षष्ठ सोपान — भाग 2

लंकाकाण्ड

सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥

सब योद्धाओ! चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानरोंको पकड़-पकड़कर खाओ—शिवजी कहते हैं, हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहरी पक्षी पैर ऊपर करके सोता है, मानो आकाशको थाम रखा हो।

चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरिखंडा॥

आज्ञा माँगकर राक्षस हाथोंमें उत्तम भिंदिपाल, साँगी, तोमर, मुद्गर, प्रचंड फरसे, त्रिशूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर निकल पड़े।

जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥

जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंके ढेरको मांस समझकर उसपर झपटते हैं, बिना यह सोचे कि इससे उनकी चोंच टूट जायगी—वैसे ही ये नासमझ राक्षस दौड़ पड़े।

दोहा

नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥४०

नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण थामे बलवान और रणधीर राक्षस वीरोंकी करोड़ोंकी संख्या परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गयी।

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥

वे परकोटेके कँगूरोंपर ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु पर्वतके शिखरोंपर बादल छाये हों। युद्धके ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, जिनकी ध्वनि सुनते ही योद्धाओंके मनमें उत्साह उमड़ आता है।

बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा॥

असंख्य भेरी-नफीरी बज रही हैं, जिन्हें सुनकर कायरोंके हृदयमें दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर देखा—विशालकाय वानर-भालू योद्धाओंके समूह-के-समूह जमा हैं।

धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥

रीछ-वानर दौड़ते हैं, ऊँची-नीची विकट घाटियोंकी परवाह नहीं करते, पर्वतोंको फोड़-फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते-गरजते हैं, दाँतोंसे होंठ काटकर खूब डपटते हैं।

उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥

उधर रावणकी और इधर श्रीरामकी दुहाई गूँज उठी, जय-जयकारके साथ ही युद्ध छिड़ गया। राक्षस पहाड़ोंके ढेरके ढेर शिखर फेंकते हैं, वानर उन्हें बीचमें ही कूदकर पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर फेंक देते हैं।

छंद

धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥

प्रचंड वानर-भालू पर्वतोंके टुकड़े उठाकर किलेपर पटकते हैं, झपटकर राक्षसोंके पैर पकड़ते हैं, उन्हें धरतीपर पछाड़कर भाग निकलते हैं और फिर ललकारते हैं। बड़े चंचल और तेजस्वी वानर-भालू फुर्तीसे उछल-उछलकर किलेपर चढ़ गये और महलों-महलोंमें घुसकर जहाँ-तहाँ श्रीरामका यशगान करने लगे।

दोहा

एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥४१

फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वानर भाग चले—ऊपर वानर और नीचे राक्षस योद्धा, इस तरह वे किलेसे धरतीपर आ गिरते हैं।

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥

श्रीरामके प्रतापसे बलशाली वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूहोंको मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किलेपर चढ़ गये और सूर्यके समान तेजस्वी श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे।

चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥

राक्षसोंके झुंड ऐसे भाग चले जैसे तेज हवा चलनेपर बादलोंके समूह बिखर जाते हैं। लंकामें भारी हाहाकार मच गया, बालक और घबरायी स्त्रियाँ रोने लगीं।

सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥

सब मिलकर रावणको कोसने लगे कि राज करते-करते इसने मृत्युको ही न्यौता दे दिया। जब रावणने सुना कि उसकी सेना भाग रही है, तो उसने भागते योद्धाओंको लौटाकर क्रोधसे कहा—

जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥

जो कोई रणसे पीठ दिखाकर भागा सुनूँगा, उसे अपनी भयानक तलवारसे स्वयं मार डालूँगा! अरे, इतने दिनों मेरा सब-कुछ खाकर, तरह-तरहके भोग भोगकर, अब रणभूमिमें आकर प्राण प्यारे हो गये!

उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा॥

रावणके ये कठोर वचन सुनकर सब भयभीत हुए, फिर लज्जित होकर क्रोधसे युद्धकी ओर लौट पड़े—यह सोचकर कि शत्रुके सामने डटकर मरना ही वीरकी शोभा है, उन्होंने प्राणोंका मोह त्याग दिया।

दोहा

बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी॥४२

तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र थामे सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे, और परिघ-त्रिशूलोंसे मार-मारकर रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया।

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! वानर भयसे घबराकर भागने लगे, यद्यपि आगे चलकर विजय उन्हींकी होनी थी। कोई पुकारता है—अंगद-हनुमान कहाँ हैं? बलवान नल-नील और द्विविद कहाँ हैं?

निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥

हनुमानने जब सुना कि अपना दल विचलित हो गया है, तब वे स्वयं पश्चिम द्वारपर डटे थे, जहाँ मेघनाद उनसे युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूट नहीं रहा था, बड़ी कठिनाई हो रही थी।

पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥

पवनपुत्रके मनमें भारी क्रोध उमड़ आया, वे काल-जैसे योद्धा जोरसे गरजे और कूदकर लंकाके किलेपर जा चढ़े, फिर पर्वत उठाकर मेघनादकी ओर दौड़े।

भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता॥दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥

उन्होंने उसका रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात जमायी। दूसरा सारथि मेघनादको विकल देखकर उसे तुरंत रथमें डालकर घर ले गया।

दोहा

अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥४३

इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र किलेपर अकेले चढ़ गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र भी वानरोंकी उछल-कूदसे किलेपर जा चढ़े।

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस _ दोहाई॥

युद्धमें शत्रुसे क्रुद्ध दोनों वानर हृदयमें श्रीरामके प्रतापका स्मरण करते हुए दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलाधीश श्रीरामकी दुहाई पुकारने लगे।

कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती॥

उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया, यह देखकर रावण भयभीत हो गया। स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं—अबकी बार दो उत्पाती वानर एकसाथ आ गये!

कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥

वानरलीला दिखाकर वे उन्हें डराते और श्रीरामका सुयश सुनाते रहे। फिर सोनेके खंभे पकड़कर दोनोंने कहा—अब असली उत्पात मचाया जाय।

गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥

वे गरजते हुए शत्रुसेनाके बीच कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसे रौंदने लगे। किसीको लातसे, किसीको थप्पड़से मारते और कहते—श्रीरामको नहीं भजते, यही इसका फल लो!

दोहा

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥४४

वे एकको दूसरेसे रगड़कर मसल डालते हैं और सिर तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर रावणके सामने जा गिरते हैं, मानो दहीके घड़े फूट रहे हों।

महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥

जो भी बड़े-बड़े मुखिया हाथ लगते, उनके पैर पकड़कर वे प्रभुके पास फेंक देते। विभीषण उनके नाम बताते और श्रीराम उन्हें भी अपना परमपद दे देते।

दोहा

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभक्षी दुष्ट राक्षस भी वही परमगति पाते हैं जिसे योगी भी तरसते हैं। कोमलहृदय, करुणाके सागर श्रीराम सोचते हैं कि राक्षस वैरभावसे ही सही, मुझे स्मरण तो करते हैं।

देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥

यही जानकर वे उन्हें परमगति दे देते हैं। हे भवानी! ऐसा कृपालु और कौन होगा! प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम अभागे हैं।

अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें॥

श्रीरामने कहा—अंगद और हनुमान किलेके भीतर घुस गये हैं। दोनों वानर लंकामें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों।

दोहा

भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥४५

भुजबलसे शत्रुसेनाको कुचल-मसलकर और दिनका अन्त होते देखकर, दोनों वीर थकानरहित होकर वहाँ कूद आये जहाँ भगवान श्रीराम विराजते थे।

