प्रथम सोपान — भाग 7
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
बालकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥॥४॥
यह जो उत्तर देते हुए भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, वह केवल हे विश्वामित्र, आपके शील के कारण है। नहीं तो अपने कठोर कुठार से इसे काटकर मैं थोड़े ही परिश्रम में अपने गुरु का ऋण चुका देता।
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥२७५॥
विश्वामित्र मन-ही-मन हँसकर कहते हैं - मुनि को हरा ही हरा दिखाई दे रहा है; यह लोहे की खाँड़ है, ईख की नहीं - यह मूर्ख अब तक भी नहीं समझ रहा।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥॥१॥
लक्ष्मण ने कहा - हे मुनि, आपका शील तो कौन नहीं जानता, यह तो सारे संसार में विदित है। आप माता-पिता के ऋण से तो भलीभाँति उऋण हो गए, बस गुरु का ऋण शेष रह गया, इसी की बड़ी चिंता आपके मन में है।
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥॥२॥
मानो वह ऋण हमारे ही माथे लिख दिया गया हो, और दिन बीतने से उसका ब्याज बहुत बढ़ गया है। अब किसी व्यवहारिये को बुलाकर हिसाब लगवा लीजिए, मैं तुरंत अपनी थैली खोलकर चुका दूँगा।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बच नृपद्रोही॥॥३॥
यह कटु वचन सुनकर परशुराम ने अपना कुठार सँभाल लिया, और सारी सभा में हाहाकार मच गया। तब लक्ष्मण फिर बोले - हे भृगुश्रेष्ठ, यह फरसा मुझे भी दिखाइए; आपको ब्राह्मण समझकर ही मैं ऐसे वचन कह रहा हूँ, नहीं तो आप तो राजाओं के भी शत्रु ठहरे।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥॥४॥
आपको कभी घोर संग्राम में कोई श्रेष्ठ योद्धा मिला ही नहीं, आप तो ब्राह्मण-देवता घर में ही बड़े वीर बने बैठे हैं। यह सुनकर सब लोग पुकार उठे कि यह अनुचित है; तब राम ने संकेत से लक्ष्मण को रोक दिया।
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥२७६॥
लक्ष्मण के उत्तर आहुति के समान थे और परशुराम का क्रोध अग्नि के समान बढ़ता जा रहा था; यह देखकर रघुकुल के सूर्य राम जल के समान शीतल वचन बोले।
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥॥१॥
हे नाथ, इस बालक पर दया कीजिए, यह भोला, दूध पीता बच्चा है, इस पर क्रोध न कीजिए। यदि इसे आपके प्रभाव का कुछ भी ज्ञान होता, तो यह नादान कभी आपसे बराबरी करने का साहस न करता।
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥॥२॥
बच्चे यदि कुछ नटखटपन करते हैं, तो गुरु, पिता और माता भी मन में प्रसन्न ही होते हैं। इसे बालक और अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए - आप जैसे शीलवान, धीर और ज्ञानी मुनि तो सदा दयालु ही होते हैं।
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने॥हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥॥३॥
राम के वचन सुनकर परशुराम कुछ शांत हुए, पर लक्ष्मण फिर कुछ कहकर मुसकरा दिए। उन्हें हँसते देखकर परशुराम नख से शिख तक क्रोध से भर उठे - हे राम, तुम्हारा यह भाई तो बड़ा पापी है।
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं॥॥४॥
इसका शरीर गोरा है पर मन साँवला है, इसका मुख दूध जैसा नहीं बल्कि कालकूट विष जैसा है। यह स्वभाव से ही टेढ़ा है, तुम्हारे जैसा नहीं लगता; यह नीच काल के समान है, मुझे तुच्छ समझ रहा है।
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥२७७॥
लक्ष्मण ने हँसकर कहा - हे मुनि, सुनिए, क्रोध ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कार्य करते हैं और संसार के प्रतिकूल आचरण करते हैं।
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥॥१॥
हे मुनिराज, मैं तो आपका सेवक ही हूँ, अब क्रोध त्यागकर दया कीजिए। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से फिर जुड़ने वाला नहीं है, बल्कि खड़े-खड़े आपके पैर ही दुखने लगेंगे।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥॥२॥
यदि यह धनुष आपको इतना प्रिय है, तो कोई उपाय कीजिए - किसी बड़े गुणी को बुलाकर इसे जुड़वा लीजिए। लक्ष्मण को यह बोलते देख जनक भयभीत होकर कहने लगे - चुप हो जाओ, यह अनुचित है, अच्छा नहीं है।
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥॥३॥
नगर के स्त्री-पुरुष थर-थर काँपने लगे - यह छोटा कुमार तो बड़ा दुष्ट है। लक्ष्मण की यह निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुराम का शरीर क्रोध से जलने लगा, मानो उनका बल ही क्षीण हो रहा हो।
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं॥॥४॥
परशुराम राम से याचना करते हुए बोले - मैं तुम्हारे छोटे भाई को नादान समझकर बचा रहा हूँ। इसका मन मलिन है पर शरीर कैसा सुंदर है - जैसे कोई सोने का घड़ा हो जो विष के रस से भरा हो।
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥२७८॥
यह सुनकर लक्ष्मण फिर हँस पड़े, तब राम ने नेत्र तरेरकर उन्हें रोका; लक्ष्मण सकुचाकर अपनी तीखी वाणी छोड़कर गुरु विश्वामित्र के पास चले गए।
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥॥१॥
फिर राम दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र, कोमल और शीतल वाणी में बोले - सुनिए नाथ, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं, इस बालक की बातों पर कान न दीजिए।
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा॥॥२॥
बालकों का यही स्वभाव होता है कि संत जन कभी उन्हें दोष नहीं देते। इसने कोई काम नहीं बिगाड़ा, हे नाथ, अपराधी तो मैं ही हूँ।
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई॥कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥॥३॥
हे स्वामी, कृपा हो या क्रोध, वध हो या बंधन - सब मुझ पर ही कीजिए, जैसे स्वामी अपने दास के साथ करता है। हे मुनिनायक, शीघ्र बताइए जिस उपाय से आपका क्रोध शांत हो, मैं वही उपाय करूँगा।
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥॥४॥
मुनि परशुराम बोले - हे राम, मेरा क्रोध भला कैसे जाए, तुम्हारा यह छोटा भाई अभी भी मुझे टेढ़ी नजर से देख रहा है। यदि मैंने अभी तक इसके कंठ पर कुठार नहीं चलाया, तो मैंने क्रोध करके किया ही क्या।
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥२७९॥
मेरे इस कुठार की भयंकर गति सुनकर तो राजाओं की रानियों के गर्भ तक गिर जाते हैं; फिर भी मेरा यह फरसा हाथ में रहते हुए भी यह वैरी राजकुमार जीवित देखा जा रहा है।
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥॥१॥
मेरा हाथ इस पर वार करने के लिए उठ ही नहीं रहा, छाती क्रोध से जल रही है, राजाओं का नाश करने वाला यह मेरा कुठार भी मानो कुंठित हो गया है। विधाता ही प्रतिकूल हो गया लगता है, मेरा स्वभाव ही बदल गया है - मेरे हृदय में कभी ऐसी कृपा कब हुआ करती थी।
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा॥बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥॥२॥
आज दया ने मुझे असह्य दुख भोगने पर विवश कर दिया है। यह सुनकर लक्ष्मण हँसकर सिर नवाकर बोले - अहा, आपकी यह कृपा-मूर्ति कितनी अनुकूल है, आपके मुख से तो मानो फूल झर रहे हैं।
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भए तनु राख बिधाता॥देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥॥३॥
यदि दया से ही मुनि का शरीर जल रहा है, तो विधाता जाने क्रोध होने पर इसका शरीर राख ही कर देगा। हे जनक, देखिए यह मूर्ख बालक कैसे हठपूर्वक यमपुर को अपना घर बनाना चाहता है।
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा॥बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥॥४॥
क्यों नहीं जल्दी अपनी आँखें फेर लेते - यह छोटा राजकुमार देखने में भी बड़ा दुष्ट लगता है। यह सुनकर लक्ष्मण हँस पड़े और मन-ही-मन कहा - आँखें मूँद लेने से भला कोई कहीं नहीं जाता, डर छिपता नहीं।
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥२८०॥
तब परशुराम हृदय में अत्यंत क्रोध लिए राम की ओर मुड़कर बोले - अरे मूर्ख, शिव के धनुष को तोड़कर अब तू मुझे ही उपदेश दे रहा है।
बंधु कह कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥॥१॥
तेरा भाई कटु वचन कहता है, और तू सहमति देकर हाथ जोड़कर छल भरी विनय कर रहा है। मुझे युद्ध करके ही संतुष्ट कर, नहीं तो अपना नाम राम कहलाना छोड़ दे।
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ॥॥२॥
हे शिवद्रोही, छल त्यागकर युद्ध कर, नहीं तो मैं तुझे तेरे भाई सहित मार डालूँगा। परशुराम कुठार उठाकर इस प्रकार बड़बड़ाते रहे, पर राम मन-ही-मन मुसकराते हुए सिर नवाते रहे।
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥॥३॥
