द्वितीय सोपान — भाग 3

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

अयोध्याकाण्ड — सुनें

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राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई॥राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥

राम की आज्ञा टाली नहीं जा सकती, कर्म की गति बड़ी कठिन है, उस पर किसी का वश नहीं चलता। राम, लक्ष्मण और सीता के चरणों में सिर नवाकर सुमंत्र ऐसे लौटे जैसे कोई व्यापारी अपनी पूँजी गँवाकर लौटता है।

दोहा

रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं९९

सुमंत्र ने रथ हाँका, घोड़े राम की ओर देख-देखकर हिनहिनाने लगे। यह देखकर निषाद लोग विषाद से भरकर सिर पीट-पीटकर पछताने लगे।

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥

जिनके वियोग में पशु तक इतने व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा और माता-पिता कैसे जी पाएँगे? राम ने बलपूर्वक सुमंत्र को लौटा दिया, फिर वे गंगा के तट पर आए।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह नाव नहीं लाया - बोला, मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है। तुम्हारे चरण-कमलों की धूल के बारे में सब कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥

जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई - काठ तो पत्थर से कठोर होता नहीं, मेरी नाव भी कहीं मुनि की पत्नी बन जाएगी और मेरी रोज़ी-रोटी की यही राह उजड़ जाएगी।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु आन कबारू॥जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

मैं तो इसी नाव से अपना पूरा परिवार पालता हूँ, दूसरा कोई काम नहीं जानता। हे प्रभु, यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हैं, तो पहले मुझे अपने चरण-कमल धोने दीजिए।

छंद

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

हे नाथ, मैं चरण धोकर ही आपको नाव पर चढ़ाऊँगा, आपसे कोई उतराई नहीं चाहता। हे राम, मुझे आपकी और दशरथ की सौगंध है, मैं सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले मुझे तीर मार दें, पर जब तक चरण धो न लूँ तब तक, हे तुलसीदास के स्वामी, हे कृपालु, आपको पार नहीं उतारूँगा।

सोरठा

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन१००

केवट के प्रेम में लिपटे इन भोले-भाले वचनों को सुनकर करुणाधाम राम, जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर मुस्कुरा उठे।

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

कृपासिंधु राम मुस्कुराते हुए बोले - भाई, तू वही कर जिससे तेरी नाव सुरक्षित रहे। जल्दी पानी ला और मेरे पैर धो दे, देर हो रही है, अब पार उतार दे।

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

जिनका नाम एक बार स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर से पार हो जाते हैं, और जिन्होंने अपने ही तीन पगों में सारे जगत को नाप लिया था, वही कृपालु राम आज केवट से विनती कर रहे हैं!

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥

प्रभु के इन वचनों से गंगा की बुद्धि मोहित हो गई, पर उनके चरणों के नखों को देखते ही वे पहचान गईं और हर्षित हो उठीं। केवट राम की आज्ञा पाकर कठौते में जल भरकर ले आया।

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥

अपार आनंद और प्रेम में उमँगकर वह भगवान के चरण-कमल धोने लगा। सारे देवता फूल बरसाते हुए ईर्ष्या करने लगे कि इसके समान भाग्यशाली कोई नहीं।

दोहा

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार१०१

चरण धोकर वह जल पीकर, अपने पूरे परिवार सहित पहले अपने पितरों को भवसागर से पार कर, फिर आनंदपूर्वक प्रभु को गंगा के पार ले गया।

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता॥केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥

गुह और लक्ष्मण सहित सीता और राम नाव से उतरकर गंगा की रेत पर खड़े हो गए। केवट भी उतरकर दंडवत करने लगा, पर उसे कुछ न दे पाने के संकोच से प्रभु को झिझक हुई।

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥

पति के हृदय की बात जाननेवाली सीता ने प्रसन्न मन से अपनी रत्नजड़ित अँगूठी उतार दी। कृपालु राम ने कहा - केवट, यह नाव की उतराई ले लो। केवट व्याकुल होकर उनके चरण पकड़ बैठा।

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥

बोला - हे नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई। बरसों मजदूरी करता रहा, पर आज विधाता ने भरपूर मजदूरी दे दी।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥

अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए, हे दीनदयाल, यह आपकी कृपा ही बहुत है। लौटते समय जो कुछ आप दें, वही प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा।

दोहा

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सिय नहिं कछु केवटु लेइ।बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ१०२

प्रभु, लक्ष्मण और सीता ने बहुत आग्रह किया, पर केवट ने कुछ नहीं लिया। अंत में करुणा के धाम राम ने उसे निर्मल भक्ति का वरदान देकर विदा किया।

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥सिय सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥

फिर रघुकुल के स्वामी राम ने स्नान करके पार्थिव-पूजा की और शिव को सिर नवाया। सीता ने हाथ जोड़कर गंगा से कहा - हे माता, मेरी यह मनोकामना पूरी कीजिए,

पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥

कि पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौटकर मैं तुम्हारी पूजा करूँ। सीता की प्रेमभरी विनती सुनकर तब गंगा के निर्मल जल से यह श्रेष्ठ वाणी गूँजी -

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥

हे रघुवीर की प्रिया जानकी, सुनो, तुम्हारा प्रभाव किसे नहीं मालूम? तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही लोग लोकपाल बन जाते हैं, सारी सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥

तुमने मुझसे इतनी विनम्रता से विनती करके मुझ पर कृपा ही की है, मुझे बड़ाई दी है। फिर भी, हे देवी, मैं अपनी वाणी सफल करने के लिए तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ -

दोहा

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ१०३

तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी, तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुयश जगत भर में फैलेगा।

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥

गंगा के इन मंगलमय वचनों को सुनकर और उन्हें अनुकूल पाकर सीता प्रसन्न हो उठीं। तब राम ने गुह से कहा - अब तुम घर लौट जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में जलन उठी।

दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥

गुह हाथ जोड़कर दीन स्वर में बोला - हे रघुकुलमणि, मेरी विनती सुनिए। मुझे आपके साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, कुछ दिन चरण-सेवा कर लेने दीजिए -

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥

जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुंदर पर्णकुटी बना दूँगा। फिर आप जैसी आज्ञा देंगे, आपकी दुहाई, मैं वही करूँगा।

सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥

उसका यह सहज प्रेम देखकर राम ने उसे साथ ले लिया, जिससे गुह का हृदय आनंद से भर गया। फिर गुह ने अपने कुटुंबियों को बुलाकर, उन्हें संतुष्ट करके विदा किया।

दोहा

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ१०४

तब गणेश और शिव का स्मरण करके, गंगा को मस्तक नवाकर, सखा गुह, छोटे भाई लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ वन की ओर चल पड़े।

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥

उस दिन एक पेड़ के नीचे विश्राम हुआ। लक्ष्मण और सखा गुह ने सारी व्यवस्था कर दी। सवेरे नित्यकर्म पूरे करके राम ने जाकर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन किए।

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी॥चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु॥

उस राजा (प्रयाग) का सत्य मंत्री है, श्रद्धा प्रिय पत्नी है, और वेणीमाधव जैसा हितैषी मित्र है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फलों से उसका भंडार भरा है, और वह पुण्यभूमि ही उसका सुंदर देश है।

छेत्र अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥

प्रयाग क्षेत्र ही एक दुर्गम, मज़बूत और सुंदर किला है, जिसे पापरूपी शत्रु स्वप्न में भी नहीं पा सके। सभी तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ रणधीर वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल देते हैं।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥

गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम ही उसका शोभायमान सिंहासन है, अक्षयवट उसका छत्र है जो मुनियों तक का मन मोह लेता है। यमुना और गंगा की लहरें उसके चँवर हैं, जिन्हें देखते ही दुख-दरिद्रता मिट जाती है।

दोहा

सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम१०५

पुण्यात्मा साधुजन उसकी सेवा करते हैं और सारी कामनाएँ पाते हैं। वेद और पुराण मानो भाट बनकर उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं।

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥

प्रयाग का प्रभाव भला कौन बखान कर सके - वह पापरूपी हाथियों का संहार करने वाला सिंह है। ऐसे सुंदर तीर्थराज का दर्शन कर सुख के सागर राम ने भी सुख पाया।

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥

उन्होंने अपने ही मुख से सीता, लक्ष्मण और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा सुनाई। फिर प्रणाम करके, वन-बगीचे निहारते हुए और बड़े प्रेम से माहात्म्य कहते हुए -

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा॥

इस तरह आकर उन्होंने त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण मात्र से ही सारे मंगल देती है। फिर आनंद से स्नान करके शिव की पूजा की और विधिपूर्वक तीर्थ-देवताओं का पूजन किया।

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥

फिर प्रभु भरद्वाज मुनि के पास पहुँचे। मुनि ने दंडवत करते-करते ही उन्हें हृदय से लगा लिया - मुनि के मन का आनंद वर्णन से परे था, मानो उन्हें ब्रह्मानंद की राशि मिल गई हो।

दोहा

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि१०६

मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज ने आशीर्वाद दिया, हृदय में यह जानकर अपार आनंद हुआ कि आज विधाता ने मानो उनके सारे पुण्यों का फल आँखों के सामने लाकर रख दिया हो।

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥

कुशल पूछकर मुनि ने उन्हें आसन दिए और प्रेमपूर्वक पूजा करके तृप्त किया। फिर मानो अमृत से बने हों, ऐसे सुंदर कंद-मूल-फल-अंकुर लाकर भेंट किए।

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥

सीता, लक्ष्मण और सेवक गुह सहित राम ने बड़े चाव से वे मूल-फल खाए। थकान मिटने से राम प्रसन्न हो उठे, तब भरद्वाज कोमल वाणी में बोले -

दोहा

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥

हे राम, आज आपका दर्शन पाकर मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया - आज मेरा जप, योग और वैराग्य सार्थक हुआ, और मेरे सारे शुभ साधनों का समूह भी आज सफल हो गया।

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी॥अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥

लाभ और सुख की सीमा आपके दर्शन के अलावा और कुछ नहीं - आपके दर्शन से मेरी सारी आशाएँ पूरी हो गईं। अब कृपा करके यह वरदान दे दीजिए कि आपके चरण-कमलों में मेरा सहज प्रेम बना रहे।

दोहा

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार१०७

जब तक मन-वचन-कर्म से छल छोड़कर कोई सच में आपका न हो जाए, तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी उसे स्वप्न में भी वह सुख नहीं मिलता।

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥

मुनि के ये वचन सुनकर, भाव-भक्ति के आनंद से तृप्त राम संकोच से भर उठे। फिर उन्होंने भरद्वाज मुनि का सुंदर यश अनेक प्रकार से कहकर सबको सुनाया।

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥

वही बड़ा है, वही सब गुणों का घर है जिसे आप जैसा मुनि आदर दे। इस तरह राम और भरद्वाज दोनों परस्पर विनम्रता दिखाते हुए अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करने लगे।

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए॥

यह खबर पाकर प्रयागवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब भरद्वाज के आश्रम में दशरथ के सुंदर पुत्रों को देखने आए।

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू॥देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई॥

राम ने सबको प्रणाम किया, सब नेत्रों का लाभ पाकर आनंदित हुए और आशीर्वाद देने लगे। राम के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौट गए।

दोहा

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ१०८

राम ने वहीं रात्रि विश्राम किया और सवेरे प्रयाग में स्नान करके, प्रसन्नतापूर्वक मुनि को सिर नवाकर सीता, लक्ष्मण और गुह सहित आगे बढ़ चले।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥

चलते हुए राम ने बड़े प्रेम से मुनि से पूछा - हे नाथ, बताइए हमें किस राह जाना है। मुनि मन में हँसकर बोले - आपके लिए तो सभी रास्ते सुगम हैं।

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥

फिर साथ भेजने के लिए मुनि ने अपने शिष्यों को बुलाया। यह सुनते ही मन में हर्षित होकर कोई पचास शिष्य आ गए - सबका राम पर अपार प्रेम था, सब कहने लगे कि रास्ता तो हमने देखा हुआ है।

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥

तब मुनि ने चार ब्रह्मचारी भी उनके साथ कर दिए, जिन्होंने कई जन्मों तक पुण्य कर्म किए थे। ऋषि की आज्ञा पाकर, प्रणाम करके राम हृदय में आनंदित होकर आगे चले।

ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई॥होहिं सनाथ जनम फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई॥

जब वे किसी गाँव के पास से निकलते हैं, स्त्री-पुरुष दौड़कर उनका दर्शन करने आते हैं। जन्म सफल हुआ मानकर वे मन को साथ भेजकर, पर शरीर से पीछे रह जाने के दुख के साथ लौटते हैं।

दोहा

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम१०९

फिर राम ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया, वे मनचाही वस्तु पाकर लौट गए। यमुना पार करके सबने उसके जल में स्नान किया, जो राम के शरीर जैसा ही श्याम था।

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥

यमुना-तट पर बसने वाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर अपना काम-काज भूलकर दौड़े, और राम, लक्ष्मण, सीता का सौंदर्य देखकर अपने भाग्य को सराहने लगे।

अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥

उनके मन में परिचय जानने की बड़ी उत्सुकता थी, पर नाम-गाँव पूछते हुए वे संकोच कर रहे थे। उनमें जो अनुभवी और चतुर बुज़ुर्ग थे, उन्होंने युक्ति से राम को पहचान लिया।

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय कीन्ह भल नाहीं॥

उन्होंने सबको पूरी कथा सुनाई कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन जा रहे हैं। यह सुनकर सब दुखी होकर पछताने लगे कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया।

तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥

उसी समय वहाँ एक तेजस्वी, कम उम्र का सुंदर तपस्वी आया। उसकी गति कोई नहीं जानता था, वैरागी वेश में था और मन-वचन-कर्म से राम का अनन्य भक्त था।

दोहा

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि११०

अपने इष्टदेव को पहचानते ही उसकी आँखें भर आईं और शरीर पुलकित हो उठा - वह दंड की तरह धरती पर गिर पड़ा, उसकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥

राम ने प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया, मानो किसी दरिद्र को पारस मिल गया हो। देखने वाले कहने लगे मानो प्रेम और परमार्थ दोनों देह धरकर आज मिल रहे हों।

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥

फिर वह लक्ष्मण के चरणों में गिरा, लक्ष्मण ने प्रेम से उमँगकर उसे उठा लिया। फिर उसने सीता के चरणों की धूल सिर पर धारण की, और सीता ने माता जैसा स्नेह देकर उसे आशीर्वाद दिया।

कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥

निषादराज ने भी उसे दंडवत की, और राम का प्रेमी जानकर वह उससे प्रसन्नता से मिला। वह तपस्वी नेत्रों से राम के रूप-सुधा का पान करता रहा, ठीक वैसे ही जैसे भूखा व्यक्ति भोजन पाकर तृप्त होता है।

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥

गाँव की स्त्रियाँ कहती हैं - सखी, बताओ तो, कैसे होंगे वे माता-पिता जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेजा! राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेह से व्याकुल हो उठते हैं।

