रामचरितमानसआरती
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चतुर्थ सोपान

किष्किन्धाकाण्ड

सुग्रीव मित्रता, बालि वध एवं वानर सेना संगठन की कथा।

किष्किन्धाकाण्ड — सुनें

किष्किन्धाकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी

सुग्रीव मित्रता, बालि वध एवं वानर सेना संगठन की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

श्लोक

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौशोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौसीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः

जो कुंदपुष्प और नीलकमलके समान श्वेत और श्याम वर्णके परम बलशाली एवं दिव्य ज्ञानके धाम हैं, जो शोभासे संपन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदों द्वारा वंदित तथा गौ और ब्राह्मणोंके अत्यंत प्रिय हैं, जिन्होंने मायासे मनुष्यरूप धारण कर रखा है, जो सद्धर्मके रक्षक और सबके हितकारी हैं तथा सीताजीकी खोजमें मार्गपर चल रहे हैं—वे रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई हमें भक्ति प्रदान करें।

श्लोक

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययंश्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा।संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनंधन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्

जो वेदरूपी समुद्रसे प्रकट हुआ, कलियुगके समस्त पापोंको सदाके लिए मिटा देनेवाला और अविनाशी है, जो भगवान् शिवके सुंदर मुखचंद्रमापर सदा सुशोभित रहता है, जो जन्म-मृत्युरूपी रोगकी औषधि और सुखदायी है तथा जो श्रीजानकीजीके जीवनस्वरूप है—उस श्रीरामनामरूपी अमृतका जो पुण्यात्मा सदा पान करते हैं, वे धन्य हैं।

सोरठा

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न॥

जहाँ भगवान् शिव और पार्वतीजी निवास करते हैं, उस काशीको मुक्तिकी जन्मभूमि, ज्ञानकी खान और पापोंका नाश करनेवाली जानकर भला उसकी सेवा क्यों न की जाए।

जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥

जिन शिवजीने जलते हुए समस्त देवताओंकी रक्षाके लिए स्वयं भयंकर हलाहल विष पी लिया, हे मूढ़ मन! तू उन्हें क्यों नहीं भजता? उनके समान कृपालु भला और कौन है?

अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना॥धरि बटु रूप देखु तें जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई॥

अत्यंत भयभीत सुग्रीवने कहा—हे हनुमान् सुनो, ये दोनों पुरुष बल और सौंदर्यके धाम प्रतीत होते हैं। तुम ब्रह्मचारीका रूप धरकर पास जाकर देखो और मन ही मन उनकी बात समझकर मुझे संकेतसे बता देना।

पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला॥बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥

सुग्रीवने कहा—यदि ये बालिके भेजे हुए हों तो मैं तुरंत यह पर्वत छोड़कर भाग जाऊँगा। यह सुनकर हनुमानजी ब्राह्मणका रूप धरकर वहाँ गए और मस्तक झुकाकर इस प्रकार पूछने लगे।

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा॥कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥

हे वीर! तुम कौन हो, जो श्यामल और गौर शरीरधारी क्षत्रियके वेषमें वनमें विचरण कर रहे हो? हे स्वामी! कठोर धरतीपर कोमल चरणोंसे चलते हुए तुम किस कारण वनमें भटक रहे हो?

मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता॥की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥

तुम्हारे कोमल और मनोहर सुंदर अंग वनकी असहनीय धूप और आँधीको सह रहे हैं। क्या तुम ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनोंमेंसे कोई हो, या तुम दोनों नर-नारायण हो?

दोहा

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥

अथवा क्या तुम जगत्के मूल कारण, संपूर्ण लोकोंके स्वामी वही भगवान् हो, जिन्होंने संसारको तारने और पृथ्वीका भार उतारनेके लिए मनुष्यरूपमें अवतार लिया है?

कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए॥नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥

श्रीरामने कहा—हम कोसलनरेश दशरथजीके पुत्र हैं और पिताकी आज्ञा मानकर वनमें आए हैं। हमारे नाम राम और लक्ष्मण हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ एक सुंदर सुकुमारी स्त्री भी थी।

इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥

यहीं किसी राक्षसने उसे हर लिया, हे विप्र! हम उसीको खोजते फिर रहे हैं। हमने तो अपनी कथा कह दी, अब तुम भी अपना परिचय बताओ।

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष के रचना॥

प्रभुको पहचानते ही हनुमानजी उनके चरणोंमें गिर पड़े—वह सुख शब्दोंमें वर्णन नहीं हो सकता। शरीर पुलकित हो उठा, मुखसे वाणी न निकली, वे बस प्रभुके सुंदर रूपको एकटक निहारते रह गए।

पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥

फिर धैर्य धरकर उन्होंने स्तुति की, हृदयमें अपने स्वामीको पहचानकर हर्ष हो रहा था। बोले—हे स्वामी! मेरा पूछना तो न्यायसंगत था, पर आप मनुष्यकी भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे हैं?

तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना॥

मैं तो आपकी मायाके वशीभूत होकर भूला-भटका फिर रहा था, इसीलिए अपने स्वामीको पहचान न सका।

दोहा

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥

मैं तो पहलेसे ही मंदबुद्धि, मोहग्रस्त, कुटिल हृदयवाला और अज्ञानी हूँ, उसपर हे दीनबंधु भगवान्! आपने भी मुझे भुला दिया।

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि पर जनि भोरें॥नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥

हे नाथ! यद्यपि मुझमें अनेक दोष हैं, फिर भी सेवक अपने स्वामीको भूलनेकी भूल न करे। जीव आपकी मायासे मोहित रहता है, आपकी ही कृपासे उसका उद्धार होता है।

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

इसीलिए हे रघुवीर! मैं आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ कि मुझे भजनका कोई उपाय नहीं आता। सेवक स्वामीके और पुत्र माताके भरोसे निश्चिंत रहता है, प्रभुको सेवककी रक्षा करनी ही पड़ती है।

अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥

यह कहते हुए हनुमानजी व्याकुल होकर चरणोंमें गिर पड़े और अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया, हृदय प्रेमसे भर गया। तब श्रीरघुनाथजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया और अपने नेत्रोंके जलसे सींचकर शांत किया।

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ॥

प्रभुने कहा—हे कपि! सुनो, मन छोटा मत करना, तुम मुझे लक्ष्मणसे भी दुगुने प्रिय हो। सब मुझे समदर्शी कहते हैं, पर सेवक मुझे विशेष प्रिय है, क्योंकि उसकी कोई अन्य गति नहीं होती।

दोहा

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

हे हनुमान्! वही अनन्य भक्त है जिसकी यह बुद्धि कभी नहीं डिगती कि मैं सेवक हूँ और यह संपूर्ण चराचर जगत् साक्षात् भगवान्का ही स्वरूप है।

देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥

स्वामीको प्रसन्न देखकर पवनपुत्र हनुमानका हृदय हर्षसे भर गया और उनके सारे दुःख दूर हो गए। उन्होंने कहा—हे नाथ! इस पर्वतपर वानरराज सुग्रीव रहते हैं, वे आपके ही दास हैं।

तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे॥सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥

हे नाथ! उनसे मित्रता कर लीजिए और दीन जानकर उन्हें निर्भय कर दीजिए। वे सीताजीकी खोज करवाएँगे और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरोंको भेज देंगे।

एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥

इस प्रकार सारी बात समझाकर हनुमानजीने दोनोंको अपनी पीठपर बिठा लिया। जब सुग्रीवने श्रीरामको देखा तो उन्होंने अपना जन्म सफल मान लिया।

सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा॥कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती॥

सुग्रीव आदरपूर्वक चरणोंमें मस्तक नवाकर मिले, श्रीरघुनाथजी भी लक्ष्मणसहित उनसे गले मिले। सुग्रीव मनमें सोचने लगे—हे विधाता! क्या ये सचमुच मुझसे प्रीति करेंगे?