अपराध लक्ष्मण का, पर क्रोध आप हम पर कर रहे हैं; कहीं यदि आप शांत भी हुए तो उसमें बड़ा दोष होगा। सब कोई टेढ़े को ही सिर झुकाते देखे गए हैं - राहु भी टेढ़े चंद्रमा को कभी नहीं ग्रसता।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी॥॥४॥
राम ने कहा - हे मुनीश्वर, क्रोध त्याग दीजिए, आपके हाथ में कुठार है और यह मेरा सिर आपके सामने प्रस्तुत है। जिस उपाय से आपका क्रोध शांत हो, वही कीजिए, हे स्वामी, मुझे अपना ही अनुगामी सेवक समझिए।
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥२८१॥
भला स्वामी और सेवक के बीच युद्ध कैसा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्रोध त्याग दीजिए। आपका वेश देखकर ही उस बालक ने कुछ कहा था, इसमें उस बालक का भी कोई दोष नहीं।
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥॥१॥
आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर इस बालक में क्षत्रिय-स्वभाव से वीर-रस का रोष जाग उठा। यह आपका नाम तो जानता है, पर आपको ठीक से पहचान नहीं सका, इसीलिए इसने अपने कुल के स्वभाव से ऐसा उत्तर दे दिया।
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥॥२॥
यदि आप मुनि के वेश में ही आए होते, तो हे स्वामी, यह बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर धारण करता। इसकी अनजाने में हुई इस चूक को क्षमा कीजिए - ब्राह्मण के हृदय में तो अपार कृपा होनी चाहिए।
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहेँ माथा॥॥३॥
हे नाथ, हमारी आपसे भला बराबरी कैसे - कहिए तो सही, कहाँ आपके चरण और कहाँ हमारा माथा।
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥
मेरा नाम तो केवल राम है, छोटा-सा — पर तुम्हारा नाम फरसे सहित परशुराम है, जो बड़ा है।
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥॥४॥
हे देव, हमारे धनुष में तो एक ही गुण होता है, पर आपमें तो नौ परम पवित्र गुण हैं। हम हर प्रकार से आपसे हारे हुए हैं - हे ब्राह्मण, हमारे इस अपराध को क्षमा कीजिए।
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥२८२॥
श्रेष्ठ मुनि बारंबार राम से शांत विनय के वचन कहते रहे, फिर भी परशुराम रोषपूर्वक हँसकर वैसे ही टेढ़े वचन बोले जैसे लक्ष्मण के प्रति बोले थे।
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु॥॥१॥
तुम मुझे केवल एक ब्राह्मण ही समझ रहे हो, तो सुनो, मैं कैसा ब्राह्मण हूँ यह भी बता दूँ। मेरा धनुष स्रुवा है, बाण आहुति है, और मेरा क्रोध अत्यंत भयंकर अग्नि है।
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥॥२॥
चतुरंगिणी सेना ही इस यज्ञ की समिधा है, और बड़े-बड़े राजा आकर इसमें पशु बने हैं। इसी फरसे से काटकर मैंने अनेक बलियाँ दी हैं, और युद्ध ही मेरा यज्ञ है जिसमें मैंने करोड़ों जप किए हैं।
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥॥३॥
मेरा प्रभाव तुम्हें ज्ञात नहीं है, इसीलिए तुम मुझे ब्राह्मण समझकर तुच्छ जानकर बोल रहे हो। धनुष तोड़ने भर से तुम्हारा घमंड इतना बढ़ गया है, मानो तुमने सारा जगत जीतकर खड़ा कर लिया हो।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना॥॥४॥
राम ने कहा - हे मुनि, विचार करके देखिए, आपका क्रोध तो बहुत बड़ा है और हमारी चूक बहुत छोटी - वह पुराना धनुष तो छूते ही टूट गया, फिर मैं किस बात का अभिमान करूँ।
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥२८३॥
हे भृगुनाथ, सत्य सुनिए - यदि हम ब्राह्मण कहकर आपका निरादर कर रहे होते, तो संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसके भय से हम सिर झुकाते।
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥॥१॥
देवता, दानव, राजा - चाहे कोई भी अनेक योद्धा हों, समान बल का हो या हमसे अधिक बलवान - यदि युद्ध में कोई हमें ललकारे, तो हम सुखपूर्वक लड़ लेते हैं, चाहे वह साक्षात काल ही क्यों न हो।
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावर आना॥कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥॥२॥
जो क्षत्रिय शरीर धारण करके भी युद्ध में डर जाए, वह नीच पुरुष अपने कुल पर कलंक ही लगाता है। यह मैं अपने कुल की प्रशंसा के लिए नहीं कह रहा, अपने स्वभाव के अनुसार कह रहा हूँ - रघुवंशी लोग काल से भी युद्ध में नहीं डरते।
बिप्रबंस के असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥॥३॥
ब्राह्मण-वंश का यही तो प्रभाव है कि जो आपसे भी डरने वाला हो, वह भी निर्भय हो जाए। राम के ये कोमल और गूढ़ वचन सुनकर परशुराम की बुद्धि पर छाया हुआ भ्रम का पर्दा हट गया।
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥॥४॥
परशुराम बोले - हे राम, हे लक्ष्मीपति, यह विष्णु-धनुष लीजिए और इसे खींचिए, जिससे मेरा संदेह मिट जाए। धनुष देते ही वह स्वयं राम के हाथ की ओर खिंच चला, यह देखकर परशुराम का मन विस्मय से भर गया।
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात॥२८४॥
तब परशुराम ने राम के वास्तविक प्रभाव को पहचान लिया; उनका शरीर रोमांचित और प्रफुल्लित हो उठा। दोनों हाथ जोड़कर वे ऐसे वचन बोलने लगे जिनमें हृदय का प्रेम समाया नहीं जा रहा था।
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु॥जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥॥१॥
हे रघुवंश-रूपी कमल-वन के सूर्य, आपकी जय हो! हे गहन दानव-कुल को भस्म करने वाली अग्नि, आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौओं का हित करने वाले, आपकी जय हो! हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम का नाश करने वाले, आपकी जय हो!
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥॥२॥
हे विनय, शील और करुणा के गुणों के सागर! आपकी जय हो, आपकी वाणी की रचना अत्यंत चतुर है। हे सेवकों को सुख देने वाले, सर्वांग सुंदर! आपकी जय हो, आपके शरीर की छवि करोड़ों कामदेवों के समान है।
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥॥३॥
मैं एक ही मुख से आपकी कैसे प्रशंसा करूँ - हे शिव के मन-मानस-सरोवर के हंस, आपकी जय हो। मैंने अज्ञानवश बहुत अनुचित वचन कहे हैं, हे क्षमा के धाम, हे दोनों भाइयो, मुझे क्षमा कीजिए।
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥॥४॥
हे रघुकुल की ध्वजा, आपकी जय हो, जय हो, जय हो - ऐसा कहकर परशुराम तपस्या के लिए वन को चले गए। यह देखकर कुटिल राजा अत्यंत भयभीत हो गए, और कायर राजा जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए।
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥२८५॥
देवताओं ने नगाड़े बजाए और प्रभु पर फूल बरसाए; नगर के सब स्त्री-पुरुष हर्षित हुए, उनका मोहमय संताप पूरी तरह मिट गया।
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे॥जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी॥॥१॥
अत्यंत जोरदार वाद्य बजने लगे, सबने मनोहर मंगल-साज सजा लिए। सुमुखी और सुनयनी स्त्रियाँ झुंड-झुंड में मिलकर कोयल-सी मधुर वाणी में गीत गाने लगीं।
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥॥२॥
राजा जनक का सुख वर्णन नहीं किया जा सकता, मानो किसी जन्म के दरिद्र को कोई निधि मिल गई हो। भय दूर होने पर सीता ऐसी सुखी हो उठीं मानो चंद्रमा के उदय होने पर चकोरी सुखी हो उठे।
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई॥॥३॥
जनक ने विश्वामित्र को प्रणाम करके कहा - आपके प्रसाद से ही राम ने धनुष तोड़ा, इन दोनों भाइयों ने मुझे कृतकृत्य कर दिया है। अब जो उचित हो, हे स्वामी, वह आज्ञा दीजिए।
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। राम बिबाहु चाप आधीना॥टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु॥॥४॥
मुनि विश्वामित्र ने कहा - सुनिए, हे प्रवीण नरनाथ! सीता का विवाह तो धनुष पर ही निर्भर था; धनुष टूटते ही विवाह हो गया समझिए, यह देवता, मनुष्य और नाग सबको विदित है।
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥२८६॥
फिर भी अब आप जाकर अपने वंश की रीति के अनुसार व्यवहार कीजिए - ब्राह्मणों, कुल के वृद्धजनों और गुरु से पूछकर वेद-विदित आचार का पालन कीजिए।
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई॥मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥॥१॥
अयोध्यापुरी को दूत भेजिए, जो जाकर राजा दशरथ को बुला लाएँ। कृपालु जनक ने प्रसन्न होकर बहुत अच्छा कहा और उसी समय दूतों को बुलाकर भेज दिया।
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥॥२॥
फिर जनक ने सब नगर-सेठों को बुलाया, और सबने आकर आदरपूर्वक सिर नवाया। राजा ने कहा - बाजार, मार्ग, मंदिर और देवालय सहित सारे नगर को चारों ओर से सजा दो।
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥॥३॥
हर्षित होकर वे सब अपने-अपने घर लौट गए; फिर राजा ने सेवकों को बुला भेजा और कहा - सुंदर विचित्र मंडप रचकर बनाओ। यह आज्ञा सिर चढ़ाकर सेवक सुखपूर्वक चले गए।