दोहा

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेई कीन्ह१११

तब राम ने सखा गुह को कई तरह से समझाया, और गुह ने राम की आज्ञा शिरोधार्य कर अपने घर की राह ली।

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥

फिर सीता, राम और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर फिर से यमुना को प्रणाम किया। सूर्यकन्या यमुना की महिमा गाते हुए दोनों भाई सीता सहित प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े।

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥

रास्ते में कई यात्री मिलते हैं, दोनों भाइयों को देखकर प्रेम से कहते हैं - तुम्हारे हर अंग में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ी चिंता होती है।

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाए॥अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥

तुम पैदल ही रास्ता तय कर रहे हो, इससे लगता है ज्योतिष झूठा ही है। आगे दुर्गम जंगल और ऊँचे पहाड़ हैं, और साथ में यह सुकुमारी स्त्री भी है।

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥

हाथी-सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें, जहाँ तक आप जाएँगे वहाँ तक पहुँचाकर फिर प्रणाम करके लौट आएँगे।

दोहा

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन११२

इस तरह वे यात्री प्रेमवश पुलकित होकर, आँखों में आँसू भरकर पूछते हैं, पर कृपासिंधु राम विनम्र, कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥

रास्ते में बसे गाँव और पुरवासियों को देखकर नाग और देवता भी ईर्ष्या करते हैं - किस पुण्यात्मा ने किस शुभ घड़ी में इन्हें बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और सुंदर हो रहे हैं!

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥

जहाँ-जहाँ राम के चरण पड़ते हैं, वहाँ की तुलना इंद्रपुरी अमरावती से भी नहीं की जा सकती। रास्ते के पास बसने वाले भी बड़े भाग्यशाली हैं - स्वर्गवासी देवता तक उनकी सराहना करते हैं -

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥

जो आँखें भरकर घनश्याम राम को सीता-लक्ष्मण सहित निहारती हैं, और जिन तालाबों-नदियों में राम स्नान करते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी प्रशंसा करती हैं।

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥

जिस वृक्ष के नीचे प्रभु बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करता है। राम के चरण-कमलों की धूल छूकर धरती अपने को परम सौभाग्यशाली मानती है।

दोहा

छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं।देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं११३

रास्ते में बादल छाया करते हैं, देवता फूल बरसाकर ईर्ष्या करते हैं। पहाड़, वन और पशु-पक्षियों को निहारते हुए राम आगे बढ़ते जाते हैं।

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी॥

सीता-लक्ष्मण सहित राम जब किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तो यह सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब घर-काम भूलकर तुरंत उन्हें देखने दौड़ पड़ते हैं।

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी॥सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥

राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर नेत्रों का फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानंद में डूब जाते हैं, आँखें भर आतीं और शरीर पुलकित हो उठता।

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥

उनकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता, मानो किसी दरिद्र को रत्नों का ढेर मिल गया हो। वे एक-दूसरे को बुलाकर कहते हैं - इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लो।

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥

कोई राम को देखकर ऐसे अनुरक्त हो गए कि निहारते हुए उनके साथ चल पड़े। किसी की आँखों में उनकी छवि बस गई और वे शरीर, मन, वाणी सबसे शिथिल हो उठे।

दोहा

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात११४

कोई बरगद की सुंदर छाया देखकर वहाँ नरम घास-पत्ते बिछाकर कहते हैं - क्षणभर यहीं बैठकर थकान मिटा लीजिए, फिर चाहे अभी चलिए, चाहे सवेरे।

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥

कोई घड़ा भरकर पानी लाते हैं और कोमल स्वर में कहते हैं - नाथ, आचमन कर लीजिए। उनका यह प्रेमभरा वचन सुनकर, अत्यंत सुशील और दयालु राम ने -

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥

सीता को मन ही मन थकी हुई जानकर घड़ी भर बरगद की छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनंदित होकर उनकी शोभा निहारते हैं, अनुपम रूप ने सबके नेत्र और मन मोह लिए हैं।

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥

सब लोग चारों ओर टकटकी लगाए, चकोर की तरह राम के मुखचंद्र को निहारते हुए शोभित हो रहे हैं। उनका तमाल जैसा साँवला शरीर देखते ही करोड़ों कामदेवों का मन मोहित हो जाता है।

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा॥

बिजली जैसे रंग वाले लक्ष्मण भी बहुत ही सुंदर लगते हैं - नख से शिखा तक मनमोहक हैं। दोनों मुनियों जैसे वस्त्र पहने, कमर में तरकस बाँधे हैं, कमल-से हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

दोहा

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल११५

उनके सिरों पर सुंदर जटा-मुकुट हैं, वक्ष-भुजाएँ-नेत्र विशाल हैं, और शरद-पूर्णिमा के चाँद जैसे सुंदर मुखों पर पसीने की बूँदें झिलमिला रही हैं।

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥

उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, शोभा इतनी अधिक है और मेरी बुद्धि इतनी छोटी। राम, लक्ष्मण, सीता की सुंदरता को सब मन-चित्त-बुद्धि लगाकर निहारते रह जाते हैं।

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥

प्रेम के प्यासे वे स्त्री-पुरुष ऐसे ठिठक गए जैसे दीपक देखकर हिरन-हिरनी स्तब्ध रह जाते हैं। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं, पर अत्यंत स्नेह के कारण कुछ पूछते हुए भी सकुचाती हैं।

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥

बार-बार सब उनके पैरों पड़ती हैं और सहज, सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं - राजकुमारी, हम कुछ पूछना चाहती हैं, पर स्त्री-स्वभाव के कारण डर रही हैं।

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥

स्वामिनी, हमारी ढिठाई क्षमा कीजिए, हमें गँवार जानकर बुरा न मानिएगा - ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही ऐसे सुंदर हैं कि मरकतमणि और सोने ने भी अपनी चमक इन्हीं से पाई है।

दोहा

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन११६

एक साँवला, एक गौरवर्ण, दोनों किशोर अवस्था के परम सुंदर हैं - इनके मुख शरद-चंद्रमा जैसे और नेत्र शरद-कमल जैसे हैं।

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥

सुमुखि, बताओ तो, करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं? यह प्रेमभरी मधुर वाणी सुनकर सीता सकुचा गईं और मन ही मन मुस्कुरा उठीं।

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी॥सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥

उन्हें देखकर सीता संकोचवश धरती की ओर देखने लगीं - दोनों ओर के संकोच से वे सकुचा रही थीं। हिरनी जैसी आँखों और कोयल जैसी वाणी वाली सीता प्रेम से सकुचाकर मधुर वचन बोलीं -

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥

ये जो सहज स्वभाव के, सुंदर और गोरे शरीर वाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीता ने चंद्रमुख को आँचल से ढककर, प्रियतम की ओर तिरछी नज़र से देखा,

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सिय सयननि॥भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥

और खंजन पक्षी जैसी सुंदर तिरछी आँखों से इशारा करके बता दिया कि ये उनके पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवतियाँ ऐसी आनंदित हुईं मानो निर्धनों ने धन की राशि लूट ली हो।

दोहा

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस११७

वे अत्यंत प्रेम से सीता के पैरों पड़कर तरह-तरह से आशीर्वाद देती हैं - जब तक शेषनाग के सिर पर यह धरती टिकी है, तब तक तुम सदा सुहागिन बनी रहो,

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥

और पार्वती जैसी अपने पति की प्रिय बनो। हे देवी, हम पर अपनी कृपा बनाए रखना। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि तुम फिर इसी रास्ते लौटना,

दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीय सब प्रेम पिआसी॥मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥

और अपनी दासी जानकर हमें दर्शन देना। सीता ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखकर मीठे वचनों से ऐसे संतुष्ट किया मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिला दिया हो।

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥

तभी राम का इशारा समझकर लक्ष्मण ने कोमल वाणी में लोगों से आगे का रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुखी हो उठे, शरीर पुलकित हुए और आँखों में आँसू भर आए।

मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥

उनका आनंद मिट गया, मन उदास हो गए, मानो विधाता दी हुई संपत्ति वापस छीन रहा हो। पर कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धरा और अच्छी तरह सोचकर सुगम रास्ता बता दिया।

दोहा

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ११८

तब लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ आगे बढ़ चले, और सबको प्रिय वचन कहकर विदा किया, पर उनका मन तो अपने साथ ही बँधा रह गया।

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं॥सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥

लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत पछताते और मन ही मन विधाता को दोष देते हैं। विषाद के साथ आपस में कहते हैं कि विधाता के सारे काम उलटे ही हैं।

निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥

वह विधाता बिल्कुल निरंकुश, निर्दय और निडर है, जिसने चाँद को रोगी और कलंकित बनाया, कल्पवृक्ष को साधारण पेड़ और समुद्र को खारा बनाया - उसी ने इन राजकुमारों को वन भेज दिया है।

जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥

यदि विधाता ने इन्हें वनवास ही दिया है, तो भोग-विलास बनाना उसका व्यर्थ ही परिश्रम था। ये तो बिना जूतों के नंगे पैर चल रहे हैं, फिर विधाता ने इतने वाहन क्यों बनाए?

ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥

ये तो कुश-पत्ते बिछाकर धरती पर ही सो जाते हैं, तब विधाता ने सुंदर शय्याएँ किसलिए रचीं? इन्हें तो पेड़ों के नीचे ही ठिकाना मिला, फिर उसने उजले महल बना-बनाकर व्यर्थ ही श्रम किया।

दोहा

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार११९

जो ये इतने सुंदर और सुकुमार होकर भी मुनियों के वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो विधाता ने तरह-तरह के गहने और वस्त्र व्यर्थ ही बनाए।

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥

जो ये कंद-मूल-फल खाते हैं, तो संसार में अमृत जैसे भोजन भी व्यर्थ ही हैं। कोई कहते हैं - ये तो स्वभाव से ही ऐसे सुंदर हैं, ये स्वयं प्रकट हुए हैं, विधाता के बनाए हुए नहीं।

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥

वेदों ने जहाँ तक विधाता की रचना का वर्णन किया है, जितना हमारी आँख-कान-मन तक पहुँचता है, चौदहों लोकों में खोज लो - ऐसा पुरुष और ऐसी स्त्री कहीं और नहीं मिलेगी।

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥

इन्हें देखकर विधाता का मन भी मोहित हो गया, और वह भी इनके समान दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। बहुत परिश्रम किया, पर कोई इनकी बराबरी तक न पहुँचा - इसी ईर्ष्या में उसने इन्हें वन में लाकर छिपा दिया है।

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥

कोई कहते हैं - हम बहुत नहीं जानते, पर अपने को बड़ा भाग्यशाली मानते हैं। हमारी समझ से वे भी बड़े पुण्यवान हैं जिन्होंने इन्हें देखा, जो देख रहे हैं, और जो आगे देखेंगे।

दोहा

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर१२०

इस तरह प्रिय बातें करते-करते सब की आँखों में जल भर आता है, और वे सोचते हैं - इतने कोमल, सुकुमार शरीर वाले ये दुर्गम रास्ते कैसे तय करेंगे।

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं॥मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥

स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो उठती हैं, मानो संध्या के समय चकवी विरह से व्याकुल हो। इनके कोमल चरणों और कठोर रास्ते को देख वे व्यथित हृदय से मीठी बातें कहती हैं -

परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥

इनके कोमल, लाल-लाल चरण छूते ही धरती भी वैसे ही सिकुड़ जाती है जैसे हमारा हृदय सिकुड़ रहा है। यदि जगदीश्वर ने इन्हें वन ही भेजा है, तो पूरा रास्ता फूलों से क्यों न भर दिया?

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥

सखी, यदि विधाता से माँगकर कुछ मिल सके, तो हम इन्हें बस अपनी आँखों में ही बसा लें! जो लोग इस अवसर पर यहाँ नहीं आए, वे सीता-राम को नहीं देख पाए।

सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥

उनका सौंदर्य सुनकर लोग व्याकुल होकर पूछते हैं - भाई, वे अब तक कहाँ तक पहुँचे होंगे? जो समर्थ हैं वे दौड़कर दर्शन कर आते हैं, और जन्म का सच्चा फल पाकर आनंदित होकर लौटते हैं।

दोहा

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं१२१

स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े हाथ मल-मलकर पछताते हैं। इस तरह राम जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेम के वश में हो जाते हैं।

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥

सूर्यकुल की कुमुदिनी को खिलाने वाले चंद्रमा जैसे राम का दर्शन कर हर गाँव में ऐसा ही आनंद छा जाता है। जो लोग यह समाचार सुनते हैं, वे राजा-रानी को दोष देने लगते हैं।

कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाई॥

कोई कहते हैं - राजा बहुत भले हैं, उन्होंने हमें भी नेत्रों का लाभ दे दिया। स्त्री-पुरुष आपस में सीधी, स्नेहभरी सुंदर बातें करते हैं।

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥

वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया, वह नगर धन्य है जहाँ से ये आए, वह देश-पर्वत-वन-गाँव धन्य है, और जहाँ-जहाँ ये जाते हैं वही स्थान धन्य हो जाता है।

सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥

ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया जिसके ये इतने स्नेही हैं। पथिक बने राम-लक्ष्मण की सुंदर कथा पूरे रास्ते और जंगल में फैल गई है।

दोहा

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत१२२

इस तरह रघुकुल-कमल को खिलाने वाले सूर्य राम रास्ते के लोगों को सुख देते हुए, सीता-लक्ष्मण सहित वन को निहारते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।

आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे॥

आगे राम हैं, पीछे लक्ष्मण - दोनों तपस्वी वेश में शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच सीता ऐसी सुशोभित हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥

फिर जैसी छवि मेरे मन में बसी है, उसे कहता हूँ - मानो वसंत और कामदेव के बीच रति शोभित हो। हृदय में खोजकर एक और उपमा कहता हूँ - मानो बुध और चंद्रमा के बीच रोहिणी सोह रही हो।

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाए॥

प्रभु के चरण-चिह्नों के बीच-बीच पैर रखती हुई सीता डरते-डरते रास्ता चलती हैं, और लक्ष्मण दोनों के चरण-चिह्न बचाते हुए उन्हें दाहिनी ओर रखकर चलते हैं।

राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥

राम-लक्ष्मण-सीता की यह सुंदर प्रीति वाणी से परे है, भला कैसे कही जाए? पक्षी-पशु भी यह छवि देखकर मुग्ध हो जाते हैं - पथिक बने राम ने तो सबके ही मन चुरा लिए हैं।

दोहा

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ१२३

प्रिय पथिक सीता सहित दोनों भाइयों को जिन-जिन लोगों ने देखा, वे बिना किसी परिश्रम के ही आनंदपूर्वक संसार का यह दुर्गम मार्ग पार कर गए।

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम ये तीनों पथिक बसें, वह भी राम के परमधाम का वह मार्ग पा लेगा जिसे कभी कोई विरला मुनि ही पाता है।

