सप्तम सोपान — भाग 4
उत्तरकाण्ड
अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
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अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
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तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥॥६॥
यही सब उस गौके लिये हरी घास बन जाते हैं, जिसे चरकर वह आस्तिक भावरूपी अपने बछड़ेको दूध पिलाती है। निवृत्ति उसकी नोई है, विश्वास दूध दुहनेका पात्र है, और निर्मल, स्ववश मन ही उसे दुहनेवाला ग्वाला है।
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥तोष मरुत तब छमा जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥॥७॥
हे भाई! इस तरह परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्कामभावरूपी अग्निपर भलीभाँति औटाया जाता है। फिर संतोषरूपी हवासे उसे ठंडा किया जाता है और धैर्य-संयमरूपी जामन देकर जमाया जाता है।
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥॥८॥
फिर प्रसन्नतारूपी मटकीमें तत्त्वविचाररूपी मथानी और इन्द्रियसंयमके सहारे, सत्य व मधुर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथा जाय, तो उसमेंसे निर्मल, सुन्दर, अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकल आता है।
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥११७(क)॥
फिर योगरूपी अग्नि जलाकर उसमें सारे शुभ-अशुभ कर्मोंको ईंधनकी तरह भस्म कर दिया जाय, तो ममतारूपी मैल जल जाता है और शेष बचे ज्ञानरूपी घीको निश्चयात्मिका बुद्धिसे ठंडा किया जाता है।
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।चित्त दिआ भरि धर दृढ़ समता दिअटि बनाइ॥११७(ख)॥
तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दीपकको भरती है, समताकी दीवटपर उसे दृढ़तासे टिकाकर रखती है।
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥११७(ग)॥
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा सत्त्व-रज-तमरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रुई निकाली जाती है, फिर उसे सँवारकर एक सुन्दर, सुदृढ़ बत्ती बनायी जाती है।
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥११७(घ)॥
इस विधिसे विज्ञानमय तेजकी राशिरूप दीपक जलाया जाता है, जिसके पास पहुँचते ही मद आदि सारे पतंगे स्वयं जल मरते हैं।
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥॥१॥
"सोऽहमस्मि" यानी "वह मैं ही हूँ" का यह अखण्ड, अटूट भाव ही उस दीपककी सबसे प्रचण्ड लौ है। जब आत्मानुभवके इस सुखका प्रकाश फैलता है, तब संसारकी जड़ भेदभ्रम मिट जाता है,
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥॥२॥
और मोह आदि प्रबल अविद्याके पूरे परिवारका अपार अन्धकार छँट जाता है। तब वही बुद्धि इस प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठे-बैठे जड़-चेतनकी उस गाँठको खोलने लगती है।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥॥३॥
यदि वह बुद्धि उस गाँठको खोल पाये, तभी यह जीव सचमुच कृतार्थ होता है। पर हे पक्षिराज! गाँठ खुलती देख माया तुरन्त इसमें अनेक विघ्न डालने लगती है।
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई॥कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा॥॥४॥
हे भाई! वह अनेक ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजकर बुद्धिको लालच दिखाती है। वे चतुराई, बल और छलसे पास आकर अपने आँचलकी हवासे उस ज्ञानदीपकको बुझा देनेकी कोशिश करती हैं।
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥॥५॥
यदि बुद्धि अत्यन्त चतुर हो, तो वह इन्हें हानिकारक समझकर इनकी ओर देखती तक नहीं। और यदि इन विघ्नोंसे भी बुद्धि विचलित नहीं होती, तो फिर स्वयं देवता ही नयी बाधाएँ खड़ी करने लगते हैं।
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥॥६॥
इन्द्रियोंके द्वार मानो हृदयरूपी घरके अनेक झरोखे हैं, जहाँ-जहाँ देवता पहरा देकर बैठे रहते हैं। ज्योंही विषयरूपी हवा आती दिखती है, वे तुरन्त हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥॥७॥
और वह तेज़ हवा जैसे ही हृदयरूपी घरमें घुसती है, वैसे ही वह ज्ञानदीपक बुझ जाता है—न गाँठ खुलती है, न वह प्रकाश टिकता है, बुद्धि विषयरूपी आँधीमें फिरसे व्याकुल हो उठती है।
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥॥८॥
इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओंको ज्ञान कभी नहीं सुहाता, क्योंकि उनकी रुचि तो सदा विषय-भोगमें ही रहती है। और बुद्धि भी विषयरूपी वायुसे भरमायी जा चुकी होती है—अब उस दीपकको फिरसे कौन जलाये?
तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस।हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥११८(क)॥
तब जीव बार-बार जन्म-मरणके क्लेश भोगता है। हे पक्षिराज! श्रीहरिकी माया इतनी दुस्तर है कि वह यों ही सहजमें पार नहीं की जा सकती।
कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक।होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥११८(ख)॥
ज्ञान कहना जितना कठिन है, समझना उससे भी कठिन है, और उसे सिद्ध करना तो और भी कठिन। कदाचित् संयोगवश यह प्राप्त भी हो जाय, तो भी आगे उसकी रक्षामें अनेकों विघ्न खड़े रहते हैं।
ग्यान पंथ कृपान के धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥॥१॥
ज्ञानका मार्ग तलवारकी धारके समान है, हे पक्षिराज! इसपरसे फिसलते देर नहीं लगती। जो इसे बिना किसी बाधाके पार कर ले, वही अन्ततः कैवल्यरूपी परम पद पाता है।
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई॥॥२॥
संत, पुराण, वेद और शास्त्र सब कहते हैं कि कैवल्य पाना अत्यन्त दुर्लभ है, पर हे गोसाईं! वही दुर्लभ मुक्ति श्रीरामके भजनसे बिना माँगे भी अपने-आप चली आती है।
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥॥३॥
जैसे धरतीके बिना जल कभी नहीं ठहर सकता, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले—वैसे ही हे पक्षिराज! मोक्षका सुख भी श्रीहरिकी भक्तिके बिना कभी टिक नहीं सकता।
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥॥४॥
यह समझकर ही बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिमें ऐसे रम जाते हैं कि मुक्तितकको तुच्छ मान बैठते हैं। भक्ति करते-करते बिना किसी अतिरिक्त प्रयासके ही संसारकी जड़ अविद्या अपने-आप नष्ट हो जाती है,
भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥॥५॥
ठीक वैसे ही जैसे भोजन तृप्तिके लिये किया जाता है और उसे पचाना जठराग्निका अपना काम है। ऐसी सहज और सुखदायी हरिभक्ति जिसे न भाये, ऐसा मूर्ख भला कौन होगा?
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥११९(क)॥
हे गरुड़! सेवक और स्वामीके भावके बिना भवसागर पार नहीं हो सकता। यह सिद्धान्त समझकर श्रीरामके चरणकमलोंका ही भजन कीजिये।
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य॥११९(ख)॥
जो चेतनको जड़ बना सकते हैं और जड़को चेतन—ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं।
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि के प्रभुताई॥राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥॥१॥
इस तरह मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कह दिया। अब भक्तिरूपी मणिकी महिमा सुनिये—श्रीरामकी भक्ति एक सुन्दर चिन्तामणि है, हे गरुड़! जिसके हृदयमें यह बस जाती है,
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥॥२॥
वह दिन-रात स्वयं ही परम प्रकाशरूप बना रहता है, उसे दीपक, घी या बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। न उसके पास मोहरूपी दरिद्रता फटकती है, न लोभरूपी हवा उस दीपको कभी बुझा पाती है।
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥॥३॥
उस मणिके प्रकाशसे अविद्याका घना अन्धकार मिट जाता है, मदादि पतंगोंका पूरा समूह हार मान लेता है। जिसके हृदयमें यह भक्ति बसती है, काम-क्रोध-लोभ जैसे दुष्ट उसके पास फटकते तक नहीं।
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥॥४॥
उसके लिये विष भी अमृत बन जाता है और शत्रु भी मित्र। उस मणिके बिना कोई सच्चा सुख नहीं पाता, और जिन भयंकर मानसिक रोगोंसे संसारभरके जीव दुखी रहते हैं, वे उसे छू भी नहीं पाते।
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥॥५॥
जिसके हृदयमें रामभक्तिरूपी यह मणि बस जाय, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। संसारमें वही लोग सच्चे बुद्धिमान् हैं जो इस मणिको पानेके लिये सच्चा प्रयत्न करते हैं।
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे॥॥६॥
यद्यपि यह मणि जगत्में सबके सामने ही प्रकट है, फिर भी श्रीरामकी कृपाके बिना इसे कोई नहीं पा सकता। इसे पानेके उपाय भी बहुत सहज हैं, पर अभागे लोग उन्हें ठुकरा देते हैं।
