प्रथम सोपान — भाग 8
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
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शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
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आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं॥॥१॥
आचार-कर्म संपन्न करके गुरु ने गौरी और गणपति की पूजा प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणों से करवाई। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते और आशीर्वाद देकर अत्यंत सुख पाते। मधुपर्क आदि मंगल-द्रव्य जिस समय मुनि मन में चाहते, उसी समय सेवक सोने के पात्रों और कलशों में भरकर वह ले आते।
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥॥२॥
कुल-रीति और प्रीति के साथ पंडित जो-जो कहता, सब आदरपूर्वक किया गया। इस प्रकार देवताओं की पूजा करवाकर सीता को सुंदर सिंहासन दिया गया। सीता-राम की परस्पर दृष्टि का प्रेम किसी से भी पहचाना नहीं जा सका - जो प्रेम मन, बुद्धि और वाणी से भी परे हो, उसे कवि भला कैसे प्रकट करे।
होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥३२३॥
होम के समय अग्नि स्वयं शरीर धारण करके अत्यंत सुखपूर्वक आहुतियाँ ग्रहण करने लगी; वेद भी ब्राह्मण का वेश धारण करके विवाह की सारी विधि बताने लगे।
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥॥१॥
जनक की पटरानी सुनयना को संसार जानता ही है, फिर सीता की माता का वर्णन भला कैसे किया जाए। सुयश, पुण्य, सुख और सुंदरता - इन सबको समेटकर मानो विधाता ने उन्हें रचा हो।
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई॥जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥॥२॥
उचित समय जानकर मुनियों ने सुनयना को बुलाया, सुनते ही सुहागिनें आदरपूर्वक उन्हें ले आईं। जनक की बाईं ओर सुनयना ऐसी सुशोभित थीं मानो हिमालय के साथ मैना बनी हों।
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥निज कर मुदित राय अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥॥३॥
सोने के कलश और सुंदर मणिजड़ित पात्र पवित्र, सुगंधित मंगल-जल से भरे गए। राजा जनक और रानी सुनयना ने प्रसन्न होकर अपने ही हाथों से उन्हें लाकर राम के आगे रखा।
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥॥४॥
मुनि वेद की मंगल-वाणी पढ़ रहे थे, अवसर जानकर आकाश से फूलों की झड़ी लगी। वर को निहारकर दंपति प्रेममग्न हो गए, और उनके पवित्र चरण पखारने लगे।
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥॥१॥
वे राम के चरण-कमल पखारने लगे, प्रेम से शरीर पर रोमांच छा गया। आकाश और नगर में गीत, नगाड़े और जय-जयकार की ध्वनि मानो चारों दिशाओं में उमड़ पड़ी। जो चरण-कमल कामदेव के शत्रु शिव के हृदय-सरोवर में सदैव विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करते ही मन निर्मल होकर कलियुग के सब पाप भाग जाते हैं।
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं।ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै॥॥२॥
जिन चरणों को छूकर पाप में डूबी अहिल्या ने भी मुक्ति पाई, जिनके चरणामृत को शिव अपने सिर पर धारण करते हैं और देवता जिसे पवित्रता की चरम सीमा कहते हैं, जिन चरणों की भ्रमर के समान सेवा करके मुनि और योगीजन मनचाही गति पाते हैं - उन्हीं चरणों को पखारते हुए भाग्यशाली जनक को देखकर सब जय-जयकार करने लगे।
बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आँनद भरैं॥सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥॥३॥
वर और वधू ने हाथ जोड़े, दोनों कुल-गुरुओं ने साक्षी-वचन कहे। पाणिग्रहण होते देख ब्रह्मा, देवता, मनुष्य और मुनि सब आनंद से भर उठे। सुख के मूल दूल्हे को देखकर जनक-सुनयना दंपति का तन पुलकित और हृदय हर्षित हो उठा। लोक और वेद की विधि के अनुसार राजाओं के भूषण जनक ने कन्यादान किया।
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरी।करि होम बिधिवत गाँठि जोरी होन लागी भावँरी॥॥४॥
जैसे हिमालय ने पार्वती को शिव को और समुद्र ने लक्ष्मी को विष्णु को समर्पित किया था, वैसे ही जनक ने सीता को राम को समर्पित किया - संसार में यह नई सुंदर कीर्ति फैल गई। विदेहराज जनक भला और कैसे विनय करते - उन्होंने साँवली मूर्ति राम को कन्या अर्पित कर दी। विधिवत होम करके, वस्त्रों की गाँठ जोड़कर भाँवरें होने लगीं।
जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥३२४॥
भाटों की जय-जयकार, वेद-ध्वनि, मंगल-गान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर सुजान देवता हर्षित होकर कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥॥१॥
वर-वधू मधुर भाँवरें दे रहे थे, सब लोग आदरपूर्वक अपने नेत्रों का लाभ ले रहे थे। उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता, जो भी उपमा दी जाए वह थोड़ी ही पड़ती है।
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥॥२॥
राम-सीता के सुंदर प्रतिबिंब मणि-जड़ित खंभों में जगमगा रहे थे। मानो कामदेव और रति अनेक रूप धारण करके राम का यह अनुपम विवाह देख रहे हों।
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥॥३॥
दर्शन की लालसा थी पर संकोच भी कम न था, इसलिए वह भाव बार-बार प्रकट और छिप रहा था। सब देखने वाले इतने मग्न हो गए कि जनक के समान वे भी अपनी सुध-बुध भूल बैठे।
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥॥४॥
प्रसन्न मुनियों ने भाँवरें फिरवाईं, नेग-सहित सारी रीतियाँ पूरी कीं। राम ने सीता की माँग में सिंदूर भरा, उस शोभा का किसी भी प्रकार वर्णन नहीं किया जा सकता।
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥॥५॥
मानो लाल पराग से भरा कमल-पुष्प चंद्रमा को अमृत के लोभ से भेंट कर रहा हो। फिर वशिष्ठ की आज्ञा पाकर वर-वधू एक ही आसन पर बैठे।
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए।तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥॥१॥
श्रेष्ठ आसन पर राम-सीता बैठे, राजा दशरथ मन में हर्षित हो उठे। बारंबार उन्हें निहारकर उनका शरीर पुलकित हो उठा, मानो अपने पुण्य-रूपी कल्पवृक्ष का यह नया फल मिला हो। सारे भुवन में उत्साह भर गया, सबने कहा - राम का विवाह हो गया। इस एक महामंगल का वर्णन एक जिह्वा से भला कैसे पूरा हो।
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।माँडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि के॥कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥॥२॥
तब वशिष्ठ की आज्ञा पाकर जनक ने विवाह की सारी सज्जा फिर से सँवारकर मांडवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला - इन कुँआरी कन्याओं को बुलवाया। कुशध्वज की कन्या मांडवी, जो गुण, शील, सुख और शोभा से परिपूर्ण थीं, उन्हें सब रीति और प्रीति के साथ विवाह करके राजा जनक ने भरत को दे दिया।
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥
सीता की छोटी बहन उर्मिला को सब सुंदरियों में शिरोमणि जानकर, उन्हें सब विधि से सम्मानपूर्वक लक्ष्मण को विवाहकर दे दिया। और जिनका नाम श्रुतकीर्ति था, वे सुनयन, सुमुखी और सब गुणों की खान थीं - रूप और शील से उजागर उस कन्या को राजा ने शत्रुघ्न को दिया।
अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं।सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिमुन सहित बिराजहीं॥॥४॥
योग्य वर-वधुओं ने परस्पर एक-दूसरे को देखकर संकोचवश हृदय में हर्ष का अनुभव किया। सभी लोग सुंदरता की सराहना करते हुए आनंदित हो उठे, और देवता फूल बरसाने लगे। सुंदर वर-वधुएँ एक ही मंडप में ऐसी सुशोभित थीं मानो जीव की चारों अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय) विमान सहित विराजमान हों।