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥

तब राम ने सीता को थका हुआ जानकर, पास ही एक बरगद और ठंडा जल देखकर वहीं विश्राम किया। कंद-मूल-फल खाकर, रातभर वहाँ रहकर, सवेरे स्नान करके राम आगे चले।

देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥

सुंदर वन, सरोवर और पर्वत निहारते हुए प्रभु वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। राम ने देखा कि मुनि का निवास अत्यंत सुंदर है, जहाँ सुंदर पर्वत, वन और पवित्र जल हैं।

सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥

सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष खिले हुए हैं, भौंरे मकरंद के नशे में मीठा गुंजन कर रहे हैं। ढेरों पक्षी-पशु कोलाहल करते हैं, वैररहित होकर प्रसन्न मन से विचरते हैं।

दोहा

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन१२४

पवित्र, सुंदर आश्रम देखकर कमलनयन राम प्रसन्न हो उठे। राम के आगमन की खबर सुनकर मुनि वाल्मीकि उन्हें लेने आगे आए।

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥

राम ने मुनि को दंडवत किया, विप्रश्रेष्ठ ने उन्हें आशीर्वाद दिया। राम की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए, और वे उन्हें सम्मानपूर्वक आश्रम में ले आए।

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए॥सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए॥

श्रेष्ठ मुनि ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर मीठे कंद-मूल-फल मँगवाए। सीता, लक्ष्मण और राम ने वे फल खाए, फिर मुनि ने उन्हें सुंदर विश्राम-स्थान दिखाया।

बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥

वाल्मीकि के मन में यह मंगलमय मूर्ति निहारकर बड़ा आनंद हुआ। तब राम ने हाथ जोड़कर कानों को सुख देने वाले मीठे वचन बोले -

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥

हे मुनिनाथ, आप त्रिकालदर्शी हैं, समूचा विश्व आपकी हथेली पर रखे बेर जैसा है। ऐसा कहकर प्रभु ने कैकेयी ने जिस-जिस तरह वनवास दिया, वह सारी कथा विस्तार से सुनाई।

दोहा

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ१२५

पिता की आज्ञा, माता का हित, भरत जैसे भाई का राजा बनना, और फिर मुझे आपके दर्शन होना - यह सब मेरे पुण्यों का ही प्रभाव है।

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥

हे मुनिराज, आपके चरणों के दर्शन से आज हमारे सारे पुण्य सफल हो गए। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो, जहाँ कोई मुनि भी उद्वेग न पाए -

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥

क्योंकि जिनसे मुनि-तपस्वी दुख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है, और ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥

ऐसा हृदय में समझकर वह स्थान बताइए जहाँ मैं सीता-लक्ष्मण सहित जा बसूँ, और वहाँ सुंदर पत्तों-घास की कुटी बनाकर, हे दयालु, कुछ समय निवास करूँ।

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥

राम की सहज सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले - धन्य, धन्य! हे रघुकुल-ध्वज, आप ऐसा क्यों न कहेंगे - आप तो सदा वेद की मर्यादा के रक्षक हैं।

छंद

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

हे राम, आप वेद-मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकी आपकी माया हैं, जो आपकी इच्छा पाकर जगत की रचना, पालन और संहार करती हैं। जो शेषनाग पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करते हैं, वही चराचर के स्वामी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिए आप राजकुमार का रूप धरकर दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने चले हैं।

सोरठा

राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह१२६

हे राम, आपका स्वरूप वाणी से परे, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है - वेद निरंतर उसे "नेति-नेति" कहकर ही वर्णित करते हैं।

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥

हे राम, संसार तो दृश्य है, आप उसके द्रष्टा हैं - आप ब्रह्मा-विष्णु-शिव तक को नचाने वाले हैं। जब वे भी आपका मर्म नहीं जानते, तो और कौन जान सकता है?

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई॥तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥

वही आपको जानता है जिसे आप स्वयं जना दें, और जानते ही वह आप-जैसा ही हो जाता है। हे रघुनंदन, हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन, आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥

आपकी देह चिदानंदमय और सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवताओं और संतों के कार्य के लिए मनुष्य-देह धारण की है, इसलिए साधारण राजा जैसे ही कहते-करते हैं।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥

हे राम, आपके चरित्र देख-सुनकर मूर्ख मोहित होते हैं और ज्ञानी सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते-करते हैं वह सब सत्य ही है - जैसा स्वांग धरा है, वैसा ही नाचना भी उचित है।

दोहा

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ१२७

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ, पर मैं यह पूछते हुए सकुचाता हूँ कि आप जहाँ न हों वह जगह बता दीजिए, तभी मैं आपके लिए ठिकाना दिखा सकूँगा।

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥

मुनि के प्रेमरस में डूबे वचन सुनकर राम सकुचाकर मन ही मन मुस्कुराए। वाल्मीकि हँसकर फिर अमृत जैसी मीठी वाणी में बोले -

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥

सुनिए राम, अब मैं वह स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीता-लक्ष्मण सहित निवास करें - जिनके कान समुद्र की तरह हैं और आपकी सुंदर कथा मानो अनेक नदियों की तरह उनमें बहती है,

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥

निरंतर भरती रहती हैं फिर भी वे कभी तृप्त नहीं होते - उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं। जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघ के लिए सदा तरसते रहते हैं,

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥

और जो बड़ी-बड़ी नदियों-समुद्रों-झीलों का तिरस्कार करके आपके सौंदर्य की एक बूँद से ही सुखी हो जाते हैं - हे रघुनाथ, उन्हीं के हृदयरूपी सुखद भवनों में आप भाई लक्ष्मण और सीता सहित निवास कीजिए।

दोहा

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु१२८

आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनकर आपके गुणसमूह रूपी मोती चुगती रहे, हे राम, आप उसी के हृदय में बस जाइए।

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

जिसकी नासिका प्रभु के पवित्र, सुगंधित प्रसाद को नित्य आदर से ग्रहण करती है, और जो आपको अर्पित करके ही भोजन करते हैं, आपके प्रसादरूप ही वस्त्र-आभूषण धारण करते हैं;

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा॥

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखते ही प्रेमपूर्वक विशेष नम्रता से झुक जाते हैं, जिनके हाथ नित्य आपके चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय में केवल आपका ही भरोसा है, दूसरा कोई नहीं;

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥

जिनके पैर आपके तीर्थों की ओर चलकर जाते हैं - हे राम, आप उनके मन में बस जाइए। जो नित्य आपके नाम-मंत्र का जप करते हैं और परिवार सहित आपकी पूजा करते हैं,

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥

जो अनेक विधियों से तर्पण-हवन करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराकर खूब दान देते हैं, और गुरु को आपसे भी बड़ा मानकर सब भाँति सम्मान के साथ उनकी सेवा करते हैं -

दोहा

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होइ।तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ१२९

ये सब कर्म करके भी वे केवल एक ही फल माँगते हैं - राम के चरणों में प्रेम हो। हे सीता-राम, उन्हीं के मनरूपी मंदिर में आप दोनों निवास कीजिए।

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥

जिनमें न काम है, न क्रोध, न मद, न अभिमान, न मोह; न लोभ, न क्षोभ, न राग, न द्वेष; और न कपट, न दंभ, न माया - हे रघुराज, आप उनके हृदय में निवास कीजिए।

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुख-सुख और निंदा-प्रशंसा समान लगते हैं, जो सोच-समझकर सच्चे, प्रिय वचन बोलते हैं और जागते-सोते सदा आपकी ही शरण में रहते हैं,