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥॥७॥
वेद-पुराण मानो पवित्र पर्वत हैं और श्रीरामकी अनेक कथाएँ उनकी सुन्दर खदानें। संत उन खदानोंके मर्मज्ञ हैं और उनकी सुबुद्धि ही कुदाल है। हे गरुड़! ज्ञान और वैराग्य ही उनकी दो आँखें हैं।
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥॥८॥
जो प्राणी प्रेमके साथ इसे खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा ही लेता है। हे प्रभो! मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि श्रीरामके दास स्वयं श्रीरामसे भी बढ़कर हैं।
राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥॥९॥
श्रीराम समुद्र हैं, धीर संत मेघ हैं; श्रीहरि चन्दनका वृक्ष हैं, संत उसे सींचनेवाली हवा हैं। सारी साधनाओंका अन्तिम फल यही सुन्दर हरिभक्ति है, और यह संतके बिना किसीको कभी नहीं मिली।
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥॥१०॥
यह समझकर जो भी सत्संग करता है, हे गरुड़! उसके लिये श्रीरामकी भक्ति सहज ही सुलभ हो जाती है।
ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं।कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥१२०(क)॥
वेद मानो समुद्र हैं, ज्ञान मन्दराचल पर्वत है और संत देवता हैं, जो इस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिकी मधुरता घुली रहती है।
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥१२०(ख)॥
वैराग्यरूपी ढालसे अपनी रक्षा करते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी शत्रुओंको मारकर जो विजय पायी जाती है, वही हरिभक्ति है—हे पक्षिराज! इसे भलीभाँति विचार कर देखिये।
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥॥१॥
तब गरुड़जी फिर प्रेमपूर्वक बोले—हे कृपालु! यदि मुझपर आपका स्नेह है, तो हे नाथ! मुझे अपना ही सेवक मानकर मेरे सात प्रश्नोंका उत्तर विस्तारसे दीजिये।
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥॥२॥
हे नाथ, हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है? फिर सबसे बड़ा दुःख और सबसे बड़ा सुख क्या है, यह भी संक्षेपमें समझाइये।
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥॥३॥
आप संत और असंतका भेद भलीभाँति जानते हैं, उनका सहज स्वभाव भी बतलाइये। साथ ही यह भी कहिये कि वेदोंमें बताया गया सबसे बड़ा पुण्य क्या है और सबसे भयंकर पाप कौन-सा है?
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥॥४॥
फिर मानसिक रोगोंको भी समझाकर कहिये—आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी अपार है। काकभुशुण्डिजी बोले—हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमसे सुनिये, मैं यह सारी नीति संक्षेपमें कहता हूँ।
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥॥५॥
मनुष्यके शरीरके समान दूसरा कोई शरीर नहीं है—चराचर सभी जीव इसीकी कामना करते हैं। यह देह नरक, स्वर्ग और मोक्ष तीनोंकी सीढ़ी है और कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य व भक्ति देनेवाली है।
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं॥॥६॥
ऐसा दुर्लभ शरीर पाकर भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीच विषयोंमें ही डूबे रहते हैं, वे मानो पारसमणिको हाथसे फेंककर बदलेमें काँचके टुकड़े उठा लेते हैं।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥॥७॥
संसारमें दरिद्रताके समान कोई दुःख नहीं और संतोंके मिलनके समान कोई सुख नहीं। हे गरुड़! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना ही संतोंका सहज स्वभाव है।
संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी॥भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला॥॥८॥
संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं, जबकि अभागे दुष्ट दूसरोंको दुःख देनेके लिये ही जीते हैं। कृपालु संत भोजवृक्षकी तरह होते हैं, जो दूसरोंके हितके लिये सदा बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ सह लेते हैं।
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥॥९॥
पर दुष्ट सनकी भाँति दूसरोंको बाँधनेके काम आते हैं और अपनी ही खाल उधड़वाकर विपत्ति सहते हुए नष्ट होते हैं। हे गरुड़! दुष्ट लोग साँप और चूहेकी तरह बिना किसी स्वार्थके भी दूसरोंका अहित करते हैं।