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥३२५॥
अपने सब पुत्रों को वधुओं सहित निहारकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए, मानो राजाओं में शिरोमणि दशरथ ने चारों पुरुषार्थ फल-सहित पा लिए हों।
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥॥१॥
जैसी राम के विवाह की विधि वर्णित की गई, वैसी ही रीति से सब कुँआरों का विवाह हुआ। दहेज इतना अपार था कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, सारा मंडप सोने-मणियों से भर गया था।
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥॥२॥
कंबल, वस्त्र और विचित्र पटोरे अनेक प्रकार के और बहुमूल्य दिए गए। हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और अलंकृत गौएँ, जो कामधेनु के समान थीं, भी दहेज में दी गईं।
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥॥३॥
इतनी वस्तुएँ थीं कि उनका हिसाब कैसे किया जाए, उन्हीं को पता है जिन्होंने देखा; कहा नहीं जा सकता। दिक्पाल भी इसे देखकर ईर्ष्या करने लगे; राजा दशरथ ने सब कुछ सुखपूर्वक स्वीकार किया।
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥॥४॥
जिस याचक को जो पसंद आया, वह उसे दे दिया गया; जो बचा वह जनवासे में ले आया गया। तब हाथ जोड़कर जनक ने सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी में कहा।
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥॥१॥
आदर, दान, विनय और बड़ाई से सारी बारात का सम्मान करके, प्रसन्न होकर जनक ने महामुनियों के समूह को प्रेमपूर्वक पूजकर वंदना की। सिर नवाकर, हाथ जोड़कर, सब देवताओं को मनाते हुए वे कहने लगे कि हे साधुजन और देवगण, आप तो भाव के सागर चाहते हैं - मेरी यह अंजलि भर जल भला आपको क्या संतोष दे सकता है।
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥॥२॥
फिर जनक ने भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलराज दशरथ से स्नेह और शील से सने मनोहर वचन कहे - हे राजन, आपसे संबंध होने से हम अब हर प्रकार से बड़े हो गए हैं। इस राज्य और वैभव सहित हमें बिना किसी शुल्क का आपका सेवक ही समझिए।
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥॥३॥
इन कन्याओं को अपनी दासी समझकर नई करुणा से इनका पालन कीजिएगा, इनका कोई भी अपराध क्षमा कीजिएगा - मैंने बुलाकर बहुत ढिठाई की है। फिर सूर्यकुल-भूषण दशरथ ने भी समधी जनक का पूरा सम्मान किया - दोनों की परस्पर विनती इतनी थी कि कही नहीं जा सकती, हृदय प्रेम से परिपूर्ण था।
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥॥४॥
देवताओं के समूह फूल बरसाने लगे, राजा दशरथ जनवासे को चल पड़े। नगाड़े, जय-जयकार और वेद-ध्वनि से आकाश और नगर में उत्तम कौतूहल छा गया। फिर मुनीश्वर वशिष्ठ की आज्ञा पाकर सखियाँ मंगल-गीत गाते हुए दूल्हे-दुल्हिनों को कोहबर में ले चलीं।
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥३२६॥
सीता बारंबार राम को निहारती थीं, शरीर से संकुचित होते हुए भी मन संकोच नहीं करता था; प्रेम के प्यासे उनके मनोहर मीन-सरीखे नेत्र सबके मन को हर लेते थे।
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥॥१॥
राम का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुहावना था, उनकी शोभा करोड़ों कामदेवों को भी लजाने वाली थी। महावर लगे उनके सुंदर चरण-कमल ऐसे थे कि मुनियों के मन-रूपी भ्रमर सदा उन पर मँडराते रहते थे।
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥॥२॥
उनकी पीली पवित्र मनोहर धोती उदीयमान सूर्य और बिजली की चमक को भी फीका कर देती थी। कमर में सुंदर घुँघरू-भरी करधनी थी, विशाल भुजाओं पर सुंदर आभूषण शोभित थे।
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे॥॥३॥
पीत यज्ञोपवीत महान छवि दे रहा था, हाथ की अँगूठी सबका मन चुरा लेती थी। सब विवाह-साज सजाकर वे सुशोभित थे, विशाल वक्षस्थल पर वक्ष-आभूषण शोभित था।
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥॥४॥
कमर में पीला उपरना बँधा था, दोनों आँचलों में मणि-मोती लगे थे। कमल-सरीखे नेत्र, कानों में सुंदर कुंडल, और उनका मुख तो समस्त सौंदर्य का भंडार ही था।
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥॥५॥
सुंदर भौंहें और मनोहर नासिका थी, भाल पर तिलक रुचिरता का निवास-स्थान था। माथे पर मंगलमय मौर सुशोभित था, जिसमें मोती और मणियाँ गूँथी हुई थीं।
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं।पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहिं।सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥॥१॥
बड़ी मणियाँ गूँथा मौर और उनके सुंदर अंग सबका मन चुरा रहे थे। नगर की स्त्रियाँ और देवांगनाएँ वर को निहारकर अपने ऊपर से मणि-वस्त्र-आभूषण वार देती थीं, और आरती करके मंगल गीत गाती थीं। देवता फूल बरसाते थे, और सूत, मागध, भाट सुयश सुनाते थे।
कोहबरहिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥॥२॥
सुहागिनों ने सुखपूर्वक वर-वधुओं को कोहबर में लाया, और अत्यंत प्रीति से लौकिक रीति के अनुसार मंगल-गीत गाने लगीं। लहकौरा की रस्म में मानो पार्वती राम को और सरस्वती सीता को सिखा रही थीं; रनिवास हास-विलास के रस में डूबकर मानो अपने जन्म का फल पा रहा था।
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं।बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥॥३॥
अपने ही हाथ की मणि में सौंदर्य-निधान राम की मूरत झलक रही थी, यह देखकर सीता की बाँह हिलती ही न थी, मानो विरह के भय से वह ठहर-सी गई हो। यह कौतुक, विनोद, हर्ष और प्रेम कहा नहीं जा सकता, यह तो केवल सखियाँ ही जानती थीं; अंत में सब सुंदर वर-वधुओं को सखियाँ जनवासे की ओर ले चलीं।
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा।चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चारयो मुदित मन सबहीं कहा॥जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी।चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥॥४॥
उस समय जहाँ-तहाँ आशीर्वाद सुनाई देते थे, नगर और आकाश में महान आनंद छाया था। सबने प्रसन्न मन से कहा - चारों सुंदर जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगींद्र, सिद्ध, मुनीश्वर और देवता प्रभु को निहारकर नगाड़े बजाकर, फूल बरसाकर और जय-जयकार करते हुए अपने-अपने लोक को चले गए।
सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास।सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥३२७॥
तब सब राजकुमार वधुओं सहित अपने पिता के पास आए; शोभा, मंगल और आनंद से भरकर जनवासा मानो उमड़ पड़ा।
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥॥१॥
फिर अनेक प्रकार का भोज तैयार हुआ, जनक ने दूत भेजकर बारातियों को बुलाया। अनुपम वस्त्रों के पावड़े बिछाए गए, और राजा दशरथ अपने पुत्रों सहित भोज में पधारे।
सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥॥२॥
आदरपूर्वक सबके चरण पखारे गए, और सबको उनके योग्य आसनों पर बिठाया गया। जनक ने स्वयं दशरथ के चरण धोए, उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥॥३॥
फिर उन्होंने राम के चरण-कमल धोए, जो स्वयं शिव के हृदय-कमल में छिपे रहते हैं। तीनों भाइयों को भी राम के समान जानकर, जनक ने अपने ही हाथों उनके चरण धोए।
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥॥४॥
राजा जनक ने सबको उचित आसन दिए, और रसोइयों को बुला लिया। आदरपूर्वक पत्तल-दोने बिछाए जाने लगे, सोने की कीलों वाले मणि-जड़ित पान सजाए गए।
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥३२८॥