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए॥राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे॥

उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाया। इन उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथका मन प्रसन्न हो उठा। श्रीरामने कृपापूर्वक दोनोंको निहारा, जिससे वे थकानरहित और परम सुखी हो गये।

गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना॥जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई॥

अंगद-हनुमानको जा चुका देखकर सब भालू-वानर वीर लौट पड़े। इधर राक्षसोंने साँझका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा बोल दिया।

निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे॥द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी॥

राक्षससेना आती देख वानर भी लौट पड़े, और योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये। दोनों ही दल बड़े बलशाली थे, योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते और कोई हार नहीं मानता था।

महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे॥सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा॥

सभी राक्षस महान वीर और घने काले रंगके थे, वानर विशालकाय और अनेक रंगोंके। दोनों दल समान बलके योद्धाओंसे भरे थे, वे क्रोधसे लड़ते हुए भी मानो कोई खेल खेल रहे हों।

प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे॥अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया॥

दोनों सेनाएँ यों भिड़ीं मानो वर्षा और शरदके घने बादल तेज हवासे टकरा रहे हों। अकंपन और अतिकाय नामके सेनापतियोंने अपनी सेनाको डगमगाते देखकर एक माया रच दी।

भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा॥

पलभरमें ही चारों ओर घोर अंधकार छा गया, और खून, पत्थर तथा राखकी वर्षा होने लगी।

दोहा

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥४६

दसों दिशाओंमें घना अंधकार देखकर वानरसेनामें खलबली मच गयी—कोई किसीको देख नहीं पा रहा था, सब जहाँ-तहाँ पुकार रहे थे।

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥

श्रीरघुनाथ सारा रहस्य समझ गये। उन्होंने अंगद-हनुमानको बुलाकर सब समाचार समझाया, जिसे सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोधित होकर दौड़ पड़े।

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥

फिर कृपालु श्रीरामने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत अग्निबाण छोड़ दिया, जिससे चारों ओर प्रकाश फैल गया और कहीं अंधेरा न रहा—जैसे ज्ञानका उदय होते ही सारे संशय मिट जाते हैं।

भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥

प्रकाश पाते ही भालू-वानर थकान-भय भुलाकर हर्षित होकर दौड़ पड़े। हनुमान-अंगद युद्धमें गरज उठे, उनकी हुंकार सुनते ही राक्षस भाग खड़े हुए।

भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥

भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर-भालू पकड़कर धरतीपर पटक देते हैं और तरह-तरहकी अद्भुत करामातें दिखाते हैं। वे उनके पैर पकड़कर समुद्रमें फेंक देते हैं, जहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जाते हैं।

दोहा

कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥४७

कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर किलेपर चढ़ गये। शत्रुदलको हिलाकर रीछ-वानर गरज-गरजकर विजयघोष करने लगे।

निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥

रात होते देख वानरोंकी चारों सेनाएँ वहाँ लौट आयीं जहाँ कोसलपति श्रीराम थे। श्रीरामने कृपादृष्टिसे सबकी ओर देखा और वे सब वानर तत्क्षण थकानरहित हो गये।

उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥

उधर लंकामें रावणने मन्त्रियोंको बुलाकर मारे गये योद्धाओंकी पूरी सूची सुनायी—वानरोंने आधी सेना ही खत्म कर दी, अब जल्दी बताओ क्या उपाय किया जाय?

माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥

माल्यवंत नामका अत्यन्त वृद्ध राक्षस, जो रावणका नाना और उसका श्रेष्ठ मन्त्री भी था, अत्यन्त पवित्र नीतिकी बात बोला—हे तात! जरा मेरी भी सीख सुन लो—

जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥

जबसे तूने सीताको हर लाया है, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं जिनका वर्णन ही नहीं हो सकता। वेद-पुराणोंने जिनका यशगान किया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर आजतक किसीने सुख नहीं पाया।

दोहा

हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥४८(क)

जिन्होंने भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान मधु-कैटभको मारा था, वे ही कृपासागर भगवान श्रीरामके रूपमें अवतरित हुए हैं।

दोहा

कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥४८(ख)

जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके वनको भस्म करनेवाली अग्नि हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, जिनकी सेवा स्वयं शिव और ब्रह्मा भी करते हैं—उनसे भला वैर कैसा?

परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे॥

इसलिये वैर छोड़कर जानकीजीको लौटा दो और उन परम स्नेही कृपानिधानका भजन करो। माल्यवंतके ये वचन रावणको बाणकी तरह चुभ गये—अरे अभागे! मुँह काला करके यहाँसे चला जा!

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥

तू बूढ़ा हो गया है, नहीं तो अभी तुझे मार डालता—अब दुबारा मुझे अपना मुँह मत दिखाना। रावणके ये वचन सुनकर माल्यवंतने मनमें समझ लिया कि कृपानिधान श्रीराम अब इसे मारना ही चाहते हैं।

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥

वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधसे बोला—सबेरे मेरी करामात देखना, मैं इतना कुछ कर दिखाऊँगा कि थोड़ा कहना भी कम होगा।

सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥

पुत्रके ये वचन सुनकर रावणको ढाढ़स बँधा, उसने प्रेमसे उसे गोदमें बिठा लिया। यों विचार करते-करते सबेरा हो गया, और वानर फिर चारों द्वारोंपर जा डटे।

कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥

वानरोंने क्रोधमें आकर उस दुर्गम किलेको घेर लिया, नगरमें भारी कोलाहल मच गया। राक्षस तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े और किलेसे पर्वत-शिखर ढहाने लगे।

छंद

ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥

उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहा दिये, अनेक प्रकारके गोले चलने लगे, जो वज्रपातकी तरह घहराते और प्रलयके बादलोंकी तरह गरजते हैं। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं, शरीर छलनी हो जाते हैं फिर भी हिम्मत नहीं हारते—वे पर्वत उठाकर किलेपर फेंकते रहते हैं, जिससे राक्षस जहाँ-के-तहाँ ढेर होते जाते हैं।

दोहा

मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ।उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥४९

मेघनादने सुना कि वानरोंने फिर आकर किला घेर लिया है, तो वह वीर किलेसे उतरकर डंका बजाता हुआ उनके सामने आ डटा।

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥

उसने पुकारकर कहा—समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अंगद-हनुमान कहाँ हैं?

कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥

भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको और उसे भी हठपूर्वक मारूँगा! ऐसा कहकर उसने अत्यन्त क्रोधमें धनुषपर कठिन बाण चढ़ाकर कानतक खींच लिया।

सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥

वह बाणोंकी झड़ी लगाने लगा, मानो बहुतसे पंखवाले साँप उड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी देने लगे, कोई भी उस समय उसके सामने टिक न सका।

जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥

रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए, सबकी युद्धकी इच्छा जाती रही। रणभूमिमें ऐसा कोई वानर या भालू नहीं बचा जिसे उसने घायल न किया हो।

दोहा

दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥५०

फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर धरतीपर गिर पड़े। बलवान और धीर मेघनाद सिंहगर्जना करते हुए दहाड़ने लगा।

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥

सारी सेना बेहाल देखकर पवनपुत्र हनुमान क्रोधसे ऐसे दौड़े मानो साक्षात काल दौड़ा आ रहा हो। उन्होंने तुरंत एक विशाल पर्वत उखाड़ लिया और उसे बड़े क्रोधसे मेघनादपर फेंक दिया।

आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥

पर्वतको आता देख वह आकाशमें उड़ गया, उसका रथ, सारथि और घोड़े सब चकनाचूर हो गये। हनुमान उसे बार-बार ललकारते रहे, पर वह निकट न आया क्योंकि वह उनके बलका भेद जानता था।

रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥

फिर मेघनाद श्रीरामके पास गया और उन्हें कई तरहसे दुर्वचन कहे, और अपने सारे अस्त्र-शस्त्र उनपर छोड़ दिये। प्रभुने खेल-खेलमें ही सबको काटकर हटा दिया।

देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥

श्रीरामका यह प्रताप देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेक प्रकारकी माया रचने लगा—जैसे कोई नन्हा साँप हाथमें लेकर गरुड़को डराने और उससे खेलने की कोशिश करे।

दोहा

जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट।ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥५१

शिव-ब्रह्मा जैसे बड़े-छोटे सभी जिस प्रबल मायाके वशमें हैं, वही नीचबुद्धि राक्षस अपनी माया उन्हींको दिखा रहा है!