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥॥१०॥
वे दूसरोंकी सम्पत्ति नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं, जैसे फ़सल बर्बाद करके ओले खुद भी पिघल जाते हैं। दुष्टका उभार जगत्के लिये वैसे ही अशुभ होता है जैसे अशुभ ग्रह केतुका उदय।
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥॥११॥
इसके विपरीत संतोंका उभार सदा सुखकारी होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय सारे संसारको सुख देता है। वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म कहा गया है, और परनिन्दाके समान भारी पाप कोई नहीं।
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई॥द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥॥१२॥
शिव और गुरुकी निन्दा करनेवाला अगले जन्ममें मेढक बनता है और हज़ार जन्मोंतक वही योनि पाता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला बहुत नरक भोगनेके बाद कौएका शरीर पाकर जन्म लेता है।
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥॥१३॥
जो अभिमानी देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। और जो संतोंकी निन्दामें रत रहते हैं, वे उल्लू बनते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात ही प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये सदा अस्त रहता है।
सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥॥१४॥
जो मूर्ख सबकी ही निन्दा करते फिरते हैं, वे चमगादड़ बनकर जन्मते हैं। अब हे तात! उन मानसिक रोगोंको सुनिये, जिनसे संसारके सभी लोग दुःख भोगते हैं।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥॥१५॥
सभी रोगोंकी जड़ मोह ही है, और उसीसे आगे अनेक व्याधियाँ जन्म लेती हैं—काम मानो वात है, अपार लोभ कफ है, और क्रोध पित्त है जो सदा छातीको जलाता रहता है।
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥बिषय मनोरथ दुर्लभ नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥॥१६॥
यदि कहीं ये तीनों भाई—वात, पित्त और कफ—आपसमें मिल जायँ, तो दुखदायी सन्निपात रोग उठ खड़ा होता है। विषय-भोगकी दुर्लभ इच्छाएँ भी ऐसे ही असंख्य शूल हैं, जिनके नाम गिनना भी असम्भव है।
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥॥१७॥
ममता मानो दाद है, ईर्ष्या खुजली है, अति हर्ष और विषाद गलेके रोगोंकी भरमार है। पराया सुख देखकर जो जलन होती है वही क्षय-रोग है, और दुष्टता व मनकी कुटिलता ही कोढ़ है।
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी॥॥१८॥
अहंकार बहुत ही कष्टदायक गाँठका रोग है, दम्भ-कपट-मद-अभिमान मानो नसोंकी बीमारी है। तृष्णा भयंकर जलोदर है, और पुत्र-धन-मानकी तीव्र लालसाएँ प्रबल तिजारी बुखार हैं।
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका॥॥१९॥
ईर्ष्या और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं—इस तरह अनगिनत बुरे रोग हैं, इन्हें कहाँतक गिनाऊँ।
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥१२१(क)॥
एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं—फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं, जो जीवको निरन्तर सताते रहते हैं। ऐसी दशामें वह शान्ति भला कैसे पाये?
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥१२१(ख)॥
नियम, धर्म, सदाचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान—और इनके अलावा करोड़ों औषधियाँ भी क्यों न हों, हे गरुड़! इन रोगोंका इनसे कभी नाश नहीं होता।
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥॥१॥
इस तरह जगत्के सभी जीव रोगी हैं, शोक-हर्ष-भय-प्रीति और वियोगसे बुरी तरह पीड़ित हैं। मैंने तो बस कुछ मानस-रोग ही गिनाये हैं। ये तो सबमें होते हैं, पर इन्हें पहचान पाना किसी विरलेके ही बसकी बात है।
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥॥२॥
ये पीड़ादायी रोग पहचान लिये जानेपर कुछ कमज़ोर तो पड़ जाते हैं, पर पूरी तरह मिटते नहीं। विषयरूपी कुपथ्य पाकर तो ये मुनियोंके हृदयतक में फिरसे अंकुरित हो उठते हैं—फिर बेचारे साधारण मनुष्यकी क्या बिसात!
राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा॥सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय के आसा॥॥३॥
यदि श्रीरामकी कृपासे ऐसा संयोग बन जाय तो ये सारे रोग जड़से मिट सकते हैं—सद्गुरुरूपी वैद्यके वचनोंपर पूरा विश्वास हो और विषयोंकी कोई आशा न रखी जाय, यही सच्चा परहेज़ है।
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥॥४॥
श्रीरघुनाथकी भक्ति ही असली संजीवनी बूटी है, और श्रद्धासे भरी बुद्धि ही उसका अनुपान है। ऐसा संयोग बन जाय तो ये रोग सचमुच मिट जाते हैं, वरना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं मिटते।
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥॥५॥
हे गोसाईं! मनको सच्चे अर्थमें निरोग तब समझना जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख हर दिन नयी होकर बढ़ती जाय, और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता पूरी तरह मिट जाय।
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥॥६॥
जब मनुष्य इस तरह निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा जाती है। शिव, ब्रह्मा, शुकदेव, सनकादि और नारदजी जैसे ब्रह्मविद्या-निपुण मुनि भी,
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥॥७॥
हे पक्षिराज! उन सबका यही निष्कर्ष है कि श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम रखना चाहिये। वेद, पुराण और सभी ग्रन्थ यही कहते हैं कि श्रीरघुनाथकी भक्तिके बिना सुख कहीं नहीं है।
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥॥८॥
कछुएकी पीठपर बाल उग आयें, बाँझका बेटा किसीको मार डाले, या आकाशमें तरह-तरहके फूल खिल जायँ—भले ऐसा हो जाय, पर श्रीहरिसे मुँह मोड़कर जीव कभी सुख नहीं पा सकता।
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥॥९॥
मृगतृष्णाका पानी पीकर प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर सींग उग आयें, या अन्धकार सूर्यको ही निगल जाय—भले यह हो जाय, पर श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुखी नहीं हो सकता।
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥॥१०॥
बर्फसे आग निकल आये—भले यह असम्भव भी सम्भव हो जाय, पर श्रीरामसे विमुख रहकर कोई भी कभी सुख नहीं पा सकता।
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥१२२(क)॥
पानी मथनेसे घी निकल आये, बालूसे तेल निचुड़ आये—भले यह हो जाय, पर श्रीहरिके भजनके बिना भवसागर पार करना असम्भव है, यह सिद्धान्त कभी नहीं बदलता।
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥१२२(ख)॥
प्रभु चाहें तो मच्छरको ब्रह्मा बना दें और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ कर दें—यह समझकर चतुर पुरुष सारा सन्देह त्यागकर बस श्रीरामका ही भजन करते हैं।
विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥१२२(ग)॥
मैं तुम्हें पूरे निश्चयके साथ कहता हूँ, मेरे ये वचन कभी झूठे नहीं होंगे—जो मनुष्य श्रीहरिको भजते हैं, वे इस अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरको सहज ही पार कर जाते हैं।
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा॥श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥॥१॥
हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिका यह अनुपम चरित्र कहीं विस्तारसे तो कहीं संक्षेपमें कह दिया। हे गरुड़! वेदोंका यही सार-सिद्धान्त है कि सब कुछ भुलाकर बस श्रीरामका भजन करना चाहिये।
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥॥२॥
प्रभु श्रीरघुनाथको छोड़कर और किसकी सेवा की जाय, जिनका मुझ-जैसे मूर्खपर भी इतना स्नेह है! हे नाथ! आप तो स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं, आपको भला मोह कैसे होगा—आपने तो मुझपर केवल बड़ी कृपा ही की है।
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥॥३॥
आपने मुझसे शुकदेव, सनकादि और शिवजीके मनको भानेवाली वह अत्यन्त पवित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ीभर, यहाँतक कि पलभरका भी एक सच्चा सत्संग पाना बड़ा दुर्लभ है।
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥॥४॥
हे गरुड़! अपने हृदयमें विचार करके देखिये—क्या सचमुच मैं श्रीरामके भजनका अधिकारी हूँ? मैं तो पक्षियोंमें सबसे नीच और हर तरहसे अपवित्र हूँ, फिर भी प्रभुने मुझे जगत्को पावन करनेवाला बना दिया।
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥१२३(क)॥
यद्यपि मैं हर तरहसे हीन हूँ, फिर भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ—क्योंकि श्रीरामने मुझे अपना ही जन मानकर तुम्हारा यह संत-समागम दिया।
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउ नहिं कछु गोइ।चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ॥१२३(ख)॥
हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार जो कुछ जानता था, बिना कुछ छिपाये कह दिया। पर श्रीरघुवीरका चरित्र तो समुद्रके समान अथाह है—उसकी थाह भला कोई कैसे पा सकता है?
सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥॥१॥
श्रीरामके अनगिनत गुणोंका बार-बार स्मरण करते हुए सुजान भुशुण्डिजी हर्षसे भर उठते हैं—जिनकी महिमा वेदोंने "नेति-नेति" कहकर गायी है, जिनका बल-प्रताप-प्रभुत्व अतुलनीय है,
सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥॥२॥
जिनके चरण शिव और ब्रह्मा तक पूजते हैं, उन्हींकी इतनी कृपा मुझपर होना उनकी अपार कोमलताका ही प्रमाण है। ऐसा स्वभाव मैंने न कभी सुना, न देखा। हे गरुड़! फिर श्रीरघुनाथके समान मैं किसे मानूँ?
