द्वितीय सोपान — भाग 6

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

अयोध्याकाण्ड — सुनें

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राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

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सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥सुद्ध भएँ दुई बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते॥

साधुओंकी राय है कि राम का यह शुद्ध होना वैसा ही है जैसे तीर्थोंके आवाहनसे गंगा शुद्ध होती है - असलमें राम तो सदा शुद्ध ही हैं। शुद्ध हुए दो दिन बीतनेपर राम प्रेमसे गुरुसे बोले -

नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी॥सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता॥

नाथ, यहाँ सब बहुत दुखी हैं, कंद-मूल-फल-जलसे ही गुजारा कर रहे हैं। शत्रुघ्नसहित भरत, मंत्रियों और सब माताओंको देखकर मुझे हर पल एक युगके समान बीतता लगता है।

सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ॥बहुत कहेउ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥

इसलिए सबके साथ आप अयोध्या पधारिए, आप यहाँ हैं और राजा स्वर्गमें हैं। मैंने बहुत कह दिया, यह मेरी बड़ी ढिठाई है, गोसाईं, अब जो उचित लगे वही कीजिए।

दोहा

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम२४८

राम, तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं, दो दिन तुम्हारा दर्शन पाकर उन्हें कुछ शांति मिल जाए।

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥

राम के यह वचन सुनकर सारा समाज ऐसे भयभीत हुआ मानो समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो। पर गुरुकी कल्याणकारी वाणी सुनते ही मानो हवा अनुकूल हो गई।

पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥

सब लोग उस पवित्र नदीमें तीनों समय स्नान करते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे पापोंके ढेर मिट जाते हैं, और मंगलमूर्ति राम को दंडवत करके नेत्र भर-भरकर निहारते हैं।

राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥

सब राम के पर्वत और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सुख ही सुख है और दुखका नामोनिशान नहीं। झरने अमृतजैसा जल बहाते हैं और शीतल-मंद-सुगंधित हवा तीनों तापोंको हर लेती है।

बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥

अनगिनत तरहके वृक्ष, लताएँ, घास, फल-फूल-पत्ते हैं, सुंदर शिलाएँ और सुखद छाया है - इस वनकी शोभा कोई कैसे बयान करे।

दोहा

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग२४९

तालाबोंमें कमल खिले हैं, जलपक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं, और रंग-बिरंगे पशु-पक्षी वैररहित होकर वनमें विचर रहे हैं।

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥

कोल-किरात-भील वनवासी लोग पवित्र, सुंदर, अमृतजैसे मीठे शहदको सुंदर दोनोंमें भर-भरकर और कंद-मूल-फल-अंकुरकी जूड़ियाँ बनाकर,

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥

विनय और प्रणाम करते हुए सबको देते हैं, हर चीजका स्वाद-भेद-गुण-नाम बता-बताकर। लोग बदलेमें बहुत दाम देना चाहते हैं, पर वे नहीं लेते, राम की दुहाई देकर लौटा देते हैं।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥

प्रेममें डूबकर वे कोमल वाणीमें कहते हैं - साधु लोग तो प्रेम पहचानकर उसका सम्मान करते हैं। आप पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं, राम की कृपासे ही हमें आपके दर्शन हुए।

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥

हमारे लिए आपके दर्शन उतने ही दुर्लभ हैं जितनी मरुभूमिके लिए गंगाकी धारा। देखिए, कृपालु राम ने निषादपर कैसी कृपा की है - जैसा राजा हो वैसे ही उसकी प्रजा भी होनी चाहिए।

दोहा

यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु२५०

यह जानकर संकोच छोड़ो और हमारा प्रेम देखकर कृपा करो, हमें कृतार्थ करनेके लिए ही यह फल-तृण-अंकुर ग्रहण करो।

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई॥

आप प्रिय अतिथि बनकर वनमें पधारे हैं, आपकी सेवाके योग्य हमारा भाग्य नहीं। स्वामी, हम आपको क्या दें, हम भीलोंकी दोस्ती तो बस लकड़ी और पत्तोंतक ही है।

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई॥हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥

हमारी यही सबसे बड़ी सेवा है कि हम आपके बर्तन-कपड़े नहीं चुराते। हम अनजान, हिंसक, कुटिल, कुचाली और नीच जातिके हैं,

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥

हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं, फिर भी न तन ढकनेको कपड़ा है न पेट भरता है। हममें सपनेमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसे आई - यह सब रघुनंदनके दर्शनका ही असर है।

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे॥

जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे असह्य दुख-दोष मिट गए। यह सुनकर अयोध्यावासी प्रेमसे भर उठे और वनवासियोंके भाग्यकी सराहना करने लगे।

छंद

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥

सब उनके भाग्यकी सराहना करते और प्रेमकी बातें सुनाते हैं। उनकी बोलचाल और सीता-रामके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सुख पाते हैं। कोल-भीलोंकी यह वाणी सुनकर नर-नारी अपने ही प्रेमको कम मानने लगते हैं। तुलसीदास कहते हैं - यह रघुवंशमणिकी ही कृपा है कि लोहा नाव बनकर तैर गया।

सोरठा

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम२५१

सब लोग दिनोंदिन प्रसन्न होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली बरसातका पानी पाकर मेढक और मोर मस्त हो उठते हैं।

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥

अयोध्याके स्त्री-पुरुष सब प्रेममें ऐसे डूबे हैं कि दिन पलकी तरह बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ हैं, सीता उतने ही रूप बनाकर आदरपूर्वक सबकी बराबर सेवा करती हैं।

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥सीय सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥

राम के सिवा यह भेद किसीने नहीं जाना - सारी माया सीताकी ही मायामें समाई है। सीताने सेवासे सासुओंको वश कर लिया, उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिए।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥

सीतासहित दोनों सरल भाइयोंको देखकर कुटिल कैकेयी भरपेट पछताई। वह धरती और यमसे मौत माँगती है, पर धरती रास्ता नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता।

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥

लोक-वेदमें प्रसिद्ध है और विद्वान भी कहते हैं कि राम से विमुखको नरकमें भी जगह नहीं मिलती। सबके मनमें यही संशय था - राम का अयोध्या लौटना होगा या नहीं।

दोहा

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच२५२

भरतको न रातमें नींद आती है न दिनमें भूख लगती है, वे शुद्ध चिंतामें ऐसे व्याकुल हैं जैसे तलकी कीचड़में फँसी मछली पानीकी कमीसे तड़पती है।

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥

भरत सोचते हैं - माताके बहाने कालने ही यह कुचाल की है, जैसे धान पकते समय अचानक आफत आ जाए। अब राम का राज्याभिषेक कैसे हो, मुझे कोई उपाय नहीं सूझता।

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥

गुरुकी आज्ञा मानकर तो राम अवश्य लौट आएँगे, पर मुनि तो राम की इच्छा जानकर ही कुछ कहेंगे। माताके कहनेसे भी रघुनाथ लौट सकते हैं, पर भला राम को जन्म देनेवाली माँ कभी हठ करेगी?

मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥

मुझ सेवककी बिसात ही क्या, ऊपरसे समय भी प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करूँ तो यह घोर अधर्म होगा - सेवकका धर्म तो कैलास पर्वतसे भी भारी होता है।

एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥

भरतके मनमें एक भी उपाय न ठहरा, सोचते-सोचते रात बीत गई। सुबह स्नान करके प्रभुको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषिने उन्हें बुलवा भेजा।

दोहा

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ२५३

भरतने गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर आसन लिया, तभी ब्राह्मण, महाजन, मंत्री और सब सभासद आकर जुट गए।

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ समयोचित वचन बोले - सुनो सभासदो, सुनो सुजान भरत, सूर्यकुलके सूर्य राजा राम धर्मधुरंधर और स्वतंत्र भगवान हैं।

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनम जग मंगल हेतू॥गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥

वे सत्यप्रतिज्ञ हैं, वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं, राम का अवतार ही जगतके कल्याणके लिए हुआ है। वे गुरु-पिता-माताके वचनके अनुसार चलते हैं, दुष्टोंका नाश करनेवाले और देवताओंके हितैषी हैं।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥

नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको राम-जैसा सच्चाईसे कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, चंद्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, कर्म और काल -

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥

शेष और सारे राजाओंकी जितनी भी प्रभुता है, योगकी जो सिद्धियाँ वेद-शास्त्रोंमें गाई गई हैं - मनमें अच्छी तरह विचार करके देखो, राम की आज्ञा ही इन सबके ऊपर है।

दोहा

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ२५४

इसलिए राम की आज्ञा और इच्छाका पालन करनेमें ही हम सबका भला है। तुम सब समझदार लोग मिलकर जो सबको मान्य हो वही अब करो।

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥

राम का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायी है, मंगल और आनंदका यही एक रास्ता है। पर रघुनाथ अयोध्या कैसे लौटें, विचारकर बताओ, वही उपाय किया जाए।

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥

मुनिश्रेष्ठकी नीति, परमार्थ और व्यावहारिकतासे भरी यह बात सबने आदरसे सुनी, पर किसीको कोई उत्तर नहीं सूझा, सब चुप रह गए। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े,

भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥

और कहा - सूर्यवंशमें एक-से-एक बढ़कर राजा हुए हैं, सबके जन्मका कारण माता-पिता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोंका फल विधाता देते हैं।

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥

आपका आशीर्वाद ही ऐसा है जो दुख मिटाकर सब कल्याण सजा देता है, यह जगत जानता है। स्वामी, आपने तो विधाताकी गति भी रोक दी है - आपने जो ठान लिया उसे कौन टाल सकता है?

दोहा

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।२५५

अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह मेरा दुर्भाग्य है। भरतके इन प्रेमभरे वचनोंको सुनकर गुरुके हृदयमें भी प्रेम उमड़ आया।

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥

तात, बात सच है, पर यह सब राम की कृपासे ही है - राम से विमुखको सपनेमें भी सफलता नहीं मिलती। तात, एक बात कहनेमें मुझे संकोच होता है - बुद्धिमान लोग सब कुछ खोने से पहले आधा त्याग देते हैं।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥

इसलिए तुम दोनों भाई वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता, राम को वापस ले आओ। यह सुंदर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो उठे, उनका पूरा शरीर आनंदसे भर गया।

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥

उनका मन प्रसन्न हो उठा, शरीरमें तेज छा गया, मानो राजा दशरथ फिर उठे हों और राम राजा बन गए हों। दूसरे लोगोंको इसमें लाभ ही ज्यादा, हानि कम लगी, पर रानियाँ तो दुख-सुख दोनोंको बराबर मानकर रोने लगीं।

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥

भरत बोले - मुनिने जो कहा वही करूँ तो संसारके सब जीवोंकी मनचाही पूरी होगी। पर मैं तो जन्मभर वनमें ही रहूँगा, इससे बढ़कर मेरे लिए कोई सुख नहीं।

दोहा

अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान२५६

राम और सीता अंतर्यामी हैं, आप सर्वज्ञ और सुजान हैं - यदि आप यह सच कह रहे हैं तो नाथ, अपने ही वचनको प्रमाण मानिए।

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥

भरतके यह वचन और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठ स्तब्ध रह गए - भरतकी महिमा तो जैसे समुद्र है और मुनिकी बुद्धि उसके किनारे खड़ी असहाय स्त्रीकी तरह।

गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥

वह उस पार जाना चाहती है, मनमें उपाय भी ढूँढ़ती है, पर कोई नाव या जहाज नहीं मिलता। भरतकी बड़ाई और कौन करेगा - क्या तालाबकी सीपीमें समुद्र समा सकता है?

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥

भरत मुनिके मनको बहुत भाए, वे समाजसहित राम के पास आए। प्रभुने प्रणाम करके उन्हें उत्तम आसन दिया, सब मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गए।

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥

मुनिश्रेष्ठ देश-काल-अवसरके अनुसार विचारकर बोले - सुनो सर्वज्ञ, सुजान, धर्म-नीति-गुण-ज्ञानके भंडार राम!

दोहा

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ२५७

आप सबके हृदयमें बसते हैं और सबका भला-बुरा भाव जानते हैं। जिसमें नगरवासियों, माताओं और भरतका हित हो, वही उपाय बताइए।

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ॥सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥

दुखी लोग कभी सोच-समझकर नहीं बोलते, जुआरीको तो बस अपना ही दाँव दिखता है। मुनिकी बात सुनकर रघुनाथ बोले - नाथ, उपाय तो आपके ही हाथमें है।

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किए मुदित फुर भाषें॥प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई॥

आपका रुख बनाए रखने और आपकी आज्ञाको सच मानकर प्रसन्नतासे निभानेमें ही सबका भला है। पहले जो आज्ञा मुझे मिले, उसे शिरोधार्य करके ही करूँगा।

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाई॥कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥

फिर गोसाईं, आप जिसे जो कहेंगे वह पूरी तरह उसीका पालन करेगा। मुनि बोले - राम, तुमने सच कहा, पर भरतके स्नेहने मेरा विवेक ही डिगा दिया है।

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥

इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गई है। मेरी समझसे तो भरतकी इच्छाके अनुसार जो भी हो, शिव साक्षी हैं, वह शुभ ही होगा।

दोहा

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि२५८

पहले भरतकी विनती आदरसे सुन लें, फिर विचार करें - तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदका निचोड़ लेकर वैसा ही करें।

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम हृदय आनंदु बिसेषी॥भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥

भरतपर गुरुका यह स्नेह देखकर राम के मनमें खास आनंद हुआ। भरतको धर्मधुरंधर और तन-मन-वचनसे अपना सेवक जानकर -

बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥

गुरुकी आज्ञाके अनुरूप राम मीठे, कोमल, मंगलमय वचन बोले - नाथ, आपकी और पिताके चरणोंकी सौगंध, संसारमें भरत-जैसा भाई कभी हुआ ही नहीं।

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥

जो गुरुके चरणोंके अनुरागी हैं, वे लोक और वेद दोनोंमें भाग्यशाली माने जाते हैं। फिर जिसपर आपका ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको भला कौन बयान करे?

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥

छोटा भाई जानकर उसके सामने ही उसकी तारीफ करते हुए मुझे संकोच होता है, फिर भी कहूँगा कि भरत जो कहें वही करना ठीक होगा। ऐसा कहकर राम चुप हो गए।

दोहा

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय के बात२५९

तब मुनिने भरतसे कहा - तात, सारा संकोच त्यागकर कृपासागर अपने प्रिय भाईसे अपने मनकी बात कहो।

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥

मुनिकी बात सुनकर और राम का रुख पाकर - गुरु और स्वामी दोनोंको अपने अनुकूल पाकर भी - सारा बोझ अपने ही ऊपर महसूस करके भरत कुछ बोल नहीं पाए, सोचमें पड़ गए।

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें॥कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥

शरीर रोमांचित होकर वे सभामें खड़े हो गए, कमल-जैसे नेत्रोंमें आँसू भर आए। बोले - मेरी बात तो मुनिनाथने ही कह दी, इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ।

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

अपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ - वे अपराधीपर भी कभी क्रोधित नहीं होते। मुझपर तो उनकी खास कृपा और स्नेह है, खेलमें भी मैंने उनकी नाराज़गी कभी नहीं देखी।

सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥

बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा, और उन्होंने भी कभी मेरा मन नहीं तोड़ा। प्रभुकी कृपाकी रीति मैंने अच्छी तरह देखी है - हारकर भी खेलमें वे मुझे जिता देते थे।

दोहा

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन२६०

मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामनेसे कुछ नहीं कहा। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक दर्शनसे तृप्त नहीं हुए।

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥

पर विधाता मेरा यह दुलार सह न सका, उसने नीच माताके बहाने बीचमें दरार डाल दी। यह कहना भी आज मुझे शोभा नहीं देता - अपनी नजरमें कौन साधु और पवित्र होता है?