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥॥४॥
मंडप बनाने में कुशल अनेक गुणी शिल्पियों को बुला भेजा गया। विधि-पूर्वक ब्रह्मा को प्रणाम करके उन्होंने कार्य आरंभ किया, और सोने के केले के खंभे बनाए।
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥२८७॥
हरे मरकत मणियों के पत्ते और पद्मराग मणियों के फूल बनाए गए; उस विचित्र रचना को देखकर स्वयं ब्रह्मा का मन भी चकित हो गया।
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई॥॥१॥
बाँस सब हरी मणियों से बनाए गए, वे इतने सीधे और पर्वों सहित थे कि असली से पहचाने ही नहीं जाते थे। सोने की सुंदर पान की बेल भी ऐसी बनाई गई कि उसके पत्तों सहित असली से पहचानना कठिन था।
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए॥मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥॥२॥
उसी बेल के सहारे सुंदर बंधन बनाए गए, बीच-बीच में सुंदर मोतियों की लड़ियाँ लगाई गईं। माणिक, मरकत, हीरा और फिरोजा को काट-छाँटकर मेहनत से कमल के फूल रचे गए।
किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिए सब ठाढ़ी॥॥३॥
रंग-बिरंगे भ्रमर और पक्षी बनाए गए, जो हवा के झोंकों से मानो गुंजार और कूजन कर रहे थे। खंभों पर देवताओं की प्रतिमाएँ गढ़ी गईं, जो मंगल-द्रव्य लिए हुए खड़ी दिखाई देती थीं।
चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई॥॥४॥
अनेक प्रकार की सुंदर चौकें पुराई गईं, जिनमें मणिजड़ित हाथी सहज ही शोभा दे रहे थे।
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥२८८॥
नीलमणि को तराशकर अत्यंत सुगंधित और सुंदर पत्ते बनाए गए, सोने के बौर और मरकत के गुच्छे रेशमी डोरी में शोभित हो रहे थे।
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥॥१॥
सुंदर वंदनवार रचे गए, मानो कामदेव ने अपने फंदे सजाए हों। अनेक मंगल-कलश बनाए गए, ध्वजा, पताका, वस्त्र और सुंदर चँवर सजाए गए।
दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥॥२॥
अनेक मनोहर मणिमय दीपक जगमगा रहे थे, उस विचित्र मंडप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जिस मंडप में स्वयं सीता वधू बनकर विराजें, उसका वर्णन करने की बुद्धि भला किस कवि में है।
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥॥३॥
जब दूल्हा स्वयं रूप-गुण के सागर राम हों, तो वह मंडप तीनों लोकों में उजागर हो ही जाएगा। राजा जनक के भवन की जैसी शोभा थी, वैसी ही शोभा नगर के घर-घर में देखी जा रही थी।
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥॥४॥
जिसने भी उस समय मिथिला को निहारा, उसे चौदहों भुवन उसके सामने तुच्छ लगने लगे। नगर के साधारण से घर में भी जो संपदा शोभित थी, उसे देखकर स्वयं इंद्र भी मोहित हो गए।
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।तेहि पुर के सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥२८९॥
जिस नगर में स्वयं लक्ष्मी छल से सुंदर स्त्री का वेश धरकर निवास करती हों, उस नगर की शोभा का वर्णन करते हुए सरस्वती और शेषनाग भी सकुचा जाते हैं।
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥॥१॥
दूत राम की पवित्र नगरी अयोध्या में पहुँचे, सुंदर नगर को देखकर वे हर्षित हुए। उन्होंने राजद्वार पर अपने आने की सूचना दी; राजा दशरथ ने सुनते ही उन्हें बुला लिया।
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती॥॥२॥
प्रणाम करके दूतों ने पत्री दी, प्रसन्न होकर राजा स्वयं उठकर उसे ले गए। पत्री बाँचते समय उनके नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो उठा और छाती भर आई।
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥॥३॥
राम-लक्ष्मण को हृदय में बसाकर हाथ में वह सुंदर पत्री लिए राजा भावविभोर होकर मौन रह गए, कुछ कह नहीं पाए। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्री पढ़ी, और सच्ची बात सुनकर सारी सभा हर्षित हो उठी।
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई॥॥४॥
वहीं खेल रहे भरत को यह समाचार मिला, तो वे अपने प्रिय भाई सहित वहाँ आ गए। अत्यंत स्नेह से सकुचाते हुए पूछने लगे - पिताजी, यह पत्री कहाँ से आई है।
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥२९०॥
भरत ने पूछा - प्राणप्रिय दोनों भाई कुशल तो हैं, बताइए वे इस समय किस देश में हैं। भरत के इन स्नेह से सने वचनों को सुनकर राजा ने फिर से पत्री बाँची।
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता॥प्रीति पुनीत भरत के देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥॥१॥
पत्री सुनकर दोनों भाई पुलकित हो उठे, उनका स्नेह इतना अधिक था कि शरीर में समाता ही नहीं था। भरत की यह पवित्र प्रीति देखकर सारी सभा को विशेष सुख मिला।
तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥॥२॥
तब राजा ने दूतों को अपने निकट बिठाया और मधुर मनोहर वचन बोले - भाई, बताओ, दोनों बालक कुशल तो हैं; तुमने उन्हें अपनी आँखों से भलीभाँति देखा है।
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥॥३॥
साँवले और गोरे रंग के, धनुष-तरकश धारण किए, किशोर अवस्था के, विश्वामित्र मुनि के साथ रहने वाले - क्या तुम उन्हें पहचानते हो, उनका स्वभाव बताओ। प्रेम-विभोर राजा बारंबार यही पूछते रहे।
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने॥॥४॥
जिस दिन से मुनि विश्वामित्र उन्हें साथ ले गए थे, आज ही तो पहली बार सच्ची खबर मिली है। बताओ, जनक ने उन्हें किस प्रकार पहचाना - राजा के ये प्रिय वचन सुनकर दूत मुसकरा दिए।
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥२९१॥
दूतों ने कहा - सुनिए, हे राजाओं के मुकुटमणि! आपके समान धन्य कोई नहीं, क्योंकि राम और लक्ष्मण जैसे विश्व-भूषण पुत्र आपके ही हैं।
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥॥१॥
आपके पुत्रों के विषय में पूछना ही व्यर्थ है, वे तो पुरुषों में सिंह के समान तीनों लोकों को उजागर करने वाले हैं। जिनके यश और प्रताप के आगे चंद्रमा मलिन और सूर्य भी शीतल जान पड़ता है।
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥॥२॥
उनके विषय में क्या कहूँ, हे नाथ, भला सूर्य को दीपक लेकर कैसे पहचाना जाए। सीता के स्वयंवर में अनेक राजा और एक-से-एक बढ़कर वीर योद्धा एकत्र हुए थे।
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥॥३॥
शिव के धनुष को कोई भी टस से मस न कर सका, सब बलवान वीर हार गए। तीनों लोकों में जो अपने को वीर मानते थे, उन सबकी शक्ति शिव-धनुष ने ही भंग कर दी।
सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥॥४॥
जो देवता-असुर मेरु पर्वत तक उठा सकते हैं, वे भी हृदय से हारकर वहाँ से चक्कर काटकर लौट गए। जिसने खेल-खेल में कैलास पर्वत तक उठा लिया था, वह भी उस सभा में पराजित हुआ।
तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥२९२॥
हे महाराज सुनिए, वहाँ रघुकुल-मणि राम ने बिना किसी प्रयास के उस धनुष को वैसे ही तोड़ दिया जैसे हाथी कमल की नाल तोड़ देता है।
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥॥१॥
यह सुनकर क्रोधित होकर परशुराम वहाँ आए, उन्होंने अनेक प्रकार से आँखें दिखाईं। परंतु राम का बल देखकर उन्होंने अपना धनुष उन्हें ही दे दिया, और बहुत विनय करते हुए वे वन को चले गए।
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥॥२॥
हे राजन, जैसा अतुलनीय बल राम का है, वैसा ही तेज का भंडार लक्ष्मण भी हैं। जिनकी दृष्टि मात्र से राजा काँप उठते हैं, जैसे सिंह-शावक की ताक से हाथी काँप उठता है।
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥॥३॥
हे देव, आपके दोनों बालकों को देखने के बाद अब कोई और हमारी आँखों में समाता ही नहीं। दूतों की यह वचन-रचना, जो प्रेम, प्रताप और वीर-रस से सनी थी, सबको बहुत प्रिय लगी।
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना॥॥४॥
सभा सहित राजा प्रेममग्न हो गए, और दूतों को न्योछावर देने लगे। जो कुछ अनुचित लगे उस पर कान बंद कर लिए, और धर्म का विचार करके सबने सुख माना।
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ॥२९३॥
तब राजा उठकर वशिष्ठ के पास गए और उन्हें पत्रिका दी; दूतों को आदरपूर्वक बुलाकर उन्होंने सारी कथा गुरु को सुनाई।
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥॥१॥
यह सुनकर गुरु वशिष्ठ अत्यंत सुखी होकर बोले - पुण्यात्मा पुरुषों के लिए तो पृथ्वी में सुख ही सुख छाया रहता है। जैसे नदियाँ बिना किसी कामना के भी सहज ही सागर में जा मिलती हैं।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥॥२॥
वैसे ही सुख और संपत्ति बिना बुलाए भी धर्मशील पुरुषों के पास सहज स्वभाव से चली आती हैं। आप गुरु, ब्राह्मण, गौ और देवताओं की सेवा करने वाले हैं, और उतनी ही पवित्र देवी कौसल्या हैं।
सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें॥॥३॥
संसार में आपके समान पुण्यात्मा न कोई हुआ है, न है और न होगा। हे राजन, आपसे अधिक पुण्यवान भला और कौन हो सकता है, जिनके राम जैसे पुत्र हैं।
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी॥तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना॥॥४॥
वीर, विनम्र, धर्म-व्रत धारण करने वाले और गुणों के सागर - ऐसे चारों उत्तम बालक आपके हैं। आपका सदा सर्वकाल कल्याण ही होगा - अब नगाड़े बजवाकर बारात सजाइए।
चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ॥२९४॥
शीघ्र चलिए - गुरु के ये वचन सुनकर राजा ने बहुत अच्छा, हे स्वामी कहकर सिर नवाया, और दूतों को ठहरने की व्यवस्था कराकर स्वयं महल को चले गए।
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥॥१॥
राजा ने सारे रनिवास की रानियों को बुलाकर जनक की पत्रिका पढ़कर सुनाई। यह समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्षित हुईं; फिर राजा ने और भी सारी कथा विस्तार से सुनाई।
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी॥मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥॥२॥
प्रेम से प्रफुल्लित रानियाँ ऐसे सुशोभित हो रही थीं मानो मोरनी बादल की गर्जना सुनकर हर्षित हो उठी हो। गुरुजनों की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही थीं, माताएँ अत्यंत आनंद में मग्न थीं।
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥राम लखन के कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥॥३॥
सब आपस में वह अत्यंत प्रिय पत्री लेकर हृदय से लगाकर अपनी छाती शीतल कर रही थीं। राजा दशरथ राम-लक्ष्मण की कीर्ति और करनी का बारंबार वर्णन कर रहे थे।
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥॥४॥
यह सब मुनि विश्वामित्र का ही प्रसाद है ऐसा कहकर दूत द्वार पर चले गए। फिर रानियों ने ब्राह्मणों को बुलाकर आनंदपूर्वक दान दिया; श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले गए।
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरथ के॥२९५॥
याचकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार से न्योछावर दी गई; सब यही आशीर्वाद देते थे - चक्रवर्ती राजा दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों।
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए॥॥१॥
यह कहते हुए दूत अनेक सुंदर वस्त्र पहनकर हर्षित होकर चले, और जोर-जोर से नगाड़े बजाए गए। यह समाचार सब लोगों तक पहुँच गया, और घर-घर बधाइयाँ होने लगीं।
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥॥२॥
चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया कि जनक-पुत्री सीता का राम से विवाह होने जा रहा है। यह शुभ कथा सुनकर लोग प्रेममग्न हो उठे, और मार्ग, घर तथा गलियाँ सजाने लगे।
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥॥३॥
यद्यपि अयोध्या सदैव ही सुहावनी और राम की मंगलमय पावन नगरी है, तथापि प्रीति की प्रीति से प्रेरित होकर लोगों ने विशेष मंगल-सजावट रची और बनाई।
ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू॥कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥॥४॥
ध्वजा, पताका, वस्त्र और सुंदर चँवरों से बाजार को अत्यंत विचित्र ढंग से सजाया गया। सोने के कलश, तोरण, मणियों की जालियाँ, हल्दी, दूब, दही, अक्षत और मालाएँ सजाई गईं।
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥२९६॥
लोगों ने अपने-अपने घरों को मंगलमय ढंग से सजाया; गलियों को चारों सुगंधित द्रव्यों से सींचा गया और सुंदर रंगोली से चौकें पुराई गईं।
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि॥बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि॥॥१॥
जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ झुंड-झुंड में मिलकर सोलहों शृंगार सजाए हुए बिजली की भाँति चमक रही थीं। चंद्रमुखी, हिरण के शावक जैसे नेत्रों वाली वे स्त्रियाँ अपने ही रूप से रति के अभिमान को चूर करने वाली थीं।
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं॥भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥॥२॥
वे मधुर वाणी में मंगल गीत गाती थीं, जिसे सुनकर कोयल भी लजा जाती थी। राजा दशरथ के महल का वर्णन भला कैसे किया जाए, जहाँ विश्व को मोहित करने वाला मंडप रचा गया था।
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥॥३॥
अनेक मनोहर मंगल-द्रव्य सुशोभित थे, अनेक नगाड़े बज रहे थे। कहीं भाट विरुदावली का उच्चारण कर रहे थे, तो कहीं ब्राह्मण वेद-ध्वनि कर रहे थे।
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥॥४॥
सुंदरियाँ राम और सीता का नाम ले-लेकर मंगल गीत गा रही थीं। उत्साह इतना अधिक था और भवन इतना छोटा पड़ गया, मानो वह उमड़कर चारों ओर बह चला हो।
सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥२९७॥
राजा दशरथ के भवन की शोभा का वर्णन भला कौन कवि कर सकता है, जहाँ स्वयं सब देवताओं के शिरोमणि राम ने अवतार लिया है।
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई॥चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥॥१॥
राजा दशरथ ने फिर भरत को बुलाकर कहा - जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, और शीघ्र राम की बारात लेकर चलो। यह सुनते ही दोनों भाई पुलकित हो उठे।
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥॥२॥
भरत ने सब घुड़सवारों को बुलाया और आज्ञा दी; वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचिपूर्वक घोड़ों पर जीन सजाए, और रंग-बिरंगे सुंदर घोड़े सुशोभित होने लगे।
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥॥३॥
सब घोड़े सुंदर और अत्यंत चंचल स्वभाव के थे, वे धरती पर पैर ऐसे रखते थे मानो लोहा जल रहा हो, इतनी फुर्ती से। वे अनेक जातियों के थे, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता - मानो वायु का भी तिरस्कार करके उड़ जाना चाहते हों।
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥॥४॥
उन सब घोड़ों पर भरत जैसी ही आयु के सजीले राजकुमार सवार हुए। सब सुंदर थे, सब आभूषण धारण किए थे, हाथों में बाण-धनुष और कमर में भारी तरकश बाँधे थे।
छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥२९८॥
सब छैल-छबीले, सुजान, नवयुवक और शूरवीर थे; हर घुड़सवार के साथ दो-दो पैदल सैनिक थे, जो तलवार चलाने की कला में अत्यंत प्रवीण थे।
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना॥॥१॥
घोर संग्राम में वीरता के बाने बाँधकर वे नगर से बाहर निकलकर खड़े हो गए। वे चतुराई से घोड़ों को अनेक प्रकार से घुमाते थे, और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि सुन-सुनकर हर्षित होते थे।
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं॥॥२॥
सारथियों ने रथों को विचित्र ढंग से सजाया, उन पर ध्वजा, पताका और मणि-आभूषण लगाए। सुंदर चँवर और घुँघरू ध्वनि कर रहे थे, वे रथ मानो सूर्य के रथ की शोभा को भी चुरा रहे थे।
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥॥३॥
कावेरी-सिंधु आदि उत्तम नस्लों के अनगिनत घोड़े थे, उन्हीं को सारथियों ने रथों में जोता। वे सब सुंदर और अलंकृत होकर ऐसे सुशोभित थे कि उन्हें देखकर मुनियों का भी मन मोहित हो जाए।
जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई॥अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥॥४॥
वे घोड़े जल में भी थल की भाँति चलते थे, इतनी अधिक गति के कारण उनके खुर तक नहीं डूबते थे। अस्त्र-शस्त्र सहित सारा साज-सामान सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया।
चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात॥२९९॥
रथों पर चढ़-चढ़कर सब नगर के बाहर जुटने लगे, बारात तैयार होने लगी; जो जिस कार्य के लिए जा रहा था, उसे वैसा ही सुंदर शुभ शकुन हो रहा था।
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥॥१॥
सुंदर हाथियों पर हौदे कसे गए, जिन्हें जिस प्रकार सजाया गया था, वह कहा नहीं जा सकता। घंटियों से सुशोभित मतवाले हाथी ऐसे चले मानो सावन के सुंदर बादलों की पंक्ति चल रही हो।
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥॥२॥
अन्य भी अनेक प्रकार की सवारियाँ थीं - सुंदर पालकी, सुखासन और यान। उन पर चढ़कर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चले, मानो सारे वेद-मंत्र ही शरीर धारण करके चल पड़े हों।
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥॥३॥
मागध, सूत, भाट और गुणगायक जो जिस सवारी के योग्य था, उसी पर चढ़कर चले। खच्चर, ऊँट, बैल आदि अनेक जातियों के पशु सामान से लदकर अनगिनत प्रकार से चले।