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥॥३॥
साधक, सिद्ध, मुक्त, विरक्त, कवि, विद्वान्, कृतज्ञ, संन्यासी, योगी, शूरवीर, महान् तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित, विज्ञानी—
तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥सरन गए मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥॥४॥
ये सब भी बिना मेरे स्वामी श्रीरामकी सेवाके पार नहीं हो सकते। मैं उन्हींको बार-बार नमस्कार करता हूँ—जिनकी शरणमें जाते ही मुझ-जैसा पापोंका ढेर भी शुद्ध हो जाता है, उन अविनाशी श्रीरामको मेरा प्रणाम है।
जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल।सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥१२४(क)॥
जिनका नाम जन्म-मरणके रोगकी अचूक औषधि है और तीनों भयंकर तापोंको हरनेवाला है, वे कृपालु श्रीराम मुझपर और आपपर सदा प्रसन्न बने रहें।
सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह।बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह॥१२४(ख)॥
भुशुण्डिजीके इन मंगलमय वचनोंको सुनकर और श्रीरामके चरणोंमें उनका गहरा प्रेम देखकर, हर सन्देहसे मुक्त हो चुके गरुड़जी प्रेमसे भरकर बोले—
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥॥१॥
आपकी भक्ति-रससे सनी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामके चरणोंमें मेरा नया प्रेम जाग उठा और मायासे उपजी सारी विपत्तियाँ दूर हो गयीं।
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥॥२॥
मोहके समुद्रमें डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज़ बन गये, हे नाथ! आपने मुझे भाँति-भाँतिका सुख दिया। इसका बदला चुकाना मेरे बसकी बात नहीं—मैं तो बस बार-बार आपके चरणोंकी वन्दना ही करता हूँ।
पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह के करनी॥॥३॥
आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामके सच्चे प्रेमी हैं—हे तात! आपके समान भाग्यशाली कोई नहीं। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी—इन सभीका स्वभाव ही दूसरोंका भला करना है।
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥॥४॥
कवियोंने संतोंके हृदयको मक्खनके समान बताया है, पर उन्होंने असली बात नहीं समझी—मक्खन तो अपनी ही आँच पाकर पिघलता है, जबकि पावन संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं।
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ॥जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर॥॥५॥
मेरा जीवन और जन्म आज सार्थक हो गया, आपकी कृपासे मेरा सारा सन्देह मिट गया—मुझे सदा अपना सेवक ही समझियेगा। शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रेष्ठ पक्षी गरुड़ बार-बार ऐसा ही कहते रहे।
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥१२५(क)॥
फिर उन भुशुण्डिजीके चरणोंमें प्रेमसहित सिर झुकाकर और हृदयमें श्रीरघुवीरको बसाये हुए धीरबुद्धि गरुड़जी वैकुण्ठकी ओर चल पड़े।
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥१२५(ख)॥
हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वेद-पुराण यही कहते हैं कि यह हरिकृपाके बिना कभी सम्भव नहीं होता।
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा॥प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा॥॥१॥
मैंने यह परम पवित्र कथा सुना दी, जिसे कानों सुनते ही संसारके बन्धन कट जाते हैं और शरणागतोंके कल्पवृक्ष, करुणाके सागर श्रीरामके चरणकमलोंमें सच्चा प्रेम जाग उठता है।
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥॥२॥
जो लोग कान और मन लगाकर इस कथाको सुनते हैं, उनके मन-वचन-कर्मसे उपजे सारे पाप धुल जाते हैं। तीर्थयात्रा जैसे अनेक साधन, योग-वैराग्य-ज्ञानकी निपुणता—
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥॥३॥
तरह-तरहके कर्म, धर्म, व्रत, दान, संयम, इन्द्रियदमन, जप-तप-यज्ञ, प्राणियोंपर दया, गुरु-ब्राह्मणकी सेवा, विद्या-विनय-विवेककी महानता—
जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥॥४॥
हे भवानी! वेदोंने जितने भी साधन बताये हैं, उन सबका अन्तिम फल श्रीहरिकी भक्ति ही है। पर वेदोंमें गायी गयी वह भक्ति श्रीरामकी कृपासे किसी विरलेको ही मिल पाती है।
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास।जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥१२६॥
जो लोग श्रद्धा और विश्वाससहित यह कथा निरन्तर सुनते रहते हैं, वे मुनियोंको भी दुर्लभ उस हरिभक्तिको बिना किसी विशेष परिश्रमके ही पा लेते हैं।
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥॥१॥
जिसका मन श्रीरामके चरणोंमें रम गया, वही सचमुच सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वीका आभूषण, सच्चा पण्डित और दानी है, वही धर्मपरायण है और वही अपने कुलका सच्चा रक्षक है।
नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥॥२॥
जो छल छोड़कर श्रीरघुवीरका भजन करता है, वही नीतिमें निपुण है, वही सबसे बुद्धिमान् है, उसीने वेदोंका सार समझा है—वही सच्चा कवि, विद्वान् और रणधीर भी है।
धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥॥३॥
