार भर में जाना जाता है।

छंद

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥

षन्मुख के जन्म, कर्म, प्रताप और महान पुरुषार्थ को सारा संसार जानता है, इसी कारण मैंने वृषकेतु के पुत्र का चरित्र संक्षेप में ही कहा। जो नर-नारी उमा-शिव के इस विवाह की कथा कहते या गाते हैं, वे सदा कल्याणकारी कार्यों और मंगल-विवाह का सुख पाते हैं।

दोहा

चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु१०३

गिरिजा-रमण शिवजी के इस चरित्र-सागर का पार तो वेद भी नहीं पा सकते, फिर अत्यंत मंदबुद्धि और गँवार तुलसीदास भला इसका वर्णन कैसे कर सकता है।

संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा॥बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥

शिवजी के इस सरस और सुहावने चरित्र को सुनकर भरद्वाज मुनि को अत्यंत सुख मिला। इस कथा के प्रति उनकी लालसा और बढ़ गई, उनके नेत्रों में जल भर आया और शरीर के रोम खड़े हो गए।

प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥

प्रेम-विभोर होकर मुख से वाणी न निकली; उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि हर्षित हुए। अहो, हे मुनीश्वर, तुम्हारा जन्म धन्य है — तुम्हें गौरीश प्राणों के समान प्रिय हैं।

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥

जिन्हें शिवजी के चरण-कमलों में प्रेम नहीं, वे राम को स्वप्न में भी नहीं सुहाते। बिना छल के विश्वनाथ के चरणों में स्नेह रखना ही राम-भक्त का सच्चा लक्षण है।

सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥

शिवजी के समान रघुपति का व्रत निभाने वाला और कौन है, जिन्होंने बिना किसी दोष के सती जैसी नारी को भी त्याग दिया। प्रतिज्ञा करके रघुपति की भक्ति को इस प्रकार प्रकट कर दिखाया — शिवजी के समान राम को और कौन प्रिय है।

दोहा

प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार१०४

पहले मैंने शिवजी का चरित्र कहकर तुम्हारे मन का भेद परख लिया — तुम राम के शुद्ध सेवक हो और समस्त विकारों से रहित हो।

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥

मैंने तुम्हारा गुण-शील पहचान लिया, अब सुनो, मैं रघुनाथ की लीला कहता हूँ। हे मुनि, सुनो, आज तुमसे मिलकर मेरे मन में जो सुख हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता।

राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥

हे मुनीश्वर, राम का चरित्र अत्यंत अपार है, इसे सौ करोड़ शेषनाग भी पूरी तरह नहीं कह सकते। फिर भी जैसा सुना है, वैसा ही संक्षेप में कहता हूँ — धनुषधारी अंतर्यामी प्रभु का स्मरण करके।

सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

शारदा काठ की कठपुतली के समान हैं, और स्वामी राम स्वयं सूत्रधार और अंतर्यामी हैं। जिस पर वे कृपा करते हैं, वे उसे अपना भक्त जानकर, कवि के हृदय-आँगन में वाणी को नचाते हैं।

प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥

उन्हीं कृपालु रघुनाथ को प्रणाम करके मैं उनकी निर्मल गुण-गाथा कहूँगा। परम रमणीय है वह श्रेष्ठ पर्वत कैलास, जहाँ सदा शिव-उमा का निवास है।

दोहा

सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद।बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद१०५

वहाँ सिद्ध, तपस्वी, योगीजन, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह निवास करते हैं। सभी पुण्यात्मा वहाँ रहते हैं और सुख के कंद शिवजी की सेवा करते हैं।

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥

जो लोग हरि-हर के विमुख हैं और जिन्हें धर्म में प्रीति नहीं, वे मनुष्य वहाँ स्वप्न में भी नहीं जा सकते। उस पर्वत पर एक विशाल बरगद का वृक्ष है, जो हर काल में नित नया और सुंदर बना रहता है।

त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥

तीनों प्रकार की सुखद, शीतल हवा और सुंदर छाया वाले उस वृक्ष को वेदों ने शिवजी के विश्राम-स्थल के रूप में गाया है। एक बार प्रभु शिवजी उस वृक्ष के नीचे गए, उसे देखकर उनके हृदय में बड़ा सुख हुआ।

निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥

अपने हाथ से बाघ की खाल बिछाकर, कृपालु शंकर सहज ही वहाँ बैठ गए। कुंद के फूल और चंद्रमा के समान गौर शरीर, लंबी भुजाएँ, वस्त्र के रूप में मुनियों जैसा चीर धारण किए।

तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥

उनके चरण नए खिले लाल कमल के समान थे, जिनके नखों की चमक भक्तों के हृदय का अंधकार हरने वाली थी। सर्प और भस्म के आभूषण धारण किए त्रिपुरारि का मुख शरद ऋतु के चंद्रमा की छटा को भी मात करता था।

दोहा

जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल१०६

जटाओं में मुकुट के समान गंगा विराजमान थीं, कमल के समान विशाल नेत्र थे। नीलकंठ, सौंदर्य के भंडार, ललाट पर बालचंद्र सजाए वे अत्यंत शोभा दे रहे थे।

बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी॥

कामदेव के शत्रु शिवजी ऐसे शोभा पा रहे थे मानो शांत रस ही शरीर धारण कर बैठा हो। शुभ अवसर जानकर पार्वती माता भवानी उनके पास पहुँचीं।

जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई॥

प्रिया जानकर शिवजी ने उनका बड़ा आदर किया, और अपने बाएँ भाग में आसन दिया। पार्वती हर्षित होकर उनके समीप बैठ गईं, तभी उनके चित्त में अपने पूर्वजन्म की कथा याद आ गई।

पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी॥

पति के हृदय में अपने लिए अधिक स्नेह जानकर, उमा मुस्कराकर मीठी वाणी में बोलीं। शैलकुमारी वह कथा पूछना चाहती थीं, जो सारे संसार के लिए हितकारी हो।

बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा॥

हे विश्वनाथ, हे मेरे स्वामी, हे पुरारी, तीनों लोकों में आपकी महिमा विख्यात है। चर-अचर, नाग, नर और देवता — सब आपके चरण-कमलों की सेवा करते हैं।

दोहा

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम१०७

हे प्रभु, आप समर्थ, सर्वज्ञ, सकल कला और गुणोंके धाम हैं। योग, ज्ञान और वैराग्यके भंडार आपका नाम शरणागतोंके लिए कल्पवृक्षके समान है।

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥

यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, हे सुख के सागर, और मुझे सचमुच अपनी दासी मानते हैं, तो हे प्रभु, मेरा अज्ञान दूर कीजिए और मुझे रघुनाथ की अनेक प्रकार की कथाएँ कहिए।

जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥

जिसके घर में कल्पवृक्ष हो, वह भला दरिद्रता का दुःख कैसे सहे — हे चंद्रशेखर, हृदय में यही विचार कर, हे नाथ, आप मेरे मन का यह बड़ा भ्रम दूर कीजिए।

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी॥सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना॥

हे प्रभु, जो मुनि परमार्थ के जानकार हैं, वे राम को ही अनादि ब्रह्म कहते हैं। शेष, शारदा, वेद और पुराण — सब मिलकर रघुपति के ही गुण गाते हैं।

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥

आप स्वयं भी दिन-रात आदरपूर्वक राम-नाम जपते हैं, जो अनंग के भी शत्रु हैं। क्या वही राम अयोध्या के राजा के पुत्र हैं, या अजन्मा-निर्गुण-अलख कोई और ही हैं?

दोहा

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि१०८

यदि वे राजा के पुत्र हैं, तो फिर वे ब्रह्म कैसे हुए? और यदि वे ब्रह्म हैं, तो पत्नी के वियोग में उनकी बुद्धि इस प्रकार क्यों भ्रमित हुई? उनका चरित्र देखते और सुनते हुए मेरी बुद्धि तो अत्यंत भ्रमित हो जाती है।

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥

यदि वे कोई इच्छारहित, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, तो हे नाथ, मुझे यह भी समझाकर बताइए। मुझे अज्ञानी जानकर मन में क्रोध न लाइएगा, बल्कि जिस प्रकार मेरा यह मोह मिट जाए, वही उपाय कीजिए।

मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥

मैंने वन में राम की वह प्रभुता देखी थी, तब मैं अत्यंत भयभीत और व्याकुल होकर भी आपको नहीं बता सकी। फिर भी मेरे मलिन मन को कोई बोध नहीं हुआ, उसी का यह फल हमें भलीभाँति मिल रहा है।

अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥

अब भी मेरे मन में कुछ संशय बचा है, हे नाथ, कृपा कीजिए, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। तब प्रभु शिवजी ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया — हे नाथ, यह समझकर आप क्रोध न कीजिए।

तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं॥कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा॥

उस समय जो मोह था, वह अब नहीं है, अब मेरे मन में राम-कथा के प्रति ही रुचि है। हे भुजंगराज के आभूषण धारण करने वाले देवनाथ, अब आप वह पवित्र राम-गुण-गाथा कहिए।

दोहा

बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि१०९

मैं पृथ्वी पर सिर टेककर आपके चरणों की वंदना करता हूँ और हाथ जोड़कर विनती करता हूँ — हे मुनि, वेदों के सिद्धांत का सार निकालकर रघुवर का निर्मल यश वर्णन कीजिए।

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥

यद्यपि स्त्री होने के नाते पार्वती इस ज्ञान की अधिकारिणी नहीं थीं, तथापि वे मन, कर्म और वचन से आपकी दासी हैं। साधु पुरुष गूढ़ तत्त्व को कभी नहीं छिपाते, वे जहाँ भी सच्चे जिज्ञासु को पाते हैं, वहाँ अवश्य उपदेश देते हैं।

अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी॥

गिरिजा ने अत्यंत आर्तभाव से पूछा — हे प्रभु, कृपा करके रघुनाथ की कथा कहिए। पहले तो यह विचारकर बताइए कि निर्गुण ब्रह्म ने सगुण शरीर क्यों धारण किया।

पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं॥

फिर हे प्रभु, राम के अवतार की कथा कहिए, और उनका उदार बाल-चरित्र भी सुनाइए। यह भी बताइए कि जानकी से विवाह कैसे हुआ, और राज्य त्यागने में उनका क्या दोष था।

बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला॥

वन में रहकर उन्होंने जो अपार चरित्र किए, हे नाथ, यह भी बताइए कि उन्होंने रावण का वध किस प्रकार किया। राज्य में बैठकर उन्होंने जो अनेक लीलाएँ कीं, हे सुखस्वरूप शंकर, वे सब भी कहिए।

दोहा

बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम।प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम११०

फिर हे करुणा के धाम, यह भी बताइए कि रघुकुलमणि राम ने कैसा आश्चर्यजनक कार्य किया और प्रजा सहित वे अपने धाम को किस प्रकार गए।

पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी॥भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा॥

फिर हे प्रभु, वह तत्त्व भी विस्तार से बताइए, जिसमें ज्ञानी मुनि विज्ञान में लीन हो जाते हैं। भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य — इन सबका भी विभाग सहित वर्णन कीजिए।

औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई॥

और भी जो अनेक राम-रहस्य हों, हे अत्यंत निर्मल विवेक वाले नाथ, वे सब कहिए। हे दयालु, यदि प्रभु, मैंने कुछ पूछना भूल गई हूँ, तो उसे भी छिपाकर मत रखिए।

तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पावर का जाना॥प्रस्न उमा के सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई॥

आप तीनों लोकों के गुरु हैं, वेद यही कहते हैं, फिर मुझ जैसे साधारण जीव की क्या बिसात। उमा का यह छलरहित और सहज सुंदर प्रश्न सुनकर शिवजी के मन को अत्यंत भाया।

हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए॥श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा॥

शिवजी के हृदय में सारा राम-चरित्र उमड़ आया, प्रेम से रोमांच हो आया और नेत्रों में जल भर आया। श्रीरघुनाथ का रूप हृदय में समा गया, और उन्हें अपार परमानंद का सुख मिला।

दोहा

मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह१११

वे दो घड़ी तक ध्यान-रस में लीन रहे, फिर मन को बाहर लाए। तब हर्षित होकर महेश ने रघुपति का चरित्र वर्णन करना आरंभ किया।

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥

जिसे बिना जाने संसार सत्य प्रतीत होता है, वह वास्तव में झूठा ही है — जैसे रस्सी को न पहचानने पर वह सर्प जैसी लगती है। जिसे जान लेने पर संसार मिथ्या हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट जाता है।

बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

मैं उसी बालरूप राम की वंदना करता हूँ, जिसका नाम जपने मात्र से सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल हरने वाले वे प्रभु दशरथ के आँगन में क्रीड़ा करते थे।

करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥

राम को प्रणाम करके त्रिपुरारि ने हर्षित होकर अमृत के समान मधुर वाणी कही — हे गिरिराज-कुमारी, तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है।

पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा॥तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित लागी॥

तुमने रघुपति की कथा का जो प्रसंग पूछा है, वह सारे लोकों को पवित्र करने वाली गंगा के समान है। तुम स्वयं रघुवीर के चरणों की अनुरागी हो, और तुमने यह प्रश्न जगत के हित के लिए ही किया है।

दोहा

रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं११२

हे पार्वती, राम की कृपा से तुम्हारे मन में स्वप्न में भी शोक, मोह, संदेह या भ्रम नहीं है, ऐसा मेरा विचार है।

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥

फिर भी तुमने यह प्रश्न इसी उद्देश्य से किया, ताकि इसे कहने और सुनने से सबका कल्याण हो। जिन्होंने कभी अपने कानों से हरिकथा नहीं सुनी, उनके कान सर्प के बिल के समान हैं।

नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥

जिन नेत्रों ने संतों का दर्शन नहीं किया, वे नेत्र मोरपंख की आँख के समान हैं। जो हरि और गुरु के चरणों में नहीं झुकते, उनका सिर कड़वी तूँबी के समान व्यर्थ है।

जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान ते प्रानी॥जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥

जिनके हृदय में हरिभक्ति नहीं आई, वे प्राणी जीते-जी भी शव के समान हैं। जो राम के गुणों का गान नहीं करता, उसकी जीभ मेंढक की जीभ के समान है।

कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥गिरिजा सुनहु राम के लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥

वज्र के समान कठोर और निष्ठुर है वह छाती, जो हरि-चरित सुनकर भी हर्षित नहीं होती। हे गिरिजा, अब सुनो राम की वे लीलाएँ, जो देवताओं का हित करने वाली और दानवों का मोह मिटाने वाली हैं।

दोहा

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।सतसमाज सुरलोक सब को न सुने अस जानि११३

राम-कथा कामधेनु के समान है, जो सेवा करने वाले को सब सुख देती है। संत-समाज और देवलोक में, जो इसे जानता है, वह भला इसे कैसे न सुने।

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी॥रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥

राम-कथा सुंदर हाथों की ताली के समान है, जो संशय-रूपी पक्षी को उड़ा देती है। राम-कथा कलियुग-रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी के समान है, हे गिरिराज-कुमारी, इसे आदरपूर्वक सुनो।

राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए॥जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥

राम का नाम, गुण और सुंदर चरित्र, उनके अगणित जन्म और कर्म — वेदों ने इन सबका गान किया है। जैसे राम स्वयं अनंत हैं, वैसे ही उनकी कीर्ति और गुणों की कथा भी अनंत है।

तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी॥उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई॥

फिर भी जैसा मैंने सुना है और जितनी मेरी बुद्धि है, उसी के अनुसार तुम्हारा अत्यधिक प्रेम देखकर मैं कहूँगा। उमा का यह प्रश्न सहज, सुंदर, सुखदायी और संतों को भी मान्य होकर मुझे बहुत भाया।

एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥

पर हे भवानी, एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि तुमने वह मोहवश ही कही। तुमने जो कहा कि राम कोई और ही हैं, जबकि वेद उन्हीं का गान करते हैं और मुनि उन्हीं का ध्यान धरते हैं।

दोहा

कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच११४

ऐसी बातें केवल वे अधम मनुष्य कहते-सुनते हैं, जो मोह-रूपी पिशाच से ग्रसित हों — पाखंडी और हरि-चरणों से विमुख लोग ही सत्य और झूठ में भेद नहीं जान पाते।

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी॥लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥

अज्ञानी, मूर्ख, अंधे और अभागे लोग, जिनके मन के दर्पण पर विषय-वासना की काई जमी है। लंपट, कपटी और अत्यंत कुटिल लोग स्वप्न में भी संत-सभा नहीं देख पाते।

कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥

वे वेद के विपरीत बातें कहते हैं, जिन्हें लाभ-हानि की सुध ही नहीं होती। जैसे मैला दर्पण या नेत्रहीन व्यक्ति, वे भला राम के रूप को कैसे देख पाएँ।

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥

जिन्हें न सगुण का बोध है, न निर्गुण का, वे तरह-तरह की कल्पित बातें बकते रहते हैं। वे हरि की माया के वश में होकर जगत में भटकते रहते हैं, इसलिए उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं लगता।

बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना॥

पागल, भूत-ग्रस्त और नशे में डूबे लोग विचारपूर्वक बात नहीं करते। जो महामोह और मद का पान कर चुके हों, उनकी बातों पर कान देना भी उचित नहीं।

सोरठा

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम११५

अपने हृदय में यह विचारकर संशय त्याग दो और राम के चरणों का भजन करो — हे गिरिराज-कुमारी, सुनो, मेरी यह बात भ्रम-रूपी अंधकार के लिए सूर्य के समान है।

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥

सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है, यही मुनि, पुराण और ज्ञानी वेद भी गाते हैं। जो निर्गुण, निराकार, अलख और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण रूप धारण कर लेता है।

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥

जो गुणरहित है, वही सगुण कैसे हो सकता है — जैसे जल और बर्फ के ओले वास्तव में अलग नहीं होते। जिसका नाम भ्रम-रूपी अंधकार के लिए सूर्य के समान है, उसी के विषय में यह मोह भरा प्रश्न कैसे उठाया जाए।

राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥

राम सच्चिदानंद और सूर्य के समान हैं, उनमें मोह-रूपी रात्रि का लेशमात्र भी नहीं है। वे स्वभाव से ही प्रकाशरूप भगवान हैं, उनमें फिर विज्ञान का उदय होने की भी आवश्यकता नहीं।

हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥

हर्ष-विषाद, ज्ञान-अज्ञान, जीव-धर्म और अहंकार — ये सब जीव के गुण हैं। पर राम तो ब्रह्म हैं, संसार में व्यापक हैं, वे परमानंद और सनातन परमेश्वर हैं।

दोहा

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ११६

वे प्रसिद्ध पुरुष, प्रकाश के भंडार, प्रकट रूप से इस लोक और परलोक के स्वामी हैं। रघुकुलमणि वे ही मेरे स्वामी हैं — ऐसा कहकर शिवजी ने सिर झुकाया।

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥

अज्ञानी लोग अपने ही भ्रम को नहीं समझते, और मूढ़ प्राणी प्रभु पर ही मोह का आरोप लगा देते हैं। जैसे आकाश में बादलों का समूह देखकर कुविचार वाले लोग कहते हैं कि सूर्य ही ढक गया।

चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥

जो व्यक्ति उँगली लगाकर आँख टेढ़ी कर लेता है, उसे एक ही चंद्रमा दो दिखाई देने लगते हैं। उमा, राम के विषय में यह मोह भी वैसा ही है, जैसे आकाश में अंधकार, धुआँ या धूल शोभा पाती दिखती है, जबकि वास्तव में वह आकाश का दोष नहीं है।

बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥

विषय, इंद्रियाँ, देवता और जीव सहित सभी एक-दूसरे से बढ़कर चेतन हैं। पर इन सबका परम प्रकाशक जो है, वही अनादि अवधपति राम हैं।

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥

संसार तो प्रकाश्य है, राम स्वयं प्रकाशक हैं, वे मायाधीश और ज्ञान-गुणों के धाम हैं। उन्हीं की सत्यता के कारण जड़ माया भी मोह की सहायता से सत्य जैसी भासती है।

दोहा

रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि११७

जैसे सीप में चाँदी और मृगतृष्णा में सूर्य की किरणों से जल दिखाई देता है, यद्यपि वह तीनों काल में मिथ्या ही है, तथापि उस भ्रम को कोई भी मिटा नहीं सकता।

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥जौं सपनें सिर काटे कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥

इसी प्रकार यह जगत हरि के आश्रय में ही टिका रहता है, यद्यपि यह असत्य है, फिर भी दुःख देता है। जैसे स्वप्न में कोई सिर काट डाले, तो जागे बिना वह दुःख दूर नहीं होता।

जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥

जिसकी कृपा से यह भ्रम मिट जाता है, हे गिरिजा, वही कृपालु रघुराई हैं। जिनका आदि-अंत कोई नहीं पा सका, वेदों ने भी अपनी बुद्धि के अनुमान से ही उनका ऐसा वर्णन किया है।

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

वे बिना पैरों के चलते हैं, बिना कानों के सुनते हैं, बिना हाथों के अनेक प्रकार के कर्म करते हैं। बिना मुख के भी सभी रसों का भोग करते हैं, और बिना वाणी के भी महान वक्ता और योगी हैं।

तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ प्रान बिनु बास असेषा॥असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥

बिना शरीर के स्पर्श करते हैं, बिना नेत्रों के देखते हैं, बिना नाक के भी सारी सुगंध ग्रहण करते हैं। ऐसी सब प्रकार से अलौकिक उनकी लीला है, जिनकी महिमा का वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान११८

जिसे वेद और विद्वान इस प्रकार गाते हैं, जिसका मुनि ध्यान धरते हैं, वही भक्तों के हितकारी, कोसलपति भगवान दशरथ के पुत्र हैं।

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥

काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर, जिनके नाम के बल से वह भी शोकरहित हो जाता है, वही मेरे प्रभु सारे चराचर के स्वामी हैं, वही रघुवर सबके हृदय के अंतर्यामी हैं।

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥

बिना जाने-बूझे भी जो मनुष्य उनका नाम लेते हैं, उनके अनेक जन्मों के रचे पाप भी भस्म हो जाते हैं। जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे भवसागर को गाय के खुर के गड्ढे के समान सरलता से पार कर जाते हैं।

राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥

हे भवानी, वही राम परमात्मा हैं, इसमें भ्रम रखना तुम्हारी वाणी के लिए उचित नहीं। हृदय में ऐसा संशय लाने से ज्ञान, वैराग्य और सारे गुण नष्ट हो जाते हैं।

सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक के रचना॥भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥

शिवजी के इन भ्रम-नाशक वचनों को सुनकर सारे कुतर्क की रचना मिट गई। उमा के मन में रघुपति के चरणों में सच्ची प्रीति और प्रतीति उत्पन्न हो गई, और हृदय का अविश्वास दूर हो गया।

दोहा

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि११९

बार-बार प्रभु के चरण-कमल पकड़कर, अपने कमल जैसे हाथ जोड़कर, गिरिजा प्रेम-रस में सनी हुई सुंदर वाणी में बोलीं।

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ॥

चंद्रमा की किरणों के समान आपकी यह वाणी सुनकर, मेरा शरद ऋतु के प्रचंड ताप जैसा भारी मोह मिट गया। हे कृपालु, आपने मेरा सारा संशय हर लिया, अब मैं राम के सच्चे स्वरूप को समझकर आपके चरणों में गिर पड़ी हूँ।

नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउ प्रभु चरन प्रसादा॥अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी॥

हे नाथ, आपकी कृपा से अब मेरा विषाद जाता रहा, मैं आपके चरणों की कृपा से सुखी हो गई। अब मुझे अपनी सच्ची सेविका जानिए, यद्यपि मैं स्वभाव से मूढ़ और अनजान स्त्री हूँ।

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू॥राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी॥

पहले मैंने जो पूछा था, वही कहिए, यदि प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं। राम ही ब्रह्म हैं, चिन्मय, अविनाशी, सब आसक्तियों से रहित और सबके हृदय-नगर में निवास करने वाले हैं।

नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता॥

हे नाथ, हे वृषकेतु, फिर उन्होंने मनुष्य का शरीर किस कारण धारण किया, यह मुझे समझाकर बताइए। उमा के इन वचनों को सुनकर, जो अत्यंत विनम्र थे और राम-कथा के प्रति उनकी पवित्र प्रीति दर्शाते थे —

दोहा

हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान।बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान१२०(क)

कामदेव के शत्रु सुजान शंकर हृदय से हर्षित हुए, और उमा की बहुत प्रकार से प्रशंसा करके कृपानिधान फिर बोले।

सोरठा

सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़१२०(ख)

हे भवानी, सुनो यह शुभ कथा — यह वही निर्मल रामचरितमानस है, जिसे काकभुशुंडि ने विस्तार से गरुड़ को सुनाया था।

सोरठा

सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ१२०(ग)

वह उदार संवाद जिस प्रकार हुआ, वह आगे कहूँगा; अभी सुनो राम के अवतार का यह परम सुंदर, निष्पाप चरित्र।

सोरठा

हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु१२०(घ)

हरि के गुण, नाम, कथा और रूप अपार और असंख्य हैं। हे उमा, मैं अपनी मति के अनुसार ही तुम्हें कहता हूँ, आदरपूर्वक सुनो।

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥

हे गिरिजा, सुनो हरि का यह सुंदर चरित्र, जिसे वेद और शास्त्रों ने विस्तार से गाया है। हरि अवतार क्यों लेते हैं, इसका पूरा कारण यही है कहकर वर्णन करना संभव ही नहीं है।

राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥

राम बुद्धि, मन और वाणी से परे हैं, हे सयानी, यही मेरा मत सुनो। फिर भी संत, मुनि, वेद और पुराण जो कुछ अपनी बुद्धि के अनुसार कहते हैं —

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥जब जब होइ धरम के हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी॥

हे सुमुखी, वैसा ही मैं तुम्हें सुनाता हूँ, जैसा मुझे समझ में आता है। जब-जब धर्म की हानि होती है और अधम, अभिमानी असुर बढ़ने लगते हैं —

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा॥

जब वे ऐसा अन्याय करते हैं जिसका वर्णन नहीं हो सकता, ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी पीड़ित होने लगते हैं — तब-तब कृपानिधान प्रभु विविध शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।

दोहा

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु१२१

असुरों का वध कर देवताओं को स्थापित करते हैं, वेद की मर्यादा की रक्षा करते हैं, और संसार में अपना निर्मल यश फैलाते हैं — यही राम के जन्म का कारण है।

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥

उसी यश को गाकर भक्त संसार-सागर से तर जाते हैं, कृपासिंधु प्रभु भक्तों के हित के लिए ही शरीर धारण करते हैं। राम के जन्म के अनेक कारण हैं, प्रत्येक एक-दूसरे से बढ़कर विचित्र है।

जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥

हे सुबुद्धि भवानी, सावधान होकर सुनो, मैं एक-दो जन्मों का कारण विस्तार से कहता हूँ। विष्णु के प्रिय दो द्वारपाल थे, जय और विजय, जिन्हें सब कोई जानते हैं।

बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥

ब्राह्मणों के शाप से वे दोनों भाई असुर हुए, उन्होंने तामसी असुर-देह पाई। वे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कहलाए, जो संसार में इंद्र का मद उतारने के लिए विख्यात हुए।

बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥

विजयी और युद्ध में वीर के रूप में विख्यात इनमें से एक को विष्णु ने वराह रूप धारण कर मार डाला। फिर नृसिंह रूप धारण कर दूसरे को मारा, और अपने भक्त प्रह्लाद का सुयश फैलाया।

दोहा

भए निसाचर जाइ तेई महाबीर बलवान।कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान१२२

फिर वे दोनों जाकर महाबली, बलवान राक्षस हुए — कुंभकर्ण और रावण, जो देवताओं को जीतने वाले महान योद्धा के रूप में संसार में जाने जाते हैं।

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥

वे भगवान के हाथों मारे जाने पर भी मुक्त नहीं हुए, क्योंकि ब्राह्मण के वचन के अनुसार उन्हें तीन जन्म लेने थे। एक बार उनके हित के लिए भक्त-प्रेमी भगवान ने शरीर धारण किया।

कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥

उस जन्म में कश्यप और अदिति उनके माता-पिता थे, जो विख्यात दशरथ और कौसल्या के रूप में हुए। एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसार में पवित्र चरित्र किए।

एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥

एक कल्प में देवताओं को दुखी देखा गया, क्योंकि युद्ध में जलंधर से सब हार गए थे। शिवजी ने भी उससे भीषण संग्राम किया, पर वह महाबली दानव मारे भी नहीं मरता था।

परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी॥

उसकी पत्नी परम सती वृंदा थी, उसी के सतीत्व के बल से त्रिपुरारि भी उसे जीत नहीं पा रहे थे।

दोहा

छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह१२३

तब प्रभु ने छल से उसका व्रत भंग किया और देवताओं का कार्य सिद्ध किया। जब उस सती ने यह भेद जाना, तो उसने क्रोधित होकर शाप दे दिया।

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥

उस शाप को कौतुक के भंडार, कृपालु भगवान ने सत्य कर दिखाया। वहीं वह जलंधर आगे रावण हुआ, और युद्ध में मारकर राम ने उसे परम पद दिया।

एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा॥प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥

यह तो एक जन्म का कारण था, जिसके लिए राम ने मनुष्य-देह धारण की। हे मुनि, प्रत्येक अवतार की कथा प्रभु की है, इन्हें कवियों ने बहुत विस्तार से वर्णित किया है, सुनो।

नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि॥

नारदजी ने एक बार शाप दिया था, उसी के कारण एक कल्प में यह अवतार हुआ। यह वाणी सुनकर गिरिजा चकित हो गईं — नारद तो विष्णुभक्त और परम ज्ञानी थे।

कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥

हे पुरारी, मुनि ने किस कारण से शाप दिया, और रमापति ने ऐसा कौन-सा अपराध किया था? यह प्रसंग मुझे बताइए, मुनि के मन में यह मोह कैसे हुआ, यह मुझे बड़ा आश्चर्य लग रहा है।

दोहा

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ११४(क)

तब महेश मुस्कराकर बोले — हे ज्ञानी, संसार में कोई भी मूढ़ नहीं होता; रघुपति जिसको जैसा बनाना चाहते हैं, वह उसी क्षण वैसा हो जाता है।

सोरठा

कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद११४(ख)

हे भरद्वाज, आदरपूर्वक सुनो, मैं राम के गुणों की गाथा कहता हूँ। तुलसीदास कहते हैं — मान और मद त्यागकर संसार-नाशक रघुनाथ का भजन करो।

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥

हिमालय में एक अत्यंत पवित्र गुफा है, जिसके पास सुंदर गंगा बहती है। वहाँ का आश्रम अत्यंत पवित्र और सुहावना था, जिसे देखकर देवर्षि नारद का मन बहुत प्रसन्न हुआ।

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

उस पर्वत, नदी और वन के भाग को देखकर नारदजी को रमापति के चरणों में अनुराग हुआ। हरि का स्मरण करते हुए भी शाप की गति ने उन्हें रोका नहीं, और उनके सहज निर्मल मन में समाधि लग गई।

मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥

मुनि की यह समाधि-अवस्था देखकर इंद्र डर गए, उन्होंने कामदेव को बुलाकर उसका सम्मान किया — मेरे लिए सहायकों सहित तुम जाओ। जलचरकेतु हृदय में हर्षित होकर चल पड़ा।

सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥

इंद्र के मन में यह भय था कि कहीं देवर्षि नारद मेरा पद न चाहने लगें। संसार में जो कामी और लोभी लोग होते हैं, वे कौवे की भाँति सबसे कुटिलता से डरते रहते हैं।

दोहा

सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज१२५

सूखी हड्डी लेकर भागता मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर भी उसे छीनने से नहीं डरता — मूर्ख को कभी लाज नहीं आती, वैसे ही इंद्र को भी कोई लाज नहीं थी।

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा॥

जब कामदेव उस आश्रम में गया, तो उसने अपनी माया से वहाँ वसंत ऋतु उत्पन्न कर दी। अनेक रंगों के वृक्ष फूलों से लद गए, कोयलें कूकने लगीं और भँवरे गुनगुनाने लगे।

चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना॥

तीनों प्रकार की सुखद बयार बहने लगी, जो कामाग्नि को और भड़काने वाली थी। रंभा आदि नई-नई देवांगनाएँ, जो कामदेव के बाणों को भी मात करने वाली कला में प्रवीण थीं, वहाँ आ पहुँचीं।

करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा॥देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥

वे अनेक मधुर तानों में गीत गातीं और हाथों में तितलियाँ लिए तरह-तरह से क्रीड़ा करतीं। यह सब देखकर कामदेव हर्षित हुआ और उसने अनेक प्रकार के और भी प्रपंच रचे।

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भय डरेउ मनोभव पापी॥सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू॥

पर कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी; उलटे पापी कामदेव स्वयं अपने भय से डर गया। उसकी सीमा को भला कौन दबा सकता है, जिसका महान रक्षक स्वयं रमापति हो।

दोहा

सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन१२६

सहायकों सहित अत्यंत भयभीत होकर, मन में हार मानकर कामदेव जाकर मुनि के चरणों में गिर पड़ा और अत्यंत दीन वचन कहने लगा।

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥

नारदजी के मन में तनिक भी क्रोध नहीं हुआ, उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव को संतुष्ट किया। चरणों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर, कामदेव अपने सहायकों सहित वहाँ से चला गया।

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥

मुनि की इस सुशीलता की, अपनी करनी सहित, इंद्र ने जाकर सभी की सभा में विस्तार से चर्चा की। यह सुनकर सबके मन में आश्चर्य हुआ, और मुनि की प्रशंसा करके सबने हरि को सिर नवाया।

तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥

तब नारदजी शिवजी के पास गए, उनके मन में यह अभिमान था कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है। उन्होंने शिवजी को कामदेव-विजय का सारा चरित्र सुनाया; महेश ने उन्हें अत्यंत प्रिय जानकर एक सीख दी।

बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं॥तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ॥

महेश ने कहा — हे मुनि, मैं बार-बार तुमसे विनती करता हूँ, जिस प्रकार तुमने यह कथा मुझे सुनाई है, उसी प्रकार भूलकर भी कभी इसे विष्णु को मत सुनाना; इस प्रसंग को उनसे सदा छिपाकर ही रखना।

दोहा

संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान१२७

शिवजी ने यह हितकारी उपदेश दिया, पर नारदजी को यह अच्छा नहीं लगा। हे भरद्वाज, अब यह कौतुक सुनो — हरि की इच्छा सचमुच कितनी बलवान होती है।

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥

राम जो चाहते हैं, वही होकर रहता है, कोई भी उसे अन्यथा नहीं कर सकता। शिवजी का यह वचन मुनि नारद के मन को नहीं भाया, और वे तुरंत ब्रह्माजी के लोक चले गए।

एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥

एक बार हाथों में सुंदर वीणा लिए, हरि के गुणों का प्रवीणतापूर्वक गान करते हुए मुनिनाथ नारद क्षीरसागर गए, जहाँ वेदों के भी शिरोमणि श्रीनिवास निवास करते हैं।

हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥

रमानिकेत विष्णु उठकर हर्षित होकर उनसे मिले, और मुनि सहित आसन पर बैठे। तीनों लोकों के स्वामी मुस्कराकर बोले — मुनिवर, तुमने बहुत दिनों बाद मुझ पर कृपा की।

काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥अति प्रचंड रघुपति के माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥

नारदजी ने कामदेव-विजय की सारी कथा सुना दी, यद्यपि पहले शिवजी ने उन्हें ऐसा करने से रोका था। रघुपति की माया अत्यंत प्रचंड है, संसार में ऐसा कौन जन्मा है जिसे यह मोहित न कर सके।

दोहा

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान१२८

श्रीभगवान ने रूखा-सा मुख बनाकर, फिर भी मृदु वाणी में कहा — हे मुनि, तुम्हारे स्मरण मात्र से ही मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं।

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके॥ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥

हे मुनि, सुनो, मोह उसी के मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान और वैराग्य नहीं होता। तुम तो ब्रह्मचर्य-व्रत में रत, धीर बुद्धि वाले हो, भला तुम्हें कामदेव कैसे पीड़ा दे सकता है!

नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥

नारदजी ने अभिमानपूर्वक कहा — हे भगवान, यह सब आपकी ही कृपा है। करुणानिधान विष्णु ने मन में विचारकर देख लिया कि नारद के हृदय में गर्व का बड़ा वृक्ष अंकुरित हो चुका है।

बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई॥

मैं शीघ्र ही उसे उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवक का हित करना ही मेरा व्रत है। मुनि का भला भी हो और मेरा भी कौतुक बना रहे, इसी के अनुरूप मैं अवश्य कोई उपाय करूँगा।

तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥

तब नारदजी हरि के चरणों में सिर नवाकर वहाँ से चले, पर उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। तब श्रीपति ने अपनी माया को प्रेरित किया, सुनो उसकी कठिन करनी।

दोहा

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार१२९

उस माया ने मार्ग में सौ योजन विस्तार का एक नगर रच दिया, जो विष्णुलोक से भी बढ़कर अनेक प्रकार की रचनाओं से सजा था।

बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥

उस नगर में सुंदर स्त्री-पुरुष निवास करते थे, मानो अनेक कामदेव और रति ही मनुष्य-देह धारण किए हों। उस नगर में शीलनिधि नामक राजा रहते थे, जिनके पास अगणित घोड़े-हाथी और सेना का समूह था।

सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥

उनका वैभव और विलास सौ इंद्रों के समान था, वे रूप, तेज, बल और नीति के धाम थे। उनकी पुत्री विश्वमोहिनी थी, जिसका रूप देखते ही लक्ष्मी भी मोहित हो जाए।

सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥

वह सब गुणों की खान वास्तव में हरि की ही माया थी, जिसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। उस राजकुमारी का स्वयंवर रचा गया, जिसमें अनगिनत राजा वहाँ आए।

मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥

कौतुकी मुनि नारद भी उस नगर में गए, और नगरवासियों से सब हाल पूछने लगे। सारा वृत्तांत सुनकर वे राजा के महल आए, राजा ने उनकी पूजा करके उन्हें आसन दिया।

दोहा

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि१३०

राजा ने राजकुमारी को लाकर नारद को दिखाया — हे नाथ, आप हृदय में विचारकर इसके सारे गुण-दोष बताइए।

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥

उसका रूप देखकर मुनि अपना वैराग्य भूल गए, बहुत देर तक उसे निहारते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर वे मोहित हो गए, पर हृदय का हर्ष प्रकट नहीं होने दिया।

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥

जो इससे विवाह करेगा, वह अमर हो जाएगा, समरभूमि में उसे कोई नहीं जीत सकेगा। सारे चराचर उसकी सेवा करेंगे, जिससे शीलनिधि की यह कन्या विवाह करेगी।

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥

सारे लक्षण विचारकर मन में रख लिए, और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया — कन्या के गुण-लक्षण बताकर नारद वहाँ से चल दिए, पर मन में एक चिंता लिए हुए।

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥

सोच-विचारकर अब मैं वही उपाय करूँ, जिससे यह कुमारी मुझे ही वरे। इस समय जप-तप से तो कुछ काम बनेगा नहीं, हे विधाता, यह बाला किस उपाय से मिलेगी।

दोहा

एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल१३१

इस अवसर पर परम शोभा और विशाल रूप चाहिए, जिसे देखकर कुमारी रीझ जाए और तभी जयमाला पहना दे।

हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥

क्यों न मैं हरि से सुंदरता माँग लूँ — पर भाई, वहाँ जाने में तो बहुत देर हो जाएगी। मेरे हित के लिए हरि के समान कोई नहीं, इस अवसर पर वे ही सहायक हो सकते हैं।

बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥

उस समय उन्होंने बहुत प्रकार से विनती की, तब कौतुकी कृपालु प्रभु प्रकट हो गए। प्रभु को देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए, हृदय में हर्षित होकर सोचा — अब मेरा कार्य सिद्ध होगा।

अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥

उन्होंने अत्यंत आर्तभाव से सारी कथा कह सुनाई — कृपा कीजिए, सहायक बनिए। हे प्रभु, मुझे अपना ही रूप दीजिए, अन्यथा मुझे वह कन्या नहीं मिल पाएगी।

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥

हे नाथ, जिस प्रकार मेरा हित हो, वही शीघ्र कीजिए, मैं आपका दास हूँ। अपनी विशाल माया-शक्ति दिखाकर दीनदयालु प्रभु हृदय में मुस्कराकर बोले —

दोहा

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार१३२

हे नारद, सुनो, जिस प्रकार तुम्हारा परम हित होगा, हम वही करेंगे, अन्य कुछ नहीं। हमारा वचन कभी असत्य नहीं होता।

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥

सुनो हे योगी मुनि, जैसे व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता — इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित ही किया है — यह कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए।

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥

माया के वश होकर मूढ़ मुनि हरि की गूढ़ वाणी को समझ न सके। वे तुरंत वहाँ चल दिए, जहाँ स्वयंवर की भूमि सजाई गई थी।

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें॥

सभी राजा अपने-अपने आसनों पर बहुत सज-धजकर समाज सहित बैठे थे। मुनि के मन में हर्ष था — मेरा रूप अत्यंत सुंदर है, कन्या मुझे छोड़कर भूल से भी किसी और को नहीं वरेगी।

मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥

कृपानिधान प्रभु ने मुनि के हित के लिए ही उन्हें ऐसा कुरूप दे दिया था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उस लीला को कोई भी समझ नहीं पाया, केवल नारद जानकर सबको सिर नवाते फिरे।

दोहा

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेऊ१३३

वहाँ शिवजी के दो गण भी उपस्थित थे, जो सारा भेद जानते थे। वे ब्राह्मण-वेष धारण किए, बड़े कौतुक से वहाँ घूम रहे थे।

जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥

जिस सभा में मुनि जाकर बैठे, उनके हृदय में अपने रूप का बड़ा अभिमान था। वहीं शिवजी के दोनों गण भी बैठे थे, ब्राह्मण-वेष में होने के कारण कोई उनकी असली पहचान नहीं जान सका।

करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥

वे नारद से चुपके-चुपके ठिठोली करने लगे — हरि ने आपको अच्छी सुंदरता दी है! राजकुमारी आपकी छवि देखकर रीझ जाएगी, और विशेष रूप से आपको ही पहचानकर वरेगी।

मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥

मुनि का मन इस मोह से बिल्कुल हाथ से निकल गया था, शिवजी के गण यह देखकर बहुत सुखी होकर हँसते रहे। यद्यपि मुनि उनकी उलटी-सीधी बातें सुनते रहे, पर बुद्धि भ्रम में सनी होने के कारण कुछ समझ न पाए।

काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥

कोई भी उस विशेष लीला को नहीं समझ सका। राजकुमारी ने जब उन्हें देखा, तो उनका असली रूप दिखाई दिया — बंदर के मुख जैसी भयंकर देह देखकर उसके हृदय में क्रोध उत्पन्न हुआ।

दोहा

सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल१३४

सखियों को साथ लेकर कुमारी तब राजहंसिनी के समान चलने लगी, हाथ में कमल जैसी जयमाला लिए, सभी राजाओं को निहारती फिरी।

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं॥

जिस दिशा में नारद फूले हुए बैठे थे, राजकुमारी भूलकर भी उस दिशा की ओर नहीं देख रही थी। मुनि बार-बार उतावले होकर व्याकुल हो रहे थे, उनकी यह दशा देखकर शिवजी के गण मुस्कराते रहे।

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥

कृपालु प्रभु ने वहाँ राजा का सुंदर रूप धारण करके पहुँचे, कुमारी ने हर्षित होकर उन्हें ही जयमाला पहना दी। लक्ष्मीनिवास दुल्हन को लेकर चले गए, और सारा राजसमाज निराश हो गया।

मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥

मुनि अत्यंत विकल हो उठे, उनकी बुद्धि भी भ्रमित हो गई, मानो गाँठ खुल जाने से मणि पर्वत से गिर पड़ी हो। तब शिवजी के गण मुस्कराते हुए बोले — जाकर अपना मुख दर्पण में तो देखिए।

अस कहि दोउ भागे भय भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥

यह कहकर वे दोनों बड़े भय से भाग खड़े हुए, और मुनि ने जल में देखकर अपना मुख निहारा। अपना वेष देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया, और उन्होंने उन दोनों गणों को अत्यंत कठोर शाप दे दिया।

दोहा

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोऊ।हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ१३५

तुम दोनों कपटी-पापी निशाचर होकर जन्म लो — जाओ! तुमने हमारी हँसी उड़ाई थी, इसी का फल भोगो; फिर कभी किसी मुनि की हँसी मत उड़ाना।

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं॥

फिर जल में उन्होंने अपना असली रूप देखा, पर फिर भी हृदय में संतोष नहीं आया। क्रोध से होंठ फड़कते हुए, वे तुरंत ही कमलापति के पास चल दिए।

देह श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई॥बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥

यह शाप दूँ या जाकर मर ही जाऊँ, संसार में मेरी हँसी उड़वाने वाले को! रास्ते में ही उन्हें दैत्यों के शत्रु विष्णु मिले, साथ में वही राजकुमारी बनी लक्ष्मी थीं।

बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥

देवताओं के स्वामी विष्णु ने मधुर वचन कहे — हे मुनि, आप ऐसे व्याकुल होकर कहाँ चले? यह वचन सुनते ही नारद को अत्यंत क्रोध आया, माया के वश उनके मन में बुद्धि न रही।

पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु॥

तुम दूसरे की संपत्ति देख ही नहीं सकते, तुम्हें विशेष रूप से ईर्ष्या और कपट भरा स्वभाव है। तुमने समुद्र-मंथन में शिवजी को भी विष पिलाकर व्याकुल कर दिया था, देवताओं को उकसाकर।

दोहा

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु१३६

असुरों को मदिरा, शिवजी को विष, और स्वयं सुंदर लक्ष्मी और मणि तुमने ले ली — तुम सदा स्वार्थ-साधक, कुटिल और कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले हो।

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावई मनहि करहु तुम्ह सोई॥भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥

तुम्हारे सिर पर कोई नियंत्रण नहीं, तुम पूर्ण स्वतंत्र होकर जो मन में आए वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला बना देते हो, तुम्हारे हृदय में न विस्मय होता है, न हर्ष।

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥

तुमने सबको बहला-फुसलाकर धोखा दिया है, तुम्हारा मन सदा निडर और उत्साहित रहता है। शुभ-अशुभ कर्मों का बंधन तुम्हें नहीं रोकता, अब तक किसी ने तुम्हें साधा नहीं है।

भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥

अब भले घर में तुमने यह छल-भरा उपहार दिया है, अपने ही किए का फल तुम पाओगे। तुमने जिस रूप में मुझे ठगा है, यह मेरा शाप है कि तुम स्वयं वही रूप धारण करो —

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥

तुमने मुझे बंदर की आकृति दी थी, इसलिए अब बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरा भारी अपकार किया है, इसलिए तुम भी स्त्री के वियोग में दुखी होओगे।

दोहा

श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।निज माया के प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि१३७

प्रभु ने वह शाप हर्षित हृदय से सिर चढ़ाकर स्वीकार किया, और बहुत विनती की; अपनी माया की प्रबलता समेटकर कृपानिधान ने उसे वापस ले लिया।

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥

जब हरि ने अपनी माया दूर हटाई, तो वहाँ न लक्ष्मी थीं, न राजकुमारी। तब मुनि अत्यंत भयभीत होकर हरि के चरण पकड़कर बोले — हे शरणागत की पीड़ा हरने वाले, मेरी रक्षा कीजिए।

मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥

हे कृपालु, मेरा यह शाप मिथ्या हो जाए — दीनदयालु प्रभु बोले, यह तो मेरी ही इच्छा थी। मैंने तो तुम्हें बहुत दुर्वचन कहे थे, मुनि ने कहा, अब मेरे पाप कैसे मिटेंगे?

जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा॥कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥

जाकर शिवजी के सौ नाम जपो, तुम्हारे हृदय को तुरंत शांति मिलेगी। मुझे शिवजी के समान कोई प्रिय नहीं, इस विश्वास को भूलकर भी मत त्यागना।

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥

जिस पर त्रिपुरारि कृपा नहीं करते, वह मुनि हमारी भक्ति भी नहीं पा सकता — यह हृदय में धारण कर पृथ्वी पर विचरण करो, अब तुम्हें माया निकट नहीं आएगी।

दोहा

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान१३८

प्रभु ने मुनि को बहुत प्रकार से समझाकर तब अंतर्धान हो गए; नारदजी राम के गुण गाते हुए सत्यलोक की ओर चल दिए।

हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी॥अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥

शिवजी के गणों ने मुनि को मार्ग में जाते देखा, तो मोह से मुक्त होकर उनका मन विशेष रूप से हर्षित हुआ। अत्यंत भयभीत होकर वे नारद के पास आए, और उनके चरण पकड़कर दीन वचन कहे।

हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥

हे मुनिराज, हम ब्राह्मण नहीं हैं, हमने बड़ा अपराध किया, जिसका यह फल पाया। हे कृपालु, अब शाप और अनुग्रह दोनों आप ही कीजिए — तब दीनदयालु नारद बोले।

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥

तुम दोनों जाकर राक्षस बनो, महान वैभव, तेज और बल पाओ। जब तुम अपनी भुजाओं के बल से सारे विश्व को जीत लोगे, तब विष्णु मनुष्य-शरीर धारण करेंगे।

समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥

युद्ध में हरि के ही हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी, और तब तुम मुक्त हो जाओगे, फिर संसार में नहीं भटकोगे। दोनों गण मुनि के चरणों में सिर नवाकर चले, और समय आने पर राक्षस होकर जन्मे।

दोहा

एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार१३९

एक कल्प में इसी कारण प्रभु ने मनुष्य-अवतार लिया — देवताओं को आनंद देने वाला, सज्जनों को सुख देने वाला, और पृथ्वी का भार हरने वाला।

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥

इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म सुंदर, सुखदायी और अत्यंत विचित्र हैं। प्रत्येक कल्प में प्रभु अवतार लेते हैं और नाना प्रकार की सुंदर लीलाएँ करते हैं।

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥

उस-उस कल्प की कथाएँ मुनीश्वरों ने गाई हैं, और परम पवित्र ग्रंथों में उन्हें रचा है। विविध अनुपम प्रसंगों का वर्णन सुनकर बुद्धिमान लोग आश्चर्य नहीं करते।

हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥

हरि अनंत हैं, और उनकी कथाएँ भी अनंत हैं, सभी संत उन्हें अनेक प्रकार से कहते-सुनते हैं। रामचंद्र के सुंदर चरित्र तो करोड़ों कल्पों में भी पूरी तरह नहीं गाए जा सकते।

यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।। सेवत सुलभ सकल दुख हारी॥

हे भवानी, यह प्रसंग मैंने इसलिए कहा कि हरि की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोहित कर देती है। प्रभु कौतुकी, शरणागत का हित करने वाले, सेवा करने में सुलभ और सबका दुःख हरने वाले हैं।

सोरठा

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि१४०

देवता, मनुष्य या मुनि — कोई भी ऐसा नहीं जिसे यह प्रबल मोह-माया न घेरे। यही सोचकर मन-ही-मन उस महामाया के स्वामी की ही उपासना करनी चाहिए।

अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥

हे शैलकुमारी, अब एक और कारण सुनो, यह विचित्र कथा मैं विस्तार से कहता हूँ — जिस कारण अजन्मा, निर्गुण और निराकार ब्रह्म ने अयोध्यापुरी के भूषण के रूप में जन्म लिया।

जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥

जिस प्रभु को तुमने वन में फिरते देखा था, भाई सहित मुनि-वेष धारण किए हुए, जिनका चरित्र देखकर तुम सती-शरीर में मोहित हो गई थीं —

अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥

आज भी तुम्हारी उसकी छाया पूरी तरह नहीं मिटी है — उन्हीं का वह चरित्र सुनो, जो भ्रम-रोग को हरने वाला है। उस अवतार में उन्होंने जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा।

भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी॥लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥

भरद्वाज मुनि शिवजी की यह वाणी सुनकर, और उमा भी सकुचाकर प्रेमपूर्वक मुस्कराईं। वृषकेतु फिर उस अवतार का वर्णन करने लगे, जिस कारण से वह हुआ था।

दोहा

सो मैं तुम्ह सन कहऊँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ।राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ१४१

वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ, हे मुनीश्वर, मन लगाकर सुनो — यह राम-कथा कलियुग के पापों को हरने वाली और सुंदर मंगल करने वाली है।

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥

स्वायंभुव मनु और शतरूपा, जिनसे यह अनुपम मानव-सृष्टि उत्पन्न हुई — उस दंपति का धर्माचरण इतना उत्तम था कि आज भी वेद उनकी कीर्ति गाते हैं।

नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू॥लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही॥

राजा उत्तानपाद उन्हीं के पुत्र थे, जिनके पुत्र ध्रुव प्रसिद्ध हरिभक्त हुए। उनके छोटे पुत्र का नाम प्रियव्रत था, जिनकी वेद-पुराण भी प्रशंसा करते हैं।

देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥

फिर देवहूति उन्हीं मनु की पुत्री थीं, जो मुनि कर्दम की प्रिय पत्नी बनीं। आदिदेव, दीनदयालु प्रभु ने उन्हीं के गर्भ से कृपालु कपिल के रूप में जन्म लिया।

सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥

उन्होंने ही सांख्य-शास्त्र का प्रकट रूप से प्रवचन किया, वे तत्त्व-विचार में निपुण भगवान थे। उन्हीं मनु ने बहुत काल तक राज्य किया, और प्रभु की आज्ञा का हर प्रकार से पालन किया।

सोरठा

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु१४२

घर में रहते-रहते जब बुढ़ापे की चौथी अवस्था आई, तब भी विषयों से वैराग्य नहीं हुआ। उनके हृदय में बड़ा दुःख हुआ — यह सारा जन्म हरिभक्ति के बिना ही बीत गया।

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥

तब उन्होंने बलपूर्वक राज्य पुत्र को सौंप दिया, और पत्नी सहित वन को चल दिए। वहाँ विख्यात नैमिषारण्य तीर्थ था, जो अत्यंत पवित्र और साधकों को सिद्धि देने वाला था।

बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥

वहाँ मुनियों और सिद्धों का समाज निवास करता था, यह जानकर राजा मनु हृदय में हर्षित होकर वहाँ चल दिए। मार्ग में जाते हुए वे धीर बुद्धि वाले ऐसे शोभा पा रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ने ही शरीर धारण कर लिया हो।

पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥

जाकर वे गोमती नदी के तट पर पहुँचे, हर्षित होकर निर्मल जल में स्नान किया। धर्मधुरंधर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आए।

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनि सकल सादर करवाए॥कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥

जहाँ-जहाँ सुंदर तीर्थ थे, मुनियों ने आदरपूर्वक सब कराए। दुबले शरीर पर मुनियों जैसा वस्त्र धारण किए, वे नित्य संत-समाज में पुराण सुनते रहे।

दोहा

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग१४३

फिर वे बारह अक्षर के मंत्र को अनुराग सहित जपते, दंपति का मन वासुदेव के चरण-कमलों में अत्यंत लीन रहता।

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥

वे साग-फल-कंद का ही आहार करते और सच्चिदानंद ब्रह्म का स्मरण करते रहते। फिर हरि की प्राप्ति के लिए तप करने लगे, केवल जल पर रहकर मूल-फल का भी त्याग कर दिया।

उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥

उनके हृदय में निरंतर यही अभिलाषा रहती — काश अपनी आँखों से उन्हीं परम प्रभु का दर्शन हो जाए। जो निर्गुण, अखंड, अनंत और अनादि हैं, जिन्हें परमार्थवादी ही चिंतन कर पाते हैं —

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥

जिन्हें वेद नेति-नेति कहकर ही निरूपित करते हैं, जो अपने आनंद में स्थित, निरुपाधि और अनुपम हैं। शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान भी जिनके अंश से अनेक रूपों में उत्पन्न होते हैं —

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा॥

ऐसे प्रभु भी अपने सेवक के वश में रहते हैं, भक्तों के लिए ही वे लीला-शरीर धारण करते हैं। यदि यह वेद-वचन सत्य है, तो हमारी भी यह अभिलाषा अवश्य पूरी होगी।

दोहा

एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार१४४

इस प्रकार पाँच सौ वर्ष केवल जल पीकर बीत गए, फिर सात हजार वर्ष तक वे केवल वायु के सहारे रहे।

बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥

फिर दस हजार वर्ष तक उन्होंने वह भी त्याग दिया, और एक पैर पर खड़े रहकर तप किया। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी उनका अपार तप देखकर मनु के पास कई बार आए।

मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥

उन्होंने अनेक प्रकार से वरदान माँगने का लोभ दिखाया, पर परम धैर्यवान मनु अपने संकल्प से टस से मस न हुए। उनका शरीर हड्डी मात्र रह गया, फिर भी मन में तनिक भी पीड़ा न हुई।

प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥

प्रभु ने उन्हें अपना ही सच्चा दास और अनन्य शरणागत तपस्वी राजा-रानी जानकर, आकाश से अत्यंत गंभीर और कृपा-अमृत में सनी वाणी हुई — माँगो, माँगो, वर माँगो।

मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥

वह मृतक को भी जीवित करने वाली मधुर वाणी जब कानों के छिद्रों से होकर हृदय में पहुँची —

ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥

वे हृष्ट-पुष्ट और सुंदर शरीर पाकर मानो अभी-अभी अपने घर से लौट आए हों।

दोहा

श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात१४५

कानों को अमृत जैसी लगने वाली उस वाणी को सुनकर, रोमांचित और प्रफुल्लित शरीर से, मनु ने दंडवत प्रणाम करते हुए कहा — हृदय में प्रेम समाया नहीं जा रहा।

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥

हे सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु समान प्रभु, ब्रह्मा-विष्णु-शिव भी जिनकी चरण-रज की वंदना करते हैं। सेवा करने में सुलभ, सबको सुख देने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले, सारे चराचर के स्वामी —

जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥

यदि अनाथों के हित के लिए आपका हम पर स्नेह है, तो प्रसन्न होकर यही वरदान दीजिए — जो रूप शिवजी के मन में सदा बसा रहता है, जिसके लिए मुनि तप करते हैं,

जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥

जो काकभुशुंडि के मानस-सरोवर में हंस के समान क्रीड़ा करता है, जिसे वेद सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में सराहते हैं — वही रूप, हे शरणागत की पीड़ा हरने वाले, कृपा करके हमें नेत्र भरकर दिखाइए।

दंपति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥

दंपति के ये कोमल, विनम्र और प्रेम-रस में डूबे वचन प्रभु को अत्यंत प्रिय लगे। भक्तवत्सल कृपानिधान, संसार के आधार भगवान प्रकट हो गए।

दोहा

नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम१४६

नीले कमल, नीलमणि और नीले बादल के समान श्याम वर्ण था, जिसकी शोभा को देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाएँ।

सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥

शरद ऋतु के चंद्रमा जैसा सुंदर मुख था, सुंदर कपोल, ठोड़ी और शंख जैसी ग्रीवा। लाल होंठ, सुंदर दाँत, सुंदर नासिका, और चंद्रमा की किरणों को भी लज्जित करने वाली मुस्कान।

नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥

नए कमल जैसे सुंदर नेत्र थे, जिनकी चितवन अत्यंत मनोहर और मन को भाने वाली थी। भौंहें कामदेव के धनुष की छटा को भी मात करने वाली थीं, ललाट पर तिलक की आभा शोभा दे रही थी।

कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥

मकर के आकार के कुंडल और मुकुट सिर पर सुशोभित थे, घुँघराले केश मानो भँवरों का समूह हों। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न और सुंदर वनमाला थी, पदक, हार और मणियों के आभूषण थे।

केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥

गले में सिंह जैसी सुदृढ़ गर्दन पर सुंदर यज्ञोपवीत था, भुजाओं पर भी वैसे ही सुंदर आभूषण थे। हाथी की सूँड़ जैसी सुंदर लंबी भुजाएँ थीं, कमर में तरकश और हाथ में धनुष-बाण।

दोहा

तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि१४७

बिजली को भी लज्जित करने वाला पीला वस्त्र था, उदर पर तीन सुंदर रेखाएँ थीं। मनोहर नाभि मानो यमुना के भँवर की शोभा को भी मात कर रही थी।

पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥

उनके चरण-कमलों का वर्णन नहीं किया जा सकता, जिनमें मुनियों के मन रूपी भँवरे निवास करते हैं। बाईं ओर अनुकूल भाव से शोभा पा रही थीं आदिशक्ति, शोभा की निधि, जगत की मूल जननी।

जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥

जिनके अंश से गुणों की खान अनगिनत लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं, जिनकी भौंहों के इशारे मात्र से संसार चलता है — राम के बाईं ओर वही सीता विराजमान थीं।

छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥

छवि के समुद्र हरि के रूप को देखकर मनु और शतरूपा एकटक निहारते रह गए, उनकी पलकें मानो नेत्रों के द्वार को रोककर रह गई थीं। वे आदरपूर्वक उस अनुपम रूप को निहारते रहे, पर तृप्ति ही न होती थी।

हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥

हर्ष से अभिभूत होकर उनकी शरीर की सुध-बुध भूल गई, वे दंड के समान गिरकर प्रभु के चरण पकड़ने लगे। प्रभु ने अपने कमल जैसे हाथों से उनके सिर का स्पर्श किया और करुणा के भंडार ने उन्हें तुरंत उठा लिया।

दोहा

बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि१४८

कृपानिधान फिर बोले — मुझे प्रसन्न जानकर, हे महादानी, अपने मन के अनुकूल कोई भी वर माँग लो।

सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥

प्रभु के ये वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर, धैर्य धारण कर मनु मृदु वाणी में बोले — हे नाथ, आपके चरण-कमलों का दर्शन पाकर अब हमारी सारी कामनाएँ पूरी हो गईं।

एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं॥तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥

फिर भी हृदय में एक बड़ी लालसा है, जो सहज होकर भी कहना कठिन जान पड़ती है — हे स्वामी, यद्यपि आपके लिए इसे पूरा करना अत्यंत सहज है, पर मुझे अपनी ही संकोच-वृत्ति के कारण यह कठिन लग रहा है।

जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥

जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति कल्पवृक्ष पाकर भी बहुत संपत्ति माँगने में सकुचाता है, क्योंकि वह उसका प्रभाव नहीं जानता — वैसे ही, हे प्रभु, मेरे हृदय में भी संशय हो रहा है।

सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥

हे अंतर्यामी, आप स्वयं मेरे मन की बात जानते हैं, हे स्वामी, मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिए। संकोच छोड़कर माँगो, हे राजा, मुझसे तुम्हें कुछ भी अदेय नहीं है।

दोहा

दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ१४९

दानियों के शिरोमणि, कृपानिधान नाथ ने सच्चे भाव से कहा — हे प्रभु, आप जैसा ही पुत्र चाहता हूँ, फिर स्वामी के सामने भला क्या छिपाव।

देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥

मनु की प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान बोले — एवमस्तु। मैं अपने ही समान कहाँ जाकर खोजूँ — हे राजा, मैं स्वयं आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा।

सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे॥जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥

शतरूपा की ओर देखकर, हाथ जोड़कर कहा — हे देवी, तुम्हें जो अच्छा लगे वह वर माँग लो। हे कृपालु, जो वर चतुर राजा ने माँगा, वह मुझे अत्यंत प्रिय लगा।

प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥

पर हे प्रभु, यह बड़ी ढिठाई होगी, यद्यपि भक्तों के हित के लिए आपको यह अच्छा भी लगता है। आप तो ब्रह्मा आदि के भी जनक और जगत के स्वामी हैं, आप ही ब्रह्मा सहित सबके हृदय के अंतर्यामी हैं।

अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥

ऐसा सोचते ही मन में संदेह होता है — पर जो प्रभु ने कहा है, वही प्रमाण मानकर स्वीकार करती हूँ। हे नाथ, जो आपके सच्चे भक्त होते हैं, जो सुख वे पाते हैं, जो गति वे प्राप्त करते हैं,

दोहा

सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु१५०

वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही आपके चरणों का स्नेह, वही विवेक और वही रहन-सहन — हे प्रभु, कृपा करके हमें भी वही दीजिए।

सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥

यह कोमल, गूढ़ और सुंदर श्रेष्ठ रचना सुनकर कृपासिंधु मृदु वचन बोले — जो कुछ तुम्हारे मन में अभिलाषा है, मैंने वह सब दे दी, इसमें कोई संदेह नहीं।

मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी॥

हे माता, तुम्हारा विवेक अलौकिक है, इसके लिए मेरा अनुग्रह कभी कम नहीं होगा। प्रभु के चरणों की वंदना करके मनु ने फिर कहा — हे प्रभु, मेरी एक और विनती है।

सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥

मेरे पुत्र के हृदय में, हे स्वामी, आपके चरणों में निःसंकोच प्रीति हो, चाहे मुझे कोई कितना ही मूढ़ क्यों न कहे। जैसे साँप बिना मणि के और मछली बिना जल के नहीं रह सकती, वैसे ही मेरा जीवन सदा आप ही पर आधारित रहे।

अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥

ऐसा वर माँगकर मनु प्रभु के चरण पकड़े ही रहे, करुणानिधान ने कहा — एवमस्तु। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर जाकर इंद्रलोक में निवास करो।

सोरठा

तहँ करि भोग बिसाल तात गए कछु काल पुनि।होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत१५१

वहाँ बहुत काल तक विशाल भोग भोगकर, फिर कुछ समय बाद तुम अयोध्या के राजा बनोगे, तब मैं ही तुम्हारा पुत्र बनूँगा।

इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे॥अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥

अपनी इच्छा से मनुष्य-वेष धारण कर मैं तुम्हारे घर में प्रकट होऊँगा। हे तात, अपने अंशों सहित शरीर धारण कर मैं भक्तों को सुख देने वाली लीलाएँ करूँगा।

जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥

जिन्हें आदरपूर्वक सुनकर बड़भागी मनुष्य ममता और मद त्यागकर संसार-सागर से पार हो जाएँगे। जिन आदिशक्ति ने इस जगत को उत्पन्न किया, वे भी मेरी इस माया के रूप में अवतरित होंगी।

पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥

मैं तुम्हारी अभिलाषा अवश्य पूरी करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, यह मेरी प्रतिज्ञा सत्य है। इस प्रकार बार-बार कहकर करुणानिधान भगवान अंतर्धान हो गए।

दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥

भक्त-वत्सल दंपति उस वचन को हृदय में धारण करके उसी आश्रम में कुछ काल तक निवास करते रहे। समय पाकर, बिना किसी क्लेश के शरीर त्यागकर, वे अमरावती में जा बसे।

दोहा

यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।१५२

वृषकेतु ने उमा को यह अत्यंत पवित्र इतिहास कहा। हे भरद्वाज, अब राम-जन्म का एक और कारण सुनो।

सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥

हे मुनि, सुनो यह पवित्र पुरानी कथा, जो शिवजी ने गिरिजा को कही थी। संसार में विख्यात एक कैकय नामक देश था, जहाँ सत्यकेतु नामक राजा राज्य करते थे।

धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥

वे धर्मधुरंधर, नीति के भंडार, तेज-प्रताप-शील से युक्त और बलवान थे। उनके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणों के धाम और महान रणधीर थे।

राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥

जो जेठे पुत्र थे, वे राज्य के अधिकारी थे, उनका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्र का नाम अरिमर्दन था, जो भुजबल में अतुल और युद्ध में अडिग था।

भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥

दोनों भाइयों में परम मित्रता थी, उनकी प्रीति सब दोष और छल से रहित थी। राजा ने जेठे पुत्र को राज्य दे दिया और स्वयं हरि की भक्ति के लिए वन को चल दिए।

दोहा

जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस१५३

जब प्रतापभानु राजा बने, तो सारे देश में उनकी दुहाई फिर गई। वे प्रजा का पालन इतनी वेदविधि से करते कि कहीं भी पाप का लेशमात्र न रहा।

नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥

राजा के हितकारी एक सुजान मंत्री थे, नाम धर्मरुचि, जो शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान थे। बुद्धिमान मंत्री, बलवीर भाई, और स्वयं तेज के पुंज रणधीर राजा —

सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥

उनके पास चतुरंगिणी अपार सेना थी, अनगिनत योद्धा सभी युद्ध में निपुण थे। सेना देखकर राजा हर्षित हुए, और गहरे स्वर में नगाड़े बजने लगे।

बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई॥

विजय के लिए सेना सजाकर, शुभ दिन देखकर राजा ने कूच किया। जहाँ-तहाँ अनेक युद्ध हुए, और उन्होंने बलपूर्वक सभी राजाओं को जीत लिया।

सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें॥सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥

उन्होंने सातों द्वीपों को अपने भुजबल से वश में कर लिया, और उनसे कर लेकर उन्हें फिर उनके राज्य लौटा दिए। उस समय सारे पृथ्वी-मंडल पर एक ही सम्राट था — प्रतापभानु।

दोहा

स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समय नरेसु१५४

सारे विश्व को अपने बाहुबल से वश में करके उन्होंने अपनी राजधानी में प्रवेश किया, और अर्थ, धर्म, काम आदि सुखों का सेवन करते हुए राजा ने अपना समय बिताया।

भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥

राजा प्रतापभानु के प्रताप से यह सुंदर पृथ्वी कामधेनु के समान हो गई। प्रजा सब दुखों से रहित और सुखी थी, स्त्री-पुरुष सभी धर्मशील और सुंदर थे।

सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब के सेवा॥

मंत्री धर्मरुचि की हरि के चरणों में प्रीति थी, वे राजा के हित के लिए नित्य उचित नीति सिखाते। गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण — सबकी राजा सदा सेवा करते।

भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥

वेदों में जो राजधर्म बताए गए हैं, वे सब राजा आदरपूर्वक और सुखपूर्वक पालन करते। प्रतिदिन वे विविध प्रकार का दान देते और श्रेष्ठ शास्त्र, वेद-पुराण सुनते।

नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए॥

अनेक बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, फूलों की वाटिकाएँ और सुंदर बाग बनवाए। ब्राह्मणों के घर और देवालय सुंदर बनवाए, और सभी तीर्थों में विचित्र निर्माण करवाए।

दोहा

जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग१५५

वेद-पुराणों में जितने भी यज्ञ बताए गए हैं, राजा ने वे सब एक-एक हजार-हजार बार बड़े अनुराग से किए।

हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥

उनके हृदय में किसी फल की कामना नहीं थी, राजा अत्यंत विवेकी और परम सुजान थे। वे जो भी धर्म-कर्म मन, वचन से करते, वह सब उन्होंने वासुदेव को ही समर्पित कर दिया था — ऐसे ज्ञानी राजा थे।

चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥

एक बार राजा सुंदर घोड़े पर चढ़कर, शिकार का सारा साज-सामान सजाकर, विंध्याचल के घने वन में गए और अनेक पवित्र मृग मारने लगे।

फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं॥

वन में घूमते हुए राजा को एक जंगली सूअर दिखाई दिया, मानो वन में छिपा हुआ राहु चंद्रमा को निगल गया हो — बड़ा चंद्रमा उसके मुख में समाता नहीं, मानो क्रोधवश उसे उगल भी नहीं पा रहा हो।

कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥

उसके कराल दाँतों की छवि अद्भुत थी, शरीर विशाल और अत्यंत मोटा था। घोड़े की आहट पाकर वह घुरघुराने लगा, कान उठाकर चकित होकर देखने लगा।

दोहा

नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु१५६

नीले पर्वत की चोटी के समान उस विशाल सूअर को देखकर, राजा घोड़े को एड़ लगाकर तेजी से दौड़ पड़े, हाँक लगाते हुए, अब पीछे हटना संभव न रहा।

आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥

घोड़े की तेज आवाज सुनकर सूअर दौड़ता हुआ आ गया, और वह वायु-वेग से भागने लगा। राजा ने तुरंत बाण चढ़ाया, पर सूअर बाण को देखते ही जमीन से मिल गया।

तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा॥

राजा निशाना साधकर बार-बार बाण चलाते, पर सूअर छल करके अपना शरीर बचा लेता। कभी प्रकट होकर, कभी छिपकर वह मृग भागता रहा, और क्रोधवश राजा उसके पीछे लगे रहे।

गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥

सूअर घने जंगल में बहुत दूर निकल गया, जहाँ हाथी-घोड़े का जाना संभव न था। राजा वहाँ अत्यंत अकेले, वन में बड़े कष्ट में थे, फिर भी उन्होंने मृग का पीछा नहीं छोड़ा।

कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥

सूअर बड़ा धैर्यवान था, वह भागकर एक गहरी पर्वत-गुफा में जा घुसा। गुफा को दुर्गम देखकर राजा को बड़ा पछतावा हुआ, वे लौट पड़े पर महावन में भटक गए।

दोहा

खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत१५७

थकान, खिन्नता, भूख और प्यास से व्याकुल राजा घोड़े सहित जल खोजते हुए नदी-तालाब ढूँढ़ते रहे, पर जल न मिलने से वे बेसुध हो गए।

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥

वन में घूमते हुए उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहाँ कपटी मुनि-वेष धारण किए एक राजा रहता था, जिसका देश प्रतापभानु ने युद्ध में जीत लिया था और जो सेना छोड़कर भाग गया था।

समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥

उसने प्रतापभानु का यह असमय जानकर, और अपने लिए इसे उचित अवसर समझकर — वह घर नहीं गया, मन में बड़ी ग्लानि थी कि अभिमानी राजा से युद्ध में सामना नहीं हो सका।

रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा॥

वह अपने हृदय के क्रोध को दबाकर, एक साधारण गरीब की तरह, वन में तपस्वी का वेष धारण करके रहता था। राजा ने उसी के पास जाकर पहुँचकर प्रणाम किया, तभी उसने प्रतापभानु को पहचान लिया।

राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥

प्यास से व्याकुल राजा ने उसे नहीं पहचाना, उसका सुंदर वेष देखकर उसे महामुनि ही समझा। घोड़े से उतरकर उन्होंने प्रणाम किया, पर अत्यंत चतुर होने के कारण अपना नाम नहीं बताया।

दोहा

भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ१५७८

राजा को प्यासा देखकर उसने उन्हें एक सुंदर सरोवर दिखाया। राजा ने प्रसन्न होकर स्नान किया, जल पिया और घोड़े को भी जल पिलाया।

गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥

सारी थकान दूर होकर राजा पूरी तरह सुखी हो गए, तापसी वेषधारी उन्हें अपने आश्रम ले गया। सूर्यास्त होते देख उसने राजा को आसन दिया, फिर मृदु वाणी में बोला —

को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥

तुम कौन हो, वन में अकेले क्यों घूम रहे हो? हे सुंदर युवक, तुम अपने जीवन को इस प्रकार जोखिम में क्यों डाल रहे हो? तुम्हारे लक्षण तो चक्रवर्ती सम्राट के जैसे हैं, तुम्हें देखकर मुझे बड़ी दया आ रही है।

नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई॥

राजा का नाम प्रतापभानु था, धरतीपति, और मैं उसका मंत्री हूँ, हे मुनीश्वर, सुनिए। शिकार खेलते हुए मैं मार्ग भूल गया, और बड़े भाग्य से आपके चरणों में आ पहुँचा।

हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा॥

हमें तो तुम्हारा दर्शन ही दुर्लभ लगता है, जान पड़ता है कुछ भला होने वाला है। मुनि बोले — हे तात, अँधेरा हो चुका है, तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन दूर है।

दोहा

निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान१५९(क)

रात घोर और गहरी है, वन का मार्ग भी सुनसान है, हे सुजान, इसलिए आज यहीं ठहर जाओ, यह जानकर सवेरा होते ही चले जाना।

दोहा

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ१५९(ख)

तुलसीदास कहते हैं, जैसी भवितव्यता होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है — वह स्वयं ही जिसे चाहिए उसके पास ले जाती है और उसे वहाँ पहुँचा देती है।

भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥

राजा ने कहा — बहुत अच्छा, हे नाथ, ऐसा कहकर उन्होंने आज्ञा सिर चढ़ाई और घोड़े को पेड़ से बाँधकर बैठ गए। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की, उसके चरण वंदन करके अपने भाग्य को सराहा।

पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥

फिर उसने मृदु और सुंदर वाणी में कहा — पिता समझकर, हे प्रभु, मैं यह ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर, मुझे अपना सेवक जानकर, कृपया अपना नाम बताइए।

तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना॥बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥

उस राजा ने उसे नहीं पहचाना, पर उसने राजा को पहचान लिया था — वह सुहृद-सा दिखने वाला राजा वास्तव में उसका शत्रु था, अत्यंत कपटी और चतुर। शत्रु फिर छद्मवेशी, फिर राजा — छल-बल से वह अपना काम साधना चाहता था।

समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥

राज्य-सुख को याद कर वह शत्रु दुखी हो उठता, उसकी छाती आग की तरह जल उठती। पर राजा के सरल वचन सुनकर, उसने अपना बैर मन में समेटकर हृदय में हर्ष प्रकट किया।

दोहा

कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत१६०

कपट में डूबी हुई मृदु वाणी में उसने युक्तिपूर्वक कहा — मेरा नाम अब भिखारी है, मैं निर्धन हूँ और मेरा कोई घर-द्वार नहीं है।

कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥

राजा ने कहा — जो विज्ञान के भंडार होते हैं, और आप जैसे जिनका अभिमान पूरी तरह गल चुका होता है, वे सदा अपने-आपको छिपाकर, हर प्रकार से कुवेष धारण किए रहते हैं।

तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥

इसीलिए संत और वेद-वाणी पुकार-पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन व्यक्ति ही हरि को सबसे प्रिय होता है। आप जैसे धनहीन, गृहहीन भिखारी को देखकर तो ब्रह्मा और शिव को भी संदेह हो जाए।

जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥सहज प्रीति भूपति के देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥

जैसे भी हैं, आपके चरणों में मैं नमन करता हूँ, हे स्वामी, अब मुझ पर कृपा कीजिए। राजा का यह सहज प्रेम देखकर उस पर उसका विशेष विश्वास और बढ़ गया।

सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥

उसने हर प्रकार से राजा को अपना बना लिया, और अधिक स्नेह प्रकट करके बोला — हे राजा, सच्चे भाव से सुनो, यहाँ रहते हुए मुझे बहुत समय बीत गया।

दोहा

अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु१६१(क)

अब तक मुझसे कोई नहीं मिला और मैंने भी किसी को अपना परिचय नहीं दिया — लोगों की मान्यता तो अग्नि के समान है, जो तपस्या के वन को जला डालती है।

सोरठा

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि१६१(ख)

तुलसीदास कहते हैं, सुंदर वेष देखकर मूर्ख और चतुर दोनों ही धोखा खा जाते हैं — जैसे सुंदर मोर को देखकर कोई नहीं सोचता कि उसके अंदर सर्प जैसा विष है, वैसे ही अमृत जैसी मीठी वाणी में भी विष का भोजन छिपा हो सकता है।

तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥

इसीलिए मैं संसार में छिपा रहता हूँ, हरि को छोड़कर किसी और उद्देश्य से कुछ करना व्यर्थ है। प्रभु तो बिना बताए ही सब जानते हैं, फिर बताओ, संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।

तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥

तुम पवित्र और सुबुद्धि हो, मुझे अत्यंत प्रिय हो, तुम्हारा मुझ पर प्रेम और विश्वास भी सच्चा है। अब हे तात, यदि मैं तुमसे कुछ छिपाऊँ, तो यह मेरे लिए बड़ा भारी दोष होगा।

जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥

जैसे-जैसे वह तापस उदासीनता की बातें करता गया, वैसे-वैसे राजा का विश्वास और बढ़ता गया। राजा को अपने कर्म, मन और वचन से पूरी तरह वश में देखकर, वह बगुला-ध्यानी तापस तब बोला —

नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई॥कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥

मेरा नाम एकतनु है, भाई — यह सुनकर राजा ने फिर सिर नवाकर कहा — कृपया इस नाम का अर्थ भी विस्तार से बताइए, मुझे अपना अत्यंत आज्ञाकारी सेवक जानकर।

दोहा

आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि१६२

जब आदि-सृष्टि उत्पन्न हुई, तभी मेरी भी उत्पत्ति हुई थी। एकतनु नाम का कारण यह है कि उसके बाद मैंने फिर कभी दूसरा शरीर धारण नहीं किया।

जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥

मन में कोई आश्चर्य मत करो, तप से बढ़कर कुछ भी दुर्लभ नहीं है। तप के बल से ही विधाता संसार की रचना करते हैं, तप के बल से ही विष्णु सबकी रक्षा करने वाले बनते हैं।

तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥

तप के बल से ही शिवजी संहार करते हैं, तप के बल से संसार में कुछ भी असंभव नहीं। यह सुनकर राजा को अत्यंत अनुराग हुआ, तब वह पुरानी-पुरानी कथाएँ कहने लगा।

करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥

उसने कर्म, धर्म के अनेक इतिहासों का, वैराग्य और विवेक का निरूपण किया। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय की कथा भी उसने असंख्य आश्चर्यजनक ढंग से वर्णित की।

सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ॥कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥

यह सुनकर राजा उस तापस के पूरी तरह वश में हो गया, तब उसने भी अपना नाम बताने का साहस किया। तापस बोला — हे राजा, मैं तुम्हें पहचानता हूँ, तुमने जो यह छल किया, वह मुझे बहुत अच्छा लगा।

सोरठा

सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव१६३

सुनो हे राजा, यह नीति है कि जहाँ-तहाँ राजा अपना नाम नहीं बताते, पर मुझे तुम पर अत्यंत प्रीति है, इसलिए तुम्हारी यह चतुराई भी मुझे भली लगी।

नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥

तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, और सत्यकेतु तुम्हारे पिता राजा हैं। गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, हे राजा, इसलिए यह मत सोचो कि अपना नाम बताने में कोई हानि हुई।

देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥

हे तात, तुम्हारी सहज सरलता, प्रीति, विश्वास, नीति और निपुणता देखकर मेरे मन में ममता उत्पन्न हो गई, इसीलिए तुम्हारे पूछने पर मैंने अपनी कथा कह दी।

अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥

अब मैं प्रसन्न हूँ, कोई संशय नहीं — हे राजा, जो तुम्हारे मन को भाए, वह वर माँग लो। यह मधुर वचन सुनकर राजा हर्षित हुए, और चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की।

कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होइ असोकी॥

हे कृपासिंधु, आपके दर्शन मात्र से ही मेरे लिए चारों पदार्थ हस्तगत हैं। फिर भी प्रभु को प्रसन्न देखकर उसने एक दुर्लभ वर माँगा जो सर्वदा शोकरहित रहे।

दोहा

जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ१६४

जरा-मृत्यु के दुःख से रहित शरीर हो, युद्ध में मुझे कोई न जीत सके, सौ कल्पों तक बिना किसी शत्रु के मैं एकछत्र पृथ्वी का राज्य करूँ।

कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥

तापस बोला — हे राजा, ऐसा ही होगा, पर सुनो, इसमें एक कठिन शर्त है। काल भी तुम्हारे चरणों में सिर नवाएगा, बस एक ब्राह्मण-कुल को छोड़कर, हे राजा।

तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥

ब्राह्मण तप के बल से सदा प्रबल होते हैं, उनके क्रोध से कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि हे राजा, तुम ब्राह्मणों को भी अपने वश में कर लो, तो विधाता, विष्णु और शिव भी तुम्हारे वश में हो जाएँगे।

चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥

ब्राह्मण-कुल से जबरदस्ती कभी काम नहीं चलता, यह मैं दोनों भुजाएँ उठाकर सत्य कहता हूँ। सुनो हे राजा, ब्राह्मण के शाप के बिना तुम्हारा नाश किसी भी काल में नहीं होगा।

हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥

राजा उसके यह वचन सुनकर हर्षित हुए — हे नाथ, अब मेरा नाश नहीं होगा। आपकी कृपा से, हे कृपानिधान प्रभु, मेरा सर्वकाल कल्याण ही होगा।

दोहा

एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि१६५

एवमस्तु कहकर वह कपटी मुनि फिर कुटिलतापूर्वक बोला — हमारी यह भेंट और तुम्हें दिया गया यह भ्रम, अब इसे किसी से मत कहना, नहीं तो हमें दोष लगेगा।

तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥

इसीलिए हे राजा, मैं तुम्हें मना करता हूँ — यह कथा कहने से तुम्हारा बड़ा अहित होगा। यह बात यदि छठे कान तक भी पहुँची, तो तुम्हारा नाश निश्चित है, मेरी यह बात सत्य मानो।

यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥

यह प्रकट होने से, अथवा ब्राह्मण के शाप से ही, हे प्रतापभानु, तुम्हारा नाश हो सकता है, सुनो। इसके सिवा किसी और उपाय से तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी — बस हरि या हर के मन में क्रोध न आए।

सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥

राजा ने प्रभु के चरण पकड़कर सत्य कहा — हे नाथ, बताइए, ब्राह्मण गुरु के क्रोध से किसने कभी रक्षा पाई है? यदि विधाता भी क्रोधित हो तो गुरु ही रक्षा करते हैं, पर गुरु के विरोध से संसार में कोई भी रक्षक नहीं।

जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥

यदि हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे, तो नाश हो जाए, हमें इसकी कोई चिंता नहीं। पर मुझे एक ही बात का डर है, हे प्रभु — ब्राह्मणों का शाप अत्यंत भयंकर होता है।

दोहा

होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ१६६

कृपा करके यह भी बताइए कि ब्राह्मण किस उपाय से वश में हों — दीनदयालु आपको छोड़कर मुझे कोई और हितैषी नहीं दिखता।

सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥

सुनो हे राजा, संसार में अनेक उपाय हैं, पर वे कठिन साध्य हैं, सफल हों या न हों। पर एक अत्यंत सुगम उपाय है, हालाँकि उसमें भी एक कठिनाई है।

मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥

वह युक्ति केवल मेरे ही अधीन है, पर मेरा तुम्हारे नगर जाना संभव नहीं। आज तक, जब से मैं उत्पन्न हुआ हूँ, मैं किसी के घर या गाँव नहीं गया।

जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥

यदि मैं न जाऊँ तो तुम्हारा काम बिगड़ जाएगा, आज तो यह बड़ी दुविधा बन गई है। यह सुनकर राजा मृदु वाणी में बोले — हे नाथ, वेदों ने भी यही नीति बताई है —

बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥

बड़े लोग छोटों पर विशेष स्नेह करते हैं, पर्वत भी अपने शिखरों पर सदा घास ही धारण करते हैं। अथाह समुद्र के ऊपर भी झाग तैरता है, और पृथ्वी सदा अपने सिर पर धूल ही धारण करती है।

दोहा

अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल१६७

ऐसा कहकर राजा ने उसके चरण पकड़ लिए — हे स्वामी, कृपालु होइए, मेरे लिए यह कष्ट सहन कीजिए, हे प्रभु, सज्जन और दीनदयालु।

जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥

राजा को अपने पूरी तरह वश में जानकर, वह कपट में निपुण तापस बोला — हे राजा, सच कहता हूँ सुनो, संसार में मेरे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तें मोरा॥जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥

मैं अवश्य तुम्हारा काम कर दूँगा, क्योंकि मन-वचन-कर्म से तुम मेरे भक्त हो। पर योग-युक्ति, तप और मंत्र का प्रभाव तभी फलित होता है जब उसे गुप्त रखा जाए।

जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥

यदि राजा, मैं भोजन बनाऊँ और तुम उसे परोसो, तो कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा। जो भी उस अन्न को खाएगा, वह वैसे ही तुम्हारी आज्ञा का अनुसरण करेगा।

पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥

फिर उनके घर जो भी भोजन करेगा, वह भी, सुनो, हे राजा, तुम्हारे वश में हो जाएगा। जाकर यह उपाय रचो और एक वर्ष भर का संकल्प करो।

दोहा

नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार१६८

नित्य नए-नए एक लाख ब्राह्मणों को परिवार सहित निमंत्रण दो; मैं तुम्हारे संकल्प के अनुसार प्रतिदिन भोज तैयार करता रहूँगा।

एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥

इस प्रकार राजा को बहुत ही कम कष्ट में सारे ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे। ब्राह्मण होम और यज्ञ की सेवा करेंगे, और उसी प्रसंग से देवता भी सहज ही तुम्हारे वश में आ जाएँगे।

और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ॥तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥

और एक बात मैं तुम्हें बताता हूँ — मैं इस वेष में कभी नहीं आऊँगा। तुम्हारे यहाँ जो पुरोहित हैं, हे राजा, मैं अपनी माया से उन्हें ही हर लाऊँगा।

तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥

तप के बल से उन्हीं के समान अपना रूप बनाकर, मैं यहाँ एक वर्ष तक रहूँगा। सुनो हे राजा, मैं उन्हीं का वेष धारण करके हर प्रकार से तुम्हारा काम सँवारूँगा।

गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता॥

बहुत रात बीत चुकी है, अब सो जाओ। हे राजा, तीसरे दिन मैं तुमसे मिलूँगा। मैं तप के बल से तुम्हें घोड़े सहित सोते-सोते ही तुम्हारे महल में पहुँचा दूँगा।

दोहा

मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि१६९

मैं उन्हीं का वेष धारण करके आऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना — जब मैं तुम्हें एकांत में बुलाकर सारी बात समझाऊँ।

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥

राजा ने आज्ञा मानकर विश्राम किया, और वह छली-ज्ञानी तापस भी जाकर अपने आसन पर बैठ गया। थके हुए राजा को गहरी नींद आ गई — पर वह चिंतायुक्त तापस भला कैसे सो पाता।

कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥

वहाँ कालकेतु नामक राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भुलाया था — वह तापस-बना राजा का परम मित्र था, और उसकी अत्यंत गहरी कपट-चालें जानता था।

तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥

उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, अत्यंत दुष्ट, अजेय और देवताओं को कष्ट देने वाले। पहले राजा ने ही युद्ध में उन सबको मार डाला था, यह देखकर ब्राह्मण, संत और देवता दुखी हो गए थे।

तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥

उस दुष्ट ने पुराना बैर याद रखा, और तापस बने राजा से मिलकर यह षड्यंत्र रचा। जिससे शत्रु का नाश हो, उसी का उपाय उन्होंने रचा — पर भवितव्यता के वश राजा को इसका कुछ पता न चला।

दोहा

रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु१७०

शत्रु चाहे तेजस्वी हो या अकेला और छोटा भी, उसे कभी कम मत समझो। आज भी राहु का बचा हुआ सिर सूर्य और चंद्रमा को दुःख देता रहता है।

तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥

तापस-रूपी राजा ने अपने मित्र को देखकर हर्षित होकर उसका स्वागत किया, उठकर मिलकर वह सुखी हो गया। मित्र को सारी कथा सुनाकर, वह राक्षस सुख पाकर बोला —

अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥

सुनो हे राजा, अब शत्रु साध लिया गया, यदि तुमने मेरी सीख मान ली। सारी चिंता त्यागकर निश्चिंत रहो, बिना औषधि के भी विधाता व्याधि को नष्ट कर देंगे।

कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई॥तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥

कुल सहित शत्रु की जड़ बहाकर, चौथे दिन मैं आकर तुमसे मिलूँगा। तापस ने राजा को बहुत संतोष देकर विदा किया, और वह महाकपटी अत्यंत क्रोधी राक्षस चल दिया।

भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥

उसने प्रतापभानु को घोड़े सहित क्षणभर में ही महल में पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुला दिया, और घोड़े को अश्वशाला में बाँध दिया।

दोहा

राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।लै राखेसि गिरि खोह महुँ माया करि मति भोरि१७१

फिर वह राजा के पुरोहित को हर ले गया, और अपनी माया से उनकी बुद्धि भ्रमित करके उन्हें एक पर्वत की गुफा में छिपाकर रख दिया।

आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥

फिर स्वयं पुरोहित का रूप धारण करके वह उसी अनुपम शय्या पर जाकर लेट गया। सवेरा होते ही राजा जागा, और अपने महल को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ।

मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी॥कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥

मन में मुनि की महिमा का अनुमान लगाकर वह गर्व के साथ उठा, कि रानी को भी पता न चले। उसी घोड़े पर चढ़कर वह वन को चला गया, नगर के किसी भी स्त्री-पुरुष को इसका पता नहीं चला।

गए जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा॥

दो पहर बीतने पर राजा लौटा, घर-घर उत्सव और बधाई के बाजे बजने लगे। जब राजा ने पुरोहित को देखा, तो चकित होकर देखते हुए अपने कार्य का स्मरण किया।

जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥

राजा के दो-तीन दिन युग के समान बीते, कपटी मुनि पुरोहित के पद पर लीन मन से बैठा रहा। समय जानकर असली पुरोहित लौट आया, और उसने राजा को सारी योजना समझा दी।

दोहा

नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत१७२

गुरु को पहचानकर राजा हर्षित हुआ, भ्रम के वश उसे कुछ सुध न रही। तुरंत उसने एक लाख श्रेष्ठ ब्राह्मणों को परिवार सहित निमंत्रित किया।

उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥

पुरोहित ने भोज तैयार किया, वेदों में बताई छहों रस और चार प्रकार की विधि से। उसने माया से रसोई बनाई, जिसमें इतने व्यंजन थे कि कोई गिन ही नहीं सकता था।

बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥

विविध मृगों का मांस पकाया गया, और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मण का मांस भी मिला दिया। भोजन के लिए सभी ब्राह्मणों को बुलाया गया, पैर धोकर आदरपूर्वक बिठाया गया।

परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥

जैसे ही राजा भोजन परोसने लगा, उसी समय आकाशवाणी हुई — हे ब्राह्मण-समूह, उठो-उठो, अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ, बड़ी हानि होगी।

भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥

रसोई में ब्राह्मण का मांस मिला हुआ था, यह सुनकर सारे ब्राह्मण विश्वास मानकर उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया, उसकी बुद्धि भी मोहग्रस्त हो गई, भवितव्यता के वश मुख से कोई वाणी न निकली।

दोहा

बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार१७३

क्रोधित होकर ब्राह्मण बोले, तब उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया — जाओ, हे मूढ़ राजा, अपने परिवार सहित राक्षस बन जाओ।

छत्रबंधु तें बिप्र बोलाई। घाले लिए सहित समुदाई॥ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तें समेत परिवारा॥

क्षत्रिय होकर तूने ब्राह्मणों को बुलाकर, उन्हें छल से बुलाकर मरवा डाला। हमारे धर्म की रक्षा ईश्वर ने की, अब तू अपने परिवार सहित राक्षस-योनि में जन्म लेगा।

संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥

एक वर्ष के भीतर तुम्हारा नाश हो, तुम्हारे कुल में जल-तर्पण देने वाला भी कोई न बचे। यह शाप सुनकर राजा अत्यंत भयभीत हो उठा, तभी फिर आकाश से एक वरदान की वाणी हुई।

बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥

ब्राह्मणों ने बिना विचारे ही यह शाप दे दिया, राजा ने कोई अपराध नहीं किया था। यह आकाशवाणी सुनकर सारे ब्राह्मण चकित रह गए, और राजा वहाँ गया जहाँ भोजन बनाया गया था।

तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥

वहाँ न तो कोई भोजन था, न ब्राह्मण रसोइया — राजा अत्यंत सोच में डूबा हुआ लौट आया। उसने सारा प्रसंग ब्राह्मणों को सुनाया, यह सुनकर वे भी भयभीत होकर व्याकुल हो गए।

दोहा

भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।किए अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर१७४

हे राजा, भवितव्यता कभी टलती नहीं, यद्यपि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। ब्राह्मण का शाप कभी अन्यथा नहीं होता, वह अत्यंत भयंकर होता है।

अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय जेहीं॥

ऐसा कहकर सभी ब्राह्मण चले गए, नगरवासियों को भी यह सारा समाचार मिल गया। सब सोचने लगे कि देवता को इसका दोष कैसे दें, जैसे हंस बनाते-बनाते कौआ बन गया हो।

उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥

राजा के असली पुरोहित को उनके घर पहुँचाकर, राक्षस ने कपटी तापस को यह सारी खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, और सारे राजा सेना सजाकर दौड़ पड़े।

घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥

उन्होंने नगर को घेर लिया, नगाड़े बजाकर विविध प्रकार से नित्य युद्ध होने लगा। सारे योद्धा वीरतापूर्वक लड़कर मारे गए, और राजा भी अपने भाई सहित पृथ्वी पर गिर पड़ा।

सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥

सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा, ब्राह्मण का शाप भला कभी झूठा कैसे हो सकता है। शत्रु राजाओं ने विजय पाकर नगर बसाया, और यश पाकर अपने-अपने नगरों को लौट गए।

दोहा

भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम१७५

हे भरद्वाज, सुनो, जिस पर विधाता प्रतिकूल हो जाते हैं, उसे धूल भी मेरु पर्वत के समान भारी और मित्र भी यमराज के समान, और रस्सी भी सर्प के समान लगने लगती है।

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥

सुनो हे मुनि, समय पाकर वही राजा अपने समाज सहित राक्षस बना। दस सिरों और बीस भुजाओं वाला वह अत्यंत बलशाली वीर रावण नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥

राजा का छोटा भाई अरिमर्दन, वही बलशाली कुंभकर्ण बना। जो धर्मरुचि नामक मंत्री था, वह उनका सौतेला छोटा भाई बना।

नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥

उसका नाम विभीषण हुआ, जिसे संसार जानता है — विष्णु-भक्त और ज्ञान के भंडार। जो पहले राजा के पुत्र-सेवक थे, वे सब भी अत्यंत भयंकर राक्षस बने।

कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥

वे इच्छानुसार रूप धरने वाले अनेक प्रकार के दुष्ट, कुटिल, भयंकर और विवेकहीन थे। सब निर्दयी, हिंसक और पापी थे, जिनका वर्णन नहीं हो सकता, संसार भर के लिए संताप देने वाले।

दोहा

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥१७६

यद्यपि वे पुलस्त्य के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए थे, तथापि ब्राह्मण के शाप के कारण वे सब पापरूप हो गए।

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥

तीनों भाइयों ने विविध प्रकार का अत्यंत उग्र तप किया, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका तप देखकर ब्रह्माजी निकट आए — हे तात, माँगो, मैं प्रसन्न हूँ।

करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥

विनती करके, चरण पकड़कर रावण बोला — सुनिए हे जगदीश्वर। हमें कोई भी न मारे, न हम मरें — देवता, दानव को छोड़कर, बस वानर और मनुष्य इन दो जातियों को छोड़कर।

एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥

एवमस्तु, तुमने बड़ा तप किया है — ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने उसे यह वर दे दिया। फिर प्रभु कुंभकर्ण के पास गए, उसे देखकर उनके मन में विस्मय हुआ।

जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥

यदि यह दुष्ट नित्य आहार करता रहे, तो सारा संसार ही उजड़ जाएगा। शारदा को प्रेरित कर उसकी बुद्धि फिरा दी, और उसने छह महीने की नींद माँग ली।

दोहा

गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु१७७

फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और कहा — हे पुत्र, वर माँगो। उसने भगवान के निर्मल चरण-कमलों में अनुराग ही माँगा।

तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥

तीनों को वरदान देकर ब्रह्माजी चले गए, वे हर्षित होकर अपने-अपने घर लौट आए। मय दानव की पुत्री का नाम मंदोदरी था, वह परम सुंदरी और नारियों में शिरोमणि थी।

सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥

मय ने वही मंदोदरी लाकर रावण को दे दी, यह जानकर कि वह राक्षसों का राजा बनेगा। सुंदर पत्नी पाकर रावण हर्षित हुआ, फिर उसने अपने दोनों भाइयों का भी विवाह करा दिया।

गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥

समुद्र के बीच त्रिकूट नामक एक पर्वत था, जिसे ब्रह्माजी ने अत्यंत विशाल दुर्ग के रूप में बनाया था। उस पर्वत को मय दानव ने फिर सजाया, सोने से बने अपार मणिजड़ित भवन बनाए।

भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥

जैसे नागलोक की भोगावती नगरी है और इंद्र का निवास अमरावती है, उनसे भी अधिक रमणीय और भव्य वह नगरी थी, जिसका संसार भर में प्रसिद्ध नाम था — लंका।

दोहा

खाई सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव१७८(क)

चारों ओर एक अत्यंत गहरी समुद्र-खाई घूमकर आती थी, सोने के परकोटे मणियों से जड़े और अत्यंत दृढ़ थे, जिसकी बनावट का वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ१७८(ख)

हरि की ही प्रेरणा से जिस कल्प में जो यक्षपति बनता है, वह प्रतापी शूरवीर अपनी अतुल सेना सहित भी अंततः वश में हो ही जाता है।

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥

वहाँ जो बड़े-बड़े बलशाली राक्षस योद्धा रहते थे, देवताओं ने युद्ध में उन सबका संहार कर दिया। अब वहाँ इंद्र की प्रेरणा से यक्षपति कुबेर के करोड़ों रक्षक निवास करते थे।

दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥

रावण को कहीं से यह समाचार मिला, तो उसने सेना सजाकर जाकर उस दुर्ग को घेर लिया। विकट योद्धाओं और बड़ी सेना को देखकर, यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गए।

फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥

घूम-घूमकर दसानन ने पूरा नगर देखा, उसकी सारी चिंता जाती रही और उसे विशेष सुख हुआ। इसे स्वभाव से ही सुंदर और दुर्गम मानकर, उसने वहीं लंका को अपनी राजधानी बना ली।

जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे॥एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥

जिसे जो पद योग्य था, उसे बाँटकर घर दे दिए, इस तरह उसने सभी राक्षसों को सुखी कर दिया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ाई करने गया, और पुष्पक विमान को जीतकर ले आया।

दोहा

कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ१७९

फिर एक बार कौतुकवश उसने कैलास पर्वत को ही उठा लिया, मानो अपने बाहुबल को तौल रहा हो, और बड़ा सुख पाकर वहाँ से चल दिया।

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥

सुख, संपत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई — ये सब नित नए-नए बढ़ते ही गए, जैसे लाभ मिलने पर लोभ भी बढ़ता जाता है।

अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा॥

उसका भाई कुंभकर्ण अत्यंत बलशाली था, संसार में कोई उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं था। वह छह महीने तक सोता, और जागते ही तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच जाती।

जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥

यदि वह प्रतिदिन आहार करता, तो सारा संसार शीघ्र ही चौपट हो जाता। युद्ध में उसका धैर्य वर्णन से परे था, उसके समान असंख्य वीर और बलवान थे।

बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥

उसका जेठा पुत्र मेघनाद था, जो योद्धाओं में सबसे आगे माना जाता था। जिसके सामने कोई युद्ध में टिक नहीं पाता, स्वर्गलोक तो उससे बचने के लिए सदा भागता ही फिरता।

दोहा

कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय१८०

कुंभ, अकंपन, वज्रदंत, धूमकेतु, अतिकाय — ये और ऐसे अनेक योद्धा थे, जिनमें से एक-एक अकेला ही संसार को जीत सकता था।

कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥

वे इच्छानुसार रूप धरने वाले और सारी माया जानने वाले थे, जिन्हें स्वप्न में भी धर्म या दया का लेशमात्र भी नहीं था। एक बार दसमुख अपनी सभा में बैठा, अपने अनगिनत परिवार को देखकर —

सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती॥सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥

पुत्रों, सेवकों, परिजनों और पौत्रों का समूह — राक्षस-जाति की गिनती भला कौन कर सकता है। अपनी विशाल सेना देखकर, स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और मद से भरे वचन बोलने लगा।

सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥

सुनो सारे राक्षस-समूहो, हमारे शत्रु देवताओं की सेना है। वे कभी हमारे सामने आकर युद्ध नहीं करते, बलवान शत्रु को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥

उनका वध केवल एक ही उपाय से हो सकता है, अब मैं तुम्हें समझाकर वह बताता हूँ, सुनो — ब्राह्मण-भोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध — इन सबमें जाकर विघ्न डालो।

दोहा

छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ१८१

भूख से क्षीण और बलहीन होकर देवता स्वयं ही सहज आकर मिलेंगे। तब मैं चाहूँ तो मार डालूँ, चाहूँ तो भलीभाँति अपना बनाकर छोड़ दूँ।

मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा॥जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥

फिर उसने मेघनाद को बुलवाया, उसे सीख दी और उसका बल-बैर बढ़ाया। जो देवता युद्ध में धीर और बलवान थे, जिन्हें युद्ध करने का अभिमान था —

तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी॥एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥

उन्हें युद्ध में जीतकर मेघनाद बाँधकर ले आया, पिता की आज्ञा को पुत्र ने कंधे पर उठाकर पूरी की। इस प्रकार रावण ने सबको आज्ञा दे दी, और स्वयं गदा हाथ में लेकर चल पड़ा।

चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी॥रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥

दसानन के चलते ही पृथ्वी काँपने लगी, गर्जना से गर्भवती स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते सुनकर, देवताओं ने मेरु पर्वत की गुफाओं में शरण ली।

दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥

दिक्पालों के सुंदर लोक दसानन को सभी सूने मिले। बार-बार भयंकर सिंहनाद करके वह देवताओं को गाली देकर ललकारने लगा।

रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥

वह युद्ध के मद में उन्मत्त होकर सारे संसार में घूमा, पर उसे कहीं कोई प्रतिद्वंद्वी योद्धा न मिला।

रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥

सूर्य, चंद्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम — ये सभी अधिकारी देवता भी उसके भय से आतंकित थे।

किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥

किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग — सबको उसने हठपूर्वक अपने अधीन कर लिया। ब्रह्मा की सृष्टि में जितने भी देहधारी नर-नारी थे, वे सब दसमुख के वश में हो गए।

आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥

सभी भयभीत होकर उसकी आज्ञा का पालन करते, नित्य आकर विनम्रतापूर्वक उसके चरणों में सिर नवाते।

दोहा

भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र१८२(क)

अपने भुजबल से सारे विश्व को वश में करके, उसने किसी को भी स्वतंत्र नहीं रहने दिया। मंडलेश्वर राजाओं का शिरोमणि रावण अपनी ही इच्छा से राज्य करता था।

दोहा

देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि।जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि१८२(ख)

देवता, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य, किन्नर, नाग-कुमारियाँ — अपने बाहुबल से जीतकर उसने अनेक सुंदर श्रेष्ठ स्त्रियों से विवाह कर लिया।

इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥

इंद्रजीत से जो कुछ भी कहा गया, वह मानो पहले से ही किया हुआ समझ लो। सबसे पहले जिन्हें आज्ञा दी गई थी, अब उनका किया हुआ चरित्र सुनो।

देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥

उस भीषण रूप को देखकर सब पापी, संतापी राक्षस-समूह और देवता — असुर-समूह नाना रूप धरकर माया से उत्पात मचाने लगे।

जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥

जिस भी प्रकार से धर्म का मूल नष्ट हो, वे सब कुछ वेद के विपरीत करते। जिस-जिस देश में गौ और ब्राह्मण मिलते, वे नगर और गाँव में आग लगा देते।

सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥

कहीं भी शुभ आचरण नहीं होता था, देव, ब्राह्मण और गुरु का कोई मान नहीं रखता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, न तप, न ज्ञान — वेद-पुराण तो स्वप्न में भी सुनने को नहीं मिलते थे।

छंद

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।आपुनु उठि धावइ रहे न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥

जप, योग, वैराग्य, तप और यज्ञ का भाग — इनकी चर्चा भी दशानन के कान में जब पड़ती, तो वह स्वयं उठकर दौड़ पड़ता और सबको पकड़कर नष्ट कर देता, कोई बच नहीं पाता। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचार फैल गया कि धर्म की बात कानों में सुनाई ही नहीं देती थी। जो कोई वेद-पुराण की बात करता, उसे वह अनेक प्रकार से त्रास देकर देश-निकाला दे देता।

सोरठा

बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति१८३

राक्षस जो घोर अनीति करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन्हें हिंसा में अत्यंत प्रीति थी, उनके पापों की कोई सीमा नहीं थी।

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥

दुष्ट, चोर, जुआरी बहुत बढ़ गए, जो लंपट होकर दूसरों के धन और स्त्री पर बुरी दृष्टि रखते। न माता-पिता का मान करते, न देवताओं का, बल्कि साधुओं से भी अपनी सेवा करवाते।

जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥अतिसय देखि धर्म के ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥

हे भवानी, जिनका ऐसा आचरण हो, उन्हें ही सब राक्षस-प्राणी समझो। धर्म की इतनी अधिक ग्लानि देखकर पृथ्वी अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो उठी।

गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥

पर्वत, नदी और समुद्र का भार भी मुझे इतना भारी नहीं लगता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही लगता है। सारे धर्म को विपरीत होते देख, रावण के भय से भयभीत पृथ्वी कुछ कह भी नहीं पा रही थी।

धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥

हृदय में विचार कर गौ का रूप धारण करके वह वहाँ गई, जहाँ देवता और मुनियों का समूह था। उसने रोते हुए अपना संताप सुनाया, पर किसी से भी कोई सहायता न मिली।

छंद

सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।संग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।जा करि तें दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥

देवता, मुनि और गंधर्व सब मिलकर ब्रह्माजी के लोक में गए, साथ में गौ-रूपधारी व्याकुल, भयभीत और शोकाकुल पृथ्वी भी थी। ब्रह्माजी ने सब कुछ मन में समझ लिया — मेरे वश में तो कुछ भी नहीं है, जिसकी तुम दासी हो, वही अविनाशी हमारी और तुम्हारी सहायता कर सकते हैं।

सोरठा

धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु।जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति१८४

पृथ्वी को धैर्य धारण करने को कहकर ब्रह्माजी बोले — हरि के चरणों का स्मरण करो, वे प्रभु अपने भक्तों की पीड़ा जानते ही हैं, वे तुम्हारी इस दारुण विपत्ति को अवश्य दूर करेंगे।

बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥

सभी देवता बैठकर विचार करने लगे — प्रभु कहाँ मिलेंगे, पुकार कहाँ करें। कोई कहता वैकुंठ जाओ, कोई कहता क्षीरसागर में ही प्रभु निवास करते हैं।

जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ॥

जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु उसी रीति से वहाँ प्रकट होते हैं। हे गिरिजा, मैं भी उसी सभा में उपस्थित था, और अवसर पाकर मैंने एक बात कही —

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥

हरि तो सर्वत्र समान रूप से व्यापक हैं, वे प्रेम से ही प्रकट होते हैं, ऐसा मैं जानता हूँ। देश, काल, दिशा-विदिशा में कहो तो सही, ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ प्रभु न हों।

अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥

जड़-चेतन सब में व्याप्त, सबसे रहित, वैराग्यवान प्रभु प्रेम से ही वैसे प्रकट होते हैं जैसे अग्नि प्रकट होती है। मेरी यह बात सबके मन को भा गई, सबने साधु-साधु कहकर मुझे सराहा।

दोहा

सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर१८५

यह सुनकर ब्रह्माजी के मन में हर्ष हुआ, शरीर रोमांचित हो उठा, नेत्रों से जल बहने लगा। स्थिर बुद्धि से, सावधान होकर, हाथ जोड़कर वे स्तुति करने लगे।

छंद

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता॥पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥

जय जय, हे देवताओं के स्वामी, भक्तों को सुख देने वाले, शरणागत के रक्षक भगवान! गौ और ब्राह्मणों के हितकारी, असुरों के शत्रु, समुद्र-पुत्री के प्रिय पति, आपकी जय हो। आप देवताओं और पृथ्वी का पालन करते हैं, आपकी अद्भुत करनी का भेद कोई नहीं जानता। जो स्वभाव से ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हम पर अनुग्रह करें।

दोहा

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।अबिगत गोतीतं चरित पुनीत मायारहित मुकुंदा॥जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥

जय जय, हे अविनाशी, सबके हृदय में निवास करने वाले, व्यापक, परमानंद स्वरूप! अव्यक्त, इंद्रियातीत, पवित्र चरित्र वाले, माया-रहित मुकुंद! जिनके लिए विरागी भी अत्यंत अनुराग रखते हैं, मोह-रहित मुनि-समूह जिनके गुणों का ध्यान और गान रात-दिन करते हैं — जय हो, सच्चिदानंद।

दोहा

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।॥।

जिन्होंने त्रिविध सृष्टि की रचना की, बिना किसी दूसरे सहायक के — हे पापनाशक, आप हमारी चिंता दूर कीजिए, हमें भक्ति चाहिए, केवल पूजा-अर्चना नहीं। जो संसार के भय को नष्ट करने वाले, मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करने वाले हैं — मन, वचन, कर्म से चतुराई छोड़कर सारे देवता उन्हीं की शरण में हैं।

दोहा

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥

शारदा, वेद, शेषनाग और असंख्य ऋषि भी जिन्हें पूरी तरह नहीं जान पाते, जिन्हें वेद दीनों का प्रिय कहकर पुकारते हैं, वही श्रीभगवान हम पर द्रवित हों। भवसागर के लिए मंदराचल के समान, सब प्रकार से सुंदर, गुणों के मंदिर और सुख के भंडार — मुनि, सिद्ध और सभी देवता अत्यंत भयभीत होकर नाथ के चरण-कमलों में नमन करते हैं।

दोहा

जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह१८६

देवताओं को भयभीत जानकर, और पृथ्वी के स्नेहसहित वचन सुनकर, आकाशवाणी अत्यंत गंभीर हुई, जो शोक और संदेह दोनों हरने वाली थी।

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥

हे मुनियो, सिद्धो, देवराजो, डरो मत — तुम्हारे ही लिए मैं मनुष्य-वेष धारण करूँगा। अपने अंशों सहित मैं मनुष्य-अवतार लूँगा, उदार सूर्यवंश में जन्म लूँगा।

कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा॥

कश्यप और अदिति ने महान तप किया था, उन्हें मैंने पहले ही वरदान दे रखा है। वही अब दशरथ और कौसल्या के रूप में कोसलपुरी में मनुष्य-राजा के रूप में प्रकट हैं।

तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥

उन्हीं के घर मैं जाकर अवतार लूँगा, रघुकुल के तिलक स्वरूप चारों भाई बनकर। नारद के वचन को मैं सर्वथा सत्य करूँगा, और परम शक्ति सहित अवतार लूँगा।

हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना॥

हे देवताओं, पृथ्वी का सारा भारी बोझ हर लिया जाएगा, तुम सब निर्भय हो जाओ। आकाश से यह ब्रह्म-वाणी कानों से सुनकर देवता तुरंत लौट पड़े, उनके हृदय को शांति मिली।

तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा॥

तब ब्रह्माजी ने पृथ्वी को समझाया, वह निर्भय हो गई और उसके मन में भरोसा आ गया।

दोहा

निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ१८७

ब्रह्माजी देवताओं को यह शिक्षा देकर अपने लोक चले गए — तुम सब वानर का शरीर धारण करके पृथ्वी पर जाकर हरि के चरणों की सेवा करो।

गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥

सभी देवता अपने-अपने धाम को गए, पृथ्वी सहित उनके मन को भी विश्राम मिला। ब्रह्माजी ने जो भी आज्ञा दी थी, देवताओं ने हर्षित होकर उसे बिना विलंब किए पूरा किया।

बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं॥गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥

उन्होंने पृथ्वी पर वानर-देह धारण की, जिन्हें अतुलित बल और प्रताप प्राप्त था। पर्वत और वृक्ष ही जिनके नख-रूपी शस्त्र थे, ऐसे धीरबुद्धि वीर हरि के मार्ग की प्रतीक्षा करने लगे।

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥

पर्वत और वन जहाँ-तहाँ भरपूर होकर, उन्होंने अपनी-अपनी सुंदर सेनाएँ रच लीं। यह सब सुंदर चरित्र मैंने कह दिया, अब वह सुनो जो बीच में छूट गया था।

अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥

अयोध्यापुरी में रघुकुल के शिरोमणि राजा राज्य करते थे, वेदविख्यात उनका नाम दशरथ था। वे धर्मधुरंधर, गुणों के भंडार और ज्ञानी थे, उनके हृदय में भक्ति थी और बुद्धि शारंगपाणि में लीन रहती थी।

दोहा

कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत१८८

कौसल्या आदि उनकी सभी प्रिय रानियाँ पवित्र आचरण वाली थीं, पति के अनुकूल, दृढ़ प्रेम रखने वाली और हरि के चरण-कमलों में विनम्र भक्ति रखने वाली थीं।

एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥

एक बार राजा के मन में यह ग्लानि हुई कि मेरे कोई पुत्र नहीं है। राजा तुरंत गुरु के घर गए और चरणों में गिरकर बड़ी विनती की।

निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥

उन्होंने अपना सारा दुःख-सुख गुरु को सुनाया, वसिष्ठ ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया — धैर्य धारण करो, तुम्हें चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में विख्यात, भक्तों के भय हरने वाले होंगे।

सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥

वसिष्ठजी ने शृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया। मुनि ने भक्तिपूर्वक आहुतियाँ दीं, तब अग्निदेव प्रकट हुए, हाथ में खीर लिए हुए।

जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥

वसिष्ठजी ने जो हृदय में सोचा था, वह सब कार्य सिद्ध हो गया — यह खीर जाकर राजा को बाँट दो, जैसा जिसके योग्य भाग बनता हो।

दोहा

तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ१८९

तब अग्निदेव सबको समझाकर वहीं अदृश्य हो गए। राजा परमानंद में मग्न हो गए, उनके हृदय में हर्ष समाया नहीं जा रहा था।

तबहिं राय प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई॥अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥

तभी राजा ने अपनी प्रिय रानियों को बुलवाया, कौसल्या आदि सब वहाँ चली आईं। आधा भाग कौसल्या को दिया, और शेष आधे के फिर दो भाग किए।

कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥

उसमें से एक भाग राजा ने कैकेयी को दिया, और बचे भाग के फिर दो भाग हुए। कौसल्या और कैकेयी ने अपने हाथ से, प्रसन्न मन से, वह भाग सुमित्रा को दे दिया।

एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥

इस प्रकार सभी रानियाँ गर्भवती होकर हृदय में हर्षित और अत्यंत सुखी हुईं। जिस दिन से हरि गर्भ में आए, उसी दिन से सभी लोकों में सुख-संपत्ति छा गई।

मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं॥सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥

महल में सभी रानियाँ शोभा, शील और तेज की खान होकर राज करने लगीं। सुखपूर्वक कुछ समय बीत गया, फिर वह अवसर आया जब प्रभु प्रकट होने वाले थे।

दोहा

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।१९०

योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि — सभी अनुकूल हो गए, चराचर सब हर्ष से भर उठे — यही था राम-जन्म का सुखमूल क्षण।

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥

चैत्र मास की पवित्र नवमी तिथि, शुक्ल पक्ष, अभिजित मुहूर्त — जो हरि को अत्यंत प्रिय है। दोपहर का समय, न अधिक सर्दी न गर्मी — वह पवित्र काल सारे लोकों को विश्राम देने वाला था।

सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥

शीतल, मंद और सुगंधित हवा बहने लगी, देवता और संत हर्षित होकर मन में उत्साहित हुए। वन में फूल खिल उठे, पर्वत मणियों से जगमगा उठे, सारी नदियाँ मानो अमृत की धाराएँ बहाने लगीं।

सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥

वह अवसर जब ब्रह्माजी को ज्ञात हुआ, तो सारे देवता विमान सजाकर चल पड़े। निर्मल आकाश देवताओं के समूहों से भर गया, गंधर्व-समूह गुण गाने लगे।

बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥

सुंदर अंजलियाँ सजाकर देवता फूल बरसाने लगे, आकाश में गड़गड़ाहट के साथ नगाड़े बजने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे, और सब अपनी-अपनी सेवा अनेक प्रकार से अर्पित करने लगे।

दोहा

सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम१९१

सभी देवसमूह विनती करके अपने-अपने धाम लौट गए। तभी जगत के आश्रय प्रभु प्रकट हुए, जो सारे लोकों को विश्राम देने वाले हैं।

छंद

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥

कृपालु, दीनदयालु, कौसल्या के हितकारी प्रभु प्रकट हुए। माता हर्षित हुईं, मुनियों के मन को भी मोहित करने वाला वह अद्भुत रूप देखकर वे विस्मित हुईं। मनोहर नेत्र, श्यामल घन जैसा शरीर, चार भुजाओं में अपने आयुध लिए, आभूषण और वनमाला धारण किए, विशाल नेत्रों वाले शोभा के सागर खरारि प्रकट हुए।

दोहा

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥

दोनों हाथ जोड़कर वे कहने लगीं — हे अनंत, मैं आपकी स्तुति किस प्रकार करूँ? आप सदा गुण और ज्ञान से परे, मानरहित हैं, वेद-पुराण भी आपका ही गुणगान करते हैं। हे करुणा और सुख के सागर, हे सब गुणों के भंडार, जिन्हें वेद और संत गाते हैं, वही श्रीकांत मेरे हित के लिए, भक्तों पर अनुराग रखकर प्रकट हुए हैं।

दोहा

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै॥उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

वेद कहते हैं कि आपके रोम-रोम में माया से रचे हुए अनगिनत ब्रह्मांडों के समूह भरे हैं। यह मेरे ही उदर में निवास करते हैं — यह विचार सुनकर धीर बुद्धि वाले भी स्थिर नहीं रह पाते। जब कौसल्या को यह ज्ञान उत्पन्न हुआ, तो प्रभु मुस्कराए, और उन्होंने कई प्रकार की लीलाएँ करने की इच्छा प्रकट की। एक सुंदर कथा कहकर उन्होंने माता को समझाया, जिससे माता को पुत्र-प्रेम प्राप्त हो सके।

दोहा

माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥

माता ने फिर कहा — हे तात, यह विराट रूप त्याग दो, मेरी बुद्धि डाँवाडोल हो रही है। शिशु-लीला करो, जो अत्यंत प्रिय और सुंदर है, यही परम अनुपम सुख है। यह वचन सुनकर सुजान प्रभु ने रोना आरंभ कर दिया, और देवताओं के भी राजा साधारण शिशु बन गए। जो यह चरित्र गाते हैं, वे हरि-चरणों को पाते हैं, वे कभी संसार-रूपी कुएँ में नहीं गिरते।

दोहा

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार१९२

ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के हित के लिए उन्होंने मनुष्य-अवतार लिया, अपनी ही इच्छा से माया-निर्मित शरीर धारण किया, जो गुणों और वाणी दोनों से परे है।

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी॥हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनंद मगन सकल पुरबासी॥

शिशु का रोना सुनकर, जो अत्यंत प्रिय वाणी लगी, सभी रानियाँ हड़बड़ाकर वहाँ दौड़ आईं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं, और सभी नगरवासी आनंद में डूब गए।

दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा॥

दशरथजी ने जब कानों से पुत्र-जन्म का समाचार सुना, तो मानो उन्हें ब्रह्मानंद के समान सुख मिला। परम प्रेम से मन और शरीर रोमांचित हो उठे, वे धैर्यपूर्वक उठने का प्रयत्न करने लगे।

जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥

जिनका नाम सुनते ही शुभ होता है, वही प्रभु मेरे घर आए हैं — परमानंद से भरे मन से राजा ने बुलवाकर कहा — बाजे बजवाओ।

गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥

गुरु वसिष्ठ को बुलवाया गया, वे ब्राह्मणों सहित राजद्वार पर आए। अनुपम बालक को जाकर देखा, जिनके रूप और गुणों की राशि का कोई अंत नहीं था।

दोहा

नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह१९३

नांदीमुख श्राद्ध करके सारे जातकर्म संस्कार संपन्न किए। राजा ने ब्राह्मणों को सोना, गाय, वस्त्र और मणियाँ दान में दीं।

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥

नगर को ध्वज, पताका और तोरणों से इस प्रकार सजाया गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, सभी लोग ब्रह्मानंद में मग्न हो गए।

बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई॥कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥

बूँद-बूँद मिलकर जैसे जल-धारा बनती है, वैसे ही स्त्रियाँ समूह बनाकर चलीं, सहज शृंगार करके दौड़ पड़ीं। सोने के कलश और मंगल थाल भरकर वे गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करने लगीं।

करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥

आरती करके वे न्योछावर करतीं, बार-बार शिशु के चरणों में गिर पड़तीं। मागध, सूत, बंदीजन और गायक रघुनाथ के पवित्र गुण गाने लगे।

सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥

राजा ने सर्वस्व दान कर दिया, जिसने जो माँगा उसे कुछ भी नहीं रोका गया। कस्तूरी, चंदन और केसर का कीचड़ सी बन गई, गलियों के बीच-बीच में यह सब बिखरा पड़ा था।

दोहा

गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद१९४

घर-घर शुभ बधाई के बाजे बजने लगे, सुंदरता के कंद प्रभु प्रकट हुए। नगर के स्त्री-पुरुष सब जहाँ-तहाँ समूह बनाकर हर्षित हो उठे।

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥

कैकेयी और सुमित्रा, दोनों के भी सुंदर पुत्र उसी समय जन्मे। उस समय के सुख, संपत्ति और उत्सव का वर्णन शारदा और शेषनाग भी नहीं कर सकते।

अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥

अयोध्यापुरी इस प्रकार शोभा पा रही थी मानो प्रभु से मिलने रात्रि स्वयं चली आई हो। सूर्य को देखकर मानो उसका मन सकुचा गया हो, फिर भी अनुमानतः संध्या-सी शोभा बनी रही।

अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी॥मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥

अगर की धूप का इतना धुआँ था मानो अंधकार हो, उड़ती अबीर मानो लालिमा हो। महलों की मणियों के समूह मानो तारे हों, राजमहल के कलश मानो उदार चंद्रमा हों।

भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर समयँ जनु सानी॥कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥

भवनों में वेदध्वनि की अत्यंत मृदु वाणी गूँज रही थी, मानो पक्षियों का कलरव उस समय में घुल-मिल गया हो। यह कौतुक देखकर सूर्य भी भूल गया, एक मास बीतने पर भी उसे पता न चला कि वह जा रहा है।

दोहा

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ१९५

एक मास का दिन एक ही दिन जैसा बीत गया, इसका रहस्य कोई न जान सका। रथ सहित सूर्य ही मानो थम गया — फिर रात्रि कैसे हो सकती थी?

यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना॥देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥

यह रहस्य किसी ने भी नहीं समझा, सूर्य गुणगान करते हुए ही आगे बढ़ता रहा। यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने-अपने सौभाग्य का बखान करते हुए अपने धामों को लौट गए।

औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥

हे गिरिजा, एक और गुप्त बात मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम्हारी बुद्धि अत्यंत दृढ़ है इसलिए बताता हूँ — काकभुशुंडि और मैं दोनों वहाँ मनुष्य-रूप में उपस्थित थे, पर हमें कोई पहचान न सका।

परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम के जापर होई॥

परमानंद और प्रेम के सुख से फूले हुए लोग गलियों में मगन होकर घूमते फिरते, अपनी सुध-बुध भूल गए थे। यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिस पर राम की कृपा हो।

तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥

उस अवसर पर जिसे जो चाहिए था, राजा ने वैसा ही दिया जो जिसके मन को भाया। हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गाय, हीरे और नाना प्रकार के वस्त्र राजा ने दान किए।

दोहा

मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस।सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस१९६

सबका मन संतुष्ट हुआ, वे जहाँ-तहाँ आशीर्वाद देते — हे तुलसीदास के स्वामी, आपके सभी पुत्र चिरंजीवी हों।

कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥

इस प्रकार कुछ दिन बीत गए, दिन-रात का पता ही नहीं चला। नामकरण का अवसर जानकर राजा ने ज्ञानी मुनि को बुलवा भेजा।

करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥

पूजा करके राजा ने कहा — जो नाम मुनि ने विचार कर रखा हो, वही रख दीजिए। इनके तो अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं राजा होने के नाते अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ कहता हूँ।

जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥

जो आनंद का सागर और सुख की राशि हैं, जिनकी एक बूँद मात्र से तीनों लोक सुखी हो जाते हैं — वही सुख के धाम का नाम राम रखा गया, जो समस्त लोकों को विश्राम देने वाला है।

बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥

जो विश्व का भरण-पोषण करने वाले हैं, उनका नाम भरत रखा गया। जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश हो जाता है, उनका नाम शत्रुघ्न वेदों में प्रसिद्ध हुआ।

दोहा

लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार१९७

लक्षणों के धाम, राम को अत्यंत प्रिय, सारे जगत के आधार — गुरु वसिष्ठ ने उनका उदार नाम लक्ष्मण रखा।

धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥

गुरु ने हृदय में विचार करके ये नाम रखे — हे राजा, तुम्हारे ये चारों पुत्र वेद के तत्त्व स्वरूप हैं। जो मुनियों का धन, भक्तों के प्राण और शिवजी के प्राण-समान हैं, वे ही बालक्रीड़ा के रस में सुख मानने लगे।

बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥

बचपन से ही अपना हित पहचानकर, लक्ष्मण ने राम के चरणों में प्रेम धारण किया। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी-सेवक जैसी प्रीति और बड़प्पन था।

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥

श्याम और गौर वर्ण की सुंदर दोनों जोड़ी को देखकर माताएँ अपनी दृष्टि से तिनका तोड़तीं। चारों भाई शील, रूप और गुणों के धाम थे, फिर भी राम सबसे बढ़कर सुख के सागर थे।

हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥

उनके हृदय की कृपा चंद्रमा के प्रकाश जैसी थी, जिसकी किरणें उनकी मनोहर मुस्कान से झलकतीं। कभी गोद में, कभी सुंदर पालने में, माता उन्हें दुलारतीं और प्रिय ललना कहकर पुकारतीं।

दोहा

ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद१९८

व्यापक ब्रह्म, निरंजन, निर्गुण, विनोद-रहित — वही अजन्मा, प्रेम-भक्ति के वश होकर कौसल्या की गोद में क्रीड़ा कर रहे थे।

काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥अरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥

करोड़ों कामदेवों जैसी छवि वाला श्याम शरीर था, नीले कमल और गहरे बादल जैसा। लाल कमल-चरणों के नखों की ज्योति ऐसी थी मानो कमल-दलों में मोती जड़े हों।

रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा॥

चरणों में वज्र, ध्वज और अंकुश के चिह्न शोभा पाते थे, पैजनियों की ध्वनि सुनकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता। कमर में करधनी और उदर पर तीन रेखाएँ थीं, नाभि इतनी गहरी थी कि देखने वाला ही उसे जान सके।

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥

विशाल भुजाओं पर अनेक आभूषण थे, हृदय पर हरि के नख-चिह्न अत्यंत सुंदर शोभा पाते थे। वक्षस्थल पर मणिहार और पदक की शोभा थी, जिसे देखकर ब्राह्मणों का मन भी लोभ से भर जाता।

कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥

शंख के समान गर्दन, अत्यंत सुंदर ठोड़ी, मुख पर कामदेव की अनंत छटा छाई थी। दो-दो सुंदर दाँत और लाल होंठ, नासिका और तिलक का वर्णन भला कौन कर सकता है।

सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥

सुंदर भौंहें और मनोहर कपोल थे, अत्यंत प्रिय मीठी तोतली बोली थी। चिकने, घुँघराले और मुलायम बाल थे, जिन्हें माता अनेक प्रकार से सजातीं।

पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा॥

पीली झगुली पहनाकर, घुटनों के बल हाथों से चलते हुए, वे सबका मन मोह लेते थे। वेद और शेषनाग भी उनके रूप का वर्णन नहीं कर सकते, उसे तो वही जान सकता है जिसने स्वप्न में भी उसे देखा हो।

दोहा

सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत।दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत१९९

सुख की राशि, मोह और ज्ञान से परे, वाणी और इंद्रियों से अतीत — फिर भी परम प्रेम के वश होकर दंपति के लिए वे पवित्र शिशु-लीला करते रहे।

एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥

इस प्रकार राम, जो सारे जगत के माता-पिता हैं, कोसलपुरवासियों को सुख देने लगे। हे भवानी, जिन्होंने रघुनाथ के चरणों में प्रेम धारण किया, उन्हीं की यह गति प्रकट हुई।

रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥

रघुपति से विमुख होकर करोड़ों उपाय करने पर भी कौन संसार के बंधन से छूट सकता है। जिस माया ने सारे चराचर जीवों को अपने वश में कर रखा है, वह भी प्रभु के सामने भयभीत होकर काँपती है।

भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥

प्रभु की भौंहों के इशारे मात्र से वह माया नाचती है — ऐसे प्रभु को छोड़कर, कहो, किसे भजा जाए? मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़कर जो उन्हें भजते हैं, रघुराई उन पर कृपा करते हैं।

एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै॥

इस प्रकार प्रभु ने शिशु-विनोद किया, जिसने सारे नगरवासियों को सुख दिया। कभी गोद में लेकर झुलातीं, कभी पालने में डालकर हिलातीं।

दोहा

प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान२००

प्रेम में मग्न कौसल्या को रात-दिन का पता ही नहीं चलता, पुत्र-स्नेह के वश माता उनके बाल-चरित्र का गान करती रहतीं।

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥

एक बार माता ने उन्हें स्नान कराकर, शृंगार करके पालने में सुलाया। फिर स्वयं अपने कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा के लिए सामग्री सजाई।

करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥

पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया, फिर स्वयं वहाँ गईं जहाँ रसोई बन रही थी। फिर माता वहाँ से लौट आईं, तो उन्होंने पुत्र को भोजन करते देखा।

गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥

वे भयभीत होकर पुत्र के पास गईं, तो देखा कि बालक वहाँ पालने में सो रहा है। फिर लौटकर देखा तो पुत्र वहीं दिखा, उनका हृदय काँप उठा, मन को धैर्य न बँधा।

इहाँ उहाँ दुई बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥

यहाँ और वहाँ दोनों जगह बालक को देखकर वे सोचने लगीं — क्या यह मेरी बुद्धि का भ्रम है, या कुछ और विशेष बात है। यह देखकर माता व्याकुल हो उठीं, तब प्रभु ने हँसकर मधुर मुस्कान दी।

दोहा

देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड२०१

प्रभु ने माता को अपना अद्भुत और अखंड रूप दिखाया, जिसके रोम-रोम में करोड़ों-करोड़ों ब्रह्मांड समाए हुए थे।

अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥

असंख्य सूर्य, चंद्रमा, शिव, ब्रह्मा, अनेक पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी और वन — काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव — वह सब कुछ माता ने देखा, जो पहले कभी सुना भी नहीं था।

देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥

उन्होंने माया को भी सब प्रकार से सुदृढ़ देखा, अत्यंत भयभीत होकर वे हाथ जोड़े खड़ी रह गईं। उन्होंने जीव को देखा जिसे यह माया नचाती है, और भक्ति को भी देखा जो उसे उससे मुक्त करती है।

तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥

शरीर रोमांचित हो उठा, मुख से वाणी न निकली, आँखें मूँदकर उन्होंने चरणों में सिर नवाया। माता को विस्मित देखकर खरारि प्रभु फिर से शिशु-रूप में आ गए।

अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥

वे स्तुति भी नहीं कर पा रही थीं, भय से व्याकुल थीं — जगत के पिता को मैंने पुत्र समझकर व्यवहार किया! हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया — हे माता, सुनो, यह बात कहीं किसी से मत कहना।

दोहा

बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि२०२

कौसल्या बार-बार हाथ जोड़कर विनती करने लगीं — हे प्रभु, अब मुझे अपनी माया से फिर कभी मोहित न होने देना।

बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥

हरि ने इस प्रकार अनेक बाल-लीलाएँ कीं, जिससे सेवकों को अत्यंत आनंद मिला। कुछ समय बीतने पर सभी भाई बड़े हुए, परिवार को सुख देने लगे।

चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥

गुरु के यहाँ जाकर चूड़ाकर्म संस्कार संपन्न हुआ, ब्राह्मणों ने बहुत दक्षिणा पाई। चारों सुकुमार भाई परम मनोहर अपार लीलाएँ करते हुए घूमते-फिरते रहे।

मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥

मन, कर्म और वाणी से जो अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथ के आँगन में विचरण करते।

भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥

भोजन करते समय जब राजा श्रीराम को बुलाते, तो वे बाल-सखाओं का साथ छोड़कर नहीं आते।

कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई॥निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥

जब कौसल्या उन्हें बुलाने जातीं, तो प्रभु ठुमुक-ठुमुककर भाग जाते। वेद जिन्हें नेति-नेति कहते हैं, शिव भी जिनका अंत नहीं पा सके, उन्हीं को पकड़ने के लिए माता हठपूर्वक दौड़तीं।

धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥

धूल-धूसरित शरीर लिए वे लौट आते, राजा हँसकर उन्हें गोद में बिठा लेते।

दोहा

भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ२०३

भोजन करते समय चंचल चित्त इधर-उधर देखता, अवसर पाते ही किलकारी मारते हुए भाग जाते, मुख में दही-भात लपेटे हुए।

बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥

बालक्रीड़ा के ये अत्यंत सरल और सुंदर चरित्र शारदा, शेषनाग, शिव और वेदों ने गाए हैं। जिनका मन इनमें रमा नहीं, विधाता ने उन्हें वंचित ही रखा है।

भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥

जब सभी भाई कुमार अवस्था को प्राप्त हुए, तो गुरु, पिता और माता ने उन्हें यज्ञोपवीत धारण कराया। रघुनाथ गुरुकुल में पढ़ने गए, और अल्प समय में ही सारी विद्याएँ आ गईं।

जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला॥

जिनकी सहज साँस से ही चारों वेद प्रकट हुए, वही हरि पढ़ते हैं — यह भी एक बड़ा कौतुक ही है। विद्या, विनय में निपुण, गुण-शील से युक्त, वे सब राजोचित खेल खेलते।

करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥

हाथों में बाण-धनुष अत्यंत शोभा पाते थे, उनका रूप देखते ही चराचर जगत मोहित हो जाता। जिन गलियों में चारों भाई विचरण करते, वहाँ सभी लोग ठिठककर देखते रह जाते।

दोहा

कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल२०४

कोसलपुरवासी स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक — सभी को कृपालु राम प्राणों से भी अधिक प्रिय लगते थे।

बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥

भाइयों और सखाओं को साथ लेकर वे नित्य वन में शिकार खेलने जाते। यज्ञ योग्य पवित्र मृगों को समझ-बूझकर मारते, और प्रतिदिन राजा को दिखाने ले आते।

जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥

जो मृग राम के बाण से मारे जाते, वे शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले जाते। भाई और सखा साथ में भोजन करते, माता-पिता की आज्ञा का पालन करते।

जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥

जिस प्रकार नगरवासी सुखी हों, कृपानिधान वैसा ही आयोजन करते। वे स्वयं मन लगाकर वेद-पुराण सुनते और अपने छोटे भाइयों को भी समझाकर सुनाते।

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥

प्रातःकाल उठकर रघुनाथ माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते। आज्ञा माँगकर नगर के कार्य करते, यह चरित्र देखकर राजा मन में हर्षित होते।

दोहा

ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप२०५

व्यापक, अगोचर, इच्छारहित, अजन्मा, निर्गुण, नाम-रूप से रहित — फिर भी भक्तों के लिए नाना प्रकार के अनुपम चरित्र करते रहते हैं।

यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥

यह सारा चरित्र मैंने गाकर कह दिया, अब आगे की कथा मन लगाकर सुनो। महामुनि ज्ञानी विश्वामित्र वन में एक शुभ आश्रम जानकर निवास करते थे।

जहँ जप जग्य जोग मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥

जहाँ मुनि जप, यज्ञ और योग करते, वे मारीच और सुबाहु से अत्यंत भयभीत रहते। यज्ञ होते देखकर राक्षस दौड़ पड़ते और उत्पात मचाकर मुनियों को दुःख पहुँचाते।

गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी॥तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥

गाधि-पुत्र विश्वामित्र के मन में चिंता व्याप्त हो गई — हरि के बिना ये पापी राक्षस मरेंगे नहीं। तब मुनिवर ने मन में विचार किया — प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिए अवतार लिया है।

एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई॥ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना॥

इसी बहाने जाकर मैं प्रभु के चरणों के दर्शन करूँ, विनती करके दोनों भाइयों को साथ ले आऊँ। ज्ञान-वैराग्य और सभी गुणों के आश्रय, उन्हीं प्रभु को मैं नेत्र भरकर देखूँ।

दोहा

बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।२०६

नाना प्रकार के मनोरथ करते हुए मार्ग में समय का पता ही नहीं चला। सरयू नदी में स्नान करके मुनि राजा के दरबार में पहुँचे।

मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥

जब राजा ने मुनि के आगमन की सूचना सुनी, तो ब्राह्मण-समाज सहित उनसे मिलने चले। दंडवत प्रणाम करके मुनि का सम्मान किया और उन्हें अपने आसन पर बिठाया।

चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा॥

चरण धोकर अत्यंत आदर से पूजा की — आज मेरे समान धन्य कोई दूसरा नहीं। अनेक प्रकार के भोजन करवाए, मुनिवर के हृदय को बड़ा हर्ष हुआ।

पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥

फिर राजा ने अपने चारों पुत्रों को मुनि के चरणों में डाल दिया, राम को देखकर मुनि अपनी देह की सुध भूल गए। उनका मुखड़ा देखते ही मुनि ऐसे मग्न हो गए मानो चकोर पूर्ण चंद्रमा को देखकर लालायित हो उठे हों।

तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥

तब हर्षित मन से राजा ने कहा — हे मुनि, आपने ऐसी कृपा पहले कभी नहीं की। बताइए आपके आगमन का क्या कारण है, जो भी आज्ञा हो, मैं बिना देर किए वह करूँगा।

असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥

राक्षसों का समूह मुझे सताता है, मैं याचना करने ही आपके पास आया हूँ, हे राजा। लक्ष्मण सहित राम मुझे दीजिए, राक्षसों के वध से मैं सनाथ हो जाऊँगा।

दोहा

देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान२०७

राजा दे दीजिए, मन में हर्षित होकर मोह और अज्ञान त्याग दीजिए। यह आपके लिए धर्म और सुयश का काम है, प्रभु, और इनके लिए भी यह अत्यंत कल्याणकारी होगा।

सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥

यह अत्यंत अप्रिय वाणी सुनकर राजा का हृदय काँप उठा, मुख की कांति मुरझा गई — बुढ़ापे की चौथी अवस्था में मुझे ये चार पुत्र मिले हैं, आपने बिना विचारे ही यह बात कह दी, हे विप्र।

मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही॥

भूमि, गाय, धन और खजाना माँग लीजिए, आज मैं प्रसन्न होकर सर्वस्व दे दूँगा। प्राणों से बढ़कर मुझे कुछ भी प्रिय नहीं, हे मुनि, वह भी मैं एक पल में दे दूँगा।

सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई॥कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥

सभी पुत्र मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, हे स्वामी, राम को मैं वन में नहीं भेज सकता। कहाँ अत्यंत घोर और कठोर राक्षस, और कहाँ मेरे सुंदर, परम कोमल पुत्र!

सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥

राजा की प्रेम-रस में सनी यह वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि के हृदय में भी हर्ष हुआ। तब वसिष्ठजी ने बहुत प्रकार से समझाया, राजा को अपने संदेह का नाश होता दिखा।

अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥

अत्यंत आदर से दोनों पुत्रों को बुलवाया, हृदय से लगाकर उन्हें बहुत प्रकार से सीख दी — मेरे प्राण-समान दोनों पुत्रो, अब मुनि ही तुम्हारे पिता हैं, और कोई नहीं।

दोहा

सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस।जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस२०८(क)

राजा ने पुत्रों को ऋषि को सौंप दिया, बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिया। प्रभु माता के भवन में गए, फिर उनके चरणों में सिर नवाकर चल पड़े।

सोरठा

पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन२०८(ख)

पुरुषसिंह दोनों वीर हर्षित होकर मुनि के भय को हरने के लिए चल पड़े — कृपासागर, स्थिरबुद्धि, संपूर्ण विश्व के कारणों के भी कारण।

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥

लाल कमल जैसे नेत्र, विशाल भुजाएँ और वक्षस्थल, नीले कमल और तमाल वृक्ष जैसा श्याम शरीर। कमर में पीला वस्त्र बाँधे, सुंदर तरकश और दोनों हाथों में सुंदर धनुष-बाण लिए।

स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई॥प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना॥

श्याम और गौर वर्ण के दोनों सुंदर भाई, जिन्हें पाकर विश्वामित्र को मानो बड़ा खजाना मिल गया हो। मैं जानता हूँ कि प्रभु स्वयं ब्रह्मण्यदेव हैं, जिन्होंने मुझे अपने ही पिता के समान अपना लिया है।

चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥

मार्ग में जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखाया, यह सुनकर वह क्रोधित होकर दौड़ी। एक ही बाण से राम ने उसके प्राण हर लिए, और दीन जानकर उसे अपना पद दे दिया।

तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥

तब ऋषि ने अपने स्वामी को हृदय में पहचान लिया, और विद्यानिधि राम को उन्होंने अनेक विद्याएँ दीं। जिनसे भूख-प्यास नहीं लगती, अतुलित बल और शरीर में तेज प्रकट होता।

दोहा

आयुष सब समर्पि के प्रभु निज आश्रम आनि।कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि२०९

सारे अस्त्र-शस्त्र समर्पित करके प्रभु को अपने आश्रम ले आए, और भक्तिभाव जानकर उन्हें कंद-मूल-फल का भोजन कराया।

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥

सवेरे रघुनाथ ने मुनि से कहा — जाइए, निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। मुनि-समूह होम करने लगे, प्रभु स्वयं यज्ञ की रखवाली करते रहे।

सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥

यह सुनकर क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकों को लेकर मुनि-द्रोही होकर दौड़ पड़ा। राम ने बिना फल के बाण से उसे मारा, वह सौ योजन दूर जाकर समुद्र के पार जा गिरा।

पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥

फिर अग्निबाण से सुबाहु को मारा, और छोटे भाई ने राक्षसों की पूरी सेना का संहार कर दिया। असुरों को मारकर, ब्राह्मणों को निर्भय करके, देवता और मुनि-समूह स्तुति करने लगे।

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥

वहाँ रघुनाथ कुछ और दिन रहे, ब्राह्मणों पर कृपा करते रहे। भक्ति के हित से मुनियों ने अनेक पुराण-कथाएँ सुनाईं, यद्यपि प्रभु स्वयं सब कुछ जानते थे।

तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥

तब मुनि ने आदरपूर्वक समझाकर कहा — प्रभु, चलकर एक और लीला देखिए। धनुष-यज्ञ की बात सुनकर रघुकुल के स्वामी हर्षित होकर मुनिवर के साथ चल दिए।

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥

मार्ग में एक आश्रम दिखाई दिया, जहाँ पक्षी, पशु, कोई भी जीव-जंतु नहीं थे। प्रभु ने वहाँ एक शिला देखकर मुनि से पूछा, मुनि ने सारी कथा विस्तार से कही।

दोहा

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर२१०

गौतम की पत्नी शाप के वश पत्थर की देह धारण किए, धैर्यपूर्वक आपके चरण-कमलों की धूलि चाहती हैं, हे रघुवीर, कृपा कीजिए।

छंद

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥

प्रभु के पावन चरण-स्पर्श से शोक मिटाने वाली वह तपस्विनी सचमुच प्रकट हो गई। रघुनाथ को देखते ही, भक्तों को सुख देने वाले प्रभु के सम्मुख वह हाथ जोड़े खड़ी रह गई। अत्यंत प्रेम से अधीर होकर, शरीर रोमांचित होकर, मुख से कोई वचन न निकला। परम भाग्यवती वह उनके चरणों में लिपट गई, उसकी दोनों आँखों से जल की धारा बह चली।

दोहा

धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥

फिर उसने मन में धैर्य धारण करके प्रभु को पहचाना, रघुपति की कृपा से भक्ति प्राप्त की। अत्यंत निर्मल वाणी में उसने स्तुति आरंभ की — जय हो, हे ज्ञानगम्य रघुराई! मैं अपवित्र नारी हूँ, प्रभु आप जगत को पवित्र करने वाले हैं, हे रावण के शत्रु, भक्तों को सुख देने वाले। हे कमल-नयन, संसार के भय को हरने वाले, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, मैं शरण में आई हूँ।

दोहा

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना॥बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।

मुनि ने जो शाप दिया, वह अत्यंत भला ही किया, इसे मैंने परम अनुग्रह ही माना। मैंने नेत्र भरकर संसार के बंधन को हरने वाले हरि को देख लिया, यही लाभ शिवजी भी जानते हैं। हे प्रभु, मेरी एक ही विनती है, मैं भोली बुद्धि वाली हूँ, हे नाथ, मैं कोई और वर नहीं माँगती — बस मेरा मन आपके चरण-कमलों की पराग-सुगंध में भ्रमर के समान लीन रहे।

दोहा

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी॥

जिन चरणों से पवित्र गंगा प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने अपने सिर पर धारण किया, वही चरण-कमल, जिन्हें ब्रह्माजी भी पूजते हैं, हे कृपालु हरि, आपने मेरे सिर पर रख दिए। इस प्रकार गौतम की पत्नी अहिल्या हरि के चरणों में बार-बार गिरकर विदा हुई, जो मन को सबसे अधिक भाया वही वरदान पाकर वह आनंद से भरकर पति-लोक को चली गई।

दोहा

अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल२११

ऐसे प्रभु दीनबंधु हैं, बिना किसी कारण के ही दयालु हैं — हे मूर्ख तुलसीदास, कपट का सारा जंजाल छोड़कर उन्हीं को भजो।

चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥

राम, लक्ष्मण और मुनि साथ-साथ चले, जहाँ जगत को पवित्र करने वाली गंगा बहती थी। गाधि-पुत्र विश्वामित्र ने सारी कथा सुनाई कि किस प्रकार गंगा पृथ्वी पर आईं।

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥

तब प्रभु ने ऋषियों सहित स्नान किया, ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए। मुनि-समूह के साथ हर्षित होकर चलते हुए, वे शीघ्र ही विदेह-नगरी के निकट पहुँचे।

पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी॥बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना॥

जब राम ने नगर की रमणीयता देखी, तो अपने छोटे भाई सहित विशेष रूप से हर्षित हुए। अनेक बावड़ियाँ, कुएँ, नदियाँ और तालाब थे, जिनका जल अमृत के समान था, सीढ़ियाँ मणियों से जड़ी थीं।

गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥

मतवाले भँवरे मीठी गुंजार कर रहे थे, विविध रंगों के पक्षी मधुर बोल रहे थे। रंग-बिरंगे कमल खिले हुए थे, तीनों प्रकार की हवा सदा सुख देने वाली थी।

दोहा

सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास२१२

फूलों की वाटिकाएँ, बाग और वन पक्षियों के निवास से भरे थे, नगर के चारों ओर वे फूलते-फलते और लहलहाते हुए शोभा पा रहे थे।

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥

नगर की सुंदरता का तो वन में भी वर्णन नहीं हो सकता, जहाँ जहाँ मन जाता वहीं मोहित हो जाता। सुंदर बाजार और विचित्र अटारियाँ थीं, मानो ब्रह्माजी ने स्वयं अपने हाथों से मणियों से सजाई हों।

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना॥चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥

कुबेर के समान धनी व्यापारी अनेक प्रकार की वस्तुएँ लिए बैठे थे। सुंदर चौराहे और सुहावनी गलियाँ थीं, जो सदा सुगंधित जल से सिंचित रहती थीं।

मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें॥पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥

सभी घर मंगलमय थे, मानो कामदेव ने स्वयं उन्हें चित्रित किया हो। नगर के स्त्री-पुरुष सुंदर, पवित्र, संत-स्वभाव, धर्मशील, ज्ञानी और गुणवान थे।

अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥

राजा जनक का निवास अत्यंत अनुपम था, जिसकी शोभा देखकर देवता भी चकित रह जाते। किले को देखकर मन चकित हो उठता, मानो उसने सारे लोकों की शोभा को ही रोक रखा हो।

दोहा

धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति२१३

श्वेत महल, मणि और स्वर्ण से जड़े सुंदर वस्त्रों जैसे भवन, नाना प्रकार से सुघटित — सीता का सुंदर निवास-स्थान, उसकी शोभा भला कैसे कही जाए।

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥

सुंदर द्वारों पर वज्र जैसे मजबूत किवाड़ थे, राजाओं की भीड़, नट, मागध और भाट वहाँ उपस्थित थे। विशाल घोड़ों और हाथियों की शालाएँ बनी थीं, हर समय घोड़े-हाथी-रथों से भरी रहतीं।

सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥

अनेक शूरवीर, मंत्री और सेनापति थे, सबके घर राजमहल जैसे ही भव्य थे। नगर के बाहर तालाबों और नदियों के समीप, जहाँ-तहाँ अनेक राजा आकर ठहरे थे।

देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई॥कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥

एक अनुपम आम्रकुंज देखकर, जो हर प्रकार से सुखद और सुहावना था, कौशिक ने कहा — मेरा मन यही मानता है, यहीं रहिए, हे सुजान रघुवीर।

भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता॥बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥

कृपानिकेत राम ने कहा — बहुत अच्छा, हे नाथ, और मुनि-समूह सहित वहाँ ठहर गए। महामुनि विश्वामित्र आए हैं, यह समाचार मिथिलापति को मिला।

दोहा

संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति२१४

मंत्री, पवित्र आचरण वाले अनेक योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु और सगे-संबंधियों सहित, हर्षित राजा मुनिनायक से मिलने इस प्रकार चल पड़े।

कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥

राजा ने माथा टेककर प्रणाम किया, हर्षित मुनिनाथ ने आशीर्वाद दिया। सभी ब्राह्मण-समूह की आदरपूर्वक वंदना की, अपने बड़े भाग्य को जानकर राजा आनंदित हुए।

कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥

बार-बार कुशल-क्षेम पूछकर विश्वामित्र ने राजा को बिठाया। उसी अवसर पर दोनों भाई भी आ गए, जो फुलवारी देखने गए हुए थे।

स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥

श्याम और गौर वर्ण, कोमल किशोर अवस्था, नेत्रों को सुख देने वाले, विश्व के चित्त को चुराने वाले — जब रघुपति आए तो सब खड़े हो गए, विश्वामित्र ने उन्हें अपने निकट बिठाया।

भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥

दोनों भाइयों को देखकर सब सुखी हो उठे, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमांचित हो उठा। उस मधुर मनोहर मूर्ति को देखकर विदेहराज विशेष रूप से मुग्ध हो गए।

दोहा

प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर२१५

प्रेम में मग्न मन को जानकर, राजा ने विवेक और धैर्य धारण कर, मुनि के चरणों में सिर नवाकर गद्गद और गंभीर वाणी में कहा —

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥

हे नाथ, बताइए ये दोनों सुंदर बालक कौन हैं — मुनिकुल के तिलक हैं या राजकुल के पालक? जिस ब्रह्म को वेद नेति-नेति कहकर गाते हैं, क्या वही दोनों रूप धारण करके आए हैं?

सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥

मेरा स्वभाव से वैराग्यमय मन भी इन्हें देखकर वैसे ही चकित हो रहा है जैसे चंद्रमा को देखकर चकोर। इसीलिए, हे प्रभु, मैं सच्चे भाव से पूछता हूँ, कृपया छिपाइए मत, बताइए।

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥

इन्हें देखते ही मन में अत्यंत अनुराग उमड़ पड़ा, मानो मेरा मन बरबस ब्रह्म-सुख को भी त्यागने लगा। मुनि मुस्कराकर बोले — हे राजा, आपने बहुत अच्छा कहा, आपकी बात कभी असत्य नहीं हो सकती।

ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥

राम यह वाणी सुनकर मन-ही-मन मुस्कराए — जितने भी प्राणी हैं, ये सबको प्रिय हैं। ये रघुकुल-शिरोमणि दशरथ के पुत्र हैं, मेरे हित के लिए राजा ने इन्हें भेजा है।

दोहा

रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम२१६

राम और लक्ष्मण, ये दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बल के धाम हैं — इन्होंने ही मेरे यज्ञ की रक्षा की और सारे संसार को साक्षी बनाकर युद्ध में राक्षसों को जीत लिया।

मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ॥सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनंद दाता॥

राजा ने कहा — हे मुनि, आपके चरणों के दर्शन पाकर मैं अपने पुण्य का प्रभाव कह भी नहीं सकता। सुंदर श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई तो आनंद के भी आनंद-दाता हैं।

इन्ह के प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥

इनकी परस्पर पवित्र प्रीति कही नहीं जा सकती, वह मन को अत्यंत भाने वाली और सुहावनी है। हे नाथ, सुनिए — यह स्नेह वैसा ही सहज है जैसा ब्रह्म और जीव के बीच होता है, ऐसा विदेहराज ने प्रसन्न होकर कहा।

पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥

राजा बार-बार प्रभु को निहारते, शरीर रोमांचित हो उठता और हृदय में अत्यधिक उत्साह भर आता। मुनि की प्रशंसा करके, उनके चरणों में सिर नवाकर, राजा उन्हें लिवाकर नगर की ओर चले।

सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥

सुंदर और सर्वदा सुखद भवन में राजा ने उन्हें ठहराया। हर प्रकार से पूजा-सेवा करके राजा विदा लेकर अपने घर गए।

दोहा

रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु२१७

ऋषियों सहित रघुवंश-शिरोमणि प्रभु ने भोजन और विश्राम किया, फिर भाई सहित बैठे — इस प्रकार दिन का एक पहर बीत गया।

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥

लक्ष्मण के हृदय में विशेष लालसा उठी — जाकर जनकपुर देख आएँ। पर प्रभु के भय और मुनि के सामने संकोचवश वे प्रकट में नहीं कहते, बस मन-ही-मन मुस्कराते हैं।

राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी॥परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई॥

राम ने अनुज के मन की बात जान ली, उनके हृदय में भक्तवत्सलता उमड़ पड़ी। लक्ष्मण अत्यंत विनम्र होकर सकुचाते हुए मुस्कराए, फिर गुरु की आज्ञा पाकर बोले —

नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ॥

हे नाथ, लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, पर प्रभु के संकोच और भय से खुलकर नहीं कह पाते। यदि आपकी आज्ञा मुझे मिल जाए, तो मैं इन्हें नगर दिखाकर तुरंत ले आऊँ।

सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता॥

यह सुनकर मुनीश्वर प्रेमपूर्वक बोले — हे राम, तुम क्यों नहीं यह नीति रखते? तुम तो धर्म की मर्यादा के पालक हो, हे तात, प्रेम के वश सेवकों को सुख देना ही तुम्हारा स्वभाव है।

दोहा

जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।२१८

जाकर नगर देख आओ, हे सुख के भंडार दोनों भाइयो, सबकी आँखों को सफल करो, अपना सुंदर मुख दिखाकर।

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥

मुनि के चरण-कमलों की वंदना करके दोनों भाई चल पड़े, जो संसार के नेत्रों को सुख देने वाले हैं। बालकों का समूह उनकी अपार शोभा देखकर उनके साथ-साथ चलने लगा, नेत्रों का मन उन पर लोभित हो गया।

पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥

पीले वस्त्र, कमर में कसा हुआ तरकश, हाथों में सुंदर धनुष-बाण शोभा पा रहे थे। शरीर पर चंदन का लेप लगा था, श्यामल और गौर वर्ण की यह मनोहर जोड़ी अद्भुत लग रही थी।

केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥

सिंह जैसी गर्दन, विशाल भुजाएँ, वक्षस्थल पर अत्यंत सुंदर नागमणि की माला थी। सुंदर लाल कमल जैसे नेत्र, मुख चंद्रमा के समान, जो तीनों तापों को हरने वाला था।

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी॥

कानों में सोने के फूल शोभा दे रहे थे, मानो देखने वालों का चित्त ही चुरा लेते हों। सुंदर चितवन, बाँकी भौंहें और तिलक की रेखा ऐसी शोभा दे रही थी मानो चाँद पर निशान बना हो।

दोहा

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस२१९

सुंदर चोटीदार टोपी, काले घुँघराले केश सिर पर सुशोभित थे। पैर से सिर तक दोनों भाइयों की शोभा सर्वांग सुंदर और सुदेश थी।

देखन नगर भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी॥

नगर देखने के लिए राजपुत्र आए, यह समाचार नगरवासियों को मिला। सब अपने घर और काम-धाम त्यागकर दौड़ पड़े, मानो कोई गरीब खजाना लूटने जा रहा हो।

निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥

सहज सुंदर दोनों भाइयों को देखकर सब सुखी होकर नेत्रों का फल पाते। युवतियाँ महलों की खिड़कियों में आ बैठीं, अनुराग से राम के रूप को निहारने लगीं।

कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥

वे परस्पर प्रेमपूर्वक कहने लगीं — सखी, इन्होंने तो करोड़ों कामदेवों की छवि को भी जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में भी ऐसी शोभा कहीं सुनी नहीं गई।

बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही॥

विष्णु के चार भुजाएँ हैं, ब्रह्मा के चार मुख हैं, त्रिपुरारि शिव का विकट वेष और पाँच मुख हैं। इनके सिवा और कोई देवता ऐसा नहीं जिससे यह छवि, हे सखी, तुलना की जा सके।

दोहा

बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख घाम।अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम२२०

किशोर अवस्था, सौंदर्य का घर, श्याम और गौर वर्ण, सुख के धाम — इनके अंग-अंग पर करोड़ों-करोड़ों कामदेव न्योछावर किए जा सकते हैं।

कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥

कहो सखी, ऐसा कौन देहधारी होगा जो यह रूप देखकर मोहित न हो जाए? कोई प्रेमपूर्वक मृदु वाणी में बोली — हे सयानी, मैंने जो सुना है वह सुनो —

ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥

ये दोनों दशरथ के पुत्र हैं, मानो बाल हंसों की सुंदर जोड़ी हों। ये कौशिक मुनि के यज्ञ के रक्षक थे, जिन्होंने युद्धभूमि में राक्षसों को मारा था।

स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥

श्यामल शरीर, सुंदर कमल जैसे नेत्र, जिन्होंने मारीच और सुबाहु के मद को तोड़ा। कौसल्या के पुत्र यही सुख की खान हैं, नाम है राम, हाथ में धनुष-बाण लिए।

गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥

गौर वर्ण, सुंदर किशोर वेष सजाए, हाथ में बाण-धनुष लिए राम के पीछे चलते हैं। नाम है लक्ष्मण, राम के छोटे भाई, सुनो सखी, इनकी माता सुमित्रा हैं।

दोहा

बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि२२१

ब्राह्मण का कार्य करके, मार्ग में मुनि-पत्नी का उद्धार करके, दोनों भाई धनुष-यज्ञ देखने आए हैं, यह सुनकर सारी स्त्रियाँ हर्षित हुईं।

देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥

राम की छवि देखकर कोई एक कहने लगी — जानकी के लिए यही वर योग्य है। हे सखी, यदि राजा इन्हें देख लें, तो अपनी प्रतिज्ञा त्यागकर हठपूर्वक इन्हीं से विवाह करा दें।

कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥

कोई कहती — इन्हें राजा पहचान चुके हैं, मुनि सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान भी किया है। पर सखी, राजा अपनी प्रतिज्ञा नहीं त्यागते, भाग्यवश वे हठपूर्वक अविवेक का ही सहारा लेते हैं।

कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता॥तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥

कोई कहती — यदि विधाता ने भला ही सोचा हो, जैसा सब कहते हैं वह उचित फल देने वाला ही होता है, तो जानकी को यही वर मिलेगा, सखी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥

यदि विधाता के वश ऐसा ही संयोग बन जाए, तो सब लोग कृतकृत्य हो जाएँ। सखी, हमें तो बस इसी बात की चिंता है कि ये फिर कभी इसी बहाने यहाँ आएँ।

दोहा

नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।२२२

नहीं तो, सुनो सखी, इनके दर्शन हमसे दूर ही रह जाएँगे। यह सुयोग तभी बनेगा जब हमारे पूर्वजन्म के पुण्य बहुत अधिक हों।

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का॥कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा॥

दूसरी बोली — सखी, तुमने बहुत अच्छा कहा, यही विवाह सबके लिए अत्यंत हितकारी होगा। कोई कहती — पर शिवजी का धनुष तो अत्यंत कठोर है, और ये तो श्यामल, कोमल शरीर वाले किशोर हैं।

सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥

सब कुछ असमंजस में है, हे सयानी — यह सुनकर दूसरी मृदु वाणी में बोली — सखियो, कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि जो देखने में छोटे लगते हैं, उनका प्रभाव बड़ा होता है।

परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥

जिनके चरण-कमलों की धूलि छूकर अहिल्या ने अपने भारी पाप से मुक्ति पाई, क्या वे शिवजी के धनुष को तोड़े बिना ही रह जाएँगे? इस विश्वास को भूलकर भी मत छोड़ो।

जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी॥

जिन ब्रह्माजी ने सीता को रचकर सँवारा, उन्होंने ही विचार करके इस श्यामल वर को भी रचा है। उसकी यह बात सुनकर सब हर्षित हो उठीं, और मृदु वाणी में कहने लगीं — ऐसा ही हो।

दोहा

हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद२२३

सुमुखी और सुलोचनी स्त्रियाँ हृदय से हर्षित होकर फूल बरसाने लगीं, दोनों भाई जहाँ-जहाँ जाते, वहाँ-वहाँ परमानंद छा जाता।

पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥

दोनों भाई नगर की पूर्व दिशा में गए, जहाँ धनुष-यज्ञ के लिए भूमि सजाई गई थी। अत्यंत विस्तृत और सुंदर फर्श बिछाकर निर्मल वेदी सुंदर ढंग से सजाई गई थी।

चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बैठहिं महिपाला॥तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥

चारों दिशाओं में सोने के विशाल मंच बने थे, जहाँ राजा लोग बैठते। उनके पीछे और निकट, चारों ओर, दूसरी मंच-मंडलियाँ शोभा पा रही थीं।

कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥

कुछ ऊँची, हर प्रकार से सुहावनी, जहाँ नगरवासी जाकर बैठते। उनके निकट विशाल और सुंदर, सफेद रंग के अनेक प्रकार के भवन बनाए गए थे।

जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी॥पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥

जहाँ बैठकर सारी स्त्रियाँ अपने-अपने कुल के अनुरूप यथोचित स्थान पर देख सकें। नगर के बालक मीठी बातें करते हुए आदरपूर्वक प्रभु को यह सारी रचना दिखाने लगे।

दोहा

सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात२२४

सभी बालक इसी बहाने प्रेमवश दोनों भाइयों के मनोहर अंगों को छूकर शरीर से रोमांचित हो उठते, हृदय में अत्यधिक हर्ष अनुभव करते हुए बार-बार उन्हें निहारते।

सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥

राम ने सभी बालकों को प्रेमवश जान लिया, प्रीतिपूर्वक उनके-उनके घरों की प्रशंसा की। सब अपनी-अपनी इच्छा से उन्हें बुलाते, और दोनों भाई स्नेहसहित उनके साथ जाते।

राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥

राम अनुज को यह सारी रचना दिखाते, मीठे और मनोहर वचन कहते हुए — जिनकी माया एक पल में सारे भुवनों की रचना कर देती है,

भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥

वही दीनदयालु प्रभु भक्ति के हेतु चकित होकर धनुष-यज्ञशाला को निहार रहे थे। यह कौतुक देखकर, विलंब होने का भय मन में जानकर, वे गुरु के पास लौट चले।

जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई॥

जिनके भय से हर किसी का भय बना रहता है, वही प्रभु भजन का प्रभाव दिखा रहे थे। मीठी और सुहावनी बातें कहकर, उन्होंने बलपूर्वक बालकों को विदा किया।

दोहा

सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ२२५

भयभीत, प्रेमपूर्वक, अत्यंत विनम्र और संकोच सहित दोनों भाई गुरु के चरण-कमलों में सिर नवाकर, आज्ञा पाकर बैठ गए।

निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥

रात्रि होने पर मुनि ने आज्ञा दी, सबने संध्या-वंदन किया। पुरानी कथाएँ और इतिहास कहते-कहते वह सुंदर रात्रि के दो पहर बीत गए।

मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥

फिर मुनिवर शयन करने गए, दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे। जिनके चरण-कमलों की सेवा पाने के लिए वैरागी मुनि विविध जप-योग करते हैं,

ते दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥

वे दोनों भाई मानो प्रेम से जीत लिए गए हों, प्रीतिपूर्वक गुरु के चरण-कमल दबाते रहे। मुनि ने बार-बार आज्ञा दी, तब रघुवर जाकर शयन करने गए।

चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥

लक्ष्मण ने हृदय से लगाकर, भय और प्रेम सहित परम सुख पाते हुए, प्रभु के चरण दबाए। प्रभु बार-बार कहते — सो जाओ तात, फिर लक्ष्मण उनके चरण-कमल हृदय में धारण करके लेट गए।

दोहा

उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान२२६

रात्रि समाप्त होने पर, अरुणशिखा की ध्वनि कानों में सुनकर लक्ष्मण उठे — पर गुरु से भी पहले जगत के स्वामी सुजान राम जाग चुके थे।

सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥

सारे शौच-स्नान करके, नित्यकर्म पूरा करके मुनि को सिर नवाया। समय जानकर, गुरु की आज्ञा पाकर, दोनों भाई फूल लेने चल पड़े।

भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥

राजा जनक का सुंदर बाग देखने गए, जहाँ वसंत ऋतु मोहित होकर ठहरी हुई थी। मनोहर अनेक वृक्ष लगे थे, रंग-बिरंगी सुंदर लताओं के मंडप बने थे।

नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए॥चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥

नए पत्ते, फल और सुंदर फूल थे, जो अपनी संपदा से देवताओं के कल्पवृक्ष को भी लजाते थे। चातक, कोयल, तोता और चकोर पक्षी कूजते और सुंदर मोर नाचते।

मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥

बाग के बीच में एक सुंदर सरोवर शोभा पा रहा था, जिसकी मणि-सीढ़ियाँ विचित्र ढंग से बनी थीं। निर्मल जल में रंग-बिरंगे कमल थे, जलपक्षी बोलते और भँवरे गुंजार करते।

दोहा

बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत२२७

बाग और सरोवर को देखकर प्रभु भाई सहित हर्षित हुए — यह अत्यंत रमणीय उद्यान राम को बड़ा सुख देने वाला था।

चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥

चारों दिशाओं में देखकर, मालियों से पूछकर, वे प्रसन्न मन से फूल-पत्तियाँ लेने लगे। उसी अवसर पर सीता वहाँ आईं, माता ने उन्हें गौरी-पूजन के लिए भेजा था।

संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी॥सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥

सभी सुंदर और सुजान सखियाँ साथ थीं, मनोहर वाणी में गीत गा रही थीं। सरोवर के पास गौरी का मंदिर शोभा पा रहा था, जिसे देखकर मन मोहित हो जाता, उसका वर्णन नहीं हो सकता।

मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥

सखियों सहित सरोवर में स्नान करके, वे प्रसन्न मन से गौरी-मंदिर गईं। अत्यंत अनुराग से पूजा की, और अपने योग्य सुंदर वर माँगा।

एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥

एक सखी सीता का साथ छोड़कर, फुलवारी देखने चली गई थी। उसने दोनों भाइयों को जाते हुए देखा, और प्रेमवश दौड़कर सीता के पास आई।

दोहा

तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन२२८

उसकी यह दशा देखकर सखियों ने — शरीर रोमांचित, नेत्रों में जल — पूछा, अपने हर्ष का कारण बताओ, सब मृदु वचनों में पूछने लगीं।

देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥

बाग देखने दोनों राजकुमार आए हैं, किशोर अवस्था के, हर प्रकार से सुंदर। श्याम और गौर, कैसे कहूँ वर्णन करके, वाणी उनके लिए आँखों के बिना और नेत्र वाणी के बिना असमर्थ हैं।

सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि संग आए काली॥

यह सुनकर सारी सयानी सखियाँ हर्षित हुईं, सीता के हृदय में अत्यधिक उत्कंठा जान गईं। एक कहने लगी — सखी, यही वे राजकुमार हैं जिनके बारे में हमने कल मुनि के साथ आने की बात सुनी थी।

जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी॥बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥

जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी शक्ति से नगर के नर-नारियों को अपने वश में कर लिया है। सब लोग जहाँ-तहाँ उनकी छवि का बखान कर रहे हैं, वे अवश्य ही देखने योग्य हैं।

तासु बचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥

उसकी यह बात सीता को अत्यंत भाई, दर्शन के लिए नेत्र व्याकुल हो उठे। वह प्रिय सखी आगे-आगे चली, कोई नहीं जानता कि यह पुरातन प्रेम था।

दोहा

सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत२२९

नारद के वचनों का स्मरण करके सीता के हृदय में पवित्र प्रीति उमड़ पड़ी, वे चकित होकर सभी दिशाओं में देखने लगीं, मानो कोई भयभीत मृग-शावक हो।

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥

कंकन, करधनी और पायल की ध्वनि सुनकर, राम ने हृदय में विचारकर लक्ष्मण से कहा — मानो कामदेव ने अपना नगाड़ा बजाया हो, मन-ही-मन विश्व-विजय की घोषणा कर दी हो।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥

ऐसा कहकर उन्होंने फिर उसी दिशा में देखा, सीता का मुख चंद्रमा देखकर उनके नेत्र चकोर हो गए। नेत्र सुंदर और स्थिर हो गए, मानो निमि ऋषि ने संकोचवश दिशाएँ ही त्याग दी हों।

देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥

सीता की शोभा देखकर राम को सुख हुआ, हृदय में सराहते रहे पर मुख से वचन न निकला। मानो ब्रह्माजी ने अपनी सारी निपुणता रचकर संसार को दिखाने के लिए प्रकट कर दी हो।

सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥

सुंदरता को भी सुंदर बनाने वाली, मानो शोभा-गृह में दीपशिखा जल रही हो। सारी उपमाएँ कवियों की जूठी हो चुकी हैं, विदेहकुमारी की तुलना किससे करूँ।

दोहा

सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि२३०

सीता की शोभा हृदय में सराहकर, अपनी दशा का विचार करते हुए, प्रभु ने पवित्र मन से समय के अनुरूप छोटे भाई से कहा —

तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई॥

हे तात, यह वही जनकतनया है, जिसके लिए धनुष-यज्ञ हो रहा है। सखियाँ उसे गौरी-पूजन के लिए ले आई हैं, वह फुलवारी में प्रकाश फैलाती घूम रही है।

जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥

जिसकी अलौकिक शोभा देखकर मेरा स्वाभाविक पवित्र मन भी चंचल हो उठा है। यह सब कारण विधाता ही जानते हैं, सुनो भाई, मेरे शुभ अंग फड़क रहे हैं।

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥

रघुवंशियों का यह सहज स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे अपने मन पर अत्यंत विश्वास है, जिसने स्वप्न में भी दूसरी स्त्री की ओर नहीं देखा।

जिन्ह के लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥

जो युद्ध में शत्रु को पीठ नहीं दिखाते, जो कभी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डालते, जिनके यहाँ याचक नहीं शब्द नहीं सुनते — ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में बहुत थोड़े हैं।

दोहा

करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान।मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान२३१

अनुज से बातें करते हुए भी राम का मन सीता के रूप में लोभित हो गया था, मानो भ्रमर उनके मुख-कमल की मकरंद-छटा का पान कर रहा हो।

चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥

सीता चकित होकर चारों दिशाओं में देख रही थीं — राजकुमार कहाँ गए, इसी चिंता में मन डूबा था। जहाँ भी वे मृग-शावक जैसी आँखों से देखतीं, वहीं मानो श्वेत कमलों की पंक्ति बरस उठती।

लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥

तब सखियों ने उन्हें लता की ओट से दिखाया — श्यामल और गौर सुंदर किशोर। उनका रूप देखकर नेत्र ललचा उठे, हर्षित हुए मानो अपनी ही खोई निधि पहचान ली हो।

थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥

रघुपति की छवि देखते-देखते नेत्र थक गए, पलकें भी झपकना भूल गईं। अधिक स्नेह से देह भोली-सी हो उठी, मानो चकोरी शरद ऋतु के चंद्रमा को निहार रही हो।

लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥

नेत्रों के मार्ग से राम को हृदय में बसाकर, सयानी सीता ने पलकों के किवाड़ बंद कर दिए। जब सखियों ने सीता को प्रेम-विभोर जाना, तो संकोचवश मन में कुछ कह न सकीं।

दोहा

लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ२३२

उसी अवसर पर लता-कुंज से दोनों भाई प्रकट हुए, मानो बादलों के पर्दे को हटाकर दो निर्मल चंद्रमा निकल आए हों।

सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥

शोभा की सीमा के समान सुंदर दोनों वीर, नीले और पीले कमल जैसे रंग के शरीर। सिर पर मोरपंख भली भाँति शोभा पा रहे थे, बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे थे।

भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥

ललाट पर तिलक और पसीने की बूँदें सुहा रही थीं, कानों में सुंदर आभूषणों की छटा छाई थी। विकट भौंहें, घुँघराले बाल, नए खिले कमल जैसे लाल नेत्र।

चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥

सुंदर ठोड़ी, नासिका और कपोल थे, मुस्कान का विलास मन को मोल ले लेता। मुख की छवि मुझसे कही नहीं जा सकती, जिसे देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाएँ।

उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥

वक्षस्थल पर मणिमाला, शंख जैसी सुंदर गर्दन, हाथी के बच्चे की सूँड़ जैसी सुदृढ़ भुजाएँ। बाएँ हाथ में फूलों सहित दोना लिए, वह श्यामल कुँवर सखी को अत्यंत मनभावन लगे।

दोहा

केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान२३३

सिंह जैसी कमर, पीला वस्त्र धारण किए, सौंदर्य और शील के भंडार — सूर्यवंश के आभूषण राम को देखकर सखियाँ अपनी सुध-बुध ही भूल गईं।

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥

एक सयानी सखी ने धैर्य धारण करके, सीता का हाथ पकड़कर कहा — फिर से गौरी का ध्यान करो, राजकुमार को देख क्यों नहीं लेतीं?