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली॥

माता बुरी है और मैं सदाचारी हूँ, यह मन में लाना ही करोड़ों दुराचारोंके बराबर है। क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान उगा सकती है? क्या काली सीपी मोती दे सकती है?

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥

सपनेमें भी किसीका कोई दोष नहीं, मेरा अभागा ही अथाह सागर है। बिना अपने पापका फल समझे मैंने माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ दुखी किया।

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥गुर गोसाईँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥

मैंने हृदयमें हर तरफ खोजा और हार गया, फिर भी एक ही बात निश्चित रूपसे मेरे भले की है - गुरु सर्वसमर्थ हैं और सीता-राम मेरे स्वामी हैं, इसीसे मुझे अच्छा परिणाम दिखता है।

दोहा

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ२६१

साधुओं और गुरु-स्वामीके सामने इस पवित्र स्थानपर मैं सच्चे मनसे कहता हूँ - यह प्रेम है या छल, सच है या झूठ, यह तो मुनि वसिष्ठ और रघुनाथ ही जानते हैं।

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी॥

पिताजीका मरना और माताकी कुबुद्धि दोनोंका सारा संसार साक्षी है। माताएँ इतनी व्याकुल हैं कि देखी नहीं जातीं, अयोध्याके नर-नारी असह्य संतापसे जल रहे हैं।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥

मैं ही इन सब अनर्थों का मूल कारण हूँ — यह जानकर भी मैंने वह सब पीड़ा सह ली, जब सुना कि रघुनाथ लक्ष्मण और सीता सहित मुनि-वेष धारण कर वन को चले गए।

बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥

वे बिना जूतों के पैदल चले, शिवजी साक्षी हैं, फिर भी इस चोट को सहकर मैं जीवित रहा। फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी मेरा वज्र-सा कठोर हृदय नहीं फटा।

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥

अब यह सब मैंने अपनी आँखों से देख लिया, फिर भी यह जड़ जीव जीवित रहकर सब सहता रहा — जबकि इन्हें (राम-लक्ष्मण-सीता को) देखकर मार्ग की साँपिन और बिच्छू तक अपना भयंकर विष और क्रोध त्याग देते हैं।

दोहा

ते रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।तासु तनय तजि दुसह दुख देउ सहावइ काहि२६२

वे ही रघुनंदन, लक्ष्मण और सीता जिसे शत्रु लगे, उस कैकेयीके पुत्रको छोड़कर दैव किसे और असह्य दुख सहाएगा?

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥

भरतकी यह अत्यंत व्याकुल, दुख-प्रेम-विनय-नीतिसे भरी वाणी सुनकर सारी सभा शोकमें डूब गई, मानो कमलोंके वनपर पाला पड़ गया हो।

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥

तब ज्ञानी मुनिने अनेक पुरानी कथाएँ सुनाकर भरतको समझाया। फिर सूर्यवंशरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चंद्रमा रघुनंदन उचित वचन बोले -

तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें॥

तात, तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो, जीवकी गति ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें तो तीनों कालों और तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा भी तुमसे कमतर हैं।

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥

मनमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप लगाना यह लोक और परलोक दोनों बिगाड़ देता है। माता कैकेयीको वही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी संगत नहीं की।

दोहा

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार२६३

भरत, तुम्हारा नाम लेते ही सब पाप, भ्रम और अमंगल मिट जाएँगे, इस लोकमें सुयश और परलोकमें सुख मिलेगा।

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥

भरत, मैं स्वभावसे ही सच कहता हूँ, शिव साक्षी हैं, यह धरती तुम्हारी ही धरोहर बनी रहेगी। तात, व्यर्थ कुतर्क मत करो, वैर और प्रेम छिपाए नहीं छिपते।

मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥

पक्षी-पशु मुनियोंके पास बेखौफ चले जाते हैं, पर शिकारीको देखते ही भाग जाते हैं - पशु-पक्षी भी मित्र-शत्रु पहचानते हैं, फिर मनुष्य-शरीर तो गुण और ज्ञानका भंडार है।

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥राखेउ राय सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥

तात, मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ, पर मन बड़े असमंजसमें है, क्या करूँ। राजाने मुझे त्यागकर सत्य निभाया और प्रेम-प्रणके लिए शरीर तक छोड़ दिया।

तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहऊँ सोइ कीन्हा॥

उनकी बातको मिटाते मनमें सोच होता है, उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है, ऊपरसे गुरुने भी मुझे आज्ञा दी है - इसलिए अब तुम जो कहोगे, वही करना चाहता हूँ।

दोहा

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु२६४

मन प्रसन्न करके, संकोच त्यागकर कहो, आज मैं वही करूँगा। सत्यप्रतिज्ञ रघुनाथका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥

देवताओंसहित इंद्र भयभीत होकर सोचने लगे कि बना-बनाया काम बिगड़ने ही वाला है, कोई उपाय नहीं सूझता। तब सब मन-ही-मन राम की शरणमें चले गए।

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥

फिर सोच-विचारकर आपसमें कहने लगे - रघुनाथ तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अंबरीष-दुर्वासाकी घटना याद करके देवता और इंद्र बिल्कुल निराश हो गए।

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥

पहले देवताओंने बहुत लंबे समय तक दुख सहा था, तब भक्त प्रह्लादने नृसिंहभगवानको प्रकट किया। सब देवता कान में कहते और सिर धुनते हैं - अब देवताओंका काम भरतके हाथमें है।

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥

देवताओ, कोई और उपाय नहीं दिखता, राम अपने अच्छे सेवककी सेवाको बहुत मानते हैं। इसलिए अपने गुण-शीलसे राम को वश करनेवाले भरतको ही प्रेमपूर्वक हृदयसे स्मरण करो।

दोहा

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु२६५

देवताओंका यह विचार सुनकर देवगुरु बृहस्पतिने कहा - अच्छा सोचा, तुम्हारा बड़ा भाग्य है, भरतके चरणोंका प्रेम ही जगतके सब मंगलोंकी जड़ है।

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥

सीतापति राम के सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान है। तुम्हारे मनमें भरतकी भक्ति आ गई तो अब सोच छोड़ो, विधाताने बात बना दी है।

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥

देवराज, भरतका प्रभाव देखो, रघुनाथ सहज स्वभावसे ही उनके पूरी तरह वश में हैं। देवताओ, भरतको राम की परछाई समझकर निश्चिंत हो जाओ, डरनेकी बात नहीं।

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥

देवगुरु और देवताओंकी यह सम्मति और उनका सोच सुनकर अंतर्यामी प्रभुको संकोच हुआ। भरतने अपने मनमें सारा भार खुद पर ही समझा और हृदयमें तरह-तरहके विचार करने लगे।

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥

पूरी तरह सोच-विचार करके अंततः मनमें यही तय किया कि राम की आज्ञामें ही भला है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रख लिया, यह कुछ कम कृपा नहीं थी।

दोहा

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ२६६

सीतानाथने सब तरहसे मुझपर अपार कृपा की। फिर भरत दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके बोले -

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥

स्वामी, कृपासागर, अंतर्यामी, अब मैं और क्या कहूँ। गुरु प्रसन्न हैं और स्वामी अनुकूल, यह जानकर मेरे मनकी सारी कल्पित पीड़ा मिट गई।

अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥

मैं बेवजह डर गया था, मेरे सोचकी कोई जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर सूरजका दोष नहीं होता। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और समयकी कठिनाई -

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥

इन सबने मिलकर मुझे बर्बाद करनेकी ठान ली थी, पर शरणागतवत्सल आपने अपना प्रण निभाया। यह आपका कोई नया तरीका नहीं, लोक और वेद दोनोंमें यह प्रसिद्ध है, छिपा नहीं।

जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥

स्वामी, सारा जगत बुरा हो पर आप अकेले भले रहें तो फिर बताइए किसकी भलाईसे भला होता है? आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है - वह न कभी किसीके अनुकूल है, न प्रतिकूल।

दोहा

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच२६७

जो उस वृक्षको पहचानकर पास जाए, उसकी छाया ही सब चिंता मिटा देती है - राजा हो या रंक, भला हो या बुरा, सब उससे मनचाही वस्तु पाते हैं।

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥

गुरु और स्वामीका यह स्नेह हर तरहसे देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मनमें कोई संदेह नहीं रहा। दयासागर, अब वही कीजिए जिससे सेवकके लिए आपके मनमें कोई क्षोभ न रहे।

जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची॥सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई॥

जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहे, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका असली हित तो यह है कि वह सारे सुख-लोभ छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे।

स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किए रजाइ कोटि बिधि नीका॥यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु॥

नाथ, आपके लौटनेमें ही सबका भला है, और आपकी आज्ञा माननेमें करोड़ों तरहका कल्याण है। यही असली स्वार्थ और परमार्थका सार है, सारे पुण्योंका फल और शुभ गतिका शिखर है।

देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥

देव, मेरी एक विनती सुनकर फिर जैसा उचित लगे वैसा कीजिए। राजतिलककी सारी सामग्री सजाकर लाई गई है, यदि आपका मन माने तो इसे सफल कर दीजिए।

दोहा

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ२६८

शत्रुघ्नसहित मुझे वनमें भेज दीजिए और अयोध्या लौटकर सबको सनाथ कर दीजिए। नहीं तो नाथ, लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिए और मैं आपके साथ चलूँ।

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥

या फिर हम तीनों भाई वनको चले जाएँ और आप सीतासहित लौट जाइए। दयासागर, जिससे भी प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिए।

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु॥कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥

देव, आपने सारा भार मुझपर डाल दिया, पर मुझमें न नीतिका विवेक है न धर्मका। मैं तो अपने ही स्वार्थके लिए यह सब कह रहा हूँ - दुखी मनुष्यके मनमें कहाँ विवेक टिकता है।

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥

स्वामीकी आज्ञा सुनकर भी जो जवाब दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी शर्मा जाए। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह सागर हूँ, फिर भी स्वामी स्नेहवश मुझे साधु कहकर सराहते हैं।

अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥

कृपालु, अब तो वही मत मुझे अच्छा लगता है जिससे स्वामीका मन तनिक भी संकुचित न हो। प्रभुके चरणोंकी सौगंध, मैं सच कहता हूँ - संसारके कल्याणका एक यही उपाय है।

दोहा

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब२६९

प्रसन्न मनसे संकोच छोड़कर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे शिरोधार्य करके निभाएँगे और सारी उलझन-अड़चन मिट जाएगी।

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥

भरतके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और साधु-साधु कहकर फूल बरसाने लगे। अयोध्यावासी असमंजसमें पड़ गए, जबकि तपस्वी और वनवासी लोग मनमें बहुत आनंदित हुए।

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥जनक दूत तेहि अवसर आए मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥

पर संकोची रघुनाथ चुप ही रह गए, प्रभुकी यह चुप्पी देखकर सारी सभा चिंतामें पड़ गई। उसी समय जनकके दूत आए, यह सुनकर मुनि वसिष्ठने उन्हें तुरंत बुलवा लिया।

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे॥दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता॥

उन्होंने प्रणाम करके राम को देखा, उनका मुनि-वेष देखकर बहुत दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने दूतोंसे पूछा - बताओ, राजा जनकका कुशल-समाचार क्या है।

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा॥बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं॥

यह सुनकर सकुचाते हुए, धरतीपर सिर नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले - स्वामी, आपका इतने आदरसे पूछना ही, गोसाईं, कुशल होनेका प्रमाण है।

दोहा

नाहिं त कोसल नाथ कें साथ कुसल गई नाथ।मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ२७०

नहीं तो नाथ, कुशल-क्षेम तो कोसलनाथ दशरथके साथ ही चली गई। उनके जानेसे यूँ तो सारा जगत ही अनाथ हो गया, पर मिथिला और अयोध्या विशेषरूपसे अनाथ हो गए।

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा॥जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥

अयोध्यानाथकी यह गति सुनकर जनकपुरवासी सब शोकसे विक्षिप्त हो गए। उस समय जिसने भी जनकको देखा, उसे उनका 'विदेह' नाम सच लगा ही नहीं (क्योंकि वे भी शोकसे अभिभूत दिखे)।

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥

रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको कुछ नहीं सूझता। फिर भरतको राज्य और राम को वनवास सुनकर जनकके मनमें और गहरा दुख हुआ।

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥

राजाने विद्वानों और मंत्रियोंसे पूछा - विचारकर बताओ, अभी क्या करना उचित है। अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों तरफसे असमंजस देखकर 'चलें या रुकें' किसीने कुछ नहीं कहा।

नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥

तब राजाने खुद धीरज धरकर विचार किया और चार चतुर गुप्तचर अयोध्या भेजे - भरतका राम के प्रति सद्भाव है या दुर्भाव, यह पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको भनक न लगे।

दोहा

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति२७१

गुप्तचर अयोध्या पहुँचे, भरतकी चाल-ढाल और करनी देखकर जैसे ही भरत चित्रकूटकी ओर चले, वैसे ही वे मिथिलाकी ओर लौट पड़े।

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥

दूतोंने आकर जनककी सभामें भरतकी करनीका अपनी समझसे वर्णन किया, यह सुनकर गुरु, कुटुंबी, मंत्री और राजा सब सोच और स्नेहसे अत्यंत व्याकुल हो उठे।

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥

फिर जनकने धीरज धरकर और भरतकी सराहना करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया, घर-नगर-देशमें रखवाले नियुक्त करके घोड़े-हाथी-रथ जैसी बहुत सी सवारियाँ सजवाईं।

दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥

शुभ मुहूर्त देखकर वे तुरंत चल पड़े, रास्तेमें राजाने कहीं विश्राम नहीं किया। उसी दिन सुबह प्रयागमें स्नान करके चले, फिर सब यमुना पार करने लगे।

खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥

तब नाथ, हमें खबर लेनेको भेजा गया - यह कहकर दूतोंने धरतीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने छह-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत विदा किया।

दोहा

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु२७२

जनकके आगमनकी बात सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो उठा, राम को बड़ा संकोच हुआ और देवराज इंद्र खासतौर से चिंतामें डूब गए।

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥

कुटिल कैकेयी मनमें ग्लानिसे गलती जा रही है - किससे कहे, किसे दोष दे। और सब नर-नारी यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि जनकके आनेसे कुछ और दिन ठहरना हो गया।

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥

इस तरह वह दिन भी बीत गया, सुबह सब स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेश, गौरी, शिव और सूर्यकी पूजा करते हैं।

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी॥

फिर विष्णुके चरण वंदन करके, हाथ जोड़कर, आँचल फैलाकर विनती करते हैं - राम राजा हों, जानकी रानी हों, और राजधानी अयोध्या आनंदकी पराकाष्ठा बनकर,