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥

और जिनके लिए आपके सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं - हे राम, आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को माता समान मानते हैं और पराया धन विष से भी भारी विष समझते हैं;

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

जो दूसरे का सुख देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे का दुख देखकर विशेष व्याकुल हो उठते हैं, हे राम, जिन्हें आप प्राणों से भी प्रिय हैं - उनका मन ही आपका सच्चा घर है।

दोहा

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात१३०

हे तात, जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता, गुरु - सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए।

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥नीति निपुन जिन्ह कह जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥

जो अवगुण छोड़कर सबके गुण ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिए संकट सहते हैं, नीति में जिनकी जगत भर में साख है, उनका सुंदर मन ही आपका घर है।

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥

जो अपने गुण आपके और दोष अपने समझता है, जिसे हर तरह से बस आपका ही भरोसा है, और जिसे राम-भक्त प्रिय लगते हैं - उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिए।

जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥

जाति, धन, धर्म, बड़ाई, प्रिय परिवार और सुखद घर - इन सबको छोड़कर जो केवल आपको हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथ, उसी के हृदय में आप निवास कीजिए।

सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥

स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसे समान लगते हैं, क्योंकि वह हर जगह बस धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है, और जो मन-वचन-कर्म से आपका दास है - हे राम, उसी के हृदय में डेरा डालिए।

दोहा

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु१३१

जिसे आपसे कभी कुछ नहीं चाहिए, और जिसका आपसे स्वाभाविक ही प्रेम है, आप निरंतर उसी के मन में बसिए - वही आपका अपना घर है।

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥

इस तरह मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि ने राम को कई घर दिखाए, उनके प्रेमभरे वचन राम के मन को भा गए। फिर मुनि ने कहा - हे सूर्यकुल-स्वामी, सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक निवास बताता हूँ -

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥

आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए हर तरह की सुविधा है। सुहावना पर्वत और सुंदर वन है, जहाँ हाथी, सिंह, हिरन और पक्षी विचरते हैं।

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी॥सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥

वहाँ एक पवित्र नदी है जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है, जिसे अत्रि-पत्नी अनसूया अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगा की ही धारा है, नाम है मंदाकिनी - जो सारे पापों को नष्ट करने वाली है।

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥

अत्रि जैसे कई श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग-जप-तप से अपनी देह साधते हैं। चलिए राम, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और इस पर्वतश्रेष्ठ को भी गौरव दीजिए।

दोहा

चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ१३२

महामुनि वाल्मीकि ने चित्रकूट की अपार महिमा सुनाई। तब सीता सहित दोनों भाइयों ने आकर उस श्रेष्ठ नदी में स्नान किया।

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥

राम ने कहा - लक्ष्मण, यह घाट बहुत अच्छा है, अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। लक्ष्मण ने पयस्विनी नदी का ऊँचा उत्तरी किनारा देखा, जिसके चारों ओर धनुष जैसा एक नाला घूमा हुआ था।

नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥

यह नदी मानो उस धनुष की डोरी है और शम-दम-दान उसके बाण हैं। कलियुग के सारे पाप इसके शिकार बने हिंसक पशु हैं। चित्रकूट मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी नहीं चूकता।

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥

यह कहकर लक्ष्मण ने जगह दिखाई, स्थान देखकर राम प्रसन्न हुए। देवताओं ने जान लिया कि राम का मन यहीं रम गया है, तो वे अपने प्रधान शिल्पी विश्वकर्मा को साथ लेकर चल पड़े।

कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥

सब देवता कोल-भील का वेश धरकर आए और पत्ते-घास के सुंदर घर बना दिए। दो ऐसी सुंदर कुटियाँ बनीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता - एक छोटी पर बेहद सुंदर, दूसरी बड़ी।

दोहा

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत१३३

लक्ष्मण और जानकी सहित प्रभु उस सुंदर कुटी में शोभायमान हैं, मानो कामदेव मुनि का वेश धरकर पत्नी रति और वसंत ऋतु के साथ सुशोभित हो रहे हों।

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥

उसी समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट आए, और राम ने सबको प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनंदित हुए।

बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥

फूल बरसाकर देवसमाज ने कहा - हे नाथ, आज हम सनाथ हो गए। फिर विनती करके उन्होंने अपने असह्य दुख सुनाए और आश्वासन पाकर प्रसन्न होकर अपने-अपने लोक लौट गए।

चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥

राम चित्रकूट में आ बसे हैं, यह खबर सुन-सुनकर कई मुनि वहाँ आए। मुनियों की मंडली को आते देख रघुकुल-चंद्र राम ने दंडवत प्रणाम किया।

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥

मुनिगण राम को हृदय से लगा लेते हैं और सफलता के लिए आशीर्वाद देते हैं। सीता-लक्ष्मण-राम की छवि देखकर वे अपनी सारी साधना सफल हुई मानते हैं।

दोहा

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद१३४

प्रभु ने यथोचित सम्मान करके मुनिमंडली को विदा किया। वे सब अपने-अपने आश्रमों में स्वच्छंद होकर योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे।

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥

यह खबर कोल-भीलों को मिली तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो घर बैठे नौ निधियाँ मिल गई हों। वे दोने भर-भरकर कंद-मूल-फल लेकर ऐसे चल पड़े मानो दरिद्र सोना लूटने जा रहे हों।

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता॥कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥

उनमें से जिन्होंने पहले ही दोनों भाइयों को देख लिया था, बाकी लोग रास्ते में उनसे पूछते जाते हैं। इस तरह राम की सुंदरता की चर्चा करते-सुनते सबने आकर राम के दर्शन किए।

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥

भेंट आगे रखकर वे जोहार करते हैं और गहरे अनुराग से प्रभु को निहारते हैं। वे मानो चित्र में खींचे हुए जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते हैं, शरीर पुलकित और आँखों में प्रेम के आँसू भर आते हैं।

राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी॥

राम ने सबको प्रेम में डूबा जानकर, प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनम्र वचन कहते हैं -

दोहा

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय१३५

हे नाथ, आपके चरणों का दर्शन पाकर आज हम सब सनाथ हो गए। हे कोसलराज, हमारे ही भाग्य से आपका यहाँ आगमन हुआ है।

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥

हे नाथ, जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे, वह भूमि, वन, रास्ता और पहाड़ धन्य हो गए। वहाँ विचरने वाले पक्षी-पशु भी धन्य हैं, जिन्होंने आपको देखकर अपना जन्म सफल कर लिया।

हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥

हम सब भी परिवार सहित धन्य हैं कि नेत्र भरकर आपका दर्शन कर पाए। आपने बड़ी सोच-समझकर अच्छी जगह निवास किया है - यहाँ हर ऋतु में आप सुखी रहेंगे।

हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥

हम हर तरह से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभु, यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ - सब हमने पग-पग देख रखे हैं।

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥

हम आपको जगह-जगह शिकार खिलाएँगे और तालाब-झरने दिखाएँगे। हम परिवार सहित आपके सेवक हैं, हे नाथ, इसलिए हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजिए।

दोहा

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन१३६

जो वेद-वचनों और मुनियों के मन तक को अगम हैं, वे करुणा के धाम राम भीलों के इन वचनों को ऐसे सुन रहे हैं जैसे पिता अपने बालक की बातें सुनता है।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेइ जो जाननिहारा॥राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥

राम को केवल प्रेम प्रिय है - जो जानना चाहे, जान ले। तब प्रेम से भरे राम ने कोमल वचन कहकर उन सब वनवासियों को संतुष्ट किया।

बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥

फिर उन्हें विदा किया। वे सिर नवाकर लौटे और राम के गुण कहते-सुनते घर पहुँचे। इस तरह देवता-मुनियों को सुख देने वाले दोनों भाई सीता सहित वन में रहने लगे।

जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥

जब से राम वहाँ आकर बसे, तभी से वह वन मंगलमय हो उठा। तरह-तरह के वृक्ष फूलने-फलने लगे, और उन पर लिपटी सुंदर लताओं के मंडप तन गए।

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥

वे कल्पवृक्ष जैसे स्वाभाविक रूप से ही सुंदर हो उठे, मानो देवताओं का नंदनवन छोड़कर यहीं आ बसे हों। भौंरों की पंक्तियाँ मीठा गुंजन करती हैं, और सुखद, शीतल, सुगंधित त्रिविध हवा बहती रहती है।

दोहा

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर१३७

नीलकंठ, कोयल, तोता, पपीहा, चकवा, चकोर - सब पक्षी तरह-तरह से ऐसी बोलियाँ बोलते हैं जो कानों को सुख देती हैं और मन को मोह लेती हैं।

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी॥

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर, हिरन - सब वैर भूलकर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार पर निकले राम की छवि देखकर पशुओं के झुंड विशेष आनंदित होते हैं।

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं॥सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥

संसार में जितने भी देवताओं के वन हैं, सब राम के इस वन को देखकर ईर्ष्या करते हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यपुत्री यमुना, नर्मदा, गोदावरी जैसी पुण्य नदियाँ,

सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥

सारे तालाब, समुद्र और नदियाँ मंदाकिनी की ही प्रशंसा करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मंदराचल, सुमेरु - देवताओं के ये सारे निवास-स्थान भी,

सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥

और हिमालय जैसे जितने भी पर्वत हैं, सब चित्रकूट का यश गाते हैं। विंध्याचल इतना आनंदित है कि उसके मन में सुख समाता नहीं - बिना किसी परिश्रम के उसने यह बड़ी प्रतिष्ठा पा ली है।

दोहा

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति१३८

चित्रकूट के पक्षी, पशु, लता, वृक्ष, तृण - इन सबकी हर जाति पुण्य की राशि और धन्य है - देवता दिन-रात यही कहते हैं।

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥

आँखों वाले जीव राम को निहारकर जन्म का फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और निर्जीव वस्तुएँ भी उनके चरणों की धूल छूकर सुखी हो उठती हैं - इस तरह सभी मानो परमपद के अधिकारी बन जाते हैं।

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥

वह वन और पर्वत स्वभाव से ही ऐसे सुंदर, मंगलमय और पवित्र हैं कि पवित्रों को भी पवित्र कर दें। उसकी महिमा भला कैसे कही जाए, जहाँ सुख के सागर राम ने निवास किया है।

पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥

क्षीरसागर और अयोध्या दोनों को छोड़कर सीता-लक्ष्मण-राम जहाँ आकर बसे, उस वन की शोभा का वर्णन तो लाख शेषनाग भी हजार-हजार मुखों से नहीं कर सकते।

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥

उसे मैं भला किस विधि से वर्णन करके कहूँ - क्या कहीं छोटे पोखर का कछुआ मंदराचल उठा सकता है? लक्ष्मण मन-वचन-कर्म से राम की सेवा करते हैं, उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु१३९

क्षण-क्षण सीता-राम के चरण निहारकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मण स्वप्न में भी भाई, माता-पिता और घर की याद नहीं करते।

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥

राम के साथ सीता अयोध्या, कुटुंब और घर की याद भूलकर सुखी रहती हैं। क्षण-क्षण पति के चंद्रमुख को निहारकर वे ऐसी प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरी चंद्रमा को देखकर।

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥

स्वामी का प्रेम नित्य बढ़ता देखकर सीता ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिन में चकवी। सीता का मन राम के चरणों में इतना रमा है कि उन्हें यह वन हजारों अयोध्या जैसा प्रिय लगता है।

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥

प्रियतम के साथ पर्णकुटी भी प्यारी लगती है, हिरन-पक्षी अपने परिवार जैसे लगते हैं। मुनि-पत्नियाँ सास जैसी, श्रेष्ठ मुनि ससुर जैसे, और कंद-मूल-फल अमृत जैसे मीठे लगते हैं।

नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥

स्वामी के साथ सोई हुई कुश-पत्तों की सेज भी सैकड़ों कामदेव-सेजों से बढ़कर सुखद है। जिनके दर्शन मात्र से जीव लोकपाल बन जाते हैं, भला उन्हें कोई भोग-विलास मोहित कर सकता है!

दोहा

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु१४०

जिन राम का स्मरण करते ही भक्त तमाम भोग-विलास तिनके जैसा त्याग देते हैं, उन्हीं की प्रिय पत्नी और जगत-जननी सीता के लिए यह त्याग कोई आश्चर्य की बात नहीं।

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥

सीता और लक्ष्मण को जिस तरह सुख मिले, राम वही करते और वही कहते हैं। वे पुरानी कथाएँ-कहानियाँ सुनाते हैं, और लक्ष्मण-सीता बड़े सुख से उन्हें सुनते हैं।

जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥

जब-जब राम को अयोध्या की याद आती है, उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता-पिता, परिजन, भाइयों और भरत के स्नेह-शील-सेवाभाव को याद करके -

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥

कृपासिंधु प्रभु दुखी हो उठते हैं, पर कुसमय जानकर धैर्य धर लेते हैं। राम को दुखी देखकर सीता-लक्ष्मण भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी की परछाईं उसी के भाव-भंगिमा दोहराती हो।

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥

प्रिया और भाई की यह दशा देखकर धीर, कृपालु, भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले राम कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मण और सीता सुख पाते हैं।

दोहा

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत१४१

लक्ष्मण और सीता सहित राम पर्णकुटी में ऐसे शोभित हैं जैसे अमरावती में इंद्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयंत के साथ बसते हों।

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥

प्रभु सीता-लक्ष्मण की ऐसी देखभाल करते हैं जैसे पलकें आँखों की करती हैं। इधर लक्ष्मण सीता-राम की ऐसी सेवा करते हैं जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने शरीर की करता है।

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥कहेउ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥

इस तरह पक्षी-पशु-देवता-तपस्वियों के हितकारी प्रभु वन में सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं। अब सुनिए, सुमंत्र जिस तरह अयोध्या लौटे, वह कथा।

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥

प्रभु को पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तो आकर उसने रथ को सुमंत्र सहित देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जो दुख हुआ, वह कहा नहीं जा सकता।

राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥

"राम, राम, सीता, लक्ष्मण" पुकारते हुए सुमंत्र धरती पर गिर पड़े, अत्यंत व्याकुल होकर। घोड़े दक्षिण दिशा की ओर देख-देखकर हिनहिनाते हैं, मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों।

दोहा

नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि१४२

वे न घास चरते हैं, न पानी पीते हैं, बस आँखों से आँसू बहाते रहते हैं। राम के घोड़ों की यह दशा देखकर सारे निषाद व्याकुल हो उठे।

धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥

तब धैर्य धरकर निषादराज बोला - सुमंत्र, अब विषाद छोड़िए। आप विद्वान और परमार्थ के ज्ञाता हैं, विधाता को प्रतिकूल जानकर धीरज धरिए।

बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी॥सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी॥

कोमल वाणी से तरह-तरह की कथाएँ सुनाकर निषाद ने जबरन सुमंत्र को रथ पर बिठा दिया। पर शोक से इतने शिथिल हो चुके थे कि रथ हाँक ही नहीं पाते - हृदय में राम-वियोग की तीव्र पीड़ा थी।

चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें॥

घोड़े तड़फड़ाते हैं, ठीक रास्ते पर नहीं चलते, मानो जंगली पशु पकड़कर रथ में जोत दिए गए हों। कभी लड़खड़ाकर गिर पड़ते, कभी मुड़कर पीछे देखने लगते - राम-वियोग की तीखी पीड़ा से व्याकुल।

जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती॥

जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम लेता है, घोड़े हिनहिनाकर प्रेम से उसकी ओर देखने लगते हैं। घोड़ों की यह विरह-दशा कैसे बयान हो, वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि खोकर साँप व्याकुल होता है।

दोहा

भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग१४३

मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद से भर उठा। तब उसने चार अच्छे सेवक बुलाकर सारथी के साथ भेज दिए।

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥

गुह सारथी सुमंत्र को पहुँचाकर लौटा - उसके विरह-दुख का वर्णन नहीं हो सकता। चारों निषाद रथ लेकर अयोध्या की ओर चले, पर हर क्षण विषाद में डूबे जाते थे।

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥

दुख से व्याकुल और दीन सुमंत्र सोचते हैं - राम के बिना जीने को धिक्कार है। यह अधम शरीर आखिर बचेगा तो नहीं ही, फिर राम से बिछुड़ते ही इसने प्राण क्यों नहीं त्याग दिए।

भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥

ये प्राण अपयश और पाप के भागी बन गए, फिर भी निकलते क्यों नहीं? हाय, मंद बुद्धि ने अच्छा मौका गँवा दिया, अब भी हृदय के दो टुकड़े नहीं होते।

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहूँ कृपन धन रासि गवाँई॥बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥

सुमंत्र हाथ मल-मलकर, सिर पीट-पीटकर पछताते हैं, मानो किसी कंजूस ने धन का खजाना खो दिया हो। वे ऐसे चले जा रहे थे मानो कोई वीर योद्धा कहलाकर युद्ध से भाग खड़ा हुआ हो।

दोहा

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति१४४

जैसे कोई विवेकी, वेदज्ञ, साधु-सम्मत आचरण वाला कुलीन ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी बैठे और फिर पछताए, वैसे ही मंत्री सुमंत्र पछता रहे हैं।

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥रहे करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु॥

जैसे किसी कुलीन, समझदार, मन-वचन-कर्म से पति को ही देवता मानने वाली साध्वी स्त्री को भाग्यवश पति से बिछुड़कर रहना पड़े, उसके हृदय में जैसी दारुण पीड़ा हो, वैसी ही सुमंत्र के हृदय में हो रही थी।

लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥

नेत्रों में जल भर आया है, दृष्टि धुँधली हो गई है, कानों से सुनाई नहीं देता, व्याकुल बुद्धि बेठिकाने है। होंठ सूख रहे हैं, मुँह में जीभ चिपक गई है, फिर भी प्राण नहीं निकलते - क्योंकि हृदय में अवधि की आस का किवाड़ लगा है।

बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥

सुमंत्र का चेहरा इतना बदरंग हो गया कि देखा नहीं जाता, मानो उन्होंने माता-पिता को मार डाला हो। राम-वियोग की गहरी ग्लानि मन पर छाई है, जैसे कोई पापी नरक जाते हुए रास्ते में पछता रहा हो।

बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥

मुँह से वचन नहीं निकलते, हृदय में पछताते हैं - अयोध्या जाकर मैं क्या देखूँगा? राम-रहित रथ जो भी देखेगा, वही मुझसे नज़र मिलाने में सकुचाएगा।

दोहा

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि१४५

नगर के व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदय पर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा।

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता॥पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥

दीन-दुखी सब माताएँ जब पूछेंगी, हे विधाता, मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मण की माता पूछेंगी, तब कौन-सा सुखद संदेश दूँगा?

राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई॥पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही॥

राम की माता जब दौड़ी आएँगी, जैसे नई ब्याई गाय बछड़े को याद कर दौड़ती है, तब उनके पूछने पर मुझे यही उत्तर देना होगा - राम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गए!

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥

जो भी पूछेगा, यही उत्तर देना पड़ेगा। हाय, अयोध्या जाकर अब बस यही सुख शेष है! जब दुख से दीन महाराज, जिनका जीवन ही राम पर टिका है, मुझसे पूछेंगे,

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई॥सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥

तब मैं कौन-सा मुँह लेकर कहूँगा कि राजकुमारों को कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण-सीता-राम का यह संदेश सुनते ही महाराज तिनके की तरह प्राण त्याग देंगे।

दोहा

-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु१४६

प्रियतम रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट क्यों नहीं गया - इससे तो यही जानता हूँ कि विधाता ने मुझे यह यातना सहने वाला शरीर ही दिया है।

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥

इस तरह रास्ते भर पछताते हुए सुमंत्र का रथ तुरंत तमसा नदी के तट पर आ पहुँचा। उन्होंने विनती करके चारों निषादों को विदा किया, वे विषाद से व्याकुल होते हुए पैरों पड़कर लौटे।

पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा॥

नगर में प्रवेश करते हुए मंत्री ऐसे सकुचा रहे थे मानो गुरु या गौ को मारकर आए हों। सारा दिन एक पेड़ के नीचे बिताया, संध्या होने पर मौका मिला।

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥

अँधेरा होते ही उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया और रथ द्वार पर खड़ा करके चुपचाप महल में घुसे। जिस-जिसने यह खबर सुनी, वे सब रथ देखने राजद्वार पर आ गए।

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जेसें॥

रथ पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर लोगों के शरीर ऐसे गल रहे थे जैसे धूप में ओले। नगर के स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल थे जैसे पानी घटने पर मछलियाँ।

दोहा

सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु१४७

मंत्री का अकेले लौटना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो उठा। महल उन्हें ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतों का निवास हो।

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी॥सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा॥

सभी रानियाँ अत्यंत व्याकुल होकर पूछती हैं, पर सुमंत्र की वाणी रुक गई है, उत्तर ही नहीं फूटता। न कानों से सुनाई देता है, न आँखों से कुछ सूझता है - वे जो भी सामने मिलता है, उसी से पूछते जाते हैं, राजा कहाँ हैं?

दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई॥जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा॥

दासियों ने मंत्री को व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्या के महल में ले गईं। सुमंत्र ने जाकर देखा - राजा ऐसे बैठे थे मानो अमृतरहित चंद्रमा।

आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना॥लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती॥

राजा आसन-शय्या-आभूषणों से रहित, बिल्कुल उदास धरती पर पड़े हैं। लंबी साँसें लेते हुए ऐसे सोच में डूबे हैं मानो राजा ययाति स्वर्ग से गिरकर पछता रहे हों।

लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती॥राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही॥

क्षण-क्षण छाती भर-भरकर सोच करते हैं, मानो पंख जलकर सम्पाती गिर पड़ा हो। राजा "राम, राम" कहते, फिर "हा राम, हा लक्ष्मण, हा जानकी" पुकारने लगते हैं।

दोहा

देखि सचिव जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कह सुमंत्र कहँ रामु१४८

मंत्री ने देखकर "जय हो, जीते रहें" कहकर दंडवत प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले - सुमंत्र, कहो, राम कहाँ हैं?

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥

राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया, मानो डूबते हुए को कोई सहारा मिल गया हो। स्नेह से पास बिठाकर, आँखों में आँसू भरे राजा पूछने लगे -