दोहा

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥

तब हनुमानजीने दोनों ओरकी सारी बात एक-दूसरेको सुनाकर अग्निको साक्षी बनाकर उनकी मित्रता दृढ़ करा दी।

कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछिमन राम चरित सब भाषा॥कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी॥

दोनोंने हृदयसे मित्रता की, कुछ भी छिपाया नहीं। लक्ष्मणजीने श्रीरामका सारा वृत्तांत कह सुनाया। सुग्रीवने आँखोंमें आँसू भरकर कहा—हे नाथ! मिथिलेशकुमारी सीताजी अवश्य मिलेंगी।

मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा॥गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता॥

मैं एक बार यहाँ मंत्रियोंके साथ बैठा विचार कर रहा था, तभी मैंने आकाशमार्गसे शत्रुके वशमें पड़ी, विलाप करती हुई एक स्त्रीको जाते देखा था।

राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥

हमें देखते ही उसने 'राम! राम! हा राम!' पुकारकर अपना वस्त्र गिरा दिया था। श्रीरामने वह वस्त्र माँगा तो सुग्रीवने तुरंत दे दिया; उसे हृदयसे लगाकर श्रीरामको बड़ा शोक हुआ।

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥

सुग्रीवने कहा—हे रघुवीर! सुनिए, शोक त्यागकर धैर्य धारण कीजिए। मैं हर संभव उपायसे आपकी सेवा करूँगा, जिससे जानकीजी आपको आकर मिल जाएँ।

दोहा

सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव।कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥

कृपाके सागर और बलकी सीमा श्रीरामजी अपने सखा सुग्रीवके ये वचन सुनकर प्रसन्न हुए और बोले—हे सुग्रीव! मुझे बताओ, तुम किस कारण वनमें रहते हो?

नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥

सुग्रीवने कहा—हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं, हमारी आपसी प्रीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता। एक बार मयदानवका पुत्र मायावी नामक राक्षस हमारे नगरमें आया।

अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहि न पारा॥धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु संग लागा॥

उसने आधी रातको नगरके द्वारपर ललकारा। बालि उसकी ललकार सह न सका; वह दौड़ा तो मायावी उसे देखकर भाग खड़ा हुआ। मैं भी भाईका साथ देते हुए पीछे-पीछे चला गया।

गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई॥परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥

मायावी एक बड़ी पर्वत-गुफामें जा घुसा। तब बालिने मुझे समझाकर कहा—तुम मेरी प्रतीक्षा एक पखवाड़े तक करना, यदि मैं न लौटूँ तो समझ लेना कि मैं मारा गया।

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥

हे खरारि! मैं वहाँ एक महीनेतक रुका रहा। तभी गुफासे खूनकी भारी धार बहने लगी। मैंने सोचा—बालि मारा गया, अब यह मुझे भी मार डालेगा। यह सोचकर मैंने गुफाके द्वारपर बड़ी शिला रखकर वहाँसे भाग निकला।

मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई॥बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥

मंत्रियोंने राजाके बिना नगर देखकर मुझे जबरन राज्य सौंप दिया। इधर बालि उसे मारकर घर लौटा और मुझे राजसिंहासनपर बैठा देखकर उसके मनमें भारी भेद-भाव भर गया।

रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी॥ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउ बिहाला॥

उसने मुझे शत्रुकी भाँति बुरी तरह पीटा और मेरा सर्वस्व तथा पत्नी तक छीन ली। हे कृपालु रघुवीर! उसके भयसे मैं बेहाल होकर समस्त लोकोंमें भटकता फिरा।

इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥

शापके कारण वह यहाँ नहीं आता, फिर भी मेरा मन सदा भयभीत रहता है। सेवकका यह दुःख सुनकर दीनदयालु श्रीरामकी दोनों विशाल भुजाएँ क्रोधसे फड़क उठीं।

दोहा

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।ब्रम्ह रुद्र सरनागत गए न उबरिहिं प्रान॥

श्रीरामने कहा—हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाणसे बालिको मार गिराऊँगा। ब्रह्मा और शिवकी शरणमें जानेपर भी उसके प्राण नहीं बचेंगे।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥

जो मित्रके दुःखसे दुःखी नहीं होते, उन्हें देखनामात्र ही बड़ा पाप है। सच्चा मित्र अपने पर्वत-जैसे दुःखको धूलके समान और मित्रके धूल-जैसे दुःखको सुमेरु पर्वतके समान गंभीर मानता है।

जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा॥

जिनमें स्वभावसे ऐसी बुद्धि नहीं होती, वे मूर्ख व्यर्थ ही हठपूर्वक मित्रता निभाते हैं। सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्रको कुमार्गसे रोककर सन्मार्गपर लगाए, उसके गुणोंको प्रकट करे और दोषोंको छिपाए।

देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥

वह लेन-देनमें मनमें कभी शंका नहीं रखता और अपनी सामर्थ्यभर सदा हित ही करता है। विपत्तिके समय तो उसका स्नेह सौ गुना बढ़ जाता है—वेद और संत यही सच्चे मित्रके लक्षण बताते हैं।

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई॥

जो सामने तो मीठे बनावटी वचन बोले और पीठ पीछे बुराई करे, मनमें कुटिलता रखे—हे भाई! जिसका मन सर्पकी चालकी भाँति टेढ़ा हो, ऐसे कुमित्रको त्याग देनेमें ही भलाई है।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥

मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र—ये चारों शूलकी तरह पीड़ा देनेवाले होते हैं। हे सखा! अब तुम मेरे बलपर निश्चिंत हो जाओ, मैं हर तरहसे तुम्हारे काम आऊँगा।

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥

सुग्रीवने कहा—हे रघुवीर! सुनिए, बालि महाबली और युद्धमें अत्यंत धीर है। यह कहकर उसने श्रीरामको दुंदुभि राक्षसकी विशाल हड्डियाँ और साल वृक्ष दिखाए, जिन्हें श्रीरामने बिना किसी परिश्रमके ढहा दिया।

देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा॥

श्रीरामका अपार बल देखकर सुग्रीवकी प्रीति और बढ़ गई तथा उन्हें विश्वास हो गया कि बालिका वध निश्चित है। वे बार-बार चरणोंमें मस्तक नवाने लगे, प्रभुको पहचानकर उनका मन हर्षसे भर उठा।

उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला॥सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥

तब सुग्रीवमें ज्ञान जाग उठा और वे बोले—हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया है। मैं सुख, संपत्ति, परिवार और बड़प्पन—सब त्यागकर अब केवल आपकी सेवा ही करूँगा।

ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक॥सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं॥

क्योंकि संतजन कहते हैं कि ये सब वस्तुएँ रामभक्तिकी बाधक हैं। संसारमें शत्रु-मित्र और सुख-दुःख जैसे सभी द्वंद्व मायाके रचे हुए हैं, वास्तवमें इनका कोई अस्तित्व नहीं।

बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥१०

हे राम! बालि तो मेरा परम हितैषी है, जिसकी ही कृपासे शोकनाशक आप मुझे मिले। अब यदि स्वप्नमें भी उससे युद्ध हो, तो जागनेपर याद करके मन संकोचसे भर जाएगा।

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी॥११

अब हे प्रभु! ऐसी कृपा कीजिए कि मैं सब कुछ त्यागकर दिन-रात केवल आपका भजन करता रहूँ। सुग्रीवकी यह वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर धनुर्धारी श्रीराम मुसकराकर बोले।

जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥१२

तुमने जो कुछ कहा वह सब सत्य है, परंतु हे सखा! मेरा वचन कभी मिथ्या नहीं होता। काकभुशुण्डिजी कहते हैं—हे गरुड़! श्रीराम मदारीकी भाँति सबको नचाते हैं, वेद भी यही कहते हैं।

लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा॥तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा॥१३

फिर सुग्रीवको साथ लेकर धनुष-बाण थामे श्रीरघुनाथजी चल पड़े। उन्होंने सुग्रीवको आगे भेजा, जो श्रीरामका बल पाकर बालिके निकट जाकर गरज उठा।

सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा॥१४

बालि यह सुनते ही क्रोधमें भरकर दौड़ पड़ा, पर उसकी पत्नी ताराने चरण पकड़कर समझाया—हे स्वामी! सुनिए, सुग्रीव जिनसे मिलकर आए हैं, वे दोनों भाई तेज और बलकी पराकाष्ठा हैं।

कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा॥१५

वे कोसलनरेश दशरथजीके पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जो युद्धमें काल तकको जीत सकते हैं।

दोहा

कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥

बालिने कहा—हे भीरु प्रिये! सुनो, श्रीराम समदर्शी हैं। यदि वे मुझे मार भी डालें, तो मैं धन्य ही हो जाऊँगा।

अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥

यह कहकर अभिमानी बालि सुग्रीवको तिनकेके समान तुच्छ समझते हुए चल पड़ा। दोनों भिड़ गए; बालिने सुग्रीवको खूब ललकारा और घूँसा जमाकर गरज उठा।

तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥

सुग्रीव व्याकुल होकर भाग खड़ा हुआ, घूँसेकी चोट उसे वज्रके समान लगी थी। उसने आकर कहा—हे कृपालु रघुवीर! मैंने पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं, साक्षात् काल है।

एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारे सोऊ॥कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥

श्रीरामने कहा—तुम दोनों भाइयोंका रूप एक-सा होनेके कारण ही मैंने उसे नहीं मारा। फिर उन्होंने सुग्रीवके शरीरको हाथसे स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्रके समान दृढ़ हो गया और सारी पीड़ा दूर हो गई।

मेली कंठ सुमन के माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥

श्रीरामने सुग्रीवके गलेमें फूलोंकी माला डाल दी और उसे अपार बल देकर फिर भेजा। दोनोंमें फिर अनेक प्रकारसे युद्ध होने लगा, जिसे श्रीरघुनाथजी वृक्षकी ओटसे देखते रहे।

दोहा

बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥

सुग्रीवने बहुत छल-बल आजमाए, पर अंततः भयभीत होकर हार मान बैठा। तब श्रीरामने धनुष तानकर बालिके हृदयमें बाण मार दिया।

परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥

बाण लगते ही बालि व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़ा, पर प्रभुको सामने देखकर फिर उठ बैठा। श्यामवर्ण शरीर, सिरपर जटा, लाल नेत्र और हाथमें चढ़ा हुआ धनुष-बाण लिए श्रीराम खड़े थे।

पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥

बालि बार-बार श्रीरामकी ओर देखकर अपना चित्त उनके चरणोंमें लगाने लगा; प्रभुको पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदयमें प्रेम था, पर मुखसे कठोर वचन निकले—वह श्रीरामकी ओर देखता हुआ बोला।

धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई॥मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥

हे गोसाईं! आपने धर्मकी रक्षाके लिए अवतार लिया है, फिर मुझे शिकारीकी तरह छिपकर क्यों मारा? क्या मैं शत्रु और सुग्रीव ही आपको प्रिय था? हे नाथ! बताइए, किस दोषके कारण आपने मुझे मारा?

अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥

श्रीरामने कहा—हे मूर्ख सुन, छोटे भाईकी पत्नी, बहिन, पुत्रकी पत्नी और कन्या—ये चारों समान पूज्य हैं। जो इन्हें बुरी दृष्टिसे देखे, उसे मार डालनेमें कोई पाप नहीं होता।

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥

हे मूढ़! तुझे अत्यधिक अभिमान था, तूने अपनी पत्नीकी सीख तक पर ध्यान नहीं दिया। सुग्रीवको मेरी भुजाओंके बलका आश्रित जानते हुए भी, हे अधम अभिमानी! तूने उसे मारना चाहा।

दोहा

सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥

बालिने कहा—हे राम! सुनिए, स्वामी आपके सामने मेरी कोई चतुराई नहीं चलती। हे प्रभो! अंतकालमें भी आपका साक्षात् दर्शन पाकर क्या मैं अब भी पापी ही कहलाऊँगा?

सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥

बालिकी यह अत्यंत कोमल वाणी सुनकर श्रीरामने अपने हाथसे उसके सिरको स्पर्श किया और कहा—मैं तुम्हारा शरीर स्वस्थ किए देता हूँ, तुम अपने प्राण बचाए रखो। बालिने कहा—हे कृपानिधान! सुनिए—

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥

मुनिजन जन्म-जन्मांतर तक साधना करते रहते हैं, फिर भी अंतसमय उनके मुखसे 'राम' नाम नहीं निकल पाता; जबकि इसी नामके प्रतापसे शिवजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशी मुक्ति प्रदान करते हैं।

मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥

वही श्रीराम आज साक्षात् मेरे नेत्रोंके सामने खड़े हैं। हे प्रभो! ऐसा दुर्लभ सुयोग क्या फिर कभी बन पाएगा?

छंद

सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥

जिनके गुणोंका श्रुतियाँ सदा 'नेति-नेति' कहकर गान करती हैं, और प्राण-मनको जीतकर, इन्द्रियोंको विषयोंसे विरक्त कर मुनिजन ध्यानमें जिनकी कभी क्षणिक झलक भर पाते हैं—वे ही प्रभु आज साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अभिमानी समझकर कहा कि शरीर बचा लो, पर ऐसा मूर्ख कौन होगा जो कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरकी बाड़ लगाएगा—अर्थात् आपको छोड़कर इस नश्वर देहकी रक्षा कौन चाहेगा?

