षष्ठ सोपान — भाग 4

लंकाकाण्ड

सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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छंद

मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥

हे रघुकुलके स्वामी! सुंदर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूहको उड़ा देनेके लिये प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वनको भस्म करनेके लिये अग्नि हैं और देवताओंको आनंद देनेवाले हैं।

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥

आप निर्गुण भी हैं और सगुण भी, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुंदर हैं। भ्रमरूपी सघन अंधकारके नाशके लिये आप प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंका दमन करनेके लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें सदा निवास कीजिये।

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥भव बारिधि मंदर परम दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥

विषय-वासनाओंके समूहरूपी कमलवनको जमा देनेके लिये आप प्रबल पाला हैं, फिर भी उदार और मनसे परे हैं। भवसागरको मथनेके लिये आप मंदराचल पर्वत हैं। हमारे परम भयको दूर कीजिये और इस दुस्तर संसार-सागरसे हमें पार लगाइये।

छंद

स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥

हे श्यामसुंदर शरीर, कमलनयन, दीनबंधु, शरणागत के दुःख हरने वाले राजा राम!

छंद

अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥

आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित सदा मेरे हृदय में निवास कीजिए।

छंद

मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥

हे मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वीमंडल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु, भय का नाश करने वाले!

दोहा

नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥११५

हे नाथ! जब कोसलपुरी में आपका राजतिलक होगा, हे कृपासिंधु! मैं वह उदार चरित्र देखने अवश्य आऊँगा।

करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥

शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीमें बोले—हे शार्ङ्गधनुषधारी प्रभु! मेरी विनती सुनिये—

सकुल सदल प्रभु रावन मारो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार्यो॥दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥

आपने कुल-सेनासहित रावणका वध करके त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, मलिन, बुद्धिहीन जातिहीनपर भी इतनी कृपा की।

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥

अब हे प्रभु! इस सेवकके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ स्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकान मिट जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति देखकर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको बाँट दीजिये।

सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥

हे नाथ! मुझे हर तरहसे अपना लीजिये और फिर मुझे साथ लेकर अयोध्या पधारिये। विभीषणके ये कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके विशाल नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये।

दोहा

तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात११६(क)

श्रीरामने कहा—हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना-घर सब मेरा ही है, यह सच है। पर भरतकी दशाका स्मरण करते ही मुझे हर पल कल्पके समान बीतता प्रतीत होता है।

दोहा

तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥११६(ख)

वे तपस्वीके वेषमें कृश शरीरसे निरंतर मेरा ही नाम जप रहे हैं। हे सखा! ऐसा उपाय करो जिससे मैं शीघ्र ही उन्हें देख सकूँ, मैं तुमसे यह निहोरा करता हूँ।

दोहा

बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥११६(ग)

यदि अवधि बीतनेके बाद पहुँचूँ तो शायद भाईको जीवित न पाऊँ। छोटे भाईकी प्रीतिका स्मरण करते ही प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो उठता है।

दोहा

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥११६(घ)

तुम कल्पभर राज्य करना और मनमें सदा मेरा स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उसी धामको पाओगे जहाँ सब संत जाते हैं।

सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥

श्रीरामके ये वचन सुनते ही विभीषणने हर्षित होकर कृपाधाम प्रभुके चरण पकड़ लिये। सभी वानर-भालू भी हर्षित होकर प्रभुके चरण पकड़े उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे।

बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥

फिर विभीषण महलको गये और रत्नों तथा वस्त्रोंसे पुष्पक विमानको भर दिया। उसे लाकर प्रभुके सामने रखा, तब कृपासागर श्रीरामने हँसकर कहा—

चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन॥नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही॥

हे सखा विभीषण! सुनो, विमानपर चढ़कर आकाशमें जाओ और वस्त्र-आभूषण बरसाओ। आज्ञा सुनते ही विभीषणने आकाशमें जाकर सब मणियाँ और वस्त्र बरसा दिये।

जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥

जिसके मनको जो भाया, वही उसने ले लिया। मणियोंको मुँहमें रखकर, खानेकी चीज न पाकर वानर उन्हें उगल देते हैं—यह तमाशा देखकर परम विनोदी कृपानिधान श्रीराम सीता-लक्ष्मणसहित हँस पड़े।

दोहा

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद११७(क)

जिन्हें मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद 'नेति-नेति' कहते हैं, वही कृपासागर श्रीराम वानरोंके साथ इतने प्रकारके विनोद कर रहे हैं।