दाल-चावल, गौ का शुद्ध घी - सुंदर, स्वादिष्ट और पवित्र भोजन क्षणभर में ही चतुर और विनम्र रसोइयों ने सबको परोस दिया।
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥॥१॥
पाँच ग्रास करके सब भोजन करने लगे, विवाह की गारी गीत सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। अनेक प्रकार के पकवान परोसे गए, जो अमृत के समान थे और जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥॥२॥
सुजान रसोइये परोसने लगे, इतने प्रकार के व्यंजन थे कि उनके नाम कौन जाने। भोजन की चार विधियाँ बताई गई हैं, पर उनमें से एक-एक विधि का भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता।
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥॥३॥
छहों रसों वाले रुचिकर व्यंजन अनेक प्रकार के थे, प्रत्येक रस के भी अनगिनत रूप थे। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का नाम ले-लेकर मधुर स्वर में विवाह की ठिठोली-भरी गारी गा रहे थे।
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥॥४॥
उस अवसर पर सुहावनी गारी शोभा दे रही थी, राजा दशरथ अपने समाज सहित उसे सुनकर हँस रहे थे। इस प्रकार सबने भोजन किया, और आदरपूर्वक आचमन कराया गया।
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥३२९॥
जनक ने पान देकर दशरथ सहित सारे समाज की पूजा की; फिर सब राजाओं के शिरोमणि दशरथ प्रसन्न होकर जनवासे को लौट गए।
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥॥१॥
नगर में नित नए मंगल हो रहे थे, दिन-रात पल के समान बीत रहे थे। भोर होते ही राजाओं में शिरोमणि दशरथ जागे, और याचक उनके गुणों का गान करने लगे।
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥॥२॥
वधुओं सहित राजकुमारों को देखकर मन में जितना आनंद था, वह कैसे कहा जाए। प्रातःक्रिया करके सब गुरु वशिष्ठ के पास गए, उनके मन में महान प्रमोद और प्रेम था।
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा॥॥३॥
प्रणाम और पूजा करके, हाथ जोड़कर, राजा दशरथ मानो अमृत में डुबोई हुई वाणी में बोले - हे मुनिराज, सुनिए, आपकी ही कृपा से आज मेरे सब कार्य पूर्ण हो गए हैं।
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई॥सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई॥॥४॥
हे स्वामी, अब सब ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भलीभाँति सजाई हुई गौएँ दान दीजिए। यह सुनकर गुरु वशिष्ठ ने राजा की बड़ाई की, फिर मुनियों के समूह को बुलाने भेजा।
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥३३०॥
वामदेव, देवर्षि नारद, वाल्मीकि और जाबालि सहित विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह वहाँ आए।
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई॥॥१॥
राजा दशरथ ने सबको दंडवत प्रणाम किया, प्रेमपूर्वक पूजकर उन्हें श्रेष्ठ आसन दिए। फिर चार लाख उत्तम गौएँ मँगाईं, जो कामधेनु के समान स्वभाव वाली और सुंदर थीं।
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं॥करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउ आजु जग जीवन लाहू॥॥२॥
उन सब गौओं को हर प्रकार से अलंकृत करके, प्रसन्न होकर राजा ने ब्राह्मणों को दान कर दिया। राजा अनेक प्रकार से विनती करते हुए कहते थे - आज मैंने अपने जीवन का सच्चा लाभ पा लिया।
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥॥३॥
आशीर्वाद पाकर राजा आनंदित हुए, फिर उन्होंने याचकों के समूह को बुलाया। सूर्यकुल के आनंददाता दशरथ ने सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ - सबकी रुचि पूछ-पूछकर दान दिए।
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥॥४॥
याचक जय हो, जय हो, सूर्यकुल के स्वामी की जय हो - ऐसी गुण-गाथा पढ़ते-गाते हुए चले गए। इस प्रकार राम के विवाह का उत्साह इतना अपार था कि उसे शेषनाग के हजार मुख भी वर्णन नहीं कर सकते।
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥३३१॥
राजा दशरथ बारंबार विश्वामित्र के चरणों में सिर नवाकर कहते थे - हे मुनिराज, यह सारा सुख आपकी ही कृपा-कटाक्ष का प्रसाद है।
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥॥१॥
जनक के स्नेह, शील और कार्यों की, और उनकी संपन्नता की राजा दशरथ हर प्रकार से सराहना करते थे। दिन उगते ही राजा दशरथ विदा माँगते, पर जनक प्रेमपूर्वक उन्हें रोक लेते।
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥॥२॥
प्रतिदिन नया आदर और अधिकाई से पहुनाई की जाती, हजारों प्रकार से आगवानी होती। नगर में नित नया आनंद और उत्साह छाया रहता था, इसलिए दशरथ का प्रस्थान किसी को अच्छा नहीं लगता था।
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥॥३॥
इस प्रकार बहुत दिन बीत गए, मानो सारे बाराती स्नेह की रस्सी से बँध गए हों। तब विश्वामित्र और शतानंद ने जाकर राजा जनक को समझाकर यह बात कही।
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥॥४॥
यद्यपि आप स्नेह के कारण उन्हें छोड़ नहीं सकते, फिर भी अब राजा दशरथ को जाने की आज्ञा दीजिए। बहुत अच्छा, हे स्वामी कहकर जनक ने मंत्रियों को बुलाया, और मंत्रियों ने जय हो कहकर उनके सामने सिर नवाया।
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥३३२॥
जनक ने कहा - अवधनाथ दशरथ जाना चाहते हैं, महल के भीतर इसकी सूचना कर दो। यह सुनकर मंत्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा सब प्रेमविभोर हो उठे।
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥॥१॥
नगरवासी यह सुनकर कि बारात चलने वाली है, विकल होकर आपस में यह बात पूछने लगे। जब उन्हें प्रस्थान की सच्चाई पता चली, तो सब उदास हो गए, मानो साँझ होते ही कमल सकुचा जाते हैं।
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥॥२॥
जहाँ-जहाँ आते समय बाराती ठहरे थे, वहाँ-वहाँ अनेक प्रकार का साज-सामान तैयार करके भेजा गया। विविध प्रकार के मेवे, पकवान और भोजन-सामग्री का वर्णन नहीं हो सकता।
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा॥तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥॥३॥
कहारों ने अपार बैलों पर सामान लाद-लादकर भेजा, जनक ने अनेक सुसज्जित वस्तुएँ भेजीं। एक लाख घोड़े और पच्चीस हजार रथ, सब नख से सिर तक सुसज्जित करके भेजे गए।
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥॥४॥
दस हजार मतवाले हाथी सजाए गए, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी भी लजा जाएँ। सोना, वस्त्र और मणियों से भरे-भरे यान, भैंसें, गौएँ और अनेक प्रकार की वस्तुएँ भी भेजी गईं।
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥३३३॥
जनक ने फिर इतना अपार दहेज दिया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता - उसे देखकर तो दिक्पालों की संपदा भी तुच्छ जान पड़ती थी।
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥॥१॥
इस प्रकार सारा साज-समाज तैयार करके जनक ने अयोध्या भेज दिया। बारात चलने की बात सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो उठीं मानो कम पानी में मछलियाँ तड़पने लगें।
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं॥होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥॥२॥
वे बारंबार सीता को गोद में ले लेतीं, आशीर्वाद देतीं और सीख देतीं - सदा अपने पति की प्रिय बनी रहना, हमारा आशीर्वाद है कि तुम्हारा सुहाग चिरंजीवी रहे।
सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥॥३॥
सास-ससुर और गुरु की सेवा करना, पति के मन को समझकर उनकी आज्ञा का पालन करना। अत्यंत स्नेहवश बुद्धिमती सखियाँ कोमल वाणी में उन्हें नारी-धर्म सिखाने लगीं।
सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई॥बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥॥४॥
रानियों ने आदरपूर्वक सब कन्याओं को समझाया, और बारंबार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ बारंबार उन्हें गले लगातीं और कहतीं - विधाता ने नारी जाति की रचना ही क्यों की।
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥३३४॥
उसी अवसर पर सूर्यकुल की ध्वजा राम भाइयों सहित, विदा कराने के लिए प्रसन्नतापूर्वक जनक के महल की ओर चले।
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥॥१॥
चारों भाई स्वभाव से सुंदर सुशोभित थे, नगर के स्त्री-पुरुष उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े। कोई कहता - आज ये जाना चाहते हैं, जनक ने विदाई की तैयारी कर दी है।
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥॥२॥
ये चारों राजपुत्र हमारे प्रिय अतिथि हैं, इनका रूप नेत्र भरकर निहार लो। कौन जाने किस पुण्य से बुद्धिमान विधाता ने इन्हें हमारे नेत्रों का अतिथि बनाकर लाया है।
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे॥॥३॥
जैसे मरणशील व्यक्ति अमृत पा जाए, जन्मों का भूखा व्यक्ति कल्पवृक्ष पा जाए, नरक में पड़ा जीव हरि-पद पा जाए - इनके दर्शन हमारे लिए वैसे ही अनमोल हैं।
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥॥४॥
राम की शोभा निहारकर उसे हृदय में धारण कर लो, अपने मन-रूपी सर्प के लिए इस मूरत को मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल में पहुँचे।
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु॥३३५॥
रूप के सागर सब भाइयों को देखकर रनिवास हर्षित होकर उठ खड़ा हुआ; सासुएँ अत्यंत प्रसन्न मन से आरती करके न्योछावर करने लगीं।
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥॥१॥
राम की छवि देखकर वे अत्यंत अनुरक्त हो गईं, प्रेमविभोर होकर बारंबार उनके चरणों में लगीं। लाज कहीं शेष न रही, हृदय में प्रीति ही छा गई - उस सहज स्नेह का वर्णन भला कैसे किया जाए।
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥॥२॥
भाइयों सहित उबटन लगाकर स्नान कराया गया, फिर अत्यंत प्रेम से छहों रसों का भोजन कराया गया। उचित अवसर जानकर राम शील, स्नेह और संकोच से भरी वाणी में बोले।
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥॥३॥
राम ने कहा - राजा दशरथ अयोध्या को जाना चाहते हैं, विदा लेने के लिए उन्होंने हमें यहाँ भेजा है। हे माता, प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिए, और हमें बालक जानकर सदा स्नेह करते रहिएगा।
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥॥४॥
यह वचन सुनते ही रनिवास उदास हो गया, प्रेमवश सासुएँ कुछ बोल ही न सकीं। उन्होंने सब कन्याओं को हृदय से लगा लिया, फिर उन्हें उनके पतियों को सौंपकर अत्यंत विनती की।
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥
विनती करके सुनयना ने सीता को राम को सौंप दिया, और हाथ जोड़कर बारंबार कहा - हे तात, मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ, आप सुजान हैं और सबकी गति आपको विदित है। परिवार, नगरवासियों और मुझ राजा से भी सीता को प्राणप्रिय जानिएगा। हे तुलसी के स्वामी! उसका शील और स्नेह देखकर उसे अपनी दासी करके मानिएगा।
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥३३६॥
हे राम, आप पूर्णकाम और ज्ञानियों में शिरोमणि हैं, आप भाव के ही प्रिय हैं। आप सेवकों के गुण ही ग्रहण करने वाले और दोषों का नाश करने वाले करुणा के धाम हैं।
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥॥१॥
ऐसा कहकर रानी सुनयना राम के चरण पकड़े रह गईं, मानो उनकी वाणी प्रेम के कीचड़ में डूब गई हो। स्नेह से सनी यह श्रेष्ठ वाणी सुनकर राम ने सासु का अनेक प्रकार से सम्मान किया।
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥॥२॥
राम ने हाथ जोड़कर विदा माँगी, बारंबार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर फिर से सिर नवाकर, भाइयों सहित रघुनाथ चल पड़े।
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी॥पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं॥॥३॥
उस सुंदर मधुर मूर्ति को हृदय में बसाकर सब रानियाँ स्नेह से शिथिल हो गईं। फिर धीरज धरकर उन्होंने अपनी कन्याओं को बुलाया, और माताएँ उन्हें बारंबार गले लगाने लगीं।
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥॥४॥
वे उन्हें पहुँचातीं, फिर लौटकर फिर मिल पड़तीं - उनकी परस्पर प्रीति कम न थी। बारंबार मिलती हुई कन्याओं को सखियों ने अलग किया, जैसे गाय को उसके बछड़े से अलग करके ले जाया जाता है।
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु॥३३७॥
सब स्त्री-पुरुष और सखियों सहित रनिवास प्रेमविभोर हो उठा, मानो करुणा ने ही जनकपुर में विरह का निवास बना लिया हो।
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥॥१॥
सीता ने जिन तोते और मैना को सोने के पिंजरों में रखकर पाला-पढ़ाया था, वे भी व्याकुल होकर पूछने लगे - सीता कहाँ हैं। यह सुनकर किसका धैर्य न टूट जाए।
भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥बंधु समेत जनकु तब आए प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥॥२॥
जब पक्षी और पशु तक इस प्रकार विकल हो उठे, तो मनुष्यों की दशा भला कैसे कही जाए। तब भाई सहित जनक वहाँ आए, प्रेम उमड़ पड़ने से उनके नेत्रों में जल छा गया।
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥लीन्हि राय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥॥३॥
सीता को देखते ही जनक का धैर्य भाग खड़ा हुआ, जो परम विरागी कहलाते थे। राजा ने सीता को हृदय से लगा लिया, और उनके ज्ञान की महामर्यादा भी मिट गई।
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई॥॥४॥
सब बुद्धिमान मंत्री उन्हें समझाते रहे, पर जनक ने अवसर का विचार करना ही छोड़ दिया। वे बारंबार अपनी पुत्री को हृदय से लगाते रहे; फिर सुंदर पालकियाँ सजाकर मँगाई गईं।
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥३३८॥
सारा परिवार प्रेमविभोर था; शुभ लग्न जानकर राजा जनक ने कन्याओं को पालकियों में चढ़ाकर सिद्धिदाता गणेश का स्मरण किया।
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई॥दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥॥१॥
राजा ने अनेक प्रकार से अपनी पुत्री को समझाया, नारी-धर्म और कुल-रीति सिखाई। बहुत से दास-दासियाँ दीं, जो सीता के प्रिय पवित्र सेवक थे।
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥॥२॥
सीता के चलते ही नगरवासी व्याकुल हो उठे, फिर भी शुभ मंगलदायी शकुन होने लगे। ब्राह्मण और मंत्रियों सहित पूरा समाज लेकर राजा जनक उन्हें पहुँचाने साथ चले।
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥॥३॥
प्रस्थान का समय देखकर वाद्य बजने लगे, बारातियों ने रथ, हाथी और घोड़े सजा लिए। दशरथ ने सब ब्राह्मणों को बुलाकर उनका दान और सम्मान पूर्ण किया।
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना॥॥४॥
चरण-कमलों की धूलि सिर पर धारण करके, आशीर्वाद पाकर राजा दशरथ प्रसन्न हुए। गणेश का स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया, और अनेक मंगलमूल शुभ शकुन होने लगे।
सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान।चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥३३९॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाते और अप्सराएँ गान करतीं; अवधपति दशरथ नगाड़े बजाते हुए प्रसन्नतापूर्वक अयोध्या को चल पड़े।
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥॥१॥