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥नख सिख देखि राम के सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥

संकोचवश सीता ने तब नेत्र खोले, सम्मुख दोनों रघुसिंहों को निहारा। नख से शिख तक राम की शोभा देखकर, पिता की प्रतिज्ञा का स्मरण करके मन अत्यंत व्याकुल हो उठा।

परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥

जब सखियों ने देखा कि सीता परवश हो गई हैं, तो देर होते देख सब भयभीत होकर कहने लगीं — कल इसी समय फिर आएँगे, ऐसा कहकर एक सखी मन-ही-मन मुस्कराई।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने॥

यह गूढ़ वचन सुनकर सीता सकुचा गईं, देर होते देख माता के भय से डर गईं। बड़ा धैर्य धारण करके, राम को हृदय में बसाकर, वे अपनी स्थिति को पिता के अधीन जानकर लौट पड़ीं।

दोहा

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥२३४

देखने के बहाने मृग-पक्षी और वृक्षों को निहारते हुए वे बार-बार मुड़तीं, रघुवीर की छवि देख-देखकर उनकी प्रीति कम नहीं बल्कि और बढ़ती जाती।

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥

शिवजी के धनुष को कठिन जानकर वे व्याकुल थीं, श्यामल मूर्ति को हृदय में बसाए हुए वे चल पड़ीं। जब प्रभु ने जानकी को जाते देखा, तो सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान —

परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही॥गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥

उन्होंने परम प्रेममय, मृदु स्याही बनाई, और अपने सुंदर चित्त की भित्ति पर उसे अंकित कर लिया। सीता भी लौटकर भवानी के मंदिर गईं, चरण वंदन करके हाथ जोड़कर बोलीं —

जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥

जय जय, हे गिरिराज की किशोरी! जय, हे महेश के मुख-चंद्रमा की चकोरी! जय, हे गजानन और षडानन की माता! हे जगत-जननी, आपका शरीर बिजली की चमक-सा है।

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥

आपका न आदि है, न मध्य, न अंत — आपका अपार प्रभाव तो वेद भी नहीं जानते। आप संसार के ऐश्वर्य और पराभव दोनों की कारण हैं, विश्व को मोहित करने वाली, अपनी ही इच्छा से विहार करने वाली हैं।

दोहा

पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष२३५

गौरी कहती हैं - पतिव्रता स्त्रियों में सबसे पहले तुम्हारा ही नाम आता है, हे सीता; तुम्हारी महिमा इतनी अपार है कि हजार शारदा और शेषनाग भी मिलकर उसका पूरा वर्णन नहीं कर सकते।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥

हे वरदायिनी, हे शिवप्रिया! तुम्हारी सेवा से चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सहज ही मिल जाते हैं। हे देवी! तुम्हारे चरण-कमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।

मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥

तुम मेरे मन की इच्छा भलीभाँति जानती हो, तुम सबके हृदय में सदा निवास करती हो; इसीलिए मैंने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की। ऐसा कहकर सीता ने देवी के चरण पकड़ लिए।

बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥सादर सिय प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥

सीता की विनय और प्रेम से भवानी प्रसन्न हो गईं, प्रतिमा मुसकराई और गले की माला (आप ही) खिसक पड़ी। सीता ने आदरपूर्वक उस प्रसाद को सिर पर धारण किया, और हृदय में हर्ष भरकर गौरी बोल उठीं।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥

सुनो सीता, हमारा यह आशीर्वाद सत्य होगा, तुम्हारे मन की कामना अवश्य पूर्ण होगी। नारदजी का वचन सदा पवित्र और सत्य होता है, इसलिए वही वर तुम्हें मिलेगा जिसमें तुम्हारा मन रम गया है।

छंद

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

जिसमें मन रम गया है, वही सहज सुंदर साँवला वर तुम्हें मिलेगा; वह करुणा का सागर और सुजान है, तुम्हारे शील और स्नेह को वह भलीभाँति जानता है। इस प्रकार गौरी का आशीर्वाद सुनकर सीता अपनी सखियों सहित हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदास कहते हैं कि भवानी को बारंबार पूजकर सीता प्रसन्न मन से महल को लौट चलीं।

सोरठा

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे२३६

गौरी को अनुकूल जानकर सीता के हृदय का हर्ष कहा नहीं जा सकता; सुंदर मंगल के सूचक उनके बाएँ अंग फड़कने लगे।

हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥

मन-ही-मन सीता के सौंदर्य की सराहना करते हुए दोनों भाई गुरु के पास गए। सरल स्वभाव के राम ने विश्वामित्र मुनि से सब कुछ यथावत कह दिया, क्योंकि छल उनके स्वभाव को छूता तक नहीं था।

सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे॥

फूल पाकर मुनि ने अपनी पूजा पूर्ण की, फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया - तुम्हारे सब मनोरथ सफल हों। यह सुनकर राम और लक्ष्मण दोनों सुखी हुए।

करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥

भोजन करके ज्ञानी मुनि विश्वामित्र कुछ पुरानी कथाएँ सुनाने लगे। इस प्रकार दिन बीत गया; गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई संध्या-वंदन करने चले गए।

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥

पूर्व दिशा में सुंदर चंद्रमा उदय हुआ; राम ने उसे देखकर सीता के मुख जैसा जानकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि नहीं, चंद्रमा सीता के मुख के समान नहीं हो सकता।

दोहा

जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक२३७

चंद्रमा का जन्म समुद्र से हुआ, विष उसका बंधु है, दिन में वह मलिन पड़ जाता है और उस पर कलंक भी है - ऐसा बेचारा दरिद्र चंद्रमा भला सीता के मुख की समानता कैसे पा सकता है।

घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥

चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, विरहिणियों को दुख देता है, अवसर पाकर राहु उसे ग्रस लेता है; वह चकवा-चकवी को शोक देने वाला और कमल का शत्रु है - हे चंद्रमा, तुझमें तो बहुत अवगुण हैं।

बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे॥सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥

सीता के मुख की उपमा तुझसे देना ही बड़ा दोष और अनुचित कार्य होगा। इस प्रकार चंद्रमा के बहाने सीता की मुख-छवि का बखान करते हुए, रात बहुत बीत गई जानकर राम गुरु के पास लौट चले।

करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥

मुनि के चरण-कमलों में प्रणाम करके, आज्ञा पाकर वे विश्राम करने लगे। रात बीतने पर राम जागे और अपने भाई को देखकर इस प्रकार कहने लगे।

उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥

हे भाई, देखो सूर्य उदय हुआ, जो कमल, चकवा और सारे संसार को सुख देने वाला है। तब लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर प्रभु के प्रभाव को सूचित करने वाली कोमल वाणी में बोले।

दोहा

अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन२३८

हे प्रभु! जैसे सूर्योदय होते ही कुमुदिनी सकुचा जाती है और तारों की ज्योति फीकी पड़ जाती है, वैसे ही आपके आगमन का समाचार सुनकर सभी राजा बलहीन हो गए हैं।

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥

ये सब राजा तारों के समान थोड़ी बहुत चमक तो दिखा रहे हैं, पर धनुष रूपी घोर अंधकार को टाल नहीं सकते। जैसे रात्रि के अंत में कमल, चकवा, भ्रमर और अनेक पक्षी हर्षित होते हैं, वैसे ही आपके आगमन से सब हर्षित होंगे।

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥

हे प्रभु, ऐसे ही आपके सब भक्त धनुष टूटने पर सुखी होंगे। सूर्य उदय होते ही बिना परिश्रम अंधकार नष्ट हो जाता है, तारे छिप जाते हैं और संसार में तेज का प्रकाश फैल जाता है।

रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥

हे रघुनाथ! सूर्य ने अपने उदय के बहाने मानो आपका प्रताप ही सब राजाओं को दिखा दिया है। आपकी भुजाओं के बल की महिमा प्रकट करने के लिए ही धनुष तोड़ने की यह रीति प्रकट हुई है।

बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥

भाई के वचन सुनकर प्रभु मुसकराए, फिर पवित्र होकर सहज ही स्नान किया। नित्यकर्म करके वे गुरु के पास आए और उनके सुंदर चरण-कमलों में सिर नवाया।

सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥

तब राजा जनक ने शतानंद मुनि को बुलाया और तुरंत विश्वामित्र मुनि के पास भेजा। शतानंद ने आकर जनक का निमंत्रण सुनाया; विश्वामित्र प्रसन्न होकर दोनों भाइयों को बुला लाए।

दोहा

सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ२३९

शतानंद के चरणों की वंदना करके प्रभु राम गुरु के पास जाकर बैठ गए। तब मुनि विश्वामित्र ने कहा - हे तात, चलो, राजा जनक ने बुलावा भेजा है।

सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥

चलकर सीता का स्वयंवर देखें, देखें ईश्वर किसे यह बड़ाई देता है। लक्ष्मण ने कहा - हे नाथ, यश का पात्र वही होगा जिस पर आपकी कृपा होगी।

हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥

लक्ष्मण की यह श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब मुनि हर्षित हुए और सुख मानकर सबने आशीर्वाद दिया। फिर कृपालु राम मुनियों के समूह सहित धनुष-यज्ञशाला देखने चले।

रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥

दोनों भाई रंगभूमि में आ पहुँचे, यह समाचार सब नगरवासियों को मिल गया। तब बालक, युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी अपने घर का काम-काज भूलकर चल पड़े।

देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू॥

जनक ने देखा कि भीड़ बहुत भारी हो गई है, तब उन्होंने अपने विश्वसनीय सेवकों को बुलाकर कहा - तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सबको उचित आसन दो।

दोहा

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि२४०

सेवकों ने मीठे और विनम्र वचन कहकर सब स्त्री-पुरुषों को बिठाया, और उत्तम, मध्यम, निम्न तथा साधारण सबको उनके योग्य स्थान पर बिठाया।

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥

उसी अवसर पर राजकुमार वहाँ आए, मानो उनके शरीर में साक्षात मनोहरता ही छा गई हो। वे गुणों के सागर, चतुर और श्रेष्ठ वीर थे, एक का शरीर साँवला और दूसरे का गोरा सुंदर था।

राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥

राजाओं की सभा में वे दोनों ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो तारों के बीच दो पूर्ण चंद्रमा हों। जिस-जिस दर्शक की जैसी भावना थी, उसने प्रभु की मूर्ति वैसी ही देखी।

देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥

कोई उन्हें महान रणधीर वीर के रूप में देखता, मानो वीर रस ने ही शरीर धारण कर लिया हो। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो उन्हें कोई भयानक विकराल मूर्ति दिखाई दे रही हो।

रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा॥पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥

जो असुर छल से राजा का वेश धरकर वहाँ बैठे थे, उन्होंने प्रभु को साक्षात काल के समान प्रकट देखा। परंतु नगरवासियों ने तो दोनों भाइयों को नरों के भूषण और नेत्रों को सुख देने वाले रूप में देखा।

दोहा

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप२४१

सब स्त्रियाँ हर्षित हृदय से अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें निहारती थीं, मानो वह परम अनुपम मूर्ति साक्षात श्रृंगार-रस धारण कर सुशोभित हो रही हो।

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥

विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिनके अनेक मुख, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। मिथिलावासी उन्हें कैसे देखते थे - जैसे अपने प्रिय सगे-संबंधी को देखा जाता है, वैसे ही प्रेम से।

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥

राजा जनक सहित रानी सुनयना उन्हें अपने पुत्र के समान प्रेम से देखती थीं, वह प्रीति वर्णन नहीं की जा सकती। योगियों को वे परम तत्त्वमय, शांत, शुद्ध, सम और सहज प्रकाशस्वरूप दिखाई दिए।

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥

हरि के भक्तों ने दोनों भाइयों को अपने इष्टदेव के समान सबको सुख देने वाला देखा। और जिस भाव से सीता राम को निहार रही थीं, उस स्नेह और सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता।

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥

सीता स्वयं भी हृदय में जो अनुभव कर रही थीं उसे कह नहीं पातीं, फिर भला कोई कवि उसे कैसे कह सकता है। इस प्रकार जिस-जिस दर्शक का जैसा भाव था, उसने कोसलराज राम को वैसा ही देखा।

दोहा

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर२४२

राजाओं की उस सभा में कोसलराज के दोनों किशोर पुत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे - एक साँवले और एक गोरे सुंदर शरीर वाले - मानो वे सारे संसार के नेत्रों को चुराने वाले हों।

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥

दोनों की मूर्ति स्वभाव से ही मनोहर थी, करोड़ों कामदेव भी उनकी उपमा देने में तुच्छ पड़ जाएँ। उनके सुंदर मुख शरद ऋतु के चंद्रमा को भी लजाने वाले थे और उनके कमल-सरीखे नेत्र सबके मन को भाते थे।

चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥

उनकी सुंदर चितवन कामदेव के भी मन को हरने वाली थी, वह हृदय को इतनी भाती थी कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। उनके सुंदर कपोल, कानों में हिलते कुंडल, ठोड़ी, अधर और मृदु वाणी सब मनोहर थे।

कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥

उनकी हँसी चंद्रमा की चाँदनी को भी लजाने वाली थी, भौंहें विकट और नासिका मनोहर थी। उनके विशाल भाल पर तिलक झलकता था, और उनके केश देखकर भ्रमरों की पंक्ति भी लजा जाती थी।

पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥

उनके सिरों पर पीली टोपियाँ शोभा दे रही थीं, जिनमें बीच-बीच में फूलों की कलियाँ लगी थीं। उनकी शंख जैसी सुंदर ग्रीवा पर रेखाएँ ऐसी थीं मानो त्रिभुवन की समस्त सुंदरता की सीमा वहीं हो।

दोहा

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल२४३

उनके गले में गजमुक्ता की माला और वक्षस्थल पर तुलसी की सुंदर माला शोभित थी। उनके कंधे बैल के समान और चाल सिंह जैसी थी, उनकी विशाल भुजाएँ बल की निधि थीं।

कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे॥पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥

कमर में तरकश और पीत वस्त्र बँधे थे, हाथ में बाण और बाईं ओर सुंदर धनुष धारण किए थे। पीत यज्ञोपवीत सुशोभित था; इस प्रकार नख से शिख तक उनके सुंदर महान सौंदर्य की छटा छाई हुई थी।

देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥

उन्हें देखकर सब लोग सुखी हो गए, उनके नेत्रों की पुतलियाँ एकटक होकर हिलती ही न थीं। दोनों भाइयों को देखकर राजा जनक हर्षित हुए, फिर जाकर उन्होंने मुनि विश्वामित्र के चरण-कमल पकड़ लिए।

करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥

विनती करके जनक ने अपनी सारी कथा सुनाई और मुनि को समूची रंगभूमि दिखाई। दोनों सुंदर राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते, वहाँ-वहाँ सब लोग चकित होकर उन्हें निहारते थे।

निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥

सबने राम को अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार ही देखा, कोई भी उनका विशेष रहस्य नहीं जान सका। मुनि ने राजा से यज्ञशाला की सुंदर रचना की प्रशंसा की, जिसे सुनकर राजा जनक ने अत्यंत हर्ष और सुख पाया।

दोहा

सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल२४४

सब मंचों में से एक सबसे सुंदर, स्वच्छ और विशाल मंच था; राजा जनक ने मुनि विश्वामित्र सहित दोनों भाइयों को उसी मंच पर बिठाया।

प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भए तारे॥असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥

प्रभु राम को देखकर सब राजा हृदय से हार गए, मानो पूर्ण चंद्रमा के उदय होते ही तारे फीके पड़ गए हों। सबके मन में यह विश्वास हो गया कि राम के अतिरिक्त और कोई भी वह धनुष तोड़ नहीं सकता।

बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥

उस विशाल शिव-धनुष को बिना तोड़े ही सीता राम के गले में वरमाला डाल देंगी - ऐसा सोचकर राजा आपस में कहने लगे कि हे भाइयो, अपना यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर व्यर्थ यहाँ रुकने से अच्छा है घर लौट चलें।

बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥

यह वचन सुनकर दूसरे अज्ञानी और अंधे अभिमानी राजा हँस पड़े - बोले, धनुष तोड़ने पर ही तो विवाह होना निश्चित है, बिना तोड़े भला कुआँरी कन्या से विवाह कौन कर सकता है।

एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥

चाहे एक बार काल ही क्यों न सामने आ जाए, हम सीता के लिए युद्ध में विजय अवश्य पाएँगे। यह सुनकर दूसरे धर्मशील, हरिभक्त और बुद्धिमान राजा मुसकरा दिए।

सोरठा

सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे२४५०

वे बुद्धिमान राजा जानते थे कि राम ही सब राजाओं का घमंड दूर करके सीता से विवाह करेंगे; दशरथ के रणबाँके पुत्र से युद्ध में विजय पाना किसके वश की बात है।

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥

वे राजा आपस में कहने लगे - व्यर्थ डींग हाँककर मत मरो, क्या मन के कल्पित लड्डुओं से कभी भूख मिटती है। हमारी यह परम पवित्र सीख सुनो - सीता को साक्षात जगदंबा जानो।

जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥

राम को जगत का पिता समझकर नेत्र भरकर उनकी छवि निहार लो; ये दोनों भाई सुंदर, सुखदायी और समस्त गुणों की राशि हैं, स्वयं शिव के हृदय में निवास करने वाले हैं।

सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥

अमृत के समुद्र को पास छोड़कर मृगतृष्णा के जल को देखकर व्यर्थ दौड़कर क्यों मरते हो। जिस राजा को जो कुछ जँचे वह जाकर करे, हमने तो आज अपने जन्म का फल पा लिया है।

अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥

ऐसा कहकर वे भले राजा प्रेममग्न होकर उस अनुपम रूप को निहारने लगे। आकाश में विमानों पर चढ़े देवता भी यह दृश्य देख रहे थे, वे फूल बरसाते और मधुर गीत गाते थे।

दोहा

जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं२४६

शुभ अवसर जानकर राजा जनक ने सीता को बुलावा भेजा; सब चतुर और सुंदर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें साथ लेकर चलीं।

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥

सीता की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता, वे साक्षात जगदंबा हैं, रूप और गुणों की खान हैं। तुलसीदास कहते हैं - मुझे उनके लिए सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं, क्योंकि वे तो साधारण स्त्रियों के अंगों से जुड़ी हुई होती हैं।

सिय बरनिअ जेहि उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई॥जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया॥

सीता का वर्णन करने के लिए कैसी उपमा दी जाए - बुरा कवि कहलाकर भला अपयश कौन ले। यदि सीता की तुलना किसी अन्य स्त्री से करें, तो संसार में ऐसी सुंदर युवती है ही कहाँ।

गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥

सरस्वती वाचाल हैं, पार्वती का आधा शरीर शिव संग है, रति अपने पति कामदेव को अनंग जानकर अत्यंत दुखी रहती हैं, लक्ष्मी का प्रिय भाई विष और मदिरा है - ऐसे में सीता की तुलना लक्ष्मी से भी कैसे की जाए।

जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई॥सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू॥

यदि सौंदर्य का अमृत-सागर हो और परम रूपमय कच्छप भी वही हो, शोभा रूपी रस्सी और शृंगार रूपी मंदराचल हो, तो कामदेव अपने कमल-सरीखे हाथों से उसे मथकर सीता का सौंदर्य उत्पन्न करे।

दोहा

एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल२४७

इस प्रकार यदि सुंदरता और सुख की मूल लक्ष्मी उत्पन्न हों, तब भी कवि संकोच के साथ ही उन्हें सीता के समान कहते हैं, क्योंकि सीता की तुलना करना भी दुष्कर है।

चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी॥

बुद्धिमान सखियों को साथ लेकर सीता चलीं, वे मनोहर वाणी में मंगल गीत गा रही थीं। नवीन शरीर पर सुंदर साड़ी सुशोभित थी; जगत की माता की वह अतुलनीय छवि अपार थी।

भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥

सखियों ने सभी सुंदर आभूषण अंग-अंग पर सजाकर पहनाए थे। जब सीता ने रंगभूमि में पैर रखा, तो उनका रूप देखकर सब स्त्री-पुरुष मोहित हो गए।

हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई॥पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥

हर्षित देवताओं ने नगाड़े बजाए, अप्सराओं ने फूल बरसाकर गीत गाए। सीता के कमल-सरीखे हाथ में जयमाला शोभित थी; अकस्मात सब राजाओं की दृष्टि उन पर पड़ गई।

सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥

चकित मन से सीता ने राम को निहारा, और सब राजा मोहवश हो गए। मुनि विश्वामित्र के पास दोनों भाइयों को देखकर सीता के नेत्र मानो कोई निधि पाकर ललचाने लगे।

दोहा

गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि२४८

गुरुजनों की लाज और बड़ी सभा को देखकर सीता सकुचा गईं; उन्होंने राम को हृदय में बसाकर, सखी के शरीर की ओर देखने का बहाना बना लिया।

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥

राम का रूप और सीता की छवि देखकर सब स्त्री-पुरुषों ने पलक झपकना ही छोड़ दिया। सब सोच में पड़ गए, कुछ कहते हुए सकुचाते थे, और मन-ही-मन ब्रह्मा से विनती करने लगे।

हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू॥

हे विधाता, शीघ्र जनक की जड़ता दूर करो, और हमें भी ऐसी अच्छी बुद्धि दो। बिना विचार किए राजा अपना प्रण त्यागकर सीता और राम का विवाह करा दें।

जग भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू॥एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू॥

संसार भी इसे भला ही कहेगा और सबको यही भाएगा; हठ करने से तो अंत में हृदय में जलन ही होगी। इसी लालसा में सब लोग मग्न थे कि साँवला वर ही जानकी के योग्य है।

तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥

तब राजा जनक ने भाटों को बुलाया, वे राजाओं की प्रशस्ति गाते हुए चले आए। राजा ने कहा - जाकर मेरा प्रण सुनाओ; भाट हृदय में बड़े हर्ष के साथ चल पड़े।

दोहा

बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल२४९

भाटों ने श्रेष्ठ वचन बोले - हे समस्त राजाओ, सुनो, हम भुजा उठाकर राजा जनक का महान प्रण सुनाते हैं।

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥

राजाओं के भुजबल के लिए यह शिव-धनुष राहु के समान है, जो चंद्रमा को ग्रस लेता है, यह भारी और कठोर होना सबको विदित है। रावण और बाणासुर जैसे महाबली योद्धा भी इस धनुष को देखकर अपने गर्व सहित लौट गए थे।

सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा॥त्रिभुवन जय समेत बैदेही।। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही॥

उसी शिव के कठोर धनुष को आज राजसभा में जो कोई तोड़ देगा, वह त्रिभुवन-विजय के यश सहित बिना किसी विचार के सीता को वर लेगा।

सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे॥परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥

यह प्रण सुनकर सब राजा सीता को पाने की अभिलाषा करने लगे; अपने को वीर मानने वाले राजा मन में अत्यंत क्रोधित हो उठे। कमर कसकर वे अकुला उठे, और अपने इष्टदेव को सिर नवाकर चल पड़े।

तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥

क्रोध से तनकर, ताककर, निशाना साधकर राजा शिव-धनुष को पकड़ते थे, पर करोड़ों प्रकार से बल लगाने पर भी वह उठता नहीं था। जिन राजाओं के मन में कुछ विचार-शक्ति शेष थी, वे तो धनुष के पास जाते ही नहीं थे।

दोहा

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ२५०

मूर्ख राजा क्रोध से धनुष पकड़ते, पर वह उठता नहीं, और वे लज्जित होकर लौट जाते; मानो वह धनुष वीरों का भुजबल पाकर और भी अधिक भारी होता जा रहा हो।

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥

दस हजार राजा एक साथ धनुष उठाने लगे, पर वह टलने का नाम ही नहीं लेता था। शिव का धनुष वैसे ही नहीं डिगता था जैसे किसी कामी पुरुष के वचन से सती स्त्री का मन नहीं डिगता।

सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥

सब राजा हास्यास्पद हो गए, जैसे बिना वैराग्य के संन्यासी उपहास के पात्र बनते हैं। अपनी कीर्ति, विजय और भारी वीरता को गँवाकर वे बलपूर्वक धनुष से हारकर लौट चले।

श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥

हृदय से हारकर राजा शोभाहीन हो गए, और अपने-अपने समाज में जाकर बैठ गए। राजाओं की यह दशा देखकर जनक व्याकुल हो उठे और मानो क्रोध में डूबे वचन बोलने लगे।

दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना॥देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा॥

हमने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीप के अनेक राजा यहाँ आए, यहाँ तक कि मनुष्य शरीर धरकर देवता और दानव भी अनेक रणधीर वीर बनकर आए।

दोहा

कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय२५१

मनोहर कन्या, बड़ी विजय और अत्यंत सुंदर कीर्ति पाने वाला कोई है ही नहीं - मानो ब्रह्मा ने यह धनुष जीता न जा सकने वाला ही रचा हो।

कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥

कहो, यह लाभ किसे नहीं भाया, फिर भी किसी ने शिव का धनुष चढ़ाया तो नहीं। चढ़ाना और तोड़ना तो दूर, हे भाइयो, कोई इसे तिल भर भी भूमि से हिला तक न सका।

अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥

अब कोई अपने को वीर मानकर क्रोधित न हो; पृथ्वी को वीरहीन जानकर तुम सब आशा त्यागकर अपने-अपने घर चले जाओ - विधाता ने सीता का विवाह लिखा ही नहीं है, ऐसा जान पड़ता है।

सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥

यदि मैं अपना प्रण त्याग दूँ तो पुण्य नष्ट हो जाएगा, पर कुँआरी सीता को कुररी पक्षी की भाँति विलाप करते रहने दूँ तो मैं क्या करूँ। हे भाइयो, यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से रहित हो गई है, तो ऐसा प्रण करके अपनी हँसाई न कराता।

जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥

जनक के ये वचन सुनकर और सीता की व्याकुलता देखकर सब स्त्री-पुरुष दुखी हो गए। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे, उनकी भौंहें कुटिल हो गईं, होंठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोध से रँग उठे।

दोहा

कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान२५२

राम के डर से लक्ष्मण कुछ कह नहीं पा रहे थे, मानो उनके वचन बाण जैसे तैयार थे; राम के चरण-कमलों में सिर नवाकर वे प्रमाणपूर्ण वाणी में बोले।

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी॥

जिस सभा में रघुवंश का कोई भी वंशज उपस्थित हो, वहाँ ऐसी बात कोई नहीं कह सकता; परंतु रघुकुल के भूषण राम के प्रत्यक्ष विद्यमान होने पर भी राजा जनक ने ऐसी अनुचित वाणी कह डाली।

सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥

सुनिए, हे सूर्यकुल रूपी कमल के सूर्य! मैं यह अपने स्वभाव से कह रहा हूँ, कुछ अभिमान से नहीं - यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो मैं गेंद के समान ब्रह्मांड को भी उठा सकता हूँ।

काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥

मैं इसे कच्चे घड़े की तरह फोड़ सकता हूँ, मेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ। हे भगवान! आपके प्रताप की महिमा के आगे यह पुराना बेचारा शिव-धनुष है ही क्या।

नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं॥

हे नाथ! यह जानकर यदि आज्ञा हो तो मैं यह कौतुक करके दिखाऊँ - कमल की नाल की भाँति इस धनुष को चढ़ाकर, सौ योजन तक इसे लेकर दौड़ जाऊँ।

दोहा

तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ२५३

हे नाथ! आपके प्रताप-बल से मैं इसे छतरी के डंडे की तरह तोड़ दूँ; यदि ऐसा न करूँ तो आपके चरणों की सौगंध, मैं फिर कभी हाथ में धनुष-बाण न धरूँ।

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥

लक्ष्मण के क्रोधपूर्ण वचन ऐसे थे कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिग्गज हाथी डोलने लगे। सब लोग और सब राजा भयभीत हो गए, सीता के हृदय में हर्ष उमड़ा और जनक सकुचा गए।

गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥

गुरु विश्वामित्र, राम और सब मुनि मन-ही-मन प्रसन्न हुए, बारंबार पुलकित हो उठे। राम ने संकेत से लक्ष्मण को रोका और प्रेमपूर्वक अपने पास बिठा लिया।

बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥

शुभ अवसर जानकर विश्वामित्र अत्यंत स्नेहभरी वाणी में बोले - हे राम, उठो और शिव-धनुष को भंग करो, हे तात, जनक का यह संताप मिटा दो।

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥

गुरु का वचन सुनकर राम ने चरणों में सिर नवाया, उनके हृदय में न कोई हर्ष आया न विषाद। वे सहज स्वभाव से उठकर खड़े हो गए, उनकी चाल युवा सिंह को भी लजाने वाली थी।

दोहा

उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग२७४

मानो उदयाचल रूपी मंच पर बाल-सूर्य ही उदित हुआ हो - राम के उठते ही संतरूपी सब कमल खिल उठे और नेत्ररूपी सब भ्रमर हर्षित हो उठे।

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥

राजाओं की आशा-रूपी रात्रि नष्ट हो गई, उनके गर्वीले वचन-रूपी तारों की पंक्ति फीकी पड़ गई। अभिमानी राजा-रूपी कुमुदिनी सकुचा गई, और कपटी राजा-रूपी उल्लू छिप गए।

भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥

मुनि और देवता-रूपी चकवा शोकरहित हो गए, वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट करने लगे। गुरु के चरणों की वंदना करके प्रेमसहित राम ने मुनीश्वर से आज्ञा माँगी।

सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥

सारे जगत के स्वामी राम सहज ही चल पड़े, उनकी चाल मतवाले सुंदर श्रेष्ठ हाथी की भाँति थी।

चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥

श्रीराम के धनुष उठाने हेतु चलते ही सम्पूर्ण नगर के नर-नारी रोमांचित होकर आनंदित हो उठे।

बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं॥

पितरों और देवताओं को प्रणाम करके सब लोग अपने-अपने पुण्य का स्मरण करने लगे - यदि हमारे भी कुछ पुण्य का प्रभाव है, तो हे गणेश! हे स्वामी! राम शिव-धनुष को कमल-नाल की भाँति सहज ही तोड़ दें।

दोहा

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।२५५

राम को प्रेमपूर्वक निहारकर, सखियों को समीप बुलाकर, सीता की माता स्नेहवश विकल होकर वचन कहने लगीं।

सखि सब कौतुक देखनिहारे। जे कहावत हितू हमारे॥कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥

यहाँ तो सब लोग केवल तमाशा देखने वाले जुट आए हैं, जो हमारे हितैषी कहलाते हैं। कोई भी समझाकर गुरु से यह नहीं कहता कि ऐसे बालकों को यह हठ शोभा नहीं देता।

रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं॥

जिस धनुष को रावण और बाणासुर ने भी छुआ तक नहीं, जिसके सामने अभिमान करने वाले सब राजा हार गए, वही धनुष ये सेवक राजकुमार के हाथ में दे रहे हैं - क्या बाल हंस भला मंदराचल पर्वत उठा सकता है।

भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥

राजा की सारी बुद्धिमानी समाप्त हो गई, सखियों की यह अवस्था किसी से समझ में नहीं आ रही थी। तब एक चतुर सखी कोमल वाणी में बोली - हे रानी, तेजवान् पुरुष को छोटा समझकर तुच्छ न समझिए।

कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥

कहाँ छोटा-सा घड़े में जन्मा अगस्त्य मुनि और कहाँ अपार समुद्र - फिर भी उन्होंने समुद्र को सोख लिया, यह सुयश सारे संसार में विख्यात है। सूर्यमंडल देखने में छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही त्रिभुवन का अंधकार भाग जाता है।

दोहा

मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब२५६

मंत्र परम छोटा होता है, पर उसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देवता हो जाते हैं। बड़े मतवाले गजराज को भी छोटा-सा अंकुश वश में कर लेता है।

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥देबि तजिअ संसय अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी॥

कामदेव ने फूलों का धनुष-बाण लेकर ही सारे भुवन को अपने वश में कर लिया है। हे देवी, यह जानकर संशय त्याग दीजिए - राम अवश्य ही धनुष तोड़ेंगे, हे रानी, सुनिए।

सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥

सखी के वचन सुनकर सुनयना को विश्वास हो गया, उनका विषाद मिट गया और प्रीति और बढ़ गई। तब राम को निहारकर सीता भयभीत हृदय से जिस-तिस देवता से विनती करने लगीं।

मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥

व्याकुल होकर सीता मन-ही-मन देवताओं को मनाने लगीं - हे महेश, हे भवानी, प्रसन्न होइए। मेरी सेवा को सफल कीजिए, हित करके इस धनुष का भारीपन दूर कर दीजिए।

गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥

हे गणनायक, हे वरदायक देव! आज तक मैंने आपकी ही सेवा की है। मेरी यह बारंबार विनती सुनकर इस धनुष का भारीपन बहुत ही थोड़ा कर दीजिए।

दोहा

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर२५७

राम के शरीर को बार-बार निहारते हुए सीता धैर्य धरकर देवताओं को मनाती रहीं, उनके नेत्र प्रेम के आँसुओं से भर गए और शरीर पर रोमांच छा गया।

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥

नेत्र भरकर भलीभाँति राम की शोभा निहार लेने के बाद, पिता के प्रण का स्मरण करके सीता का मन फिर व्याकुल हो उठा - हाय तात, आपने कैसा भयंकर हठ ठान लिया, आप न कुछ लाभ समझते हैं न हानि।

सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई॥कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥

भयभीत मंत्री कोई सीख भी नहीं देता, विद्वानों की सभा में यह कितना अनुचित हो रहा है। कहाँ यह वज्र से भी कठोर धनुष और कहाँ यह साँवला कोमल शरीर वाला किशोर।

बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥सकल सभा के मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥

हे विधाता, मैं किस प्रकार हृदय में धीरज धरूँ - क्या शिरीष के कोमल फूल से हीरा बींधा जा सकता है। सारी सभा की बुद्धि भ्रमित हो गई लगती है; अब तो मेरी गति शिव-धनुष के भरोसे ही है।

निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं॥

सीता अपनी जड़ता दूसरों पर डालकर, राम को निहारकर मन-ही-मन कहने लगीं - हे धनुष, हलका हो जा। सीता के मन में अत्यंत संताप था, उन्हें पल भर भी सैकड़ों युग के समान बीत रहा था।

दोहा

प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल२५८

सीता कभी प्रभु को निहारतीं, कभी भूमि की ओर देखने लगतीं - उनके चंचल नेत्र ऐसे सुशोभित थे मानो चंद्रमंडल में कामदेव की दो मछलियाँ क्रीड़ा कर रही हों।

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना॥

सीता की वाणी-रूपी भ्रमरी को मुख-कमल ने रोक रखा था, लज्जा-रूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो पा रही थी। नेत्रों के कोने में आँसू ऐसे रुके थे जैसे किसी महाकंजूस का सोना व्यय होने से रुका रहता है।

सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥

अपनी व्याकुलता बहुत बढ़ती देख सीता सकुचा गईं, फिर धीरज धरकर हृदय में विश्वास लाईं - तन, मन, वचन से मेरा प्रण सत्य है, मेरा चित्त तो राम के चरण-कमलों में ही रम गया है।

तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर के दासी॥जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू॥

तो सबके हृदय में बसने वाले भगवान अवश्य मुझे राम की दासी बना देंगे। जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे अवश्य मिलता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे॥

सीता ने प्रभु के शरीर को निहारकर मन में प्रेम को दृढ़ किया; कृपानिधान राम यह सब जानते थे। सीता की ओर देखकर राम ने धनुष की ओर वैसे ही निगाह डाली जैसे गरुड़ किसी छोटे साँप की ओर देखता है।

दोहा

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु२५९

लक्ष्मण ने देखा कि रघुकुल-मणि राम ने शिव-धनुष की ओर निगाह डाल दी है; शरीर पुलकित होकर वे चरणों से मानो ब्रह्मांड को दबाकर वचन बोले।

दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥

हे दिशाओं के हाथियो, कच्छप, शेषनाग और वराह! धैर्य धरकर पृथ्वी को दृढ़ता से धारण करना, हिलना मत। राम शिव का धनुष तोड़ने वाले हैं, मेरी आज्ञा सुनकर सावधान हो जाओ।

चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥

जब राम धनुष के समीप आए, तब सब स्त्री-पुरुषों और देवताओं ने अपने-अपने पुण्यों का स्मरण करके मनौती मनाई।

सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥

सभी का संशय और अज्ञान मिटने लगा, और मंदबुद्धि राजाओं का अभिमान चूर होने लगा।

भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥

उस समय राजाओं के गर्व की भारी गरिमा, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की व्याकुलता, सीता की चिंता, जनक का पछतावा और रानियों का भयंकर दुखरूपी दावानल - सब एक साथ छाया हुआ था।

संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥

शिव-धनुष रूपी बड़ा जहाज पाकर सब लोग साथ मिलकर उस पर चढ़ गए थे, अर्थात सबकी आशा उसी पर टिकी थी। परंतु राम का बाहुबल तो अपार समुद्र है, जिसका पार पाना किसी खेवटिया के वश की बात नहीं।

दोहा

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि२६०

राम ने देखा कि सब लोग चित्र में खिंची हुई मूर्तियों के समान स्तब्ध खड़े हैं; फिर कृपानिधान राम ने सीता को अत्यंत विकल जानकर उनकी ओर देखा।

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥

राम ने देखा कि सीता अत्यंत विकल हैं, उनके लिए एक पल भी कल्प के समान बीत रहा है। प्यासे को जल न मिले और वह प्राण त्याग दे, तो मरने के बाद अमृत का तालाब भी उसके किस काम आएगा।

का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥

सारी खेती सूख जाने के बाद वर्षा किस काम की, अवसर चूक जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ। मन में ऐसा विचार कर राम ने सीता की ओर देखा, और सीता की विशेष प्रीति देखकर प्रभु स्वयं पुलकित हो उठे।

गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥

मन-ही-मन गुरु को प्रणाम करके राम ने अत्यंत सहजता से धनुष उठा लिया। जब उसे उठाया तो वह बिजली की भाँति चमक उठा, फिर आकाश में इंद्रधनुष के समान मंडलाकार दिखने लगा।

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सब ठाढ़ें॥तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥

धनुष को उठाना, चढ़ाना और जोर से खींचना - यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि खड़े देख रहे किसी को भी कुछ दिखाई न दिया। उसी क्षण राम ने धनुष को बीच से तोड़ डाला, जिसकी भयंकर कठोर ध्वनि से सारे भुवन गूँज उठे।

छंद

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही॥

उस भयंकर कठोर ध्वनि से सारे भुवन भर गए, सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर भटक गए। दिग्गज हाथी चीत्कार करने लगे, पृथ्वी डोल उठी, शेषनाग, वराह और कच्छप व्याकुल हो उठे। देवता, असुर और मुनि कान लगाकर व्याकुल होकर विचार करने लगे कि यह क्या हुआ। तुलसीदास कहते हैं कि राम ने शिव-धनुष खंडित कर दिया - यह जानकर सब जय-जयकार करने लगे।

सोरठा

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस२६१

शिव का धनुष एक जहाज के समान था और राम का बाहुबल मानो समुद्र था; जो-जो लोग पहले मोहवश उस धनुष-रूपी जहाज पर चढ़ गए थे, वह सारा समाज गर्व सहित डूब गया।

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥

प्रभु ने धनुष के दोनों टुकड़े भूमि पर डाल दिए, यह देखकर सब लोग सुखी हो गए। विश्वामित्र रूपी पवित्र समुद्र प्रेम-जल में सुहावने ढंग से डूब गया, अर्थात हर्ष से भर उठा।

रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी॥बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना॥

राम-रूपी पूर्ण चंद्रमा को निहारकर विश्वामित्र के हृदय में रोमांच की भारी लहरें उठने लगीं। आकाश में जोर-जोर से नगाड़े बजने लगे, देवांगनाएँ गीत गाते हुए नाचने लगीं।

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा॥बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला॥

ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की प्रशंसा करते हुए आशीर्वाद देने लगे। वे रंग-बिरंगे फूलों की मालाएँ बरसाने लगे, और किन्नर मधुर गीत गाने लगे।

रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥

सारे भुवन में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी, धनुष टूटने की गड़गड़ाहट कहाँ विलीन हो गई पता ही न चला। जहाँ-तहाँ प्रसन्न होकर स्त्री-पुरुष कहने लगे - राम ने शिव का भारी धनुष तोड़ डाला।

दोहा

बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर२६२

बुद्धिमान भाट, मागध और सूत राम की विरुदावली गाने लगे। सब लोग प्रसन्न होकर घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र न्योछावर करने लगे।

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥

झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुंदर नगाड़े - अनेक सुंदर वाद्य बजने लगे, और जहाँ-तहाँ युवतियाँ मंगल गीत गाने लगीं।

सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। परत थकें थाह जनु पाई॥

सखियों सहित रानी सुनयना अत्यंत हर्षित हुईं, मानो सूखते हुए धान पर वर्षा का जल पड़ गया हो। राजा जनक भी चिंता त्यागकर सुखी हो गए, मानो डूबते हुए थके तैराक को अचानक भूमि की थाह मिल गई हो।

श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥

धनुष टूटते ही सब राजा शोभाहीन हो गए, जैसे दिन में दीपक की चमक फीकी पड़ जाती है। सीता के सुख का वर्णन किस प्रकार करूँ - मानो चातकी को स्वाति नक्षत्र की बूँद का जल मिल गया हो।

रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें॥सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥

लक्ष्मण राम को कैसे निहार रहे थे - जैसे कोई किशोर चकोर चंद्रमा को निहारता है। तब शतानंद मुनि ने आज्ञा दी, और सीता राम के पास जाने के लिए चलीं।

दोहा

संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार२६३

सुंदर और चतुर सखियाँ साथ में मंगल गीत गाती जा रही थीं; बाल हंसिनी की सी चाल से सीता चलीं, उनके अंग-अंग में अपार सुंदरता थी।

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥

सखियों के बीच सीता कैसे सुशोभित हो रही थीं - जैसे सुंदरताओं के समूह के बीच साक्षात महाछवि हो। उनके कमल-सरीखे हाथ में वह सुंदर जयमाला थी जिसमें विश्व-विजय की शोभा छाई हुई थी।

तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी॥

शरीर में संकोच था पर मन में परम उत्साह; उनका गूढ़ प्रेम किसी से पहचाना नहीं जा सकता था। समीप जाकर जब सीता ने राम की छवि देखी, तो मानो वे किसी चित्र में खिंची कुँआरी की भाँति स्तब्ध रह गईं।

चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥

यह देखकर चतुर सखी ने समझाकर कहा - अब यह सुंदर जयमाला पहनाओ। यह सुनते ही सीता ने दोनों हाथों से माला उठाई, पर प्रेम में इतनी विवश हो गईं कि पहनाई ही नहीं जा रही थी।

सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥

सीता के दोनों हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो दो डंठल-सहित कमल किसी चंद्रमा को सभय होकर जयमाला अर्पित कर रहे हों। यह छवि देखकर सखियाँ गीत गाने लगीं, और अंततः सीता ने राम के गले में जयमाला डाल ही दी।

सोरठा

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन२६४

राम के गले में जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे; सब राजा ऐसे सकुचा गए जैसे सूर्य को देखकर कुमुदिनियाँ मुरझा जाती हैं।

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे॥सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥

नगर और आकाश दोनों में बाजे बजने लगे; दुष्ट लोग मलिन हो गए और सज्जन सब प्रसन्नता से चमक उठे। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर सब जय-जयकार करते हुए आशीर्वाद देने लगे।

नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं॥जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं॥

देवांगनाएँ नाचती-गाती थीं, बारंबार फूलों की अंजलि बरसाती थीं। जहाँ-तहाँ ब्राह्मण वेद-ध्वनि कर रहे थे, और भाट विरुदावली का उच्चारण कर रहे थे।

महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा॥करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥

पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकों में यह यश फैल गया कि राम ने धनुष तोड़कर सीता को वरण कर लिया। नगर के स्त्री-पुरुष आरती उतार रहे थे, धन का हिसाब भुलाकर न्योछावर कर रहे थे।

सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥

सीता-राम की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो छवि और शृंगार दोनों एक ही स्थान पर एकत्र हो गए हों। सखियाँ कहती थीं - सीता, प्रभु के चरण छू लो; पर अत्यंत भयभीत होने के कारण सीता चरण-स्पर्श नहीं कर रही थीं।

दोहा

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि२६५

गौतम की पत्नी अहिल्या की गति का स्मरण करके सीता हाथ से चरण नहीं छू रही थीं; यह देखकर रघुकुल-मणि राम मन-ही-मन मुसकराए, उन्होंने सीता की इस अलौकिक प्रीति को पहचान लिया।

तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥

तब सीता को देखकर जो क्रूर, कुपूत और मूर्ख राजा उन्हें पाने की लालसा रखते थे, वे मन-ही-मन क्रोधित हो उठे। वे अभागे राजा उठ-उठकर कवच पहनकर जहाँ-तहाँ डींगें हाँकने लगे।

लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥

कोई कहता - सीता को छीन लो; कोई कहता - इन दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़ देने से ही काम नहीं चलेगा - जब तक हम जीवित हैं, कोई कुँआरा भी सीता को कैसे वरण कर सकता है।

जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥

यदि विदेहराज जनक कुछ सहायता करें, तो दोनों भाइयों सहित युद्ध में उन्हें जीत लो। यह वाणी सुनकर भले राजा बोल उठे कि यह तो सारी राजसभा को ही लज्जित कर देने वाली बात है।

बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥

तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता और बड़ाई तो शिव-धनुष के साथ ही स्वर्ग सिधार गए। क्या वही वीरता अब कहीं और मिल गई है? यदि ऐसी बुद्धि है, तो विधाता ने तुम्हारे मुँह पर कालिख ही पोत दी है।

दोहा

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु२६६

ईर्ष्या, मद और क्रोध त्यागकर नेत्र भरकर राम को देखो; लक्ष्मण के रोष को प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे की तरह जलकर मत भस्म हो जाओ।

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥

जैसे कौआ गरुड़ का बल पाना चाहे, जैसे खरगोश शेषनाग के शत्रु का भाग्य पाना चाहे, जैसे बिना कारण क्रोध करने वाला व्यक्ति कुशलता चाहे - वैसे ही शिवद्रोही व्यक्ति समस्त संपदा पाना चाहता है।

लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥

लोभी और लालची व्यक्ति सुंदर कीर्ति चाहते हैं, पर क्या कामी को कभी निष्कलंकता मिलती है? भगवान के चरणों से विमुख व्यक्ति परम गति चाहे - हे राजाओ, तुम्हारा यह लालच भी वैसा ही व्यर्थ है।

कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥

यह कोलाहल सुनकर सीता सहम गईं; सखियाँ उन्हें रानी के पास ले गईं। राम सहज स्वभाव से गुरु के पास चले, मन-ही-मन सीता के स्नेह का स्मरण करते हुए।

रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥

रानियों सहित सीता चिंता में डूब गईं - अब न जाने विधाता क्या करने वाले हैं। राजाओं के ऐसे वचन सुनकर सब लोग इधर-उधर देखने लगे; लक्ष्मण राम के भय से आज्ञा बिना कुछ बोल नहीं पा रहे थे।

दोहा

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप२६७

लक्ष्मण के नेत्र लाल हो गए, भौंहें टेढ़ी हो गईं, वे क्रोधपूर्वक राजाओं की ओर देख रहे थे - मानो मतवाले हाथियों के झुंड को देखकर सिंह-शावक क्रोध से तमतमा उठा हो।

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा॥

यह हलचल देखकर नगर की स्त्रियाँ विकल हो गईं, और सब मिलकर राजाओं को गालियाँ देने लगीं। ठीक उसी अवसर पर शिव-धनुष टूटने का समाचार सुनकर भृगुकुल-रूपी कमल के सूर्य परशुराम वहाँ आ पहुँचे।

देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥

परशुराम को देखते ही सब राजा सकुचा गए, मानो बाज की झपट देखकर तीतर छिप जाते हैं। उनका गोरा शरीर भस्म से भलीभाँति सुशोभित था, विशाल भाल पर त्रिपुंड शोभित था।

सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥

सिर पर जटा और चंद्रमा-सा सुंदर मुख था, जो क्रोधवश कुछ लाल हो आया था। भौंहें टेढ़ी थीं, नेत्र क्रोध से रँगे हुए थे - वे सहज ही देखते तो भी मानो क्रोधित दिखाई देते थे।

दोहा

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥।कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥

उनके कंधे बैल के समान और वक्षस्थल-भुजाएँ विशाल थीं; सुंदर जनेऊ, माला और मृगछाला धारण किए थे। कमर में मुनि-वस्त्र और दो तरकश बँधे थे, हाथ में धनुष-बाण और कुठार तथा सुंदर करधनी थी।

दोहा

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप२६८

उनका वेश शांत था पर करनी कठोर थी, उनके स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता - मानो मुनि का शरीर धारण करके साक्षात वीर रस ही उस स्थान पर आ पहुँचा हो जहाँ सब राजा एकत्र थे।

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥

परशुराम का भयंकर वेश देखते ही सब राजा भयभीत होकर उठ खड़े हुए। पिता सहित अपना-अपना नाम बताते हुए सब दंडवत प्रणाम करने लगे।

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥

परशुराम जिस किसी को भी हितैषी समझकर सहज भाव से देख लेते, वह मानो अपनी मृत्यु ही सामने आई जानता। फिर राजा जनक ने आकर सिर नवाया और सीता को बुलाकर उनसे भी प्रणाम कराया।

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥

परशुराम ने आशीर्वाद दिया, सखियाँ हर्षित हुईं और बुद्धिमती सखियाँ सीता को अपने समाज में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर परशुराम से मिले, और दोनों भाइयों को उनके चरण-कमलों में प्रणाम कराया।

