द्वितीय सोपान — भाग 4
अयोध्याकाण्ड
राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।
अयोध्याकाण्ड — सुनें
अयोध्याकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए॥॥२॥
हे मेरे स्नेही सखा, राम की कुशल कहो - बताओ, रघुनाथ, लक्ष्मण और वैदेही कहाँ हैं? क्या उन्हें लौटा लाए हो या वे वन को चले गए? यह सुनते ही मंत्री की आँखों में आँसू भर आए।
सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू॥राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥॥३॥
शोक से व्याकुल राजा फिर पूछने लगे - सीता, राम, लक्ष्मण का संदेश तो कहो। राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते रहे।
राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना॥॥४॥
मैंने राजतिलक की बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिसके मन में न हर्ष हुआ न विषाद, उस पुत्र से बिछुड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गए - मुझसे बड़ा पापी और कौन होगा!
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।॥१४९॥
हे सखा, राम, सीता, लक्ष्मण जहाँ हों, मुझे भी वहीं पहुँचा दो - नहीं तो सच कहता हूँ, अब मेरे प्राण चलने को ही व्याकुल हैं।
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥॥१॥
राजा बार-बार मंत्री से पूछते हैं - मेरे प्यारे पुत्रों का संदेश सुनाओ। हे सखा, तुरंत वही उपाय करो जिससे राम, लक्ष्मण, सीता को मुझे आँखों दिखा सको।
सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा॥॥२॥
मंत्री धीरज धरकर कोमल वाणी में बोले - महाराज, आप विद्वान और ज्ञानी हैं। हे देव, आप शूरवीरों और धैर्यवानों में श्रेष्ठ हैं, आपने सदा साधु-समाज की सेवा की है।
जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा॥काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥॥३॥
जन्म-मरण, सुख-दुख के भोग, हानि-लाभ, प्रियजनों का मिलना-बिछुड़ना - ये सब, हे स्वामी, काल और कर्म के अधीन रात-दिन की तरह अपने आप होते रहते हैं।
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥॥४॥
मूर्ख सुख में हर्षित होते और दुख में रोते हैं, पर धीर पुरुष मन में दोनों को समान मानते हैं। धीरज धरिए, विवेक से विचार कीजिए और सबका हित सोचकर शोक त्याग दीजिए।
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।नहाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर॥१५०॥
राम का पहला पड़ाव तमसा तट पर हुआ, दूसरा गंगा तट पर - सीता सहित दोनों भाई उस दिन केवल स्नान करके जल पीकर ही रहे।
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥॥१॥
केवट ने बहुत सेवा की, वह रात श्रृंगवेरपुर में ही बीती। सवेरा होते ही बरगद का दूध मँगवाकर राम-लक्ष्मण ने सिर पर जटाओं के मुकुट बनाए।
राम सखा तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥॥२॥
तब सखा निषादराज ने नाव मँगवाई। पहले प्रिया सीता को चढ़ाकर, फिर राम स्वयं चढ़े। लक्ष्मण ने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू॥॥३॥
मुझे व्याकुल देखकर राम ने धीरज धरकर मधुर वचन कहे - तात, पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और बार-बार उनके चरण-कमल पकड़ना।
करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी॥बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें॥॥४॥
फिर पैर पकड़कर विनती करना कि पिताजी, मेरी चिंता न कीजिए। आपकी कृपा और पुण्य से वन में और रास्ते में हमारा कल्याण ही होगा।
तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥जननीं सकल परितोषि परि परि पाय करि बिनती घनी।तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी॥
पिताजी, आपके अनुग्रह से मैं वन में जाते हुए भी सुख ही पाऊँगा। आज्ञा का भलीभाँति पालन करके, आपके दर्शन को फिर कुशलपूर्वक लौट आऊँगा। सब माताओं के चरणों में गिर-गिरकर, उनसे बहुत विनती करके - तुलसीदास कहते हैं - तुम वही करना जिससे कोसलपति पिता कुशल रहें।
गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥१५१॥
बार-बार चरण-कमल पकड़कर गुरु वसिष्ठ से मेरा संदेश कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिता मेरी चिंता न करें।
पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी॥सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी॥॥१॥
पुरवासियों और परिजनों सबसे विनती करके, तात, मेरी यह प्रार्थना सुनाना कि वही मेरा सच्चा हितैषी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।
कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥॥२॥
भरत के आने पर उन्हें मेरा संदेश कहना कि राजपद पाकर भी नीति न छोड़ें, मन-वचन-कर्म से प्रजा का पालन करें और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करें।
ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥॥३॥
और भाई, पिता-माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपन को अंत तक निभाना। हे तात, राजा को इस तरह रखना जिससे उन्हें कभी मेरी चिंता न सतानी पड़े।
लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई॥॥४॥
लक्ष्मण ने कुछ कठोर वचन कहे, पर राम ने उन्हें रोककर फिर मुझसे अनुरोध किया, बार-बार अपनी सौगंध दिलाई - कहा, तात, वहाँ लक्ष्मण की यह लड़कपन वाली बात मत कहना।
कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥१५२॥
प्रणाम करके सीता भी कुछ कहना चाहती थीं, पर स्नेह से शिथिल हो गईं - वाणी रुक गई, आँखों में जल भर आया और शरीर रोमांच से भर उठा।
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥॥१॥
उसी समय राम का इशारा पाकर केवट ने नाव पार को चला दी। इस तरह रघुकुल-तिलक राम चले गए, और मैं छाती पर वज्र रखे खड़ा-खड़ा देखता रहा।
मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ॥॥२॥
मैं अपना दुख कैसे बताऊँ, कि राम का यह संदेश लेकर भी मैं जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गई, और वे ग्लानि और सोच से भर उठे।
सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥॥३॥
सारथी के वचन सुनते ही राजा धरती पर गिर पड़े, हृदय में भयानक जलन उठी। वे तड़पने लगे, मन गहरे मोह से व्याकुल हो गया - मानो मछली को माँझा (वर्षा का पहला जल) लग गया हो।
करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी॥सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा॥॥४॥
सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं - उस महान विपत्ति का वर्णन कैसे हो सके? उनका विलाप सुनकर दुख को भी दुख हुआ, और धीरज का भी धीरज छूट गया।
भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु॥१५३॥
राजमहल में उठे शोर को सुनकर पूरे अयोध्या में भारी कुहराम मच गया, मानो पक्षियों से भरे किसी वन में रात में कठोर वज्र गिरा हो।
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥॥१॥
राजा के प्राण कंठ तक आ गए, मानो मणि खोकर साँप व्याकुल हो उठा हो। सारी इंद्रियाँ बुरी तरह विकल हो गईं, मानो बिना जल के तालाब में कमल-वन मुरझा गया हो।
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी॥॥२॥
कौसल्या ने राजा को इतना व्याकुल देखा कि हृदय में समझ गईं - अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त होने को है। तब राम की माता कौसल्या धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं -
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू॥करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥॥३॥
हे नाथ, मन में विचार कीजिए कि राम का यह वियोग एक अपार समुद्र है, अयोध्या उसमें चलता जहाज है, और आप उसके कर्णधार हैं - सब प्रियजन ही इस जहाज पर सवार यात्री हैं।
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू॥जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥॥४॥
धीरज धरेंगे तो सब पार लग जाएँगे, नहीं तो सारा परिवार डूब जाएगा। हे प्रिय स्वामी, यदि मेरी यह विनती मान लें तो राम, लक्ष्मण, सीता फिर मिल जाएँगे।
प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि॥१५४॥
प्रिय पत्नी के कोमल वचन सुनकर राजा ने आँखें खोलकर देखा - मानो कोई तड़पती हुई दीन मछली पर शीतल जल छिड़क रहा हो।
धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥॥१॥
धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले - सुमंत्र, कहो, कृपालु राम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है?