राजा दशरथ ने विनतीपूर्वक नगर के महाजनों को विदा किया, और आदरपूर्वक सब याचकों को बुलाया। आभूषण, वस्त्र, घोड़े और हाथी देकर, प्रेम से उन सबको संतुष्ट करके खड़ा कर दिया।
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरे न चहहीं॥॥२॥
बारंबार विरुदावली गाकर सब लोग राम को हृदय में बसाकर लौट गए। कोसलपति दशरथ बारंबार लौट जाने को कहते, पर जनक प्रेमवश लौटना नहीं चाहते थे।
पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥॥३॥
फिर राजा दशरथ ने सुंदर वचन कहे - हे महाराज, अब लौट चलिए, आप बहुत दूर तक आ गए हैं। राजा जनक फिर रथ से उतरकर खड़े हो गए, प्रेम के प्रवाह से उनके नेत्रों में जल बढ़ आया।
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥॥४॥
तब विदेहराज जनक हाथ जोड़कर, मानो स्नेह के अमृत में डुबोए हुए वचन बोले - हे महाराज, मैं किस प्रकार अपनी विनय व्यक्त करूँ, आपने मुझे कितनी बड़ाई दी है।
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥३४०॥
कोसलपति दशरथ ने समधी और सज्जनों का हर प्रकार से सम्मान किया; परस्पर मिलन और विनय इतनी अधिक थी कि प्रीति हृदय में समाती नहीं थी।
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥॥१॥
जनक ने मुनियों की मंडली को सिर नवाया, और सबसे आशीर्वाद पाया। फिर आदरपूर्वक उन्होंने अपने जामाताओं को गले लगाया - रूप, शील और गुणों की निधि वे सब भाई थे।
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥॥२॥
सुंदर कमल-सरीखे हाथ जोड़कर जनक प्रेम से मानो अपने ही उपजे वचन बोले - हे राम, मैं आपकी प्रशंसा किस प्रकार करूँ - आप तो मुनियों और शिव के मन-मानस-सरोवर के हंस हैं।
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥॥३॥
जिनकी प्राप्ति के लिए योगीजन क्रोध, मोह, ममता और मद त्यागकर योग-साधना करते हैं, जो व्यापक, ब्रह्म, अलख, अविनाशी, चिदानंद, निर्गुण होते हुए भी गुणों की राशि हैं।
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥॥४॥
जिन्हें मन सहित वाणी भी नहीं जान पाती, जिनका अनुमान लगाने वाले सब तर्क से थक जाते हैं, जिनकी महिमा को वेद भी नेति-नेति कहकर वर्णन करते हैं, जो तीनों कालों में एकरस बने रहते हैं।
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।सब लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥३४१॥
वही आप मेरे नेत्रों के विषय बन गए, यही समस्त सुखों का मूल है। जब ईश्वर अनुकूल हो जाएँ, तो जीव को जगत में सारे लाभ मिल जाते हैं।
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥॥१॥
आपने मुझे हर प्रकार से बड़ाई दी, अपना सेवक जानकर मुझे अपना लिया। यदि दस हजार सरस्वती और शेषनाग हों, और करोड़ों कल्पों तक भी हिसाब करें, तो भी आपके इस उपकार का वर्णन न कर सकें।
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥॥२॥
हे रघुनाथ, सुनिए, मेरा भाग्य और आपके गुणों की गाथा कहते नहीं समाप्त होती। मैं कुछ कहता हूँ, इसका मेरे पास एक ही बल है - आप तो थोड़े से स्नेह पर भी रीझ जाते हैं।
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥॥३॥
हाथ जोड़कर मैं बारंबार यही माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी कभी आपके चरण न छोड़े। यह श्रेष्ठ वचन सुनकर, मानो प्रेम से पोषित होकर, पूर्णकाम राम संतुष्ट हुए।
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही॥॥४॥
श्रेष्ठ विनय करके राम ने ससुर जनक का सम्मान किया, उन्हें पिता, विश्वामित्र और वशिष्ठ के समान माना। फिर उन्होंने भरत से भी विनती की; भरत ने प्रेमपूर्वक मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस॥३४२॥
लक्ष्मण शत्रुघ्न से मिले, राजा जनक ने सबको आशीर्वाद दिया; सब परस्पर प्रेमविभोर होकर बारंबार सिर नवाने लगे।
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥॥१॥
बारंबार विनय और बड़ाई करके राम सब भाइयों सहित चल पड़े। जनक ने जाकर विश्वामित्र के चरण पकड़ लिए, और उनकी चरण-रज सिर तथा नेत्रों पर लगाई।
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥॥२॥
जनक बोले - सुनिए मुनीश्वर, आपके श्रेष्ठ दर्शन से मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है, मेरे मन को यह पूरा विश्वास है। जो सुख और सुयश स्वयं दिक्पाल भी चाहते हुए मनोरथ करने में सकुचाते हैं।
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥॥३॥
हे स्वामी, वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया है, क्योंकि आपके दर्शन के पीछे सब सिद्धियाँ अनुगामिनी हैं। बारंबार सिर नवाकर विनय करके, आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौट गए।
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥॥४॥
नगाड़े बजाकर बारात चल पड़ी, छोटे-बड़े सारे समुदाय प्रसन्न थे। मार्ग में गाँव के स्त्री-पुरुष राम को निहारकर, अपने नेत्रों का फल पाकर सुखी होते थे।
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत॥३४३॥
बीच-बीच में सुंदर पड़ाव करते हुए और मार्ग के लोगों को सुख देते हुए, शुभ दिन बारात अयोध्या के समीप आ पहुँची।
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥॥१॥
नगाड़े और श्रेष्ठ ढोल बजाए गए, भेरी और शंख की ध्वनि से घोड़े-हाथी गरज उठे। झाँझ और सुंदर डिंडिमी वाद्य बज रहे थे, शहनाइयाँ सरस राग में बज उठीं।
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥॥२॥
बारात आने का समाचार सुनकर नगरवासी प्रसन्न हो उठे, उनके शरीर पुलकित हो उठे। सबने अपने-अपने सुंदर घर सजाए, साथ ही बाजार, मार्ग, चौराहे और नगर-द्वार भी सजाए।
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई॥बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥॥३॥
सारी गलियाँ सुगंधित द्रव्यों से सींची गईं, जहाँ-तहाँ सुंदर रंगोली पुराई गई। बाजार इतना सुंदर सजाया गया कि उसका वर्णन नहीं हो सकता - तोरण, ध्वजा, पताका और मंडप सजाए गए।
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥॥४॥
फलों से लदे सुपारी और केले के वृक्ष, तथा आम के वृक्ष रोपे गए, साथ ही बकुल, कदंब और तमाल के वृक्ष भी। ये सुंदर वृक्ष मानो धरती को छूते हुए लगते थे, उनकी जड़ों के चारों ओर मणिजड़ित सुंदर क्यारियाँ बनाई गई थीं।
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥३४४॥
घर-घर में विविध प्रकार के मंगल-कलश सजाए गए; राम की इस नगरी को निहारकर ब्रह्मा आदि सब देवता भी ईर्ष्या करने लगे।
भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥॥१॥
उस अवसर पर राजमहल की शोभा ऐसी थी कि उसकी रचना देखकर कामदेव का भी मन मोहित हो जाए। मंगल-शकुन, मनोहरता, ऋद्धि, सिद्धि, सुख और संपदा सब सुहावने लग रहे थे।
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए॥देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥॥२॥
मानो सब सहज सुहावने उत्साह शरीर धारण करके दशरथ के महल में छा गए हों। राम-सीता को देखने की लालसा भला किसे न हो, यह कहना कठिन है।
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि॥सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥॥३॥
सुहागिनें झुंड-झुंड में मिलकर चलीं, वे अपनी छवि से कामदेव की प्रेयसियों को भी लजाती थीं। सब सुमंगल-सामग्री और आरती सजाए हुए वे ऐसा गान करती थीं मानो सरस्वती ही अनेक रूप धारण करके गा रही हों।
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं॥॥४॥
राजमहल में कोलाहल मच गया, उस समय के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्या आदि राम की माताएँ प्रेमविभोर होकर अपनी शरीर की सुध ही भूल गईं।
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥३४५॥