वह देश धन्य है जहाँ गंगाजी बहती हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत्यका पालन करती है, वह राजा धन्य है जो न्यायसे शासन करता है, और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्मसे कभी नहीं डिगता।
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥॥४॥
वह धन धन्य है जो दानमें लगता है, वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें रमी रहती है, वही घड़ी धन्य है जिसमें सत्संग मिले, और वही जन्म धन्य है जिसमें अखण्ड रामभक्ति हो।
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥१२७॥
हे उमा! सुनो, वह कुल धन्य है, जगत्भरके लिये पूज्य और परम पवित्र है, जिसमें कोई विनम्र, श्रीरघुवीरका अनन्य भक्त पुरुष जन्म ले।
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥॥१॥
मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह कथा तुम्हें सुनायी, यद्यपि इसे पहले मैंने छिपाकर ही रखा था। पर जब तुम्हारे मनमें प्रेमकी गहराई देखी, तभी मैंने श्रीरघुनाथकी यह कथा तुम्हें सुनायी।
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुनइ हरि लीलहि॥कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥॥२॥
यह कथा उन्हें कभी नहीं सुनानी चाहिये जो धूर्त और हठी हों, जो मन लगाकर श्रीहरिकी लीला न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामीको भी नहीं, जो चराचरके स्वामीको कभी नहीं भजते।
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी॥॥३॥
ब्राह्मणद्रोहीको यह कथा कभी न सुनानी चाहिये, भले ही वह इन्द्रके समान वैभवशाली राजा ही क्यों न हो। रामकथाके सच्चे अधिकारी तो वे ही हैं जिन्हें सत्संगति सबसे अधिक प्रिय है।
गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई॥ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥॥४॥
जिनकी गुरुके चरणोंमें प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणोंके सेवक हैं, वे ही इस कथाके अधिकारी हैं। और जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंसे भी प्यारे हों, उसके लिये तो यह कथा विशेष सुखदायी है।
राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान।भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान॥१२८॥
जो श्रीरामके चरणोंमें प्रेम चाहता हो या मोक्षपद पाना चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृतको प्रेमपूर्वक अपने कानोंके दोनेमें भरकर पिये।
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥॥१॥
हे गिरिजे! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मैलको धोनेवाली यह रामकथा तुम्हें सुनायी। वेद और मनीषी यही कहते हैं कि यह रामकथा जन्म-मरणरूपी रोगकी संजीवनी बूटी है।
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना॥अति हरि कृपा जाहि पर होई। पग देइ एहिं मारग सोई॥॥२॥
इसमें रामभक्तिको पानेके सुन्दर सात सोपान हैं। जिसपर श्रीहरिकी अपार कृपा होती है, वही इस मार्गपर पहला कदम रख पाता है।
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥॥३॥
जो लोग कपट त्यागकर यह कथा गाते हैं, वे अपनी मनोकामना पूरी कर लेते हैं। जो इसे कहते, सुनते और सराहते हैं, वे संसार-सागरको गौके खुरके गड्ढेजैसी छोटी बाधाकी तरह सहज ही पार कर जाते हैं।
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥॥४॥
यह सारी कथा सुनकर पार्वतीजीके हृदयको बहुत भायी, और वे मधुर वाणीमें बोलीं—हे नाथ! आपकी कृपासे मेरा सन्देह मिट गया और श्रीरामके चरणोंमें मेरा नया प्रेम जाग उठा।
मैं कृतकृत्य भई अब तव प्रसाद बिस्वेस।उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस॥१२९॥
हे विश्वनाथ! आपकी कृपासे अब मैं सचमुच कृतार्थ हो गयी—मुझमें दृढ़ रामभक्ति जन्म ले चुकी है और मेरे सारे क्लेश बीत गये।
यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा॥भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥॥१॥
शिव-पार्वतीका यह कल्याणकारी संवाद सुख देनेवाला और शोकका नाश करनेवाला है। यह जन्म-मरणका अन्त करता है, सन्देह मिटाता है, भक्तोंको आनन्द देता है और संतोंको सबसे प्रिय है।
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं॥रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥॥२॥
जगत्में जितने भी रामोपासक हैं, उन्हें इस कथाके समान प्रिय और कुछ भी नहीं। श्रीरघुनाथकी कृपासे ही मैंने यह पवित्र और सुन्दर चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है।
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥॥३॥
इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत या पूजा—इनमें से कोई भी दूसरा साधन काम नहीं आता। बस श्रीरामका ही स्मरण करना है, उन्हींका गुण गाना है और निरन्तर उन्हींके गुणसमूह सुनने हैं।
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥॥४॥
पतितोंको पवित्र करना जिनका प्रसिद्ध स्वभाव है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण सब गाते हैं। हे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज—श्रीरामको भजकर आजतक किसने परम गति नहीं पायी?