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती॥तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥॥२॥
राजा व्याकुल होकर बहुत तरह से विलाप कर रहे हैं, वह रात युग जैसी लंबी हो गई, बीतती ही नहीं। तभी राजा को अंधे तपस्वी के शाप की याद आई, और उन्होंने वह सारी कथा कौसल्या को सुना दी।
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा॥सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा॥॥३॥
वह कथा सुनाते-सुनाते राजा व्याकुल हो उठे और बोले - राम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है! मैं इस शरीर को रखकर क्या करूँगा, जिसने मेरा प्रेम का प्रण नहीं निभाया?
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥॥४॥
हा रघुनंदन, मेरे प्राणप्रिय! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गए। हा जानकी, हा लक्ष्मण, हा रघुवर! हा पिता के हृदयरूपी चातक के लिए मेघ समान पुत्र!
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥१५५॥
राम-राम कहते, फिर राम कहते, फिर राम-राम कहते और फिर राम कहते हुए राजा राम के विरह में शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले गए।
जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥॥१॥
जीने और मरने का सच्चा फल तो दशरथ ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनगिनत ब्रह्मांडों में फैल गया। जीते-जी राम के चंद्रमुख को निहारा, और राम के विरह को ही अपनी मृत्यु का सुंदर बहाना बना लिया।
सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी॥करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा॥॥२॥
शोक से व्याकुल सब रानियाँ रो रही हैं, राजा के रूप, शील, बल और तेज का बखान करते हुए वे तरह-तरह से विलाप करती हैं और बार-बार धरती पर गिर पड़ती हैं।
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू॥॥३॥
दास-दासी व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं, नगरवासी घर-घर रो रहे हैं - कहते हैं, आज धर्म की सीमा, गुण-रूप के भंडार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गए!
गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी॥॥४॥
सब कैकेयी को कोसते हैं, जिसने पूरे संसार को अंधा कर दिया। इस तरह विलाप करते-करते रात बीत गई। सवेरे बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि वहाँ आए।
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥१५६॥
तब वसिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल कई इतिहास सुनाकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।
तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥॥१॥
वसिष्ठ ने तेल भरी नाव में राजा के शरीर को सुरक्षित रखवा दिया, फिर दूतों को बुलाकर कहा - तुरंत भरत के पास दौड़ो, पर राजा की मृत्यु की खबर रास्ते में किसी को मत बताना।
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई॥सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए॥॥२॥
भरत से जाकर बस इतना कहना कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलवाया है। मुनि की आज्ञा सुनते ही दूत दौड़ पड़े, अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी मात करते हुए चले।
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥॥३॥
जब से अयोध्या में यह अनर्थ शुरू हुआ, तभी से भरत को अपशकुन होने लगे थे। वे रात में डरावने सपने देखते और जागकर तरह-तरह की बुरी कल्पनाएँ करते रहते।
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥॥४॥
वे रोज़ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते, शिव का अभिषेक कई विधियों से करते। हृदय में महादेव को मनाकर माता-पिता, परिजन और भाइयों की कुशलता माँगते।
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥१५७॥
भरत मन में यों ही सोच रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरु की आज्ञा सुनते ही वे गणेश जी को मनाकर चल पड़े।
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥॥१॥
हवा जैसे वेग वाले घोड़ों को हाँकते हुए वे कठिन नदी, पहाड़ और घने जंगल लाँघते चले। हृदय में गहरा सोच था, कुछ भाता नहीं था - मन में यही सोचते कि उड़कर पहुँच जाऊँ।
एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥॥२॥
एक-एक पल वर्ष जैसा बीत रहा था, इस तरह भरत नगर के निकट पहुँचे। नगर में प्रवेश करते ही अपशकुन होने लगे - कौवे बुरी जगह बैठकर अशुभ बोलने लगे।
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥॥३॥
गधे और सियार विपरीत दिशा में बोल रहे हैं, यह सुन-सुनकर भरत के मन में गहरी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब बेरौनक हो गए हैं, नगर बेहद डरावना लग रहा है।
खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥॥४॥
राम के वियोग रूपी रोग से पीड़ित पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी ऐसे दुखी हैं कि देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यंत दुखी हैं, मानो सबने अपनी सारी संपत्ति खो दी हो।
पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥१५८॥
नगरवासी मिलते हैं पर कुछ बोलते नहीं, चुपचाप दूर से ही प्रणाम करके निकल जाते हैं। भरत भी किसी से कुशल नहीं पूछ पाते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छाया है।
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥॥१॥
बाजार और रास्ते सूने नहीं दिखते, मानो पूरे नगरमें चारों ओर आग लग गई हो। पुत्रके आनेकी बात सुनकर सूर्यवंशरूपी कमलको खिलानेवाली चाँदनी के समान कैकेयी बहुत हर्षित हुई।
सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई॥भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥॥२॥
आरती सजाकर वह आनंदमें उठ दौड़ी और द्वारपर ही भरत-शत्रुघ्नसे मिलकर उन्हें महलमें ले आई। भरतने पूरे परिवारको उदास देखा, मानो कमलोंके वनपर पाला पड़ गया हो।
कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥॥३॥
कैकेयी अकेली ऐसी हर्षित दिखाई देती है जैसे कोई भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनंदित हो रही हो। पुत्रको चिंतित और उदास देखकर वह पूछने लगी - हमारे नैहरमें तो सब कुशल है न?
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥॥४॥
भरतने सारी कुशल-क्षेम बता दी और फिर अपने घरकी कुशलता पूछी - पिताजी कहाँ हैं, सब माताएँ कहाँ हैं, सीता और मेरे प्रिय भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं?
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥१५९॥
पुत्रके स्नेहभरे वचन सुनकर आँखोंमें कपटके आँसू भरकर पापिनी कैकेयी भरतके मनमें शूलकी तरह चुभनेवाले वचन बोली।
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥॥१॥
बेटा, मैंने सारी बात बना ली थी, बेचारी मंथरा भी सहायक बनी। पर विधाताने बीचमें कुछ बिगाड़ दिया - राजा स्वर्गको सिधार गए।
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥॥२॥
यह सुनते ही भरत दुखसे विवश हो गए, मानो सिंहकी दहाड़ सुनकर हाथी सहम गया हो। 'तात, तात, हा तात' पुकारते हुए वे व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े।
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥॥३॥
आपके जाते समय मैं दर्शन भी न कर सका, आपने मुझे राम भी नहीं सौंपा - ऐसा विलाप करते हुए फिर धीरज धरकर वे उठे और बोले - माता, पिताके मरनेका कारण तो बताओ।
सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥॥४॥
पुत्रका यह वचन सुनकर कैकेयी मानो घावमें विष भरते हुए बोलने लगी और शुरूसे लेकर अपनी सारी करनी बड़े प्रसन्न मनसे कठोरतापूर्वक सुना दी।
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥१६०॥
राम वनको गए यह सुनते ही भरतको पिताके मरनेका शोक भी भूल गया, और मनमें इस सबका कारण खुदको जानकर वे स्तब्ध होकर मौन खड़े रह गए।
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।॥॥१॥
पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी घावपर नमक छिड़कती-सी समझाने लगी - बेटा, राजाके लिए सोच करनेकी बात नहीं, उन्होंने पुण्य कमाकर उसका पूरा भोग कर लिया।
जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥॥२॥
जीते-जी उन्होंने जन्मका सारा फल पा लिया और अंतमें इंद्रलोक चले गए। ऐसा समझकर सोच छोड़ो और समाजसहित नगरका राज्य संभालो।
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा॥॥३॥
यह सुनकर राजकुमार भरत बुरी तरह सहम गए, मानो पके घावपर अंगारा छू गया हो। धीरज धरकर लंबी साँस लेते हुए बोले - पापिनी, तूने हर तरहसे कुलका नाश कर डाला।
जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥पेड़ काटि तें पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥॥४॥
यदि तेरी नीयत इतनी बुरी थी तो जन्मते ही मुझे क्यों नहीं मार डाला? तूने तो पेड़ काटकर पत्तेको सींचा और मछलीके लिए पानी ही उलीच डाला - मेरा भला करते-करते उलटा अहित कर डाला।
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥१६१॥
मुझे सूर्यवंश-सा वंश मिला, दशरथ-जैसे पिता मिले, राम-लक्ष्मण-से भाई मिले, पर हे माता, जन्म देनेवाली तू निकली! विधाताके आगे किसीका वश नहीं चलता।
जब तें कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदय न गयऊ॥बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा॥॥१॥
जिस दिन तूने यह दुर्बुद्धि मनमें ठानी, उसी क्षण तेरे हृदयके टुकड़े-टुकड़े क्यों न हो गए? वरदान माँगते समय तुझे तनिक भी पीड़ा न हुई, तेरी जीभ न गली, तेरे मुँहमें कीड़े न पड़े?