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥

फिर समाजसहित सुखसे बसे, और राम भरतको युवराज बनाएँ। देव, इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सबको जीनेका यह लाभ दीजिए।

दोहा

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ२७३

गुरु, समाज और भाइयोंसहित राम का राज्य अयोध्यामें हो, और राम के राजा रहते ही हम अयोध्यामें मरें - सब यही माँगते हैं।

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥

अयोध्यावासियोंकी यह प्रेमभरी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग-वैराग्यको तुच्छ मानने लगते हैं। इस तरह नित्यकर्म करके अवधवासी रोमांचित होकर राम को प्रणाम करते हैं।

ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥

ऊँच-नीच-मध्यम सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार दर्शन पाते हैं। राम सावधानीसे सबका सम्मान करते हैं और सब कृपानिधानकी सराहना करते हैं।

लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥

बचपनसे ही राम की यह आदत है कि प्रेम पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। रघुनाथ शील और संकोचके सागर हैं, सुंदर मुख, सुंदर नेत्र और सरल स्वभावके धनी हैं।

कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥

राम के गुणोंकी चर्चा करते-करते सब प्रेममें डूब गए और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे - संसारमें हम-जैसे पुण्यशाली कम ही हैं, जिन्हें राम अपना मानते हैं।

दोहा

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु२७४

उस पल सब प्रेममें डूबे थे, तभी मिथिलापति जनकके आनेकी खबर सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य राम सभासहित तुरंत आदरपूर्वक उठ खड़े हुए।

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं॥

भाई, मंत्री, गुरु और नगरवासियोंको साथ लेकर रघुनाथ अगवानीमें आगे बढ़े। जनकने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठको देखा, त्यों ही प्रणाम करके रथ छोड़ दिया।

राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥

राम के दर्शनकी लालसा और उत्साहमें किसीको रास्तेकी थकान तनिक भी महसूस नहीं हुई। मन तो वहीं है जहाँ राम और जानकी हैं, बिना मनके तन कैसे सुख-दुख जाने?

आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती॥आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे॥

जनक इस तरह चले आ रहे हैं, समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आते देखकर सब प्रेमसे भर उठे और आदरपूर्वक एक-दूसरेसे मिलने लगे।

लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि॥

जनक मुनियोंके चरण वंदन करने लगे और रघुनंदनने ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसहित राम जनकसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रम ले चले।

दोहा

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।सेन मनहुँ करुना सरित लिए जाहिं रघुनाथु२७५

राम का आश्रम शांतरसका पवित्र सागर है, और जनककी सेना मानो करुणाकी नदी है, जिसे रघुनाथ उसी सागरमें मिलानेको लिए जा रहे हैं।

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥

यह करुणानदी ज्ञान-वैराग्यके किनारोंको डुबोती जा रही है, शोकभरे वचन इसमें मिलनेवाले नद-नाले हैं, और लंबी साँसें इसकी लहरें हैं जो धैर्यरूपी किनारेके वृक्षोंको तोड़ रही हैं।

बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥

भयानक विषाद ही इसकी तेज धारा है, भय-भ्रम इसके अनगिनत भँवर हैं। विद्वान मल्लाह हैं, विद्या बड़ी नाव है, पर कोई इसे खे नहीं पाता, किसीको कोई तरकीब नहीं सूझती।

बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई॥

बेचारे वनवासी कोल-किरात ही इसके यात्री हैं, जो इसे देखकर हिम्मत हार बैठे हैं। यह करुणानदी जब आश्रमरूपी सागरमें मिली, तो मानो वह सागर खुद उमड़ पड़ा।

सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥

दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो उठे, किसीको न ज्ञान रहा न धीरज न लाज। राजा दशरथके रूप-गुण-शीलकी सराहना करते हुए सब रोते हुए शोकसागरमें डूब रहे हैं।

छंद

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।दे दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥

शोकसागरमें डूबते हुए सब स्त्री-पुरुष अत्यंत व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं, क्रोधसे विधाताको दोष देते हुए कहते हैं - इस प्रतिकूल विधाताने यह क्या कर डाला! तुलसीदास कहते हैं - देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनि तक कोई भी जनककी यह दशा देखकर प्रेमकी इस नदीको पार नहीं कर सका, सब प्रेममें डूब गए।

सोरठा

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन२७६

जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको बहुत उपदेश दिए, और वसिष्ठने जनकसे कहा - राजन, धीरज धरिए।

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥

जिनका ज्ञानरूपी सूर्य जन्म-मरणकी रातको मिटा देता है, जिनकी वाणीकी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं - क्या मोह-ममता उनके पास भी फटक सकते हैं? यह तो सीता-रामके प्रेमकी ही महिमा है।

बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥

विषयी, साधक और सिद्ध - वेदोंने संसारमें तीन तरहके जीव बताए हैं। इनमें से जिसका मन राम के प्रेमसे सराबोर रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका सबसे बड़ा आदर होता है।

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए॥

राम के प्रेमके बिना ज्ञान भी वैसे ही शोभाहीन है जैसे कर्णधार बिना जहाज। वसिष्ठने जनकको बहुत तरहसे समझाया, फिर सबने राम के घाटपर स्नान किया।

सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥

सब स्त्री-पुरुष शोकसे भरे थे, वह दिन बिना पानी पिए ही बीत गया। पशु-पक्षी-हिरणोंतकने कुछ नहीं खाया, फिर प्रियजनोंकी तो बात ही क्या।

दोहा

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात२७७

जनक और राम दोनों समाजसहित अगले दिन सुबह स्नान करके बरगदके पेड़तले जा बैठे, सबके मन उदास और शरीर दुबले थे।

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥

दशरथकी अयोध्या और जनककी मिथिलाके जो ब्राह्मण थे, और सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठ तथा जनकके पुरोहित शतानंद, जिन्होंने सांसारिक और पारमार्थिक दोनों मार्ग खोज डाले थे,

लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका॥कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं॥

वे सब धर्म, नीति, वैराग्य और विवेकसे भरे अनेक उपदेश देने लगे। विश्वामित्रने पुरानी कथाएँ सुना-सुनाकर सारी सभाको सुंदर वाणीमें समझाया।

तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥

तब रघुनाथने विश्वामित्रसे कहा - नाथ, कल सब लोग बिना जल पिए ही रह गए थे। मुनिने कहा - राम ठीक कह रहे हैं, आज भी ढाई पहर दिन बीत चुका है।

रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाई रजायसु चले नहाना॥

ऋषिका रुख देखकर जनकने कहा - यहाँ अन्न खाना उचित नहीं। राजाकी यह बात सबको भली लगी, आज्ञा पाकर सब स्नान करने चल पड़े।

दोहा

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार२७८

उसी समय वनवासी लोग तरह-तरहके फल-फूल-पत्ते-मूल बहँगियोंमें भर-भरकर बड़ी मात्रामें ले आए।

कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनंद अनुरागा॥

राम की कृपासे सारे पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले बन गए, देखनेमात्रसे ही दुख हर लेते थे। तालाब, नदी, वन और धरतीके हर हिस्सेमें मानो आनंद और प्रेम उमड़ रहा था।

बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला॥तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥

बेलें और पेड़ सब फल-फूलसे लद गए, पक्षी-पशु-भौंरे सब मीठा बोलने लगे। उस समय वनमें बड़ा उत्साह था, हर किसीको सुख देनेवाली शीतल-मंद-सुगंधित हवा बह रही थी।

जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥

उस वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी स्वयं जनकजी की आवभगत कर रही हो। तब राम, जनक और मुनि की आज्ञा पाकर सभी लोग स्नान करने लगे।

देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥

सुंदर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम से भरकर नगरवासी जहाँ-तहाँ ठहरने लगे — वहाँ अनेक प्रकार के पवित्र, सुंदर और अमृत-सम मीठे पत्ते, फल, मूल और कंद उपलब्ध थे।