छंद

अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ।गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥

हे नाथ! अब कृपादृष्टिसे मुझे देखिए और मैं जो वर माँगता हूँ, वह दीजिए—मैं कर्मवश जिस भी योनिमें जन्म लूँ, वहीं श्रीरामके चरणोंमें मेरा प्रेम बना रहे। और हे कल्याणकारी प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बलमें मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिए; हे देवताओं और मनुष्योंके स्वामी! इसकी भुजा थामकर इसे अपना सेवक बना लीजिए।

दोहा

राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥१०

श्रीरामके चरणोंमें दृढ़ प्रेम रखते हुए बालिने वैसे ही सहज भावसे शरीर त्याग दिया, जैसे हाथी अपने गलेसे गिरती हुई फूलमालाको भी नहीं जान पाता।

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा॥नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥

श्रीरामने बालिको अपने परम धामको भेज दिया। यह सुनते ही नगरके सब लोग व्याकुल होकर दौड़ पड़े। बालिकी पत्नी तारा तरह-तरहसे विलाप करने लगी, उसके बाल बिखर गए थे और उसे अपनी देहकी सुध तक नहीं थी।

तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥

ताराको व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजीने उसे ज्ञानोपदेश देकर उसका मोह दूर किया—पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु, इन पाँच तत्त्वोंसे बना यह शरीर अत्यंत तुच्छ है।

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥

जिस शरीरके लिए तुम रो रही हो, वह तो सामने ही पड़ा है; परंतु जीव तो नित्य और अविनाशी है, फिर किसके लिए विलाप कर रही हो? यह सुनकर ताराको ज्ञान हुआ, वह श्रीरामके चरणोंमें लीन हो गई और उसने परम भक्तिका वरदान माँग लिया।

उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई॥तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! स्वामी श्रीराम सबको कठपुतलीकी भाँति नचाते हैं। इसके बाद श्रीरामने सुग्रीवको आज्ञा दी और उन्होंने विधिपूर्वक बालिका सारा अंत्येष्टि-कर्म संपन्न कराया।

राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई॥रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा॥

श्रीरामने लक्ष्मणको समझाकर कहा—जाओ, सुग्रीवको राज्य सौंप दो। श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा शिरोधार्य कर सब लोग उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चल पड़े।

दोहा

लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥११

लक्ष्मणजीने तुरंत नगरवासियों और ब्राह्मणोंको बुलवाया और सबके समक्ष सुग्रीवको राज्य तथा अंगदको युवराज-पद प्रदान किया।

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥सुर नर मुनि सब के यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥

शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! संसारमें श्रीरामके समान हितैषी न गुरु है, न पिता-माता, न बंधु और न स्वामी। देवता, मनुष्य और मुनि—सभीकी यह रीति है कि वे स्वार्थके कारण ही प्रेम करते हैं।

बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती॥सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ॥

जो सुग्रीव दिन-रात बालिके भयसे व्याकुल रहता था, जिसका शरीर अनेक घावोंसे भरा था और चिंतासे छाती जलती रहती थी, श्रीरामने उसी सुग्रीवको वानरोंका राजा बना दिया—ऐसा है उनका कृपालु स्वभाव।

जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं॥पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई॥

जो लोग सब जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे विपत्तिके जालमें क्यों न फँसें? इसके बाद श्रीरामने सुग्रीवको बुलाकर उन्हें राजनीतिकी विस्तृत शिक्षा दी।

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा॥गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई॥

प्रभुने कहा—हे वानरराज सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्षतक किसी बस्तीमें नहीं जाऊँगा। अब ग्रीष्म बीतकर वर्षा ऋतु आ गई है, इसलिए मैं यहीं पास पर्वतपर रुकूँगा।

अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू॥जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए॥

तुम अंगदको साथ लेकर राज्य करो, और मेरा कार्य सदा हृदयमें स्मरण रखना। इसके बाद सुग्रीव अपने नगर लौट गए और श्रीराम वर्षा बिताने पर्वतपर ठहर गए।

दोहा

प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ॥१२

देवताओंने पहले ही उस पर्वतकी एक गुफाको सुंदर ढंगसे सजा रखा था, यह जानते हुए कि कृपानिधान श्रीराम कुछ दिन वहाँ अवश्य निवास करेंगे।

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥

सुंदर वन फूलोंसे लदकर अत्यंत शोभायमान है, भौंरोंके झुंड मधुके लोभसे गुंजार कर रहे हैं। जबसे प्रभु वहाँ आए हैं, तबसे कंद, मूल, फल और पत्ते वनमें भरपूर हो गए हैं।

देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥

उस मनोहर, अनुपम पर्वतको देखकर देवताओंके स्वामी श्रीराम अपने छोटे भाईसहित वहीं ठहर गए। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरे, पक्षी और पशुओंका रूप धरकर प्रभुकी सेवामें लग गए।

मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते॥फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥

जबसे लक्ष्मीपति श्रीरामने वहाँ निवास किया, वन मंगलमय हो उठा। वहाँ एक अत्यंत उज्ज्वल स्फटिक-शिलापर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान रहते हैं।

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका॥बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥

श्रीराम छोटे भाई लक्ष्मणसे भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेककी अनेक कथाएँ कहते रहते हैं। वर्षाकालमें आकाशमें छाए बादल गरजते हुए बड़े ही मनोहर लगते हैं।

दोहा

लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि॥१३

श्रीराम कहते हैं—हे लक्ष्मण! देखो, बादलोंको देखकर मोरोंके झुंड कैसे नाच उठे हैं, ठीक वैसे ही जैसे वैराग्यमें रत गृहस्थ किसी विष्णुभक्तको देखकर हर्षित हो उठता है।

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल के प्रीति जथा थिर नाहीं॥

आकाशमें बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीता) के बिना मेरा मन आशंकित हो उठता है। जैसे बिजलीकी चमक बादलोंमें कभी टिकती नहीं, वैसे ही दुष्टकी मित्रता कभी स्थिर नहीं रहती।

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें॥

बादल धरतीके निकट आकर बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् विनम्र हो जाते हैं। पर्वत जिस तरह बूँदोंकी चोट सह लेते हैं, वैसे ही संत दुष्टोंके कटु वचन सह लेते हैं।

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥

छोटी नदियाँ किनारे तोड़ती हुई उमड़ चलीं, मानो थोड़ा-सा धन पाकर दुष्ट इतरा उठे हों। धरतीपर गिरते ही जल गँदला हो गया, मानो निर्मल जीवको माया आ लपेटे।

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥

जल इकट्ठा होकर तालाबोंमें भरने लगा, जैसे सद्गुण धीरे-धीरे सज्जनके पास आ जुटते हैं। नदीका जल समुद्रमें मिलकर स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरिको पाकर सदाके लिए अचल हो जाता है।