गणेश और शिव की पूजा करके ब्राह्मणों को अपार दान दिया गया; सब ऐसे प्रसन्न थे मानो किसी परम दरिद्र को चारों पदार्थ मिल गए हों।
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥॥१॥
सब माताएँ आनंद और हर्ष से विभोर थीं, उनके शरीर शिथिल हो गए थे, पैर चलते ही नहीं थे। राम के दर्शन की चाह में वे अत्यंत अनुरक्त होकर परिछन की सामग्री सजाने लगीं।
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥॥२॥
अनेक विधानों से वाद्य बजने लगे, सुमित्रा प्रसन्न होकर मंगल-सामग्री सजाने लगीं। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी - ये सब मंगल की मूल वस्तुएँ थीं।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥॥३॥
अक्षत, अंकुरित अनाज, लावा और सुंदर तुलसी की मंजरी सजी हुई थीं। मिट्टी के सहज सुंदर छोटे घड़े ऐसे लगते थे मानो कामदेव-रूपी पक्षी ने अपने घोंसले बना लिए हों।
सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥॥४॥
शकुन और सुगंधित द्रव्यों का वर्णन नहीं हो सकता, सब रानियाँ सारी मंगल-सामग्री सजा रही थीं। अनेक विधानों से आरतियाँ रची गईं, और सब प्रसन्न होकर मधुर मंगल-गान करने लगीं।
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिए मात।चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥३४६॥
सोने के थालों में मंगल-सामग्री भरकर अपने कमल-सरीखे हाथों में लिए, माताएँ प्रसन्न होकर परिछन करने चलीं, उनके शरीर रोमांच से पुलकित थे।
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥॥१॥
धूप के धुएँ से आकाश काला हो गया, मानो सावन के बादल घुमड़ आए हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसाते थे, मानो बगुलों की पंक्ति मन को खींच रही हो।
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥॥२॥
सुंदर मणिजड़ित वंदनवार ऐसे लगते थे मानो इंद्रधनुष ही सजाया गया हो। अटारियों पर स्त्रियाँ कभी प्रकट होतीं कभी छिप जातीं, मानो सुंदर चंचल बिजली चमक रही हो।
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥॥३॥
नगाड़ों की ध्वनि बादलों की घोर गर्जना जैसी थी, याचक चातक, मेंढक और मोर के समान थे। देवता सुगंधित पवित्र जल बरसाते थे, चंद्रमा के समान नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी थे।
समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥॥४॥
उचित समय जानकर गुरु वशिष्ठ ने आज्ञा दी, तब रघुकुल-मणि राम ने नगर में प्रवेश किया। शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण करके राजा दशरथ अपने समाज सहित प्रसन्न हुए।
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभी बजाइ।बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥३४७॥
शुभ शकुन होने लगे, देवता नगाड़े बजाकर फूल बरसाने लगे; देवांगनाएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं और मधुर मंगल-गान गाने लगीं।
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥॥१॥
मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों में उजागर राम के यश का गान करने लगे। जय-जयकार की ध्वनि, निर्मल वेद-वाणी - दसों दिशाओं में सुमंगल की ध्वनि सुनाई देने लगी।
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥॥२॥
अनेक वाद्य बजने लगे, आकाश में देवता और नगर में लोग सब अनुरक्त हो गए। सजे-सजाए बाराती इतने सुंदर थे कि वर्णन नहीं किया जा सकता, उनके मन में महान हर्ष और सुख समाया नहीं जा रहा था।
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥॥३॥
तब नगरवासियों ने राजा दशरथ को प्रणाम किया, राम को देखकर वे सुखी हो गए। वे मणि और वस्त्र न्योछावर करने लगे, उनके नेत्रों में जल और शरीर पर रोमांच छा गया।
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी॥सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥॥४॥
नगर की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आरती करने लगीं, चारों सुंदर राजकुमारों को निहारकर हर्षित हुईं। पालकियों के सुंदर पर्दे खोलकर वे दुल्हिनों को देखकर सुखी हो गईं।
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥३४८॥
इस प्रकार सबको सुख देते हुए बारात राजद्वार पर आ पहुँची; माताएँ प्रसन्न होकर वधुओं सहित राजकुमारों का परिछन करने लगीं।
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥भूषन मनि पट नाना जाती।। करही निछावरि अगनित भाँती॥॥१॥
वे बारंबार आरती करती थीं, उनके प्रेम और आनंद का वर्णन कौन कर सकता है। आभूषण, मणि और अनेक प्रकार के वस्त्र वे अगणित प्रकार से न्योछावर करती थीं।
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥॥२॥
वधुओं सहित चारों पुत्रों को देखकर माताएँ परमानंद में मग्न हो गईं। बारंबार सीता-राम की छवि देखकर वे प्रसन्न होकर अपने जीवन को सफल मानने लगीं।
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥॥३॥
सखियाँ बारंबार सीता का मुख निहारतीं, और अपने पुण्य की सराहना करते हुए गीत गातीं। देवता क्षण-क्षण फूल बरसाते थे, नाचते-गाते और सेवा में तत्पर रहते थे।
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥॥४॥
चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाएँ ढूँढ़ डालीं, पर कोई भी उपमा देते नहीं बनी - सब तुच्छ ही लगीं। सब स्त्रियाँ उनके रूप में अनुरक्त होकर एकटक निहारती रह गईं।
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥३४९॥
वेद-नीति और कुल-रीति के अनुसार अर्घ्य देकर, पावड़े बिछाकर, वधुओं सहित पुत्रों का परिछन करके सब उन्हें महल के भीतर ले चलीं।
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥॥१॥
चार सहज सुंदर सिंहासन ऐसे थे मानो कामदेव ने स्वयं अपने हाथों से बनाए हों। उन पर कुँआरे राजकुमारों को बिठाया गया, और आदरपूर्वक उनके पवित्र चरण पखारे गए।
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥॥२॥
धूप, दीप और नैवेद्य से वेद-विधि के अनुसार मंगल की निधि वर-वधुओं की पूजा की गई। बारंबार आरती की जाती थी, सुंदर पंखे और चँवर उनके सिर पर ढुलाए जाते थे।
बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं॥॥३॥
अनेक वस्तुएँ न्योछावर की जा रही थीं, सब माताएँ आनंद से भरकर सुशोभित थीं - मानो किसी योगी ने परम तत्व पा लिया हो, मानो किसी चिरकालिक रोगी को अमृत मिल गया हो।
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥॥४॥
मानो किसी जन्म के दरिद्र को पारस पत्थर मिल गया हो, मानो अंधे को सुंदर नेत्र मिल गए हों। मानो गूँगे के मुख में सरस्वती स्वयं आ बसी हों, मानो किसी वीर ने युद्ध में विजय पाई हो।
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥३५०(क)॥
इस सुख से भी सौ करोड़ गुना अधिक आनंद माताओं को मिल रहा था, क्योंकि रघुकुल-चंद्रमा राम भाइयों सहित विवाह करके घर आ गए थे।
लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं॥३५०(ख)॥
माताएँ लोक-रीति संपन्न कर रही थीं, वर-वधू संकोच से सकुचा रहे थे; यह आनंद-विनोद देखकर राम मन-ही-मन मुसकरा रहे थे।
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥॥१॥
विधिपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा की गई, जिससे मन की सारी वासनाएँ पूर्ण हो गईं। सबकी वंदना करके यही वरदान माँगा जाता था - भाइयों सहित राम का कल्याण हो।
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं॥भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥॥२॥
अदृश्य रहकर देवता आशीर्वाद दे रहे थे, प्रसन्न माताएँ अपना आँचल भरकर उसे ग्रहण करती थीं। राजा दशरथ ने बारातियों को बुलाकर उन्हें सवारी, वस्त्र, मणि और आभूषण दिए।
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि॥पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए॥॥३॥