दोहा

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम११७(ख)

शिवजी कहते हैं—हे उमा! अनेकों योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करनेपर भी श्रीराम वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेमसे करते हैं।

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए॥नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥

भालू-वानरोंने वस्त्र-आभूषण पाकर उन्हें पहन-पहनकर श्रीरामके पास आना शुरू किया। इतनी विचित्र जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति बार-बार हँस रहे हैं।

चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥तुम्हरें बल मैं रावनु मारयो। तिलक बिभीषन कहूँ पुनि सारयो॥

श्रीरामने सबपर कृपादृष्टि डालकर कोमल वाणीमें कहा—तुम्हारे ही बलसे मैंने रावणको मारा और विभीषणका राजतिलक भी सम्पन्न किया।

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू॥सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर॥

अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ, मेरा स्मरण करते रहना और किसीसे मत डरना। यह सुनते ही सब वानर प्रेमविह्वल होकर हाथ जोड़े आदरपूर्वक बोले—

प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरें होत बचन सुनि मोहा॥दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा॥

प्रभु! आप जो भी कहें, वह सब उचित ही है, पर आपके ये वचन सुनकर हमें मोह होता है। हे रघुनाथ! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं, हमें दीन जानकर ही आपने कृतार्थ किया है।

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह के ईछा॥

प्रभुके ऐसे वचन सुनकर हम तो लज्जासे मरे जा रहे हैं—भला मच्छर कहीं गरुड़का हित कर सकता है? श्रीरामका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें ऐसे मग्न हो गये कि उन्हें घर जानेकी कोई इच्छा ही न रही।

दोहा

प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि११८(क)

फिर भी प्रभुकी प्रेरणासे सब वानर-भालू श्रीरामके रूपको हृदयमें बसाकर, भाँति-भाँतिकी विनती करके हर्ष और विषादसहित अपने घरोंको चल पड़े।

दोहा

कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥११८(ख)

वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान, अंगद, नल, हनुमान और विभीषणसहित जो भी अन्य बलवान वानर-सेनापति थे,

दोहा

कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥११८(ग)

वे प्रेमवश कुछ भी कह नहीं पा रहे थे—नेत्रोंमें आँसू भरकर, पलक झपकाये बिना, टकटकी लगाकर वे श्रीरामकी ओर निहार रहे थे।

अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥

उनका यह अपार प्रेम देखकर श्रीरामने सबको विमानपर चढ़ा लिया। फिर मन-ही-मन ब्राह्मणोंके चरणोंमें सिर नवाकर विमानको उत्तर दिशाकी ओर चलाया।

चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥

विमान चलते ही चारों ओर कोलाहल मच गया, सब 'रघुवीरकी जय' पुकारने लगे। विमानमें एक अत्यंत ऊँचा, मनोहर सिंहासन था, जिसपर सीतासहित प्रभु विराजमान हुए।

राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥

पत्नीसहित श्रीराम ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु-शिखरपर बिजलीसहित काला बादल हो। सुंदर विमान बड़े वेगसे चला, देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे।

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥

अत्यंत सुखद तीन प्रकारकी वायु चलने लगी, समुद्र-तालाब-नदियोंका जल निर्मल हो उठा। चारों ओर शुभ शकुन होने लगे, सबके मन प्रसन्न हो उठे और आकाश-दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं।

कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥

श्रीरामने कहा—हे सीते! यह रणभूमि देखो। यहाँ लक्ष्मणने इंद्रजीत मेघनादको मारा था, यहीं हनुमान और अंगदके हाथों मारे गये ये विशाल राक्षस पड़े हैं।

कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥

देवता और मुनियोंको संतप्त करनेवाले कुम्भकर्ण और रावण, दोनों भाई यहीं मारे गये।

दोहा

इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम।सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम११९(क)

यहाँ मैंने सेतु बँधवाया और सुखधाम शिवजीकी स्थापना की थी। तब कृपानिधानने सीतासहित श्रीरामेश्वरको प्रणाम किया।

दोहा

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम११९(ख)

वनमें जहाँ-जहाँ करुणासागरने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखाये और हर स्थानका नाम बताया।

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब के अस्थाना॥

विमान शीघ्र ही उस परम रमणीय दंडकवनमें जा पहुँचा, जहाँ अगस्त्य आदि अनेक मुनिराज निवास करते थे। श्रीराम इन सबके आश्रमोंमें गये।