दोहा

हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥१४

धरती घास-फूससे भरकर हरी-भरी हो गई है, जिससे रास्ते तक पहचानमें नहीं आते—ठीक वैसे ही जैसे पाखंडके प्रचारसे सद्ग्रंथ छिप जाते हैं।

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥

चारों दिशाओंमें मेंढकोंकी टर्राहट ऐसी लगती है मानो विद्यार्थी वेद पढ़ रहे हों। अनेक वृक्ष नई कोंपलोंसे भर उठे हैं, जैसे विवेक जागते ही साधकका मन खिल उठता है।

अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥

मदार और जवासा पत्तोंसे रहित हो गए हैं, जैसे सुशासनमें दुष्टोंका बल क्षीण हो जाता है। धूल कहीं ढूँढ़नेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध आते ही धर्मका विवेक लुप्त हो जाता है।

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी के संपति जैसी॥निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥

फसलोंसे लहलहाती धरती वैसी ही शोभा पा रही है जैसी परोपकारी पुरुषकी संपत्ति। रातके घने अंधकारमें जुगनू यों चमक रहे हैं मानो दंभियोंकी सभा जुट आई हो।

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥

भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ टूट-फूट गई हैं, जैसे स्वच्छंद होते ही स्त्रियाँ मर्यादा भूल बैठती हैं। चतुर किसान खेतोंकी निराई कर रहे हैं, जैसे विद्वान् मोह, मद और अहंकारको जड़से उखाड़ फेंकते हैं।

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥

चकवा पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते, जैसे कलियुग आते ही धर्म लुप्त हो जाता है। ऊसर भूमिपर वर्षा तो होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती—जैसे हरिभक्तके हृदयमें कामनाका बीज नहीं पनपता।

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥

पृथ्वी नाना जीव-जंतुओंसे भरकर वैसे ही शोभित है जैसे सुशासनमें प्रजा फलती-फूलती है। जहाँ-तहाँ अनेक थके हुए पथिक विश्राम कर रहे हैं, जैसे ज्ञान उदय होते ही इंद्रियाँ विषयोंकी दौड़ छोड़कर शांत हो जाती हैं।

दोहा

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥१५(क)

कभी-कभी प्रचंड आँधी चलनेसे बादल इधर-उधर बिखरकर लुप्त हो जाते हैं, जैसे कुपुत्रके जन्मसे कुलका सुंदर आचरण नष्ट हो जाता है।

दोहा

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥१५(ख)

कभी दिनमें भी घना अंधकार छा जाता है तो कभी सूर्य अचानक निकल आता है, ठीक वैसे ही जैसे कुसंगके प्रभावसे ज्ञान नष्ट हो जाता है और सत्संगसे पुनः प्रकट हो उठता है।

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

श्रीराम कहते हैं—हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद्-ऋतु आ गई है। खिले हुए काससे धरती ऐसी छा गई है मानो वर्षा-ऋतुने अपना बुढ़ापा (सफेद बालोंके रूपमें) प्रकट कर दिया हो।

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा॥सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥

अगस्त्य तारेके उदय होते ही मार्गका जल सूख गया, जैसे संतोष लोभको सोख लेता है। नदी-तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा दे रहा है जैसे मद-मोहसे मुक्त संतका हृदय।

रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥

नदी-तालाबोंका पानी धीरे-धीरे सूखने लगा है, जैसे ज्ञानी पुरुष ममताको त्यागते चले जाते हैं। शरद्-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ पहुँचे, ठीक वैसे ही जैसे उचित समय आते ही शुभ कर्मोंका फल प्रकट होता है।

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप के जसि करनी॥जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥

न कहीं कीचड़ है न धूल, धरती ऐसी शोभा दे रही है जैसी नीतिनिपुण राजाकी करनी! जलके घट जानेसे मछलियाँ व्याकुल हैं, जैसे विवेकहीन गृहस्थ धनके अभावमें व्याकुल हो उठता है।

बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥

बादलरहित निर्मल आकाश ऐसे शोभित है जैसे सब आशाएँ त्यागकर भगवद्भक्त सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं शरद्की हल्की बूँदाबाँदी हो रही है, जैसे कोई विरला ही सच्ची भक्ति पाता है।

दोहा

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥१६

शरद्-ऋतु पाकर राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी हर्षित होकर अपने-अपने कार्यके लिए नगर छोड़ चले, ठीक वैसे ही जैसे हरिभक्ति पाकर चारों आश्रमोंके लोग अपने साधनोंका श्रम भूल जाते हैं।

सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा॥

जो मछलियाँ गहरे जलमें हैं वे सुखी हैं, जैसे हरिकी शरणमें गए भक्तको कोई बाधा नहीं छूती। कमल खिलनेसे तालाब ऐसी शोभा दे रहा है जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करनेपर शोभित होता है।

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥

भौंरे अनोखी गुंजार कर रहे हैं और पक्षी नाना प्रकारकी मधुर बोलियाँ बोल रहे हैं। रातको देखकर चकवेका मन वैसे ही दुखी होता है जैसे दूसरेकी संपत्ति देखकर दुष्टका मन जलता है।

चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही॥सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥

पपीहा प्यासा होकर रट लगाए है, जैसे शिवद्रोही कभी सुख नहीं पाता। शरद्की धूपको रातमें चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतोंके दर्शनमात्रसे पाप मिट जाते हैं।

देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किए कुल नासा॥

चकोर चंद्रमाको देखकर वैसे ही एकटक निहारते हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्को पाकर उन्हें निर्निमेष नेत्रोंसे देखते हैं। मच्छर-डाँस जाड़ेके भयसे नष्ट हो गए, जैसे ब्राह्मणसे द्रोह करनेपर कुल नष्ट हो जाता है।

दोहा

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥१७

वर्षामें भर आए जीव-जंतु शरद्-ऋतु आते ही वैसे ही मिट गए जैसे सद्गुरुके मिलते ही संशय और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं।

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीति निमिष महुँ आनौं॥

वर्षा बीत गई, निर्मल शरद्-ऋतु आ गई, पर हे तात! सीताकी कोई खबर नहीं मिली। कैसे भी एक बार उनका पता चल जाए तो मैं कालको भी जीतकर पलभरमें उन्हें ले आऊँ।

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आने सोई॥सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥

वे कहीं भी हों, यदि जीवित होंगी तो हे तात! मैं यत्न करके उन्हें अवश्य ले आऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और पत्नी पाकर सुग्रीवने भी मेरी सुध भुला दी है।

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥

जिस बाणसे मैंने बालिको मारा था, उसी बाणसे कल इस मूढ़को भी मारूँगा। शिवजी कहते हैं—हे उमा! जिनकी कृपासे मद और मोह छूट जाते हैं, क्या उन्हें स्वप्नमें भी क्रोध हो सकता है? यह तो केवल लीला है।