दोहा

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥२७९

श्रीराम के गुरु वसिष्ठजी ने आदरपूर्वक सबके लिए भार भर-भरकर सामग्री भिजवाई; पितरों, देवताओं, अतिथियों और गुरु की पूजा करके सब फलाहार करने लगे।

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥

इस तरह चार दिन बीत गए, राम को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजोंके मनमें यही इच्छा है कि सीता-रामके बिना लौटना ठीक नहीं।

सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥

सीता-रामके साथ वनमें रहना करोड़ों स्वर्गोंके बराबर सुखद है। लक्ष्मण, राम, जानकीको छोड़कर जिसे घर अच्छा लगे, विधाता उसीके विरुद्ध समझो।

दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥

जब भाग्य सबके अनुकूल हो, तभी राम के पास वनमें रहा जा सकता है - मंदाकिनीमें तीनों समय स्नान और आनंद-मंगलकी माला-जैसा राम का दर्शन,

अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥

राम के पर्वत, वन और तपोवनमें घूमना, अमृतजैसे मीठे कंद-मूल-फल खाना - सुखके साथ चौदह वर्ष पलकी तरह बीत जाएँगे, पता ही नहीं चलेगा।

दोहा

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु२८०

सब लोग कहते हैं - हम इस सुखके लायक नहीं, हमारा ऐसा भाग्य कहाँ। दोनों समाजोंका राम के चरणोंमें स्वाभाविक ही गहरा प्रेम है।

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥

इस तरह सब मनोरथ करते रहे, उनके प्रेमभरे वचन सुनते ही मन मोह लेते हैं। उसी समय सीताकी माता सुनयनाकी भेजी दासियाँ सही मौका देखकर आ पहुँचीं।

सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥

यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ अभी फुरसतमें हैं, जनकका रनिवास मिलने आया। कौसल्याने आदरसे सबका स्वागत किया और समयोचित आसन दिए।

सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥

दोनों ओरका शील और स्नेह देखकर-सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाए। शरीर रोमांचित और शिथिल हैं, आँखोंमें आँसू हैं, सब पैरोंके नखोंसे धरती कुरेदते हुए सोचमें डूब गईं।

सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥

सब मानो सीता-रामके प्रेमकी साक्षात मूर्ति हैं, मानो करुणा खुद कई रूप धरकर विलाप कर रही हो। सीताकी माताने कहा - विधाताकी बुद्धि कितनी टेढ़ी है, जो दूधके फेनजैसी कोमल चीज़को वज्रकी छेनीसे तोड़ रहा है।

दोहा

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल२८१

अमृतकी बस बात सुनी जाती है, पर विष हर जगह सामने दिखता है - विधाताकी करतूतें ही ऐसी भयानक हैं। जहाँ-तहाँ कौए-उल्लू-बगुले ही दिखते हैं, हंस तो बस मानसरोवरमें ही मिलता है।

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥जो सजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी॥

यह सुनकर सुमित्रा दुखी होकर बोलीं - विधाताकी चाल बड़ी उलटी और अजीब है, जो बनाकर पालता है फिर खुद ही नष्ट कर देता है, विधाताकी बुद्धि बच्चोंके खेलजैसी लगती है।

कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥

कौसल्याने कहा - किसीका दोष नहीं, दुख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं। कर्मकी गति बड़ी कठिन है, इसे विधाता ही जानता है जो शुभ-अशुभ सब फल देता है।

ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥

ईश्वरकी आज्ञा सबके ऊपर है - उत्पत्ति, पालन, नाश और अमृत-विष तककी। देवी, मोहवश सोच करना व्यर्थ है, विधाताका यह खेल सदासे ऐसा ही अटल और अनादि है।

भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥

राजाके जीने-मरनेकी बात याद करके जो चिंता करती है, वह असलमें अपने ही स्वार्थकी हानि देखकर करती है, सखी। सीताकी माताने कहा - आपकी बात सच है, आप तो पुण्यात्माओंके शिखर राजा दशरथकी ही रानी हैं।

दोहा

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु२८२

कौसल्याने भारी मनसे कहा - राम, लक्ष्मण, सीताका वनमें जाना अंततः अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो बस भरतकी चिंता है।

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥

ईश्वरकी कृपा और आपके आशीर्वादसे मेरे पुत्र और बहुएँ गंगाजलकी तरह पवित्र हैं। सखी, मैंने कभी राम की सौगंध नहीं खाई, आज खाकर सच कहती हूँ -

भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥

भरतके शील, गुण, विनय, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छाईका वर्णन करते तो सरस्वती भी हिचकें - क्या सीपसे कहीं समुद्र उलीचा जा सकता है?

जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥

मैं भरतको सदा कुलका दीपक मानती हूँ, राजाने भी बार-बार यही कहा था। सोना कसौटीपर और रत्न जौहरीके सामने ही पहचाना जाता है, वैसे ही इंसानकी परख समय आनेपर ही होती है।

अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥

पर आज मेरा यह कहना भी अनुचित है, शोक और स्नेहमें सूझबूझ कम हो जाती है। कौसल्याकी गंगाजैसी पवित्र वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहसे व्याकुल हो उठीं।

दोहा

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि२८३

कौसल्याने फिर धीरज धरकर कहा - देवी मिथिलेश्वरी, सुनिए, ज्ञानके भंडार जनककी प्रिया आपको भला कौन उपदेश दे सकता है?

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥

रानी, मौका पाकर राजासे अपनी तरफसे समझाकर कहिएगा कि लक्ष्मणको घर रोक लिया जाए और भरत वनको जाएँ, यदि यह बात राजाके मनमें ठीक बैठे,

तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥

तो अच्छी तरह सोच-विचारकर ऐसी व्यवस्था कर दें। मुझे भरतकी बहुत चिंता है, उनके मनमें गहरा प्रेम छिपा है, उनका घर रहना मुझे ठीक नहीं लगता।

लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥

कौसल्याका स्वभाव और उनकी सरल सुंदर वाणी सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें डूब गईं। आकाशसे फूलोंकी झड़ी लगी और धन्य-धन्यकी ध्वनि गूँजी, सिद्ध-योगी-मुनि तक स्नेहसे द्रवित हो उठे।

सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥

सारा रनिवास यह देखकर स्तब्ध रह गया, तब सुमित्राने धीरज धरकर कहा - देवी, दो घड़ी रात बीत चुकी है। यह सुनकर राम की माता कौसल्या प्रेमसे उठीं।

दोहा

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय२८४

और स्नेहसे सच्चे मनसे बोलीं - अब जल्दी अपने डेरे चलिए। हमारा तो अब ईश्वर ही सहारा है, या फिर मिथिलेश्वर जनक ही मददगार हैं।

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥

कौसल्याका यह स्नेह और विनम्र वचन देखकर-सुनकर जनककी पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिए और बोलीं - देवी, आपकी ऐसी नम्रता स्वाभाविक ही है, आप दशरथकी रानी और राम की माता हैं।

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥

प्रभु अपने नीचोंका भी आदर करते हैं, जैसे आग धुएँको और पर्वत घासको भी अपने ऊपर धारण करता है। हमारे राजा तो तन-मन-वचनसे आपके सेवक हैं, और शिव-पार्वती सदा उनके सहायक हैं।

रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै॥रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥

आपकी सहायता करने योग्य संसारमें कौन है? दीपक सूर्यकी मदद करने जाए तो क्या शोभा पाएगा? राम वनमें जाकर देवताओंका काम पूरा करके अयोध्यामें अटल राज्य करेंगे।

अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल॥यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥

देवता, नाग और मनुष्य सब राम की भुजाओंके बलपर अपने-अपने स्थानोंमें सुखसे बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनिने पहले ही कह रखा है, देवी, मुनिकी बात झूठी नहीं हो सकती।

दोहा

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ२८५

ऐसा कहकर बड़े प्रेमसे चरणोंमें गिरकर सीताको साथ भेजनेकी विनती की, और आज्ञा पाकर सीताकी माता सीतासहित डेरेकी ओर चलीं।

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥

जानकी अपने प्रिय परिजनोंसे जिस-जिसके योग्य था उसी तरहसे मिलीं। जानकीको तपस्विनी-वेषमें देखकर सब बहुत व्याकुल हो उठे।

जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की॥

जनक राम के गुरुकी आज्ञा पाकर डेरेकी ओर चले और सीताको देखा। जनकने अपनी प्रिय, प्राणोंसे प्यारी बेटी जानकीको हृदयसे लगा लिया।

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥

उनके हृदयमें प्रेमका सागर उमड़ पड़ा, राजाका मन मानो प्रयाग बन गया। उन्होंने देखा कि सीताके स्नेहरूपी अक्षयवटपर राम का प्रेमरूपी बालक कैसा शोभित हो रहा है।

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥

जनकका ज्ञानरूपी चिरंजीवी मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो इस प्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया। असलमें विदेहराजकी बुद्धि मोहमें नहीं डूबी - यह तो सीता-रामके प्रेमकी ही महिमा है।

दोहा

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि२८६

पिता-माताके स्नेहके आगे सीता इतनी विकल हो उठीं कि खुदको सँभाल न सकीं, पर धैर्यवती पृथ्वीपुत्रीने समय और धर्मका विचार करके धीरज धर लिया।

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥

सीताको तपस्विनी-वेषमें देखकर जनकको विशेष प्रेम और संतोष हुआ - बेटी, तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए, तेरे उज्ज्वल यशसे सारा जगत रोशन हो रहा है, ऐसा सब कहते हैं।

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥

तेरी कीर्तिरूपी नदीने गंगाको भी पीछे छोड़कर करोड़ों ब्रह्मांडोंमें बहना शुरू कर दिया है। गंगाने तो धरतीपर बस तीन ही तीर्थ बड़े बनाए, पर तेरी इस कीर्तिने अनगिनत संत-समाजरूपी तीर्थ रच डाले।

पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥

पिताने स्नेहसे यह सच्ची बात कही, पर अपनी तारीफ सुनकर सीता मानो संकोचमें सिमट गईं। फिर माता-पिताने उन्हें गले लगाया और हितकी सुंदर सीख व आशीर्वाद दिए।

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥

सीता कुछ कहती नहीं पर मनमें संकोच है कि रातमें यहाँ ठहरना ठीक नहीं। रानी सुनयनाने सीताका मन भाँपकर राजासे कह दिया, दोनों मन-ही-मन उनके शील-स्वभावकी सराहना करने लगे।

दोहा

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि२८७

राजा-रानीने बार-बार गले मिलकर, सम्मान करके सीताको विदा किया। फिर चतुर रानीने सही समय देखकर राजासे भरतकी दशाका वर्णन किया।

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥

भरतका ऐसा व्यवहार सुनकर, जो सोनेमें सुगंध और अमृतमें चंद्रमाके सारजैसा है, राजाने प्रेमसे भरी आँखें मूँद लीं, शरीर रोमांचित हो उठा और मन-ही-मन उनके सुयशकी सराहना करने लगे।

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥

बोले - सुनयनी, ध्यान से सुनो, भरतकी कथा संसारके बंधनसे मुक्त करनेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार - इनमें जितनी मेरी समझ है, उतना बताता हूँ।

सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥

पर मेरी वह बुद्धि भी भरतकी महिमाका वर्णन तो दूर, छलसे भी उसकी परछाईं नहीं छू सकती। ब्रह्मा, गणेश, शेष, शिव, सरस्वती, कवि, विद्वान, बुद्धिमान -

भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥

भरतका चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल वैभव - सुनने-समझनेमें सबको सुख देते हैं, पवित्रतामें गंगाको और मिठासमें अमृतको भी मात देते हैं।

दोहा

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि२८८

भरत असीम गुणोंवाले, बेमिसाल पुरुष हैं - भरतकी तुलना सिर्फ भरतसे ही हो सकती है। सुमेरुको भला बटखरेके बराबर कैसे कहा जाए? इसलिए कविसमाजकी बुद्धि भी उन्हें किसीसे उपमा देते हुए सकुचा जाती है।

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥

श्रेष्ठ वर्णवाली, भरतकी महिमा सबके लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित धरतीपर मछलीका चलना। रानी, भरतकी अपार महिमा को अकेले राम ही जानते हैं, पर वे भी उसे पूरा बयान नहीं कर सकते।

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥

इस तरह प्रेमसे भरतके प्रभावका वर्णन करके, पत्नीके मनकी इच्छा भाँपकर राजाने कहा - लक्ष्मण लौट जाएँ और भरत वनको जाएँ, इसीमें सबका भला है, यही सबके मनमें भी है।

देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की॥

पर देवी, भरत और रघुनाथका प्रेम और परस्पर विश्वास तर्कसे नहीं समझा जा सकता। राम भले समताकी सीमा हों, पर भरत तो प्रेम और ममताकी सीमा हैं।

परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥साधन सिद्ध राम पग नेहू।। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥

भरतने परमार्थ, स्वार्थ और सुख - इनकी ओर सपनेमें भी नहीं देखा। राम के चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही उनकी सिद्धि है - मुझे तो भरतका बस यही एक सिद्धांत जान पड़ता है।

दोहा

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ२८९

राजाने भावुक होकर कहा - भरत भूलकर भी राम की आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे, इसलिए स्नेहवश चिंता करनेकी जरूरत नहीं।

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥

राम और भरतके गुण गिनते-गिनते पति-पत्नीको सारी रात पलकी तरह बीत गई। सुबह दोनों राजसमाज जागे और स्नान करके देवताओंकी पूजा करने लगे।

गे नहाइ गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई॥नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥

स्नान करके रघुनाथ गुरुके पास गए, चरण वंदन करके उनका रुख पाकर बोले - नाथ, भरत, नगरवासी और सब माताएँ शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं।

सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा॥

मिथिलापति जनकको भी समाजसहित यह कष्ट सहते बहुत दिन हो गए। इसलिए नाथ, जो उचित हो वही कीजिए, सबका भला अब आपके ही हाथमें है।

अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥

यह कहकर रघुनाथ बहुत सकुचा गए, उनका शील-स्वभाव देखकर मुनि रोमांचित हो उठे - राम, तुम्हारे बिना दोनों राजसमाजोंके सारे सुख-साधन भी नरकके समान हैं।

दोहा

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम२९०

राम, तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माकी भी आत्मा, सुखके भी सुख हो। तात, तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर अच्छा लगता है, विधाता उन्हींके विरुद्ध समझो।

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥

जहाँ राम के चरणोंमें प्रेम नहीं, वह सुख-कर्म-धर्म जल जाए। जिसमें राम प्रेमकी प्रधानता नहीं, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है।

तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥

तुम्हारे बिना सब दुखी हैं, और जो सुखी हैं वे तुम्हारे ही कारण सुखी हैं। हर किसीके मनकी बात तुम जानते हो, तुम्हारी आज्ञा सबके सिरपर है, कृपालु, तुम्हें सबकी दशा भलीभाँति मालूम है।

आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥

इसलिए आप आश्रमको पधारिए। यह कहते-कहते मुनिराज स्नेहसे भर उठे। फिर राम प्रणाम करके चले गए और वसिष्ठ धीरज धरकर जनकके पास आए।

राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए॥महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥

गुरुने राम के शील और स्नेहभरे स्वभावसे यह सुंदर बात राजा जनकको सुनाई - महाराज, अब वही कीजिए जिससे धर्मसहित सबका भला हो।

दोहा

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल२९१

राजन, आप ज्ञानके भंडार, सुजान, पवित्र और धर्ममें दृढ़ हैं। इस समय आपके सिवा इस दुविधाको सुलझाने में और कौन समर्थ है?