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥॥४॥
करोड़ों कहार काँवरें लेकर चले, विविध प्रकार की वस्तुओं का वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकों के समुदाय अपना-अपना साज-सामान सजाकर चले।
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर॥३००॥
सबके हृदय में अपार हर्ष भरा हुआ था, शरीर रोमांच से पूरित था; सब यही सोच रहे थे कि कब आँख भरकर राम-लक्ष्मण दोनों वीरों को निहारेंगे।
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥॥१॥
हाथी गरज रहे थे, घंटियों की घोर ध्वनि गूँज रही थी, चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट थी। नगाड़े बादलों को भी तिरस्कृत करते हुए गरज रहे थे, इतने शोर में अपना-पराया कुछ भी कानों को सुनाई नहीं पड़ता था।
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें॥चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिए आरती मंगल थारी॥॥२॥
राजा दशरथ के द्वार पर इतनी भारी भीड़ थी कि पत्थर भी रगड़ खाकर धूल हो जाए। स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर आरती और मंगल-थाल लिए यह दृश्य देख रही थीं।
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥॥३॥
वे अनेक मनोहर गीत गा रही थीं, उनका अत्यंत आनंद वर्णन से परे था। तब सुमंत्र ने दो रथ सजाए, जिनमें सूर्य के घोड़ों को भी लजाने वाले घोड़े जोते गए।
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥॥४॥
दोनों सुंदर रथ राजा जनक के पास लाए गए, जिनका वर्णन स्वयं सरस्वती से भी नहीं हो सकता। एक रथ में राजसी ठाट-बाट सजा था, दूसरा अत्यंत तेजपुंज से देदीप्यमान था।
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥३०१॥
उस सुंदर रथ में राजा दशरथ ने हर्षपूर्वक गुरु वशिष्ठ को चढ़ाया, फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके अपने रथ पर चढ़े।
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥॥१॥
वशिष्ठ सहित राजा दशरथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे देवगुरु बृहस्पति के साथ इंद्र सुशोभित हों। कुल-रीति और वेद-विधि के अनुसार राजा ने सब कुछ भलीभाँति व्यवस्थित देख लिया।
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता॥॥२॥
राम का स्मरण करके और गुरु की आज्ञा पाकर राजा शंख बजाते हुए चल पड़े। बारात को देखकर देवता हर्षित हो उठे, और शुभ-मंगलदायी फूल बरसाने लगे।
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥॥३॥
घोड़ों और हाथियों की गर्जना से कोलाहल मच गया, आकाश तक बारात के बाजे बजने लगे। देवता और मनुष्य स्त्रियाँ सब सुंदर मंगल गीत गाने लगीं, शहनाइयाँ सरस राग में बज उठीं।
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥॥४॥
घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं किया जा सकता, पैदल सैनिक शोर करते और झंडे फहराते चल रहे थे। विदूषक अनेक प्रकार के कौतुक कर रहे थे, हास्य में कुशल और मधुर गान में निपुण लोग साथ चल रहे थे।
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥३०२॥
राजकुमार मृदंग और नगाड़े की ध्वनि सुनकर घोड़ों को नचा रहे थे; चतुर नट यह देखकर चकित हो जाते थे कि वे ताल के बंधन से जरा भी नहीं डिगते।
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥॥१॥
वह सजी हुई बारात वर्णन करते नहीं बनती थी, सुंदर शुभ शकुन हो रहे थे। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा चुग रहा था, मानो वह सारे मंगल का संदेश दे रहा हो।
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी॥॥२॥
दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में दिखाई दिया, सबको नेवले का दर्शन हुआ। तीनों प्रकार की हवा अनुकूल दिशा में बह रही थी, और घड़ा लिए, बालक सहित सुंदर स्त्री सामने से आ रही थी।
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥॥३॥
सियारिन बार-बार अपना दर्शन दिखा रही थी, गाय सामने से अपने बछड़े को दूध पिला रही थी। हिरणों का झुंड घूमकर दाहिनी ओर आ गया, मानो उसने साक्षात मंगल-गणों का दर्शन करा दिया हो।
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥॥४॥
छेमकरी पक्षी ने विशेष कुशलता की सूचना दी, बाईं ओर सुंदर वृक्ष पर श्यामा पक्षी दिखाई दिया। सामने से दही और मछली आती दिखी, और हाथों में पुस्तकें लिए दो प्रवीण ब्राह्मण भी सामने आए।
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥३०३॥
ये सभी शकुन मंगलमय, कल्याणमय और मनचाहा फल देने वाले थे, मानो सारे शुभ शकुन एक साथ सच होने के लिए ही प्रकट हुए हों।
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥॥१॥
उस राजा के लिए तो मंगल शकुन सहज ही होंगे, जिसके पास साक्षात सगुण ब्रह्म ही सुंदर पुत्र बनकर हैं। राम जैसा वर और सीता जैसी वधू हो, और समधी हों पवित्र दशरथ तथा जनक - फिर शुभ शकुन क्यों न हों।
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥॥२॥
ऐसा विवाह होने की बात सुनकर मानो सारे शकुन नाच उठे - अब ब्रह्मा ने हमें सच्चा कर दिया। इस प्रकार बारात ने प्रस्थान किया, घोड़े-हाथी गरजते और नगाड़े बजते रहे।
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥॥३॥
सूर्यवंश की ध्वजा-रूप बारात को आता जानकर जनक ने नदियों पर पुल बँधवाए। बीच-बीच में सुंदर पड़ाव बनवाए गए, जहाँ स्वर्ग के समान संपदा छाई हुई थी।
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥॥४॥
भोजन, शयन और सुंदर वस्त्र सबको अपनी-अपनी इच्छा के अनुरूप मिल रहे थे। ऐसी नित नई अनुकूल सुख-सुविधा देखकर सारे बाराती अपना घर तक भूल गए।
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥३०४॥
बारात आ रही है यह जानकर और नगाड़ों की तेज ध्वनि सुनकर, राजा जनक ने हाथी, रथ, पैदल सेना और घोड़े सजाकर स्वागत के लिए अगवानी दल भेजा।
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥॥१॥
सोने के कलश, परात और थाल भरकर तथा अनेक प्रकार के सुंदर पात्र लेकर अमृत के समान सब पकवान भरे गए, जिनका वर्णन विविध प्रकार से नहीं किया जा सकता।
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥॥२॥
अनेक फल और सुंदर वस्तुएँ राजा जनक ने हर्षपूर्वक भेंट के रूप में भिजवाईं। आभूषण, वस्त्र, अनेक बड़ी मणियाँ, पक्षी, मृग, घोड़े, हाथी और अनेक प्रकार की सवारियाँ भी भेजीं।
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥॥३॥
मंगल शकुन-द्रव्य और सुंदर सुगंधित वस्तुएँ राजा जनक ने अनेक प्रकार से भेजीं। दही, चिउड़ा और अपार उपहार लेकर कहार काँवरें भर-भरकर चले।
अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥॥४॥
जब अगवानी दल को बारात दिखाई दी, तो उनके हृदय में आनंद उमड़ पड़ा और शरीर रोमांचित हो उठा। अगवानी दल की सजावट देखकर बाराती भी प्रसन्न होकर नगाड़े बजाने लगे।
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥३०५॥
हर्षित होकर परस्पर मिलने के लिए दोनों दल पंक्तिबद्ध होकर आगे बढ़े, मानो दो आनंद के समुद्र अपनी मर्यादा भूलकर आपस में मिलने चले हों।
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें॥॥१॥
देवांगनाएँ फूल बरसाकर गीत गाने लगीं, प्रसन्न देवता नगाड़े बजाने लगे। जनक की ओर से लाई गई सब भेंट-वस्तुएँ राजा दशरथ के सामने रखी गईं, और अत्यंत प्रेम से विनती की गई।
प्रेम समेत राय सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥॥२॥
राजा दशरथ ने प्रेमपूर्वक वह सब भेंट स्वीकार कर ली, और जो कुछ इनाम में मिला वह याचकों को दे दिया। सम्मान और आदर के साथ पूजा करके सबको जनवासे की ओर ले चले।
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं॥अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥॥३॥
विचित्र वस्त्रों के पावड़े बिछाए गए थे, जिन्हें देखकर स्वयं कुबेर भी अपने धन का अभिमान त्याग दे। अत्यंत सुंदर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको हर प्रकार से पूरी सुविधा मिली।
जानी सिय बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई॥॥४॥
जब सीता को पता चला कि बारात नगर में आ गई है, तो उन्होंने अपनी कुछ महिमा प्रकट कर दिखाई। उन्होंने हृदय में स्मरण करके सब सिद्धियों को बुलाया, और राजा दशरथ की आगवानी करने भेज दिया।
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।लिए संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥३०६॥
सीता की आज्ञा सुनते ही सब सिद्धियाँ उस जनवासे में जा पहुँचीं, और वहाँ स्वर्ग की समस्त संपदा, सुख और भोग-विलास ले आईं।
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥॥१॥