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥॥१॥
अरे मूर्ख मन! सुन—पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परम गति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, बहेलिया, गीध, हाथी जैसे अनेक दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। अहीर, यवन, किरात, खस, चाण्डाल जैसे अत्यन्त पापी लोग भी उनका नाम एक बार लेकर पवित्र हो जाते हैं—उन श्रीरामको मैं नमस्कार करता हूँ।
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै॥॥२॥
जो मनुष्य रघुकुलभूषण श्रीरामके इस चरित्रको कहते, सुनते या गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनका मैल धोकर बिना किसी परिश्रमके ही श्रीरामके परम धामको चले जाते हैं। यहाँतक कि जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर हृदयमें बसा लेता है, उसके भी पाँचों अविद्याजनित भयंकर विकारोंको श्रीराम हर लेते हैं।
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥॥३॥
परम सुन्दर, सुजान और कृपानिधान, अनाथोंपर प्रेम करनेवाले तो एकमात्र श्रीराम ही हैं। इनके समान निःस्वार्थ हित करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपासे मन्दबुद्धि तुलसीदासने भी परम शान्ति पायी, उन श्रीरामके समान कोई प्रभु कहीं नहीं है।
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥१३०(क)॥
हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं और आपके समान दीनोंका हित करनेवाला कोई नहीं—हे रघुवंशमणि! यह विचारकर मेरे भयंकर जन्म-मरणके भयको हर लीजिये।
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥१३०(ख)॥
जैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है और लोभीको धन, वैसे ही हे रघुनाथ, हे राम! आप मुझे सदा-सर्वदा प्रिय लगते रहिये।
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमंश्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तयेभाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं॥॥१॥
जो दुर्गम रामायण पहले भगवान् शिवने, उत्तम कवि होते हुए, श्रीरामके चरणकमलोंमें निरन्तर भक्ति पानेके लिये रचा था, उसीको समझकर, सदा रघुनाथके नाममें रत रहते हुए, अपने हृदयके अन्धकारको शान्त करनेके लिये तुलसीदासने इस "मानस" को लोकभाषामें बाँधा।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदममायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।श्रीमद्रामचरितमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति येते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥॥२॥
यह पवित्र, पापोंका नाश करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति देनेवाला, माया-मोहके मैलको धोनेवाला, अत्यन्त निर्मल और प्रेमरूपी जलसे भरा शुभ रामचरितमानस—जो मनुष्य इसमें भक्तिपूर्वक डुबकी लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्यकी भयंकर किरणोंसे कभी नहीं झुलसते।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने सप्तमः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले इस श्रीरामचरितमानसका यह सातवाँ सोपान, उत्तरकाण्ड, यहाँ समाप्त हुआ।
आरति श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बाल्मीकि बिग्यान बिसारद॥सुक सनकादिक सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस सम्मत सबही की॥गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥ब्यास आदिक कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़ के ही की॥कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥
यह श्रीरामायणजीकी आरती है, जो सीतापतिकी सुन्दर और उज्ज्वल कीर्तिका बखान करती है। इसे ब्रह्मा आदि देवता, नारदजी, विज्ञानमें निपुण वाल्मीकिजी, शुकदेव, सनकादि मुनि, शेषजी और सरस्वतीजी गाते हैं, और हनुमानजीकी सुन्दर कीर्तिका वर्णन करती है। अठारहों पुराण और वेद इसे गाते हैं, यही छहों शास्त्रों और समस्त ग्रन्थोंका सार है, मुनियों और संतोंकी सबसे बड़ी थाती है, तथा सबके सम्मत सारका ही अंश है। शिव-पार्वती और घटसंभव अगस्त्य मुनि सदा इसे गाते हैं, व्यास आदि श्रेष्ठ कवियोंने इसे बखाना है, और यह काकभुशुण्डि तथा गरुड़के संवादका ही सार है। यह कलियुगके पापोंको हरनेवाली है, विषय-भोगके नीरस रसको फीका कर देनेवाली है, मुक्तिरूपी युवतीका सुन्दर शृंगार है, संसारके रोगोंको मिटानेवाली अमृत-जड़ी है, और तुलसीदासके लिये हर तरहसे माता-पिताके समान है।