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥

वह आकाशमें चढ़कर बहुत-से अंगारे बरसाने लगा, धरतीसे जलकी धाराएँ फूट पड़ीं, और अनेक पिशाच-पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर "मारो, काटो" चिल्लाने लगीं।

बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥

वह कभी विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता, कभी ढेरों पत्थर फेंकता। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा घोर अंधकार कर दिया कि अपना ही फैलाया हाथ नहीं दिखता था।

कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें॥कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥

यह माया देखकर वानर घबरा उठे—लगा जैसे अब सबका अन्त निश्चित है। यह देखकर श्रीराम मुसकराये, वे जान गये कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।

एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥

तब उन्होंने एक ही बाणसे सारी मायाको वैसे ही काट डाला जैसे सूर्य अंधकारको हर लेता है। फिर उन्होंने वानर-भालुओंपर कृपादृष्टि डाली, जिससे वे इतने प्रबल हो गये कि रणमें रोके न रुकते थे।

दोहा

आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥५२

श्रीरामसे आज्ञा लेकर लक्ष्मण अंगद आदि वानरोंको साथ लिये, हाथोंमें धनुष-बाण थामे क्रोधसे भरकर आगे बढ़े।

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥

उनके लाल नेत्र, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, हिमाचलकी तरह गौरवर्ण शरीरमें हल्की ललाई है। इधर रावणने भी अपने बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़ पड़े।

भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥

पर्वत, नाखून और वृक्षोंको ही हथियार बनाये वानर "श्रीरामकी जय" पुकारते हुए दौड़े। दोनों ओरसे जोड़ी-जोड़ी भिड़ गये, दोनों ही पक्ष विजयके लिये उतने ही उतावले थे।

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥

वानर उन्हें घूँसों-लातोंसे मारते, दाँतोंसे काटते, और मारकर फिर डाँटते भी—"मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार डालो, सिर तोड़ दो, भुजा उखाड़ लो!"

असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥

ऐसी हुंकार नवों खंडोंमें गूँज उठी, कटे हुए धड़ जहाँ-तहाँ इधर-उधर दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह तमाशा देख रहे हैं—कभी विस्मित होते हैं, कभी आनन्दित।

दोहा

रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥५३

गड्ढोंमें खून भर-भरकर जम गया, ऊपरसे धूल उड़-उड़कर उसपर बिछ गयी—मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छायी हो।

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे॥लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥

घायल वीर ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो फूले हुए पलासके वृक्ष हों। इधर लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोधसे एक-दूसरेसे भिड़ गये।

एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥

दोनोंमें कोई एक-दूसरेको जीत नहीं पा रहा था, तब राक्षस छल-बल और अनीतिपर उतर आया। यह देख शेषावतार लक्ष्मण क्रोधित हो उठे और तुरंत उसका रथ तोड़कर सारथिको मार डाला।

नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥

लक्ष्मण उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे, राक्षसके प्राण बस कंठतक आ पहुँचे। मेघनादने मनमें समझ लिया—अब तो प्राणसंकट आ गया, ये मेरे प्राण हर ही लेंगे।

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी॥मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥

तब उसने वीरघातिनी शक्ति चला दी, वह तेजस्वी शक्ति लक्ष्मणकी छातीमें जा लगी। शक्तिके लगते ही उन्हें मूर्छा आ गयी, तब मेघनाद निर्भय होकर उनके पास चला गया।

दोहा

मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।जगदाधार सेष किमि उठे चले खिसिआइ॥५४

मेघनादके समान करोड़ों योद्धा मिलकर लक्ष्मणको उठानेकी कोशिश करते रहे, पर जगत्के आधार शेषावतार भला कैसे उठते? अंततः वे लज्जित होकर लौट गये।

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥

शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! जिनके क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको पल भरमें जला सकती है, और देवता-मनुष्य-चराचर सब जिनकी सेवा करते हैं, उन्हें युद्धमें भला कौन जीत सकता है?

यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम के होई॥संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥

इस रहस्यको वही समझ सकता है जिसपर श्रीरामकी कृपा हो। संध्या होते ही दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं, सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे।

ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥

सर्वव्यापी, ब्रह्मस्वरूप, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्मांडके स्वामी और करुणाके सागर श्रीरामने पूछा—लक्ष्मण कहाँ हैं? तभीतक हनुमान उन्हें ले आये, छोटे भाईकी यह दशा देखकर प्रभुको बड़ा दुःख हुआ।

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥

जाम्बवानने कहा—लंकामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे लानेके लिये किसे भेजा जाय? हनुमान तुरंत छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत ही उठा लाये।

दोहा

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥५५

सुषेणने आकर श्रीरामके चरणकमलोंमें सिर नवाया, फिर उसने पर्वत और औषधिका नाम बताया—हे पवनपुत्र! जाकर वह औषधि ले आओ।

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी॥उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा॥

श्रीरामके चरणकमलोंको हृदयमें बसाकर पवनपुत्र अपना बल जताते हुए चल पड़े। उधर एक गुप्तचरने रावणको यह रहस्य बता दिया, तब रावण कालनेमिके घर पहुँचा।

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥

रावणने उसे सारा हाल बताया, यह सुनकर कालनेमिने बार-बार सिर पीट लिया—तुम्हारे देखते-देखते जिसने पूरा नगर जला डाला, उसका रास्ता कौन रोक सकता है?

भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥

श्रीरघुनाथका भजन करके अपना कल्याण कर लो, हे नाथ! अब झूठी बकवास छोड़ दो। नेत्रोंको सुख देनेवाले नीलकमल-जैसे सुन्दर श्यामवर्णको हृदयमें बसा लो।

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥

मैं-तू और ममताकी यह मूर्खता त्याग दो, महामोहकी इस नींदसे जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, भला उसे स्वप्नमें भी युद्धमें जीता जा सकता है?