अपने-अपने निवास को देखकर हर बाराती को हर प्रकार का स्वर्ग-सुख सहज ही सुलभ हो गया। किसी को भी अपने और दूसरे के निवास में कोई भेद नहीं दिखा, और सब जनक की इस उदारता का बखान करने लगे।
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥॥२॥
राम ने सीता की इस महिमा को पहचानकर उसका कारण जान लिया और हृदय में हर्षित हुए। पिता के आगमन का समाचार सुनते ही दोनों भाइयों के हृदय में अत्यंत आनंद समाया नहीं जा रहा था।
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥॥३॥
संकोचवश वे गुरु विश्वामित्र से कुछ कह नहीं पा रहे थे, पर मन में पिता के दर्शन की लालसा थी। विश्वामित्र ने उनकी यह बड़ी विनम्रता देखी, तो उनके हृदय में विशेष संतोष उपजा।
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥॥४॥
हर्षित होकर विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को हृदय से लगाया, उनके अंग पुलकित हो उठे और नेत्रों में जल छा गया। फिर वे उस जनवासे की ओर चले जहाँ दशरथ थे, मानो कोई प्यासा सरोवर की ओर चला हो।
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥३०७॥
जब राजा दशरथ ने मुनि विश्वामित्र को अपने दोनों पुत्रों सहित आते देखा, तो हर्षित होकर उठ खड़े हुए और सुख के समुद्र में मानो थाह लेते हुए आगे चले।
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥॥१॥
राजा दशरथ ने मुनि विश्वामित्र को दंडवत प्रणाम किया, बारंबार उनके चरणों की धूलि सिर पर धारण की। विश्वामित्र ने राजा को हृदय से लगाया, आशीर्वाद देकर उनकी कुशलता पूछी।
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥॥२॥
फिर दोनों भाई दंडवत प्रणाम करने लगे, उन्हें देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं जा रहा था। पुत्रों को हृदय से लगाकर उन्होंने अपने असह्य दुख मिटा लिए, मानो किसी मृत शरीर में प्राण लौट आए हों।
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं॥॥३॥
फिर दोनों भाइयों ने वशिष्ठ के चरणों में सिर नवाया, प्रेममग्न होकर श्रेष्ठ मुनि ने उन्हें हृदय से लगाया। दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों के समूह को भी प्रणाम किया, और मनचाहे आशीर्वाद पाए।
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥॥४॥
भरत ने अपने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित प्रणाम किया, राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगाया। भरत-शत्रुघ्न को देखकर लक्ष्मण भी हर्षित हुए, और सब प्रेम से परिपूर्ण होकर आपस में मिले।
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥३०८॥
नगरवासी, परिजन, जातिजन, याचक, मंत्री और मित्र - सबसे परम कृपालु और विनम्र प्रभु राम यथाविधि मिले।
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥॥१॥
राम को देखकर सारी बारात शीतल हो गई, उस प्रेम की रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। राजा दशरथ के समीप चारों पुत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फल स्वयं शरीर धारण करके आ गए हों।
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥॥२॥
पुत्रों सहित दशरथ को देखकर नगर के स्त्री-पुरुष विशेष रूप से प्रसन्न हुए। देवता फूल बरसाकर नगाड़े बजाने लगे, स्वर्ग की अप्सराएँ गीत गाकर नाचने लगीं।
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥॥३॥
शतानंद, ब्राह्मण, मंत्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाट - राजा जनक ने बारात सहित इन सबका सम्मान किया। फिर अगवानी दल आज्ञा माँगकर लौट गया।
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥॥४॥
बारात लगन के दिन से पहले ही आ गई, इसलिए नगर में उत्सव और भी बढ़ गया। सब लोग ब्रह्मानंद का अनुभव कर रहे थे, और मानो विधाता से कहते थे कि दिन-रात और भी बढ़ जाएँ।
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥३०९॥
राम-सीता सौंदर्य की चरम सीमा हैं, और दोनों राजा पुण्य की चरम सीमा हैं - नगरवासी स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ मिलकर ऐसा ही कहते थे।
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहूँ न इन्ह समान फल लाधे॥॥१॥
सीता साक्षात जनक के पुण्य की मूर्ति हैं, और राम दशरथ के पुण्य ने ही शरीर धारण कर लिया है। इन दोनों राजाओं जैसी शिव-आराधना किसी ने नहीं की, और किसी को भी इनके समान फल नहीं मिला।
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥हम सब सकल सुकृत के रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥॥२॥
इनके समान न कोई संसार में हुआ है, न है कहीं और न होगा। हम तो सब पूर्वजन्म के समस्त पुण्यों की राशि लेकर ही जनकपुर में जन्म लेकर इसके निवासी बने हैं।
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥॥३॥
जिन्होंने सीता-राम की छवि देख ली, हमारे समान विशेष पुण्यात्मा और कौन होगा। अब हम राम का विवाह भी देखेंगे, और भलीभाँति अपने नेत्रों का लाभ उठाएँगे।
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥॥४॥
कोयल जैसी मधुर वाणी वाली स्त्रियाँ आपस में कहती थीं - हे सुनयनी, इस विवाह में हमें बड़ा लाभ मिलेगा। बड़े भाग्य से विधाता ने ऐसी बात बनाई कि दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि बनेंगे।
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥३१०॥
स्नेहवश जनक बारंबार सीता को मायके बुलाएँगे, और तब करोड़ों कामदेवों से भी सुंदर दोनों भाई उन्हें लेने आएँगे।
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥॥१॥
तब अनेक प्रकार से उनकी पहुनाई होगी - भला ऐसा ससुराल किसे प्रिय नहीं लगेगा। और उस-उस समय राम-लक्ष्मण को निहारकर सारे नगरवासी सुखी होंगे।
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥॥२॥
राम-लक्ष्मण की जैसी सुंदर जोड़ी है, वैसे ही राजा जनक के साथ आए दो और सुंदर बालक भी हैं। दोनों के साँवले-गोरे सर्वांग सुहावने हैं - ऐसा वे सब कहते थे जो उन्हें देख आए थे।
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥॥३॥
किसी ने कहा - मैंने आज उन्हें निहारा, मानो ब्रह्मा ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें सँवारा हो। भरत की सूरत तो बिलकुल राम जैसी ही है, कि सहसा स्त्री-पुरुष उन्हें पहचान ही नहीं पाते।
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥॥४॥
लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी बिलकुल एक जैसे रूप के हैं, नख से शिख तक उनके सब अंग अनुपम हैं। वे सबके मन को भाते हैं पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता, और तीनों लोकों में उनकी कोई उपमा नहीं है।
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से ए अहैं॥पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
तुलसीदास कहते हैं कि इनकी कोई उपमा नहीं है, चाहे कहीं कोई कवि या विद्वान इन्हें कुछ भी कहें - बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के सागर तो बस यही चारों भाई हैं। नगर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता से यह वचन सुनाती थीं - चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो, जिससे हम सब सुमंगल गीत गाएँ।
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥३११॥
स्त्रियाँ आपस में नेत्रों में जल भरे और शरीर पुलकित किए हुए कहती थीं - हे सखी, यह सब शिव ही करेंगे, क्योंकि दोनों राजा तो पुण्य के सागर ही हैं।
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनंद उमगि उमगि उर भरहीं॥जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥॥१॥
इस प्रकार सब अपने-अपने मनोरथ करती रहीं, आनंद उमड़-उमड़कर हृदय में भरता रहा। जो राजा सीता के स्वयंवर में आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया।
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥॥२॥
राम के विशद और विशाल यश का बखान करते हुए सब राजा अपने-अपने घर लौट गए। इस प्रकार कुछ दिन बीत गए, और सारे नगरवासी और बाराती अत्यंत हर्षित रहे।
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥॥३॥
मंगल का मूल वह लग्न-दिन आ पहुँचा - हेमंत ऋतु का सुहावना अगहन मास था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और श्रेष्ठ वार का विचार करके विधाता ने शुभ लग्न निश्चित किया।
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥॥४॥
वही लग्न नारदजी को भेजी गई, और जनक के ज्योतिषियों ने भी उसकी गणना करके वही निकाला। यह बात सब लोगों ने सुनी और कहने लगे कि ज्योतिषी तो साक्षात विधाता ही हैं।
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥३१२॥
वह धनु राशि की निर्मल बेला सब सुमंगल का मूल थी; शकुन अनुकूल जानकर ब्राह्मणों ने राजा जनक से इस लग्न की बात कही।
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥॥१॥