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥॥२॥
राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? लगता है मरते समय विधाताने उनकी बुद्धि ही हर ली थी। स्त्रीके हृदयकी चाल तो विधाता भी नहीं जान पाया, वह तो कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है।
सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जाने तीय सुभाऊ॥अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥॥३॥
पर पिता तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे, वे भला स्त्रीका स्वभाव कैसे जानते? संसारमें ऐसा कौन जीव है जिसे राम प्राणोंसे प्यारे नहीं?
भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई॥॥४॥
वही राम भी तुझे शत्रु लगने लगे! तू सच-सच बता, तू कौन है? जो भी है सो है, अब मुँह काला करके उठ और मेरी नजरोंसे दूर जा बैठ।
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥१६२॥
विधाताने मुझे रामके विरोधी तेरे ही हृदयसे जन्म दिया। मेरे बराबर पापी और कौन होगा? मैं व्यर्थ ही तुझसे यह सब कह रहा हूँ।
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥॥१॥
माताकी यह कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नका रोम-रोम क्रोधसे जल उठा, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके वस्त्र-आभूषणोंसे सजी हुई कुबड़ी मंथरा वहाँ आ पहुँची।
लखि रिस भरे लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई॥हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा॥॥२॥
उसे सजी-धजी देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न क्रोधसे भर उठे, मानो जलती आगमें घी पड़ गया हो। उन्होंने ठीक निशाना साधकर उसके कूबड़पर लात जमा दी, वह चीखती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी।
कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा॥॥३॥
उसका कूबड़ टूट गया, खोपड़ी फूट गई, दाँत टूट गए, मुँहसे खून बहने लगा। वह कराहते हुए बोली - हाय दैव, मैंने क्या बिगाड़ा था, भला करते-करते यह बुरा फल पाया।
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥॥४॥
उसकी बात सुनकर और उसे सिरसे पाँवतक दुष्ट जानकर शत्रुघ्न उसे बाल पकड़कर घसीटने लगे। तब दयालु भरतने उसे छुड़ा दिया और दोनों भाई कौसल्याके पास चले गए।
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥१६३॥
कौसल्याके वस्त्र मैले हैं, चेहरा उतरा हुआ है, वे व्याकुल हैं, दुखके बोझसे शरीर सूख गया है - मानो सोनेकी सुंदर बेलको वनमें पालाने मार दिया हो।
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥॥१॥
भरतको देखते ही माता उठकर दौड़ीं पर चक्कर खाकर मूर्छित होकर गिर पड़ीं। यह देखकर भरत भी बहुत व्याकुल हो उठे और अपनी सुध भुलाकर उनके चरणोंमें गिर पड़े।
मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा॥॥२॥
बोले - माता, पिताजी कहाँ हैं, दिखा दो; सीता और मेरे दोनों भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं? कैकेयी संसारमें जन्मी ही क्यों, और जन्मी तो बाँझ क्यों न रही?
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥॥३॥
जिसने कुलका कलंक, अपयशका भागी और अपनोंका द्रोही मुझ-जैसा पुत्र जना, तीनों लोकोंमें मुझसे बड़ा अभागा कौन होगा, जिसके कारण माता तेरी यह दशा हुई।
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु॥धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥॥४॥
पिता स्वर्गमें हैं, राम वनमें हैं, इन सब अनर्थोंका कारण मैं ही हूँ। धिक्कार है मुझे, मैं तो बाँसके वनमें उठी आगकी तरह हूँ जिसने यह असह्य जलन और दुख फैलाया।
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥१६४॥
भरतके कोमल वचन सुनकर माता फिर सँभलकर उठीं, उन्हें उठाकर छातीसे लगा लिया और आँखोंसे आँसू बहाने लगीं।
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥॥१॥
सीधे स्वभाववाली माताने भरतको ऐसे प्रेमसे गले लगाया मानो राम ही लौट आए हों। फिर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नको भी गले लगाया। हृदयमें शोक और स्नेह समाए नहीं समा रहे थे।
देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे॥॥२॥
उनका यह स्वभाव देखकर सब कहने लगे - रामकी माता ऐसी ही तो होनी चाहिए। माताने भरतको गोदमें बिठाया, आँसू पोंछे और कोमल वचन बोलीं।
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि॥॥३॥
बेटा, अब भी धीरज धरो, बुरा समय समझकर शोक छोड़ दो। काल और कर्मकी गति टाली नहीं जा सकती, यह जानकर मन ही मन हानि और ग्लानि मत मानो।
काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥॥४॥
बेटा, किसीको दोष मत दो, विधाता तो मेरे साथ ही उलटा हो गया है कि इतने दुखके बाद भी मुझे जिला रहा है। कौन जानता है उसे अब और क्या मंजूर है।
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥१६५॥
पिताकी आज्ञासे राम ने गहने-वस्त्र त्याग दिए और वल्कल पहन लिए। उनके मनमें न कोई खेद था, न कोई हर्ष।
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥चले बिपिन सुनि सिय संग लागी। रहहिं न राम चरन अनुरागी॥॥१॥
मुख प्रसन्न था, मनमें न मोह था न रोष, सबको संतुष्ट करके वे वनको चल दिए। यह सुनते ही सीता भी साथ हो लीं, रामके चरणोंकी प्रेमिका वे किसी तरह पीछे न रह सकीं।
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥॥२॥
यह सुनते ही लक्ष्मण भी उठकर साथ चल दिए, राघुनाथने उन्हें रोकनेकी बहुत कोशिश की पर वे न रुके। तब सबको सिर नवाकर राघुनाथ सीता और छोटे भाईको साथ लेकर चले गए।
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गयउँ न संग न प्रान पठाए॥यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें॥॥३॥
राम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गए, न मैं उनके साथ गई, न अपने प्राण उनके साथ भेजे। यह सब मेरी इन्हीं आँखोंके सामने हुआ, फिर भी अभागे इस जीवने शरीर नहीं छोड़ा।
मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥॥४॥
अपने ही स्नेहको देखकर मुझे लाज तक नहीं आती, राम-जैसे पुत्रकी मैं माता हूँ! जीना-मरना तो राजाने खूब समझा था, मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है।
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥१६६॥
कौसल्याके यह वचन सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा, राजमहल मानो शोकका घर बन गया।
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥॥१॥
भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई व्याकुल होकर रो रहे थे, कौसल्याने उन्हें छातीसे लगा लिया और अनेक प्रकारसे समझा-बुझाकर विवेकभरी बातें कहीं।
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं॥छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥॥२॥
भरतने भी सब माताओंको पुराण-वेदकी सुंदर कथाएँ सुनाकर धीरज बँधाया। फिर हाथ जोड़कर वे निष्कपट, पवित्र और सीधी वाणीमें बोले।
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥॥३॥
जो पाप माता-पिता-पुत्रकी हत्यासे, गौशाला और ब्राह्मणोंके गाँव जलानेसे लगते हैं, जो पाप स्त्री-बालककी हत्यासे और मित्र-राजाको विष देनेसे लगते हैं,
जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं॥ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता॥॥४॥
कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने भी छोटे-बड़े पाप कवियोंने गिनाए हैं - हे विधाता, अगर इस काममें मेरी सहमति रही हो तो हे माता, वे सारे पाप मुझे लगें।
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥१६७॥
जो लोग हरि और शंकरके चरण छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंकी उपासना करते हैं, माता, अगर इसमें मेरी सहमति रही हो तो विधाता मुझे उन्हींकी गति दे।
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥॥१॥
जो वेद बेचते हैं, धर्मको दुहकर कमाते हैं, चुगली करते हैं, दूसरोंके पाप उघाड़ते हैं, जो कपटी, कुटिल, झगड़ालू और क्रोधी हैं, जो वेदोंकी निंदा करते और सारे संसारसे बैर रखते हैं,
लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥॥२॥
जो लोभी, लम्पट और लालचमें डूबे रहते हैं, जो दूसरोंके धन और स्त्रीपर नजर रखते हैं - माता, अगर यह मेरी सम्मति रही हो तो मैं उन्हींकी भयानक गति पाऊँ।
जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥॥३॥
जिनका सत्संगमें मन नहीं लगता, जो अभागे परमार्थके मार्गसे मुँह मोड़े रहते हैं, जो मनुष्य-जन्म पाकर भी हरिका भजन नहीं करते, जिन्हें हरि-हरका सुयश अच्छा नहीं लगता,
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥तिन्ह के गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥॥४॥
जो वेदमार्ग छोड़कर उल्टे रास्तेपर चलते हैं, जो ठग वेष बनाकर संसारको छलते हैं - माता, अगर यह भेद मुझे मालूम रहा हो तो शंकर मुझे उन्हींकी गति दें।
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ॥१६८॥
भरतके यह सच्चे और सरल स्वाभाविक वचन सुनकर माता कौसल्या बोलीं - बेटा, तुम तो सदा ही मन, वचन और शरीरसे रामके प्रिय हो।
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥॥१॥
बेटा, राम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं और तुम भी राघुनाथको प्राणोंसे बढ़कर प्यारे हो। चाहे चाँद विष उगलने लगे और पाला आग बरसाने लगे, जलचर जीव पानीसे विरक्त हो जाएँ,
भए ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥॥२॥
चाहे ज्ञान होनेपर भी मोह न मिटे, तुम राम के विरुद्ध कभी नहीं हो सकते। संसारमें जो लोग तुम्हारे विषय में ऐसा कहते हैं, वे स्वप्नमें भी सुख और सद्गति नहीं पाएँगे।
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए॥करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती॥॥३॥
ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतको छातीसे लगा लिया, उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा और आँखोंमें आँसू छलक आए। इस तरह विलाप करते हुए बैठे-बैठे ही सारी रात बीत गई।
बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे॥॥४॥
तब वामदेव और वसिष्ठ आए, उन्होंने सब मंत्रियों और नगरवासियोंको बुलवाया। मुनि वसिष्ठने बहुत तरहसे परमार्थकी उचित बातें कहकर भरतको समझाया।
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥१६९॥
हे तात, हृदयमें धीरज धरो और आज जो करने योग्य है वह करो - गुरुके यह वचन सुनकर भरत उठे और सारी तैयारीका आदेश दिया।
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥॥१॥
वेदविधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और एक अद्भुत विमान सजाया गया। भरतने सब माताओंके चरण पकड़कर उन्हें रोक लिया, और वे रानियाँ राम-दर्शनकी आशामें रुक गईं।
चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए॥सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥॥२॥
चंदन, अगर और अनगिनत सुगंधित द्रव्योंके ढेर मँगाए गए। सरयूके तटपर ऐसी सुंदर चिता सजाई गई मानो स्वर्गकी सीढ़ी हो।
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत नहाइ तिलांजुलि दीन्ही॥सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥॥३॥
इस तरह सारी दाहक्रिया संपन्न हुई और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलांजलि दी। वेद-स्मृति-पुराणका मत जानकर भरतने पिताका दसगात्र-विधान पूरा किया।
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा॥भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना॥॥४॥
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने जहाँ जैसा आदेश दिया, भरतने वहाँ वैसा ही हजारों तरहसे किया। शुद्ध होकर गौ, घोड़े, हाथी आदि अनेक सवारियाँ दान कीं,
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम॥१७०॥
सिंहासन, गहने, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और घर - सब भरतने दान किए, और ब्राह्मण यह पाकर पूरी तरह संतुष्ट हो गए।
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥॥१॥
पिताके लिए भरतने जो कुछ किया वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं हो सकता। शुभ दिन देखकर तब मुनि वसिष्ठ आए और मंत्रियों तथा नगरवासियोंको बुलवाया।
बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई॥भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे॥॥२॥
सब लोग राजसभामें जाकर बैठे। मुनिने भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको बुलवाया, भरतको अपने पास बिठाकर नीति और धर्मसे भरे वचन कहे।
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी॥भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा॥॥३॥
पहले मुनिने कैकेयीकी सारी कुटिल करनी की कथा कही, फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने प्रेम निभानेके लिए शरीर तक त्याग दिया।
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥॥४॥
राम के गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते मुनिराजकी आँखें भर आईं और शरीर पुलकित हो उठा। फिर लक्ष्मण और सीताके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें डूब गए।
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥१७१॥
मुनिनाथ भारी मनसे बोले - भरत, सुनो, होनहार बड़ी बलवान होती है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश - यह सब विधाताके हाथ है।
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥॥१॥
ऐसा सोचकर किसे दोष दें, किसपर व्यर्थ क्रोध करें? हे तात, मनमें विचार करो - राजा दशरथ सोच करने योग्य नहीं हैं।
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥॥२॥
सोच तो उस ब्राह्मणका करना चाहिए जो वेद नहीं जानता और अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें डूबा रहता है। सोच उस राजाका करना चाहिए जो नीति नहीं जानता और जिसे प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं।
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥॥३॥
सोच उस वैश्यका करना चाहिए जो धनवान होकर भी कंजूस है और अतिथि-सत्कार तथा शिव-भक्तिमें कुशल नहीं। सोच उस शूद्रका करना चाहिए जो ब्राह्मणोंका अपमान करता है, बहुत बोलता है, मान चाहता है और ज्ञानका घमंड रखता है।
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥॥४॥
फिर सोच उस स्त्रीका करना चाहिए जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, झगड़ालू और मनमानी करनेवाली है। सोच उस ब्रह्मचारीका करना चाहिए जो अपना व्रत छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञा नहीं मानता।
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग॥१७२॥
सोच उस गृहस्थका करना चाहिए जो मोहवश कर्मका रास्ता छोड़ देता है। सोच उस संन्यासीका करना चाहिए जो सांसारिक प्रपंचमें फँसा है और जिसमें ज्ञान-वैराग्य नहीं।
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥॥१॥
वानप्रस्थी वही सोचने योग्य है जिसे तप छोड़कर भोग अच्छे लगने लगें। सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करता है और माता-पिता-गुरु-भाइयोंसे बैर रखता है।
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥॥२॥
हर तरहसे सोच उसका करना चाहिए जो दूसरोंका बुरा करता है, सिर्फ अपना ही शरीर पालता है और बहुत निर्दयी है। और सबसे ज्यादा सोच उसका करना चाहिए जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं बनता।
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥॥३॥
पर कोसलराज दशरथ सोच करने योग्य नहीं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें फैला है। भरत, तुम्हारे-जैसा पिता न कभी हुआ, न है, न आगे होगा।
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥॥४॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र और सब दिक्पाल दशरथके गुणोंकी कथाएँ गाया करते हैं।
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥१७३॥
हे तात, बताओ, उनकी बड़ाई भला कोई कैसे करे जिनके राम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-जैसे पवित्र पुत्र हैं?