दोहा

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥५६

यह सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हुआ, तब कालनेमिने मनमें सोचा—इसके हाथों मरनेकी बजाय श्रीरामके दूतके हाथों मरना ही अच्छा है, यह दुष्ट तो पापोंके बोझमें ही डूबा हुआ है।

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥

ऐसा सोचकर वह चल पड़ा और मार्गमें माया रचकर एक तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बना दिया। हनुमानने वह सुन्दर आश्रम देखा और सोचा—मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकान मिट जाय।

राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥

राक्षस वहाँ कपटी मुनिका वेश धरे बैठा था, वह मायावी दूतको भी मोहमें फँसाना चाहता था। हनुमानने पास जाकर मस्तक नवाया, तो वह श्रीरामके गुणोंकी कथा सुनाने लगा।

होत महा रन रावन रामहिं। जितहहिं राम न संसय या महिं॥इहाँ भए मैं देखेउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥

उसने कहा—रावण और रामके बीच घोर युद्ध चल रहा है, इसमें सन्देह नहीं कि जीत श्रीरामकी ही होगी। भाई, मैं यहीं बैठा सब कुछ देख रहा हूँ, मुझे ज्ञानदृष्टिका बड़ा बल प्राप्त है।

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥

हनुमानने उससे जल माँगा तो उसने कमंडल थमा दिया। हनुमानने कहा—इतने थोड़े जलसे मेरी प्यास नहीं बुझेगी। तब वह बोला—पहले तालाबमें स्नान करके लौट आओ, फिर मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा जिससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त हो।

दोहा

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥५७

हनुमान जैसे ही तालाबमें उतरे, एक मगरीने घबराकर उनका पैर पकड़ लिया। हनुमानने उसे मार डाला, तो वह दिव्य देह धारण कर विमानपर चढ़कर आकाशमें उड़ चली।

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥

उसने कहा—हे वानर! तुम्हारे दर्शनमात्रसे मैं पापमुक्त हो गयी, तात, मुझे मुनिवरका शाप छूट गया। यह कोई मुनि नहीं, घोर राक्षस है—मेरी बात सच मानो।

अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू॥

ऐसा कहकर ज्योंही वह अप्सरा चली गयी, त्योंही हनुमान उस राक्षसके पास पहुँचे। हनुमानने कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये, फिर मुझे मन्त्र दीजियेगा।

सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥

हनुमानने उसका सिर अपनी पूँछमें लपेटकर उसे पटक दिया। मरते समय उसने अपना असली राक्षसी रूप प्रकट किया और "राम-राम" कहते हुए प्राण त्याग दिये। यह सुनकर हनुमान मनमें प्रसन्न होकर आगे बढ़े।

देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥

उन्होंने पर्वत तो देखा, पर औषधि पहचान न सके। तब हनुमानने तुरंत पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, और उसे लेकर रातके अंधेरेमें आकाशमार्गसे उड़ते हुए अयोध्यापुरीके ऊपर जा पहुँचे।

दोहा

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥५८

भरतने आकाशमें यह अत्यन्त विशाल आकृति देखी, तो मनमें अनुमान लगाया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुष खींचकर बिना फलका एक बाण चलाया।

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥

बाण लगते ही हनुमान "राम, राम, रघुनायक" रटते हुए मूर्छित होकर धरतीपर गिर पड़े। यह प्रिय नाम सुनकर भरत तुरंत उठकर बड़ी उतावलीसे हनुमानके पास दौड़े आये।

बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥

उन्हें व्याकुल देखकर भरतने हृदयसे लगा लिया, बहुत तरहसे जगाया पर वे जागे नहीं। तब भरतका मुख उदास हो गया, मनमें बहुत दुखी होकर आँखोंमें आँसू भरकर वे बोले—

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥

जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने यह भयानक दुःख भी दिया है। यदि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो,

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥

और यदि श्रीरघुनाथ मुझपर प्रसन्न हों, तो यह वानर थकान और पीड़ासे मुक्त हो जाय! यह वचन सुनते ही हनुमान "कोसलाधीश श्रीरामकी जय, जय हो" कहते हुए उठ बैठे।

सोरठा

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥५९

भरतने हनुमानको हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रोंमें आँसू छलक आये। रघुकुलतिलक श्रीरामका स्मरण करते ही उनके हृदयमें प्रेम समाता न था।

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥

भरतने पूछा—हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण और माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामकी कुशल तो कहो। हनुमानने सारी कथा संक्षेपमें सुनायी, सुनकर भरत दुखी होकर मनमें पछताने लगे।

अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥

हाय! मैं जगत्में क्यों जन्मा, प्रभुके किसी भी काम न आ सका! फिर असमय जानकर मनमें धैर्य धारण करके बलवीर भरत हनुमानसे बोले—

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥

हे तात! तुम्हें जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही सारा काम बिगड़ जायगा। इसलिये पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुम्हें वहीं भेज दूँगा जहाँ कृपानिधान श्रीराम हैं।

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥

यह सुनकर हनुमानके मनमें क्षणभर अभिमान उठा कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? पर फिर श्रीरामके प्रभावका विचार करके उन्होंने भरतके चरणोंकी वन्दना कर हाथ जोड़कर कहा—

दोहा

तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत।अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥६०(क)

हे नाथ! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर अभी चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा लेकर, भरतके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान चल पड़े।

दोहा

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥६०(ख)

भरतके बाहुबल, शील, गुण और श्रीरामके चरणोंमें उनके अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए पवनपुत्र आगे बढ़ते जा रहे थे।

उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥अर्ध राति गई कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥

उधर लक्ष्मणकी यह दशा देखकर श्रीराम एक साधारण मनुष्यकी तरह विलाप करने लगे—आधी रात बीत गयी, हनुमान अभी तक नहीं लौटे। ऐसा कहकर उन्होंने लक्ष्मणको उठाकर हृदयसे लगा लिया।

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥

और बोले—हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे, तुम्हारा स्वभाव सदा ही कोमल रहा है। मेरे लिये ही तुमने माता-पिताको छोड़ा और वनमें जाड़ा-गरमी-हवा सब कुछ सहा।

सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥

हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ चला गया? मेरी व्याकुल पुकार सुनकर भी क्यों नहीं उठते? यदि मुझे पता होता कि वनमें तुमसे बिछड़ना पड़ेगा, तो मैं पिताकी आज्ञा भी न मानता।

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥

पुत्र, धन, पत्नी, घर और परिवार तो संसारमें बार-बार मिलते-बिछड़ते रहते हैं, पर सगा भाई फिर नहीं मिलता। यह सोचकर हे तात! जागो।

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥

जैसे पंखके बिना पक्षी, मणिके बिना सर्प और सूँड़के बिना गजराज अत्यन्त दीन हो जाते हैं, वैसे ही हे भाई! यदि विधाता मुझे तुम्हारे बिना जीवित रखे, तो मेरा जीवन भी वैसा ही निरर्थक होगा।

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥

स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर मैं किस मुँहसे अयोध्या जाऊँगा? संसारमें बदनामी तो मैं सह लेता, स्त्रीकी हानिमें कोई बड़ी बात नहीं थी।

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥

पर अब हे पुत्र! मेरा यह निष्ठुर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों साथ-साथ सहेगा। तुम अपनी माताके इकलौते पुत्र और उसके प्राणाधार हो।

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥

उन्होंने तुम्हें सब तरहसे सुखद और परम हितकारी समझकर ही मेरे हाथमें सौंपा था, अब मैं जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! उठकर मुझे क्यों नहीं समझाते?

बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥

दुःखहर्ता श्रीराम इस तरह बहुत सोच रहे थे, उनके कमलदल-जैसे नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रीरघुनाथ तो एक और अखंड हैं, भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवानने यह मनुष्यकी लीला दिखायी है।

सोरठा

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥६१

प्रभुका यह विलाप सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो उठे, तभी हनुमान आ पहुँचे—मानो करुणरसमें अचानक वीररस प्रकट हो गया हो।

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥

श्रीराम हर्षित होकर हनुमानसे गले मिले, प्रभु परम सुजान और अत्यन्त कृतज्ञ हैं। तब वैद्यने तुरंत उपचार किया, जिससे लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे।

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥

प्रभुने भाईको हृदयसे लगाकर मिलाया, सब भालू-वानर हर्षित हो उठे। फिर हनुमानने वैद्यको उसी तरह वापस पहुँचा दिया जिस तरह पहले उन्हें ले आये थे।

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥

यह समाचार जब रावणने सुना, तो वह अत्यन्त शोकसे बार-बार सिर पीटने लगा। व्याकुल होकर वह कुम्भकर्णके पास गया और अनेक उपाय करके उसे जगाया।

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥

कुम्भकर्ण जागा तो ऐसा दिखा मानो स्वयं काल शरीर धरकर बैठा हो। उसने पूछा—भाई, बताओ तो, तुम्हारा मुँह क्यों सूखा हुआ है?

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे॥

अभिमानी रावणने सीता हरण करनेसे लेकर अबतककी सारी कथा उसे सुनायी—हे तात! वानरोंने हमारे सब राक्षस मार डाले, बड़े-बड़े योद्धाओंतकका संहार कर डाला।

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥

दुर्मुख, देवान्तक, नरान्तक, विशाल योद्धा अतिकाय, अकंपन और महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे जा चुके हैं।

दोहा

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥६२

यह सुनकर कुम्भकर्ण दुखी होकर बोला—अरे मूर्ख! जगज्जननी सीताको हरकर अब तू कल्याण चाहता है?

भल न कीन्ह तें निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥

हे राक्षसराज! तूने यह अच्छा नहीं किया, अब मुझे जगाकर क्या लाभ हुआ? हे तात! अब भी अभिमान त्यागकर श्रीरामको भज ले, कल्याण होगा।

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥अहह बंधु तें कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥

जिनके हनुमान-जैसे सेवक हैं, वे श्रीराम भला मनुष्य कैसे हो सकते हैं? हाय भाई! तूने बड़ी भूल की कि पहले ही आकर यह हाल मुझे नहीं सुनाया।

कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा॥

तूने उस परम देवताका विरोध कर लिया जिसके शिव, ब्रह्मा जैसे देवता भी सेवक हैं। नारदमुनिने मुझे जो ज्ञान दिया था, वह तुझे बताता, पर अब समय ही नहीं रहा।

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई॥स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥

अब तो हे भाई! अंतिम बार मुझे भरपूर अँकवारमें भर ले, मैं जाकर अपने नेत्र सफल कर लूँ। तीनों तापोंको हरनेवाले श्यामवर्ण, कमलनयन श्रीरामके दर्शन करने जाता हूँ।

दोहा

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥६३

श्रीरामके रूप-गुणका स्मरण करते ही वह क्षणभरके लिये प्रेममें मगन हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये।

महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर कुम्भकर्ण वज्रपातकी तरह गरज उठा। मदमत्त और युद्धोत्साहसे भरा वह सेनाको साथ लिये बिना ही अकेला किला छोड़कर चल पड़ा।

देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥

उसे देखकर विभीषण आगे बढ़े और उसके चरणोंमें गिरकर अपना नाम बताया। उसने छोटे भाईको उठाकर हृदयसे लगा लिया—श्रीरघुनाथका भक्त जानकर विभीषण उसके मनको बहुत भाये।

तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥

विभीषणने कहा—हे तात! परम हितकी सलाह देनेपर रावणने मुझे लात मारी थी। उसी ग्लानिसे मैं श्रीरघुनाथके पास चला आया, और दीन जानकर प्रभुके मनको मैं प्रिय लगा।

सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥धन्य धन्य तें धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥

कुम्भकर्णने कहा—हे पुत्र! सुन, रावण अब कालके वशमें आ चुका है, वह भला अब उत्तम शिक्षा कैसे मानेगा? हे विभीषण! तू धन्य है, तू ही राक्षसकुलका सच्चा भूषण बना है।

बंधु बंस तें कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥

हे भाई! तूने श्रीराम-जैसे शोभा और सुखके सागरको भजकर अपने कुलको उजागर कर दिया।

दोहा

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥६४

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामका भजन करते रहना। अब मैं कालके वशमें आ चुका हूँ, मुझे अपना-पराया कुछ नहीं सूझ रहा, इसलिये तुम अभी यहाँसे चले जाओ।

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥

भाईकी यह बात सुनकर विभीषण लौट चले और वहाँ पहुँचे जहाँ त्रिलोकभूषण श्रीराम विराजते थे। उन्होंने कहा—हे नाथ! पर्वत-जैसे विशाल शरीरवाला रणधीर कुम्भकर्ण चला आ रहा है।

एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥

वानरोंने जब इतना ही सुना, तो बलवान वानर हर्षध्वनि करते हुए दौड़ पड़े और वृक्ष-पर्वत उखाड़कर दाँत पीसते हुए उसपर बरसाने लगे।

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥

रीछ-वानर एक ही बारमें करोड़ों पर्वत-शिखर उसपर दे मारते हैं, पर न तो उसका मन विचलित होता है, न शरीरपर कोई असर पड़ता है—जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीको कुछ भी नहीं होता।

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परथो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥

तब हनुमानने उसे एक जोरदार घूँसा मारा, जिससे वह व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उठकर उसने हनुमानको ऐसा मारा कि वे चक्कर खाकर तुरंत धरतीपर गिर पड़े।

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥

फिर उसने नल-नीलको भी धरतीपर पछाड़ दिया, और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर गिरा दिया। वानरसेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई, कोई उसके सामने नहीं टिक सका।

दोहा

अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥६५

फिर वह सुग्रीवसमेत अंगद आदि सभी वानरोंको मूर्छित करके, अपार बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दबाकर आगे बढ़ चला।

उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रीरघुनाथ ऐसे मनुष्यलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ साँपोंके झुंडमें घुसकर खेल रहा हो। जो भौंहके इशारेभरसे कालको भी निगल जाते हैं, उन्हें भला ऐसी लड़ाई क्या शोभा देती है?

जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥मुरुछा गई मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥

भगवान इस लीलाके द्वारा वह जगत्को पवित्र करनेवाली कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे पार हो जायँगे। इतनेमें मूर्छा टूटी और हनुमान जाग उठे, फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे।

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥

सुग्रीवकी भी मूर्छा टूट गयी, तब वे चुपचाप खिसक गये और कुम्भकर्णने उन्हें मरा हुआ ही समझा। सुग्रीवने दाँतोंसे उसके नाक-कान काट लिये और गरजते हुए आकाशकी ओर उड़ चले, तब कुम्भकर्णको असलियत पता चली।

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥

उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उन्हें धरतीपर पछाड़ दिया, पर सुग्रीव फुर्तीसे उठकर उसे मारकर प्रभुके पास आ गये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो!

नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥

नाक-कान कटे जानकर कुम्भकर्णको बड़ी ग्लानि हुई, वह क्रोधसे भरकर लौटा। वैसे ही वह स्वभावसे भयंकर था, अब बिना नाक-कानके तो और भी भयानक दिखने लगा—उसे देखते ही वानरसेनामें भय फैल गया।

दोहा

जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥६६

"रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो" ऐसी पुकार लगाकर वानर हुँकार भरते हुए दौड़े और सबने एक साथ ही उसपर पर्वत और वृक्षोंके समूह बरसा दिये।

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥

रणके नशेमें चूर कुम्भकर्ण उनके सामने ऐसे बढ़ा मानो क्रोधित काल ही चला आ रहा हो। वह करोड़ों वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर निगलने लगा, मानो पर्वतकी गुफामें टिड्डियाँ समा रही हों।

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥

उसने करोड़ों वानरोंको पकड़कर शरीरसे ही मसल डाला, करोड़ोंको हाथोंसे मलकर धूलमें मिला दिया। भालू-वानरोंके झुंड-के-झुंड उसके मुँह, नाक और कानोंके रास्ते निकल-निकलकर भाग रहे हैं।

रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥

युद्धके मदमें चूर वह राक्षस ऐसा इतरा उठा मानो विधाताने पूरा विश्व ही उसे निगलनेके लिये सौंप दिया हो। सब योद्धा भागते ही जा रहे हैं, लौटाये भी नहीं लौटते, आँखोंसे कुछ सूझता नहीं, पुकारनेपर भी सुनते नहीं।

कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥

कुम्भकर्णने वानरसेनाको तितर-बितर कर दिया, यह सुनकर राक्षससेना भी दौड़ पड़ी। श्रीरामने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना चढ़ आयी है।

दोहा

सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥६७

कमलनयन श्रीरामने कहा—हे सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण! सुनो, तुम सब सेनाको सँभालो, मैं स्वयं इस दुष्टके बल और उसकी सेनाको देख लेता हूँ।

कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥

हाथमें धनुष और कमरमें तरकस सजाकर श्रीरघुनाथ शत्रुसेनाका दलन करने चले। प्रभुने पहले धनुषकी टंकार की, जिसकी भयानक ध्वनि सुनते ही शत्रुसेना बहरी हो गयी।

सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥

फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामने एक लाख बाण छोड़े, जो पंखवाले कालसर्पोंकी तरह चले। जहाँ-तहाँ अनगिनत बाण चले, जिनसे भयानक राक्षस योद्धा कटने लगे।

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥

उनके चरण, छाती, सिर और भुजाएँ कट रही हैं, अनेक वीरोंके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खाकर धरतीपर गिरते हैं, फिर सँभलकर उठते हैं और फिर लड़ते हैं।

लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं॥

बाण लगते ही वे बादलकी तरह गरजते हैं, कई तो कठिन बाण देखते ही भाग खड़े होते हैं। बिना सिरके प्रचंड धड़ दौड़ रहे हैं और "पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो" चिल्ला रहे हैं।

दोहा

छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥६८

प्रभुके बाणोंने पलभरमें ही भयानक राक्षससेनाको काट डाला, फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथके तरकसमें वापस जा समाये।

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी॥भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥

कुम्भकर्णने मनमें देखा कि श्रीरामने क्षणभरमें राक्षससेनाका संहार कर दिया। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित होकर गम्भीर सिंहगर्जना करने लगा।

कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥

वह क्रोधसे पर्वत उखाड़ लेता और जहाँ भारी वानर योद्धा होते वहीं फेंक देता। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देख प्रभुने उन्हें बाणोंसे काटकर धूलकी तरह चूर-चूर कर दिया।

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥

फिर श्रीरघुनाथने क्रोधसे धनुष तानकर अत्यन्त भयानक बाण छोड़े, जो कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर उसी तरह पार निकल गये जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं।

सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥

उसके काले शरीरसे बहता रक्त ऐसा शोभित हो रहा है मानो काजलके पर्वतसे गेरूकी धाराएँ बह रही हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े, पर वे निकट आते ही वह हँस पड़ा।

दोहा

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥६९

फिर वह घोर गर्जना करके करोड़ों वानरोंको पकड़-पकड़कर गजराजकी तरह धरतीपर पटकने लगा और रावणकी जय-जयकार करने लगा।

भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।॥चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥

यह देखकर भालू-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़ियेको देखकर भेड़ोंके झुंड भागते हैं। शिवजी कहते हैं—हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तस्वरमें पुकारते हुए भाग खड़े हुए।

यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥

वे कहने लगे—यह राक्षस तो अकालकी तरह है, जो अब वानरकुलरूपी देशको ही उजाड़ना चाहता है। हे कृपाके मेघ, खरके शत्रु श्रीराम! हे शरणागतका दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥

यह करुणाभरी पुकार सुनते ही भगवान धनुष-बाण सँभालकर चल पड़े। महाबलशाली श्रीरामने सेनाको अपने पीछे रखकर स्वयं क्रोधपूर्वक आगे बढ़े।

खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥

उन्होंने धनुष खींचकर सौ बाण छोड़े, जो सीधे उसके शरीरमें जा समाये। बाण लगते ही वह क्रोधसे भरकर दौड़ा, जिससे पर्वत डगमगाने और धरती हिलने लगी।

लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी॥धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥

उसने एक पर्वत उखाड़ लिया, तो रघुकुलतिलक श्रीरामने उसकी वही भुजा काट डाली। वह बायें हाथमें पर्वत उठाकर फिर दौड़ा, प्रभुने वह भुजा भी काटकर धरतीपर गिरा दी।

काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका॥

दोनों भुजाएँ कट जानेपर वह दुष्ट ऐसा दिखने लगा जैसे बिना पंखोंका मन्दराचल पर्वत। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा, मानो तीनों लोकोंको ही निगल जाना चाहता हो।

दोहा

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥७०

वह घोर चीत्कार करते हुए मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता भयभीत होकर "हा! हा!" पुकार उठे।

सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो॥बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥

करुणानिधान प्रभुने देवताओंको भयभीत जाना, तब धनुषको कानतक खींचकर उसके मुँहको बाणोंसे भर दिया। फिर भी वह महाबली धरतीपर नहीं गिरा।

सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥

मुँह बाणोंसे भरा होने पर भी वह सामने दौड़ा, मानो कालरूपी सजीव तरकस ही चला आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोधसे एक तीक्ष्ण बाण लेकर उसका सिर धड़से अलग कर दिया।

सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥

वह सिर रावणके सामने जा गिरा, जिसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि खो देनेपर साँप। कुम्भकर्णका प्रचंड धड़ दौड़ता रहा, जिससे धरती धँसती जा रही थी, तब प्रभुने उसे काटकर दो टुकड़े कर दिये।

परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥

वे दोनों टुकड़े वानर-भालू और राक्षसोंको अपने नीचे दबाते हुए धरतीपर ऐसे गिरे मानो आकाशसे दो पर्वत गिरे हों। उसका तेज प्रभुके मुखमें जा समाया, यह देखकर देवता और मुनि सब आश्चर्यचकित रह गये।

सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥

देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे। विनती करके सब देवता चले गये, उसी समय देवर्षि नारद आ पहुँचे।

गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥

उन्होंने आकाशसे श्रीहरिके वीररसभरे गुणोंका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब शीघ्र ही दुष्ट रावणका वध कीजिये—श्रीराम रणभूमिमें ऐसे सुशोभित हुए।

छंद

संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥

अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथ रणभूमिमें सुशोभित हैं, मुखपर पसीनेकी बूँदें और कमलनयनोंमें हल्की लाली है, शरीरपर रक्तके छींटे हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण घुमा रहे हैं और चारों ओर रीछ-वानर शोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छविका वर्णन तो हजार मुखवाले शेषजी भी नहीं कर सकते।

दोहा

निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥७१

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजे! जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उस कुम्भकर्णको भी श्रीरामने अपना परमधाम दे दिया! अतः जो मनुष्य उन श्रीरामको नहीं भजते, वे निश्चय ही मन्दबुद्धि हैं।

दिन के अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥

दिनका अन्त होते ही दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं, आज योद्धाओंको बड़ी थकान हुई। पर श्रीरामकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी तरह बढ़ गया जैसे घास पाकर आग और भी भड़क उठती है।