राजा जनक ने पुरोहित से कहा - अब विलंब करने का क्या कारण है। तब शतानंद ने मंत्रियों को बुलाया, और सब मंगल-सामग्री सजाकर ले आए।
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥॥२॥
शंख, नगाड़े और अनेक ढोल बज उठे, मंगल-कलश और शुभ शकुन-सामग्री सजाई गई। सुंदर सुहागिनें मंगल-गीत गाने लगीं, और पवित्र ब्राह्मण वेद-ध्वनि करने लगे।
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥॥३॥
इस प्रकार आदरपूर्वक राजा दशरथ को लेने चले, जहाँ बाराती ठहरे थे वहाँ जा पहुँचे। कोसलपति दशरथ का समाज देखकर उन्हें स्वयं इंद्र भी अत्यंत तुच्छ जान पड़ा।
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥॥४॥
समय हो गया है, अब पग बढ़ाइए - यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ने लगी। गुरु से पूछकर और कुल-रीति पूरी करके राजा मुनियों और साधुओं के समाज सहित चल पड़े।
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥३१३॥
अयोध्या-नरेश दशरथ का भाग्य और वैभव देखकर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने हजार मुखों से उनकी सराहना करने लगे, और अपने जन्म को उनके सामने व्यर्थ-सा मानने लगे।
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥॥१॥
देवताओं ने इस सुमंगल अवसर को पहचानकर नगाड़े बजाते हुए फूल बरसाने शुरू किए। शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अनेक विमानों पर चढ़कर वहाँ आए।
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥॥२॥
प्रेम से पुलकित शरीर और हृदय में उत्साह लिए वे सब राम का विवाह देखने चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन्हें अपना-अपना लोक भी तुच्छ लगने लगा।
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना॥नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥॥३॥
वे चकित होकर विचित्र मंडप को निहारते थे, वहाँ की सारी रचना अलौकिक और अनूठी थी। नगर के स्त्री-पुरुष रूप के भंडार थे - सुघड़, सुधर्मी, सुशील और सुजान।
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥॥४॥
उन्हें देखकर सब देवता और देवांगनाएँ ऐसे फीके पड़ गए मानो चंद्रमा की चाँदनी में तारे फीके पड़ जाते हैं। स्वयं ब्रह्मा को भी विशेष आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें अपनी रचना-कला कहीं भी ऐसी दिखाई नहीं दी थी।
सिव समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥३१४॥
शिव ने सब देवताओं को समझाया - विस्मय में मत भूल जाओ, धैर्य धरकर हृदय में विचार करो कि यह सीता-राम का विवाह है।
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥करतल होहिं पदारथ चारी। ते सिय रामु कहेउ कामारी॥॥१॥
शिव ने देवताओं से कहा - जिनका नाम लेने मात्र से संसार के समस्त अमंगलों की जड़ नष्ट हो जाती है, और चारों पदार्थ हथेली पर आ जाते हैं, वे ही सीता-राम हैं।
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥॥२॥
इस प्रकार शिव ने देवताओं को समझाया, फिर आगे बढ़कर अपने श्रेष्ठ बैल नंदी को हाँका। देवताओं ने राजा दशरथ को जाते देखा, जिनका मन महान आनंद से भरा था और शरीर पुलकित था।
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥॥३॥
साधुओं के समाज के साथ ब्राह्मण भी चल रहे थे, मानो सुख ने ही शरीर धारण करके सेवा की हो। साथ में चारों सुंदर पुत्र ऐसे सुशोभित थे मानो मोक्ष स्वयं शरीर धारण करके चल रहा हो।
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥॥४॥
मरकत मणि और सोने के रंग की वह सुंदर जोड़ी देखकर देवताओं का प्रेम कम न रहा। फिर राम को निहारकर वे हृदय से हर्षित हुए, और राजा दशरथ की सराहना करते हुए फूल बरसाए।
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥३१५॥
राम के नख से शिख तक सुंदर रूप को बारंबार निहारकर, पार्वती सहित शिव का शरीर पुलकित हो उठा और नेत्र जल से भर गए।
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥॥१॥
राम के अंग मोर के कंठ जैसी साँवली आभा वाले थे, उनके सुंदर वस्त्र बिजली को भी लजाने वाले थे। विवाह के विविध आभूषण धारण किए हुए थे, जो हर प्रकार से मंगलमय और सुहावने लगते थे।
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥॥२॥
उनका मुख शरद ऋतु के निर्मल चंद्रमा जैसा सुहावना था, नेत्र नवीन कमल को भी लजाने वाले थे। उनकी सारी सुंदरता अलौकिक थी, जिसे कहा नहीं जा सकता, केवल मन-ही-मन अनुभव किया जा सकता था।
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥॥३॥
साथ में मनोहर भाई सुशोभित थे, चंचल घोड़ों को नचाते हुए चल रहे थे। राजकुमार अपने सुंदर घोड़े दिखा रहे थे, और वंश की प्रशंसा करने वाले भाट विरुदावली सुना रहे थे।
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥॥४॥
जिस घोड़े पर राम विराजमान थे, उसकी चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते थे। वह हर प्रकार से इतना सुहावना था कि कहा नहीं जा सकता - मानो कामदेव ने स्वयं घोड़े का वेश बनाया हो।
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥
मानो कामदेव ने राम के लिए घोड़े का वेश बनाया हो, वह अपनी आयु, बल, रूप, गुण और चाल से सारे भुवन को मोहित कर रहा था। उसकी जीन जड़ाऊ रत्नों की चमक से जगमगा रही थी, जिस पर सुंदर मोती, मणि और माणिक जड़े थे। उसकी सुंदर घुँघरू-भरी लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सब ठगे से रह गए।
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥३१६॥
प्रभु के मन में लीन होकर घोड़ा चलते समय ऐसी छवि पाता था मानो तारों से सजा बादल बिजली के साथ मोर को नचा रहा हो।
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारद न बरनै पारा॥संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥॥१॥
जिस सुंदर घोड़े पर राम सवार थे, उसका वर्णन स्वयं सरस्वती भी नहीं कर सकतीं। शिव राम के रूप में इतने अनुरक्त हो गए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र अत्यंत प्रिय लगने लगे।
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥॥२॥
जब विष्णु ने प्रेमपूर्वक राम को निहारा, तो लक्ष्मी सहित वे स्वयं मोहित हो गए। राम की छवि देखकर ब्रह्मा भी हर्षित हुए, पर अपने आठ ही नेत्र होने का उन्हें पछतावा हुआ।
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥॥३॥
देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह था, क्योंकि उनके पास ब्रह्मा से डेढ़ गुना नेत्र थे। सुजान इंद्र भी राम को निहारते हुए यह मानने लगे कि गौतम मुनि का दिया शाप उनके लिए परम हितकारी ही सिद्ध हुआ।
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥॥४॥
सब देवता इंद्र से ईर्ष्या करने लगे - आज इंद्र के समान भाग्यशाली कोई नहीं है। राम को देखकर देवगण प्रसन्न हुए, और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा गया।
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥
दोनों ओर के राजसमाज में अत्यंत हर्ष था, अनेक नगाड़े बज रहे थे। देवता हर्षित होकर जय हो, रघुकुल-मणि की जय हो कहते हुए फूल बरसा रहे थे। बारात आती जानकर इस प्रकार अनेक बाजे बजने लगे; रानियों ने सुहागिनों को बुलाकर परिछन के लिए मंगल-सामग्री सजाई।
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥३१७॥
आरती सजाकर और सब मंगल-सामग्री अनेक विधियों से सँवारकर, हाथी की सी चाल वाली सुंदर स्त्रियाँ प्रसन्न होकर परिछन करने चलीं।
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥॥१॥
सब चंद्रमुखी और हिरण जैसे नेत्रों वाली स्त्रियाँ अपने शरीर की छवि से रति के अभिमान को चूर करने वाली थीं। उन्होंने रंग-बिरंगे सुंदर वस्त्र पहने थे, और शरीर पर सब आभूषण सजाए थे।
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥॥२॥
उन्होंने अपने अंगों पर सब सुमंगल-चिह्न बनाए थे, वे ऐसा गान गा रही थीं जिसे सुनकर कोयल भी लजा जाए। उनके कंगन, करधनी और पायल बज रहे थे, उनकी चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते थे।
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥॥३॥
आकाश और नगर दोनों में विविध प्रकार के मंगल-वाद्य बज रहे थे। इंद्राणी शची, सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जैसी पवित्र, सहज बुद्धिमती देवांगनाएँ भी वहाँ उपस्थित थीं।
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई॥करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी॥॥४॥
छल से सुंदर स्त्री का वेश बनाकर वे सब देवांगनाएँ रनिवास में जा मिलीं। वे मधुर मंगल-वाणी में गान करने लगीं, हर्ष में विभोर होकर किसी ने भी उन्हें पहचाना नहीं।
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