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥॥१॥
राजा हर तरहसे भाग्यशाली थे, उनके लिए विषाद करना व्यर्थ है। यह समझकर सोच छोड़ दो और राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो।
राय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥॥२॥
राजाने राजपद तुम्हें दिया है, पिताका वचन सच करना ही चाहिए, जिन्होंने वचनके लिए राम को त्याग दिया और राम-विरहकी अग्निमें अपना शरीर तक होम कर दिया।
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥करहु सीस धरि भूप रजाई। है तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥॥३॥
राजाको वचन प्रिय थे, प्राण नहीं। इसलिए तात, पिताके वचनको सच करो, उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके पालन करो, इसीमें तुम्हारा सब तरहसे भला है।
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥॥४॥
परशुरामने पिताकी आज्ञा रखते हुए माताको मार डाला, सारा संसार इसका साक्षी है। ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी - पिताकी आज्ञा माननेसे उन्हें पाप या अपयश नहीं लगा।
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥१७४॥
जो उचित-अनुचितका विचार छोड़कर पिताके वचनका पालन करते हैं, वे सुख और सुयशके भागी बनकर अंततः स्वर्गमें बसते हैं।
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू॥॥१॥
राजाका वचन अवश्य सच करो, शोक छोड़ो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजाको संतोष मिलेगा और तुम्हें पुण्य और सुयश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥॥२॥
वेदमें भी यही बात प्रसिद्ध और सबको मान्य है कि पिता जिसे राज्य दे वही राजतिलक पाता है। इसलिए राज्य करो, ग्लानि छोड़ दो, मेरे वचनको हितकारी समझकर मानो।
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥॥३॥
यह सुनकर राम और सीता भी सुखी होंगे, कोई विद्वान इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्या समेत सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी।
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥॥४॥
जो तुम्हारे और रामके श्रेष्ठ संबंधको जानेगा, वह तुम्हें ही भला समझेगा। राम के लौटनेपर राज्य उन्हें सौंप देना, तबतक स्नेहपूर्वक उनकी ओरसे प्रजाकी सेवा करना।
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥१७५॥
मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं - गुरुकी आज्ञा अवश्य मानिए, राघुनाथके लौटनेपर जो उचित होगा वह तब कर लीजिएगा।
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥॥१॥
कौसल्या धीरज धरकर कह रही हैं - बेटा, गुरुकी आज्ञा ही तुम्हारे लिए हितकारी है, उसे मानो, हित समझकर पालन करो और कालकी गति जानकर विषाद छोड़ दो।
बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा॥॥२॥
राम वनमें हैं, राजा स्वर्ग सिधार गए, और तात, तुम इस तरह कातर हो रहे हो! परिवार, प्रजा, मंत्री और सब माताओं - सबका सहारा अब तुम्हीं हो।
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥॥३॥
विधाता प्रतिकूल और समय कठोर देखकर धीरज धरो, बेटा, मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ। गुरुकी आज्ञा शिरोधार्य करके प्रजाका पालन करो और परिवारका दुख दूर करो।
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥॥४॥
गुरुके वचन और मंत्रियोंके समर्थनको सुनकर भरतके हृदयको मानो चंदनकी ठंडक मिली। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलतासे भरी माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी।
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
माताकी सरल और स्नेहभरी वाणी सुनकर भरत व्याकुल हो उठे, उनकी आँखोंसे बहते आँसू मानो हृदयमें उगे विरहके नए अंकुरको सींच रहे थे। उस दशाको देखकर उस पल सबको अपनी देहकी सुध भूल गई। तुलसीदास कहते हैं - सब आदरपूर्वक भरतके इस स्वाभाविक स्नेहकी सीमाकी सराहना करने लगे।
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥१७६॥
धैर्यको थामे भरत हाथ जोड़कर, धीरज धरकर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबोकर सबको उचित उत्तर देने लगे -
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥॥१॥
गुरुने मुझे सुंदर उपदेश दिया, प्रजा और मंत्री - सबको यही स्वीकार्य है, माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है, और मैं भी अवश्य उसे शिरोधार्य करके निभाना चाहता हूँ।
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥उचित कि अनुचित किए बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥॥२॥
गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृदकी बात सुनकर मन प्रसन्न रखते हुए उसे भला समझकर करना ही चाहिए। उचित-अनुचितका विचार करने बैठें तो धर्म भी छूट जाता है और सिरपर पापका बोझ चढ़ जाता है।
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें॥॥३॥
आप मुझे वही सीधी शिक्षा दे रहे हैं जिसके पालनमें मेरा भला है। यह मैं भलीभाँति समझता हूँ, फिर भी मेरे मनको संतोष नहीं मिलता।
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥॥४॥
अब आप मेरी विनती भी सुन लें और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे राह दिखाएँ। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा करें - साधु पुरुष दुखी मनुष्यके गुण-दोष नहीं गिनते।
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।एहि तें जानहु मोर हित के आपन बड़ काजु॥१७७॥
पिता स्वर्गमें हैं, सीता-राम वनमें हैं, और आप मुझसे राज्य करनेको कह रहे हैं। इसमें आप मेरा हित समझते हैं या इसमें आपका ही कोई बड़ा स्वार्थ छिपा है?
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई॥मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपाय मोर हित नाहीं॥॥१॥
मेरा हित तो रामकी सेवामें था, वह भी माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने खुद सोचकर देख लिया है, इसके सिवा मेरा और कोई भला नहीं।
सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू॥॥२॥
लक्ष्मण, राम और सीताके चरण देखे बिना यह शोकभरा राज्य किस गिनतीमें है? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ ही व्यर्थ है, वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है,
सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥॥३॥
रोगी शरीरके लिए तमाम भोग व्यर्थ हैं, हरिभक्तिके बिना जप-योग व्यर्थ हैं, जीवके बिना सुंदर देह व्यर्थ है - वैसे ही राघुनाथके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है।
जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू॥मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥॥४॥
मुझे आज्ञा दीजिए, मैं राम के पास जाऊँ, यही निश्चय है, इसीमें मेरा हित है। और मुझे राजा बनाकर आप मेरा भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहके मोहवश ही कह रहे हैं।
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम के राज॥॥१७८॥
कैकेयीका बेटा, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-जैसे नीचके राज्यसे आप मोहवश ही सुख चाहते हैं।
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥॥१॥
मैं सच कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें - राजा वही होना चाहिए जो धर्मपरायण हो। मुझे जबरन राज्य दोगे उसी क्षण धरती पाताल में धँस जाएगी।
मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥राय राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥॥२॥
मेरे समान पापी और कौन होगा, जिसके कारण सीता-राम को वनवास मिला? राजाने राम को वन दिया और उनके बिछड़ते ही खुद स्वर्ग सिधार गए।
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥॥३॥
और मैं दुष्ट, जो इन सब अनर्थोंका कारण हूँ, होश में बैठा यह सब सुन रहा हूँ! राम बिना सूने घरको देखकर और दुनियाका उपहास सहकर भी ये प्राण टिके हुए हैं।
राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥॥४॥
क्योंकि ये प्राण राम-जैसे पवित्र विषयमें रमे नहीं, बल्कि लालची हैं, भूमि और भोगके भूखे हैं। मेरे हृदयकी कठोरताका क्या कहूँ, जिसने वज्रको भी मात दे दी।
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥१७९॥
कारण कठिन हो तो कार्य भी कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा - दोनों ही भयानक और कठोर बनते हैं।
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावर प्रान अघाइ अभागे॥जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥॥१॥
कैकेयीसे जन्मी इस देहसे मोह करनेवाले ये नीच प्राण पूरी तरह अभागे हैं। जब प्रियके वियोगमें भी मुझे यह प्राण प्यारे लग रहे हैं, तो आगे और भी बहुत कुछ देखना-सुनना बाकी है।
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥॥२॥
लक्ष्मण, राम और सीताको तो वन दिया, स्वर्ग भेजकर पतिका भला किया, खुद विधवापन और अपयश लिया, और प्रजाको शोक-संताप दिया।
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू॥एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥॥३॥
और मुझे सुख, सुयश और राज्य दिया! कैकेयीने तो सबका काम बना दिया! इससे बढ़कर मेरे लिए अब क्या रह गया, कि आप मुझे राजतिलक देनेकी बात कर रहे हैं!
कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥॥४॥
कैकेयीके पेट से जन्म लेकर यह मेरे लिए कुछ भी अनुचित नहीं। यह सब तो विधाताने ही रचा है, फिर इसमें प्रजा और आप लोग सहायता क्यों कर रहे हैं?
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥
जिसे बुरे ग्रह लगे हों, फिर वायुरोग सताए, और तिसपर बिच्छू भी डंक मार दे - ऐसेको यदि शराब पिलाई जाए, तो बताइए यह कैसा इलाज हुआ।
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥॥१॥
कैकेयीके बेटेके लिए संसारमें जो कुछ उचित था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर 'दशरथका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे व्यर्थ ही मिली।
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका॥उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥॥२॥
आप सब भी मुझसे तिलक कढ़ानेकी बात कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सबको ठीक लगती है। मैं किस-किसको क्या उत्तर दूँ - जिसकी जो इच्छा हो, वही आप सुखपूर्वक कहें।
मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥॥३॥
मेरी कुमाता कैकेयीको छोड़कर, बताइए, और कौन कहेगा कि यह अच्छा हुआ? इस चराचर संसारमें मेरे सिवा कोई और नहीं जिसे सीता-राम प्राणोंसे प्यारे न हों।
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥॥४॥
जो सबसे बड़ी हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दिख रहा है। यह मेरा बुरा समय है, इसमें किसीका दोष नहीं। आप सब जो कह रहे हैं वह उचित ही है, क्योंकि आप संशय, शील और प्रेमके वश में हैं।
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥१८१॥
रामकी माता बहुत सरलहृदय हैं और मुझपर उनका खास स्नेह है, इसीलिए मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ऐसा कह रही हैं।
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥॥१॥
गुरुजी ज्ञानके सागर हैं, यह सारा संसार जानता है, जिनके लिए यह पूरा विश्व हथेलीके बेरके समान है - वे भी मेरे लिए राजतिलककी तैयारी कर रहे हैं। सच है, विधाता विपरीत हो तो सब कोई विपरीत हो जाता है।
परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥॥२॥
राम-सीताको छोड़कर संसारमें कोई नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सहमति नहीं थी। मैं यह सब सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा, क्योंकि जहाँ पानी है वहाँ अंततः कीचड़ भी होता ही है।
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥एक उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥॥३॥
मुझे डर नहीं कि संसार मुझे बुरा कहेगा, न परलोककी चिंता है। बस मेरे हृदयमें एक ही असह्य आग धधक रही है कि मेरे कारण सीता-राम दुखी हुए।
जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥॥४॥
जीवनका असली लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ छोड़कर रामके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो रामके वनवासके लिए ही हुआ था, फिर मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताऊँ?
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।देखें बिनु रघुनाथ पद जिय के जरनि न जाइ॥१८२॥
सबके आगे सिर झुकाकर मैं अपनी गहरी दीनता कह रहा हूँ - राघुनाथके चरणोंके दर्शन बिना मेरे मनकी जलन नहीं जाएगी।
आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय के रघुबर बिनु बूझा॥एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥॥१॥
मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता, राम के बिना मेरे मनकी बात कौन जाने? मनमें एक ही निश्चय है - सुबह होते ही मैं प्रभुके पास चल पड़ूँगा।
जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥॥२॥
यद्यपि मैं दुष्ट और अपराधी हूँ, और मेरे कारण ही यह सारा उपद्रव हुआ, फिर भी मुझे शरणमें सामने खड़ा देखकर राम सब कुछ क्षमा करके मुझपर खास कृपा करेंगे।
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥॥३॥
राघुनाथ शील, संकोच, अत्यंत सरल स्वभाव और कृपा-स्नेहके घर हैं। उन्होंने शत्रुका भी कभी बुरा नहीं किया। मैं भले टेढ़ा हूँ, पर हूँ तो उनका बच्चा और सेवक ही।
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥॥४॥
आप सब भी इसीमें मेरा भला मानकर मुझे मीठी वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दें, ताकि मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास मानकर राम फिर राजधानी लौट आएँ।
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥१८३॥
यद्यपि मेरा जन्म बुरी माँसे हुआ है और मैं खुद भी दुष्ट और दोषी हूँ, फिर भी मुझे भरोसा है कि राघुनाथ मुझे अपना जानकर कभी नहीं त्यागेंगे।
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥॥१॥
भरतके यह वचन सबको प्यारे लगे, मानो वे रामके प्रेमरूपी अमृतमें डूबे हों। रामवियोगके भारी विषसे जले हुए सब लोग मानो बीजमंत्र सुनते ही जाग उठे।
मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥भरतहि कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही॥॥२॥
माता, मंत्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष - सब स्नेहके मारे बहुत व्याकुल हो उठे। सब भरतकी बार-बार सराहना करते हुए कहते हैं कि आपका शरीर तो साक्षात रामप्रेमकी मूरत ही है।
तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥जो पावर अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई॥॥३॥
तात भरत, आप ऐसा क्यों न कहें, राम को आप प्राणोंके समान प्रिय हैं। जो मूर्ख अपनी नादानीमें आपकी माताकी कुटिलताको लेकर आपपर शक करेगा,
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥॥४॥
वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकमें ही बसेगा। जैसे साँपके पाप-अवगुणको मणि ग्रहण नहीं करती, बल्कि वह विष हर लेती है और दुख-दरिद्रता जला देती है।
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह॥१८४॥
भरत, वनको जरूर चलिए जहाँ राम हैं - आपने बहुत अच्छी सलाह दी। शोकसागरमें डूबते हुए सबको आपने बड़ा सहारा दिया है।
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥॥१॥
सबके मनमें अपार आनंद हुआ, मानो बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनकर पपीहा और मोर खुश हो उठे हों। सुबह चलनेका यह सुंदर निर्णय देखकर भरत सबको प्राणप्रिय हो गए।
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥॥२॥
मुनि वसिष्ठको प्रणाम करके और भरतको सिर नवाकर सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर चले। कहते जाते हैं - भरतका जीवन धन्य है, ऐसा कहकर सब उनके शील-स्नेहकी सराहना करते जाते हैं।
कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चले कर साजहिं साजू॥जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥॥३॥
आपसमें कहते हैं - बड़ा काम हो गया, सब चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसे भी घरकी रखवालीके लिए रोका जाता, वह मानो अपनी गर्दन कटती महसूस करता।
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू॥॥४॥
कोई-कोई कहते हैं - किसीको भी रुकनेको मत कहो, संसारमें जीवनका यह लाभ भला कौन नहीं चाहता।
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥१८५॥
वह संपत्ति, घर, सुख, मित्र, माता-पिता-भाई जल जाएँ जो रामके चरणोंकी ओर बढ़नेमें हँसते-हँसते साथ न दें।
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना॥भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू॥॥१॥
घर-घर लोग तरह-तरहकी सवारियाँ सजा रहे हैं, हृदयमें हर्ष है कि सुबह चलना है। भरतने घर जाकर सोचा - नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना सब,
संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही॥तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥॥२॥
यह सारी संपत्ति तो रघुनाथकी है। यदि इसकी व्यवस्था किए बिना यूँ ही छोड़कर चल दूँ, तो अंततः इसमें मेरी भलाई नहीं - स्वामीका द्रोह तो सबसे बड़ा पाप है।
करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥॥३॥