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥

यह रहस्य वही ज्ञानी मुनि समझते हैं जिन्होंने श्रीरघुनाथके चरणोंमें प्रीति जोड़ी है। प्रभुको क्रोधित जानकर लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर हाथमें बाण ले लिए।

दोहा

तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥१८

तब करुणाके सागर श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणको समझाया—हे तात! सखा सुग्रीवको केवल भय दिखाकर ले आना, उन्हें मारना नहीं है।

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥

इधर पवनपुत्र हनुमानने मन ही मन विचार किया कि सुग्रीवने श्रीरामका कार्य भुला दिया है। वे उनके पास जाकर चरणोंमें सिर नवाकर साम, दाम, दंड, भेद—चारों नीतियोंसे उन्हें समझाने लगे।

सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥

यह सुनते ही सुग्रीव अत्यंत भयभीत हो उठे और बोले—विषय-भोगोंने मेरा विवेक हर लिया। अब हे पवनपुत्र! जहाँ-तहाँ वानरोंके दल हैं, वहाँ दूत भेज दो।

कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता॥

और कहला दो कि जो एक पखवाड़ेमें न आएगा, उसे मेरे हाथों दंड मिलेगा। तब हनुमानजीने दूतोंको बुलाकर सबका भरपूर सम्मान किया।

भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥

सबको भय, प्रेम और नीति—तीनों दिखाकर विदा किया गया; सब वानर चरणोंमें सिर नवाकर चल पड़े। इसी बीच लक्ष्मणजी नगरमें आ पहुँचे, और उनका क्रोध देखकर वानर जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए।

दोहा

धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥१९

तब लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर कहा कि अभी नगरको जलाकर राख कर दूँगा। नगरभरको व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगद उनके पास दौड़े आए।

चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भय अकुलाना॥

अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर क्षमा माँगी, तब लक्ष्मणजीने भुजा उठाकर उन्हें निर्भय किया। लक्ष्मणजीको क्रोधित सुनकर सुग्रीव भयसे अत्यंत व्याकुल होकर बोले—

सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥

हे हनुमान्! सुनो, तुम ताराको साथ लेकर विनयपूर्वक राजकुमार लक्ष्मणको समझाओ। हनुमानजी ताराको साथ लेकर गए और लक्ष्मणके चरणोंकी वंदना कर प्रभुके सुयशका गुणगान करने लगे।

करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए॥तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा॥

वे विनतीपूर्वक उन्हें महलमें ले आए, चरण धोकर पलंगपर बिठाया। तब सुग्रीवने चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने उन्हें बाँह पकड़कर गले लगा लिया।

नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥

सुग्रीवने कहा—हे नाथ! विषय-भोगके समान कोई मद नहीं, यह मुनियोंके मनमें भी क्षणभरमें मोह उत्पन्न कर देता है। सुग्रीवके विनम्र वचन सुनकर लक्ष्मणजीको संतोष हुआ और उन्होंने उन्हें भाँति-भाँति समझाया।

पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई॥

फिर पवनपुत्र हनुमानने बताया कि किस प्रकार दूतोंके समूह चारों दिशाओंमें भेजे गए थे।

दोहा

हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ॥२०

तब सुग्रीव हर्षित होकर अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर तथा लक्ष्मणजीको आगे करके श्रीरघुनाथजीके पास आए।

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥

श्रीरामके चरणोंमें सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीवने कहा—हे नाथ! मेरा कोई दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यंत प्रबल है, आपकी दयासे ही यह छूटती है।

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावर पसु कपि अति कामी॥नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥

हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयोंके वशमें हैं, फिर मैं तो पामर पशु और अत्यंत कामी वानर ही ठहरा। जिसे स्त्रीका कटाक्ष-बाण न लगा हो और जो घोर क्रोधरूपी अँधेरी रातमें भी जागता रहे—

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई॥

और लोभकी फाँसीमें जिसका गला न बँधा हो, हे रघुनाथ! वह मनुष्य आपके ही समान है। यह गुण साधनसे नहीं, केवल आपकी कृपासे ही किसी विरलेको प्राप्त होता है।

तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई॥

तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले—हे भाई! तुम मुझे भरतके समान प्रिय हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिससे सीताकी खबर मिल सके।

दोहा

एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ॥२१

इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि वानरोंके दल आ पहुँचे। सब दिशाओंमें भाँति-भाँतिके रंगोंवाले वानरोंके समूह दिखाई देने लगे।

बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा॥

शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! मैंने वह वानर-सेना देखी थी, जो उसकी गिनती करना चाहे वह महामूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामके चरणोंमें मस्तक नवाते और उनका मुखदर्शन पाकर कृतार्थ हो जाते हैं।

अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं॥यह कछु नहिं प्रभु कह अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई॥

सेनामें एक भी ऐसा वानर नहीं था जिसकी कुशल श्रीरामने न पूछी हो। प्रभुके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि श्रीरघुनाथ विश्वरूप और सर्वव्यापक हैं।

ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई॥राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा॥

आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गए। तब सुग्रीवने सबको समझाते हुए कहा—यह श्रीरामका कार्य है और मेरा भी अनुरोध है, तुम सब चारों दिशाओंमें जाओ।

जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई॥अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ॥

जाकर जानकीजीको खोजो और हे भाइयो! एक महीनेके भीतर लौट आना। जो बिना पता लगाए ही अवधि बिताकर लौटेगा, उसे मेरे हाथों दंड भोगना पड़ेगा।

दोहा

बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत।तब सुग्रीव बोलाए अंगद नल हनुमंत॥२२

सुग्रीवके वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ चल पड़े। तब सुग्रीवने अंगद, नल और हनुमानको बुलाया।

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू॥

सुनो, धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ वीर मिलकर दक्षिण दिशामें जाओ और वहाँ हर किसीसे सीताजीका पता पूछना।

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी॥

मन, वचन और कर्मसे उसी उपायको सोचना और श्रीरामका कार्य सफल करना। जैसे सूर्यको पीठसे और अग्निको सामनेसे सेवन करना चाहिए, वैसे ही स्वामीकी सेवा हर तरहसे छल त्यागकर ही करनी चाहिए।

तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका॥देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई॥

माया त्यागकर परलोक-साधन करना चाहिए, जिससे जन्म-मरणसे उपजे सारे शोक मिट जाएँ। हे भाई! देह धारण करनेका यही सच्चा फल है कि सब कामनाएँ छोड़कर केवल श्रीरामका भजन किया जाए।

सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी॥आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई॥

वही सद्गुणी और सौभाग्यशाली है जो श्रीरघुनाथके चरणोंका प्रेमी है। यह कहकर सबने आज्ञा माँगी, चरणोंमें सिर नवाया और श्रीराम-स्मरण करते हुए हर्षित होकर चल पड़े।

पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥

सबके पीछे पवनपुत्र हनुमानने सिर नवाया। कार्यकी गंभीरता समझकर प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया, अपने हाथसे उनके सिरका स्पर्श किया और अपना सेवक जानकर उन्हें अपनी अँगूठी उतारकर दे दी।

बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना॥

बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा प्रेम व विरह कहकर शीघ्र लौट आना। हनुमानजीने अपना जन्म सफल माना और हृदयमें कृपानिधानको धारण करके वे चल पड़े।

जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता॥

यद्यपि देवताओंके रक्षक प्रभु सब कुछ पहलेसे ही जानते हैं, फिर भी वे राजनीतिकी मर्यादा बनाए रखते हैं।

दोहा

चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥२३

सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और गुफाओंमें खोज करते हुए चल पड़े। उनका मन श्रीरामके कार्यमें ऐसा लीन था कि शरीरकी सुधतक भूल गए।

कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा॥बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं॥

कहीं किसी राक्षससे भेंट हो जाती तो एक ही चपतमें उसके प्राण ले लेते। पर्वत और वन भाँति-भाँतिसे खोजे जा रहे हैं। कोई मुनि मिल जाए तो पता पूछनेके लिए सब उसे घेर लेते हैं।

लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने॥मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना॥

इतनेमें सबको भारी प्यास लगी और वे व्याकुल हो उठे, पर घने जंगलमें भटककर भी कहीं जल न मिला। हनुमानजीने मनमें भाँप लिया कि सब बिना जल पिए मरनेको ही हैं।

चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा॥चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं॥

पर्वतकी चोटीपर चढ़कर उन्होंने चारों ओर देखा तो धरतीके भीतर एक गुफामें एक अद्भुत दृश्य दिखा—चकवे, बगुले और हंस उसके ऊपर उड़ रहे थे और अनेक पक्षी उसीमें प्रवेश कर रहे थे।

गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा॥आगें के हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा॥

पवनपुत्र हनुमान पर्वतसे उतर आए और सबको ले जाकर वह गुफा दिखाई। सबने हनुमानजीको आगे कर लिया और वे बिना विलंब किए गुफामें प्रवेश कर गए।

दोहा

दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज।मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥२४

आगे जाकर उन्होंने एक सुंदर उपवन और तालाब देखा, जिसमें अनेक कमल खिले हुए थे। वहीं एक मनोहर मंदिरमें एक तपस्विनी स्त्री बैठी दिखीं।

दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा॥तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना॥

दूरसे ही सबने उन्हें प्रणाम किया और पूछनेपर अपना सारा वृत्तांत सुना दिया। तब उन्होंने कहा—पहले जलपान करो और भाँति-भाँतिके रसीले फल खाओ।

मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए॥तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥

सबने स्नान किया, मीठे फल खाए और फिर उनके पास आ बैठे। उन्होंने भी अपनी कथा सुनाई और कहा—अब मैं वहीं जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं।

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा॥

तुमलोग आँखें मूँदकर इस गुफासे बाहर निकल जाओ, सीताजी अवश्य मिलेंगी, निराश मत होना। आँखें मूँदकर जब उन्होंने फिर खोलीं तो देखा कि सब समुद्रके तटपर खड़े हैं।

सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा॥नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही॥

और वह स्वयं वहाँ चली गई जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने चरणकमलोंमें मस्तक नवाकर भाँति-भाँतिसे विनती की, और प्रभुने उसे अपनी अटल भक्ति प्रदान की।

दोहा

बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस॥२५

प्रभुकी आज्ञा शिरोधार्य कर और ब्रह्मा-शिव द्वारा भी वंदित श्रीरामके युगल चरणोंको हृदयमें बसाकर वह (स्वयंप्रभा) बदरिकाश्रम चली गई।

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं॥सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता॥

इधर वानरगण मनमें सोच रहे हैं कि अवधि तो बीत गई, पर काम कुछ नहीं बना। सब आपसमें कहने लगे—हे भाइयो! सीताजीका पता लिए बिना अब लौटकर भी क्या करेंगे?

कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥इहाँ न सुधि सीता के पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई॥

अंगदने आँखोंमें आँसू भरकर कहा—दोनों ही तरहसे हमारी मृत्यु निश्चित है। यहाँ तो सीताजीका पता न मिला, और वहाँ लौटनेपर वानरराज सुग्रीव हमें मार डालेंगे।

पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही॥पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं॥

पिताके वधके अपराधमें तो वे मुझे मार ही डालते, श्रीरामने ही मेरी रक्षा की—इसमें सुग्रीवका कोई एहसान नहीं। अंगद बार-बार सबसे यही कहने लगे कि अब मरना निश्चित है, इसमें कोई संदेह नहीं।

अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा॥छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस बचन कहत सब भए॥

अंगदके ये वचन सुनकर वानरवीर कुछ बोल नहीं पाए, उनकी आँखोंसे आँसू बहने लगे। एक क्षण सब सोचमें डूब गए, फिर सब यह कहने लगे—

हम सीता के सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना॥अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई॥

हे सुयोग्य युवराज! हम सीताजीका पता लिए बिना नहीं लौटेंगे। यह कहकर सब वानर समुद्रके तटपर कुश बिछाकर बैठ गए।

जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी॥तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु॥

अंगदका दुःख देखकर जाम्बवान्ने विशेष उपदेशकी बातें कहीं—हे तात! श्रीरामको मनुष्य मत समझो, उन्हें निर्गुण, अजेय और अजन्मा ब्रह्म ही जानो।

हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥

हम सब सेवक अत्यंत भाग्यशाली हैं, जो निरंतर सगुण ब्रह्म श्रीरामके प्रति अनुराग रखते हैं।

दोहा

निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥२६

देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिए प्रभु अपनी ही इच्छासे अवतार लेते हैं, और सगुण-उपासक भक्त सब प्रकारके मोक्षको त्यागकर वहाँ उनके साथ ही रहना पसंद करते हैं।

एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥

इस प्रकार जाम्बवान् भाँति-भाँतिसे कथाएँ कह रहे थे, तभी पर्वतकी गुफामें बैठे संपातिने यह सब सुन लिया। बाहर निकलकर उसने इतने सारे वानर देखे तो कहा—जगदीश्वरने आज घर बैठे मुझे भरपूर आहार भेज दिया!