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥

मुनिकी बात सुनकर जनक प्रेममें डूब गए, उनकी दशा देखकर मानो ज्ञान-वैराग्यको भी वैराग्य हो गया। स्नेहसे शिथिल होकर सोचने लगे कि यहाँ आना ठीक नहीं किया।

रामहि राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥

राजा दशरथने राम को वन भेजा और अपने प्रेमको प्राणोंसे सच्चा साबित कर दिया, पर हम इन्हें और गहरे वनमें भेजकर अपने विवेककी बड़ाई करते हुए लौटेंगे।

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा॥

तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सुनकर-देखकर प्रेमसे बहुत व्याकुल हो उठे। समय समझकर धीरज धरते हुए जनक समाजसहित भरतके पास चले।

भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥

भरतने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उचित आसन दिए। तिरहुतराज जनक बोले - तात भरत, तुम राम का स्वभाव जानते ही हो।

दोहा

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु२९२

राम सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील-स्नेह रखते हैं, इसीलिए संकोचवश यह कष्ट सह रहे हैं - अब तुम जो आज्ञा दो, वही उन्हें बताई जाए।

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥

यह सुनकर रोमांचित होकर, आँखोंमें आँसू भरकर, बड़ा धीरज धरकर भरत बोले - प्रभु, आप पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं, और कुलगुरु-जैसा हितैषी तो माता-पिता भी नहीं होते।

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी॥

विश्वामित्र-जैसे मुनि और मंत्रियोंका समाज है, और आज ज्ञानसागर आप स्वयं यहाँ हैं। स्वामी, मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञाकारी समझकर शिक्षा दीजिए।

एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥

इस पवित्र सभामें आप जैसोंसे पूछना ही उचित होता, चुप रहूँ तो मलिन समझा जाऊँगा, बोलूँ तो पागलपन - फिर भी छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ, तात, विधाताको दोषी मानकर क्षमा कीजिएगा।

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥

वेद-शास्त्र-पुराणोंमें प्रसिद्ध है, सारा जगत जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामिधर्म और स्वार्थमें विरोध होता है, वैर अंधा होता है और प्रेमको होश नहीं रहता।

दोहा

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि२९३

इसलिए मुझे पराधीन मानकर, राम की रुचि और सत्यके व्रतको बनाए रखते हुए, जो सबको मान्य और सबके लिए हितकर हो, आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिए।

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥

भरतके यह वचन और स्वभाव देखकर राजा जनक समाजसहित उनकी सराहना करने लगे - भरतकी बात सुगम भी है, अगम भी, कोमल भी, कठोर भी - शब्द थोड़े पर अर्थ अपार।

ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥

जैसे मुखका प्रतिबिंब आईनेमें दिखता है, आईना हाथमें होते हुए भी वह पकड़ में नहीं आता - वैसे ही भरतकी यह अद्भुत बात भी समझमें आकर भी पकड़में नहीं आती। तब राजा जनक, भरत और मुनि समाजसहित वहाँ गए जहाँ देवतारूपी कुमुदोंको खिलानेवाले चंद्रमा राम थे।

सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥देव प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥

यह खबर सुनकर सब लोग चिंतासे व्याकुल हो उठे, जैसे नई बरसातके पानीसे मछलियाँ बेचैन होती हैं। देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्ठकी दशा देखी, फिर जनककी गहरी भावुकता देखी,

राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥

और फिर राम-भक्तिमें डूबे भरतको देखा। यह सब देखकर स्वार्थी देवता घबराकर हतोत्साहित हो गए, हर किसीको राम प्रेममें सराबोर पाया, और खुद इतनी चिंतामें डूब गए जिसका हिसाब ही नहीं।

दोहा

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु२९४

देवराज इंद्र चिंतित होकर बोले - राम तो स्नेह और संकोचके वश हैं, इसलिए सब मिलकर कोई तरकीब निकालो, नहीं तो काम बिगड़ा ही समझो।

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥

देवताओंने सरस्वतीका स्मरण करके उनकी स्तुति की - देवी, हम शरणागत हैं, रक्षा कीजिए, अपनी माया रचकर भरतकी बुद्धि पलट दीजिए और छलसे देवकुलकी रक्षा कीजिए।

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥

देवताओंकी यह विनती सुनकर और उन्हें स्वार्थवश मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वती बोलीं - मुझसे कहते हो भरतकी बुद्धि पलट दूँ? हजार आँखोंसे भी तुम्हें सुमेरु नहीं दिखता!

बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिवकी माया भी इतनी विशाल है, फिर भी वह भरतकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती - उसे तुम मुझसे भोली बनवाना चाहते हो? क्या चाँदनी कभी सूरजकी तेज किरणें चुरा सकती है?

भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥

भरतके हृदयमें तो सीता-रामका वास है, जहाँ सूरजका उजाला हो वहाँ अंधेरा कैसे टिकेगा? ऐसा कहकर सरस्वती ब्रह्मलोक चली गईं, देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रातमें चकवा तड़पता है।

दोहा

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु२९५

मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाहसे एक षड्यंत्र रचा, अपनी प्रबल मायासे भय, भ्रम, अनबन और उथल-पुथल फैला दी।

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥

यह कुचाल करके भी इंद्र चिंतित ही रहे कि सब कुछ भरतके ही हाथमें है। इधर जनक राम के पास पहुँचे, सूर्यकुलदीपक राम ने सबका सम्मान किया,

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥

तब समय, समाज और धर्मके अनुकूल वसिष्ठ बोले। उन्होंने पहले जनक-भरतका संवाद सुनाया, फिर भरतकी कही सुंदर बातें दोहराईं।

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥

तात राम, मेरा तो यही मत है कि तुम जो आज्ञा दो वही सब करें। यह सुनकर रघुनाथ हाथ जोड़कर सच्ची, सरल, कोमल वाणीमें बोले -

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥

आप और मिथिलेश्वर जनक स्वयं मौजूद हैं, ऐसेमें मेरा कुछ कहना अनुचित होगा। आप दोनोंकी जो भी आज्ञा होगी, मैं आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ, वही सबको शिरोधार्य होगी।

दोहा

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत२९६

राम की यह शपथ सुनकर मुनि और जनक सभासहित सकुचा गए, किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, सब भरतका मुँह ताकने लगे।

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी॥कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा॥

भरतने सभाको संकोचमें देखा, बड़ा धीरज धरकर और कुसमय जानकर अपने उमड़ते प्रेमको ऐसे सँभाला जैसे अगस्त्यने बढ़ते विंध्याचलको रोका था।

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥

शोकने सारी सभाकी विमल गुणोंसे भरी बुद्धिरूपी धरतीको हर लिया था, पर भरतके विवेकरूपी विशाल वराहने बिना किसी परिश्रमके उसे तुरंत उबार लिया।

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥

भरतने प्रणाम करके सबको हाथ जोड़े - राम, राजा जनक, गुरु और साधुओंसे विनती की - आज मेरे इस अनुचित व्यवहारको क्षमा करें, मैं छोटे मुँहसे कठोर बात कह गया।

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥

फिर उन्होंने हृदयमें सुंदर सरस्वतीका स्मरण किया, वे मानो उनके मनरूपी मानसरोवरसे मुखपर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे भरी भरतकी वाणी सुंदर हंसिनीके समान है।