सेवक वही है जो स्वामीका भला करे, चाहे कोई उसे करोड़ों दोष क्यों न दे। ऐसा सोचकर भरतने ऐसे विश्वस्त सेवकोंको बुलाया जो कभी सपनेमें भी अपने कर्तव्यसे नहीं डिगे थे।
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा॥करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे॥॥४॥
सब भेद और उत्तम कर्तव्य समझाकर, जो जिस लायक था उसे वही जिम्मेदारी सौंपी। पूरी व्यवस्था करके, रखवाले नियुक्त करके भरत रामकी माता कौसल्याके पास गए।
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान॥१८६॥
स्नेहके जानकार भरतने सब माताओंको दुखी जानकर उनके लिए पालकियाँ और सुखासन तैयार करवाने को कहा।
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी॥जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना॥॥१॥
नगरके स्त्री-पुरुष चकवा-चकवीकी तरह हृदयमें व्याकुल होकर सुबह होनेकी राह देख रहे हैं। सारी रात जागते-जागते सुबह हो गई, तब भरतने चतुर मंत्रियोंको बुलाया।
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू॥बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥॥२॥
और कहा - तिलकका सब सामान ले चलो, वनमें ही मुनि वसिष्ठ राम को राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियोंने प्रणाम किया और तुरंत घोड़े, रथ, हाथी सजा दिए।
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ॥बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना॥॥३॥
सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठ अरुंधती और अग्निहोत्रकी सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले, फिर तप और तेजके भंडार सभी ब्राह्मण अलग-अलग सवारियोंपर चढ़कर चले।
नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना॥सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी॥॥४॥
नगरके सब लोग तैयार होकर चित्रकूटकी ओर चल पड़े। सुंदर पालकियोंपर चढ़कर सब रानियाँ चलीं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ॥१८७॥
विश्वस्त सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक विदा करके, राम-सीताके चरणोंका स्मरण करते हुए भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चल पड़े।
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥॥१॥
राम दर्शनकी चाहमें सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी पानी देखकर दौड़ पड़े हों। सीता-राम वनमें हैं यह सोचकर छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरत भी पैदल ही चल रहे हैं।
देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे॥जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली॥॥२॥
उनका यह स्नेह देखकर लोग भी भाव-विभोर हो उठे और घोड़े-हाथी-रथ छोड़कर पैदल चलने लगे। तब रामकी माता कौसल्या भरतके पास आकर, अपनी पालकी वहीं खड़ी करके कोमल वाणीमें बोलीं -
तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥॥३॥
बेटा, रथपर चढ़ जाओ, माता तुम्हारी बलैया लेती है, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी होगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सब लोग पैदल चलेंगे, शोकसे दुबले हुए यह सब पैदल चलनेके लायक नहीं हैं।
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई॥तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू॥॥४॥
माताकी आज्ञा मानकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चल पड़े। पहला दिन तमसा नदीपर बिताया, दूसरा गोमती तटपर।
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग॥१८८॥
कोई सिर्फ दूध पीते, कोई फलाहार करते, और कुछ रातमें एक ही बार भोजन करते - राम के लिए सब गहने-भोग छोड़कर ऐसे नियम-व्रत निभा रहे हैं।
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥॥१॥
रातभर सई नदीके किनारे रुककर सुबह वहाँसे चल दिए और सब श्रृंगवेरपुरके पास पहुँच गए। निषादराजने यह खबर सुनी तो दुखी मनसे सोचने लगा -
कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं॥जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥॥२॥
भरत वनको क्यों जा रहे हैं, मनमें जरूर कोई कपट है। अगर मनमें खोट न होती तो साथ सेना क्यों लाए हैं?
जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥॥३॥
समझते होंगे कि लक्ष्मणसहित राम को मारकर आराम से निष्कंटक राज्य करूँगा। भरतने राजनीतिका विचार ही मनमें नहीं रखा - पहले कलंक लगा था, अब जान ही जाएगी।
सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा॥का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं॥॥४॥
सारे देवता-दानव मिलकर भी लड़ें तो राम को युद्धमें कोई नहीं जीत सकता। भरत ऐसा कर रहे हैं तो इसमें अचरज क्या, विषकी बेल कभी अमृत-फल नहीं देती।
अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु॥१८९॥
ऐसा सोचकर गुहने अपनी जातिवालोंसे कहा - सब सावधान हो जाओ, नावें अपने कब्जेमें कर लो, फिर उन्हें डुबा दो और सारे घाट रोक दो।
होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥॥१॥
तैयार होकर घाट रोक लो, सब मरनेकी तैयारी कर लो। मैं भरतसे आमने-सामने भिड़ूँगा और जीते-जी उन्हें गंगापार नहीं उतरने दूँगा।
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा॥भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥॥२॥
युद्धमें मरना, फिर गंगातट, राम का काम और यह क्षणभंगुर शरीर - भरत तो राम के भाई और राजा हैं, और मैं तुच्छ सेवक, ऐसी मृत्यु तो बड़े भाग्यसे मिलती है।
स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥॥३॥
मैं स्वामीके काज के लिए रणमें लड़ूँगा और चौदहों लोकोंमें अपने यशसे नाम रोशन करूँगा। रघुनाथके लिए प्राण त्याग दूँगा - मेरे तो दोनों हाथ लड्डू हैं, जीता तो सेवकका यश, मरा तो रामकी सेवा।
साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥॥४॥
जिसकी गिनती साधुओंके बीच नहीं और जिसका नाम रामभक्तोंमें नहीं, वह जीते-जी धरतीका बोझ है, माताके यौवनरूपी पेड़को काटनेवाली कुल्हाड़ी है।
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥१९०॥
यह सोचकर निषादराज विषादसे मुक्त हो गया, सबका उत्साह बढ़ाकर और राम को स्मरण करके उसने तुरंत तरकस, धनुष और कवच माँगा।
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ॥भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा॥॥१॥
बोला - भाइयो, जल्दी करो, हथियार सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई डरे नहीं। सब हर्षसे बोल उठे - बहुत अच्छा नाथ, और एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे।
चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं॥॥२॥
निषादराजको प्रणाम कर-करके सब निषाद चल पड़े, सब बड़े शूरवीर हैं जिन्हें युद्धकी लड़ाई भाती है। राम के चरणकमलोंकी खड़ाऊँ याद करके उन्होंने तरकस बाँधे और धनुषोंपर प्रत्यंचा चढ़ाई।
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥॥३॥
कवच पहनकर सिरपर टोप रख लिया, फरसे-भाले-बरछे तैयार कर लिए। कुछ तलवारके वार रोकनेमें बड़े कुशल हैं, ऐसे उत्साहमें हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद रहे हों।
निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई॥देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने॥॥४॥
अपना-अपना साज-सामान सजाकर सब निषादराज गुहके पास जाकर जोहार करने लगे। सुंदर योद्धाओंको देखकर गुहने सबको सुयोग्य समझा और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया।
भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥१९१॥
बोला - भाइयो, आज धोखा मत करना, मेरा बड़ा काम है। यह सुनकर सब योद्धा जोशमें बोल पड़े - वीर, अधीर मत हो।
राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥॥१॥
नाथ, राम के प्रताप और आपके बलसे हम भरतकी सेनाको वीर और घोड़े दोनोंसे खाली कर देंगे, जीते-जी पीछे पाँव नहीं रखेंगे, धरतीको रुंड-मुंडसे भर देंगे।
दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥॥२॥
निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर लड़ाईका ढोल बजवाया। इतना कहते ही बाईं ओर छींक हुई, शकुन देखनेवालोंने कहा कि यह शुभ संकेत है।