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥

सब ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीराम चित्रकूट पहुँचे, वहाँ मुनियोंको संतुष्ट करके विमान वहाँसे फिर तेज गतिसे आगे बढ़ा।

बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥

फिर श्रीराम ने जानकीजी को कलियुग के पाप हरने वाली सुंदर यमुनाजी के दर्शन कराये, फिर पवित्र गंगाजी के दर्शन कराकर कहा—हे सीते! इन्हें प्रणाम करो।

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥

फिर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन कराये, जिन्हें देखने मात्र से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणी के दर्शन कराये, जो शोक हरने वाली और हरिलोक की सीढ़ी-सी है।

पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥

फिर अत्यंत पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन कराये, जो तीनों तापों और जन्म-मरण के रोग का नाश करने वाली है।

दोहा

सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥१२०(क)

फिर सीतासहित कृपालु श्रीरामने अयोध्याको प्रणाम किया—उनके नेत्र भर आये और शरीर बार-बार पुलकित होकर हर्षित हो उठा।

दोहा

पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह१२०(ख)

फिर त्रिवेणीमें आकर प्रभुने हर्षपूर्वक स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान दिये।

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥

फिर प्रभुने हनुमानको समझाकर कहा—ब्रह्मचारीका रूप धरकर अयोध्या जाओ, भरतको हमारा कुशल-समाचार सुनाना और उनका हाल लेकर लौट आना।

तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥

पवनपुत्र तुरंत ही चल पड़े, और प्रभु भरद्वाज मुनिके पास पहुँचे। मुनिने भाँति-भाँतिसे उनकी पूजा-स्तुति की और फिर आशीर्वाद दिया।

मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥

दोनों हाथ जोड़कर मुनिके चरणोंकी वंदना करके प्रभु फिर विमानपर चढ़कर आगे बढ़े। इधर निषादराजने सुना कि प्रभु आ गये हैं, तो वह 'नाव कहाँ है, नाव कहाँ है' पुकारते हुए लोगोंको बुलाने लगा।

सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥

इतनेमें विमान गंगाजीको लाँघकर इस पार आ गया और प्रभुकी आज्ञासे किनारे उतरा। तब सीताजीने भाँति-भाँतिसे गंगाजीकी पूजा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया।

दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥

गंगाजीने प्रसन्न मनसे आशीर्वाद दिया—हे सुंदरी! तुम्हारा सुहाग सदा अखंड रहे। यह सुनते ही, प्रभुके तटपर उतरनेकी खबर पाकर निषादराज गुह प्रेमविह्वल होकर दौड़ पड़ा।

प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई॥

सीतासहित प्रभुको देखते ही वह आनंदमग्न होकर धरतीपर गिर पड़ा, उसे देहकी सुधि तक न रही। उसका यह परम प्रेम देखकर श्रीरामने हर्षपूर्वक उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया।

छंद

लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान राय रमापती।बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे।सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥

सुजानोंके शिरोमणि, लक्ष्मीपति, कृपानिधान प्रभुने उसे हृदयसे लगाकर अत्यंत निकट बैठाया और कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जिन चरणकमलोंकी सेवा ब्रह्मा-शंकर तक करते हैं, उनके दर्शन पाकर ही मैं अब सचमुच सकुशल हूँ। हे सुखधाम, हे पूर्णकाम राम! मैं आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ।

छंद

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो।मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा।कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥

सर्वथा नीच उस निषादको भी प्रभुने भरतकी ही भाँति हृदयसे लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—मुझ मंदबुद्धिने ही मोहवश उस प्रभुको भुला रखा है। रावणके शत्रुका यह पावन चरित्र सदा श्रीरामके चरणोंमें प्रेम उपजानेवाला है, कामादि विकारोंका नाश करनेवाला और परम ज्ञान देनेवाला है—देवता, सिद्ध और मुनि इसे आनंदपूर्वक गाते हैं।

दोहा

समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान१२१(क)

जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी इस समर-विजयकी लीलाको सुनते हैं, उन्हें भगवान सदा विजय, विवेक और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

दोहा

यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार१२१(ख)

अरे मन! विचार करके देख—यह कलिकाल पापोंका घर है। इसमें श्रीरघुनाथके नामके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है।

श्लोक

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठ: सोपानः समाप्त:।

कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह छठा सोपान (लंकाकांड) यहाँ समाप्त होता है।

धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥

श्रीराम दौड़कर गुरु वसिष्ठके चरणकमलोंसे लिपट गये, उनका शरीर छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यंत पुलकित हो उठा।