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥

यह जानकर कि ये राम-लक्ष्मण दशरथ के पुत्र हैं, परशुराम ने उनकी सुंदर जोड़ी देखकर आशीर्वाद दिया। राम को निहारते हुए उनके नेत्र मानो वहीं थककर ठहर गए, क्योंकि राम का रूप अपार था और कामदेव के मद को भी चूर करने वाला था।

दोहा

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर२६९

फिर जनक की ओर देखकर परशुराम ने पूछा - कहो, यहाँ इतनी भीड़ किस कारण है। यह पूछते समय वे मानो सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर पूछ रहे थे, और उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो गया।

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥

राजा जनक ने वह सारा समाचार सुनाया जिस कारण सब राजा वहाँ आए थे। यह वचन सुनते ही परशुराम ने दूसरी ओर देखा, तो भूमि पर पड़े धनुष के टुकड़े दिखाई दिए।

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष के तोरा॥बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

अत्यंत क्रोध से परशुराम कठोर वचन बोले - हे मूर्ख जनक, बताओ, यह धनुष किसने तोड़ा। शीघ्र दिखाओ, नहीं तो हे मूढ़, आज ही तुम्हारा जहाँ तक राज्य है, उसे उलट दूँगा।

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥सुर मुनि नाग नगर नर नारी।। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥

अत्यंत भय से राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे; इस पर कुटिल राजा मन-ही-मन हर्षित हुए। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के स्त्री-पुरुष सब हृदय में भारी त्रास के साथ सोचने लगे।

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥

सीता की माता मन-ही-मन पछता रही थीं - हाय विधाता, अब तक बनी हुई बात बिगड़ गई। परशुराम का स्वभाव सुनकर सीता के लिए आधा पल भी कल्प के समान बीतने लगा।

दोहा

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु२७०

परशुराम ने सब लोगों को भयभीत देखा और सीता को भी भयभीत जानकर उनका ध्यान गया; तब श्रीराम, जिनके हृदय में न कोई हर्ष था न विषाद, बोल पड़े।

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥

हे नाथ, शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा; मुझे क्या आज्ञा है, कहिए। यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम रुष्ट होकर बोले।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

सेवक वही है जो सेवा करे; शत्रु का काम करके फिर लड़ाई की क्या बात। सुनो राम, जिसने भी शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥

वह इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सब राजाओं सहित मारा जाएगा। मुनि के ये वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकरा उठे और परशुराम का अपमान करते हुए बोले।

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

हे स्वामी, बचपन में तो हमने कितने ही धनुष तोड़े हैं, पर आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इस धनुष पर आपकी इतनी ममता किस कारण है? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वजारूप परशुराम क्रोधित होकर बोले।

दोहा

रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार२७१

अरे राजकुमार, तू काल के वश होकर बोल रहा है, तुझे कुछ सुध-बुध नहीं रही। यह शिव का धनुष तेरे लिए साधारण धनुही के समान भले हो, पर यह तो सारे संसार में विख्यात है।

लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें॥

लक्ष्मण ने हँसकर कहा - हे देव, हमारी समझ में तो सब धनुष एक समान हैं। इस पुराने धनुष के टूटने से क्या हानि-लाभ हो गया? राम ने तो इसे केवल आँखों की चूक से देखा था।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥

छूते ही यह टूट गया, इसमें राम का भी कोई दोष नहीं है, फिर हे मुनि, आप व्यर्थ ही क्रोध क्यों कर रहे हैं। यह सुनकर परशुराम अपने फरसे की ओर देखते हुए बोले - अरे मूर्ख, तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना है।

बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥

तुझे बालक समझकर मैं मार नहीं रहा, तू मुझे केवल एक जड़ मुनि ही समझ रहा है। मैं आजन्म ब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी हूँ, संसार भर में विख्यात क्षत्रियकुल का शत्रु हूँ।

भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

मैंने अपने भुजबल से पृथ्वी को अनेक बार राजाओं से रहित करके ब्राह्मणों को दान कर दिया है। सहस्रबाहु की भुजाओं को काटने वाला यह मेरा फरसा है - हे राजकुमार, इसे भलीभाँति देख ले।

दोहा

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर२७२

हे राजकुमार, अपने माता-पिता को चिंतित न करा; मेरा यह अत्यंत भयंकर फरसा तो गर्भ में पल रहे बच्चों तक का नाश कर देने वाला है।

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥

हँसकर लक्ष्मण कोमल वाणी में बोले - अहो मुनीश्वर, आप तो अपने को बड़ा भारी योद्धा मानते हैं। आप बार-बार मुझे अपना कुठार दिखा रहे हैं, मानो फूँक मारकर पहाड़ को उड़ाना चाहते हों।

इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥

यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया जैसा कमजोर नहीं है, जो उँगली दिखाते ही डरकर मर जाए। आपका फरसा, धनुष-बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमानपूर्ण वचन कहे हैं।

भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥

आपको भृगुऋषि का पुत्र और आपका जनेऊ देखकर ही मैं क्रोध रोककर जो कुछ आप कहते हैं, सह लेता हूँ। देवता, ब्राह्मण, हरिभक्त और गाय - इन पर हमारे कुल में कभी शूरता नहीं दिखाई जाती।

बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥

आपको मारने से पाप लगेगा, और यदि हारकर भाग जाऊँ तो अपयश होगा - इसलिए मारते समय भी आपके ही चरणों में पड़ना उचित होगा। आपका वचन ही करोड़ों वज्र के समान है, अतः धनुष-बाण और कुठार व्यर्थ ही धारण किए हुए हैं।

दोहा

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर२७३

हे महामुनि, हे धीर! यदि आपकी अवस्था और स्वरूप देखकर मैंने कुछ अनुचित कह दिया हो तो क्षमा करें। यह सुनकर भृगुवंश-मणि परशुराम अत्यंत रोष के साथ गंभीर वाणी में बोले।

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥

हे विश्वामित्र, सुनिए - यह बालक अत्यंत मंदबुद्धि है, कुटिल काल के वश होकर अपने ही कुल का नाश करने वाला बन गया है। यह सूर्यवंश रूपी पूर्ण चंद्रमा पर कलंक है - नितांत निरंकुश, अज्ञानी और निडर है।

काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥

यह क्षण भर में काल का ग्रास हो जाएगा, मैं पुकारकर कह देता हूँ, फिर मुझे दोष मत देना। यदि आप इसे बचाना चाहते हैं तो इसे रोकिए - मेरे प्रताप, बल और रोष का यह हाल है।

लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥

लक्ष्मण ने कहा - हे मुनि, आपके यश का वर्णन तो आपके स्वयं रहते और कौन कर सकता है। आपने अपने मुख से अपनी ही करनी का बखान बारंबार, अनेक प्रकार से बहुत बार कर दिया है।

नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥

यदि अभी भी संतोष न हुआ हो, तो और कुछ कहिए; क्रोध रोककर असह्य दुख मत सहिए। आप वीरव्रती, धीर और अक्षुब्ध हैं - पर गाली देते हुए आपको शोभा नहीं मिलती।

दोहा

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु२७४

शूरवीर तो युद्ध में करनी करते हैं, कहकर अपनी वीरता प्रकट नहीं करते; कायर व्यक्ति ही शत्रु को सामने पाकर भी केवल अपने प्रताप की बातें बघारते हैं।

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥

लगता है काल ने ही तुम्हें हाँक लगाकर बार-बार मुझे बुलाने के लिए भेजा है। लक्ष्मण के ये कठोर वचन सुनते ही परशुराम ने अपने भयंकर फरसे को हाथ में सँभाल लिया।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥

अब लोग मुझे दोष न दें - यह कटुभाषी बालक तो वध के ही योग्य है। इसे बालक समझकर मैंने अब तक बहुत बचाया है, पर अब सचमुच यह मरने ही वाला है।

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥

विश्वामित्र ने कहा - हे मुनि, इसका अपराध क्षमा कीजिए, साधुजन बालकों के दोष-गुण नहीं गिनते। परशुराम बोले - मेरा कुठार तीक्ष्ण है, मैं निर्दयी और क्रोधी हूँ, और सामने खड़ा है एक अपराधी, गुरुद्रोही बालक।

उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥

यह जो उत्तर देते हुए भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, वह केवल हे विश्वामित्र, आपके शील के कारण है। नहीं तो अपने कठोर कुठार से इसे काटकर मैं थोड़े ही परिश्रम में अपने गुरु का ऋण चुका देता।

दोहा

गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ२७५

विश्वामित्र मन-ही-मन हँसकर कहते हैं - मुनि को हरा ही हरा दिखाई दे रहा है; यह लोहे की खाँड़ है, ईख की नहीं - यह मूर्ख अब तक भी नहीं समझ रहा।

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥

लक्ष्मण ने कहा - हे मुनि, आपका शील तो कौन नहीं जानता, यह तो सारे संसार में विदित है। आप माता-पिता के ऋण से तो भलीभाँति उऋण हो गए, बस गुरु का ऋण शेष रह गया, इसी की बड़ी चिंता आपके मन में है।

सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥

मानो वह ऋण हमारे ही माथे लिख दिया गया हो, और दिन बीतने से उसका ब्याज बहुत बढ़ गया है। अब किसी व्यवहारिये को बुलाकर हिसाब लगवा लीजिए, मैं तुरंत अपनी थैली खोलकर चुका दूँगा।

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बच नृपद्रोही॥

यह कटु वचन सुनकर परशुराम ने अपना कुठार सँभाल लिया, और सारी सभा में हाहाकार मच गया। तब लक्ष्मण फिर बोले - हे भृगुश्रेष्ठ, यह फरसा मुझे भी दिखाइए; आपको ब्राह्मण समझकर ही मैं ऐसे वचन कह रहा हूँ, नहीं तो आप तो राजाओं के भी शत्रु ठहरे।

मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥

आपको कभी घोर संग्राम में कोई श्रेष्ठ योद्धा मिला ही नहीं, आप तो ब्राह्मण-देवता घर में ही बड़े वीर बने बैठे हैं। यह सुनकर सब लोग पुकार उठे कि यह अनुचित है; तब राम ने संकेत से लक्ष्मण को रोक दिया।

दोहा

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु२७६

लक्ष्मण के उत्तर आहुति के समान थे और परशुराम का क्रोध अग्नि के समान बढ़ता जा रहा था; यह देखकर रघुकुल के सूर्य राम जल के समान शीतल वचन बोले।

नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥

हे नाथ, इस बालक पर दया कीजिए, यह भोला, दूध पीता बच्चा है, इस पर क्रोध न कीजिए। यदि इसे आपके प्रभाव का कुछ भी ज्ञान होता, तो यह नादान कभी आपसे बराबरी करने का साहस न करता।

जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥

बच्चे यदि कुछ नटखटपन करते हैं, तो गुरु, पिता और माता भी मन में प्रसन्न ही होते हैं। इसे बालक और अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए - आप जैसे शीलवान, धीर और ज्ञानी मुनि तो सदा दयालु ही होते हैं।

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने॥हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥

राम के वचन सुनकर परशुराम कुछ शांत हुए, पर लक्ष्मण फिर कुछ कहकर मुसकरा दिए। उन्हें हँसते देखकर परशुराम नख से शिख तक क्रोध से भर उठे - हे राम, तुम्हारा यह भाई तो बड़ा पापी है।

गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं॥

इसका शरीर गोरा है पर मन साँवला है, इसका मुख दूध जैसा नहीं बल्कि कालकूट विष जैसा है। यह स्वभाव से ही टेढ़ा है, तुम्हारे जैसा नहीं लगता; यह नीच काल के समान है, मुझे तुच्छ समझ रहा है।

दोहा

लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल२७७

लक्ष्मण ने हँसकर कहा - हे मुनि, सुनिए, क्रोध ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कार्य करते हैं और संसार के प्रतिकूल आचरण करते हैं।

मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥

हे मुनिराज, मैं तो आपका सेवक ही हूँ, अब क्रोध त्यागकर दया कीजिए। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से फिर जुड़ने वाला नहीं है, बल्कि खड़े-खड़े आपके पैर ही दुखने लगेंगे।

जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥

यदि यह धनुष आपको इतना प्रिय है, तो कोई उपाय कीजिए - किसी बड़े गुणी को बुलाकर इसे जुड़वा लीजिए। लक्ष्मण को यह बोलते देख जनक भयभीत होकर कहने लगे - चुप हो जाओ, यह अनुचित है, अच्छा नहीं है।

थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥

नगर के स्त्री-पुरुष थर-थर काँपने लगे - यह छोटा कुमार तो बड़ा दुष्ट है। लक्ष्मण की यह निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुराम का शरीर क्रोध से जलने लगा, मानो उनका बल ही क्षीण हो रहा हो।

बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं॥

परशुराम राम से याचना करते हुए बोले - मैं तुम्हारे छोटे भाई को नादान समझकर बचा रहा हूँ। इसका मन मलिन है पर शरीर कैसा सुंदर है - जैसे कोई सोने का घड़ा हो जो विष के रस से भरा हो।

दोहा

सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम२७८

यह सुनकर लक्ष्मण फिर हँस पड़े, तब राम ने नेत्र तरेरकर उन्हें रोका; लक्ष्मण सकुचाकर अपनी तीखी वाणी छोड़कर गुरु विश्वामित्र के पास चले गए।

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥

फिर राम दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र, कोमल और शीतल वाणी में बोले - सुनिए नाथ, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं, इस बालक की बातों पर कान न दीजिए।

बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा॥

बालकों का यही स्वभाव होता है कि संत जन कभी उन्हें दोष नहीं देते। इसने कोई काम नहीं बिगाड़ा, हे नाथ, अपराधी तो मैं ही हूँ।

कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई॥कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥

हे स्वामी, कृपा हो या क्रोध, वध हो या बंधन - सब मुझ पर ही कीजिए, जैसे स्वामी अपने दास के साथ करता है। हे मुनिनायक, शीघ्र बताइए जिस उपाय से आपका क्रोध शांत हो, मैं वही उपाय करूँगा।

कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥

मुनि परशुराम बोले - हे राम, मेरा क्रोध भला कैसे जाए, तुम्हारा यह छोटा भाई अभी भी मुझे टेढ़ी नजर से देख रहा है। यदि मैंने अभी तक इसके कंठ पर कुठार नहीं चलाया, तो मैंने क्रोध करके किया ही क्या।

दोहा

गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर२७९

मेरे इस कुठार की भयंकर गति सुनकर तो राजाओं की रानियों के गर्भ तक गिर जाते हैं; फिर भी मेरा यह फरसा हाथ में रहते हुए भी यह वैरी राजकुमार जीवित देखा जा रहा है।

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥

मेरा हाथ इस पर वार करने के लिए उठ ही नहीं रहा, छाती क्रोध से जल रही है, राजाओं का नाश करने वाला यह मेरा कुठार भी मानो कुंठित हो गया है। विधाता ही प्रतिकूल हो गया लगता है, मेरा स्वभाव ही बदल गया है - मेरे हृदय में कभी ऐसी कृपा कब हुआ करती थी।

आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा॥बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥

आज दया ने मुझे असह्य दुख भोगने पर विवश कर दिया है। यह सुनकर लक्ष्मण हँसकर सिर नवाकर बोले - अहा, आपकी यह कृपा-मूर्ति कितनी अनुकूल है, आपके मुख से तो मानो फूल झर रहे हैं।

जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भए तनु राख बिधाता॥देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥

यदि दया से ही मुनि का शरीर जल रहा है, तो विधाता जाने क्रोध होने पर इसका शरीर राख ही कर देगा। हे जनक, देखिए यह मूर्ख बालक कैसे हठपूर्वक यमपुर को अपना घर बनाना चाहता है।

बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा॥बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥

क्यों नहीं जल्दी अपनी आँखें फेर लेते - यह छोटा राजकुमार देखने में भी बड़ा दुष्ट लगता है। यह सुनकर लक्ष्मण हँस पड़े और मन-ही-मन कहा - आँखें मूँद लेने से भला कोई कहीं नहीं जाता, डर छिपता नहीं।

दोहा

परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु२८०

तब परशुराम हृदय में अत्यंत क्रोध लिए राम की ओर मुड़कर बोले - अरे मूर्ख, शिव के धनुष को तोड़कर अब तू मुझे ही उपदेश दे रहा है।

बंधु कह कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥

तेरा भाई कटु वचन कहता है, और तू सहमति देकर हाथ जोड़कर छल भरी विनय कर रहा है। मुझे युद्ध करके ही संतुष्ट कर, नहीं तो अपना नाम राम कहलाना छोड़ दे।

छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ॥

हे शिवद्रोही, छल त्यागकर युद्ध कर, नहीं तो मैं तुझे तेरे भाई सहित मार डालूँगा। परशुराम कुठार उठाकर इस प्रकार बड़बड़ाते रहे, पर राम मन-ही-मन मुसकराते हुए सिर नवाते रहे।

गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥

अपराध लक्ष्मण का, पर क्रोध आप हम पर कर रहे हैं; कहीं यदि आप शांत भी हुए तो उसमें बड़ा दोष होगा। सब कोई टेढ़े को ही सिर झुकाते देखे गए हैं - राहु भी टेढ़े चंद्रमा को कभी नहीं ग्रसता।

राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी॥

राम ने कहा - हे मुनीश्वर, क्रोध त्याग दीजिए, आपके हाथ में कुठार है और यह मेरा सिर आपके सामने प्रस्तुत है। जिस उपाय से आपका क्रोध शांत हो, वही कीजिए, हे स्वामी, मुझे अपना ही अनुगामी सेवक समझिए।

दोहा

प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु२८१

भला स्वामी और सेवक के बीच युद्ध कैसा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्रोध त्याग दीजिए। आपका वेश देखकर ही उस बालक ने कुछ कहा था, इसमें उस बालक का भी कोई दोष नहीं।

देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥

आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर इस बालक में क्षत्रिय-स्वभाव से वीर-रस का रोष जाग उठा। यह आपका नाम तो जानता है, पर आपको ठीक से पहचान नहीं सका, इसीलिए इसने अपने कुल के स्वभाव से ऐसा उत्तर दे दिया।

जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥

यदि आप मुनि के वेश में ही आए होते, तो हे स्वामी, यह बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर धारण करता। इसकी अनजाने में हुई इस चूक को क्षमा कीजिए - ब्राह्मण के हृदय में तो अपार कृपा होनी चाहिए।

हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहेँ माथा॥

हे नाथ, हमारी आपसे भला बराबरी कैसे - कहिए तो सही, कहाँ आपके चरण और कहाँ हमारा माथा।

राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥

मेरा नाम तो केवल राम है, छोटा-सा — पर तुम्हारा नाम फरसे सहित परशुराम है, जो बड़ा है।

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥

हे देव, हमारे धनुष में तो एक ही गुण होता है, पर आपमें तो नौ परम पवित्र गुण हैं। हम हर प्रकार से आपसे हारे हुए हैं - हे ब्राह्मण, हमारे इस अपराध को क्षमा कीजिए।

दोहा

बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम२८२

श्रेष्ठ मुनि बारंबार राम से शांत विनय के वचन कहते रहे, फिर भी परशुराम रोषपूर्वक हँसकर वैसे ही टेढ़े वचन बोले जैसे लक्ष्मण के प्रति बोले थे।

निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु॥

तुम मुझे केवल एक ब्राह्मण ही समझ रहे हो, तो सुनो, मैं कैसा ब्राह्मण हूँ यह भी बता दूँ। मेरा धनुष स्रुवा है, बाण आहुति है, और मेरा क्रोध अत्यंत भयंकर अग्नि है।

समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥

चतुरंगिणी सेना ही इस यज्ञ की समिधा है, और बड़े-बड़े राजा आकर इसमें पशु बने हैं। इसी फरसे से काटकर मैंने अनेक बलियाँ दी हैं, और युद्ध ही मेरा यज्ञ है जिसमें मैंने करोड़ों जप किए हैं।

मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥

मेरा प्रभाव तुम्हें ज्ञात नहीं है, इसीलिए तुम मुझे ब्राह्मण समझकर तुच्छ जानकर बोल रहे हो। धनुष तोड़ने भर से तुम्हारा घमंड इतना बढ़ गया है, मानो तुमने सारा जगत जीतकर खड़ा कर लिया हो।

राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना॥

राम ने कहा - हे मुनि, विचार करके देखिए, आपका क्रोध तो बहुत बड़ा है और हमारी चूक बहुत छोटी - वह पुराना धनुष तो छूते ही टूट गया, फिर मैं किस बात का अभिमान करूँ।

दोहा

जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ२८३

हे भृगुनाथ, सत्य सुनिए - यदि हम ब्राह्मण कहकर आपका निरादर कर रहे होते, तो संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसके भय से हम सिर झुकाते।

देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥

देवता, दानव, राजा - चाहे कोई भी अनेक योद्धा हों, समान बल का हो या हमसे अधिक बलवान - यदि युद्ध में कोई हमें ललकारे, तो हम सुखपूर्वक लड़ लेते हैं, चाहे वह साक्षात काल ही क्यों न हो।

छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावर आना॥कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥

जो क्षत्रिय शरीर धारण करके भी युद्ध में डर जाए, वह नीच पुरुष अपने कुल पर कलंक ही लगाता है। यह मैं अपने कुल की प्रशंसा के लिए नहीं कह रहा, अपने स्वभाव के अनुसार कह रहा हूँ - रघुवंशी लोग काल से भी युद्ध में नहीं डरते।

बिप्रबंस के असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥

ब्राह्मण-वंश का यही तो प्रभाव है कि जो आपसे भी डरने वाला हो, वह भी निर्भय हो जाए। राम के ये कोमल और गूढ़ वचन सुनकर परशुराम की बुद्धि पर छाया हुआ भ्रम का पर्दा हट गया।

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥

परशुराम बोले - हे राम, हे लक्ष्मीपति, यह विष्णु-धनुष लीजिए और इसे खींचिए, जिससे मेरा संदेह मिट जाए। धनुष देते ही वह स्वयं राम के हाथ की ओर खिंच चला, यह देखकर परशुराम का मन विस्मय से भर गया।

दोहा

जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात२८४

तब परशुराम ने राम के वास्तविक प्रभाव को पहचान लिया; उनका शरीर रोमांचित और प्रफुल्लित हो उठा। दोनों हाथ जोड़कर वे ऐसे वचन बोलने लगे जिनमें हृदय का प्रेम समाया नहीं जा रहा था।

जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु॥जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥

हे रघुवंश-रूपी कमल-वन के सूर्य, आपकी जय हो! हे गहन दानव-कुल को भस्म करने वाली अग्नि, आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौओं का हित करने वाले, आपकी जय हो! हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम का नाश करने वाले, आपकी जय हो!

बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥

हे विनय, शील और करुणा के गुणों के सागर! आपकी जय हो, आपकी वाणी की रचना अत्यंत चतुर है। हे सेवकों को सुख देने वाले, सर्वांग सुंदर! आपकी जय हो, आपके शरीर की छवि करोड़ों कामदेवों के समान है।

करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥

मैं एक ही मुख से आपकी कैसे प्रशंसा करूँ - हे शिव के मन-मानस-सरोवर के हंस, आपकी जय हो। मैंने अज्ञानवश बहुत अनुचित वचन कहे हैं, हे क्षमा के धाम, हे दोनों भाइयो, मुझे क्षमा कीजिए।

कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥

हे रघुकुल की ध्वजा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो - ऐसा कहकर परशुराम तपस्या के लिए वन को चले गए। यह देखकर कुटिल राजा अत्यंत भयभीत हो गए, और कायर राजा जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए।

दोहा

देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल२८५

देवताओं ने नगाड़े बजाए और प्रभु पर फूल बरसाए; नगर के सब स्त्री-पुरुष हर्षित हुए, उनका मोहमय संताप पूरी तरह मिट गया।

अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे॥जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी॥

अत्यंत जोरदार वाद्य बजने लगे, सबने मनोहर मंगल-साज सजा लिए। सुमुखी और सुनयनी स्त्रियाँ झुंड-झुंड में मिलकर कोयल-सी मधुर वाणी में गीत गाने लगीं।

सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥

राजा जनक का सुख वर्णन नहीं किया जा सकता, मानो किसी जन्म के दरिद्र को कोई निधि मिल गई हो। भय दूर होने पर सीता ऐसी सुखी हो उठीं मानो चंद्रमा के उदय होने पर चकोरी सुखी हो उठे।

जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई॥

जनक ने विश्वामित्र को प्रणाम करके कहा - आपके प्रसाद से ही राम ने धनुष तोड़ा, इन दोनों भाइयों ने मुझे कृतकृत्य कर दिया है। अब जो उचित हो, हे स्वामी, वह आज्ञा दीजिए।

कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। राम बिबाहु चाप आधीना॥टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु॥

मुनि विश्वामित्र ने कहा - सुनिए, हे प्रवीण नरनाथ! सीता का विवाह तो धनुष पर ही निर्भर था; धनुष टूटते ही विवाह हो गया समझिए, यह देवता, मनुष्य और नाग सबको विदित है।

दोहा

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु२८६

फिर भी अब आप जाकर अपने वंश की रीति के अनुसार व्यवहार कीजिए - ब्राह्मणों, कुल के वृद्धजनों और गुरु से पूछकर वेद-विदित आचार का पालन कीजिए।

दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई॥मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥

अयोध्यापुरी को दूत भेजिए, जो जाकर राजा दशरथ को बुला लाएँ। कृपालु जनक ने प्रसन्न होकर बहुत अच्छा कहा और उसी समय दूतों को बुलाकर भेज दिया।

बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥

फिर जनक ने सब नगर-सेठों को बुलाया, और सबने आकर आदरपूर्वक सिर नवाया। राजा ने कहा - बाजार, मार्ग, मंदिर और देवालय सहित सारे नगर को चारों ओर से सजा दो।

हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥

हर्षित होकर वे सब अपने-अपने घर लौट गए; फिर राजा ने सेवकों को बुला भेजा और कहा - सुंदर विचित्र मंडप रचकर बनाओ। यह आज्ञा सिर चढ़ाकर सेवक सुखपूर्वक चले गए।

पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥

मंडप बनाने में कुशल अनेक गुणी शिल्पियों को बुला भेजा गया। विधि-पूर्वक ब्रह्मा को प्रणाम करके उन्होंने कार्य आरंभ किया, और सोने के केले के खंभे बनाए।

दोहा

हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल२८७

हरे मरकत मणियों के पत्ते और पद्मराग मणियों के फूल बनाए गए; उस विचित्र रचना को देखकर स्वयं ब्रह्मा का मन भी चकित हो गया।

बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई॥

बाँस सब हरी मणियों से बनाए गए, वे इतने सीधे और पर्वों सहित थे कि असली से पहचाने ही नहीं जाते थे। सोने की सुंदर पान की बेल भी ऐसी बनाई गई कि उसके पत्तों सहित असली से पहचानना कठिन था।

तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए॥मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥

उसी बेल के सहारे सुंदर बंधन बनाए गए, बीच-बीच में सुंदर मोतियों की लड़ियाँ लगाई गईं। माणिक, मरकत, हीरा और फिरोजा को काट-छाँटकर मेहनत से कमल के फूल रचे गए।

किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिए सब ठाढ़ी॥

रंग-बिरंगे भ्रमर और पक्षी बनाए गए, जो हवा के झोंकों से मानो गुंजार और कूजन कर रहे थे। खंभों पर देवताओं की प्रतिमाएँ गढ़ी गईं, जो मंगल-द्रव्य लिए हुए खड़ी दिखाई देती थीं।

चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई॥

अनेक प्रकार की सुंदर चौकें पुराई गईं, जिनमें मणिजड़ित हाथी सहज ही शोभा दे रहे थे।

दोहा

सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि२८८

नीलमणि को तराशकर अत्यंत सुगंधित और सुंदर पत्ते बनाए गए, सोने के बौर और मरकत के गुच्छे रेशमी डोरी में शोभित हो रहे थे।

रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥

सुंदर वंदनवार रचे गए, मानो कामदेव ने अपने फंदे सजाए हों। अनेक मंगल-कलश बनाए गए, ध्वजा, पताका, वस्त्र और सुंदर चँवर सजाए गए।

दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥

अनेक मनोहर मणिमय दीपक जगमगा रहे थे, उस विचित्र मंडप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जिस मंडप में स्वयं सीता वधू बनकर विराजें, उसका वर्णन करने की बुद्धि भला किस कवि में है।

दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥

जब दूल्हा स्वयं रूप-गुण के सागर राम हों, तो वह मंडप तीनों लोकों में उजागर हो ही जाएगा। राजा जनक के भवन की जैसी शोभा थी, वैसी ही शोभा नगर के घर-घर में देखी जा रही थी।

जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥

जिसने भी उस समय मिथिला को निहारा, उसे चौदहों भुवन उसके सामने तुच्छ लगने लगे। नगर के साधारण से घर में भी जो संपदा शोभित थी, उसे देखकर स्वयं इंद्र भी मोहित हो गए।

दोहा

बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।तेहि पुर के सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु२८९

जिस नगर में स्वयं लक्ष्मी छल से सुंदर स्त्री का वेश धरकर निवास करती हों, उस नगर की शोभा का वर्णन करते हुए सरस्वती और शेषनाग भी सकुचा जाते हैं।

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥

दूत राम की पवित्र नगरी अयोध्या में पहुँचे, सुंदर नगर को देखकर वे हर्षित हुए। उन्होंने राजद्वार पर अपने आने की सूचना दी; राजा दशरथ ने सुनते ही उन्हें बुला लिया।

करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती॥

प्रणाम करके दूतों ने पत्री दी, प्रसन्न होकर राजा स्वयं उठकर उसे ले गए। पत्री बाँचते समय उनके नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो उठा और छाती भर आई।

रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥

राम-लक्ष्मण को हृदय में बसाकर हाथ में वह सुंदर पत्री लिए राजा भावविभोर होकर मौन रह गए, कुछ कह नहीं पाए। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्री पढ़ी, और सच्ची बात सुनकर सारी सभा हर्षित हो उठी।

खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई॥

वहीं खेल रहे भरत को यह समाचार मिला, तो वे अपने प्रिय भाई सहित वहाँ आ गए। अत्यंत स्नेह से सकुचाते हुए पूछने लगे - पिताजी, यह पत्री कहाँ से आई है।

दोहा

कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस२९०

भरत ने पूछा - प्राणप्रिय दोनों भाई कुशल तो हैं, बताइए वे इस समय किस देश में हैं। भरत के इन स्नेह से सने वचनों को सुनकर राजा ने फिर से पत्री बाँची।

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता॥प्रीति पुनीत भरत के देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥

पत्री सुनकर दोनों भाई पुलकित हो उठे, उनका स्नेह इतना अधिक था कि शरीर में समाता ही नहीं था। भरत की यह पवित्र प्रीति देखकर सारी सभा को विशेष सुख मिला।

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥

तब राजा ने दूतों को अपने निकट बिठाया और मधुर मनोहर वचन बोले - भाई, बताओ, दोनों बालक कुशल तो हैं; तुमने उन्हें अपनी आँखों से भलीभाँति देखा है।

स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥

साँवले और गोरे रंग के, धनुष-तरकश धारण किए, किशोर अवस्था के, विश्वामित्र मुनि के साथ रहने वाले - क्या तुम उन्हें पहचानते हो, उनका स्वभाव बताओ। प्रेम-विभोर राजा बारंबार यही पूछते रहे।

जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने॥

जिस दिन से मुनि विश्वामित्र उन्हें साथ ले गए थे, आज ही तो पहली बार सच्ची खबर मिली है। बताओ, जनक ने उन्हें किस प्रकार पहचाना - राजा के ये प्रिय वचन सुनकर दूत मुसकरा दिए।

दोहा

सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ२९१

दूतों ने कहा - सुनिए, हे राजाओं के मुकुटमणि! आपके समान धन्य कोई नहीं, क्योंकि राम और लक्ष्मण जैसे विश्व-भूषण पुत्र आपके ही हैं।

पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥

आपके पुत्रों के विषय में पूछना ही व्यर्थ है, वे तो पुरुषों में सिंह के समान तीनों लोकों को उजागर करने वाले हैं। जिनके यश और प्रताप के आगे चंद्रमा मलिन और सूर्य भी शीतल जान पड़ता है।

तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥

उनके विषय में क्या कहूँ, हे नाथ, भला सूर्य को दीपक लेकर कैसे पहचाना जाए। सीता के स्वयंवर में अनेक राजा और एक-से-एक बढ़कर वीर योद्धा एकत्र हुए थे।

संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥

शिव के धनुष को कोई भी टस से मस न कर सका, सब बलवान वीर हार गए। तीनों लोकों में जो अपने को वीर मानते थे, उन सबकी शक्ति शिव-धनुष ने ही भंग कर दी।

सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥

जो देवता-असुर मेरु पर्वत तक उठा सकते हैं, वे भी हृदय से हारकर वहाँ से चक्कर काटकर लौट गए। जिसने खेल-खेल में कैलास पर्वत तक उठा लिया था, वह भी उस सभा में पराजित हुआ।

दोहा

तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल२९२

हे महाराज सुनिए, वहाँ रघुकुल-मणि राम ने बिना किसी प्रयास के उस धनुष को वैसे ही तोड़ दिया जैसे हाथी कमल की नाल तोड़ देता है।

सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥

यह सुनकर क्रोधित होकर परशुराम वहाँ आए, उन्होंने अनेक प्रकार से आँखें दिखाईं। परंतु राम का बल देखकर उन्होंने अपना धनुष उन्हें ही दे दिया, और बहुत विनय करते हुए वे वन को चले गए।

राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥

हे राजन, जैसा अतुलनीय बल राम का है, वैसा ही तेज का भंडार लक्ष्मण भी हैं। जिनकी दृष्टि मात्र से राजा काँप उठते हैं, जैसे सिंह-शावक की ताक से हाथी काँप उठता है।

देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥

हे देव, आपके दोनों बालकों को देखने के बाद अब कोई और हमारी आँखों में समाता ही नहीं। दूतों की यह वचन-रचना, जो प्रेम, प्रताप और वीर-रस से सनी थी, सबको बहुत प्रिय लगी।

सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना॥

सभा सहित राजा प्रेममग्न हो गए, और दूतों को न्योछावर देने लगे। जो कुछ अनुचित लगे उस पर कान बंद कर लिए, और धर्म का विचार करके सबने सुख माना।

दोहा

तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ२९३

तब राजा उठकर वशिष्ठ के पास गए और उन्हें पत्रिका दी; दूतों को आदरपूर्वक बुलाकर उन्होंने सारी कथा गुरु को सुनाई।

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥

यह सुनकर गुरु वशिष्ठ अत्यंत सुखी होकर बोले - पुण्यात्मा पुरुषों के लिए तो पृथ्वी में सुख ही सुख छाया रहता है। जैसे नदियाँ बिना किसी कामना के भी सहज ही सागर में जा मिलती हैं।

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥

वैसे ही सुख और संपत्ति बिना बुलाए भी धर्मशील पुरुषों के पास सहज स्वभाव से चली आती हैं। आप गुरु, ब्राह्मण, गौ और देवताओं की सेवा करने वाले हैं, और उतनी ही पवित्र देवी कौसल्या हैं।

सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें॥

संसार में आपके समान पुण्यात्मा न कोई हुआ है, न है और न होगा। हे राजन, आपसे अधिक पुण्यवान भला और कौन हो सकता है, जिनके राम जैसे पुत्र हैं।

बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी॥तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना॥

वीर, विनम्र, धर्म-व्रत धारण करने वाले और गुणों के सागर - ऐसे चारों उत्तम बालक आपके हैं। आपका सदा सर्वकाल कल्याण ही होगा - अब नगाड़े बजवाकर बारात सजाइए।

दोहा

चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ२९४

शीघ्र चलिए - गुरु के ये वचन सुनकर राजा ने बहुत अच्छा, हे स्वामी कहकर सिर नवाया, और दूतों को ठहरने की व्यवस्था कराकर स्वयं महल को चले गए।

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥

राजा ने सारे रनिवास की रानियों को बुलाकर जनक की पत्रिका पढ़कर सुनाई। यह समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्षित हुईं; फिर राजा ने और भी सारी कथा विस्तार से सुनाई।

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी॥मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥

प्रेम से प्रफुल्लित रानियाँ ऐसे सुशोभित हो रही थीं मानो मोरनी बादल की गर्जना सुनकर हर्षित हो उठी हो। गुरुजनों की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही थीं, माताएँ अत्यंत आनंद में मग्न थीं।

लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥राम लखन के कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥

सब आपस में वह अत्यंत प्रिय पत्री लेकर हृदय से लगाकर अपनी छाती शीतल कर रही थीं। राजा दशरथ राम-लक्ष्मण की कीर्ति और करनी का बारंबार वर्णन कर रहे थे।

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥

यह सब मुनि विश्वामित्र का ही प्रसाद है ऐसा कहकर दूत द्वार पर चले गए। फिर रानियों ने ब्राह्मणों को बुलाकर आनंदपूर्वक दान दिया; श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले गए।

सोरठा

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरथ के२९५

याचकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार से न्योछावर दी गई; सब यही आशीर्वाद देते थे - चक्रवर्ती राजा दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों।

कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए॥

यह कहते हुए दूत अनेक सुंदर वस्त्र पहनकर हर्षित होकर चले, और जोर-जोर से नगाड़े बजाए गए। यह समाचार सब लोगों तक पहुँच गया, और घर-घर बधाइयाँ होने लगीं।

भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥

चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया कि जनक-पुत्री सीता का राम से विवाह होने जा रहा है। यह शुभ कथा सुनकर लोग प्रेममग्न हो उठे, और मार्ग, घर तथा गलियाँ सजाने लगे।

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥

यद्यपि अयोध्या सदैव ही सुहावनी और राम की मंगलमय पावन नगरी है, तथापि प्रीति की प्रीति से प्रेरित होकर लोगों ने विशेष मंगल-सजावट रची और बनाई।

ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू॥कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥

ध्वजा, पताका, वस्त्र और सुंदर चँवरों से बाजार को अत्यंत विचित्र ढंग से सजाया गया। सोने के कलश, तोरण, मणियों की जालियाँ, हल्दी, दूब, दही, अक्षत और मालाएँ सजाई गईं।

दोहा

मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ२९६

लोगों ने अपने-अपने घरों को मंगलमय ढंग से सजाया; गलियों को चारों सुगंधित द्रव्यों से सींचा गया और सुंदर रंगोली से चौकें पुराई गईं।

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि॥बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि॥

जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ झुंड-झुंड में मिलकर सोलहों शृंगार सजाए हुए बिजली की भाँति चमक रही थीं। चंद्रमुखी, हिरण के शावक जैसे नेत्रों वाली वे स्त्रियाँ अपने ही रूप से रति के अभिमान को चूर करने वाली थीं।

गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं॥भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥

वे मधुर वाणी में मंगल गीत गाती थीं, जिसे सुनकर कोयल भी लजा जाती थी। राजा दशरथ के महल का वर्णन भला कैसे किया जाए, जहाँ विश्व को मोहित करने वाला मंडप रचा गया था।

मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥

अनेक मनोहर मंगल-द्रव्य सुशोभित थे, अनेक नगाड़े बज रहे थे। कहीं भाट विरुदावली का उच्चारण कर रहे थे, तो कहीं ब्राह्मण वेद-ध्वनि कर रहे थे।

गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥

सुंदरियाँ राम और सीता का नाम ले-लेकर मंगल गीत गा रही थीं। उत्साह इतना अधिक था और भवन इतना छोटा पड़ गया, मानो वह उमड़कर चारों ओर बह चला हो।

दोहा

सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार२९७

राजा दशरथ के भवन की शोभा का वर्णन भला कौन कवि कर सकता है, जहाँ स्वयं सब देवताओं के शिरोमणि राम ने अवतार लिया है।

भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई॥चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥

राजा दशरथ ने फिर भरत को बुलाकर कहा - जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, और शीघ्र राम की बारात लेकर चलो। यह सुनते ही दोनों भाई पुलकित हो उठे।

भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥

भरत ने सब घुड़सवारों को बुलाया और आज्ञा दी; वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचिपूर्वक घोड़ों पर जीन सजाए, और रंग-बिरंगे सुंदर घोड़े सुशोभित होने लगे।

सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥

सब घोड़े सुंदर और अत्यंत चंचल स्वभाव के थे, वे धरती पर पैर ऐसे रखते थे मानो लोहा जल रहा हो, इतनी फुर्ती से। वे अनेक जातियों के थे, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता - मानो वायु का भी तिरस्कार करके उड़ जाना चाहते हों।

तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥

उन सब घोड़ों पर भरत जैसी ही आयु के सजीले राजकुमार सवार हुए। सब सुंदर थे, सब आभूषण धारण किए थे, हाथों में बाण-धनुष और कमर में भारी तरकश बाँधे थे।

दोहा

छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन२९८

सब छैल-छबीले, सुजान, नवयुवक और शूरवीर थे; हर घुड़सवार के साथ दो-दो पैदल सैनिक थे, जो तलवार चलाने की कला में अत्यंत प्रवीण थे।

बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना॥

घोर संग्राम में वीरता के बाने बाँधकर वे नगर से बाहर निकलकर खड़े हो गए। वे चतुराई से घोड़ों को अनेक प्रकार से घुमाते थे, और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि सुन-सुनकर हर्षित होते थे।

रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं॥

सारथियों ने रथों को विचित्र ढंग से सजाया, उन पर ध्वजा, पताका और मणि-आभूषण लगाए। सुंदर चँवर और घुँघरू ध्वनि कर रहे थे, वे रथ मानो सूर्य के रथ की शोभा को भी चुरा रहे थे।

सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥

कावेरी-सिंधु आदि उत्तम नस्लों के अनगिनत घोड़े थे, उन्हीं को सारथियों ने रथों में जोता। वे सब सुंदर और अलंकृत होकर ऐसे सुशोभित थे कि उन्हें देखकर मुनियों का भी मन मोहित हो जाए।

जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई॥अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥

वे घोड़े जल में भी थल की भाँति चलते थे, इतनी अधिक गति के कारण उनके खुर तक नहीं डूबते थे। अस्त्र-शस्त्र सहित सारा साज-सामान सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया।

दोहा

चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात२९९

रथों पर चढ़-चढ़कर सब नगर के बाहर जुटने लगे, बारात तैयार होने लगी; जो जिस कार्य के लिए जा रहा था, उसे वैसा ही सुंदर शुभ शकुन हो रहा था।

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥

सुंदर हाथियों पर हौदे कसे गए, जिन्हें जिस प्रकार सजाया गया था, वह कहा नहीं जा सकता। घंटियों से सुशोभित मतवाले हाथी ऐसे चले मानो सावन के सुंदर बादलों की पंक्ति चल रही हो।

बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥

अन्य भी अनेक प्रकार की सवारियाँ थीं - सुंदर पालकी, सुखासन और यान। उन पर चढ़कर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चले, मानो सारे वेद-मंत्र ही शरीर धारण करके चल पड़े हों।

मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥

मागध, सूत, भाट और गुणगायक जो जिस सवारी के योग्य था, उसी पर चढ़कर चले। खच्चर, ऊँट, बैल आदि अनेक जातियों के पशु सामान से लदकर अनगिनत प्रकार से चले।

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥

करोड़ों कहार काँवरें लेकर चले, विविध प्रकार की वस्तुओं का वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकों के समुदाय अपना-अपना साज-सामान सजाकर चले।

दोहा

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर३००

सबके हृदय में अपार हर्ष भरा हुआ था, शरीर रोमांच से पूरित था; सब यही सोच रहे थे कि कब आँख भरकर राम-लक्ष्मण दोनों वीरों को निहारेंगे।

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥

हाथी गरज रहे थे, घंटियों की घोर ध्वनि गूँज रही थी, चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट थी। नगाड़े बादलों को भी तिरस्कृत करते हुए गरज रहे थे, इतने शोर में अपना-पराया कुछ भी कानों को सुनाई नहीं पड़ता था।

महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें॥चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिए आरती मंगल थारी॥

राजा दशरथ के द्वार पर इतनी भारी भीड़ थी कि पत्थर भी रगड़ खाकर धूल हो जाए। स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर आरती और मंगल-थाल लिए यह दृश्य देख रही थीं।

गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥

वे अनेक मनोहर गीत गा रही थीं, उनका अत्यंत आनंद वर्णन से परे था। तब सुमंत्र ने दो रथ सजाए, जिनमें सूर्य के घोड़ों को भी लजाने वाले घोड़े जोते गए।

दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥

दोनों सुंदर रथ राजा जनक के पास लाए गए, जिनका वर्णन स्वयं सरस्वती से भी नहीं हो सकता। एक रथ में राजसी ठाट-बाट सजा था, दूसरा अत्यंत तेजपुंज से देदीप्यमान था।

दोहा

तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु३०१

उस सुंदर रथ में राजा दशरथ ने हर्षपूर्वक गुरु वशिष्ठ को चढ़ाया, फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके अपने रथ पर चढ़े।

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥

वशिष्ठ सहित राजा दशरथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे देवगुरु बृहस्पति के साथ इंद्र सुशोभित हों। कुल-रीति और वेद-विधि के अनुसार राजा ने सब कुछ भलीभाँति व्यवस्थित देख लिया।

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता॥

राम का स्मरण करके और गुरु की आज्ञा पाकर राजा शंख बजाते हुए चल पड़े। बारात को देखकर देवता हर्षित हो उठे, और शुभ-मंगलदायी फूल बरसाने लगे।

भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥

घोड़ों और हाथियों की गर्जना से कोलाहल मच गया, आकाश तक बारात के बाजे बजने लगे। देवता और मनुष्य स्त्रियाँ सब सुंदर मंगल गीत गाने लगीं, शहनाइयाँ सरस राग में बज उठीं।

घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥

घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं किया जा सकता, पैदल सैनिक शोर करते और झंडे फहराते चल रहे थे। विदूषक अनेक प्रकार के कौतुक कर रहे थे, हास्य में कुशल और मधुर गान में निपुण लोग साथ चल रहे थे।

दोहा

तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान३०२

राजकुमार मृदंग और नगाड़े की ध्वनि सुनकर घोड़ों को नचा रहे थे; चतुर नट यह देखकर चकित हो जाते थे कि वे ताल के बंधन से जरा भी नहीं डिगते।

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥

वह सजी हुई बारात वर्णन करते नहीं बनती थी, सुंदर शुभ शकुन हो रहे थे। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा चुग रहा था, मानो वह सारे मंगल का संदेश दे रहा हो।

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी॥

दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में दिखाई दिया, सबको नेवले का दर्शन हुआ। तीनों प्रकार की हवा अनुकूल दिशा में बह रही थी, और घड़ा लिए, बालक सहित सुंदर स्त्री सामने से आ रही थी।

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥

सियारिन बार-बार अपना दर्शन दिखा रही थी, गाय सामने से अपने बछड़े को दूध पिला रही थी। हिरणों का झुंड घूमकर दाहिनी ओर आ गया, मानो उसने साक्षात मंगल-गणों का दर्शन करा दिया हो।

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥

छेमकरी पक्षी ने विशेष कुशलता की सूचना दी, बाईं ओर सुंदर वृक्ष पर श्यामा पक्षी दिखाई दिया। सामने से दही और मछली आती दिखी, और हाथों में पुस्तकें लिए दो प्रवीण ब्राह्मण भी सामने आए।

दोहा

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार३०३

ये सभी शकुन मंगलमय, कल्याणमय और मनचाहा फल देने वाले थे, मानो सारे शुभ शकुन एक साथ सच होने के लिए ही प्रकट हुए हों।

मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥

उस राजा के लिए तो मंगल शकुन सहज ही होंगे, जिसके पास साक्षात सगुण ब्रह्म ही सुंदर पुत्र बनकर हैं। राम जैसा वर और सीता जैसी वधू हो, और समधी हों पवित्र दशरथ तथा जनक - फिर शुभ शकुन क्यों न हों।

सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥

ऐसा विवाह होने की बात सुनकर मानो सारे शकुन नाच उठे - अब ब्रह्मा ने हमें सच्चा कर दिया। इस प्रकार बारात ने प्रस्थान किया, घोड़े-हाथी गरजते और नगाड़े बजते रहे।

आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥

सूर्यवंश की ध्वजा-रूप बारात को आता जानकर जनक ने नदियों पर पुल बँधवाए। बीच-बीच में सुंदर पड़ाव बनवाए गए, जहाँ स्वर्ग के समान संपदा छाई हुई थी।

असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥

भोजन, शयन और सुंदर वस्त्र सबको अपनी-अपनी इच्छा के अनुरूप मिल रहे थे। ऐसी नित नई अनुकूल सुख-सुविधा देखकर सारे बाराती अपना घर तक भूल गए।

दोहा

आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान३०४

बारात आ रही है यह जानकर और नगाड़ों की तेज ध्वनि सुनकर, राजा जनक ने हाथी, रथ, पैदल सेना और घोड़े सजाकर स्वागत के लिए अगवानी दल भेजा।

कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥

सोने के कलश, परात और थाल भरकर तथा अनेक प्रकार के सुंदर पात्र लेकर अमृत के समान सब पकवान भरे गए, जिनका वर्णन विविध प्रकार से नहीं किया जा सकता।

फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥

अनेक फल और सुंदर वस्तुएँ राजा जनक ने हर्षपूर्वक भेंट के रूप में भिजवाईं। आभूषण, वस्त्र, अनेक बड़ी मणियाँ, पक्षी, मृग, घोड़े, हाथी और अनेक प्रकार की सवारियाँ भी भेजीं।

मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥

मंगल शकुन-द्रव्य और सुंदर सुगंधित वस्तुएँ राजा जनक ने अनेक प्रकार से भेजीं। दही, चिउड़ा और अपार उपहार लेकर कहार काँवरें भर-भरकर चले।

अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥

जब अगवानी दल को बारात दिखाई दी, तो उनके हृदय में आनंद उमड़ पड़ा और शरीर रोमांचित हो उठा। अगवानी दल की सजावट देखकर बाराती भी प्रसन्न होकर नगाड़े बजाने लगे।

दोहा

हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल३०५

हर्षित होकर परस्पर मिलने के लिए दोनों दल पंक्तिबद्ध होकर आगे बढ़े, मानो दो आनंद के समुद्र अपनी मर्यादा भूलकर आपस में मिलने चले हों।

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें॥

देवांगनाएँ फूल बरसाकर गीत गाने लगीं, प्रसन्न देवता नगाड़े बजाने लगे। जनक की ओर से लाई गई सब भेंट-वस्तुएँ राजा दशरथ के सामने रखी गईं, और अत्यंत प्रेम से विनती की गई।

प्रेम समेत राय सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥

राजा दशरथ ने प्रेमपूर्वक वह सब भेंट स्वीकार कर ली, और जो कुछ इनाम में मिला वह याचकों को दे दिया। सम्मान और आदर के साथ पूजा करके सबको जनवासे की ओर ले चले।

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं॥अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥

विचित्र वस्त्रों के पावड़े बिछाए गए थे, जिन्हें देखकर स्वयं कुबेर भी अपने धन का अभिमान त्याग दे। अत्यंत सुंदर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको हर प्रकार से पूरी सुविधा मिली।

जानी सिय बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई॥

जब सीता को पता चला कि बारात नगर में आ गई है, तो उन्होंने अपनी कुछ महिमा प्रकट कर दिखाई। उन्होंने हृदय में स्मरण करके सब सिद्धियों को बुलाया, और राजा दशरथ की आगवानी करने भेज दिया।

दोहा

सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।लिए संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास३०६

सीता की आज्ञा सुनते ही सब सिद्धियाँ उस जनवासे में जा पहुँचीं, और वहाँ स्वर्ग की समस्त संपदा, सुख और भोग-विलास ले आईं।

निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥

अपने-अपने निवास को देखकर हर बाराती को हर प्रकार का स्वर्ग-सुख सहज ही सुलभ हो गया। किसी को भी अपने और दूसरे के निवास में कोई भेद नहीं दिखा, और सब जनक की इस उदारता का बखान करने लगे।

सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥

राम ने सीता की इस महिमा को पहचानकर उसका कारण जान लिया और हृदय में हर्षित हुए। पिता के आगमन का समाचार सुनते ही दोनों भाइयों के हृदय में अत्यंत आनंद समाया नहीं जा रहा था।

सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥

संकोचवश वे गुरु विश्वामित्र से कुछ कह नहीं पा रहे थे, पर मन में पिता के दर्शन की लालसा थी। विश्वामित्र ने उनकी यह बड़ी विनम्रता देखी, तो उनके हृदय में विशेष संतोष उपजा।

हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥

हर्षित होकर विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को हृदय से लगाया, उनके अंग पुलकित हो उठे और नेत्रों में जल छा गया। फिर वे उस जनवासे की ओर चले जहाँ दशरथ थे, मानो कोई प्यासा सरोवर की ओर चला हो।

दोहा

भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत३०७

जब राजा दशरथ ने मुनि विश्वामित्र को अपने दोनों पुत्रों सहित आते देखा, तो हर्षित होकर उठ खड़े हुए और सुख के समुद्र में मानो थाह लेते हुए आगे चले।

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥

राजा दशरथ ने मुनि विश्वामित्र को दंडवत प्रणाम किया, बारंबार उनके चरणों की धूलि सिर पर धारण की। विश्वामित्र ने राजा को हृदय से लगाया, आशीर्वाद देकर उनकी कुशलता पूछी।

पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥

फिर दोनों भाई दंडवत प्रणाम करने लगे, उन्हें देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं जा रहा था। पुत्रों को हृदय से लगाकर उन्होंने अपने असह्य दुख मिटा लिए, मानो किसी मृत शरीर में प्राण लौट आए हों।

पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं॥

फिर दोनों भाइयों ने वशिष्ठ के चरणों में सिर नवाया, प्रेममग्न होकर श्रेष्ठ मुनि ने उन्हें हृदय से लगाया। दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों के समूह को भी प्रणाम किया, और मनचाहे आशीर्वाद पाए।

भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥

भरत ने अपने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित प्रणाम किया, राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगाया। भरत-शत्रुघ्न को देखकर लक्ष्मण भी हर्षित हुए, और सब प्रेम से परिपूर्ण होकर आपस में मिले।

दोहा

पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत३०८

नगरवासी, परिजन, जातिजन, याचक, मंत्री और मित्र - सबसे परम कृपालु और विनम्र प्रभु राम यथाविधि मिले।

रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥

राम को देखकर सारी बारात शीतल हो गई, उस प्रेम की रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। राजा दशरथ के समीप चारों पुत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फल स्वयं शरीर धारण करके आ गए हों।

सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥

पुत्रों सहित दशरथ को देखकर नगर के स्त्री-पुरुष विशेष रूप से प्रसन्न हुए। देवता फूल बरसाकर नगाड़े बजाने लगे, स्वर्ग की अप्सराएँ गीत गाकर नाचने लगीं।

सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥

शतानंद, ब्राह्मण, मंत्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाट - राजा जनक ने बारात सहित इन सबका सम्मान किया। फिर अगवानी दल आज्ञा माँगकर लौट गया।

प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥

बारात लगन के दिन से पहले ही आ गई, इसलिए नगर में उत्सव और भी बढ़ गया। सब लोग ब्रह्मानंद का अनुभव कर रहे थे, और मानो विधाता से कहते थे कि दिन-रात और भी बढ़ जाएँ।

दोहा

रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज३०९

राम-सीता सौंदर्य की चरम सीमा हैं, और दोनों राजा पुण्य की चरम सीमा हैं - नगरवासी स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ मिलकर ऐसा ही कहते थे।

जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहूँ न इन्ह समान फल लाधे॥

सीता साक्षात जनक के पुण्य की मूर्ति हैं, और राम दशरथ के पुण्य ने ही शरीर धारण कर लिया है। इन दोनों राजाओं जैसी शिव-आराधना किसी ने नहीं की, और किसी को भी इनके समान फल नहीं मिला।

इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥हम सब सकल सुकृत के रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥

इनके समान न कोई संसार में हुआ है, न है कहीं और न होगा। हम तो सब पूर्वजन्म के समस्त पुण्यों की राशि लेकर ही जनकपुर में जन्म लेकर इसके निवासी बने हैं।

जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥

जिन्होंने सीता-राम की छवि देख ली, हमारे समान विशेष पुण्यात्मा और कौन होगा। अब हम राम का विवाह भी देखेंगे, और भलीभाँति अपने नेत्रों का लाभ उठाएँगे।

कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥

कोयल जैसी मधुर वाणी वाली स्त्रियाँ आपस में कहती थीं - हे सुनयनी, इस विवाह में हमें बड़ा लाभ मिलेगा। बड़े भाग्य से विधाता ने ऐसी बात बनाई कि दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि बनेंगे।

दोहा

बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय३१०

स्नेहवश जनक बारंबार सीता को मायके बुलाएँगे, और तब करोड़ों कामदेवों से भी सुंदर दोनों भाई उन्हें लेने आएँगे।

बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥

तब अनेक प्रकार से उनकी पहुनाई होगी - भला ऐसा ससुराल किसे प्रिय नहीं लगेगा। और उस-उस समय राम-लक्ष्मण को निहारकर सारे नगरवासी सुखी होंगे।

सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥

राम-लक्ष्मण की जैसी सुंदर जोड़ी है, वैसे ही राजा जनक के साथ आए दो और सुंदर बालक भी हैं। दोनों के साँवले-गोरे सर्वांग सुहावने हैं - ऐसा वे सब कहते थे जो उन्हें देख आए थे।

कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥

किसी ने कहा - मैंने आज उन्हें निहारा, मानो ब्रह्मा ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें सँवारा हो। भरत की सूरत तो बिलकुल राम जैसी ही है, कि सहसा स्त्री-पुरुष उन्हें पहचान ही नहीं पाते।

लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥

लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी बिलकुल एक जैसे रूप के हैं, नख से शिख तक उनके सब अंग अनुपम हैं। वे सबके मन को भाते हैं पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता, और तीनों लोकों में उनकी कोई उपमा नहीं है।

छंद

उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से ए अहैं॥पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥

तुलसीदास कहते हैं कि इनकी कोई उपमा नहीं है, चाहे कहीं कोई कवि या विद्वान इन्हें कुछ भी कहें - बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के सागर तो बस यही चारों भाई हैं। नगर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता से यह वचन सुनाती थीं - चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो, जिससे हम सब सुमंगल गीत गाएँ।

सोरठा

कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ३११

स्त्रियाँ आपस में नेत्रों में जल भरे और शरीर पुलकित किए हुए कहती थीं - हे सखी, यह सब शिव ही करेंगे, क्योंकि दोनों राजा तो पुण्य के सागर ही हैं।

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनंद उमगि उमगि उर भरहीं॥जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥

इस प्रकार सब अपने-अपने मनोरथ करती रहीं, आनंद उमड़-उमड़कर हृदय में भरता रहा। जो राजा सीता के स्वयंवर में आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया।

कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥

राम के विशद और विशाल यश का बखान करते हुए सब राजा अपने-अपने घर लौट गए। इस प्रकार कुछ दिन बीत गए, और सारे नगरवासी और बाराती अत्यंत हर्षित रहे।

मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥

मंगल का मूल वह लग्न-दिन आ पहुँचा - हेमंत ऋतु का सुहावना अगहन मास था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और श्रेष्ठ वार का विचार करके विधाता ने शुभ लग्न निश्चित किया।

पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥

वही लग्न नारदजी को भेजी गई, और जनक के ज्योतिषियों ने भी उसकी गणना करके वही निकाला। यह बात सब लोगों ने सुनी और कहने लगे कि ज्योतिषी तो साक्षात विधाता ही हैं।

दोहा

धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल३१२

वह धनु राशि की निर्मल बेला सब सुमंगल का मूल थी; शकुन अनुकूल जानकर ब्राह्मणों ने राजा जनक से इस लग्न की बात कही।

उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥

राजा जनक ने पुरोहित से कहा - अब विलंब करने का क्या कारण है। तब शतानंद ने मंत्रियों को बुलाया, और सब मंगल-सामग्री सजाकर ले आए।

संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥

शंख, नगाड़े और अनेक ढोल बज उठे, मंगल-कलश और शुभ शकुन-सामग्री सजाई गई। सुंदर सुहागिनें मंगल-गीत गाने लगीं, और पवित्र ब्राह्मण वेद-ध्वनि करने लगे।

लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥

इस प्रकार आदरपूर्वक राजा दशरथ को लेने चले, जहाँ बाराती ठहरे थे वहाँ जा पहुँचे। कोसलपति दशरथ का समाज देखकर उन्हें स्वयं इंद्र भी अत्यंत तुच्छ जान पड़ा।

भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥

समय हो गया है, अब पग बढ़ाइए - यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ने लगी। गुरु से पूछकर और कुल-रीति पूरी करके राजा मुनियों और साधुओं के समाज सहित चल पड़े।

दोहा

भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि३१३

अयोध्या-नरेश दशरथ का भाग्य और वैभव देखकर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने हजार मुखों से उनकी सराहना करने लगे, और अपने जन्म को उनके सामने व्यर्थ-सा मानने लगे।

सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥

देवताओं ने इस सुमंगल अवसर को पहचानकर नगाड़े बजाते हुए फूल बरसाने शुरू किए। शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अनेक विमानों पर चढ़कर वहाँ आए।

प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥

प्रेम से पुलकित शरीर और हृदय में उत्साह लिए वे सब राम का विवाह देखने चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन्हें अपना-अपना लोक भी तुच्छ लगने लगा।

चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना॥नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥

वे चकित होकर विचित्र मंडप को निहारते थे, वहाँ की सारी रचना अलौकिक और अनूठी थी। नगर के स्त्री-पुरुष रूप के भंडार थे - सुघड़, सुधर्मी, सुशील और सुजान।

तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥

उन्हें देखकर सब देवता और देवांगनाएँ ऐसे फीके पड़ गए मानो चंद्रमा की चाँदनी में तारे फीके पड़ जाते हैं। स्वयं ब्रह्मा को भी विशेष आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें अपनी रचना-कला कहीं भी ऐसी दिखाई नहीं दी थी।

दोहा

सिव समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु३१४

शिव ने सब देवताओं को समझाया - विस्मय में मत भूल जाओ, धैर्य धरकर हृदय में विचार करो कि यह सीता-राम का विवाह है।

जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥करतल होहिं पदारथ चारी। ते सिय रामु कहेउ कामारी॥

शिव ने देवताओं से कहा - जिनका नाम लेने मात्र से संसार के समस्त अमंगलों की जड़ नष्ट हो जाती है, और चारों पदार्थ हथेली पर आ जाते हैं, वे ही सीता-राम हैं।

एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥

इस प्रकार शिव ने देवताओं को समझाया, फिर आगे बढ़कर अपने श्रेष्ठ बैल नंदी को हाँका। देवताओं ने राजा दशरथ को जाते देखा, जिनका मन महान आनंद से भरा था और शरीर पुलकित था।

साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥

साधुओं के समाज के साथ ब्राह्मण भी चल रहे थे, मानो सुख ने ही शरीर धारण करके सेवा की हो। साथ में चारों सुंदर पुत्र ऐसे सुशोभित थे मानो मोक्ष स्वयं शरीर धारण करके चल रहा हो।

मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥

मरकत मणि और सोने के रंग की वह सुंदर जोड़ी देखकर देवताओं का प्रेम कम न रहा। फिर राम को निहारकर वे हृदय से हर्षित हुए, और राजा दशरथ की सराहना करते हुए फूल बरसाए।

दोहा

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि३१५

राम के नख से शिख तक सुंदर रूप को बारंबार निहारकर, पार्वती सहित शिव का शरीर पुलकित हो उठा और नेत्र जल से भर गए।

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥

राम के अंग मोर के कंठ जैसी साँवली आभा वाले थे, उनके सुंदर वस्त्र बिजली को भी लजाने वाले थे। विवाह के विविध आभूषण धारण किए हुए थे, जो हर प्रकार से मंगलमय और सुहावने लगते थे।

सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥

उनका मुख शरद ऋतु के निर्मल चंद्रमा जैसा सुहावना था, नेत्र नवीन कमल को भी लजाने वाले थे। उनकी सारी सुंदरता अलौकिक थी, जिसे कहा नहीं जा सकता, केवल मन-ही-मन अनुभव किया जा सकता था।

बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥

साथ में मनोहर भाई सुशोभित थे, चंचल घोड़ों को नचाते हुए चल रहे थे। राजकुमार अपने सुंदर घोड़े दिखा रहे थे, और वंश की प्रशंसा करने वाले भाट विरुदावली सुना रहे थे।

जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥

जिस घोड़े पर राम विराजमान थे, उसकी चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते थे। वह हर प्रकार से इतना सुहावना था कि कहा नहीं जा सकता - मानो कामदेव ने स्वयं घोड़े का वेश बनाया हो।

छंद

जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥

मानो कामदेव ने राम के लिए घोड़े का वेश बनाया हो, वह अपनी आयु, बल, रूप, गुण और चाल से सारे भुवन को मोहित कर रहा था। उसकी जीन जड़ाऊ रत्नों की चमक से जगमगा रही थी, जिस पर सुंदर मोती, मणि और माणिक जड़े थे। उसकी सुंदर घुँघरू-भरी लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सब ठगे से रह गए।

दोहा

प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव३१६

प्रभु के मन में लीन होकर घोड़ा चलते समय ऐसी छवि पाता था मानो तारों से सजा बादल बिजली के साथ मोर को नचा रहा हो।

जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारद न बरनै पारा॥संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥

जिस सुंदर घोड़े पर राम सवार थे, उसका वर्णन स्वयं सरस्वती भी नहीं कर सकतीं। शिव राम के रूप में इतने अनुरक्त हो गए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र अत्यंत प्रिय लगने लगे।

हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥

जब विष्णु ने प्रेमपूर्वक राम को निहारा, तो लक्ष्मी सहित वे स्वयं मोहित हो गए। राम की छवि देखकर ब्रह्मा भी हर्षित हुए, पर अपने आठ ही नेत्र होने का उन्हें पछतावा हुआ।

सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥

देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह था, क्योंकि उनके पास ब्रह्मा से डेढ़ गुना नेत्र थे। सुजान इंद्र भी राम को निहारते हुए यह मानने लगे कि गौतम मुनि का दिया शाप उनके लिए परम हितकारी ही सिद्ध हुआ।

देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥

सब देवता इंद्र से ईर्ष्या करने लगे - आज इंद्र के समान भाग्यशाली कोई नहीं है। राम को देखकर देवगण प्रसन्न हुए, और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा गया।

छंद

अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥

दोनों ओर के राजसमाज में अत्यंत हर्ष था, अनेक नगाड़े बज रहे थे। देवता हर्षित होकर जय हो, रघुकुल-मणि की जय हो कहते हुए फूल बरसा रहे थे। बारात आती जानकर इस प्रकार अनेक बाजे बजने लगे; रानियों ने सुहागिनों को बुलाकर परिछन के लिए मंगल-सामग्री सजाई।

दोहा

सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि३१७

आरती सजाकर और सब मंगल-सामग्री अनेक विधियों से सँवारकर, हाथी की सी चाल वाली सुंदर स्त्रियाँ प्रसन्न होकर परिछन करने चलीं।

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥

सब चंद्रमुखी और हिरण जैसे नेत्रों वाली स्त्रियाँ अपने शरीर की छवि से रति के अभिमान को चूर करने वाली थीं। उन्होंने रंग-बिरंगे सुंदर वस्त्र पहने थे, और शरीर पर सब आभूषण सजाए थे।

सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥

उन्होंने अपने अंगों पर सब सुमंगल-चिह्न बनाए थे, वे ऐसा गान गा रही थीं जिसे सुनकर कोयल भी लजा जाए। उनके कंगन, करधनी और पायल बज रहे थे, उनकी चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते थे।

बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥

आकाश और नगर दोनों में विविध प्रकार के मंगल-वाद्य बज रहे थे। इंद्राणी शची, सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जैसी पवित्र, सहज बुद्धिमती देवांगनाएँ भी वहाँ उपस्थित थीं।

कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई॥करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी॥

छल से सुंदर स्त्री का वेश बनाकर वे सब देवांगनाएँ रनिवास में जा मिलीं। वे मधुर मंगल-वाणी में गान करने लगीं, हर्ष में विभोर होकर किसी ने भी उन्हें पहचाना नहीं।

छंद

को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥

कौन जाने किस आनंद के वश होकर सब स्त्रियाँ साक्षात ब्रह्म राम का परिछन करने चलीं। मधुर गान और नगाड़ों की ध्वनि के बीच देवता फूल बरसा रहे थे, शोभा अत्यंत सुंदर थी। आनंद-कंद दूल्हे को निहारकर सबके हृदय हर्षित हो उठे, कमल-सरीखे नेत्रों से जल उमड़ आया और सुंदर अंगों पर रोमांच छा गया।

दोहा

जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु३१८

राम के दूल्हे के वेश को देखकर सीता की माता के मन में जो सुख हुआ, उसे सौ कल्पों तक भी सहस्र सरस्वती और शेषनाग मिलकर भी नहीं कह सकते।

नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥

नेत्रों के जल को हटाकर, इसे मंगल अवसर जानकर, प्रसन्न मन से रानियाँ परिछन करने लगीं। वेद-विहित और कुल-परंपरा के अनुसार सब व्यवहार भलीभाँति संपन्न किया गया।

पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥

पंचशब्द वाद्यों की ध्वनि और मंगल-गान हो रहे थे, अनेक प्रकार के वस्त्रों के पावड़े बिछाए जा रहे थे। आरती करके उन्होंने अर्घ्य दिया, फिर राम ने मंडप की ओर गमन किया।

दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥

राजा दशरथ अपने समाज सहित सुशोभित थे, उनका वैभव देखकर दिक्पाल भी लजा जाते थे। समय-समय पर देवता फूल बरसाते थे, और ब्राह्मण अनुकूल शांति-मंत्र पढ़ रहे थे।

नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥

आकाश और नगर दोनों में इतना कोलाहल था कि अपना-पराया कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता था। इस प्रकार राम मंडप में आए, उन्हें अर्घ्य देकर आसन पर बिठाया गया।

छंद

बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥

आसन पर बिठाकर आरती करके स्त्रियाँ दूल्हे को निहारकर सुख पा रही थीं। वे मणि, वस्त्र और आभूषण वारकर मंगल-गीत गा रही थीं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण का वेश बनाकर यह कौतुक देख रहे थे, और रघुकुल-रूपी कमल के सूर्य राम को निहारकर अपने जीवन को सफल मान रहे थे।

दोहा

नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ३१९

नाई, कहार, भाट और नट राम से न्योछावर पाकर, सिर नवाकर प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देने लगे, उनके हृदय में हर्ष समाया नहीं जा रहा था।

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥

जनक और दशरथ वैदिक और लौकिक सभी रीतियाँ पूरी करके अत्यंत प्रेम से मिले। मिलते समय दोनों महान राजा ऐसे सुशोभित हुए कि उपमा खोज-खोजकर कवि भी लज्जित हो गए।

लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम ए उपमा उर आनी॥सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥

कहीं भी उपमा न मिली, तो कवियों ने हृदय से हार मान ली कि इनके समान कोई ऐसी उपमा मन में नहीं आती। दोनों समधियों को देखकर देवता अनुरक्त हो गए, और फूल बरसाकर उनके यश का गान करने लगे।

जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥

देवता कहने लगे - जब से ब्रह्मा ने यह जगत रचा है, तब से हमने बहुत विवाह देखे-सुने हैं, पर आज हमने पहली बार ऐसा देखा कि हर प्रकार से समान साज-समाज और समान योग्यता वाले समधी हों।

देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥

देवताओं की यह सुंदर और सच्ची वाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति उमड़ पड़ी। पावड़े बिछाकर और सुंदर अर्घ्य देकर जनक आदरपूर्वक दशरथ को मंडप में ले आए।

छंद

मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न पर कही॥

मंडप की विचित्र रचना और रुचिरता देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो गया। सुजान जनक ने अपने ही हाथों से सबके लिए सिंहासन लाकर रखे। उन्होंने कुल-इष्टदेव के समान वशिष्ठ की पूजा की और विनयपूर्वक आशीर्वाद पाया। विश्वामित्र की पूजा करते समय जो परम प्रीति थी, उसकी रीति का वर्णन दूसरों से नहीं हो सकता।

दोहा

बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस३२०

प्रसन्न राजा जनक ने वामदेव आदि ऋषियों की पूजा की, सबको दिव्य आसन दिए और सबसे आशीर्वाद पाया।

बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥

फिर जनक ने कोसलपति दशरथ की पूजा की, यह जानकर कि उनके प्रति भाव ईश्वर के समान ही है, दूसरा नहीं। हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उनकी बड़ाई की, और अपने भाग्य और वैभव की बहुतायत बताई।

पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती॥आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥

उन्होंने सारी बारात के राजाओं की भी पूजा की, समधी के समान ही सबका आदर किया। सबको उचित आसन दिए - इतना उत्साह था कि एक मुख से क्या-क्या कहूँ।

सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥

जनक ने सारी बारात का दान, मान, विनती और श्रेष्ठ वाणी से सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य - जो सब राम का प्रभाव जानते थे, वे भी वहाँ उपस्थित थे।

कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥

छल से श्रेष्ठ ब्राह्मण का वेश बनाकर वे सब यह कौतुक देख रहे थे और अत्यंत सुख पा रहे थे। जनक ने उन्हें देवता समझे बिना ही ब्राह्मण मानकर पूजा की, और बिना पहचाने ही उन्हें सुंदर आसन दिए।

छंद

पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई।आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई॥सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥

कौन किसे पहचाने - सबको अपनी ही सुध भूल गई थी। आनंद-कंद दूल्हे को निहारकर दोनों ओर आनंद ही आनंद छा गया था। सुजान राम ने देवताओं को पहचान लिया और मन-ही-मन उन्हें आसन दिए; प्रभु का शील और स्वभाव देखकर सब देवताओं का मन प्रमुदित हो गया।

दोहा

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर३२१

श्रीराम का मुख चंद्रमा के समान शोभित था, और सुंदर चकोर-सरीखे नेत्र आदरपूर्वक उस चंद्र-मुख का रसपान कर रहे थे; सबका प्रेम और आनंद कुछ कम न था।

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥

उचित समय देखकर वशिष्ठ ने शतानंद को बुलाया, वे आदरपूर्वक सुनते ही आ गए। वशिष्ठ ने कहा - अब शीघ्र जाकर सीता को ले आओ; शतानंद मुनि आज्ञा पाकर प्रसन्न होकर चले।

रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं॥

पुरोहित की वाणी सुनकर बुद्धिमती रानी सुनयना सखियों सहित प्रसन्न हुईं। उन्होंने ब्राह्मण-वधुओं और कुल की वृद्धाओं को बुलाया, और कुल-रीति के अनुसार सुमंगल गीत गाए।

नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥

जो श्रेष्ठ देवांगनाएँ स्त्री-वेश धारण किए हुए थीं, वे सब स्वभाव से ही सुंदर श्यामा थीं। उन्हें देखकर सब स्त्रियाँ सुख पाती थीं, बिना पहचाने ही वे उन्हें प्राणों से भी प्रिय लगती थीं।

बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥

रानी उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर बारंबार सम्मान करती थीं। सीता को सजा-सँवारकर और सारा साज-समाज बनाकर वे प्रसन्न होकर मंडप की ओर ले चलीं।

छंद

चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

सखियाँ सोलहों शृंगार सजाकर आदरपूर्वक सीता को लिवा लाईं; मतवाले हाथी की सी चाल वाली वे सुंदरियाँ सब मंगल-सज्जा से सजी थीं। उनके मधुर गान को सुनकर मुनि भी अपना ध्यान त्याग देते थे, कामदेव और कोयल दोनों लजा जाते थे। उनकी पायल, नूपुर और कंगन ताल में सुंदर ध्वनि करते हुए बज रहे थे।

दोहा

सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय३२२

स्त्रियों के समूह के बीच सहज सुंदर सीता ऐसी सुशोभित थीं मानो सुंदरियों के बीच साक्षात सुंदरता ही एक कमनीय स्त्री बनकर विराजमान हो।

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥आवत दीखि बरातिन्ह सीता।। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥

सीता की सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता, मेरी बुद्धि छोटी है और उनकी मनोहरता बहुत अधिक है। बारातियों ने सीता को आते देखा - वे रूप की राशि और हर प्रकार से पवित्र थीं।

सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥

सबने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया; दूल्हे राम पूर्णकाम हो गए। पुत्रों सहित राजा दशरथ हर्षित हुए, उनके हृदय में जितना आनंद था, वह कहा नहीं जा सकता।

सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥

देवताओं ने प्रणाम करके फूल बरसाए, मुनियों के आशीर्वाद की ध्वनि मंगल का मूल बनी। गीत, नगाड़ों और भारी कोलाहल के बीच सब स्त्री-पुरुष प्रेम और आनंद में मग्न थे।

एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू॥

इस प्रकार सीता मंडप में आईं, मुनिश्रेष्ठ प्रसन्न होकर शांति-पाठ करने लगे। उस अवसर पर विधि-विधान के अनुसार दोनों कुलों के गुरुओं ने सारा आचार-कर्म संपन्न किया।

छंद

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं॥

आचार-कर्म संपन्न करके गुरु ने गौरी और गणपति की पूजा प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणों से करवाई। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते और आशीर्वाद देकर अत्यंत सुख पाते। मधुपर्क आदि मंगल-द्रव्य जिस समय मुनि मन में चाहते, उसी समय सेवक सोने के पात्रों और कलशों में भरकर वह ले आते।

दोहा

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥

कुल-रीति और प्रीति के साथ पंडित जो-जो कहता, सब आदरपूर्वक किया गया। इस प्रकार देवताओं की पूजा करवाकर सीता को सुंदर सिंहासन दिया गया। सीता-राम की परस्पर दृष्टि का प्रेम किसी से भी पहचाना नहीं जा सका - जो प्रेम मन, बुद्धि और वाणी से भी परे हो, उसे कवि भला कैसे प्रकट करे।

दोहा

होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं३२३

होम के समय अग्नि स्वयं शरीर धारण करके अत्यंत सुखपूर्वक आहुतियाँ ग्रहण करने लगी; वेद भी ब्राह्मण का वेश धारण करके विवाह की सारी विधि बताने लगे।

जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥

जनक की पटरानी सुनयना को संसार जानता ही है, फिर सीता की माता का वर्णन भला कैसे किया जाए। सुयश, पुण्य, सुख और सुंदरता - इन सबको समेटकर मानो विधाता ने उन्हें रचा हो।

समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई॥जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥

उचित समय जानकर मुनियों ने सुनयना को बुलाया, सुनते ही सुहागिनें आदरपूर्वक उन्हें ले आईं। जनक की बाईं ओर सुनयना ऐसी सुशोभित थीं मानो हिमालय के साथ मैना बनी हों।

कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥निज कर मुदित राय अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥

सोने के कलश और सुंदर मणिजड़ित पात्र पवित्र, सुगंधित मंगल-जल से भरे गए। राजा जनक और रानी सुनयना ने प्रसन्न होकर अपने ही हाथों से उन्हें लाकर राम के आगे रखा।

पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥

मुनि वेद की मंगल-वाणी पढ़ रहे थे, अवसर जानकर आकाश से फूलों की झड़ी लगी। वर को निहारकर दंपति प्रेममग्न हो गए, और उनके पवित्र चरण पखारने लगे।

छंद

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥

वे राम के चरण-कमल पखारने लगे, प्रेम से शरीर पर रोमांच छा गया। आकाश और नगर में गीत, नगाड़े और जय-जयकार की ध्वनि मानो चारों दिशाओं में उमड़ पड़ी। जो चरण-कमल कामदेव के शत्रु शिव के हृदय-सरोवर में सदैव विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करते ही मन निर्मल होकर कलियुग के सब पाप भाग जाते हैं।

दोहा

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं।ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै॥

जिन चरणों को छूकर पाप में डूबी अहिल्या ने भी मुक्ति पाई, जिनके चरणामृत को शिव अपने सिर पर धारण करते हैं और देवता जिसे पवित्रता की चरम सीमा कहते हैं, जिन चरणों की भ्रमर के समान सेवा करके मुनि और योगीजन मनचाही गति पाते हैं - उन्हीं चरणों को पखारते हुए भाग्यशाली जनक को देखकर सब जय-जयकार करने लगे।

दोहा

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आँनद भरैं॥सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥

वर और वधू ने हाथ जोड़े, दोनों कुल-गुरुओं ने साक्षी-वचन कहे। पाणिग्रहण होते देख ब्रह्मा, देवता, मनुष्य और मुनि सब आनंद से भर उठे। सुख के मूल दूल्हे को देखकर जनक-सुनयना दंपति का तन पुलकित और हृदय हर्षित हो उठा। लोक और वेद की विधि के अनुसार राजाओं के भूषण जनक ने कन्यादान किया।

दोहा

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरी।करि होम बिधिवत गाँठि जोरी होन लागी भावँरी॥

जैसे हिमालय ने पार्वती को शिव को और समुद्र ने लक्ष्मी को विष्णु को समर्पित किया था, वैसे ही जनक ने सीता को राम को समर्पित किया - संसार में यह नई सुंदर कीर्ति फैल गई। विदेहराज जनक भला और कैसे विनय करते - उन्होंने साँवली मूर्ति राम को कन्या अर्पित कर दी। विधिवत होम करके, वस्त्रों की गाँठ जोड़कर भाँवरें होने लगीं।

दोहा

जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान३२४

भाटों की जय-जयकार, वेद-ध्वनि, मंगल-गान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर सुजान देवता हर्षित होकर कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥

वर-वधू मधुर भाँवरें दे रहे थे, सब लोग आदरपूर्वक अपने नेत्रों का लाभ ले रहे थे। उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता, जो भी उपमा दी जाए वह थोड़ी ही पड़ती है।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥

राम-सीता के सुंदर प्रतिबिंब मणि-जड़ित खंभों में जगमगा रहे थे। मानो कामदेव और रति अनेक रूप धारण करके राम का यह अनुपम विवाह देख रहे हों।

दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥

दर्शन की लालसा थी पर संकोच भी कम न था, इसलिए वह भाव बार-बार प्रकट और छिप रहा था। सब देखने वाले इतने मग्न हो गए कि जनक के समान वे भी अपनी सुध-बुध भूल बैठे।

प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥

प्रसन्न मुनियों ने भाँवरें फिरवाईं, नेग-सहित सारी रीतियाँ पूरी कीं। राम ने सीता की माँग में सिंदूर भरा, उस शोभा का किसी भी प्रकार वर्णन नहीं किया जा सकता।

अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥

मानो लाल पराग से भरा कमल-पुष्प चंद्रमा को अमृत के लोभ से भेंट कर रहा हो। फिर वशिष्ठ की आज्ञा पाकर वर-वधू एक ही आसन पर बैठे।

छंद

बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए।तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥

श्रेष्ठ आसन पर राम-सीता बैठे, राजा दशरथ मन में हर्षित हो उठे। बारंबार उन्हें निहारकर उनका शरीर पुलकित हो उठा, मानो अपने पुण्य-रूपी कल्पवृक्ष का यह नया फल मिला हो। सारे भुवन में उत्साह भर गया, सबने कहा - राम का विवाह हो गया। इस एक महामंगल का वर्णन एक जिह्वा से भला कैसे पूरा हो।

दोहा

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।माँडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि के॥कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥

तब वशिष्ठ की आज्ञा पाकर जनक ने विवाह की सारी सज्जा फिर से सँवारकर मांडवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला - इन कुँआरी कन्याओं को बुलवाया। कुशध्वज की कन्या मांडवी, जो गुण, शील, सुख और शोभा से परिपूर्ण थीं, उन्हें सब रीति और प्रीति के साथ विवाह करके राजा जनक ने भरत को दे दिया।

दोहा

जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥

सीता की छोटी बहन उर्मिला को सब सुंदरियों में शिरोमणि जानकर, उन्हें सब विधि से सम्मानपूर्वक लक्ष्मण को विवाहकर दे दिया। और जिनका नाम श्रुतकीर्ति था, वे सुनयन, सुमुखी और सब गुणों की खान थीं - रूप और शील से उजागर उस कन्या को राजा ने शत्रुघ्न को दिया।

छंद

अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं।सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिमुन सहित बिराजहीं॥

योग्य वर-वधुओं ने परस्पर एक-दूसरे को देखकर संकोचवश हृदय में हर्ष का अनुभव किया। सभी लोग सुंदरता की सराहना करते हुए आनंदित हो उठे, और देवता फूल बरसाने लगे। सुंदर वर-वधुएँ एक ही मंडप में ऐसी सुशोभित थीं मानो जीव की चारों अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय) विमान सहित विराजमान हों।

दोहा

मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि३२५

अपने सब पुत्रों को वधुओं सहित निहारकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए, मानो राजाओं में शिरोमणि दशरथ ने चारों पुरुषार्थ फल-सहित पा लिए हों।

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥

जैसी राम के विवाह की विधि वर्णित की गई, वैसी ही रीति से सब कुँआरों का विवाह हुआ। दहेज इतना अपार था कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, सारा मंडप सोने-मणियों से भर गया था।

कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥

कंबल, वस्त्र और विचित्र पटोरे अनेक प्रकार के और बहुमूल्य दिए गए। हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और अलंकृत गौएँ, जो कामधेनु के समान थीं, भी दहेज में दी गईं।

बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥

इतनी वस्तुएँ थीं कि उनका हिसाब कैसे किया जाए, उन्हीं को पता है जिन्होंने देखा; कहा नहीं जा सकता। दिक्पाल भी इसे देखकर ईर्ष्या करने लगे; राजा दशरथ ने सब कुछ सुखपूर्वक स्वीकार किया।

दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥

जिस याचक को जो पसंद आया, वह उसे दे दिया गया; जो बचा वह जनवासे में ले आया गया। तब हाथ जोड़कर जनक ने सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी में कहा।

छंद

सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥

आदर, दान, विनय और बड़ाई से सारी बारात का सम्मान करके, प्रसन्न होकर जनक ने महामुनियों के समूह को प्रेमपूर्वक पूजकर वंदना की। सिर नवाकर, हाथ जोड़कर, सब देवताओं को मनाते हुए वे कहने लगे कि हे साधुजन और देवगण, आप तो भाव के सागर चाहते हैं - मेरी यह अंजलि भर जल भला आपको क्या संतोष दे सकता है।

दोहा

कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥

फिर जनक ने भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलराज दशरथ से स्नेह और शील से सने मनोहर वचन कहे - हे राजन, आपसे संबंध होने से हम अब हर प्रकार से बड़े हो गए हैं। इस राज्य और वैभव सहित हमें बिना किसी शुल्क का आपका सेवक ही समझिए।

दोहा

ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥

इन कन्याओं को अपनी दासी समझकर नई करुणा से इनका पालन कीजिएगा, इनका कोई भी अपराध क्षमा कीजिएगा - मैंने बुलाकर बहुत ढिठाई की है। फिर सूर्यकुल-भूषण दशरथ ने भी समधी जनक का पूरा सम्मान किया - दोनों की परस्पर विनती इतनी थी कि कही नहीं जा सकती, हृदय प्रेम से परिपूर्ण था।

दोहा

बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥

देवताओं के समूह फूल बरसाने लगे, राजा दशरथ जनवासे को चल पड़े। नगाड़े, जय-जयकार और वेद-ध्वनि से आकाश और नगर में उत्तम कौतूहल छा गया। फिर मुनीश्वर वशिष्ठ की आज्ञा पाकर सखियाँ मंगल-गीत गाते हुए दूल्हे-दुल्हिनों को कोहबर में ले चलीं।

दोहा

पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन३२६

सीता बारंबार राम को निहारती थीं, शरीर से संकुचित होते हुए भी मन संकोच नहीं करता था; प्रेम के प्यासे उनके मनोहर मीन-सरीखे नेत्र सबके मन को हर लेते थे।

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥

राम का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुहावना था, उनकी शोभा करोड़ों कामदेवों को भी लजाने वाली थी। महावर लगे उनके सुंदर चरण-कमल ऐसे थे कि मुनियों के मन-रूपी भ्रमर सदा उन पर मँडराते रहते थे।

पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥

उनकी पीली पवित्र मनोहर धोती उदीयमान सूर्य और बिजली की चमक को भी फीका कर देती थी। कमर में सुंदर घुँघरू-भरी करधनी थी, विशाल भुजाओं पर सुंदर आभूषण शोभित थे।

पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे॥

पीत यज्ञोपवीत महान छवि दे रहा था, हाथ की अँगूठी सबका मन चुरा लेती थी। सब विवाह-साज सजाकर वे सुशोभित थे, विशाल वक्षस्थल पर वक्ष-आभूषण शोभित था।

पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥

कमर में पीला उपरना बँधा था, दोनों आँचलों में मणि-मोती लगे थे। कमल-सरीखे नेत्र, कानों में सुंदर कुंडल, और उनका मुख तो समस्त सौंदर्य का भंडार ही था।

सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥

सुंदर भौंहें और मनोहर नासिका थी, भाल पर तिलक रुचिरता का निवास-स्थान था। माथे पर मंगलमय मौर सुशोभित था, जिसमें मोती और मणियाँ गूँथी हुई थीं।

छंद

गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं।पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहिं।सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥

बड़ी मणियाँ गूँथा मौर और उनके सुंदर अंग सबका मन चुरा रहे थे। नगर की स्त्रियाँ और देवांगनाएँ वर को निहारकर अपने ऊपर से मणि-वस्त्र-आभूषण वार देती थीं, और आरती करके मंगल गीत गाती थीं। देवता फूल बरसाते थे, और सूत, मागध, भाट सुयश सुनाते थे।

दोहा

कोहबरहिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥

सुहागिनों ने सुखपूर्वक वर-वधुओं को कोहबर में लाया, और अत्यंत प्रीति से लौकिक रीति के अनुसार मंगल-गीत गाने लगीं। लहकौरा की रस्म में मानो पार्वती राम को और सरस्वती सीता को सिखा रही थीं; रनिवास हास-विलास के रस में डूबकर मानो अपने जन्म का फल पा रहा था।

दोहा

निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं।बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥

अपने ही हाथ की मणि में सौंदर्य-निधान राम की मूरत झलक रही थी, यह देखकर सीता की बाँह हिलती ही न थी, मानो विरह के भय से वह ठहर-सी गई हो। यह कौतुक, विनोद, हर्ष और प्रेम कहा नहीं जा सकता, यह तो केवल सखियाँ ही जानती थीं; अंत में सब सुंदर वर-वधुओं को सखियाँ जनवासे की ओर ले चलीं।

दोहा

तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा।चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चारयो मुदित मन सबहीं कहा॥जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी।चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥

उस समय जहाँ-तहाँ आशीर्वाद सुनाई देते थे, नगर और आकाश में महान आनंद छाया था। सबने प्रसन्न मन से कहा - चारों सुंदर जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगींद्र, सिद्ध, मुनीश्वर और देवता प्रभु को निहारकर नगाड़े बजाकर, फूल बरसाकर और जय-जयकार करते हुए अपने-अपने लोक को चले गए।

दोहा

सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास।सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास३२७

तब सब राजकुमार वधुओं सहित अपने पिता के पास आए; शोभा, मंगल और आनंद से भरकर जनवासा मानो उमड़ पड़ा।

पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥

फिर अनेक प्रकार का भोज तैयार हुआ, जनक ने दूत भेजकर बारातियों को बुलाया। अनुपम वस्त्रों के पावड़े बिछाए गए, और राजा दशरथ अपने पुत्रों सहित भोज में पधारे।

सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥

आदरपूर्वक सबके चरण पखारे गए, और सबको उनके योग्य आसनों पर बिठाया गया। जनक ने स्वयं दशरथ के चरण धोए, उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।

बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥

फिर उन्होंने राम के चरण-कमल धोए, जो स्वयं शिव के हृदय-कमल में छिपे रहते हैं। तीनों भाइयों को भी राम के समान जानकर, जनक ने अपने ही हाथों उनके चरण धोए।

आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥

राजा जनक ने सबको उचित आसन दिए, और रसोइयों को बुला लिया। आदरपूर्वक पत्तल-दोने बिछाए जाने लगे, सोने की कीलों वाले मणि-जड़ित पान सजाए गए।

दोहा

सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत३२८

दाल-चावल, गौ का शुद्ध घी - सुंदर, स्वादिष्ट और पवित्र भोजन क्षणभर में ही चतुर और विनम्र रसोइयों ने सबको परोस दिया।

पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥

पाँच ग्रास करके सब भोजन करने लगे, विवाह की गारी गीत सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। अनेक प्रकार के पकवान परोसे गए, जो अमृत के समान थे और जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।

परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥

सुजान रसोइये परोसने लगे, इतने प्रकार के व्यंजन थे कि उनके नाम कौन जाने। भोजन की चार विधियाँ बताई गई हैं, पर उनमें से एक-एक विधि का भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता।

छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥

छहों रसों वाले रुचिकर व्यंजन अनेक प्रकार के थे, प्रत्येक रस के भी अनगिनत रूप थे। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का नाम ले-लेकर मधुर स्वर में विवाह की ठिठोली-भरी गारी गा रहे थे।

समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥

उस अवसर पर सुहावनी गारी शोभा दे रही थी, राजा दशरथ अपने समाज सहित उसे सुनकर हँस रहे थे। इस प्रकार सबने भोजन किया, और आदरपूर्वक आचमन कराया गया।

दोहा

देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज३२९

जनक ने पान देकर दशरथ सहित सारे समाज की पूजा की; फिर सब राजाओं के शिरोमणि दशरथ प्रसन्न होकर जनवासे को लौट गए।

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥

नगर में नित नए मंगल हो रहे थे, दिन-रात पल के समान बीत रहे थे। भोर होते ही राजाओं में शिरोमणि दशरथ जागे, और याचक उनके गुणों का गान करने लगे।

देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥

वधुओं सहित राजकुमारों को देखकर मन में जितना आनंद था, वह कैसे कहा जाए। प्रातःक्रिया करके सब गुरु वशिष्ठ के पास गए, उनके मन में महान प्रमोद और प्रेम था।

करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा॥

प्रणाम और पूजा करके, हाथ जोड़कर, राजा दशरथ मानो अमृत में डुबोई हुई वाणी में बोले - हे मुनिराज, सुनिए, आपकी ही कृपा से आज मेरे सब कार्य पूर्ण हो गए हैं।

अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई॥सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई॥

हे स्वामी, अब सब ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भलीभाँति सजाई हुई गौएँ दान दीजिए। यह सुनकर गुरु वशिष्ठ ने राजा की बड़ाई की, फिर मुनियों के समूह को बुलाने भेजा।

दोहा

बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि३३०

वामदेव, देवर्षि नारद, वाल्मीकि और जाबालि सहित विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह वहाँ आए।

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई॥

राजा दशरथ ने सबको दंडवत प्रणाम किया, प्रेमपूर्वक पूजकर उन्हें श्रेष्ठ आसन दिए। फिर चार लाख उत्तम गौएँ मँगाईं, जो कामधेनु के समान स्वभाव वाली और सुंदर थीं।

सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं॥करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउ आजु जग जीवन लाहू॥

उन सब गौओं को हर प्रकार से अलंकृत करके, प्रसन्न होकर राजा ने ब्राह्मणों को दान कर दिया। राजा अनेक प्रकार से विनती करते हुए कहते थे - आज मैंने अपने जीवन का सच्चा लाभ पा लिया।

पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥

आशीर्वाद पाकर राजा आनंदित हुए, फिर उन्होंने याचकों के समूह को बुलाया। सूर्यकुल के आनंददाता दशरथ ने सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ - सबकी रुचि पूछ-पूछकर दान दिए।

चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥

याचक जय हो, जय हो, सूर्यकुल के स्वामी की जय हो - ऐसी गुण-गाथा पढ़ते-गाते हुए चले गए। इस प्रकार राम के विवाह का उत्साह इतना अपार था कि उसे शेषनाग के हजार मुख भी वर्णन नहीं कर सकते।

दोहा

बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ३३१

राजा दशरथ बारंबार विश्वामित्र के चरणों में सिर नवाकर कहते थे - हे मुनिराज, यह सारा सुख आपकी ही कृपा-कटाक्ष का प्रसाद है।

जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥

जनक के स्नेह, शील और कार्यों की, और उनकी संपन्नता की राजा दशरथ हर प्रकार से सराहना करते थे। दिन उगते ही राजा दशरथ विदा माँगते, पर जनक प्रेमपूर्वक उन्हें रोक लेते।

नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥

प्रतिदिन नया आदर और अधिकाई से पहुनाई की जाती, हजारों प्रकार से आगवानी होती। नगर में नित नया आनंद और उत्साह छाया रहता था, इसलिए दशरथ का प्रस्थान किसी को अच्छा नहीं लगता था।

बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥

इस प्रकार बहुत दिन बीत गए, मानो सारे बाराती स्नेह की रस्सी से बँध गए हों। तब विश्वामित्र और शतानंद ने जाकर राजा जनक को समझाकर यह बात कही।

अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥

यद्यपि आप स्नेह के कारण उन्हें छोड़ नहीं सकते, फिर भी अब राजा दशरथ को जाने की आज्ञा दीजिए। बहुत अच्छा, हे स्वामी कहकर जनक ने मंत्रियों को बुलाया, और मंत्रियों ने जय हो कहकर उनके सामने सिर नवाया।

दोहा

अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ३३२

जनक ने कहा - अवधनाथ दशरथ जाना चाहते हैं, महल के भीतर इसकी सूचना कर दो। यह सुनकर मंत्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा सब प्रेमविभोर हो उठे।

पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥

नगरवासी यह सुनकर कि बारात चलने वाली है, विकल होकर आपस में यह बात पूछने लगे। जब उन्हें प्रस्थान की सच्चाई पता चली, तो सब उदास हो गए, मानो साँझ होते ही कमल सकुचा जाते हैं।

जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥

जहाँ-जहाँ आते समय बाराती ठहरे थे, वहाँ-वहाँ अनेक प्रकार का साज-सामान तैयार करके भेजा गया। विविध प्रकार के मेवे, पकवान और भोजन-सामग्री का वर्णन नहीं हो सकता।

भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा॥तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥

कहारों ने अपार बैलों पर सामान लाद-लादकर भेजा, जनक ने अनेक सुसज्जित वस्तुएँ भेजीं। एक लाख घोड़े और पच्चीस हजार रथ, सब नख से सिर तक सुसज्जित करके भेजे गए।

मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥

दस हजार मतवाले हाथी सजाए गए, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी भी लजा जाएँ। सोना, वस्त्र और मणियों से भरे-भरे यान, भैंसें, गौएँ और अनेक प्रकार की वस्तुएँ भी भेजी गईं।

दोहा

दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि३३३

जनक ने फिर इतना अपार दहेज दिया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता - उसे देखकर तो दिक्पालों की संपदा भी तुच्छ जान पड़ती थी।

सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥

इस प्रकार सारा साज-समाज तैयार करके जनक ने अयोध्या भेज दिया। बारात चलने की बात सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो उठीं मानो कम पानी में मछलियाँ तड़पने लगें।

पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं॥होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥

वे बारंबार सीता को गोद में ले लेतीं, आशीर्वाद देतीं और सीख देतीं - सदा अपने पति की प्रिय बनी रहना, हमारा आशीर्वाद है कि तुम्हारा सुहाग चिरंजीवी रहे।

सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥

सास-ससुर और गुरु की सेवा करना, पति के मन को समझकर उनकी आज्ञा का पालन करना। अत्यंत स्नेहवश बुद्धिमती सखियाँ कोमल वाणी में उन्हें नारी-धर्म सिखाने लगीं।

सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई॥बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥

रानियों ने आदरपूर्वक सब कन्याओं को समझाया, और बारंबार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ बारंबार उन्हें गले लगातीं और कहतीं - विधाता ने नारी जाति की रचना ही क्यों की।

दोहा

तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु३३४

उसी अवसर पर सूर्यकुल की ध्वजा राम भाइयों सहित, विदा कराने के लिए प्रसन्नतापूर्वक जनक के महल की ओर चले।

चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥

चारों भाई स्वभाव से सुंदर सुशोभित थे, नगर के स्त्री-पुरुष उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े। कोई कहता - आज ये जाना चाहते हैं, जनक ने विदाई की तैयारी कर दी है।

लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥

ये चारों राजपुत्र हमारे प्रिय अतिथि हैं, इनका रूप नेत्र भरकर निहार लो। कौन जाने किस पुण्य से बुद्धिमान विधाता ने इन्हें हमारे नेत्रों का अतिथि बनाकर लाया है।

मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे॥

जैसे मरणशील व्यक्ति अमृत पा जाए, जन्मों का भूखा व्यक्ति कल्पवृक्ष पा जाए, नरक में पड़ा जीव हरि-पद पा जाए - इनके दर्शन हमारे लिए वैसे ही अनमोल हैं।

निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥

राम की शोभा निहारकर उसे हृदय में धारण कर लो, अपने मन-रूपी सर्प के लिए इस मूरत को मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल में पहुँचे।

दोहा

रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु३३५

रूप के सागर सब भाइयों को देखकर रनिवास हर्षित होकर उठ खड़ा हुआ; सासुएँ अत्यंत प्रसन्न मन से आरती करके न्योछावर करने लगीं।

देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥

राम की छवि देखकर वे अत्यंत अनुरक्त हो गईं, प्रेमविभोर होकर बारंबार उनके चरणों में लगीं। लाज कहीं शेष न रही, हृदय में प्रीति ही छा गई - उस सहज स्नेह का वर्णन भला कैसे किया जाए।

भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥

भाइयों सहित उबटन लगाकर स्नान कराया गया, फिर अत्यंत प्रेम से छहों रसों का भोजन कराया गया। उचित अवसर जानकर राम शील, स्नेह और संकोच से भरी वाणी में बोले।

राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥

राम ने कहा - राजा दशरथ अयोध्या को जाना चाहते हैं, विदा लेने के लिए उन्होंने हमें यहाँ भेजा है। हे माता, प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिए, और हमें बालक जानकर सदा स्नेह करते रहिएगा।

सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥

यह वचन सुनते ही रनिवास उदास हो गया, प्रेमवश सासुएँ कुछ बोल ही न सकीं। उन्होंने सब कन्याओं को हृदय से लगा लिया, फिर उन्हें उनके पतियों को सौंपकर अत्यंत विनती की।

छंद

करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥

विनती करके सुनयना ने सीता को राम को सौंप दिया, और हाथ जोड़कर बारंबार कहा - हे तात, मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ, आप सुजान हैं और सबकी गति आपको विदित है। परिवार, नगरवासियों और मुझ राजा से भी सीता को प्राणप्रिय जानिएगा। हे तुलसी के स्वामी! उसका शील और स्नेह देखकर उसे अपनी दासी करके मानिएगा।

सोरठा

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन३३६

हे राम, आप पूर्णकाम और ज्ञानियों में शिरोमणि हैं, आप भाव के ही प्रिय हैं। आप सेवकों के गुण ही ग्रहण करने वाले और दोषों का नाश करने वाले करुणा के धाम हैं।

अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥

ऐसा कहकर रानी सुनयना राम के चरण पकड़े रह गईं, मानो उनकी वाणी प्रेम के कीचड़ में डूब गई हो। स्नेह से सनी यह श्रेष्ठ वाणी सुनकर राम ने सासु का अनेक प्रकार से सम्मान किया।

राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥

राम ने हाथ जोड़कर विदा माँगी, बारंबार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर फिर से सिर नवाकर, भाइयों सहित रघुनाथ चल पड़े।

मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी॥पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं॥

उस सुंदर मधुर मूर्ति को हृदय में बसाकर सब रानियाँ स्नेह से शिथिल हो गईं। फिर धीरज धरकर उन्होंने अपनी कन्याओं को बुलाया, और माताएँ उन्हें बारंबार गले लगाने लगीं।

पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥

वे उन्हें पहुँचातीं, फिर लौटकर फिर मिल पड़तीं - उनकी परस्पर प्रीति कम न थी। बारंबार मिलती हुई कन्याओं को सखियों ने अलग किया, जैसे गाय को उसके बछड़े से अलग करके ले जाया जाता है।

दोहा

प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु३३७

सब स्त्री-पुरुष और सखियों सहित रनिवास प्रेमविभोर हो उठा, मानो करुणा ने ही जनकपुर में विरह का निवास बना लिया हो।

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥

सीता ने जिन तोते और मैना को सोने के पिंजरों में रखकर पाला-पढ़ाया था, वे भी व्याकुल होकर पूछने लगे - सीता कहाँ हैं। यह सुनकर किसका धैर्य न टूट जाए।

भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥बंधु समेत जनकु तब आए प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥

जब पक्षी और पशु तक इस प्रकार विकल हो उठे, तो मनुष्यों की दशा भला कैसे कही जाए। तब भाई सहित जनक वहाँ आए, प्रेम उमड़ पड़ने से उनके नेत्रों में जल छा गया।

सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥लीन्हि राय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥

सीता को देखते ही जनक का धैर्य भाग खड़ा हुआ, जो परम विरागी कहलाते थे। राजा ने सीता को हृदय से लगा लिया, और उनके ज्ञान की महामर्यादा भी मिट गई।

समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई॥

सब बुद्धिमान मंत्री उन्हें समझाते रहे, पर जनक ने अवसर का विचार करना ही छोड़ दिया। वे बारंबार अपनी पुत्री को हृदय से लगाते रहे; फिर सुंदर पालकियाँ सजाकर मँगाई गईं।

दोहा

प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस३३८

सारा परिवार प्रेमविभोर था; शुभ लग्न जानकर राजा जनक ने कन्याओं को पालकियों में चढ़ाकर सिद्धिदाता गणेश का स्मरण किया।

बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई॥दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥

राजा ने अनेक प्रकार से अपनी पुत्री को समझाया, नारी-धर्म और कुल-रीति सिखाई। बहुत से दास-दासियाँ दीं, जो सीता के प्रिय पवित्र सेवक थे।

सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥

सीता के चलते ही नगरवासी व्याकुल हो उठे, फिर भी शुभ मंगलदायी शकुन होने लगे। ब्राह्मण और मंत्रियों सहित पूरा समाज लेकर राजा जनक उन्हें पहुँचाने साथ चले।

समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥

प्रस्थान का समय देखकर वाद्य बजने लगे, बारातियों ने रथ, हाथी और घोड़े सजा लिए। दशरथ ने सब ब्राह्मणों को बुलाकर उनका दान और सम्मान पूर्ण किया।

चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना॥

चरण-कमलों की धूलि सिर पर धारण करके, आशीर्वाद पाकर राजा दशरथ प्रसन्न हुए। गणेश का स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया, और अनेक मंगलमूल शुभ शकुन होने लगे।

दोहा

सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान।चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान३३९

देवता हर्षित होकर फूल बरसाते और अप्सराएँ गान करतीं; अवधपति दशरथ नगाड़े बजाते हुए प्रसन्नतापूर्वक अयोध्या को चल पड़े।

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥

राजा दशरथ ने विनतीपूर्वक नगर के महाजनों को विदा किया, और आदरपूर्वक सब याचकों को बुलाया। आभूषण, वस्त्र, घोड़े और हाथी देकर, प्रेम से उन सबको संतुष्ट करके खड़ा कर दिया।

बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरे न चहहीं॥

बारंबार विरुदावली गाकर सब लोग राम को हृदय में बसाकर लौट गए। कोसलपति दशरथ बारंबार लौट जाने को कहते, पर जनक प्रेमवश लौटना नहीं चाहते थे।

पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥

फिर राजा दशरथ ने सुंदर वचन कहे - हे महाराज, अब लौट चलिए, आप बहुत दूर तक आ गए हैं। राजा जनक फिर रथ से उतरकर खड़े हो गए, प्रेम के प्रवाह से उनके नेत्रों में जल बढ़ आया।

तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥

तब विदेहराज जनक हाथ जोड़कर, मानो स्नेह के अमृत में डुबोए हुए वचन बोले - हे महाराज, मैं किस प्रकार अपनी विनय व्यक्त करूँ, आपने मुझे कितनी बड़ाई दी है।

दोहा

कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति३४०

कोसलपति दशरथ ने समधी और सज्जनों का हर प्रकार से सम्मान किया; परस्पर मिलन और विनय इतनी अधिक थी कि प्रीति हृदय में समाती नहीं थी।

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥

जनक ने मुनियों की मंडली को सिर नवाया, और सबसे आशीर्वाद पाया। फिर आदरपूर्वक उन्होंने अपने जामाताओं को गले लगाया - रूप, शील और गुणों की निधि वे सब भाई थे।

जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥

सुंदर कमल-सरीखे हाथ जोड़कर जनक प्रेम से मानो अपने ही उपजे वचन बोले - हे राम, मैं आपकी प्रशंसा किस प्रकार करूँ - आप तो मुनियों और शिव के मन-मानस-सरोवर के हंस हैं।

करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥

जिनकी प्राप्ति के लिए योगीजन क्रोध, मोह, ममता और मद त्यागकर योग-साधना करते हैं, जो व्यापक, ब्रह्म, अलख, अविनाशी, चिदानंद, निर्गुण होते हुए भी गुणों की राशि हैं।

मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥

जिन्हें मन सहित वाणी भी नहीं जान पाती, जिनका अनुमान लगाने वाले सब तर्क से थक जाते हैं, जिनकी महिमा को वेद भी नेति-नेति कहकर वर्णन करते हैं, जो तीनों कालों में एकरस बने रहते हैं।

दोहा

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।सब लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल३४१

वही आप मेरे नेत्रों के विषय बन गए, यही समस्त सुखों का मूल है। जब ईश्वर अनुकूल हो जाएँ, तो जीव को जगत में सारे लाभ मिल जाते हैं।

सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥

आपने मुझे हर प्रकार से बड़ाई दी, अपना सेवक जानकर मुझे अपना लिया। यदि दस हजार सरस्वती और शेषनाग हों, और करोड़ों कल्पों तक भी हिसाब करें, तो भी आपके इस उपकार का वर्णन न कर सकें।

मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥

हे रघुनाथ, सुनिए, मेरा भाग्य और आपके गुणों की गाथा कहते नहीं समाप्त होती। मैं कुछ कहता हूँ, इसका मेरे पास एक ही बल है - आप तो थोड़े से स्नेह पर भी रीझ जाते हैं।

बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥

हाथ जोड़कर मैं बारंबार यही माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी कभी आपके चरण न छोड़े। यह श्रेष्ठ वचन सुनकर, मानो प्रेम से पोषित होकर, पूर्णकाम राम संतुष्ट हुए।

करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही॥

श्रेष्ठ विनय करके राम ने ससुर जनक का सम्मान किया, उन्हें पिता, विश्वामित्र और वशिष्ठ के समान माना। फिर उन्होंने भरत से भी विनती की; भरत ने प्रेमपूर्वक मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया।

दोहा

मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस३४२

लक्ष्मण शत्रुघ्न से मिले, राजा जनक ने सबको आशीर्वाद दिया; सब परस्पर प्रेमविभोर होकर बारंबार सिर नवाने लगे।

बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥

बारंबार विनय और बड़ाई करके राम सब भाइयों सहित चल पड़े। जनक ने जाकर विश्वामित्र के चरण पकड़ लिए, और उनकी चरण-रज सिर तथा नेत्रों पर लगाई।

सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥

जनक बोले - सुनिए मुनीश्वर, आपके श्रेष्ठ दर्शन से मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है, मेरे मन को यह पूरा विश्वास है। जो सुख और सुयश स्वयं दिक्पाल भी चाहते हुए मनोरथ करने में सकुचाते हैं।

सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥

हे स्वामी, वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया है, क्योंकि आपके दर्शन के पीछे सब सिद्धियाँ अनुगामिनी हैं। बारंबार सिर नवाकर विनय करके, आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौट गए।

चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥

नगाड़े बजाकर बारात चल पड़ी, छोटे-बड़े सारे समुदाय प्रसन्न थे। मार्ग में गाँव के स्त्री-पुरुष राम को निहारकर, अपने नेत्रों का फल पाकर सुखी होते थे।

दोहा

बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत३४३

बीच-बीच में सुंदर पड़ाव करते हुए और मार्ग के लोगों को सुख देते हुए, शुभ दिन बारात अयोध्या के समीप आ पहुँची।

हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥

नगाड़े और श्रेष्ठ ढोल बजाए गए, भेरी और शंख की ध्वनि से घोड़े-हाथी गरज उठे। झाँझ और सुंदर डिंडिमी वाद्य बज रहे थे, शहनाइयाँ सरस राग में बज उठीं।

पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥

बारात आने का समाचार सुनकर नगरवासी प्रसन्न हो उठे, उनके शरीर पुलकित हो उठे। सबने अपने-अपने सुंदर घर सजाए, साथ ही बाजार, मार्ग, चौराहे और नगर-द्वार भी सजाए।

गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई॥बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥

सारी गलियाँ सुगंधित द्रव्यों से सींची गईं, जहाँ-तहाँ सुंदर रंगोली पुराई गई। बाजार इतना सुंदर सजाया गया कि उसका वर्णन नहीं हो सकता - तोरण, ध्वजा, पताका और मंडप सजाए गए।

सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥

फलों से लदे सुपारी और केले के वृक्ष, तथा आम के वृक्ष रोपे गए, साथ ही बकुल, कदंब और तमाल के वृक्ष भी। ये सुंदर वृक्ष मानो धरती को छूते हुए लगते थे, उनकी जड़ों के चारों ओर मणिजड़ित सुंदर क्यारियाँ बनाई गई थीं।

दोहा

बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि३४४

घर-घर में विविध प्रकार के मंगल-कलश सजाए गए; राम की इस नगरी को निहारकर ब्रह्मा आदि सब देवता भी ईर्ष्या करने लगे।

भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥

उस अवसर पर राजमहल की शोभा ऐसी थी कि उसकी रचना देखकर कामदेव का भी मन मोहित हो जाए। मंगल-शकुन, मनोहरता, ऋद्धि, सिद्धि, सुख और संपदा सब सुहावने लग रहे थे।

जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए॥देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥

मानो सब सहज सुहावने उत्साह शरीर धारण करके दशरथ के महल में छा गए हों। राम-सीता को देखने की लालसा भला किसे न हो, यह कहना कठिन है।

जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि॥सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥

सुहागिनें झुंड-झुंड में मिलकर चलीं, वे अपनी छवि से कामदेव की प्रेयसियों को भी लजाती थीं। सब सुमंगल-सामग्री और आरती सजाए हुए वे ऐसा गान करती थीं मानो सरस्वती ही अनेक रूप धारण करके गा रही हों।

भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं॥

राजमहल में कोलाहल मच गया, उस समय के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्या आदि राम की माताएँ प्रेमविभोर होकर अपनी शरीर की सुध ही भूल गईं।

दोहा

दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि३४५

गणेश और शिव की पूजा करके ब्राह्मणों को अपार दान दिया गया; सब ऐसे प्रसन्न थे मानो किसी परम दरिद्र को चारों पदार्थ मिल गए हों।

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥

सब माताएँ आनंद और हर्ष से विभोर थीं, उनके शरीर शिथिल हो गए थे, पैर चलते ही नहीं थे। राम के दर्शन की चाह में वे अत्यंत अनुरक्त होकर परिछन की सामग्री सजाने लगीं।

बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥

अनेक विधानों से वाद्य बजने लगे, सुमित्रा प्रसन्न होकर मंगल-सामग्री सजाने लगीं। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी - ये सब मंगल की मूल वस्तुएँ थीं।

अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥

अक्षत, अंकुरित अनाज, लावा और सुंदर तुलसी की मंजरी सजी हुई थीं। मिट्टी के सहज सुंदर छोटे घड़े ऐसे लगते थे मानो कामदेव-रूपी पक्षी ने अपने घोंसले बना लिए हों।

सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥

शकुन और सुगंधित द्रव्यों का वर्णन नहीं हो सकता, सब रानियाँ सारी मंगल-सामग्री सजा रही थीं। अनेक विधानों से आरतियाँ रची गईं, और सब प्रसन्न होकर मधुर मंगल-गान करने लगीं।

दोहा

कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिए मात।चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात३४६

सोने के थालों में मंगल-सामग्री भरकर अपने कमल-सरीखे हाथों में लिए, माताएँ प्रसन्न होकर परिछन करने चलीं, उनके शरीर रोमांच से पुलकित थे।

धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥

धूप के धुएँ से आकाश काला हो गया, मानो सावन के बादल घुमड़ आए हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसाते थे, मानो बगुलों की पंक्ति मन को खींच रही हो।

मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥

सुंदर मणिजड़ित वंदनवार ऐसे लगते थे मानो इंद्रधनुष ही सजाया गया हो। अटारियों पर स्त्रियाँ कभी प्रकट होतीं कभी छिप जातीं, मानो सुंदर चंचल बिजली चमक रही हो।

दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥

नगाड़ों की ध्वनि बादलों की घोर गर्जना जैसी थी, याचक चातक, मेंढक और मोर के समान थे। देवता सुगंधित पवित्र जल बरसाते थे, चंद्रमा के समान नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी थे।

समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥

उचित समय जानकर गुरु वशिष्ठ ने आज्ञा दी, तब रघुकुल-मणि राम ने नगर में प्रवेश किया। शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण करके राजा दशरथ अपने समाज सहित प्रसन्न हुए।

दोहा

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभी बजाइ।बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ३४७

शुभ शकुन होने लगे, देवता नगाड़े बजाकर फूल बरसाने लगे; देवांगनाएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं और मधुर मंगल-गान गाने लगीं।

मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥

मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों में उजागर राम के यश का गान करने लगे। जय-जयकार की ध्वनि, निर्मल वेद-वाणी - दसों दिशाओं में सुमंगल की ध्वनि सुनाई देने लगी।

बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥

अनेक वाद्य बजने लगे, आकाश में देवता और नगर में लोग सब अनुरक्त हो गए। सजे-सजाए बाराती इतने सुंदर थे कि वर्णन नहीं किया जा सकता, उनके मन में महान हर्ष और सुख समाया नहीं जा रहा था।

पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥

तब नगरवासियों ने राजा दशरथ को प्रणाम किया, राम को देखकर वे सुखी हो गए। वे मणि और वस्त्र न्योछावर करने लगे, उनके नेत्रों में जल और शरीर पर रोमांच छा गया।

आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी॥सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥

नगर की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आरती करने लगीं, चारों सुंदर राजकुमारों को निहारकर हर्षित हुईं। पालकियों के सुंदर पर्दे खोलकर वे दुल्हिनों को देखकर सुखी हो गईं।

दोहा

एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार३४८

इस प्रकार सबको सुख देते हुए बारात राजद्वार पर आ पहुँची; माताएँ प्रसन्न होकर वधुओं सहित राजकुमारों का परिछन करने लगीं।

करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥भूषन मनि पट नाना जाती।। करही निछावरि अगनित भाँती॥

वे बारंबार आरती करती थीं, उनके प्रेम और आनंद का वर्णन कौन कर सकता है। आभूषण, मणि और अनेक प्रकार के वस्त्र वे अगणित प्रकार से न्योछावर करती थीं।

बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥

वधुओं सहित चारों पुत्रों को देखकर माताएँ परमानंद में मग्न हो गईं। बारंबार सीता-राम की छवि देखकर वे प्रसन्न होकर अपने जीवन को सफल मानने लगीं।

सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥

सखियाँ बारंबार सीता का मुख निहारतीं, और अपने पुण्य की सराहना करते हुए गीत गातीं। देवता क्षण-क्षण फूल बरसाते थे, नाचते-गाते और सेवा में तत्पर रहते थे।

देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥

चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाएँ ढूँढ़ डालीं, पर कोई भी उपमा देते नहीं बनी - सब तुच्छ ही लगीं। सब स्त्रियाँ उनके रूप में अनुरक्त होकर एकटक निहारती रह गईं।

दोहा

निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत३४९

वेद-नीति और कुल-रीति के अनुसार अर्घ्य देकर, पावड़े बिछाकर, वधुओं सहित पुत्रों का परिछन करके सब उन्हें महल के भीतर ले चलीं।

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥

चार सहज सुंदर सिंहासन ऐसे थे मानो कामदेव ने स्वयं अपने हाथों से बनाए हों। उन पर कुँआरे राजकुमारों को बिठाया गया, और आदरपूर्वक उनके पवित्र चरण पखारे गए।

धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥

धूप, दीप और नैवेद्य से वेद-विधि के अनुसार मंगल की निधि वर-वधुओं की पूजा की गई। बारंबार आरती की जाती थी, सुंदर पंखे और चँवर उनके सिर पर ढुलाए जाते थे।

बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं॥

अनेक वस्तुएँ न्योछावर की जा रही थीं, सब माताएँ आनंद से भरकर सुशोभित थीं - मानो किसी योगी ने परम तत्व पा लिया हो, मानो किसी चिरकालिक रोगी को अमृत मिल गया हो।

जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥

मानो किसी जन्म के दरिद्र को पारस पत्थर मिल गया हो, मानो अंधे को सुंदर नेत्र मिल गए हों। मानो गूँगे के मुख में सरस्वती स्वयं आ बसी हों, मानो किसी वीर ने युद्ध में विजय पाई हो।

दोहा

एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु३५०(क)

इस सुख से भी सौ करोड़ गुना अधिक आनंद माताओं को मिल रहा था, क्योंकि रघुकुल-चंद्रमा राम भाइयों सहित विवाह करके घर आ गए थे।

दोहा

लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं३५०(ख)

माताएँ लोक-रीति संपन्न कर रही थीं, वर-वधू संकोच से सकुचा रहे थे; यह आनंद-विनोद देखकर राम मन-ही-मन मुसकरा रहे थे।

देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥

विधिपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा की गई, जिससे मन की सारी वासनाएँ पूर्ण हो गईं। सबकी वंदना करके यही वरदान माँगा जाता था - भाइयों सहित राम का कल्याण हो।

अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं॥भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥

अदृश्य रहकर देवता आशीर्वाद दे रहे थे, प्रसन्न माताएँ अपना आँचल भरकर उसे ग्रहण करती थीं। राजा दशरथ ने बारातियों को बुलाकर उन्हें सवारी, वस्त्र, मणि और आभूषण दिए।

आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि॥पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए॥

आज्ञा पाकर, राम को हृदय में बसाकर सब प्रसन्न होकर अपने-अपने घर चले गए। नगर के सब स्त्री-पुरुषों को वस्त्र पहनाए गए, घर-घर बधाई के बाजे बजने लगे।

जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई॥सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना॥

याचक जो-जो माँगते, प्रसन्न राजा उन्हें वही-वही देते थे। सब सेवकों और अनेक वादकों को भी दान-सम्मान से पूर्ण किया गया।

दोहा

देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ३५१

सब प्रणाम करके आशीर्वाद देते और गुण-गाथा गाते थे; तब राजा दशरथ गुरु और ब्राह्मणों सहित महल को गए।

जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥

वशिष्ठ ने जो आज्ञा दी, राजा ने लोक और वेद-विधि के अनुसार आदरपूर्वक उसका पालन किया। ब्राह्मणों की भीड़ देखकर सब रानियाँ अपना बड़ा भाग्य जानकर आदरपूर्वक उठ खड़ी हुईं।

पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए॥आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे॥

सबके चरण पखारकर स्नान कराया गया, भलीभाँति पूजा करके राजाओं को भोजन कराया गया। आदर, दान और प्रेम से संतुष्ट होकर वे आशीर्वाद देते हुए मन में संतोष लेकर चले गए।

बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥

राजा दशरथ ने विश्वामित्र की अनेक प्रकार से पूजा की, कहा - हे नाथ, मेरे समान धन्य कोई दूसरा नहीं। राजाओं ने उनकी अत्यंत प्रशंसा की, और रानियों सहित उनकी चरण-धूलि ग्रहण की।

भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू॥पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥

महल के भीतर उन्हें उत्तम निवास दिया गया, राजा और रनिवास उनकी इच्छा का ध्यान रखते थे। फिर राजा ने गुरु वशिष्ठ के चरण-कमलों की पूजा की, और हृदय में अपार प्रीति के साथ विनती की।

दोहा

बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु३५२

वधुओं सहित सब राजकुमार, और रानियों सहित राजा - सब बारंबार गुरु के चरणों की वंदना करते थे, और मुनीश्वर वशिष्ठ उन्हें आशीर्वाद देते थे।

बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥

राजा ने हृदय में अत्यंत प्रेम से विनती की, अपने सब पुत्रों और संपदा को गुरु के सामने प्रस्तुत करते हुए। मुनिनायक वशिष्ठ ने अपना नेग माँगकर लिया, और अनेक प्रकार से आशीर्वाद दिया।

उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई॥

सीता सहित राम को हृदय में बसाकर गुरु वशिष्ठ प्रसन्न होकर अपने निवास को चले गए। राजा ने सब ब्राह्मण-वधुओं को बुलाया, और उन्हें सुंदर वस्त्र-आभूषण पहनाए।

बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥

फिर सुहागिनों को बुलाकर उनकी रुचि के अनुसार पहनावा दिया गया। नेगी लोग अपने-अपने योग्य नेग लेते थे, और राजाओं में शिरोमणि दशरथ उनकी रुचि के अनुसार उन्हें देते थे।

प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥

जो भी प्रिय अतिथि और पूज्य जाने गए, राजा ने उन सबका भलीभाँति सम्मान किया। देवता राम के इस विवाह को देखकर फूल बरसाते और उत्साह की प्रशंसा करते थे।

दोहा

चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ३५३

देवता नगाड़े बजाते हुए सुखपूर्वक अपने-अपने लोक को चले गए, आपस में राम के यश की चर्चा करते हुए - उनके हृदय में प्रेम समाया नहीं जा रहा था।

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥

राजा ने हर प्रकार से सबको संतुष्ट किया, उनका हृदय उत्साह से भरा हुआ था। जहाँ रनिवास था, वहाँ पग धरकर उन्होंने वधुओं सहित राजकुमारों को निहारा।

लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥

उन्होंने आनंद से उन्हें गोद में ले लिया, जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है। वधुओं को प्रेमपूर्वक गोद में बिठाया, और बारंबार हृदय से हर्षित होकर दुलार किया।

देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥

यह समाज देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया, सबके हृदय में आनंद का निवास हो गया। राजा ने जिस प्रकार विवाह हुआ था वह सब कह सुनाया, यह सुन-सुनकर सबको हर्ष हो रहा था।

जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानी सब प्रमुदित सुनि करनी॥

राजा दशरथ ने जनक के राज्य, गुण, शील, बड़ाई, प्रीति, रीति और सुहावनी संपदा का अनेक प्रकार से भाटों की भाँति बखान किया; यह वृत्तांत सुनकर सब रानियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं।

दोहा

सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति३५४

पुत्रों सहित स्नान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और जाति-बंधुओं को बुलाकर अनेक प्रकार से भोजन किया; इस प्रकार पाँच घड़ी रात बीत गई।

मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥

सुंदर स्त्रियाँ मंगल-गान कर रही थीं, वह रात्रि सुख का मूल और मनोहर बन गई थी। आचमन करके सबको पान मिले, माला और सुगंध से सबकी छवि सुशोभित हो गई।

रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥

राम को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर चले गए। प्रेम, प्रमोद, विनोद, बड़ाई और सारा समाज मनोहरता से भरा हुआ था।

कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥

जिसे सौ सरस्वती और शेषनाग भी नहीं कह सकते, जिसे वेद, ब्रह्मा, शिव और गणेश भी नहीं वर्णन कर सकते, उसे मैं कैसे और किस विधि से वर्णन करूँ।

नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी॥बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई॥

राजा ने हर प्रकार से सबका सम्मान करके कोमल वचन कहते हुए रानियों को बुलाया - वधुएँ छोटी लड़कियाँ हैं, पराए घर से आई हैं, इन्हें पलक की भाँति नेत्रों में संभालकर रखना।

दोहा

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ३५५

राजा ने कहा - बच्चे थके हुए और नींद में हैं, जाकर उन्हें सुला दो। ऐसा कहकर वे राम के चरणों में चित्त लगाए हुए विश्राम-गृह को चले गए।

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥

राजा के सहज सुहावने वचन सुनकर सोने और मणियों से जड़े पलंग बिछाए गए। दूध के झाग जैसी सुंदर और सुगंधित, कोमल और सुंदर अनेक चादरें बिछाई गईं।

उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥

श्रेष्ठ तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता, मणि-भवन में माला और सुगंध महक रही थी। रत्नों के दीपक और अत्यंत सुंदर चँदोवा - इसका वर्णन नहीं हो सकता, वही जान सकता है जिसने उसे देखा हो।

सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥

सुंदर सेज रचकर राम को उठाया गया, और प्रेमपूर्वक पलंग पर लिटाया गया। फिर बारंबार भाइयों को भी आज्ञा दी गई, और उन्होंने अपनी-अपनी सेज पर शयन किया।

देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥

राम के साँवले, कोमल और सुंदर अंगों को देखकर सब माताएँ प्रेमपूर्वक कहने लगीं - हे तात, मार्ग में जाते समय भयंकर ताड़का को तुमने किस प्रकार मार डाला।

दोहा

घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु३५६

जो घोर निशाचर और विकट योद्धा युद्ध में किसी को गिनते ही नहीं थे, उन दुष्ट मारीच-सुबाहु को उनके सहायकों सहित तुमने किस प्रकार मार डाला।

मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई॥

हे तात, मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, मुनि के प्रसाद से तुमने अनेक कठिनाइयाँ टाल दीं। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके, गुरु के प्रसाद से सारी विद्याएँ पाईं।

मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥

तुम्हारे चरणों की धूलि लगते ही मुनि-पत्नी अहिल्या का उद्धार हो गया, यह कीर्ति सारे भुवन में भर गई। फिर राजाओं की सभा में तुमने शिव के उस कठोर धनुष को तोड़ डाला, जो कच्छप की पीठ के समान दृढ़ था।

बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥

विश्व-विजय का यश और सीता को पाकर सब भाई विवाह करके घर आ गए। तुम्हारे ये सब अमानुष कर्म केवल विश्वामित्र की कृपा से ही संभव हो सके।

आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥

हे तात, तुम्हारा चंद्रमुख देखकर आज हमारा जीवन सफल हो गया। जो दिन तुम्हें बिना देखे बीते, विधाता उन्हें हमारी आयु में न गिनें।

दोहा

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन३५७

राम ने विनम्र श्रेष्ठ वचन कहकर सब माताओं को संतुष्ट किया; फिर शिव, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण करके उन्होंने अपने नेत्र नींद के वश कर लिए।

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥

नींद में उनका सुंदर मुख ऐसे सुशोभित था मानो साँझ के समय कमल मुँदा हुआ हो। घर-घर में स्त्रियाँ जागरण कर रही थीं, आपस में मंगल-गारी गा रही थीं।

पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई॥

नगरी और रात दोनों सुशोभित थीं; रानियाँ कहती थीं - हे सखी, देखो। सासुएँ सुंदर वधुओं को साथ लेकर सोईं, मानो सर्पों ने अपनी सिरमणि हृदय में छिपा ली हो।

प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥

पवित्र प्रातःकाल में प्रभु राम जागे, मुर्गे बोलने लगे। भाटों और मागधों ने गुण-गान किया, नगरवासी द्वार पर प्रणाम करने आए।

बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥

ब्राह्मण, देवता, गुरु, पिता और माता की वंदना करके, आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओं का आदरपूर्वक मुख निहारकर वे राजा दशरथ के साथ द्वार पर पग धरने चले।

दोहा

कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ३५८

सहज ही पवित्र होकर सबने शौच किया, फिर पुनीत नदी में स्नान किया। प्रातःक्रिया करके चारों भाई पिता के पास आए।

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई॥देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥

राजा ने उन्हें देखकर हृदय से लगा लिया, आज्ञा पाकर वे हर्षित होकर बैठ गए। राम को देखकर सारी सभा शीतल हो गई, मानो नेत्रों के लाभ की चरम सीमा पा ली हो।

पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥

फिर मुनि वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों वहाँ पधारे; राजा ने उन्हें सुंदर आसनों पर बिठाया। पुत्रों सहित राजा ने उनकी पूजा करके उनके चरणों में प्रणाम किया; राम को निहारकर दोनों गुरु प्रेममग्न हो गए।

कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥

वशिष्ठ धर्म की कथाएँ सुना रहे थे, राजा दशरथ रनिवास सहित उन्हें सुन रहे थे। मुनियों के मन के लिए भी दुर्गम विश्वामित्र की महिमा को वशिष्ठ ने प्रसन्न होकर विस्तार से वर्णन किया।

बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥

वामदेव मुनि बोले - यह सब सत्य है, विश्वामित्र की सुंदर कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई है। यह सुनकर सबको आनंद हुआ, और राम-लक्ष्मण के हृदय में विशेष उत्साह जागा।

दोहा

मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति३५९

इस प्रकार नित्य मंगल, आनंद और उत्सव के बीच दिन बीतते जा रहे थे; अयोध्या आनंद से इस कदर भर उठी कि वह दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता ही गया।

सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥

शुभ मुहूर्त निकालकर विवाह के मंगल-कंकण खोले गए, मंगल, आनंद और विनोद कम न था। इस नित नए सुख को देखकर देवता भी ईर्ष्या करने लगे, और ब्रह्मा से अयोध्या में जन्म लेने का वरदान माँगने लगे।

बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥

विश्वामित्र प्रतिदिन अपने आश्रम लौटने की इच्छा करते, पर राम की प्रेमपूर्ण विनय के वश रुक जाते। राजा दशरथ का भाव दिन-प्रतिदिन सौ गुना बढ़ता देखकर महामुनि विश्वामित्र उसकी सराहना करते थे।

मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥

जब विश्वामित्र ने विदा माँगी, तो राजा प्रेममग्न होकर पुत्रों सहित उनके आगे खड़े हो गए - हे नाथ, यह सारी संपदा आपकी ही है, मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक मात्र हूँ।

करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू॥अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥

हे मुनि, इन बालकों पर सदा स्नेह बनाए रखिएगा, और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा। ऐसा कहकर राजा पुत्रों और रानियों सहित उनके चरणों में गिर पड़े, प्रेमविह्वल होने से मुख से वाणी ही न निकली।

दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥

विश्वामित्र ने अनेक प्रकार से आशीर्वाद देकर प्रस्थान किया - उस प्रीति की रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। राम सब भाइयों सहित प्रेमपूर्वक उन्हें पहुँचाकर, आज्ञा पाकर लौट आए।

दोहा

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु३६०

गाधिकुल के चंद्रमा विश्वामित्र मार्ग में जाते हुए राम के रूप, राजा की भक्ति, विवाह के उत्साह और आनंद को मन-ही-मन प्रसन्नतापूर्वक सराहते जा रहे थे।

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥

ज्ञानी वामदेव और रघुकुल-गुरु वशिष्ठ ने फिर विश्वामित्र की कथा विस्तार से सुनाई। मुनि का यह सुयश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पूर्वजन्म के पुण्यों के प्रभाव की चर्चा करने लगे।

बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥

आज्ञा मिलते ही सब लोग अपने-अपने घर लौट गए, राजा भी पुत्रों सहित महल को गए। जहाँ-तहाँ लोग राम के विवाह की गाथा गाने लगे, उनका पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया।

आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥

जब से राम विवाह करके घर आए, तब से अयोध्या में सब प्रकार का आनंद बसने लगा। प्रभु के विवाह में जो उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और शेषनाग भी वर्णन नहीं कर सकते।

कबिकुल जीवनु पावन जानी।। राम सीय जसु मंगल खानी॥तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥

सीता-राम के इस मंगलदायी यश को कवियों के जीवन को पवित्र करने वाला जानकर, अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए ही मैंने इसका थोड़ा-सा वर्णन कर दिया है।

छंद

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो।रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥

अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए ही तुलसीदास ने राम का यश कहा है, अन्यथा राम का चरित्र तो एक अपार समुद्र है, जिसका पार आज तक किस कवि ने पाया है। जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के इस मंगलमय उत्सव को आदरपूर्वक सुनकर गाएँगे, वे सीता-राम की कृपा से सदा सुख पाएँगे।

सोरठा

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु३६१

सीता-राम के इस विवाह-प्रसंग को जो प्रेमपूर्वक गाएँगे या सुनेंगे, उनके लिए सदा उत्साह और आनंद ही आनंद रहेगा, क्योंकि राम का यश स्वयं मंगल का धाम है।

सोरठा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथम: सोपान: समाप्त:।कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पहला सोपान समाप्त हुआ॥

इस प्रकार कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस के इस प्रथम सोपान, बालकाण्ड, की यहाँ समाप्ति होती है।