आज्ञा पाकर, राम को हृदय में बसाकर सब प्रसन्न होकर अपने-अपने घर चले गए। नगर के सब स्त्री-पुरुषों को वस्त्र पहनाए गए, घर-घर बधाई के बाजे बजने लगे।
जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई॥सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना॥॥४॥
याचक जो-जो माँगते, प्रसन्न राजा उन्हें वही-वही देते थे। सब सेवकों और अनेक वादकों को भी दान-सम्मान से पूर्ण किया गया।
देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ॥३५१॥
सब प्रणाम करके आशीर्वाद देते और गुण-गाथा गाते थे; तब राजा दशरथ गुरु और ब्राह्मणों सहित महल को गए।
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥॥१॥
वशिष्ठ ने जो आज्ञा दी, राजा ने लोक और वेद-विधि के अनुसार आदरपूर्वक उसका पालन किया। ब्राह्मणों की भीड़ देखकर सब रानियाँ अपना बड़ा भाग्य जानकर आदरपूर्वक उठ खड़ी हुईं।
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए॥आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे॥॥२॥
सबके चरण पखारकर स्नान कराया गया, भलीभाँति पूजा करके राजाओं को भोजन कराया गया। आदर, दान और प्रेम से संतुष्ट होकर वे आशीर्वाद देते हुए मन में संतोष लेकर चले गए।
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥॥३॥
राजा दशरथ ने विश्वामित्र की अनेक प्रकार से पूजा की, कहा - हे नाथ, मेरे समान धन्य कोई दूसरा नहीं। राजाओं ने उनकी अत्यंत प्रशंसा की, और रानियों सहित उनकी चरण-धूलि ग्रहण की।
भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू॥पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥॥४॥
महल के भीतर उन्हें उत्तम निवास दिया गया, राजा और रनिवास उनकी इच्छा का ध्यान रखते थे। फिर राजा ने गुरु वशिष्ठ के चरण-कमलों की पूजा की, और हृदय में अपार प्रीति के साथ विनती की।
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु॥३५२॥
वधुओं सहित सब राजकुमार, और रानियों सहित राजा - सब बारंबार गुरु के चरणों की वंदना करते थे, और मुनीश्वर वशिष्ठ उन्हें आशीर्वाद देते थे।
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥॥१॥
राजा ने हृदय में अत्यंत प्रेम से विनती की, अपने सब पुत्रों और संपदा को गुरु के सामने प्रस्तुत करते हुए। मुनिनायक वशिष्ठ ने अपना नेग माँगकर लिया, और अनेक प्रकार से आशीर्वाद दिया।
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई॥॥२॥
सीता सहित राम को हृदय में बसाकर गुरु वशिष्ठ प्रसन्न होकर अपने निवास को चले गए। राजा ने सब ब्राह्मण-वधुओं को बुलाया, और उन्हें सुंदर वस्त्र-आभूषण पहनाए।
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥॥३॥
फिर सुहागिनों को बुलाकर उनकी रुचि के अनुसार पहनावा दिया गया। नेगी लोग अपने-अपने योग्य नेग लेते थे, और राजाओं में शिरोमणि दशरथ उनकी रुचि के अनुसार उन्हें देते थे।
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥॥४॥
जो भी प्रिय अतिथि और पूज्य जाने गए, राजा ने उन सबका भलीभाँति सम्मान किया। देवता राम के इस विवाह को देखकर फूल बरसाते और उत्साह की प्रशंसा करते थे।
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥३५३॥
देवता नगाड़े बजाते हुए सुखपूर्वक अपने-अपने लोक को चले गए, आपस में राम के यश की चर्चा करते हुए - उनके हृदय में प्रेम समाया नहीं जा रहा था।
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥॥१॥
राजा ने हर प्रकार से सबको संतुष्ट किया, उनका हृदय उत्साह से भरा हुआ था। जहाँ रनिवास था, वहाँ पग धरकर उन्होंने वधुओं सहित राजकुमारों को निहारा।
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥॥२॥
उन्होंने आनंद से उन्हें गोद में ले लिया, जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है। वधुओं को प्रेमपूर्वक गोद में बिठाया, और बारंबार हृदय से हर्षित होकर दुलार किया।
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥॥३॥
यह समाज देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया, सबके हृदय में आनंद का निवास हो गया। राजा ने जिस प्रकार विवाह हुआ था वह सब कह सुनाया, यह सुन-सुनकर सबको हर्ष हो रहा था।
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानी सब प्रमुदित सुनि करनी॥॥४॥
राजा दशरथ ने जनक के राज्य, गुण, शील, बड़ाई, प्रीति, रीति और सुहावनी संपदा का अनेक प्रकार से भाटों की भाँति बखान किया; यह वृत्तांत सुनकर सब रानियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं।
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥३५४॥
पुत्रों सहित स्नान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और जाति-बंधुओं को बुलाकर अनेक प्रकार से भोजन किया; इस प्रकार पाँच घड़ी रात बीत गई।
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥॥१॥
सुंदर स्त्रियाँ मंगल-गान कर रही थीं, वह रात्रि सुख का मूल और मनोहर बन गई थी। आचमन करके सबको पान मिले, माला और सुगंध से सबकी छवि सुशोभित हो गई।
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥॥२॥
राम को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर चले गए। प्रेम, प्रमोद, विनोद, बड़ाई और सारा समाज मनोहरता से भरा हुआ था।
कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥॥३॥
जिसे सौ सरस्वती और शेषनाग भी नहीं कह सकते, जिसे वेद, ब्रह्मा, शिव और गणेश भी नहीं वर्णन कर सकते, उसे मैं कैसे और किस विधि से वर्णन करूँ।
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी॥बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई॥॥४॥
राजा ने हर प्रकार से सबका सम्मान करके कोमल वचन कहते हुए रानियों को बुलाया - वधुएँ छोटी लड़कियाँ हैं, पराए घर से आई हैं, इन्हें पलक की भाँति नेत्रों में संभालकर रखना।
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥३५५॥
राजा ने कहा - बच्चे थके हुए और नींद में हैं, जाकर उन्हें सुला दो। ऐसा कहकर वे राम के चरणों में चित्त लगाए हुए विश्राम-गृह को चले गए।
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥॥१॥
राजा के सहज सुहावने वचन सुनकर सोने और मणियों से जड़े पलंग बिछाए गए। दूध के झाग जैसी सुंदर और सुगंधित, कोमल और सुंदर अनेक चादरें बिछाई गईं।
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥॥२॥
श्रेष्ठ तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता, मणि-भवन में माला और सुगंध महक रही थी। रत्नों के दीपक और अत्यंत सुंदर चँदोवा - इसका वर्णन नहीं हो सकता, वही जान सकता है जिसने उसे देखा हो।
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥॥३॥
सुंदर सेज रचकर राम को उठाया गया, और प्रेमपूर्वक पलंग पर लिटाया गया। फिर बारंबार भाइयों को भी आज्ञा दी गई, और उन्होंने अपनी-अपनी सेज पर शयन किया।
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥॥४॥
राम के साँवले, कोमल और सुंदर अंगों को देखकर सब माताएँ प्रेमपूर्वक कहने लगीं - हे तात, मार्ग में जाते समय भयंकर ताड़का को तुमने किस प्रकार मार डाला।
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥३५६॥
जो घोर निशाचर और विकट योद्धा युद्ध में किसी को गिनते ही नहीं थे, उन दुष्ट मारीच-सुबाहु को उनके सहायकों सहित तुमने किस प्रकार मार डाला।
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई॥॥१॥
हे तात, मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, मुनि के प्रसाद से तुमने अनेक कठिनाइयाँ टाल दीं। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके, गुरु के प्रसाद से सारी विद्याएँ पाईं।
मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥॥२॥