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥॥३॥
एक बूढ़ेने शकुन देखकर कहा - भरतसे मिल लो, लड़ाई नहीं होगी। भरत तो राम को मनाने जा रहे हैं, शकुन कहता है कोई विरोध नहीं है।
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥॥४॥
यह सुनकर गुहने कहा - बूढ़ा सही कह रहा है, जल्दबाजीमें किया काम मूर्ख बादमें पछताते हैं। भरतका स्वभाव बिना जाने-समझे लड़ना बड़ी हानि होगी।
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ॥१९२॥
इसलिए वीरो, तुम सब घाट रोककर इकट्ठे रहो, मैं जाकर भरतसे मिलकर उनका मन टटोलता हूँ। मित्र हैं, शत्रु हैं या उदासीन - यह समझकर ही आगे जो करना होगा करूँगा।
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥॥१॥
उनके सुंदर स्वभावसे ही मैं उनका स्नेह पहचान लूँगा, वैर और प्रेम छिपाए नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान जुटाने लगा - कंद, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाए।
मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥॥२॥
कहार लोग बड़ी-बड़ी पुरानी मछलियोंके भार भर-भरकर लाए। भेंटका सामान सजाकर वे मिलनेको चले, और रास्तेमें शुभ शकुन मिले।
देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥॥३॥
दूर से देखकर उसने अपना नाम बताया और मुनि वसिष्ठको दंडवत प्रणाम किया। मुनिने उसे रामका प्रिय जानकर आशीर्वाद दिया और भरतको समझाकर बताया कि यह राम का मित्र है।
राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥॥४॥
यह राम का मित्र है, सुनते ही भरतने रथ छोड़ दिया और प्रेममें उमड़ते हुए उतरकर चल पड़े। गुहने अपना गाँव, जाति और नाम बताकर धरतीपर माथा टेककर जोहार की।
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ॥१९३॥
उसे दंडवत करते देखकर भरतने उठाकर छातीसे लगा लिया, मानो लक्ष्मणसे ही भेंट हो गई हो, हृदयमें प्रेम समाया नहीं जा रहा।
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम के रीती॥धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥॥१॥
भरत उसे बड़े प्रेमसे गले लगा रहे हैं, लोग इस प्रेमकी रीति देखकर मुग्ध हो रहे हैं। देवता 'धन्य-धन्य' कहकर सराहते हुए फूल बरसा रहे हैं।
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥॥२॥
जो लोक और वेद दोनोंमें सबसे नीचा माना जाता है, जिसकी छाया छू जाए तो स्नान करना पड़े, उसी निषादको राम के छोटे भाई भरत बाँहोंमें भरकर, शरीरमें रोमांच लिए गले लगा रहे हैं।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥॥३॥
जो राम-राम कहकर जँभाई भी लेते हैं, उनके सामने पापोंका ढेर भी नहीं टिकता। फिर इस गुहको तो राम ने खुद हृदयसे लगा लिया और उसके पूरे कुलको जगत्-पावन बना दिया।
करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥॥४॥
कर्मनाशा नदीका पानी जब गंगामें मिल जाता है तो उसे भी कौन सिरपर नहीं चढ़ाता? दुनिया जानती है कि उलटा नाम जपते-जपते वाल्मीकि ब्रह्मके समान हो गए।
स्वपच सबर खस जमन जड़ पावर कोल किरात।रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥१९४॥
चांडाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात-जैसे मूर्ख और नीच भी रामनाम लेते ही परम पवित्र होकर तीनों लोकोंमें विख्यात हो जाते हैं।
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं॥॥१॥
इसमें कोई अचरज नहीं, यह तो युगों-युगोंसे चली आ रही रीति है - राम ने किसे बड़ाई नहीं दी? देवता रामनामकी यह महिमा कह रहे हैं, और सुन-सुनकर अयोध्यावासी सुखी हो रहे हैं।
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥॥२॥
राम के मित्र निषादराजसे प्रेमपूर्वक मिलकर भरतने कुशल-मंगल पूछी। भरतका शील-स्नेह देखकर निषाद उस पल देहकी सुध भूल गया।
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥॥३॥
उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनंद इतना बढ़ गया कि वह टकटकी लगाए भरतको देखता खड़ा रह गया। फिर धीरज धरकर, चरण वंदन करके प्रेमसे हाथ जोड़कर विनती करने लगा -
कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥॥४॥
प्रभु, कुशलके मूल आपके चरणकमल देखकर मैंने तीनों कालोंमें अपनी कुशलता जान ली। अब आपकी परम कृपासे मेरे करोड़ों कुलोंका कल्याण हो गया।
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥१९५॥
अपनी करनी और कुल सोचकर, और प्रभुकी महिमा हृदयमें तौलकर - जो रघुवीरके चरणोंका भजन नहीं करता, वह इस संसारमें विधाताके हाथों ठगा गया समझो।
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥॥१॥
मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और नीच जातिका हूँ, लोक और वेद दोनोंसे बाहर हूँ, पर जबसे राम ने मुझे अपनाया है तभीसे मैं संसारका भूषण बन गया।
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥॥२॥
उसका प्रेम और सुंदर विनय देखकर फिर भरतके छोटे भाई शत्रुघ्न भी उससे मिले। निषादने अपना नाम बताकर आदरपूर्वक सब रानियोंको जोहार की।
जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥॥३॥
रानियाँ उसे लक्ष्मणके समान मानकर आशीर्वाद देती हैं - सौ लाख वर्ष सुखसे जिओ। नगरके स्त्री-पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए मानो लक्ष्मणको ही देख रहे हों।
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥॥४॥
सब कहते हैं - जीवनका असली लाभ तो इसीने पाया, जिसे राम ने बाँहों भरकर गले लगाया। निषाद अपने भाग्यकी यह बड़ाई सुनकर मनमें फूला न समाया और सबको साथ लेकर चल पड़ा।
सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ॥१९६॥
उसने इशारेसे अपने सब सेवकोंको बता दिया, वे स्वामीका इशारा पाकर चल दिए और घरों, पेड़ोंके नीचे, तालाबों, बागों और जंगलोंमें ठहरनेकी जगह बना दी।
सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥सोहत दिए निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥॥१॥
भरतने जब श्रृंगवेरपुर देखा तो प्रेमके मारे उनका पूरा शरीर शिथिल हो गया। वे निषादके कंधेपर हाथ रखे ऐसे शोभित हो रहे थे मानो विनय और प्रेम ने खुद शरीर धारण कर लिया हो।
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥॥२॥
इस तरह पूरी सेना साथ लेकर भरतने जगत्को पवित्र करनेवाली गंगाके दर्शन किए, रामघाटपर प्रणाम किया - मन इतना आनंदमग्न हुआ मानो राम से ही भेंट हो गई हो।
करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥॥३॥
नगरके स्त्री-पुरुष प्रणाम कर रहे हैं और गंगाके पवित्र जलको देखकर आनंदित हो रहे हैं। स्नान करके हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि रामके चरणोंमें उनका प्रेम कभी कम न हो।
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥॥४॥
भरतने कहा - हे गंगे, तुम्हारी रज सबको सुख देनेवाली और सेवकके लिए कामधेनु समान है। हाथ जोड़कर मैं यही वरदान माँगता हूँ कि सीता-रामके चरणोंमें मेरा सहज प्रेम बना रहे।
एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ॥१९७॥
इस तरह स्नान करके, गुरुकी आज्ञा पाकर और यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, भरत डेरा उठाकर आगे चल दिए।
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥॥१॥
लोगोंने जहाँ-तहाँ अपना डेरा डाल दिया, भरतने सबकी खोज-खबर ली। फिर देवपूजा करके आज्ञा पाकर दोनों भाई रामकी माता कौसल्याके पास गए।
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥॥२॥
चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतने सब माताओंका सम्मान किया, फिर भाई शत्रुघ्नको माताओंकी सेवा सौंपकर खुद निषादको बुला लिया।
चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें॥पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥॥३॥
सखा निषादसे हाथ मिलाए भरत चल रहे हैं, प्रेम इतना गहरा है कि शरीर शिथिल हुआ जा रहा है। सखासे पूछते हैं - मुझे वह जगह दिखाओ, नेत्र और मनकी जलन थोड़ी ठंडी करो।
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥॥४॥
जहाँ सीता, राम और लक्ष्मण रातको सोए थे। इतना कहते ही उनकी आँखोंमें आँसू भर आए। भरतके यह वचन सुनकर निषाद भी विषादमें डूब गया और तुरंत उन्हें वहाँ ले गया।