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा॥

आज मैं इन सबको खा जाऊँगा। कई दिनोंसे बिना भोजनके मर रहा था, पेटभर आहार तो कभी नसीब ही नहीं होता था, आज विधाताने एक ही बारमें इतना भोजन दे दिया।

डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥

गीधके ये वचन सुनते ही सब वानर डर गए—अब हमारा मरना निश्चित हो गया, यह समझ लिया। संपातिको देखते ही सब उठ खड़े हुए, और जाम्बवान्के मनमें भारी चिंता होने लगी।

कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी॥

अंगदने मनमें विचार कर कहा—अहा! जटायुके समान भाग्यशाली और कोई नहीं, जिसने श्रीरामके कार्यके लिए प्राण त्यागकर भगवान्के परमधामको प्राप्त किया।

सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥

हर्ष और शोक दोनोंसे भरी यह बात सुनकर वह पक्षी (संपाति) वानरोंके निकट आया। वानर भयभीत हो उठे, तब उसने उन्हें निर्भय करके जटायुका सारा वृत्तांत पूछा, और वानरोंने उसे सब कथा कह सुनाई।

सुनि संपाति बंधु के करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी॥

अपने भाई जटायुकी वीरगाथा सुनकर संपातिने भाँति-भाँतिसे श्रीरघुनाथजीकी महिमाका बखान किया।

दोहा

मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि।बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि॥२७

उसने कहा—मुझे समुद्रके तटपर ले चलो, मैं जटायुको तिलांजलि दे दूँ। इस सेवाके बदलेमें मैं अपने वचनसे तुम्हारी सहायता करूँगा—तुम जिसे खोज रहे हो, वह अवश्य मिलेगी।

अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा॥हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई॥

समुद्रके तटपर छोटे भाई जटायुका अंत्येष्टि-कर्म करके संपाति अपनी कथा सुनाने लगा—हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई युवावस्थामें एक बार आकाशमें उड़ते हुए सूर्यके निकट चले गए थे।

तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा॥जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥

जटायु सूर्यका तेज सह न सका और लौट आया, पर मैं अहंकारवश और आगे सूर्यके निकट चला गया। उसके प्रचंड तेजसे मेरे पंख जल गए और मैं भयंकर चीत्कार करता हुआ धरतीपर आ गिरा।

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही॥बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा॥

वहाँ चंद्रमा नामक एक मुनि थे, मुझे देखकर उन्हें दया आ गई। उन्होंने मुझे भाँति-भाँतिसे ज्ञानोपदेश देकर मेरा देहाभिमान दूर किया।

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही॥तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तें होब पुनीता॥

उन्होंने कहा—त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यरूप धारण करेंगे, राक्षसराज उनकी पत्नीको हर ले जाएगा। उनकी खोजमें वे दूत भेजेंगे, और उनसे मिलते ही तू पवित्र हो जाएगा।

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तें सीता॥मुनि कर गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥

तब तेरे पंख फिर उग आएँगे, चिंता न कर। उन्हें तू सीताजीका पता दिखा देना। मुनिके वे वचन आज सत्य हो गए। अब मेरे कहे अनुसार तुमलोग प्रभुका कार्य पूरा करो।

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका॥तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई॥

त्रिकूट पर्वतपर लंका बसी है, जहाँ नितांत निडर रावण रहता है। वहीं अशोक वाटिका है, जिसमें सीताजी विराजमान हैं—इस समय भी वे गहरी चिंतामें डूबी बैठी हैं।

दोहा

मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार॥२८

मैं तो उन्हें देख पा रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते, क्योंकि गीधकी दृष्टि बहुत दूरतक जाती है। मैं बूढ़ा न हो गया होता तो तुम्हारी अवश्य कुछ सहायता करता।

जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर॥मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥

जो सौ योजन समुद्र लाँघ सके, वही बुद्धिमान श्रीरामका यह कार्य कर सकता है। मुझे देखकर धैर्य धरो—देखो, श्रीरामकी कृपासे मेरा शरीर कैसा नवीन हो गया है!

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं॥तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई॥

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अपार भवसागरसे पार हो जाते हैं, तुम उन्हींके दूत हो। इसलिए कायरता त्यागकर श्रीरामको हृदयमें बसाकर उपाय करो।

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ॥निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा॥

यह सुनकर जब संपाति चला गया, तो वानरोंके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। सबने अपना-अपना बल तो बताया, पर समुद्र पार करनेमें सबको संदेह ही रहा।

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥

जाम्बवान् बोले—अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीरमें पहलेवाला बल तनिक भी शेष नहीं रहा। जब खरारि श्रीराम वामनरूप होकर त्रिविक्रम बने थे, तब मैं युवा था और मुझमें अपार बल था।

दोहा

बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ॥२९

बलिको बाँधते समय प्रभुका शरीर इतना विशाल हो गया था कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर भी मैंने दो घड़ीमें ही दौड़कर उसकी सात परिक्रमाएँ पूरी कर लीं।

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक॥

अंगदने कहा—मैं समुद्र पार तो चला जाऊँगा, पर लौटनेकी बातमें मनमें कुछ संशय है। जाम्बवान्ने कहा—तुम हर तरहसे योग्य हो, पर तुम सबके नायक हो, तुम्हें कैसे भेजा जाए?

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

ऋक्षराज जाम्बवान्ने कहा—हे बलवान हनुमान्! सुनो, तुम यह चुप्पी क्यों साधे बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, बलमें पवनके समान हो और बुद्धि, विवेक तथा विज्ञानके भंडार हो।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा॥

संसारमें ऐसा कौन-सा कठिन कार्य है जो हे तात! तुमसे न हो सके? श्रीरामके कार्यके लिए ही तो तुम्हारा जन्म हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वताकार विशालकाय हो उठे।

कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा॥सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा॥

उनका शरीर स्वर्णके समान कांतिमान और तेजसे दमक उठा, मानो दूसरा सुमेरु पर्वत हो। उन्होंने बार-बार सिंहनाद करते हुए कहा—मैं इस खारे समुद्रको खेल-खेलमें ही लाँघ सकता हूँ।

सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥

और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहीं ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सलाह दो कि मुझे क्या करना चाहिए।

एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥

जाम्बवान्ने कहा—हे तात! तुम केवल इतना करो कि जाकर सीताजीको देख आओ और उनका समाचार ले आओ। इसके बाद कमलनयन श्रीराम अपने बाहुबलसे ही राक्षसोंका संहार करेंगे, वानरसेना तो बस साथ चलनेके लिए है।

छंद

कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

वानर-सेनाके साथ राक्षसोंका संहार करके श्रीराम सीताजीको ले आएँगे। तब देवता और नारद आदि मुनि उनके त्रिलोक-पावन सुयशका गान करेंगे—जिसे सुनने, गाने, कहने और मनन करनेसे मनुष्य परमपद पाता है, और जिस श्रीरघुवीरके चरणकमलके भ्रमर बनकर तुलसीदास इसे गाते हैं।

दोहा

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥३०(क)

श्रीरघुवीरका यश जन्म-मरणरूपी रोगकी अमोघ औषधि है। जो स्त्री-पुरुष इसे सुनते हैं, त्रिशिराके शत्रु श्रीराम उनके समस्त मनोरथ पूर्ण कर देते हैं।

सोरठा

नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघखगबधिक॥३०(ख)

नीलकमलके समान श्यामवर्ण, करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक सुंदर और पापरूपी पक्षियोंके लिए साक्षात् व्याधके समान नामवाले श्रीरामकी लीलाओंका यह गुणगान अवश्य सुनना चाहिए।

सोरठा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थ: सोपान: समाप्तः।

कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह चौथा सोपान (किष्किंधाकाण्ड) यहाँ समाप्त हुआ।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥

यह सुनते ही हनुमानजी बड़े जोरसे अट्टहास करते हुए गरज उठे और अपने विशाल शरीरको बढ़ाकर आकाशकी ओर छलाँग लगानेको उठ खड़े हुए।