तुम्हारे चरणों की धूलि लगते ही मुनि-पत्नी अहिल्या का उद्धार हो गया, यह कीर्ति सारे भुवन में भर गई। फिर राजाओं की सभा में तुमने शिव के उस कठोर धनुष को तोड़ डाला, जो कच्छप की पीठ के समान दृढ़ था।
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥॥३॥
विश्व-विजय का यश और सीता को पाकर सब भाई विवाह करके घर आ गए। तुम्हारे ये सब अमानुष कर्म केवल विश्वामित्र की कृपा से ही संभव हो सके।
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥॥४॥
हे तात, तुम्हारा चंद्रमुख देखकर आज हमारा जीवन सफल हो गया। जो दिन तुम्हें बिना देखे बीते, विधाता उन्हें हमारी आयु में न गिनें।
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन॥३५७॥
राम ने विनम्र श्रेष्ठ वचन कहकर सब माताओं को संतुष्ट किया; फिर शिव, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण करके उन्होंने अपने नेत्र नींद के वश कर लिए।
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥॥१॥
नींद में उनका सुंदर मुख ऐसे सुशोभित था मानो साँझ के समय कमल मुँदा हुआ हो। घर-घर में स्त्रियाँ जागरण कर रही थीं, आपस में मंगल-गारी गा रही थीं।
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई॥॥२॥
नगरी और रात दोनों सुशोभित थीं; रानियाँ कहती थीं - हे सखी, देखो। सासुएँ सुंदर वधुओं को साथ लेकर सोईं, मानो सर्पों ने अपनी सिरमणि हृदय में छिपा ली हो।
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥॥३॥
पवित्र प्रातःकाल में प्रभु राम जागे, मुर्गे बोलने लगे। भाटों और मागधों ने गुण-गान किया, नगरवासी द्वार पर प्रणाम करने आए।
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥॥४॥
ब्राह्मण, देवता, गुरु, पिता और माता की वंदना करके, आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओं का आदरपूर्वक मुख निहारकर वे राजा दशरथ के साथ द्वार पर पग धरने चले।
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥३५८॥
सहज ही पवित्र होकर सबने शौच किया, फिर पुनीत नदी में स्नान किया। प्रातःक्रिया करके चारों भाई पिता के पास आए।
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई॥देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥॥१॥
राजा ने उन्हें देखकर हृदय से लगा लिया, आज्ञा पाकर वे हर्षित होकर बैठ गए। राम को देखकर सारी सभा शीतल हो गई, मानो नेत्रों के लाभ की चरम सीमा पा ली हो।
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥॥२॥
फिर मुनि वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों वहाँ पधारे; राजा ने उन्हें सुंदर आसनों पर बिठाया। पुत्रों सहित राजा ने उनकी पूजा करके उनके चरणों में प्रणाम किया; राम को निहारकर दोनों गुरु प्रेममग्न हो गए।
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥॥३॥
वशिष्ठ धर्म की कथाएँ सुना रहे थे, राजा दशरथ रनिवास सहित उन्हें सुन रहे थे। मुनियों के मन के लिए भी दुर्गम विश्वामित्र की महिमा को वशिष्ठ ने प्रसन्न होकर विस्तार से वर्णन किया।
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥॥४॥
वामदेव मुनि बोले - यह सब सत्य है, विश्वामित्र की सुंदर कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई है। यह सुनकर सबको आनंद हुआ, और राम-लक्ष्मण के हृदय में विशेष उत्साह जागा।
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥३५९॥
इस प्रकार नित्य मंगल, आनंद और उत्सव के बीच दिन बीतते जा रहे थे; अयोध्या आनंद से इस कदर भर उठी कि वह दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता ही गया।
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥॥१॥
शुभ मुहूर्त निकालकर विवाह के मंगल-कंकण खोले गए, मंगल, आनंद और विनोद कम न था। इस नित नए सुख को देखकर देवता भी ईर्ष्या करने लगे, और ब्रह्मा से अयोध्या में जन्म लेने का वरदान माँगने लगे।
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥॥२॥
विश्वामित्र प्रतिदिन अपने आश्रम लौटने की इच्छा करते, पर राम की प्रेमपूर्ण विनय के वश रुक जाते। राजा दशरथ का भाव दिन-प्रतिदिन सौ गुना बढ़ता देखकर महामुनि विश्वामित्र उसकी सराहना करते थे।
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥॥३॥
जब विश्वामित्र ने विदा माँगी, तो राजा प्रेममग्न होकर पुत्रों सहित उनके आगे खड़े हो गए - हे नाथ, यह सारी संपदा आपकी ही है, मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक मात्र हूँ।
करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू॥अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥॥४॥
हे मुनि, इन बालकों पर सदा स्नेह बनाए रखिएगा, और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा। ऐसा कहकर राजा पुत्रों और रानियों सहित उनके चरणों में गिर पड़े, प्रेमविह्वल होने से मुख से वाणी ही न निकली।
दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥॥५॥
विश्वामित्र ने अनेक प्रकार से आशीर्वाद देकर प्रस्थान किया - उस प्रीति की रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। राम सब भाइयों सहित प्रेमपूर्वक उन्हें पहुँचाकर, आज्ञा पाकर लौट आए।
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥३६०॥
गाधिकुल के चंद्रमा विश्वामित्र मार्ग में जाते हुए राम के रूप, राजा की भक्ति, विवाह के उत्साह और आनंद को मन-ही-मन प्रसन्नतापूर्वक सराहते जा रहे थे।
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥॥१॥
ज्ञानी वामदेव और रघुकुल-गुरु वशिष्ठ ने फिर विश्वामित्र की कथा विस्तार से सुनाई। मुनि का यह सुयश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पूर्वजन्म के पुण्यों के प्रभाव की चर्चा करने लगे।
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥॥२॥
आज्ञा मिलते ही सब लोग अपने-अपने घर लौट गए, राजा भी पुत्रों सहित महल को गए। जहाँ-तहाँ लोग राम के विवाह की गाथा गाने लगे, उनका पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया।
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥॥३॥
जब से राम विवाह करके घर आए, तब से अयोध्या में सब प्रकार का आनंद बसने लगा। प्रभु के विवाह में जो उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और शेषनाग भी वर्णन नहीं कर सकते।
कबिकुल जीवनु पावन जानी।। राम सीय जसु मंगल खानी॥तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥॥४॥
सीता-राम के इस मंगलदायी यश को कवियों के जीवन को पवित्र करने वाला जानकर, अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए ही मैंने इसका थोड़ा-सा वर्णन कर दिया है।
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो।रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥
अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए ही तुलसीदास ने राम का यश कहा है, अन्यथा राम का चरित्र तो एक अपार समुद्र है, जिसका पार आज तक किस कवि ने पाया है। जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के इस मंगलमय उत्सव को आदरपूर्वक सुनकर गाएँगे, वे सीता-राम की कृपा से सदा सुख पाएँगे।
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥३६१॥
सीता-राम के इस विवाह-प्रसंग को जो प्रेमपूर्वक गाएँगे या सुनेंगे, उनके लिए सदा उत्साह और आनंद ही आनंद रहेगा, क्योंकि राम का यश स्वयं मंगल का धाम है।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथम: सोपान: समाप्त:।कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पहला सोपान समाप्त हुआ॥
इस प्रकार कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस के इस प्रथम सोपान, बालकाण्ड, की यहाँ समाप्ति होती है।