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥

उधर राक्षस दिन-रात इस तरह घटते जा रहे हैं जैसे अपने ही मुँहसे पुण्य बखाननेपर पुण्य घटता है। रावण बहुत विलाप कर रहा है, बार-बार भाई कुम्भकर्णका सिर छातीसे लगाता है।

रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥

स्त्रियाँ उसके तेज-बलका बखान करते हुए छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद वहाँ आया और उसने कई बातें कहकर पिताको समझाया।

देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥

और कहा—कल मेरा पराक्रम देखियेगा, अभी बहुत बड़ाई करनेकी क्या जरूरत! हे तात! मुझे अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ मिला है, वह अबतक आपको नहीं दिखाया था।

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥

इस तरह डींग हाँकते-हाँकते सबेरा हो गया। लंकाके चारों द्वारोंपर बहुतसे वानर जा डटे—इधर काल-जैसे वीर वानर-भालू और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस।

लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥

दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी विजयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उस युद्धका वर्णन करना असंभव है।

दोहा

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥७२

मेघनाद अपने मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें जा पहुँचा और जोरसे अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरसेनामें भय फैल गया।

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥

वह शक्ति, त्रिशूल, तलवार, कृपाण आदि तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगा, और फरसे, परिघ, पत्थर फेंकने तथा बाणोंकी झड़ी लगाने लगा।

दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥

दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। "पकड़ो, पकड़ो, मारो" की आवाजें कानोंमें पड़ती हैं, पर मारनेवाला कौन है, यह कोई नहीं जान पाता।

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥

पर्वत और वृक्ष लेकर वानर आकाशमें दौड़ते हैं, पर उसे देख नहीं पाते और दुखी होकर लौट आते हैं—मेघनादने अपनी मायासे विकट घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंसे भर दिया था।

जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥

कहाँ जायँ, यह न सूझनेसे वानर व्याकुल हो उठे, मानो इन्द्रकी कैदमें पड़े पर्वत हों। मेघनादने हनुमान, अंगद, नल और नील—सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया।

पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥

फिर उसने लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषणको भी बाणोंसे बींधकर उनके शरीर छलनी कर दिये। फिर वह श्रीरघुनाथसे भी युद्ध करने लगा—उसके छोड़े बाण साँप बनकर लगते।

ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥

जो सर्वथा स्वतंत्र, अनंत, अखंड और निर्विकार हैं, वे खरारि श्रीराम लीलावश नागपाशमें बँध गये। श्रीराम तो सदा स्वतंत्र, अद्वितीय भगवान ही हैं, वे नटकी तरह अनेक दिखावटी लीलाएँ रचते हैं।

रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥

रणकी शोभाके लिये ही मानो प्रभुने स्वयंको नागपाशमें बँधा लिया, पर इससे देवताओंमें भारी भय फैल गया।

दोहा

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥७३

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि जन्म-मृत्युके बन्धन काट डालते हैं, वे सर्वव्यापी और विश्वके आधार प्रभु भला किसी बन्धनमें कैसे बँध सकते हैं?

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥

हे भवानी! श्रीरामकी इन सगुण लीलाओंको बुद्धि या वाणीके तर्कसे नहीं समझा जा सकता। यही सोचकर तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष सब तर्क छोड़कर श्रीरामका भजन ही करते हैं।

ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥

मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया, फिर वह स्वयं प्रकट होकर दुर्वचन बोलने लगा। जाम्बवानने कहा—अरे दुष्ट! वहीं खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया।

बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥

उसने कहा—अरे मूर्ख! मैंने तुझे बूढ़ा समझकर छोड़ दिया था, अरे नीच! अब तू मुझे ही ललकारने लगा? ऐसा कहकर उसने चमकता त्रिशूल चलाया, जाम्बवानने उसे हाथसे ही पकड़कर उसीकी ओर दौड़ा दिया।

मारिसि मेघनाद के छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो॥

और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा। वह देवशत्रु चक्कर खाकर धरतीपर गिर पड़ा। जाम्बवानने फिर क्रोधसे उसका पैर पकड़कर घुमाया और धरतीपर पछाड़कर अपना बल दिखा दिया।

बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥

पर वरदानके प्रभावसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवानने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया। इधर देवर्षि नारदने गरुड़को भेजा, वे तुरंत ही श्रीरामके पास आ पहुँचे।

दोहा

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥७४(क)

पक्षिराज गरुड़ने सब मायावी नागोंके समूहको पकड़-पकड़कर खा लिया, तब सब वानरोंके झुंड मायासे मुक्त होकर हर्षित हो उठे।

दोहा

गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥७४(ख)

पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नाखून लिये वानर क्रोधसे दौड़ पड़े। राक्षस अत्यन्त व्याकुल होकर भाग खड़े हुए और भागकर किलेपर जा चढ़े।

मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥

मेघनादकी मूर्छा टूटी, तो पिताको देखकर उसे बड़ी लज्जा आयी। मैं अजेय होनेके लिये यज्ञ करूँगा, ऐसा निश्चय करके वह तुरंत एक श्रेष्ठ पर्वत-कन्दरामें चला गया।

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥

इधर विभीषणने यह सलाह दी—हे अतुलनीय बलवान, उदार प्रभु! सुनिये, देवताओंको सतानेवाला दुष्ट मायावी मेघनाद एक अपवित्र यज्ञ कर रहा है।

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥

हे प्रभु! यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो फिर मेघनाद शीघ्र जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अंगद आदि अनेक वानरोंको बुलाया।

लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥

और कहा—हे भाइयो! तुम सब लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर उसका यज्ञ विध्वंस कर दो। हे लक्ष्मण! युद्धमें तुम उसे मारना, देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है।

मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥

हे भाई! ऐसी बल-बुद्धिकी युक्तिसे उसे मारना कि राक्षसका ही नाश हो। हे जाम्बवान, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों सेनासहित इनके साथ रहना।

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥

जब श्रीरघुवीरने यह आज्ञा दी, तब रणधीर लक्ष्मणने कमरमें तरकस कसकर, धनुष चढ़ाकर, प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करते हुए बादलकी तरह गम्भीर वाणीमें कहा—

जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥

यदि मैं आज उसे बिना मारे लौटूँ, तो श्रीरघुनाथका सेवक कहलानेके योग्य नहीं। भले ही सैकड़ों शंकर उसकी सहायता करें, फिर भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है, आज मैं उसे अवश्य मारूँगा।

दोहा

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥७५

श्रीरघुनाथके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार लक्ष्मण तुरंत चल पड़े, उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान-जैसे उत्तम योद्धा थे।

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥

वानरोंने जाकर देखा कि मेघनाद बैठा हुआ रक्त और भैंसकी आहुति दे रहा है। वानरोंने उसका सारा यज्ञ ध्वस्त कर दिया, फिर भी जब वह नहीं उठा तो वे उसकी खिल्ली उड़ाने लगे।

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥

फिर भी जब वह नहीं उठा, तो उन्होंने उसके बाल पकड़कर लातें जमायीं और भाग चले। वह त्रिशूल उठाकर दौड़ा, वानर भागकर वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मण खड़े थे।

आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥

वह अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ आया और बार-बार भयानक गर्जना करने लगा। हनुमान और अंगद क्रोधसे दौड़े, पर उसने त्रिशूलसे छातीपर मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया।