कौन जाने किस आनंद के वश होकर सब स्त्रियाँ साक्षात ब्रह्म राम का परिछन करने चलीं। मधुर गान और नगाड़ों की ध्वनि के बीच देवता फूल बरसा रहे थे, शोभा अत्यंत सुंदर थी। आनंद-कंद दूल्हे को निहारकर सबके हृदय हर्षित हो उठे, कमल-सरीखे नेत्रों से जल उमड़ आया और सुंदर अंगों पर रोमांच छा गया।
जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥३१८॥
राम के दूल्हे के वेश को देखकर सीता की माता के मन में जो सुख हुआ, उसे सौ कल्पों तक भी सहस्र सरस्वती और शेषनाग मिलकर भी नहीं कह सकते।
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥॥१॥
नेत्रों के जल को हटाकर, इसे मंगल अवसर जानकर, प्रसन्न मन से रानियाँ परिछन करने लगीं। वेद-विहित और कुल-परंपरा के अनुसार सब व्यवहार भलीभाँति संपन्न किया गया।
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥॥२॥
पंचशब्द वाद्यों की ध्वनि और मंगल-गान हो रहे थे, अनेक प्रकार के वस्त्रों के पावड़े बिछाए जा रहे थे। आरती करके उन्होंने अर्घ्य दिया, फिर राम ने मंडप की ओर गमन किया।
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥॥३॥
राजा दशरथ अपने समाज सहित सुशोभित थे, उनका वैभव देखकर दिक्पाल भी लजा जाते थे। समय-समय पर देवता फूल बरसाते थे, और ब्राह्मण अनुकूल शांति-मंत्र पढ़ रहे थे।
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥॥४॥
आकाश और नगर दोनों में इतना कोलाहल था कि अपना-पराया कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता था। इस प्रकार राम मंडप में आए, उन्हें अर्घ्य देकर आसन पर बिठाया गया।
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥
आसन पर बिठाकर आरती करके स्त्रियाँ दूल्हे को निहारकर सुख पा रही थीं। वे मणि, वस्त्र और आभूषण वारकर मंगल-गीत गा रही थीं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण का वेश बनाकर यह कौतुक देख रहे थे, और रघुकुल-रूपी कमल के सूर्य राम को निहारकर अपने जीवन को सफल मान रहे थे।
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥३१९॥
नाई, कहार, भाट और नट राम से न्योछावर पाकर, सिर नवाकर प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देने लगे, उनके हृदय में हर्ष समाया नहीं जा रहा था।
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥॥१॥
जनक और दशरथ वैदिक और लौकिक सभी रीतियाँ पूरी करके अत्यंत प्रेम से मिले। मिलते समय दोनों महान राजा ऐसे सुशोभित हुए कि उपमा खोज-खोजकर कवि भी लज्जित हो गए।
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम ए उपमा उर आनी॥सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥॥२॥
कहीं भी उपमा न मिली, तो कवियों ने हृदय से हार मान ली कि इनके समान कोई ऐसी उपमा मन में नहीं आती। दोनों समधियों को देखकर देवता अनुरक्त हो गए, और फूल बरसाकर उनके यश का गान करने लगे।
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥॥३॥
देवता कहने लगे - जब से ब्रह्मा ने यह जगत रचा है, तब से हमने बहुत विवाह देखे-सुने हैं, पर आज हमने पहली बार ऐसा देखा कि हर प्रकार से समान साज-समाज और समान योग्यता वाले समधी हों।
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥॥४॥
देवताओं की यह सुंदर और सच्ची वाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति उमड़ पड़ी। पावड़े बिछाकर और सुंदर अर्घ्य देकर जनक आदरपूर्वक दशरथ को मंडप में ले आए।
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न पर कही॥
मंडप की विचित्र रचना और रुचिरता देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो गया। सुजान जनक ने अपने ही हाथों से सबके लिए सिंहासन लाकर रखे। उन्होंने कुल-इष्टदेव के समान वशिष्ठ की पूजा की और विनयपूर्वक आशीर्वाद पाया। विश्वामित्र की पूजा करते समय जो परम प्रीति थी, उसकी रीति का वर्णन दूसरों से नहीं हो सकता।
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥३२०॥
प्रसन्न राजा जनक ने वामदेव आदि ऋषियों की पूजा की, सबको दिव्य आसन दिए और सबसे आशीर्वाद पाया।
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥॥१॥
फिर जनक ने कोसलपति दशरथ की पूजा की, यह जानकर कि उनके प्रति भाव ईश्वर के समान ही है, दूसरा नहीं। हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उनकी बड़ाई की, और अपने भाग्य और वैभव की बहुतायत बताई।
पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती॥आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥॥२॥
उन्होंने सारी बारात के राजाओं की भी पूजा की, समधी के समान ही सबका आदर किया। सबको उचित आसन दिए - इतना उत्साह था कि एक मुख से क्या-क्या कहूँ।
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥॥३॥
जनक ने सारी बारात का दान, मान, विनती और श्रेष्ठ वाणी से सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य - जो सब राम का प्रभाव जानते थे, वे भी वहाँ उपस्थित थे।
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥॥४॥
छल से श्रेष्ठ ब्राह्मण का वेश बनाकर वे सब यह कौतुक देख रहे थे और अत्यंत सुख पा रहे थे। जनक ने उन्हें देवता समझे बिना ही ब्राह्मण मानकर पूजा की, और बिना पहचाने ही उन्हें सुंदर आसन दिए।
पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई।आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई॥सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥
कौन किसे पहचाने - सबको अपनी ही सुध भूल गई थी। आनंद-कंद दूल्हे को निहारकर दोनों ओर आनंद ही आनंद छा गया था। सुजान राम ने देवताओं को पहचान लिया और मन-ही-मन उन्हें आसन दिए; प्रभु का शील और स्वभाव देखकर सब देवताओं का मन प्रमुदित हो गया।
रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥३२१॥
श्रीराम का मुख चंद्रमा के समान शोभित था, और सुंदर चकोर-सरीखे नेत्र आदरपूर्वक उस चंद्र-मुख का रसपान कर रहे थे; सबका प्रेम और आनंद कुछ कम न था।
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥॥१॥
उचित समय देखकर वशिष्ठ ने शतानंद को बुलाया, वे आदरपूर्वक सुनते ही आ गए। वशिष्ठ ने कहा - अब शीघ्र जाकर सीता को ले आओ; शतानंद मुनि आज्ञा पाकर प्रसन्न होकर चले।
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं॥॥२॥
पुरोहित की वाणी सुनकर बुद्धिमती रानी सुनयना सखियों सहित प्रसन्न हुईं। उन्होंने ब्राह्मण-वधुओं और कुल की वृद्धाओं को बुलाया, और कुल-रीति के अनुसार सुमंगल गीत गाए।
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥॥३॥
जो श्रेष्ठ देवांगनाएँ स्त्री-वेश धारण किए हुए थीं, वे सब स्वभाव से ही सुंदर श्यामा थीं। उन्हें देखकर सब स्त्रियाँ सुख पाती थीं, बिना पहचाने ही वे उन्हें प्राणों से भी प्रिय लगती थीं।
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥॥४॥
रानी उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर बारंबार सम्मान करती थीं। सीता को सजा-सँवारकर और सारा साज-समाज बनाकर वे प्रसन्न होकर मंडप की ओर ले चलीं।
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
सखियाँ सोलहों शृंगार सजाकर आदरपूर्वक सीता को लिवा लाईं; मतवाले हाथी की सी चाल वाली वे सुंदरियाँ सब मंगल-सज्जा से सजी थीं। उनके मधुर गान को सुनकर मुनि भी अपना ध्यान त्याग देते थे, कामदेव और कोयल दोनों लजा जाते थे। उनकी पायल, नूपुर और कंगन ताल में सुंदर ध्वनि करते हुए बज रहे थे।
सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥३२२॥
स्त्रियों के समूह के बीच सहज सुंदर सीता ऐसी सुशोभित थीं मानो सुंदरियों के बीच साक्षात सुंदरता ही एक कमनीय स्त्री बनकर विराजमान हो।
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥आवत दीखि बरातिन्ह सीता।। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥॥१॥
सीता की सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता, मेरी बुद्धि छोटी है और उनकी मनोहरता बहुत अधिक है। बारातियों ने सीता को आते देखा - वे रूप की राशि और हर प्रकार से पवित्र थीं।
सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥॥२॥
सबने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया; दूल्हे राम पूर्णकाम हो गए। पुत्रों सहित राजा दशरथ हर्षित हुए, उनके हृदय में जितना आनंद था, वह कहा नहीं जा सकता।
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥॥३॥
देवताओं ने प्रणाम करके फूल बरसाए, मुनियों के आशीर्वाद की ध्वनि मंगल का मूल बनी। गीत, नगाड़ों और भारी कोलाहल के बीच सब स्त्री-पुरुष प्रेम और आनंद में मग्न थे।
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू॥॥४॥
इस प्रकार सीता मंडप में आईं, मुनिश्रेष्ठ प्रसन्न होकर शांति-पाठ करने लगे। उस अवसर पर विधि-विधान के अनुसार दोनों कुलों के गुरुओं ने सारा आचार-कर्म संपन्न किया।