प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥

फिर उसने लक्ष्मणपर प्रचंड त्रिशूल छोड़ा, पर अनंतरूप लक्ष्मणने बाणसे उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमान और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोधसे उसे मारने लगे, पर उसे कोई चोट नहीं लगती थी।

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥

शत्रु मारे नहीं मर रहा, यह देख वीर लौटे, तो वह घोर चीत्कार करते हुए दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणने भयानक बाण छोड़े।

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥

वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर तरह-तरहके रूप धरकर लड़ने लगा—कभी प्रकट होता, कभी छिप जाता।

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥

शत्रुको पराजित होता न देखकर वानर डर गये, तब शेषावतार लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने मनमें दृढ़ निश्चय किया—इस पापीको मैं बहुत खेला चुका, अब इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥

कोसलपति श्रीरामके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणने वीरोचित दर्पके साथ बाण चढ़ाया। बाण छूटते ही उसकी छातीके बीचमें जा लगा, मरते समय उसने सारा कपट त्याग दिया।

दोहा

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥७६

"लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं?" ऐसा कहते हुए उसने प्राण त्याग दिये। अंगद और हनुमान बोल उठे—तेरी माता धन्य है, धन्य है, जो तू मरते समय भी राम-लक्ष्मणका ही स्मरण करता रहा।

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥

हनुमानने उसे बिना किसी परिश्रमके उठा लिया और लंकाके द्वारपर रखकर लौट आये। उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आ पहुँचे।

बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥

वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथका निर्मल यश गाते हैं—हे अनंत! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो, आपने सब देवताओंका महासंकटसे उद्धार कर दिया।

अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिंधु पहिं आए॥सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं॥

स्तुति करके देवता-सिद्ध चले गये, तब लक्ष्मण कृपासागर श्रीरामके पास आये। इधर रावणने ज्योंही पुत्रवधका समाचार सुना, त्योंही वह मूर्छित होकर धरतीपर गिर पड़ा।

मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा॥

मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर तरह-तरहसे पुकारते हुए बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो उठे, सब रावणको ही दोषी ठहराने लगे।

दोहा

तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥७७

तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेक प्रकारसे यह समझाया—सारे संसारका यह रूप नाशवान है, हृदयमें विचारकर देख लो।

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥

रावणने उन्हें ज्ञानका उपदेश दिया—वह स्वयं तो नीच था, पर उसकी बातें शुभ और पवित्र थीं। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं, पर उस उपदेशपर आचरण करनेवाले बहुत कम मिलते हैं।

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला॥

रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर फिर चारों द्वारोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर रावणने कहा—युद्धमें शत्रुके सामने जिसका भी मन डगमगाये,

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥

वह अभी भाग जाय, युद्धमें आकर पीठ दिखाना अच्छा नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर यह वैर बढ़ाया है, जो शत्रु चढ़ आया है उसे मैं स्वयं उत्तर दूँगा।

अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥

ऐसा कहकर उसने पवन-जैसा वेगवान रथ सजवाया, सभी युद्ध-वाद्य बज उठे। सब अतुलनीय बलशाली वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी उठी हो।

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला॥

उस समय अनगिनत अपशकुन होने लगे, पर अपनी भुजाओंके बलके गर्वमें रावण उनकी परवाह ही नहीं करता।

छंद

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते।भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनकी परवाह नहीं करता। हाथोंसे हथियार गिर रहे हैं, योद्धा रथसे लुढ़क रहे हैं, घोड़े-हाथी साथ छोड़कर चीखते हुए भाग रहे हैं। सियार, गिद्ध, कौए और गधे भयानक बोलियाँ बोल रहे हैं, बहुत-से कुत्ते भौंक रहे हैं, और उल्लू ऐसे डरावने बोल रहे हैं मानो साक्षात कालके दूत हों।

दोहा

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥७८

जो जीवोंसे द्रोह करनेमें रत है, मोहके वशमें है, रामसे विमुख है और कामासक्त है, उसे भला स्वप्नमें भी शुभ सम्पत्ति, शुभ शकुन या मनकी शान्ति कैसे मिल सकती है?

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥

राक्षसोंकी अपार सेना चल पड़ी, चतुरंगिणी सेनाकी अनेक टुकड़ियाँ थीं। तरह-तरहके वाहन, रथ और सवारियाँ थीं, और बहुरंगी अनगिनत पताकाएँ-ध्वजाएँ लहरा रही थीं।

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥

मतवाले हाथियोंके अनेक झुंड चले, मानो पवनसे प्रेरित वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे वस्त्र धारण किये योद्धाओंके समूह थे, जो युद्धमें शूरवीर और मायाके ज्ञाता थे।

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥

अत्यन्त विचित्र सेना ऐसी शोभित थी मानो वीर वसंतने अपनी सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डगमगाने लगे, समुद्र क्षुब्ध हो उठा और पर्वत हिलने लगे।

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥

इतनी धूल उड़ी कि सूर्य ढक गये, हवा थम गयी और धरती व्याकुल हो उठी। ढोल-नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं, मानो प्रलयकालके बादल गरज रहे हों।

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं॥

भेरी, नफीरी और शहनाईपर योद्धाओंको सुख देनेवाला युद्धगीत बज रहा है। सब वीर सिंहगर्जना करते हुए अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं।

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥

रावणने कहा—हे श्रेष्ठ योद्धाओ! सुनो, तुम रीछ-वानरोंके झुंडोंको कुचल डालो, मैं स्वयं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना आगे बढ़ा दी।

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई॥

यह समाचार जब सब वानरोंने पाया, तो वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़ पड़े।

छंद

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥

विशाल और काल-जैसे भयंकर वानर-भालू दौड़े, मानो पंखवाले पर्वत उड़े जा रहे हों। नाखून, दाँत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार थे, वे बड़े बलशाली थे और किसीसे नहीं डरते थे—वे रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामका जय-जयकार करते हुए उनका सुयश गा रहे थे।

दोहा

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥७९

दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करते हुए अपनी-अपनी जोड़ी चुनकर, इधर श्रीरामका और उधर रावणका नाम लेकर आपसमें भिड़ गये।

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥

रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो उठे। स्नेहवश उनके मनमें सन्देह हुआ, तो श्रीरामके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहसे बोले—

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥

हे नाथ! आपके पास न रथ है, न कवच और न ही जूते—भला इतने बलवान रावणको कैसे जीता जायगा? कृपानिधान श्रीरामने कहा—हे सखा! सुनो, जिससे विजय मिलती है, वह रथ तो कोई और ही है।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥

शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं, सत्य और सदाचार उसकी मजबूत ध्वजा-पताका हैं। बल, विवेक, संयम और परोपकार—ये चारों उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समताकी डोरीसे जुते हुए हैं।

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥

ईश्वरका भजन ही उस रथका चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचंड शक्ति है, और श्रेष्ठ विवेक कठिन धनुष है।

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥

निर्मल और स्थिर मन तरकसके समान है, शम, यम और नियम उसके अनेक बाण हैं। ब्राह्मण-गुरुकी पूजा अभेद्य कवच है—इसके समान विजयका दूसरा कोई उपाय नहीं।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥

हे सखा! जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ हो, उसके लिये जीतनेको संसारमें कोई शत्रु ही शेष नहीं रह जाता।

दोहा

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥८०(क)

हे धीरबुद्धि सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसाररूपी महान दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है, रावणकी तो बात ही क्या।

दोहा

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥८०(ख)

प्रभुके ये वचन सुनकर विभीषणने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये—हे कृपा और सुखके सागर श्रीराम! आपने इसी बहाने मुझे भी महान उपदेश दे दिया।